The Token System – Chapter 1005
मैंने काग़ज़ लिया। पुराना पीला, कोने से फटा। मोटी स्याही। नीचे हस्ताक्षर — मोटा, टेढ़ा।
“पढ़,” भवानी ने कहा।
मैंने पढ़ा। “मैं कौशल्या देवी, अपना हिस्सा हवेली से भवानी सिंह के नाम करती हूँ। बदले में मेरी बेटी कमलेश की शादी मेरी मर्ज़ी से नहीं होगी, और मुझे इस घर में रहने की इजाज़त होगी।”
मैंने नीचे देखा। हस्ताक्षर के नीचे दो गवाहों के नाम थे। एक का नाम मिटा हुआ था। दूसरे का नाम — हरि सिंह।
“देखा?” भवानी ने कहा। “ये काग़ज़ मेरे पास है। तेरे पास मुहर है। दोनों मिलकर काम करते हैं।”
“कैसे?”
“जज मुहर देखेगा, तो पूछेगा — ये कहाँ से आई? मैं कहूँगा — मेरे घर से। मेरी माँ की थी। और ये काग़ज़ दिखाऊँगा, जिस पर उसी माँ के हस्ताक्षर हैं। यानी मुहर मेरी जायदाद है, और तेरे पास चोरी से आई है।”
मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।
“रख लो।”
“तू समझा नहीं।”
“समझ गया,” मैंने कहा। “पर एक बात पूछूँ?”
“पूछ।”
“इस काग़ज़ पर दूसरे गवाह का नाम क्यों मिटा है?”
भवानी की आँखें झपकीं। एक बार। दो बार।
“क्या फ़र्क पड़ता है?”
“फ़र्क पड़ता है,” मैंने कहा। “अगर गवाह ज़िंदा है, तो वो अदालत में बताएगा कि शर्त पूरी हुई या नहीं। पूरी नहीं हुई। कौशल्या को घर से निकाल दिया गया। कमलेश की शादी तुड़वा दी गई। यानी काग़ज़ खुद ही हार गया।”
भवानी की उँगलियाँ खिड़की पर कस गईं।
“तू बहुत बोलने लगा है, मन्नू।”
“आपके यहाँ से सीखा है।”
वो मुस्कुराया। वो मुस्कान जो मैंने पहली बार देखी थी — बिना दाँत, सिर्फ़ होंठ। “कल सुबह नौ बजे।” उसने खिड़की बंद की। गाड़ी चली।
राजेंद्र ने मेरी जेब से हाथ निकाला। “वो काग़ज़ देखना था मुझे।”
“देख लिया। असली है।”
“तो भवानी का दावा मज़बूत हो गया।”
“नहीं,” मैंने कहा। “अब हमें सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए — दूसरे गवाह का नाम।”
“कौन मिटाएगा?”
“कोई मिटाएगा नहीं,” मैंने कहा। “सक्सेना स्याही की परत उठा सकती है। पहले भी उठाई है।”
राजेंद्र ने कमलेश की गाड़ी की तरफ़ देखा। “वो ठीक है?”
“ठीक है। पर उसका डर असली है।” मैंने मुहर जेब से निकाली। गरम थी, पर पहले से कम। “ये मुहर भवानी के डर का कारण है। वो जानता है कि ये किसी भी अदालत में उसका पूरा हिसाब खोल सकती है।”
“तो इसे कहीं सुरक्षित रखना होगा।”
“सक्सेना के पास,” मैंने कहा। “पर पहले मुझे एक काम करना है।”
हम सक्सेना के दफ़्तार पहुँचे सुबह पाँच बजे। सक्सेना सो नहीं रही थी। मेज़ पर बैठी थी, सामने चाय ठंडी पड़ी थी। कमलेश दरवाज़े पर खड़ी थी, दुपट्टा सिर से खिसक गया था।
“काग़ज़ दिखाओ,” सक्सेना ने कहा।
मैंने टेबल पर रख दिया। सक्सेना ने चश्मा लगाया, दोनों तरफ़ से देखा, फिर लैंप जलाया और काग़ज़ को उसके नीचे पकड़ा।
“दूसरा नाम मिटा है,” उसने कहा। “पर स्याही अलग है। ऊपर की स्याही काली है। मिटाने वाली स्याही नीली।”
उसने फ़ाइल से एक छोटी शीशी निकाली। उसमें कुछ बूँदें मिटाने वाले तरल की थीं।
“पहले भी किया था,” उसने कहा। “भवानी के हस्ताक्षर वाले काग़ज़ पर।”
उसने रुई से हल्का सा पोंछा। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर धीरे-धीरे अक्षर उभरने लगे। पहला अक्षर — “रा”। फिर एक लकीर। फिर अधूरा।
“रामदीन,” सक्सेना ने कहा।
“रामदीन?” मैंने कहा। “रामदीन मिस्त्री?”
“वही,” सक्सेना ने कहा। “कौशल्या के काग़ज़ का दूसरा गवाह रामदीन मिस्त्री था। जो हवेली का असली मालिक था। जिसे भवानी के दादा ने कुएँ में धकेला था।”
कमलेश आगे बढ़ी। उसके होंठ काँप रहे थे। “मेरे बाप?”
