The Mysterious Bell818 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 818

7 min read November 5, 2026

उन्होंने अपना टेप लिपटा पुराना स्टेथोस्कोप गले से उतारा और हमारे साथ सीधे नीचे वाले कमरे में चले आए, जहाँ माँ का पलंग था। उसी के बगल में एक खाली पलंग था, पुराना लोहे का, जिसकी चादर धुली हुई थी।

"इन्हें यहाँ लिटाओ।" उन्होंने कहा। "धीरे। कमर न मुड़े।"

हमने पापा को लिटाया।

डॉक्टर इसरानी ने उनकी कलाई पकड़ी, घड़ी देखी, फिर उनका सीना सुनने लगे।

कमरे में सिर्फ़ दवा और फ़िनाइल की गंध थी और दूर कहीं पंखे की धीमी चरचराहट।

"सुशीला जी।" डॉक्टर ने माँ की तरफ़ देखा। "इन्होंने आज कुछ खाया?"

"सुबह चाय।" माँ ने कहा। "और एक रोटी, आधी।"

"ब्लड प्रेशर?" डॉक्टर ने काजल से पूछा।

"दो दिन से नहीं नापा।" काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं… मैंने नहीं नापा, डॉक्टर साहब। मैं उनके पास ही थी, फिर भी–"

"काजल।" डॉक्टर ने रुककर उसकी तरफ़ देखा। "अभी अपने ऊपर इल्ज़ाम मत लगाओ। यह काम बाद में। पहले इनका हाथ पकड़े रहो। इनका हाथ ठंडा है, और जब हाथ ठंडा होता है तो आदमी डर जाता है। तुम गरम हाथ दो।"

काजल ने पापा का हाथ दोनों हाथों में लिया।

डॉक्टर इसरानी ने स्टेथोस्कोप निकाला और मुझे इशारा किया।

"बाहर आओ।"

मैं उनके पीछे गलियारे में आया।

"कुछ गलत है?" मैंने पूछा।

उन्होंने स्टेथोस्कोप अपनी जेब में डाला और मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे आँखें थकी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।

"दिल ठीक कर रहा है।" उन्होंने कहा।

"तो फिर?"

"यह दिल की बीमारी नहीं है।" उन्होंने कहा। "यह डर का दौरा है, और कमज़ोरी का। शरीर ने अपना काम करना बंद नहीं किया, अंकुश। शरीर ने बस हार मान ली। तुम्हारे पापा पच्चीस साल से एक ही डर को अपने सीने में लेकर चल रहे हैं। आज कुछ ऐसा हुआ कि वो डर उनके हाथ से निकल गया। और जब डर निकलता है, तो पहले वो आदमी को गिराता है, बाद में उठाता है।"

मैंने दीवार को देखा।

"यह ठीक हो जाएगा?"

"आराम से हाँ।" उन्होंने कहा। "पर मैं तुम्हें साफ़ कहता हूँ। इलाज दो चीज़ों से होगा। आराम से, और सच से। जो देर तक चुप रहा है, उसका दर्द चुप्पी की जगह बैठ जाता है। आज रात से उन्हें सच बोलने दो। चाहे सब बिखरे, मेरी तरफ़ से इजाज़त है।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि गलियारे के दूसरे सिरे से पदचाप आई।

तेज़, जल्दी, अनियमित।

मैंने पलटकर देखा।

उस्ताद अली बक्श आ रहे थे।

उनकी दुकान की सिलाई मशीन के पचास साल में वो पहली बार इस तरह आ रहे थे — बिना चश्मा ठीक किए, बिना कान पर पेंसिल खोजे, शर्ट का एक कोना कुर्ते से बाहर निकला हुआ।

उनके हाथ में अपनी छोटी फूल वाली घंटी थी।

वो सीधे मेरे पास आए और रुके। साँस फूल रही थी।

"उस्ताद।" मैंने कहा। "पापा को कोई खतरा नहीं, डॉक्टर कह रहे हैं–"

"अंकुश।" उन्होंने मेरी बात काटी।

उनकी आवाज़ में कुछ था जो मैंने कभी नहीं सुना।

"मेरे साथ आ।"

उन्होंने मेरा कोहनी पकड़ा और मुझे गलियारे के कोने की तरफ़ खींच लिया, जहाँ रोशनी कम थी और दीवार पर पुराना सफेद प्लास्टर झड़ा हुआ था।

"उस्ताद, पापा–"

"तेरे पापा को डॉक्टर देख रहा है।" उन्होंने कहा। "मैं तुझे एक बात कहने आया हूँ, और ये बात अगर आज नहीं कही, तो शायद कभी नहीं कहूँगा।"

उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।

"मैं पचास साल से एक चीज़ छिपा रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "और अब वो छिप नहीं सकती।"

मेरी जेब से घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीमी।

"क्यों अब?" मैंने पूछा।

"क्योंकि आज वो औरत पीपल पर बैठी है।" उस्ताद ने कहा।

मैं जम गया।

"आप उसे जानते हैं?"

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कीं और फिर खोलीं।

"अंकुश।" उन्होंने कहा। "ये घंटी जो तेरे पास है, ये मेरे घर से गई थी।"

मेरे हाथ से खून उतर गया।

"क्या?"

