The Mysterious Bell – Chapter 914
"तीन महीने," रेहाना ने कहा। "मेरे घर का चूल्हा तीन महीने नहीं जला। मेरे पति दूसरे शहर में काम करते थे, उन्हें पता नहीं चला। पैसे नहीं थे, तो मैंने चने उबालकर खाए। पड़ोसन ने कभी दो रोटियाँ डाल दीं, कभी एक कटोरी सब्ज़ी।"
वो रुकी, और मुझे लगा कि अगली बात वो धीरे बोलेगी।
"मेरा बेटा उन दिनों आठ साल का था। एक रात वो मेरे पास आया और उसने पूछा — अम्मी, क्या मैंने कोई गलती की?"
शबनम आपा ने गुमटी की तरफ़ मुँह फेर लिया।
"मैंने कहा नहीं बेटा। उसने कहा तो फिर हमें चूल्हा क्यों नहीं जलने देते?" रेहाना ने धीरे से सिर हिलाया। "आज वो अठ्ठाईस का है। दूसरे शहर में नौकरी करता है। महीने में एक बार फोन करता है। पिछले साल उसने पूछा — अम्मी, तुझे नौकरी से क्यों निकाला था? और मैं आज तक उसे जवाब नहीं दे पाई।"
कुछ देर कुछ नहीं बोला गया।
फिर डॉक्टर इसरानी बोले।
उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे बेंच पर उनकी तरफ़ झुकना पड़ा।
"मैंने तुम्हें निकाला नहीं था, रेहाना।"
रेहाना ने उनकी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"मैंने तुम्हारा नाम कटवाया था।" उन्होंने चश्मा उतार दिया और उसे मेज़ पर रखा। "काग़ज़ पर तुम्हें निकाला हुआ दिखाया था।"
रेहाना की आवाज़ बदल गई। वो नरम नहीं हुई, वो बस धार खो बैठी।
"आपने?"
"उस दिन शाम को," डॉक्टर ने कहा, "तुम्हारे घर के बाहर दो आदमी खड़े थे। मुझे खबर मिली। मैंने उन्हें नहीं देखा, पर जिसने बताया वो झूठ नहीं बोलता। लकड़ी के जूते थे। दोनों के।"
मेरी जेब में घंटी हिली। नहीं बजी। बस हिली।
"मुझे कहा गया," डॉक्टर इसरानी ने कहा, "कि अगर तुम्हारा नाम काग़ज़ों में ज़िंदा रहेगा, तो तुम्हारे घर का दरवाज़ा ज़िंदा नहीं रहेगा। मैं डर गया। मैं अभी भी डरता हूँ, और उस वक़्त मैं तीस साल जवान था, तो और डरता था।"
रेहाना ने कुछ नहीं कहा।
"काग़ज़ में मरा हुआ आदमी उनके हिसाब में कोई मतलब नहीं रखता," डॉक्टर ने कहा। "अगर तुम काग़ज़ में निकली हुई हो, तो तुमसे कोई डरता नहीं। तुमसे कोई पूछता नहीं। मैंने सोचा — एक नाम मिटा दूँगा, और एक ज़िंदगी बचा लूँगा।"
"और आपने मुझे बताया नहीं," रेहाना ने कहा।
डॉक्टर इसरानी ने मुँह खोला और फिर बंद कर लिया।
"क्यों नहीं बताया?" रेहाना ने पूछा।
वो बैठे रहे।
"डॉक्टर साहब," रेहाना ने कहा, "क्यों नहीं बताया?"
"मैं इसका जवाब नहीं दे सकता," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में जो था, वो माफ़ी नहीं थी। वो आदमी का अपने ही हाथों की तरफ़ देखना था।
रेहाना ने अपने बैग पर अपनी उँगलियाँ कस दीं।
मैंने देखा कि उसने कुछ कहने के लिए होंठ खोले। फिर बंद कर लिए। फिर उसने एक बार बैग के अंदर हाथ डाला, जहाँ उसका रजिस्टर था, और तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया, जैसे किसी ने अंदर से उसे झुलसा दिया हो।
मैं कुछ नहीं बोला।
पर मैं समझ गया।
कोई इंसान जब कोई बात छिपाता है, तो वो बात उसके हाथ में आ जाती है। वो बात उसकी उँगलियों में बैठ जाती है, और जब वो इंसान अपने हाथ किसी और चीज़ पर रखता है, तो छिपी बात उस हाथ से छू जाती है।
रेहाना ने उस रजिस्टर की किसी को कॉपी दी थी। यह उसने नहीं कहा। पर उसका हाथ बता रहा था।
और डॉक्टर इसरानी आज भी नहीं बोले कि उन्होंने यह बात उससे क्यों छिपाई। उन्होंने अपनी चुप्पी के लिए तीन सौ जवाब गिनाए। सब सही थे। एक भी काम का नहीं था।
मैंने उन दोनों को देखा और मुझे एक बात समझ आई, जो शायद मुझे पहले समझनी चाहिए थी।
आधा सच जोड़ नहीं होता।
आधा सच सिर्फ़ दरार पर रखी चादर होता है। तुम उसे देखते हो, तुम्हें लगता है कि नीचे अब कुछ नहीं है। फिर कोई उस चादर पर पाँव रखता है और वो धँस जाती है, और तब पता चलता है कि दरार वही की वही थी, बस तुमने उसे अंधेरे में देखा नहीं था।
डॉक्टर ने रेहाना की नौकरी बचाने के लिए उसका नाम मिटाया। रेहाना ने अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए रजिस्टर की कॉपी किसी को दी। दोनों ने एक-दूसरे से आधा सच कहा। दोनों पंद्रह साल से उसी चादर पर खड़े थे।
"आपा," मैंने कहा। "आपने मुझे अपना पूरा दर्द बताया। कम से कम आधा सच और बताओ।"
रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या?"
