The Mysterious Bell – Chapter 815
"मैं पचास साल से इस घंटी के साथ हूँ," उस्ताद ने कहा। "मुझे पता है जब कोई चीज़ तुम्हारा राज़ जान लेती है, तो सबसे बुरा ये नहीं लगता कि वो जान गई। सबसे बुरा ये लगता है कि उसने तुमसे पहले किसी और को बताया।"
बबलू की आँखें भर आईं।
"उसने मुझसे कुछ नहीं पूछा," वो बोला। "उसने बस कहा — ठीक है ना। जैसे उसे पहले से पता था। जैसे वो मेरा जवाब सिर्फ़ मिलाने आया था।"
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी। पर उस वक़्त जब बबलू ने वो कहा, मुझे उसमें एक हल्की सी कंपन महसूस हुई। बहुत हल्की। जैसे कोई सोते हुए में करवट बदल दे।
मीरा ने अपना कैमरा बैग में रखा। उसने आज पहली बार कैमरा जान-बूझकर नीचे किया था और मुझे लगा वो उसे वापस उठाने को तैयार नहीं है।
"अंकुश," उसने कहा। "मेरे पास एक तस्वीर है। वो तस्वीर जो मैंने शाम को मंच पर ली थी।"
"जिसमें रणवीर के पीछे साया है।"
"हाँ। और मैंने उस तस्वीर में एक चीज़ देखी थी जिसे मैं समझ नहीं पाई थी। साये की परछाईं सीधी नहीं थी। वो मुड़ी हुई थी।"
"डॉक्टर इसरानी ने भी कहा था।"
"स्कूल की तरफ़," मीरा ने कहा। "मैंने सोचा था कि हो सकता है लाइट का कोण हो। पर अब सोचो — साया जिसकी परछाईं स्कूल की तरफ़ जाती है, वो उस जगह से जुड़ा होगा। और अब वही सहायक आकर बबलू भाई से स्कूल के टैंक की पुष्टि करके गया है।"
मैंने धीरे से कहा, "तो वो तस्वीर इशारा कर रही थी।"
"इशारा नहीं," मीरा ने कहा। "वो बता रही थी कि वो अपना काम पहले से कर रहा है और हम देख नहीं रहे।"
मैंने आसपास देखा।
डॉक्टर इसरानी चश्मा हाथ में लिए खड़े थे। उनके पीछे अस्पताल की खिड़कियाँ अंधेरी थीं — चारों, पाँचों, जितनी भी थीं। उनमें से एक में कोई दीया जल रहा था। बस एक।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "आप बताइए। स्कूल की छत पर पानी का टैंक है?"
वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "मेरा अस्पताल इस स्कूल की दीवार से सटा है, बेटा। मैंने उस छत को पैंतीस साल देखा है। उस टैंक में तीन साल से पानी नहीं आया। मोटा ज़ंग लगा ढक्कन है। बच्चे ऊपर जाते हैं, क्रिकेट खेलते हैं, पर टैंक के पास कोई नहीं जाता। बच्चों को मना किया है।"
"क्यों मना किया?"
"क्योंकि अंदर से आवाज़ आती है," उन्होंने कहा। "और मैंने हमेशा सोचा कि ये खोखली लोहे की आवाज़ है।"
सन्नाटा छा गया।
टिंकू ने धीरे से कहा, "बाईस साल से मैं स्कूल की छत पर पतंग उड़ाता आया हूँ। मैंने कभी टैंक का ढक्कन खोला नहीं।"
"कभी नहीं?" मैंने पूछा।
टिंकू ने सिर हिलाया। "एक बार खोलने की कोशिश की थी, तीन साल पहले। ढक्कन ज़ंग से चिपका था। और फिर…" वो रुका। "एक आवाज़ आई। मुझे लगा चूहा होगा। मैं भाग गया और किसी को नहीं बताया।"
मैंने उसे देखा। तेरह साल का लड़का, जो स्कूल छोड़ चुका था, जो मेरी दुकान पर सुबह से रात तक रहता था, जो मुझे उस्ताद कहता था।
"तूने क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि डर लगा था," उसने सीधा कहा। "और अगर मैं डरकर बताता, तो आप मुझे बच्चा समझते।"
उसकी बात सुनकर मुझे अपनी ही बात याद आई।
मैंने जेब से माँ का पीतल का टुकड़ा निकाला। वो छोटा था, नाखून जितना, और उस पर वही फूल खुदा था जो मेरी घंटी पर है। मैंने उसे पलटा। उसकी पीठ पर एक बहुत महीन लकीर थी — इतनी महीन कि पहले कभी नहीं दिखी।
"अंकुश," मीरा ने देखकर कहा। "ये तो वही दो मुड़ी लकीरें हैं।"
"हाँ," मैंने कहा। "और बीच में बिंदु।"
"जो बबलू भाई ने नए बाज़ार के बोर्ड पर देखा था।"
मैंने टुकड़ा जेब में रखा और सीधे बबलू की तरफ़ देखा।
"बबलू भाई, तुमने कहा था कि तुम उस बक्से से डरते हो। अब सीधा जवाब दो — उस बक्से में सिर्फ़ काग़ज़ था?"
वो एक पल चुप रहा।
"काग़ज़ और…" उसने होंठ सुखाकर कहा, "एक आवाज़।"
"कैसी आवाज़?"
