The Mysterious Bell673 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 673

7 min read November 5, 2026

दुकान के बाहर बाल्टी में पानी डालने की आवाज़ आई। मैं उठकर देखने गया — पापा थे। पीठ मेरी तरफ़, हाथ में पुरानी रिंच, और वही औज़ार जो उन्होंने रात भर पोंछे थे। लोहे की किसी चीज़ पर लगी ज़ंग साफ़ करते रहे, जैसे कोई नमाज़ पढ़ता है — बिना रुके, बिना देखे कि कौन आया।

"पापा?"

"हम्म।"

"भूरी फाइल कहाँ है?"

रिंच चलती रही।

"पापा, वो फाइल मैंने देखी है। सीने पर चिपकाए थे। सभा में। पीपल के नीचे। माँ के सामने, गली के सामने, सक्सेना के सामने। और अब —"

"औज़ार पोंछ," उन्होंने कहा।

"क्या?"

"औज़ार पोंछ। दुकान है। कुछ काम कर।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा साफ़ था, पर आँखों के नीचे जो गड्ढे थे, वो बता रहे थे कि रात भर नींद नहीं आई। और वो चेहरा — वो वही चेहरा था जो बाईस साल पहले सकीना बी की दुकान पर हर महीने की पाँच तारीख़ को जाता था। जो चेहरा बेटे से कुछ छिपाता है, पर छिपाते हुए भी बेटे के सामने बैठना चाहता है।

मैंने रिंच उठाई। दो मिनट पोंछी। फिर फेंक दी।

"मैं पूछ रहा हूँ, पापा। आप सुन रहे हैं न?"

वो रुके। रिंच को कपड़े पर रखा। और फिर पानी के बर्तन में हाथ डालकर कुल्ला करने लगे, जैसे मैंने कुछ पूछा ही न हो।

मैं दुकान के बाहर आया। सुबह की गली में शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी, सिर्फ़ एक बूढ़ा अपनी लाठी के सहारे बैठा था। उसने मुझे देखा, सिर हिलाया, और फिर अपनी लाठी देखने लगा, जैसे मुझे न देखा हो। यही तो सुबह की गली होती है — रात की सभा के बाद सब एक दूसरे को ऐसे देखते हैं जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।

घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर थीं, पर आज चूल्हा जल रहा था और हाथ नहीं चल रहे थे। वो बस तवे पर रोटी रखकर उसे देख रही थीं, जैसे रोटी उनसे कुछ पूछ रही हो।

"माँ।"

"हाँ, बेटा।"

"पापा से बात नहीं हो रही।"

"होगी।"

"कब?"

"जब उनका मन करेगा।"

वो हिसाब की कॉपी उठाने लगीं जो चूल्हे के पास रखी थी। पर कॉपी उनके हाथ से फिसल गई। काग़ज़ फर्श पर गिरे, और मैंने देखा — उनके हाथ काँप रहे थे। मेरी माँ के हाथ, जो सुबह पाँच बजे से पूरी गली का खाना बनाते हैं, काँप रहे थे।

"माँ।"

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "कल रात ठंड लग गई थी।"

"माँ, मुझे पता है आप डर रही हैं।"

वो रुकीं। तवे से रोटी उतारी, थाली में रखी, और फिर मेरी तरफ़ देखा — एक पल के लिए। बस एक पल। और उस एक पल में मैंने वो देखा जो कभी नहीं देखा था। डर। वो डर जो रोटी बनाते हुए भी पीछे देखता है।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "आज तू बाहर मत जा।"

"कहाँ?"

"कहीं भी। दुकान पर रह। मैं तेरे लिए समोसा ले आऊँगी शबनम से।"

"माँ, कल सभा में आपने खुद कहा था — अपना काग़ज़ माँगो। आपने सक्सेना के सामने खड़े होकर कहा था कि दो नामों वाली लाइन में एक अंगूठा आज भी खाली है। आपने वो कहा था, माँ। और अब —"

"और अब मैं कह रही हूँ, दुकान पर रह।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं तेरी माँ हूँ।"

"ये जवाब नहीं है।"

"मेरे पास इससे बड़ा जवाब नहीं है।"

मैं वहीं खड़ा रह गया। कभी-कभी माँ के पास कोई जवाब ऐसा होता है जो सवाल से बड़ा होता है। और मैं उस जवाब से आगे नहीं जा पाता। आज भी नहीं जा पाया।

काजल बाहर से आई। बाल बाँध रही थी, किताब दबी थी बगल में। मुझे देखकर रुकी, माँ को देखा, फिर धीरे से मेरे पास आई।

"उसे मत पूछ," उसने फुसफुसाया।

"क्यों?"

"वो कल रात से डरी हुई है। पापा रात भर नहीं सोए। मैंने उठकर देखा — वो दुकान से आकर बैठे रहे, चारपाई पर, जूते भी नहीं उतारे। और माँ ने आटे के डिब्बे में कुछ छिपाया है।"

"क्या?"

