The Mysterious Bell817 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 817

7 min read November 5, 2026

चबूतरी तक पहुँचने में मैंने शायद सौ कदम रखे होंगे। पर हर कदम पर मुझे लगा कि गली लंबी होती जा रही है, जैसे रबर की हो और कोई उसे दोनों तरफ़ से खींच रहा हो।

पीपल का पेड़ पास आया, तो हवा भी बदल गई। गर्मी की हवा नहीं थी, बस एक ठंडी सी परत, जैसे किसी पुराने कमरे से आई हो।

चबूतरी पर वो बैठी थी।

सिर पर ओढ़नी थी, मैली सफ़ेद, किनारों से ज़र्द पड़ी हुई। ओढ़नी इतनी बड़ी थी कि उसका पूरा शरीर ढका हुआ था, और पीछे से आती लालटेन की पीली रोशनी उसे एक अलग ही आकार दे रही थी।

उसके हाथ सामने थे।

दोनों हाथ।

और मैंने देखा।

बाएँ हाथ की कलाई पर हरी शीशे की चूड़ी थी। चमक ख़त्म हो चुकी थी। किनारे से एक जगह चूड़ी में दरार भी थी, जैसे कभी गिरी हो और फिर धागे से बाँधकर सँभाल ली गई हो।

मेरे पैर अपने आप रुक गए।

वो उठी नहीं। उसने सिर्फ़ अपना सिर उठाया और मुझे देखा।

चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर आँखें… आँखें साफ़ थीं। बहुत साफ़। और उन आँखों में वो नहीं था जो मैंने सोचा था। रोना नहीं। शिकायत नहीं। गुस्सा नहीं।

बस एक चीज़ थी।

इंतज़ार।

इतना लंबा इंतज़ार, जिसका वक़्त नहीं गिना जाता, सिर्फ़ सहा जाता है।

"आ जा।" उसने कहा।

आवाज़ दबी थी, रूखी थी, जैसे कई साल से बिना इस्तेमाल का दरवाज़ा खुला हो।

मैं दो कदम आगे बढ़ा।

"आ जा, शंकर के बेटे।"

मेरे अंदर कुछ हिल गया। मैं बोला नहीं।

"बैठ।" उसने चबूतरी पर जगह दिखाई।

मैं बैठ गया। बैठते ही मेरी जेब से घंटी की धीमी झनक हुई, पर उसने अभी खुद नहीं बजा।

औरत ने अपना हाथ बढ़ाया।

"हाथ दे।"

मैंने अपना दाहिना हाथ बढ़ा दिया।

उसने मेरा हाथ अपनी झुर्रीदार, खुरदुरी उँगलियों में लिया और उसे उलटकर देखा। मेरी उँगलियों के जोड़ों पर ग्रीस के पुराने निशान थे, हथेली के किनारे कीचड़ की पतली लकीर थी, और अँगूठे की जड़ पर एक छोटा सा चीरा पड़ा था।

वो मेरी हथेली को देखती रही।

फिर उसने बीस साल की चुप्पी में पहली बात कही।

"ये हाथ जगदीश के हैं।"

मेरी साँस रुक गई।

"मैंने…" मेरी आवाज़ फँस गई। मैंने गला साफ़ किया। "मैंने दादा को देखा नहीं है।"

"देखा नहीं है।" उसने दोहराया। "पर तेरे हाथ ने देखा है।"

उसने मेरी हथेली पर उँगली रखी।

"जगदीश के हाथ भी ऐसे थे। बड़ी हथेली, छोटी उँगलियाँ। और जब वो पेंच कसता था, तब उसकी कलाई के अंदर की नस उभर जाती थी। ऐसे।"

उसने मेरी कलाई की तरफ़ इशारा किया।

और मैंने अपनी कलाई नीचे देखी।

नस उभरी हुई थी।

मैंने हाथ खींचा, फिर रोक लिया। मैंने उसकी आँखों में देखा।

"आप…"

"मुझसे नाम न पूछ।" उसने तुरंत कहा।

और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ कसा हुआ आया।

"नाम पूछने से पहले…" उसने मेरा हाथ फिर दबाया। "पहले अपने पापा के पास जा।"

मैं जम गया।

"क्या?"

"जो आज रात टूटा है, उसे अकेला मत छोड़।" उसने कहा। "मैं इतनी दूर से आई हूँ, दो दिन पैदल, तेरा चेहरा देखने के लिए। मैं और दो घंटे बैठ सकती हूँ। पर तेरा पापा…"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तेरा पापा दो घंटे नहीं सह पाएँगे।"

और ठीक उसी वक़्त, जैसे उसकी बात को किसी ने गली के दूसरे सिरे से झटका देकर सच कर दिया हो, आँगन की तरफ़ से एक चीख आई।

काजल की चीख।

"माँ! माँ, पापा!"

