The Mysterious Bell915 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 915

7 min read November 5, 2026

"और नीचे?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे अपनी ही नहीं लगी।

"नीचे गवाह की जगह कोई नाम नहीं था," रेहाना ने कहा। "बस दो लकीरें थीं और बीच में एक बिंदु। वही निशान जो तुम्हारे घंटी के छल्ले पर है।"

उसने एक गहरी साँस ली, जैसे पंद्रह साल से छाती में रखी कोई चीज़ अब जाकर बाहर निकली हो।

"मैंने उस रात सोचा था कि ये कोई आम काग़ज़ है," उसने कहा। "आज सुबह तुम्हें देखकर समझ आया कि ये आम काग़ज़ नहीं था। ये बस आधा था। बाक़ी आधा किसी और के पास है।"

वो मुड़ी और बाहर चली गई।

मैं गुमटी की बेंच पर बैठा रह गया। मेरी जेब में वो पुराना काग़ज़ था, जिस पर शिवनारायण लिखा था और जो नाम अधूरा था।

मैंने काग़ज़ निकाला।

लालटेन की रोशनी में उस अधूरे नाम को देखा।

अब वो मुझे अधूरा नहीं लग रहा था।

वो बस आधा था। और आधा होने की बीमारी में लोग पूरा होने की दुआ माँगते हैं, पर सच यह है कि आधा नाम कभी पूरा नहीं होता, वो बस अगले आधे से जुड़ता है।

मेरे परदादा का नाम शिवनारायण यादव था।

और ज़मीन का काग़ज़ जब आख़िरी बार ज़िंदा था, तब उस पर उनका नाम था।

मैंने घंटी को हथेली पर रखा। वो गरम थी, और धड़क रही थी, बहुत धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए खुद से कह रहा हो कि बस, थोड़ा और।

शबनम आपा आईं। उन्होंने तीनों कटोरी देखीं। एक भी खाली नहीं थी। उन्होंने एक गहरी साँस ली और कटोरियाँ उठा लीं।

"अब क्यों उठा रही हो?" मैंने पूछा।

"क्योंकि बात पूरी नहीं हुई," उन्होंने कहा। "जब पूरी होगी, तब खाओगे। हलवा बिगड़ता नहीं है, बस ऊपर से सूख जाता है।"

उन्होंने कटोरियाँ अंदर रखीं और लौटकर मेरे सामने खड़ी हो गईं।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "आज रात तू घर जा। सो। कल सुबह कुछ होने वाला है। मुझे लग रहा है।"

"क्यों लग रहा है?"

"क्योंकि आज शाम मेरी गुमटी पर तीन लोग बैठे थे," उन्होंने कहा, "और तीनों ने अपना आधा सच कहा। इतना आधा सच मेरे चूल्हे की आग भी नहीं बुझा सकता। अब जो होगा, वो पूरा होगा।"

वो अंदर चली गईं और उन्होंने गुमटी की लालटेन धीमी कर दी।

मैं उठा और सड़क की तरफ़ चला।

मेरी जेब में काग़ज़ था और वो गरम था। घंटी भी गरम थी। और मेरे सीने में जो चीज़ गरम थी, उसका नाम डर था, पर वो डर आज किसी और चीज़ में बदल रहा था।

मैंने चलते-चलते घंटी को हथेली से दबाया।

"ठीक है," मैंने धीरे से कहा। "तू आज छोटी है। सुन ले। कल तेरी ज़रूरत बड़ी होगी। इसलिए आज आराम कर।"

घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।

पर उसकी गरमी एक पल के लिए थोड़ी सी बढ़ी।

जैसे किसी ने थककर भी हाँ कह दिया हो।

॥

रात मैं सोया तो घंटी सिरहाने रखी थी। तकिये के नीचे नहीं, सिरहाने। जान-बूझकर। ताकि अगर वो बोले तो मैं सुन सकूँ, और अगर वो चुप रहे तो मुझे पता रहे कि वो चुप है।

वो चुप रही।

पूरी रात चुप रही। एक बार भी नहीं बजी। मैं बीच-बीच में जागकर हाथ बढ़ाता, उसे छूता, वो गरम मिलती। और मैं फिर सो जाता।

सुबह माँ की आवाज़ से नींद खुली। वो अस्पताल से लौट आई थीं। डॉक्टर इसरानी ने कहा था कि आज एक जाँच और होगी, पर माँ ने कहा कि जाँच अस्पताल में भी हो सकती है और घर में भी, और घर वाली जाँच में चूल्हा जलता रहता है।

मैं उठकर बैठा। कमरे में हल्की धूप आ रही थी, और उस धूप में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे किसी ने हवा में चीनी घोल दी हो।

"आज जल्दी," माँ ने कहा। "चाय पीकर निकल।"

मैंने कुछ पूछा नहीं। माँ की आवाज़ में एक बात थी जो सुबह-सुबह चेतावनी जैसी लगती है। वो चाय बना रही थीं और उनके हाथ की हरकत तेज़ थी। जब माँ के हाथ तेज़ होते हैं, तो समझ लो कि कुछ होने वाला है।