“हाँ,” सक्सेना ने कहा। “और अगर रामदीन गवाह था, तो इसका मतलब —” वो रुकी।
“क्या?” मैंने पूछा।
“मतलब ये काग़ज़ उसने लिखा था। कौशल्या का हिस्सा हरि सिंह को देना — ये रामदीन ने ही लिखवाया था। कौशल्या ने कभी देना नहीं चाहा।”
कमलेश फ़र्श पर बैठ गई। राजेंद्र ने पानी लाया। उसने गिलास दोनों हाथों में पकड़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
“तो माँ का हिस्सा आज भी उसका है?”
“हाँ,” सक्सेना ने कहा। “क्योंकि शर्त पूरी नहीं हुई। कौशल्या को घर से निकाला गया, कमलेश की शादी तुड़वाई गई। काग़ज़ अपने आप रद्द हो गया।”
कमलेश ने गिलास रखा। “तो हवेली का हिस्सा मेरा है।”
“तकनीकी तौर पर? हाँ। कानूनी तौर पर? अदालत को दिखाना होगा।”
“और भवानी के पास जो काग़ज़ है?” मैंने पूछा।
“वो नकली है,” सक्सेना ने कहा। “उसी काग़ज़ की फ़ोटोकॉपी। असली हमारे पास है।”
“तो भवानी ख़ुद अपना केस हार रहा है।”
“हार रहा है,” सक्सेना ने कहा। “पर वो अभी जानता नहीं।”
मैंने मुहर सक्सेना की मेज़ पर रखी। “ये भी आपके पास रहेगी।”
सक्सेना ने मुहर उठाई। उसकी उँगलियाँ काँपीं। “ये कौशल्या की सास की है।”
“आपको कैसे पता?”
“मेरे पापा के काग़ज़ों में इस मुहर का ज़िक्र है। इसे कौशल्या की सास ने बनवाया था, हवेली के पहले बँटवारे के वक़्त। इस मुहर के बिना हवेली का कोई काग़ज़ पूरा नहीं माना जाता था।”
“यानी अगर ये मुहर हमारे पास है, तो हम हवेली का कोई भी काग़ज़ बना सकते हैं।”
“बना सकते हैं।” सक्सेना ने चश्मा उतारा। “पर हम नहीं बनाएंगे। हम सिर्फ़ सच साबित करेंगे।”
बाहर आकर मैंने फ़ोन देखा। तीन मिस्ड कॉल — अमर के। मैंने वापस किया।
“मन्नू?” अमर की आवाज़ घबराई थी। “तुम्हारी माँ मिल गई?”
“नहीं। अभी नहीं।”
“मैं सुन रहा था,” अमर ने कहा। “भवानी कुछ और चाहता है। वो सिर्फ़ हवेली नहीं चाहता।”)
“क्या चाहता है?”
“नाम।” अमर की आवाज़ धीमी हो गई। “मेरे बाप का नाम उस काग़ज़ पर मेरे नाम के साथ है। अगर वो काग़ज़ अदालत में जाएगा, तो मेरा नाम भी जाएगा। और मेरा नाम का मतलब है — मैं उसका बेटा हूँ। मैं उसका हिस्सा हूँ।”
“तुम उसका बेटा नहीं हो,” मैंने कहा। “गेंदा का बेटा हो। मेरी बुआ का। मेरे चचेरे भाई हो।”
“मेरे काग़ज़ कहते हैं कुछ और।”
“काग़ज़ बदले जा सकते हैं,” मैंने कहा। “बसंत सिंह ने बदले। कौशल्या के काग़ज़ ने बदले। तुम्हारे काग़ज़ भी बदलेंगे।”
अमर चुप रहा। फिर बोला, “मन्नू, एक बात है। भवानी कल अदालत में ख़ुद आएगा, ये तो पता है। पर वो कुछ और भी लाएगा।”
“क्या?”
“मुझे नहीं पता। पर उसने किसी को फोन पर कहा — ‘सबूत साथ लाना, वो बच्चा आज बहुत बोल रहा है।’”
फ़ोन कटा। मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा।
“अब?” राजेंद्र ने पूछा।
“अब माँ को ढूँढना है।”
“कहाँ?”
मैंने जेब से टोकन निकाला। ठंडा था। सपाट। उस पर कुछ नहीं उभरा।
“टोकन कुछ नहीं बोल रहा,” मैंने कहा।
“तो?”
“तो इसका मतलब — जवाब मेरे पास है, टोकन के पास नहीं।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ घूरा। “क्या मतलब?”
“माँ ने मुझे मीरा के यहाँ से एक पर्ची भेजी थी — किशोरी लाल का नाम। उसका मतलब ये नहीं था कि किशोरी लाल माँ को उठा ले गया। उसका मतलब ये था कि किशोरी लाल के पास वो चीज़ है जो माँ चाहती थी।”
“क्या चीज़?”
“वो लिफ़ाफ़ा। जो किशोरी लाल भवानी को देना चाहता था। माँ उसे पहले ले गई।”
राजेंद्र की आँखें बड़ी हुईं। “तो माँ किशोरी लाल के पास है?”
“नहीं,” मैंने कहा। “माँ ने उसे छिपा दिया। और जब भवानी के आदमी उसे ढूँढने आए, तो वो ख़ुद भी छिप गई।”
“कहाँ?”
“जहाँ हर माँ जाती है,” मैंने कहा। “अपने बच्चे के घर।”
हम रात में ही मेरे घर पहुँचे। गली सूनी थी। घर का दरवाज़ा खुला था। अंदर चूल्हे पर चाय की केतली अब भी गरम थी, पर चाय जल चुकी थी।
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