The Mysterious Bell – Chapter 913
"उस रात पिछले दरवाज़े के पास नाली में मिला था," उसने कहा। "आधा जला, आधा भीगा। मैंने उसे उठाया, कपड़े में लपेटा और अपने बक्से में रख दिया। न जाने क्यों रखा। मुझे इतना ही पढ़ना आता है कि दवा की पर्ची पहचान लूँ।"
"और आज?"
"आज सुबह एक बाई आई," उसने कहा। "सफ़ेद वर्दी। चेहरा देखा नहीं, मुँह पर कपड़ा था। उसने मेरा नाम लिया। हमीदा। इस अस्पताल में मेरा नाम अब कोई नहीं लेता। वो बोली कि तेरे पास एक पुराना काग़ज़ है, आज उस लड़के को दे देना जो घंटी रखता है। उसने कहा कि वक़्त आ गया है।"
"कैसे पहचाना कि मैं वही हूँ?"
वो मुस्कुराई। बूढ़े लोग ऐसे ही मुस्कुराते हैं, जैसे जवाब देने से ज़्यादा ज़रूरी हो कि सवाल अब बेकार हो गया है।
"तू गलियारे में आया," उसने कहा, "और तीन लोगों ने तेरी तरफ़ देखा। डॉक्टर साहब ने चश्मा उतार दिया। रेहाना ने रजिस्टर बंद कर दिया। तू जिस जगह खड़ा हो, वहाँ हवा बदल जाती है। मुझे इतना पढ़ना आता है।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो बेंच पर बैठे थे और उनका चश्मा उनके हाथ में था। उन्होंने वो काग़ज़ माँगा।
मैंने दे दिया।
उन्होंने उसे खोला, एक उँगली उस अधूरे नाम पर रखी और कुछ देर वैसे ही बैठे रहे। फिर उन्होंने चश्मा पहना और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"शिवनारायण," वो बोले।
"आप इन्हें जानते हैं?"
डॉक्टर इसरानी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने बेंच से हाथ उठाया, जैसे कुछ कहने की कोशिश की, और फिर हाथ गिरा दिया।
रेहाना ने काग़ज़ लिया। उसने उसे देखा और मुझे लगा कि वो काग़ज़ नहीं, किसी का चेहरा देख रही है। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
हमीदा ने अपनी साड़ी ठीक की।
"मैं चलूँ?" उसने पूछा।
"आपको बाई कहाँ मिली थी?"
"सीढ़ी के नीचे।" उसने सीढ़ी की तरफ़ इशारा किया। "वहाँ कोई नहीं बैठता। वो बैठी थी। मैंने उसे रोटी देनी चाही, तो उसने कहा कि मेरे पास वक़्त नहीं है। और फिर मेरे हाथ में यह काग़ज़ रखकर चली गई।"
"कहाँ गई?"
"बाहर।" हमीदा ने अस्पताल के गेट की तरफ़ देखा। "मैं उसके पीछे जाने की सोच रही थी, पर मेरी टाँगें। इसलिए सीधे तुम्हारे पास आई।"
वो चली गई। हमने उसे जाते हुए देखा।
तुम सोच रहे होगे कि इतने सारे काग़ज़ और इतने सारे नाम हो गए हैं, इनका क्या करेगा ये आदमी। पर गली के काम ऐसे ही चलते हैं। पहले एक नाम आता है, फिर उस नाम के नीचे एक और नाम उभरता है, और जब तक तुम सब जोड़ते हो, तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारा अपना नाम भी उसी जोड़ में पड़ा था।
मैंने काग़ज़ ऐसे मोड़ा जैसे लोग बहुत कीमती चीज़ मोड़ते हैं, और अपनी जेब की तरफ़ देखा।
घंटी गरम थी।
इतनी गरम कि कपड़े से भी महसूस हुई।
माँ अस्पताल के नीचे वाले कमरे में थीं। मैंने काजल से कहा कि वो उनके पास रहे। मीरा को कहा कि गुमटी पर आ जाए, जब वो पन्नों की तस्वीरें उतार ले। और खुद डॉक्टर इसरानी के सामने खड़े होकर कहा,
"डॉक्टर साहब, शाम को मुझे आपके साथ गुमटी पर बैठना है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे?" उन्होंने कहा।
"आपको।"
"मैं तेरे काम का आदमी नहीं हूँ, बेटा।"
"आप रेहाना आपा के काम के आदमी हैं," मैंने कहा। "और वो मेरे काम की हैं। तो गणित ऐसे ही चलता है।"
वो कुछ कहने से पहले मुस्कुराए। फिर रुक गए, जैसे मुस्कुराने पर खुद उन्हें ताज्जुब हुआ हो।
शाम को सात बजे गुमटी की लालटेन जल रही थी और सामने वाली बेंच खाली कर दी गई थी। शबनम आपा ने यह खुद किया था। उन्होंने अपनी पुरानी बेंच पर एक मैली चादर बिछाई और चारों तरफ़ देखकर कहा,
"आज यहाँ कोई चाय नहीं पीएगा। जब कोई भी मुँह खोलना है, तो खोले। चाय पीने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है।"
