The Mysterious Bell – Chapter 674
पीछे माँ ने धीरे से कहा, "मैंने कहा था।"
उस्ताद ने पीछे मुड़कर देखा, और फिर उनसे एक पल के लिए ऐसे देखा जैसे कोई बूढ़ा अपनी ही गली में अचानक बहका हुआ लड़का देखता है।
"सुशीला जी," उन्होंने कहा, "ये बात तुम्हारे डर से नहीं रुकेगी। ये बात मेरे भाई से नहीं रुकेगी। ये तो उस घंटी से रुकेगी, और आज वो चुप है। मैं पचास साल में पहली बार उसे चुप देख रहा हूँ।"
मेरा हाथ अपने आप घंटी पर गया।
मैंने उसे उठाया। मेरी हथेली में रखा। और उसे हिलाया।
घंटी बजी। पर उसकी आवाज़ वो नहीं थी जो रोज़ की थी। उसमें कुछ था — जैसे कोई चीज़ जो बहुत दूर से आ रही हो, जैसे कोई चीज़ जो अभी रास्ते में हो, जैसे कोई चीज़ जो यह कह रही हो — अभी नहीं, थोड़ा और रुको।
"उसने कुछ नहीं कहा," मैंने कहा।
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"वो आज नहीं बोलेगी। जिस दिन उसका असली नाम बोला जाएगा, उस दिन वो चुप रहेगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि असली नाम सुनकर हर चीज़ चुप हो जाती है। पहले वो सुनती है। फिर सोचती है — ये आदमी इसे जानकर क्या करेगा।"
मैंने घंटी जेब में रखी। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"आपकी मशीन, उस्ताद। जो आपने बताया कि उस रात छत की कोठरी के ताले की चेन की कड़ी है। उसका क्या?"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "उसका ताला आज खुलेगा। वो मैं जानता हूँ। सिर्फ़ ये नहीं जानता कि खुलेगा किसके हाथ से।"
काजल ने पीछे से कहा, "माँ ने आटे के डिब्बे में कुछ छिपाया है।"
सब रुक गए।
माँ की तरफ़ सबने देखा। माँ ने काजल को देखा — एक पल के लिए क्रोध से, फिर प्यार से, फिर हार से।
"वो चाबी," उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे पापा की नहीं है। वो मेरी है। और मैंने उसे बाईस साल से रखा हुआ है। उस दिन के बाद से नहीं खोला।"
"कौन सी चाबी, माँ?" मैंने पूछा।
"वो चाबी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, "जो उस संदूक के धूल वाले हिस्से में मिली थी जिसे किसी ने कल रात खोला। वो चाबी असली ताले की है, अंकुश। बंद ताले की। उस ताले की, जो शहर में सबसे पुराना है। और वो ताला —"
वो रुक गईं।
"वो ताला आज भी लगा हुआ है," उन्होंने कहा। "और उसका पता सिर्फ़ तीन आदमी जानते हैं। मैं। तेरे पापा। और —"
माँ ने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "और मेरा भाई।"
मैंने गहरी साँस ली।
बाहर गली में किसी ने शटर खोला। धूप बढ़ रही थी। शबनम आपा की चिमटी की आवाज़ आई। पीपल के नीचे किसी बूढ़े ने खाँसा।
सुबह का आम दिन, एक आम गली में, एक आम शहर में।
और मेरे हाथ में एक घंटी थी, जो किसी का असली नाम जानती थी।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आपके भाई की दुकान पर जो आदमी खड़ा है — वो कौन है?"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"वो मेरे भाई का आदमी है। पहले भी था। पचास साल पहले भी था।"
"पचास साल पहले?"