"एक चाबी। पुरानी। मैंने सुबह देखा — जब वो आटा लेने गई थी, डिब्बे के अंदर कुछ धातु की आवाज़ आई।"

"कौन सी चाबी?"

"मैं नहीं जानती। पर वो चाबी ऐसी थी जैसे बहुत पुरानी हो। और माँ ने उसे ऐसे डिब्बे में रखा, जैसे कोई चीज़ ज़मीन के नीचे दफ़्नाता है।"

मैं कुछ सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर खटपट हुई। जैसे ही खोला, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और टिंकू — पाँचों खड़े थे, आँखें चमक रही थीं, साँस फूल रही थी।

"उस्ताद!" टिंकू ने कहा। "उस्ताद की दुकान पर!"

"क्या हुआ?"

"सलीम आया! कल रात से वहीं है!"

"तो?"

"उसने चाय माँगी थी।"

"तो?"

"चीनी नहीं माँगी!"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"उस्ताद ने पूछा — चीनी कितनी? तो सलीम ने कहा — चीनी नहीं। बिना चीनी। और उसने अपना आदमी दुकान के बाहर खड़ा कर दिया है। बड़ा आदमी, काली शर्ट में, दरवाज़े के सामने खड़ा है।"

"क्या कर रहा है वो?"

"कुछ नहीं। बस खड़ा है। सबको अंदर जाने देता है, पर देर तक रुकने वाले को ऐसे देखता है जैसे कहे — जा, तेरा काम नहीं।"

मैं हँस पड़ा।

"अरे, चीनी छोड़ने वाला आदमी ज़रूर कोई बड़ा राज़ छिपा रहा है।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

"मैंने भी यही सोचा, उस्ताद! मैंने कहा भी — अरे, चीनी के बिना चाय?" पाँचों बच्चों ने एक साथ सिर हिलाया, जैसे गली में सबसे बड़ी खबर यही हो।

"अंकुश," माँ ने दरवाज़े से कहा। और उनकी आवाज़ में वो कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। "इधर आ।"

मैं गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया — दोनों हाथों से। उनके हाथ ठंडे थे।

"आज तू उस्ताद की दुकान पर मत जा।"

"माँ —"

"मत जा। मैं जानती हूँ तू क्यों जाना चाहता है। सलीम तुझे बुला रहा है। वो अपना आदमी वहाँ खड़ा करके बुला रहा है। और मैं जानती हूँ, जब कोई ऐसे बुलाता है तो वहाँ जाने के बाद आदमी वैसा नहीं रहता जैसा वो गया था।"

"माँ —"

"बात बहुत आगे बढ़ चुकी है, अंकुश।"

"माँ, यही तो बात है। जब बात बहुत आगे बढ़ जाए, तो आदमी को चलना पड़ता है। पीछे नहीं हटना होता।"

"तू उस आदमी से नहीं जानता।"

"आप जानती हो?"

उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया। उनकी आँखें भर आईं।

"मैं बाईस साल से उस आदमी के नाम से डरती हूँ, अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "जिस रात सलीम मरा, उस रात से। और आज वो ज़िंदा है। और तेरे सामने खड़ा है। तुझे पता है ये क्या मतलब है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"ये मतलब है," उन्होंने कहा, "कि मरा हुआ दुबारा नहीं मरता। पर ज़िंदा — ज़िंदा आदमी एक ही रात में सब कुछ बदल सकता है।"

काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।

"उस्ताद आ रहे हैं," उसने खिड़की से देखकर कहा। "और वो अकेले नहीं आ रहे। भाग रहे हैं।"

मैं खिड़की तक गया।

गली में उस्ताद अली बक्श आ रहे थे। उनका चश्मा हाथ में था। वो एक बार भी उसे लगाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। दौड़ना उनकी उम्र का काम नहीं है, पर वो दौड़ रहे थे। और चेहरा — उनका चेहरा पीला था। जैसे किसी ने उनकी आँखों के सामने से दुनिया खींच ली हो।

वो दरवाज़े तक पहुँचे। एक पल को रुके। मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़। फिर मुझे अपनी तरफ़ खींचा, और बहुत धीरे बोले — इतना धीरे कि काजल भी न सुने।

"मेरा भाई तेरी घंटी का असली नाम जानता है।"

मैं ठिठक गया।

"क्या?"

"मेरा भाई," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "सलीम। वो तेरी घंटी का असली नाम जानता है। और वो यही नाम आज किसी को बताने आया है।"

मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया।

घंटी वहीं थी। चुप। इतनी चुप जैसे साँस भी न ले रही हो।

"किसे?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा।

"अभी नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर वो बिना चीनी की चाय पी रहा है। और बिना चीनी की चाय पीने वाला आदमी सिर्फ़ इसलिए नहीं पीता कि उसे चीनी पसंद नहीं। वो इसलिए पीता है कि उसे पता है — आज उसका मुँह कड़वा रहेगा, तो कम से कम चाय तो कड़वी न हो।"

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