"आपने उस रजिस्टर की कॉपी किसी को दी है।"
उसका चेहरा नहीं बदला। बस उसकी गर्दन थोड़ी नीची हुई।
"किसी को नहीं," उसने कहा। पर यह पहला झूठ था जो उसने आज रात बोला, और उसने इसे उसी तरह बोला जैसे कोई पुरानी आदत से कोई छोटी गलती कर दे।
मैंने उससे यह नहीं कहा कि मुझे पता है। मैंने कहा,
"ठीक है। जब आप बोलना चाहें, मैं सुनूँगा। बेंच यहीं रहेगी।"
शबनम आपा ने उस वक़्त अपनी गुमटी की तरफ़ देखा।
"मेरी बेंच हमेशा यहीं रहेगी," उन्होंने कहा। "पर मेरी बेंच पर झूठ बोलने की जगह नहीं है। ये बेंच सस्ती है, हिम्मत नहीं है।"
रेहाना ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोली।
तभी घंटी बजी।
एक बार।
बहुत छोटी आवाज़। ऐसी जैसे कोई दूर किसी बंद कमरे में बजा रहा हो और आवाज़ दीवार से टकराकर हम तक आई हो।
मैंने जेब से उसे निकाला। वो और गरम हो गई थी, पर उसकी पीतल की सतह पर उँगली रखने पर लगा कि वो काँप रही है।
"क्या कहा तूने?" मैंने पूछा।
"दोनों सच बोले," घंटी ने कहा। "दोनों आधा रखा।"
"तो जोड़ कब होगा?"
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा,
"अंकुश।"
"हाँ।"
"आज मैं छोटी लग रही हूँ।"
और चुप हो गई।
मेरे हाथ में पीतल बर्फ़ जैसा ठंडा नहीं हुआ। वो गरमी में ही बंद रही, बस आवाज़ जाती रही। मैं उसे उलटकर अपनी हथेली में दबाकर बैठ गया। कभी-कभी तुम्हें एक चीज़ की सबसे बड़ी कमी उसकी आवाज़ नहीं, उसकी आवाज़ की ताक़त लगती है। घंटी आज थकी हुई लग रही थी।
रेहाना उठ खड़ी हुई।
"मैं जाऊँ?" उसने पूछा। किसी से नहीं, गुमटी की लालटेन से पूछा।
"आपा," मैंने कहा। "कल पाँच बजे की सभा है। आपका रजिस्टर वहाँ पहुँचना चाहिए। आप खुद पहुँचिएगा। मैं आपको बुलाने को कोई नहीं भेजूँगा। आपको आना है या नहीं, ये आप तय करेंगी।"
उसने सिर हिलाया।
वो गुमटी के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, जैसे कुछ कहना हो, पर वो रुक गए। उनका हाथ हवा में रह गया और फिर नीचे गिरा।
डॉक्टर इसरानी ने हलवे की कटोरी उठाई।
इस बार उन्होंने एक चम्मच मुँह में रखा। वो बूढ़े आदमी जब हलवा खा रहे थे तो मुझे लगा कि वो दवा निगल रहे हैं।
रेहाना दरवाज़े पर पहुँची, उसने अपनी ओढ़नी ठीक की और फिर वो रुक गई।
वो पीछे मुड़ी।
मुझे लगा कि वो शायद मुझसे कहेगी कि कल सुबह वो कितने बजे आएगी, या यह कि डॉक्टर साहब को उससे माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए। पर उसने जो कहा वो मैंने सोचा भी नहीं था।
"अंकुश।"
"हाँ आपा।"
"उस रात रजिस्टर में ज़मीन का मालिक वो नहीं था जो आज है।"
मेरी पीठ ठंडी हो गई।
"आपने पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मैं पंद्रह साल से उस नाम को भूलना चाहती थी," उसने कहा। "और भूलने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह होता है कि तुम किसी और को बता दो। मैंने किसी को नहीं बताया।"
वो एक कदम आगे आई। लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, और मैंने देखा कि उसकी आँखें सूखी थीं। इतनी सूखी कि लगा कि उनमें अब रोने के लिए भी पानी नहीं बचा।
"उसका नाम शिवनारायण था," उसने कहा। "पूरा नाम नहीं लिखा था। बीच में एक लकीर खींचकर आधा कर दिया गया था। ऊपर किसी ने अंगूठा लगाया था और उस अंगूठे के नीचे उसका नाम काट दिया गया था।"
गुमटी के बाहर हवा रुक गई।
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