"ये घंटी बनी थी।" उन्होंने कहा। "बनी थी, किसी दुकान में नहीं, किसी मशीन से नहीं। बनी थी तीन भाइयों के हाथ से।"

उस वक़्त गलियारे के आख़िरी सिरे पर अस्पताल के मुख्य दरवाज़े की तरफ़ से एक आवाज़ आई।

खाँसी।

लंबी, गीली, सूखी खाँसी, जैसे कोई सालों से बाहर नहीं आया हो।

हम दोनों ने पलटकर देखा।

दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था।

दुबला। बहुत दुबला। उसकी कमीज़ हड्डियों पर लटक रही थी और उसके कंधे अंदर धँसे हुए थे, जैसे कोई बोझ उठाकर आया हो जो अब भी उस पर पड़ा है। उम्र सत्तर के पार। गाल धँसे हुए, आँखें धँसी हुई, और एक हाथ में पुरानी लाठी, जिसका निचला सिरा घिसकर गोल पत्थर जैसा हो गया था।

उसने एक कदम आगे रखा और फिर रुककर खाँसा। खाँसी में उसके पूरे शरीर ने झटका खाया।

और जब वो सीधा हुआ, तो उसने हमारी तरफ़ देखा।

मैंने उसका चेहरा देखा।

और मुझे कुछ अजीब लगा।

उस चेहरे में कुछ जाना-पहचाना था। नाक का ढलान, भौंहों का कोण, आँखों के नीचे की हड्डी…

मैंने उस्ताद अली बक्श की तरफ़ देखा।

और मेरा दिल धक से रह गया।

क्योंकि उस्ताद जैसे खड़े थे, वैसे ही वो आदमी खड़ा था। एक ही तरह से झुकी कमर, एक ही तरह से पकड़ी लाठी, एक ही तरह से साँस खींचते हुए ठुड्डी थोड़ी ऊपर।

दो शरीर। दो उम्रें। पर चेहरा… चेहरा एक ही साँचे से निकला हुआ।

उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी उनके हाथ में काँपी और फिर खामोश हो गई।

मैंने देखा कि उस्ताद का चेहरा बदल रहा है।

धीरे-धीरे।

पहले रंग गया, फिर आँखें, फिर होंठ।

उनका गला सूख गया। उन्होंने एक बार हवा निगली, दूसरी बार, और तीसरी बार।

फिर उनकी आवाज़ निकली।

और वो आवाज़ काँप रही थी।

इतनी काँप रही थी कि मुझे लगा कि किसी ने उनकी ज़ुबान को हाथ में पकड़कर हिला दिया है।

"याकूब।"

वो आदमी रुका।

"याकूब।" उस्ताद ने फिर कहा, और इस बार उनका पूरा शरीर उस नाम के साथ झुक गया।

"तू… तू पचास साल बाद भी मेरा हिस्सा माँगने आया है?"

दरवाज़े पर खड़ा आदमी हिला नहीं।

उसने सिर्फ़ अपना सिर थोड़ा ऊपर उठाया और उस्ताद को देखा।

और उसकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ में एक पुरानी, ठंडी, साफ़ कड़वाहट।

"नहीं, अली।" उसने कहा।

खाँसी दबाकर, साँस खींचकर।

"मैं तेरा हिस्सा नहीं माँगने आया। मैं तेरा हिस्सा लेने आया हूँ।"

मेरी जेब में घंटी ज़ोर से बजी।

एक बार।

और मैंने उसे साफ़ सुना।

"तीन में से एक आ गया।" घंटी ने कहा। "अब बाकी दो को बुलाना पड़ेगा।"

॥

दरवाज़े पर खड़ा वो आदमी एक कदम आगे आया।

फिर रुक गया।

उसने लाठी ज़मीन पर टिकाई और लाठी की नोक से एक छोटी सी टक-टक निकली, जो गलियारे की खाली दीवारों से टकराकर लौटी। गलियारे में जलने वाली पीली बत्ती ने एक बार झपक कर अपनी रोशनी कम की और फिर वापस बढ़ा दी।

मैंने उसका चेहरा फिर देखा।

सत्तर के पार। हड्डियाँ चमड़े के नीचे गिनी जा सकती थीं। कमीज़ जो कभी सफ़ेद रही होगी, अब पीली पड़ चुकी थी और उसके दोनों कोनों पर मोटे धागे से पैबंद लगे थे। एक कंधे पर फटा हुआ मोटा कपड़ा था, जिसे उसने ठुड्डी के नीचे गाँठ मारकर बाँधा हुआ था, जैसे ठंड से बचने की कोई पुरानी आदत हो।

उसके हाथ में एक थैला था।

मोटे कपड़े का पुराना थैला, जिसका रंग उतर गया था। ऊपर से रस्सी बँधी थी और रस्सी की गाँठ पर टेप चिपका था, जो उतर रहा था। थैला उसके हाथ में इतना भारी नहीं दिख रहा था, जितना उसकी कलाई झुकी हुई थी।

वो सीधा हुआ और उसने फिर खाँसा।

इस बार खाँसी छोटी थी, पर उसके साथ उसके सीने से एक आवाज़ आई, जैसे किसी पुरानी अलमारी का दरवाज़ा बंद हो रहा हो।

उस्ताद ने एक कदम पीछे रखा।

मैंने देखा, बस एक कदम। पर वो कदम उनके पूरे पचास साल का था।

"अली।" याकूब ने कहा। "तेरे पास बैठने की जगह है?"

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