मेरा शरीर पलक झपकने में चबूतरी से उठ गया।

वो औरत मेरी कलाई पकड़े हुई थी।

"जा।" उसने कहा और हाथ छोड़ दिया। "जा, और जब वो होश में आएँ, तो उनसे कह देना कि माँ आई है।"

मैं दौड़ा।

कुछ नहीं सोचा। नाम नहीं पूछा। पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखा कि वो उठी या बैठी रही।

मैं बस दौड़ा।

और इस बार घंटी जेब में बजती रही, पूरे रास्ते, तेज़-तेज़, जैसे मेरे साथ दौड़ रही हो।

आँगन में पहुँचा तो देखा कि पापा ज़मीन पर पड़े थे।

मुँह के बल नहीं, करवट। दाहिना हाथ सीने पर, बायाँ फैला हुआ, और वो साँस लेने की कोशिश कर रहे थे, पर साँस उनके शरीर में ठीक से नहीं उतर रही थी। उनका चश्मा नाक पर टेढ़ा लटका था, एक काँच चटका हुआ, टेप खुली हुई।

काजल घुटनों के बल उनके पास बैठी थी और उनका हाथ पकड़े हुए थी।

माँ कुछ दूर खड़ी थीं, और वो हिल नहीं रही थीं। बिल्कुल नहीं। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनके होंठ काँप रहे थे।

"पापा।" मैं घुटनों पर गिरा। "पापा, सुनते हो?"

उनकी आँखें खुली थीं। वो मुझे देख रहे थे।

"अं… अंकुश।" उन्होंने कहा।

आवाज़ इतनी धीमी कि लगा जैसे किसी दूसरे कमरे से आ रही हो।

"मैंने…" उन्होंने साँस खींची। "मैंने ज़ोर से नहीं लगाया था।"

मैं ठंडा हो गया।

"क्या?"

"अंगूठा।" उन्होंने कहा। "मैंने ज़ोर से नहीं लगाया था। मेरा हाथ… मेरा हाथ काँप रहा था। उसने मेरा हाथ पकड़ा था। उसने खुद दबाया था।"

मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल की आँखों में पानी था और वो अपने होंठ काट रही थी।

"भैया।" उसने कहा। "उन्होंने अभी अचानक… अचानक हाथ सीने पर रखा और गिर पड़े।"

"पल्स?" मैंने पूछा।

"चल रही है।" काजल ने कहा। "धीमी है, पर चल रही है। और मुठ्ठी… मुठ्ठी ठंडी हो रही है।"

तभी माँ आगे आईं।

उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा और मुझे धीरे से खींचकर उठाया।

"अंकुश।" उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ में वो नहीं था जो माँ की आवाज़ में होता है। न डाँट, न घबराहट। बस एक चीज़ थी, जो इतनी साफ़ थी कि मेरी रीढ़ तक उतर गई।

"आज रात।" उन्होंने कहा, और हर शब्द अलग से बोला। "आज रात इस घर में कोई झूठ नहीं सोएगा। कोई नहीं।"

"माँ, पहले उन्हें–"

"मैं जानती हूँ।" उन्होंने मेरी बात काटी। "अस्पताल ले जाओ। पर मैं तुमसे कह रही हूँ, अंकुश — दवा शरीर ठीक करती है। सच घर ठीक करता है। और आज इस घर में दोनों होंगे।"

फिर वो मुड़ीं।

"काजल, चादर ला। टिंकू, डॉक्टर इसरानी को फोन कर। उस्ताद के पास जाकर कहो कि अस्पताल आ जाएँ। मीरा…"

मीरा पहले से गेट पर खड़ी थी। कैमरा उसके हाथ में था, पर बंद था।

"मीरा।" माँ ने कहा। "कैमरा यहीं रख दो। पहले इंसान हो, फिर पत्रकार।"

मीरा ने एक पल माँ को देखा।

फिर उसने कैमरा गेट के किनारे, उस्ताद की सिलाई मशीन वाले बेंच पर रख दिया।

"जी आंटी।" उसने कहा।

हमने पापा को उठाया। नदीम ने पैर उठाए, मैंने और टिंकू ने कंधे। माँ पीछे थीं और काजल उनका हाथ पकड़े हुई थी।

गली में जब हम निकले तो पता चला कि पूरी गली जाग गई है।

शबनम आपा गुमटी का बोर्ड लगा रही थीं और उनके हाथ में चाय वाली केतली थी, जो उन्होंने बिना किसी से कुछ कहे बीच रास्ते रख दी। भोला भाई अपनी दुकान का शटर खोल रहे थे, और उनकी बीवी बैसाखी लेकर दरवाज़े पर खड़ी थी। उस्ताद की दुकान का दरवाज़ा खुला था, पर अंदर कोई नहीं था।

रास्ते में पापा मेरी बाँह पकड़े हुए थे।

और वो बार-बार वही कह रहे थे।

"मैंने ज़ोर से नहीं लगाया।"

"पापा, रहने दीजिए।"

"नहीं, सुन।" उन्होंने मेरी बाँह दबाई। "सुन। उसने मेरा हाथ पकड़ा था। उसके हाथ में… उसके हाथ में ताक़त थी। मेरे हाथ में नहीं थी। मैं रो रहा था। मैं रो रहा था, अंकुश।"

मैं रुक गया।

मैंने अपने पापा को देखा। पचपन साल के आदमी को, जिनकी कमर झुकी हुई थी और जिनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और जो उस वक़्त बिल्कुल वैसे बोल रहे थे जैसे कोई बच्चा बोलता है — जब उससे कोई चीज़ टूट जाए और उसे लगे कि उसने तोड़ी है।

"पापा।" मैंने कहा। "अब आप चुप रहिए। बस दो मिनट। अस्पताल आ गया।"

अस्पताल के गेट पर डॉक्टर इसरानी पहले से खड़े थे।

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