मैं बैठा। डॉक्टर इसरानी आए और बेंच के एक सिरे पर बैठे जैसे उन्हें लगता हो कि कहीं डेढ़ इंच आगे बैठने से कोई चीज़ बिगड़ जाएगी। रेहाना आई, उसने अपना रजिस्टर अपने बैग के अंदर कसकर रखा, बैग अपनी गोद में रखा और मेरे सामने बैठी।
और शबनम आपा बिना कुछ पूछे अंदर गईं और तीन कटोरी हलवा लेकर आईं।
घी का हलवा, ऊपर दो बादाम, कटोरी गरम थी और वो मेज़ पर रखते वक़्त कच-कच बोली।
"आपा, हमने माँगा नहीं," मैंने कहा।
"माँगने पर तो चाय भी मिल जाती है," शबनम आपा ने कहा। "ये बात भारी है। भारी बात से पहले हलवा खाया जाता है, वरना ज़ुबान काँपती है।"
उन्होंने एक कटोरी मेरी तरफ़ धकेली, एक डॉक्टर साहब की तरफ़, और तीसरी रेहाना के आगे रख दी।
रेहाना ने उसे नहीं छुआ।
डॉक्टर इसरानी ने भी नहीं छुआ।
मैंने एक चम्मच लिया। मुँह में हलवा ऐसा लगा जैसे बहुत सालों बाद कुछ मीठा खा रहा हूँ और मैं इसके लायक़ नहीं हूँ। मैंने चम्मच रख दिया।
"आपा बोल रही हैं," मैंने कहा। "तो मैं कहता हूँ। रेहाना आपा, आज सुबह से जो भी काग़ज़ हमारे हाथ लगे हैं, सब एक ही दीवार की तरफ़ जा रहे हैं। पर उस दरवाज़े की चाबी आपके पास है। मुझे उस रात की पूरी बात चाहिए। बिल्कुल शुरू से।"
रेहाना ने अपने बैग के पट्टे से हाथ नहीं उठाया।
वो सीधी बैठी, आँखें गुमटी के बाहर अंधेरे में, और बोलने लगी। उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई पुराना रास्ता चलता चलता पीछे मुड़कर गिनती कर रहा हो।
"उस रात मैं आख़िरी ड्यूटी पर थी," उसने कहा। "डॉक्टर साहब ने मुझे काग़ज़ों का हिसाब दिया था। अस्पताल का रजिस्टर, दवा की परची, मरीज़ का नाम, पता, अंगूठा। सब मैंने अपने हाथ से लिखा था। मेरी लिखाई चलती थी।"
वो रुकी और शबनम आपा ने बिना बोले उसके आगे पानी का गिलास रख दिया।
"रात के ग्यारह बजे थे," रेहाना ने कहा। "मैं रजिस्टर के आख़िरी पन्नों पर थी। ज़मीन वाला हिस्सा। वो अलग रजिस्टर था, पुराना, जिसके किनारे उखड़ गए थे। मैंने पन्ना पलटा और मेरा हाथ रुक गया।"
"क्यों रुका?" मैंने पूछा।
"क्योंकि उस पन्ने पर नाम बदला हुआ था।"
उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मुझे हल्का कर देना चाहती हो।
"मैं थकी थी," उसने कहा। "पहली बार मुझे लगा कि आँखें धोखा दे रही हैं। मैंने पन्ना पलटकर दुबारा देखा। दुबारा वही। मैंने उसे तीसरी बार नहीं देखा। तीसरी बार देखना मतलब खुद से सवाल पूछना, और उस रात सवाल पूछने की हिम्मत मेरे पास नहीं थी।"
"आपने किसी को बताया?"
"सुबह डॉक्टर साहब को बताया।" उसने डॉक्टर की तरफ़ देखा। "वो यहीं बैठे हैं। उन्हें याद होगा।"
डॉक्टर इसरानी ने अपना सिर हल्का हिलाया।
"मैंने उनसे कहा था कि पन्ना बदला हुआ है," रेहाना ने कहा। "उन्होंने कहा कि अभी किसी से कुछ मत कहना। मैंने कहा ठीक है। मैं चुप रही। फिर मैं चाय लेने नीचे गई। जब लौटी, तो मेरी ड्यूटी वाले काग़ज़ पर मेरा नाम कटा हुआ था और उसके आगे लिखा था कि मुझे निकाल दिया गया है।"
गुमटी के बाहर हवा में लालटेन हिली।
"दोपहर होते-होते पूरी गली में बात फैल गई," उसने कहा। "कहने लगे कि रेहाना काग़ज़ों में हेर-फेर करती थी। काग़ज़ बदलने के पैसे लेती थी। मेरे घर के बाहर लोग खड़े होकर बातें करते। मेरी सास ने मुझसे पूछा — बहू, तूने किया है क्या?"
उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
"मैंने कोई काग़ज़ नहीं बदला," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ पढ़ा था। और पढ़ने की सज़ा मुझे मिली।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। उन्होंने हलवे की कटोरी उठाई, फिर रख दी। उनकी उँगलियों में कँपकँपी थी।
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