मैंने चाय पी। दो घूँट में। जल गया, फिर भी पी गया, क्योंकि माँ की नज़र सामने थी।

गले में चाबी थी, जेब में घंटी, और दूसरी जेब में वो पुराना काग़ज़, जिस पर मेरे परदादा का आधा नाम लिखा था।

मैं निकला।

गली में सुबह का वो वक़्त था जब दूध वाला जा चुका होता है और स्कूल वाले नहीं निकले होते। पीपल के नीचे दो-तीन लोग खड़े थे। मुझे दूर से ही कुछ गड़बड़ लगी, क्योंकि लोग जिस तरह खड़े थे, वो तरीका बात करने का नहीं, देखने का था।

जैसे कोई चीज़ गिरी हो।

मैं आगे बढ़ा।

और फिर मैंने वो देखा जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

जोड़ केंद्र पर, यानी उस टूटी लकड़ी की मेज़ पर जिस पर सफ़ेद पेंट से मैंने खुद लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ — उस मेज़ पर अब कुछ नहीं था। मेज़ हटा दी गई थी। और पीपल की जड़ के पास, चबूतरी के उस हिस्से में जहाँ मैं रोज़ बैठता था, लोहे का एक मोटा ताला लगा था।

मोटा ताला। मतलब ऐसा जो आम चाबी से न खुले। जिसकी गर्दन मोटी हो, जिसकी कुंडी किसी पुराने सरकारी दफ़्तार की कुंडी जैसी भारी हो।

और ताले के ऊपर, चबूतरी की ईंट पर, एक काग़ज़ चिपका था।

सील नोटिस।

मैं जानता हूँ तुम सोच रहे होगे कि एक ताला और एक काग़ज़, इसमें क्या बड़ी बात। भाई, ताला ताले की जगह लगता है। ये ताला किसी दरवाज़े पर नहीं लगा था। ये उस जगह पर लगा था जहाँ से पूरी गली में एक भी अच्छी बात शुरू होती थी।

जहाँ एक महीने पहले सिर्फ़ धूल थी, वहाँ लोग आकर बैठने लगे थे। और अब वहाँ ताला था।

मैं सीधा खड़ा रह गया।

पीछे से टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद, ये कब लगा?"

"मुझे क्या पता," मैंने कहा। "मैं रात को सोया था, ताला नहीं बना रहा था।"

वो मेरी तरफ़ देखकर हँसा नहीं। उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चे के चेहरे पर तब आता है जब उसे लगता है कि बड़ों ने कुछ ऐसा कर दिया है जो अब वापस नहीं होगा।

और तभी मैंने वो आवाज़ सुनी।

पान चबाने की आवाज़।

मैं मुड़ा।

बबलू पांडे वहाँ खड़ा था। गले में वही मोटी सोने की चेन, हाथ में वही पानदान, और पीछे उसके दो आदमी — एक हाथ में मोटी लाठी, दूसरा हाथ में काला बैग। दोनों चुप। दोनों ऐसे खड़े जैसे दीवार के दो हिस्से हों।

बबलू ने मुझे देखा और मुस्कुराया।

और यही सबसे डरावनी बात थी।

क्योंकि बबलू पांडे की आवाज़ में हमेशा एक चीख होती थी। वो चीखता हुआ भी नहीं चीखता था, उसकी बात में ही चीख घुली रहती थी। पान की चीख। धमकी की चीख। वो आदमी जब बोलता था तो लगता था कि कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।

आज वो नहीं थी।

आज उसकी आवाज़ में नरमी थी। झूठी नरमी।

"अंकुश भाई," उसने कहा। "सुबह-सुबह आ गए? चाय ले लो, मैंने कहा है गुमटी वाली को।"

"शबनम आपा तुम्हारी चाय नहीं बनातीं," मैंने कहा।

"अरे, बना रही हैं," उसने कहा। "आज बना रही हैं।"

उसने अपना हाथ मोटे ताले पर रख दिया। ऐसे, जैसे कोई अपने ही घर के दरवाज़े पर हाथ रखे। और यही बात मुझे अंदर तक चुभी।

"देखो भाई," उसने कहा। "ये चबूतरी साहब ने सार्वजनिक काम के लिए माँगी है। अब इसे सार्वजनिक काम कहो या भला काम, काग़ज़ पर बात एक ही है। कल सुबह सर्वे टीम आएगी। अस्पताल के आँगन में। सुबह सात बजे।"

भीड़ बढ़ रही थी। पीछे से कोई बोला, "कौन सा सर्वे?"

बबलू ने उस आदमी की तरफ़ देखा भी नहीं। उसने सिर्फ़ अपना पान मुँह के एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ घुमाया।

"अरे भाई," उसने कहा, "सर्वे मतलब नाप। नाप मतलब पता लगाना कि क्या कहाँ है। कुछ छीन नहीं रहे, कुछ बाँट रहे हैं।"

"क्या बाँट रहे हो?" ये आवाज़ मीरा की थी। वो कब आई, मुझे पता नहीं चला। उसके कंधे पर कैमरा था और बगल में वो फटा बैग।

बबलू ने उसे देखकर मुस्कुराया।

"बेटा, तुम रोज़ आती हो," उसने कहा। "कुछ नया भी लाओ।"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho