The Mysterious Bell814 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 814

7 min read November 5, 2026

"आ जाओ भाई," उन्होंने कहा। "आज रात सब यहीं खड़े हैं।"

सहायक ने दीवार पर आख़िरी ठोक दी, फीता समेटा, और मनोज की तरफ़ देखा।

"कुछ नहीं है," उसने कहा।

"क्या मतलब कुछ नहीं है?" शबनम आपा ने कहा।

"मतलब — बड़ी दरार नहीं है," सहायक ने कहा। "पलस्तर जगह-जगह उखड़ा है। पुस्ताई करनी है। बस।"

गली में फुसफुसाहट फैली।

"तो फिर ये मशीन क्यों आई है?" भवानी प्रसाद ने कहा। "ये सूचना क्यों लिखी गई? ये चौबीस घंटे की बात कहाँ से आई?"

मनोज ने क्लिपबोर्ड उठाया।

और मैंने देखा — उसने जाँच वाली शीट पर कोई बात नहीं लिखी। उसने सीधे उसी पुराने पीले नोटिस की नकल निकाली, जिस पर चौबीस घंटे की लाइन छपी थी, और कलम उठाकर उसके नीचे हस्ताक्षर करने लगा।

"रुकिए," मैंने कहा।

कलम रुकी।

"आपने जाँच की, कोई बड़ी दरार नहीं मिली, और फिर भी वही काग़ज़ साइन कर रहे हैं जिसमें मरीज़ हटाने की बात लिखी है?"

"ये मेरा काम नहीं है," मनोज ने कहा। "मुझे जाँच रिपोर्ट और ये नोटिस — दोनों साथ जमा करने को कहा गया है।"

"किसने कहा?"

"ऊपर से।"

"कौन ऊपर?"

"वो…" मनोज ने काग़ज़ में देखा। "जिसका नाम नीचे है।"

"चंद्रेश सक्सेना," मैंने कहा। "वही चंद्रेश जो हर काग़ज़ पर 'बेटा' कहकर मुस्कुराता है।"

मनोज ने कुछ नहीं कहा। कलम फिर काग़ज़ पर झुकी। स्याही की एक बूँद गिरी और उसने उसे उँगली से फैला दिया, जैसे फैलाने से बूँद मिट जाती हो।

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।

"ये मत होने दे," उसने कहा।

"कैसे रोकूँ? काग़ज़ उसके हाथ में है।"

"काग़ज़ नहीं," घंटी ने कहा। "आदमी देख। सहायक को देख।"

मैंने देखा।

सहायक मशीन के पास खड़ा था। वो मनोज की कलम की तरफ़ नहीं देख रहा था। वो गली के लोगों की तरफ़ नहीं देख रहा था।

वो बबलू को देख रहा था।

बहुत देर से। बहुत शांति से। जैसे कोई हिसाब मिला रहा हो।

और फिर वो धीरे-धीरे चला।

गली ने उसके लिए रास्ता छोड़ दिया — सबने शायद सोचा कि वो काग़ज़ लेने जा रहा है। वो सीधे बबलू के पास पहुँचा।

और बबलू के कान के पास झुककर उसने कुछ फुसफुसाया।

बस एक लाइन।

मैंने सुना नहीं। मैं दो कदम पीछे था।

पर मैंने बबलू का चेहरा देखा।

और मैंने अपनी ज़िंदगी में ऐसा चेहरा कभी नहीं देखा।

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। सफ़ेद नहीं — राख जैसा। जैसे किसी ने उसके चेहरे पर वही राख मल दी हो जिस पर जोड़ना बंद करो लिखा था। उसका बँधा हुआ हाथ धीरे-धीरे ऊपर आया, फिर नीचे गिरा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"बबलू भाई?" मैंने कहा।

वो नहीं बोला।

सहायक पीछे हटा। उसके होंठों पर एक छोटी मुस्कान थी, और फिर वो मुड़कर मशीन की तरफ़ चला गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

मैं बबलू के पास पहुँचा। उसका कंधा पकड़ा।

"बबलू भाई, क्या कहा उसने?"

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने उस रात टंकी के पीछे देखा था — जब वो नीले बक्से की बात कर रहा था।

"बबलू भाई," मैंने फिर कहा। "मुझे बताओ।"

उसने होंठ हिलाए।

आवाज़ नहीं निकली।

दूसरी बार।

"उसने…" बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे उसके होंठों को पढ़ना पड़ा। "उसने पूछा—"

वो रुका।

उसने मेरी कलाई पकड़ी। उसकी पकड़ में ताक़त नहीं थी, बस काँपन था।

"उसने पूछा," बबलू ने कहा, "कि बक्सा स्कूल की छत के नीचे वाले टैंक में ठीक है ना।"

मेरी जेब में घंटी ने बजना बंद कर दिया।

बिल्कुल।

और उस सन्नाटे में — मशीन के इंजन के नीचे, गली के लोगों की साँसों के नीचे, उस पीली लाइट के नीचे — मैंने अपनी ही आवाज़ सुनी, जो बहुत दूर से आ रही थी।

"कौन सा बक्सा?"

