The Token System – Chapter 1006
मैं पीछे की तरफ़ गया। कोठरी का दरवाज़ा खुला था। अंदर अँधेरा। मैंने टॉर्च जलाई।
कोठरी के कोने में, पुरानी चारपाई पर, माँ बैठी थी। सिर पर दुपट्टा, हाथ में एक पुराना लिफ़ाफ़ा। वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराई।
“आ गया?” उसने कहा।
“माँ —” मेरी आवाज़ फँस गई।
“बैठ,” उसने कहा। “चाय पी। चूल्हे पर रखी है।”
“माँ, आप यहाँ क्यों —”
“क्योंकि यहाँ कोई नहीं ढूँढता।” उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। “ये ले।”
“क्या है?”
“किशोरी लाल का लिफ़ाफ़ा। उसने भवानी को देना चाहा था। मैंने रास्ते से उठा लिया।”
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक ही काग़ज़ था। पीला, पुराना। ऊपर लिखा था — “किशोरी लाल का बयान।”
मैंने पढ़ा। दस लाइनें। और उन दस लाइनों में वो सब था जो भवानी ने कभी किसी को नहीं बताया। हवेली के काग़ज़ों के बदले में भवानी ने किशोरी लाल को क्या दिया। किस तारीख़ को। किसके हाथ से। कौन गवाह था।
“ये सबसे बड़ा सबूत है,” मैंने कहा।
“हाँ,” माँ ने कहा। “और सबसे बड़ा ख़तरा।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये बयान किशोरी लाल का है। और किशोरी लाल अब भवानी के साथ है। जब भवानी को पता चलेगा कि उसका बयान हमारे पास है, तो वो किशोरी लाल को मनाएगा — बयान बदलने के लिए। और किशोरी लाल बदल देगा।”
मैंने काग़ज़ मोड़कर अपनी जेब में रखा। “तो फिर?”
“तो फिर तू वो कर जो तू करता है,” माँ ने कहा। “सबको सामने लाकर खड़ा कर दे।”
मैं उठा। राजेंद्र दरवाज़े पर खड़ा सुन रहा था।
“कल नौ बजे,” मैंने कहा। “सब कुछ तय होगा।”
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। “एक बात।”
“क्या?”
“भवानी कल अदालत में कुछ ऐसा लाएगा जो तुम सोच भी नहीं सकते।”
“क्या?”
“मुझे नहीं पता। पर किशोरी लाल के बयान में एक लाइन है जो मैंने अभी तुम्हें नहीं दी।”
“कौन सी?”
माँ ने मेरी जेब से काग़ज़ वापस निकाला। उसने पलटा। आख़िरी लाइन के नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, कुछ लिखा था। माँ ने पढ़ा।
“किशोरी लाल ने लिखा है — ‘भवानी के पास एक और काग़ज़ है। उस पर मेरा हस्ताक्षर है। वो काग़ज़ हवेली का नहीं है। वो मेरे बेटे की मौत का है।’”
राजेंद्र ने साँस रोक ली। “मौत का काग़ज़?”
“किशोरी लाल के बेटे की मौत का,” माँ ने कहा। “जो अब तक हादसा बताई जाती थी। भवानी उसे अदालत में लाएगा। और अगर वो लाया, तो सारा केस उलट जाएगा।”
बाहर गली में एक गाड़ी की रोशनी आई और फिर चली गई। मैंने टोकन जेब से निकाला। वो अब गरम था।
उस पर एक नया शब्द उभरा — “सुबह।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “क्या?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस — कल सुबह जल्दी उठना होगा।”
रात के तीन बज रहे थे। माँ ने चूल्हे पर फिर चाय रखी। राजेंद्र ने कुर्सी खींची। और मैंने अपनी जेब से वो काग़ज़ निकाला, जो कमलेश ने छत से फेंका था — “कौशल्या का हिस्सा। अदालत में पेश।”
एक ही रात में तीन काग़ज़ मेरे पास थे। एक था कौशल्या का, जो भवानी का दावा तोड़ता था। दूसरा था किशोरी लाल का, जो भवानी का सच खोलता था। और तीसरा था वो, जो भवानी लाएगा — किशोरी लाल के बेटे की मौत का।
अब सिर्फ़ ये तय करना था कि नौ बजे अदालत में पहले कौन बोलेगा।
मैंने चाय का प्याला उठाया। कड़वी थी, पर गरम। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
बाहर आकाश हल्का हो रहा था।
॥
कमलेश ने चादर कंधे पर रखी और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ने लगी।
“रुको,” मैंने कहा। “एक बात पूछनी है।”
“पूछ।”
“भवानी कल अदालत में क्या लाएगा?”
वो रुकी। मुझे लगा वो टाल देगी। पर उसने चादर वापस कुर्सी पर रखी और मेरी तरफ़ मुड़ी।
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा। “पर रात में मैंने उसे अपने वकील को फ़ोन पर कहते सुना — ‘वो काग़ज़ लाओ जिस पर किशन के हस्ताक्षर हैं।’”
मेरे हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। राजेंद्र ने पकड़ लिया।
“किशन?” मैंने कहा। “किशन मेरे पापा हैं।”
“मुझे पता है,” कमलेश ने कहा। “और इसीलिए मैं कह रही थी — भवानी कुछ ऐसा लाएगा जो तुम सोच भी नहीं सकते।”
मैंने फ़ौरन घर का नंबर मिलाया। बेल बजती रही। कोई नहीं उठाया।
दूसरी बार। तीसरी बार। कोई नहीं।
“राजेंड्र,” मैंने कहा। “गाड़ी निकालो।”
“माँ घर पर हैं,” राजेंद्र ने कहा। “कह रही थीं कि चाय बनाकर इंतज़ार करेंगी।”
“तो फ़ोन क्यों नहीं उठा रहीं?”
हम तीनों गाड़ी में बैठे। रास्ते में मैंने माँ के मोबाइल पर भी मिलाया — बंद। कमलेश पीछे बैठी थी, उसने चादर सिर पर खींच ली थी।
“तुम्हारे पापा,” उसने धीमे से कहा, “बीस साल छिपे रहे। इस बात को याद रखना।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि जब कोई आदमी बीस साल छिपकर ज़िंदा रहता है, तो वो एक ही कारण से बाहर आता है — जब उसे लगे कि छिपकर उसने जो बचाया था, वो अब भी बचा हुआ है।”
गाड़ी मोहल्ले की गली में घुसी तो सुबह की पहली किरण छतों पर फैल रही थी। घर का गेट खुला था। आँगन में चूल्हा जल रहा था, और धुआँ सीधा आकाश की तरफ़ जा रहा था।
माँ चूल्हे के सामने बैठी थी। हाथ में सरकंडी, आँखें आग में।
“माँ!”
वो मुड़ी। चेहरे पर कोई हड़बड़ी नहीं थी। बस थकान थी।
“आ गए?” उसने कहा। “चाय रख दूँ?”
“माँ, पापा कहाँ हैं?”
उसने सरकंडी चूल्हे में डाली, फिर उठी। आँच से उसका चेहरा लाल था।
“गए,” उसने कहा।
“कहाँ गए?”
“भवानी के आदमी आए थे। कह रहे थे — ठाकुर साहब बुला रहे हैं, एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने हैं।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“और आपने उन्हें जाने दिया?”
“मैंने रोका,” माँ ने कहा। “गुहार लगाई। पर तुम्हारे पापा ने ख़ुद जाना चाहा।”
“क्यों?”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने बीस साल में नहीं देखा था — न डर, न ग़ुस्सा। बस एक साफ़-साफ़ हुक्म।
“उन्होंने कहा — ‘मैं बीस साल से छिप रहा हूँ। अब नहीं छिपूँगा। अगर भवानी मेरे बेटे के गले में फंदा डालना चाहता है, तो वो फंदा मेरे हाथ से लेगा।’”
“माँ, ये आपने क्यों —”
“मन्नू।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “मैं तुम्हारे पापा को बीस साल से जानती हूँ। वो जब भी कुछ तय करते हैं, अपने हिसाब से करते हैं। मैं उनसे बहस नहीं कर सकती थी।”
“आप बहस नहीं चाहती थीं या नहीं कर सकती थीं?”
माँ ने हाथ छोड़ दिया। “दोनों।”
राजेंड्र ने मेरा कंधा पकड़ा। “मन्नू, वक़्त नहीं है। सोचना बाद में।”
उसी वक़्त मेरा फ़ोन बजा। सुमन।
“मन्नू?” उसकी आवाज़ तेज़ थी, सीधी।
“हाँ।”
“अमर को होश आ गया है। और उसने एक बात बताई है जो तुम्हें तुरंत जाननी चाहिए।”
“क्या?”
“उसके बाप ने — भवानी ने — एक पुरानी डायरी जलाई थी। रात में। उसी डायरी में किशन के हस्ताक्षर थे।”
मैंने गाड़ी की छत को हाथ लगाया। “तो वो डायरी अब राख है?”
“नहीं,” सुमन ने कहा। “शेखर बाबू ने वो राख बचा ली है। जलती डायरी से जो काग़ज़ बचा, वो उन्होंने अपने केबिन में छिपा दिया है।”
“शेखर बाबू? वो तो कल से गायब थे।”
“वो मेरे केबिन में ही छिपे थे,” सुमन ने कहा। “रात में उन्होंने मुझे सब बता दिया। अब वो कुछ काग़ज़ लेकर आ रहे हैं।”
“कितनी देर में?”
“पंद्रह मिनट। तुम होम पर पहुँचो।”
“मैं तो होम पर ही हूँ,” मैंने कहा। “पर पापा —”
“मन्नू, सुनो।” सुमन की आवाज़ एकदम से धीमी हो गई। “अमर ने एक और बात कही। उसने कहा कि भवानी कल रात अपने कमरे में बैठा हुआ एक काग़ज़ देख रहा था। बार-बार देख रहा था। और वो काग़ज़ किसी मौत का काग़ज़ था।”
“किशोरी लाल के बेटे का।”
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