The Mysterious Bell – Chapter 816
शाम छह बजे आँगन फिर भरा।
इस बार कोई खाना नहीं लाया। इस बार कोई ताली नहीं बजी। लोग चुपचाप आए, चुपचाप बैठे, और चुपचाप मेरी तरफ़ देखने लगे।
मैंने उन्हें सब बताया। बबलू से लेकर सहायक की फुसफुसाहट तक। स्कूल की छत तक। उस टैंक तक जिसमें तीन साल से पानी नहीं आया।
और फिर मैंने कहा, "आज रात मैं जाऊँगा।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"पर मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। "ये मेरी शर्त है। खुद से।"
तब सबसे पिछली पंक्ति से एक आवाज़ आई।
"मैं चलूँगा।"
वो पापा थे।
वो खड़े थे। उन्होंने चश्मा ठीक किया जो कान पर टेप से बँधा था और आगे आए। पूरी गली ने उन्हें देखा। पापा जो बोलते ही नहीं थे। पापा जो सिर्फ़ औज़ार पकड़कर बैठते थे।
"पापा—"
"सुनो," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "मैं कम बोलता हूँ। ये सब जानते हैं। पच्चीस साल से लोग सोचते हैं कि मैं चुप हूँ क्योंकि मेरे पास कहने को कुछ नहीं।"
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
"सच ये है कि मैं चुप हूँ क्योंकि मैं डरता हूँ। और डर को छुपाने का सबसे आसान तरीका चुप्पी है। तुम कुछ कहते नहीं, तो कोई पूछता नहीं। कोई पूछता नहीं, तो कुछ टूटता नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"पर ये झूठ है। डर छुपाने से मरता नहीं। बढ़ता है। और वो एक दिन ऐसा बड़ा हो जाता है कि तुम्हारे बेटे को अकेले स्कूल की छत पर जाना पड़ता है।"
मेरा गला भर आया।
"पापा, आप—"
"मैं तुम्हारे साथ चलूँगा," उन्होंने कहा। "आज रात। और मैं अपनी बात रखूँगा, चाहे जितनी देर लगे।"
वो बैठ गए।
गली के लोगों ने कुछ नहीं कहा। पर माँ के पास से एक आवाज़ आई — धीमी, तेज़, वैसी ही जैसी मुझे बचपन से याद थी।
"मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता," उन्होंने कहा। "और बात में भी।"
वो व्हीलचेयर पर बैठी थीं। काजल उनके पीछे खड़ी थी।
"अंकुश," माँ ने कहा। "तू जाएगा। मैं मना नहीं करूँगी। पर एक बात सुन ले।"
"कहिए।"
"अगर वहाँ लगे कि मामला बिगड़ रहा है — तो भाग। अकेला। मुझे अंदर ले जाने का सोचकर मत रुकना। मैं यहाँ हूँ। और मैं तुझे जानती हूँ। तू रुकेगा। तुझे रुकना नहीं है।"
मैं उनके पास गया और उनका हाथ पकड़ा।
"माँ।"
"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "मैंने तेरे पापा से यही कहा था पच्चीस साल पहले। उसने नहीं सुना। तू भी मत सुनना। बस… ज़िंदा आना।"
उनका हाथ काँप रहा था।
रात नौ बजे मैंने योजना समझाई।
"दो हिस्से," मैंने कहा। "पहला हिस्सा स्कूल के आँगन में रहेगा।" मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। "उस्ताद, आप वहाँ। आपकी आवाज़ चाहिए।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"दूसरा हिस्सा छत पर।" मैंने पापा की तरफ़ देखा। "आप, टिंकू, बंसीलाल, और मैं। मीरा—"
"मैं साथ हूँ," मीरा ने तुरंत कहा।
"तू आँगन में रहेगी।"
उसके चेहरे पर झटका आया।
"मीरा, सुन।" मैंने कहा। "अगर वहाँ कुछ होता है और सब ऊपर होते हैं, तो नीचे से कोई नहीं देखेगा। तेरे कैमरे से बाहर दुनिया को पता चलेगा। तू नीचे रहेगी, पर तेरे पास सबसे ज़रूरी काम होगा।"
"अगर तुम ऊपर फँस गए?"
"तब मैं घंटी से बात करूँगा। और घंटी तेरे तक पहुँचेगी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर।
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक शर्त है।"
"कहो।"
"अगर मुझे लगे कि तुम ऊपर मरे हो — तो मैं ऊपर आऊँगी। तुम चाहे जो कहो।"
मैं हँसा। "ये चीज़ मैं तुझमें पसंद करता हूँ, मीरा।"
"क्या?"