बबलू ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर उसने वो कहा, जो पूरी गली को पत्थर बना गया।

"वही," उसने कहा। "जो सात महीने पहले मैंने खोला था। जिसमें दादा का पीला काग़ज़ था। जिसमें मेरा नाम था।"

मैंने पीछे देखा।

शबनम आपा के हाथ से चिमटी गिर गई और धूल में खड़ी रह गई।

उस्ताद की उँगलियाँ स्टूल की लकड़ी में धँस गईं।

डॉक्टर इसरानी ने अपना चश्मा उतार लिया।

मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया — जान-बूझकर, पहली बार।

और मनोज की कलम काग़ज़ पर रुक गई, एक अधूरे हस्ताक्षर पर।

मशीन की लाइटें फड़फड़ाईं और फिर स्थिर हो गईं।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

घंटी ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी।

"अब क्या?" मैंने धीरे से पूछा।

घंटी ने बहुत देर बाद कहा — इतने धीमे कि लगा पीतल की गहराई से आ रही है —

"अब स्कूल।"

॥

मनोज ने अपनी कलम जेब में डाली और काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाकर मशीन की तरफ़ मुड़ गया।

"छह बजे तक," उसने बिना पीछे देखे कहा। "मरीज़ बाहर। वरना मशीन खुद हटाएगी।"

जाँच का सहायक उसके पीछे चल पड़ा। उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। न बबलू को, न गली को, न उस पीली दीवार को जिस पर राख से लिखा था — जोड़ना बंद करो।

मशीन का इंजन भिनभिनाया, ट्रैक्टर जैसा भारी पहिया घूमा, और वो धीरे-धीरे फाटक से बाहर निकल गई। धूल उठी और उसी पीली लाइट में लटकती रही, जैसे कोई चीज़ हवा में ही अटक गई हो।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

घंटी अब भी ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मुझे लगा मैंने जेब में पत्थर रख लिया है।

बबलू वहीं खड़ा था। वहीं — चबूतरी से तीन कदम आगे, जहाँ सहायक ने उसे छोड़ा था। उसका बँधा हुआ बायाँ हाथ अब भी नीचे लटका था और वो उसे देख रहा था जैसे वो उसका हाथ नहीं, किसी और की चीज़ हो।

मैं उसके पास गया और उसका कंधा पकड़ा।

"बबलू भाई।"

वो नहीं बोला।

"बबलू भाई, वो चले गए। अब बताओ उसने क्या कहा।"

उसने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में उस वक़्त कुछ था जो मैंने टंकी के पीछे देखा था — जब वो नीले बक्से की बात कर रहा था और उसके हाथ काँप रहे थे।

"उसने कहा," बबलू ने फुसफुसाया, "कि बक्सा स्कूल की छत के नीचे वाले टैंक में ठीक है ना।"

मैंने उसका कंधा पकड़कर ज़ोर दिया।

"और तुमने?"

"मैंने…" बबलू ने गला साफ़ किया। आवाज़ नहीं आई। वो फिर बोला, "मैंने सिर हिला दिया। बस। हाँ में। मैंने नहीं सोचा, अंकुश भाई। वो मेरे कान के पास ऐसे बोला जैसे कोई पुराना हिसाब माँग रहा हो।"

"तुमने उसे कब बताया कि बक्सा टैंक में है?"

"किसी को नहीं बताया।"

"बबलू भाई।"

"किसी को नहीं बताया!" उसकी आवाज़ फट गई। "मैंने तुम्हें बताया, पूरी गली के सामने, आधे घंटे पहले! उसके पहले कोई नहीं जानता था। मैं सात महीने से ये बात अपने अंदर ढो रहा था, एक शब्द किसी से नहीं कहा।"

वो मेरे सामने बैठ गया। सीधा ज़मीन पर। उसके घुटने धूल में धँस गए और उसने अपना बँधा हुआ हाथ घुटने पर रख दिया।

"सात महीने," उसने कहा। "सात महीने मैं सो नहीं पाया। और जिस दिन मैंने सबके सामने कह दिया, उसी दिन किसी ने आकर मेरे कान में वही नाम लिया।"

शबनम आपा ने आगे आकर उसके सिर पर हाथ रखा। उनकी चिमटी धूल में पड़ी थी और वो उसे उठाने के लिए झुकीं भी नहीं।

"उठ," उन्होंने कहा। "ज़मीन पर बैठकर कोई चीज़ ठीक नहीं होती।"

"आपा, आप नहीं समझीं—"

"मैं सब समझी," शबनम आपा ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार पतली लगी। "जो सच बोलता है, उसके पास पहले सब आते हैं। कुछ सुनने, कुछ डराने। ये नया नहीं है।"

उस्ताद अपने स्टूल से उठे। वो बहुत धीरे उठे, जैसे उनकी कमर उनसे कुछ कह रही हो। वो आकर सीधे बबलू के सामने खड़े हुए।

"बेटा।"

बबलू ने ऊपर देखा।

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