"हाँ। उस रात भी वही आदमी बाहर खड़ा था। जब माँ की पेटी बंद हुई थी।"
मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।
फिर मैंने घंटी जेब में डाली, अपना फटा जूता पहना, और अपना हाथ दरवाज़े की तरफ़ बढ़ाया।
"माँ," मैंने कहा, "आज मैं उस्ताद की दुकान पर नहीं जा रहा।"
उन्होंने राहत की साँस ली।
"मैं उस्ताद की दुकान पर नहीं जा रहा," मैंने फिर कहा, "क्योंकि आज सलीम मेरी दुकान पर आ रहा है।"
उनका चेहरा बदल गया।
"अंकुश —"
"माँ, वो बिना चीनी की चाय पी रहा है। अपना आदमी बाहर खड़ा करके बता रहा है कि उसे कोई नहीं सुन रहा। अब मैं उसके सामने जाकर खड़ा रहूँगा। तब देखेंगे कि चीनी बिना वो क्या कहेगा।"
मैंने पीछे मुड़कर उस्ताद को देखा।
"उस्ताद, आप कहते हैं वो मेरी घंटी का असली नाम जानता है।"
"हाँ।"
"तो आज वो नाम मेरी गली में सुनाया जाएगा। मेरी दुकान पर। मेरे पापा के सामने। मेरी माँ के सामने। और उस नाम को सुनकर अगर वो घंटी टूटी तो टूटी — पर आज ये दुकान थोड़ी देर के लिए मेरे नाम की होगी।"
पापा अभी भी दुकान के पीछे थे, औज़ार पोंछ रहे थे।
मैंने बाहर आकर देखा।
सुबह की गली में मनोज का टेम्पो नहीं था। नीला बोर्ड नहीं था। पीला नोटिस नहीं था।
पर एक आदमी था।
काली शर्ट में। दुकान से तीन कदम दूर। हाथ पीछे बँधे। सिर ऊपर। ऐसे खड़ा जैसे दस साल से खड़ा हो।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।
"उस्ताद, वो अब भी खड़ा है।"
"हाँ।"
"क्या करें?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आज वो देखेगा कि हम क्या करते हैं।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। औज़ार अब भी हाथ में था। पर अब वो औज़ार नहीं पोंछ रहे थे। वो मुझे देख रहे थे।
और उनकी आँखों में कुछ था जो बाईस साल से नहीं था।
वो चुप नहीं थे।
वो डर रहे थे — पर डर के पीछे कुछ और भी था। कुछ जो कह रहा था — बेटा, तेरे पीछे मैं हूँ।
मैंने उनकी तरफ़ सिर हिलाया।
उन्होंने भी सिर हिलाया।
बस इतना। कोई शब्द नहीं। कोई लंबी बात नहीं।
पर वो सिर हिलाना — वो मेरे लिए पूरी सभा से बड़ा था।
घंटी जेब में थी।
और उस पल, बहुत धीरे से, जैसे कोई सपने में नाम पुकारता हो, उसने कहा —
"अब तेरे पापा घर के अंदर आएँगे।"
मैं रुका।
"फिर?"
"फिर तेरा सबसे पुराना दरवाज़ा खुलेगा।"
"कब?"
"जब सलीम अपना नाम बोलेगा।"
मैंने दुकान के दरवाज़े की तरफ़ देखा। पापा अंदर चले गए थे।
गली में काली शर्ट वाला आदमी खड़ा था।
उस्ताद अली बक्श मेरे पास खड़े थे, चश्मा हाथ में, वो पहन नहीं रहे थे — जैसे अभी तक उन्होंने अपनी आँखों से वो देखा ही नहीं जो कल रात देखा था।
और पीछे, दुकान के पीछे वाले कमरे में, मेरे पापा — मैंने दरवाज़े की दरार से देखा — भूरी कपड़े में लिपटी फाइल अपने सीने से उतार रहे थे। उसे खोल रहे थे। और फिर उसमें से कोई पुराना काग़ज़ निकालकर अपनी हथेली पर रख रहे थे।
उनका हाथ नहीं काँप रहा था।
पहली बार।
मैंने मुड़कर उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कभी सोचा — ये घंटी मेरे पास क्यों आई?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा। "पचास साल सोचा। और जवाब नहीं मिला।"
"तो आज मिलेगा?"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "आज या कभी नहीं।"
वो मेरी दुकान के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। उनका चेहरा अब भी पीला था, पर अब उसमें कुछ और भी था — वो कुछ जो बूढ़े आदमी के चेहरे पर तभी आता है जब वो जानता है कि आज उसकी सबसे बड़ी बात कही जाएगी।
और गुमटी पर, शबनम आपा ने चिमटी उठाकर उस काली शर्ट वाले को देखा, और बिना कुछ कहे अपनी सबसे तेज़ आवाज़ में बोलीं —
"अरे, तू सुबह से खड़ा है। चाय पीएगा या डंडा बन जाएगा?"
गली हँसी।
काली शर्ट वाला नहीं हँसा।
पर मैंने देखा — उसके हाथ, जो पीछे बँधे थे, एक पल के लिए हिले।
और उसी पल मैंने सोचा — शायद यही तो वो आदमी है, जिसने बाईस साल पहले उस रात छत की कोठरी के बाहर खड़ा था।
वो आदमी जो हर बात का सिर्फ़ गवाह बनता है।
आज वो गवाह नहीं रहेगा।
आज वो गली के सामने खड़ा है, और गली को देख रहा है — और उसकी आँखों में डर नहीं, हिसाब है।
बच्चे उसे घूर रहे थे। शबनम आपा चाय का गिलास उसकी तरफ़ बढ़ा रही थीं। उस्ताद उसे देख नहीं रहे थे, पर मैं जानता था — उनकी हर साँस उसी की तरफ़ जा रही थी।
मैंने अपने दुकान का शटर थोड़ा और ऊपर किया।
आज गली में एक नई चीज़ होने वाली थी।
और घंटी, जेब में, बहुत धीरे से बोली —
"अब देख, आज कौन सा नाम बोला जाएगा।"
॥
"अरे, तू सुबह से खड़ा है," शबनम आपा ने फिर कहा, "चाय पीएगा या डंडा बन जाएगा?"
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