"तू शर्तों पर चौका मत खेलना," मैंने कहा।
रात ग्यारह बजे मैं घर गया। कमरा अंधेरा था। चारपाई पर टूटा रेडियो रखा था जिसे मैंने गुस्से में पटकर तोड़ दिया था और फिर वापस जोड़ दिया था — कभी ठीक नहीं होगा, पर अब भी मेज़ पर है।
मैंने अलमारी की दराज़ खोली औरं उसमें से एक छोटा काग़ज़ निकाला।
मैंने उस पर लिखा हुआ पढ़ा।
"माँ की हिसाब की कॉपी…"
वो काग़ज़ माँ की कॉपी का आख़िरी पन्ना था जो काजल ने मुझे दिया था। उस पर माँ ने पाँच साल पहले लिखा था — “पापा ने अंगूठा लगाया। उसकी ग़लती है। मेरी भी ग़लती है।”
मैं उसे जेब में रखने ही वाला था कि गली की सारी बत्तियाँ बुझ गईं।
एक साथ।
पहले शबनम आपा की गुमटी की बत्ती गई, फिर भोला भाई की दुकान की, फिर हबीब चाचा के आँगन की, फिर मेरे कमरे की।
अंधेरा।
अंधेरे में मैंने सुना — मेरे ही बंद शटर के पीछे, दुकान के अंदर।
घंटी बज रही थी।
पर घंटी तो मेरे पास है।
मैंने अपनी जेब पर हाथ रखा। घंटी वहीं थी। ठंडी, भारी।
और फिर भी दुकान के अंदर, ताले के पीछे, पीतल की आवाज़ चल रही थी। बहुत धीमी, बहुत लगातार, जैसे कोई बच्चा खेलते-खेलते बजा रहा हो।
मैं नीचे गया।
दुकान के शटर के सामने उस्ताद पहले से खड़े थे — अपने हाथ में जलता हुआ पीतल का दीया लिए। पापा उनके पीछे थे।
"शटर मत खोल," उस्ताद ने कहा।
"उसके अंदर कोई है।"
"नहीं है," उन्होंने कहा।
फिर बहुत धीरे से — इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे उनके होंठ पढ़ने पड़े — उन्होंने कहा, "वो अंदर नहीं है। वो गया है।"
आवाज़ रुक गई।
और फिर मेरी अपनी जेब से आई — एक गहरी, ठंडी, झुरझुरी देने वाली फुसफुसाहट, जो मेरा पीतल नहीं थी।
"फूट जागा है।"
मैं जम गया।
"और अब वो स्कूल गया है।"
हम स्कूल की तरफ़ चले। साथ में पापा, टिंकू, उस्ताद, बंसीलाल। मीरा स्कूल के आँगन के दरवाज़े पर रुकी — मेरी तरफ़ देखती रही, फिर कैमरा उठा लिया।
स्कूल का आँगन पीली लाइट से भरा था — जैसी रात पहले देखी थी। पर इस बार और तेज़। और इस बार आँगन के बीच, पत्थर की मेज़ पर, धूल में वो चौकोर निशान अब भी था जहाँ से काग़ज़ निकाला गया था।
हम सीधे सीढ़ी की तरफ़ बढ़े। लोहे की सीढ़ी। वो अब भी दीवार से टिकी थी।
टिंकू पहले चढ़ा। फिर मैं। फिर पापा — धीरे, बहुत धीरे, हर सीढ़ी पर रुककर। उस्ताद नीचे ही रुके, आँगन में, दीया जलाए, नीचे की सीढ़ी पर बैठ गए।
छत पर पहुँचकर मैंने सीधे पीछे देखा।
वहाँ टैंक था।
बड़ा, काला, ज़ंग लगी लोहे की परत, ढक्कन पर मोटा ज़ंग और उसके नीचे ईंट का टुकड़ा रखा हुआ — जैसे किसी ने उसे सोच-समझकर दबाया हो।
छत पर हवा थी। ठंडी, हल्की। और उस हवा में, नीचे से, दूर से, मुझे बच्चों की आवाज़ें सुनाई दीं।
सुबह की प्रार्थना वाली आवाज़ें नहीं। रात की आवाज़ें। खेलती हुई आवाज़ें। बहुत सारे बच्चे। बहुत आगे।
"ये कहाँ से आ रहा है?" मैंने धीरे से पूछा।
पापा ने कहा, "नीचे तालाब की तरफ़ कोई गली है। वहाँ से…"
वो रुक गए।
"वहाँ से आ रहा है, या टैंक से?"
टैंक के अंदर से।
टिंकू मेरे पास आया और उसकी आँखें बड़ी थीं।
"उस्ताद, मैंने तीन साल पहले यही सुना था। बच्चों की आवाज़। मैंने सोचा था पतंग वाले होंगे।"
मैंने अपनी जेब से माँ का पीतल का टुकड़ा निकाला और उसे टैंक की तरफ़ बढ़ाया।
आवाज़ें बंद हो गईं।
सन्नाटा।
इतना गहरा सन्नाटा कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दी।
कुछ देर तक हम चारों वहाँ खड़े रहे।
फिर टैंक के ढक्कन के नीचे, पीतल की परत के भीतर से, कुछ हिला।
मैंने घंटी जेब से निकाली और हाथ में ले ली।
वो ठंडी नहीं थी।
वो जल रही थी।
"पीछे रहो," मैंने कहा।
पर पापा आगे बढ़ गए। वो उस टैंक तक गए — उस्ताद कहते रहे रुको, पर उन्होंने सुना ही नहीं — और उन्होंने अपनी हथेली उस ढक्कन पर रख दी।
"पापा, नहीं—"
ढक्कन हिला।
और टैंक के अंदर से, बच्चों की आवाज़ों की जगह, एक आवाज़ आई — नीची, ठंडी, जैसे किसी ने धातु के अंदर से बोला हो।
"अंकुश यादव।"
मेरा हाथ घंटी पर कस गया।
"तेरा नाम उसी काग़ज़ पर है।"
पापा ने पीछे मुझे देखा। उनके चेहरे का रंग उतर गया था।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
और ढक्कन के नीचे से सफ़ेद लोहे की किसी चीज़ की धीमी खुरचने की आवाज़ आने लगी — जैसे कोई अंदर से, बड़े आराम से, अपना नाम लिख रहा हो।
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