"जैसे किसी ने मेरे कान में बहुत धीमे से कहा — अब सो जा।" उसने अपना स्वस्थ हाथ अपने दूसरे कान पर रख लिया। "मैं सात महीने से उसी आवाज़ को सुनकर जगता हूँ। आधी रात, तीन बजे, चार बजे। कभी नहीं पता कि कब आएगी।"
मेरी जेब में घंटी हिली — बहुत हल्की, जैसे किसी ने साँस छोड़ी हो।
"बक्सा अभी वहीं है?" मैंने पूछा।
"उसने कहा — वही," बबलू ने कहा। "सात महीने पहले मैंने उसे वहीं छोड़ा था। छत के टैंक के अंदर, पीछे की तरफ़, ईंट के नीचे।"
मैंने आसमान देखा। रात खत्म हो रही थी।
"आज रात," मैंने कहा। "स्कूल की छत पर जाना होगा।"
मीरा ने तुरंत कहा, "मैं साथ चलूँगी।"
"नहीं।"
"अंकुश—"
"मीरा, सुनो।" मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर कहा। "आज रात अगर मैं अकेले गया, तो यही सबसे बड़ी गलती होगी। और अगर मैंने गली को बताए बिना गया, तो मैं वही करूँगा जो रणवीर चाहता है — अकेला, जल्दबाज़, अंधेरे में।"
वो कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई।
"तो?"
"तो पहले सबको बताऊँगा," मैंने कहा। "शाम को। वहीं आँगन में, जहाँ आज सब खाना खाने आए थे। जहाँ रणवीर आया था। उसी जगह।"
शबनम आपा ने कहा, "पहले मेरी चाय।"
"आपा—"
"बेटा, मैंने आज रात बत्तियाँ बुझने के बाद से चूल्हा नहीं जलाया। तीन घंटे से पानी ठंडा पड़ा है। अब जब सूरज निकलेगा, तब मैं चूल्हा जलाऊँगी और सब पिएँगे।" उन्होंने चिमटी उठाकर कमर में खोंसी। "और हाँ — आज रात स्कूल जाने से पहले सबको ये भी बताना होगा कि जो बाहर नहीं आ सकता, वो कम से कम जान ले कि कौन जा रहा है।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है। शाम को।"
तब तक सुबह की पहली लालिमा अस्पताल की पीली दीवार पर आ गई थी।
दिन बीता। बीता कैसे, मुझे ठीक से याद नहीं।
मैंने पूरा दिन दुकान का शटर बंद रखा। बाहर उन्नीस नंबर की दुकान पर भारद्वाज का लाल-सफ़ेद बोर्ड लगा रहा और उसे देखने के लिए एक भी आदमी नहीं आया। गली में शाम को एक बार फिर वही ठहराव आ गया था जो बड़ी आँधी से पहले आता है।
मैंने दोपहर में अपना औज़ारदान खोला और उसमें से सब कुछ निकालकर सामने रख दिया। रिंच, पेचकस, रेती, छोटी हथौड़ी, बोल्ट, पुरानी चेन, टूटी तीलियाँ, ग्रीस की डिब्बी, और एक छोटी टॉर्च जो काजल ने रात में दी थी।
मैं हर चीज़ को देख रहा था और ये सोच रहा था कि इनमें से कौन सी चीज़ इस रात काम आएगी।
कोई नहीं।
ये सब औज़ार थे। और इस रात मुझे औज़ार नहीं चाहिए थे। मुझे लोग चाहिए थे।
शाम पाँच बजे टिंकू दुकान पर आया। उसके जूते पर कीचड़ था और हाथ में पीतल की छोटी बाल्टी।
"क्या है ये?"
"लाउडस्पीकर।" उसने बाल्टी मेज़ पर रख दी।
"टिंकू, ये बाल्टी है।"
"पर इसके अंदर आवाज़ गूँजती है।" उसने गंभीर चेहरा बनाया। "मैंने चेक किया है।"
मैं हँस पड़ा। पहली बार उस दिन में।
"बेवकूफ़," मैंने कहा और उसका सिर खराब किया। "पर फिर भी रख ले। शायद काम आए।"
वो खुश होकर बैठ गया और तब उसने धीरे से पूछा, "उस्ताद। आज रात मैं चलूँ?"
"हाँ।"
"पक्का?"
"पक्का। पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"अगर मैं कहूँ रुक जा, तो तू बिना पूछे रुक जाएगा।"
उसने सोचा। फिर बोला, "और अगर मुझे लगे कि आपको रुकना चाहिए?"
मैं एक पल रुक गया।
"तो कह दे।" मैंने कहा। "आज रात हर एक को कहने का हक़ है। तेरे को भी।"
वो चुप हो गया। और फिर कहा, "उस्ताद, मेरे पापा छह महीने पहले गए थे। उस दिन मैंने सोचा था कि अब मैं घर का आदमी हूँ। पर मैं सिर्फ़ तेरह का हूँ। मुझे कुछ समझ नहीं आता।"
"मुझे भी कुछ समझ नहीं आता," मैंने कहा। "पर आज रात हम दोनों एक ही छत पर जाएँगे और वहाँ जो मिलेगा, वो साथ देखेंगे। ठीक है?"
उसने सिर हिलाया। उसकी आँखें चमक रही थीं।
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