The Mysterious Bell – Chapter 622
वो दौड़ा अंदर। मैंने देखा कि उस्ताद ने आज अपना मोटा चश्मा पहना हुआ था, और कान पर पेंसिल नहीं थी। जब आदमी सिलाई करता है, तो पेंसिल कान पर रहती है। जब आदमी बैठकर बात करता है, तो पेंसिल नीचे रख देता है। मैं समझ गया — आज उस्ताद सिलाई नहीं करेंगे। आज वो बोलेंगे।
टिंकू दो स्टूल घसीटकर लाया। एक स्टूल उसने बंसी बाबा के लिए रखा, दूसरा हाफ़िज़ बाबा के लिए — ठीक आमने-सामने, दो हाथ के फ़ासले पर।
बंसी बाबा स्टूल पर बैठे। हाफ़िज़ बाबा बैठे। और फिर वो हुआ जो चबूतरी पर नहीं हुआ था।
दोनों चुप बैठे रहे, पर एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे। बस देख रहे थे। जैसे कोई पुरानी किताब खोलकर दोनों एक ही पन्ने पर रुक गए हों।
शबनम आपा ने पीछे से केतली उठाई।
“चाय पीनी है दोनों को,” उन्होंने कहा। “और मेरी केतली एक ही है। दो केतली मेरे पास नहीं।”
उन्होंने पहला कप बंसी बाबा के आगे रखा। बंसी बाबा ने कप उठाया, फिर रख दिया।
“ये कप धोया गया है?” उन्होंने पूछा।
शबनम आपा की आँखें तनी।
“बंसी बाबा,” उन्होंने कहा, “मैं गुमटी पर पंद्रह साल से चाय दे रही हूँ। आज तक किसी की माँ ने शिकायत नहीं की।”
“मैं बस पूछ रहा हूँ।”
“धोया गया है!” आपा ने कहा। “गरम पानी से। और चाहो तो उल्टा कप ले लो।”
हाफ़िज़ बाबा ने अपना कप उठाया, घूँट लिया, और फिर बोले, “चीनी कम थी।”
शबनम आपा ने थाली मेज़ पर रखी, ज़ोर से।
“अच्छा जी!” वो बोलीं। “एक को कप धोया हुआ नहीं लगता, दूसरे को चीनी कम। और जिसने साठ साल से चीनी खाई है वो मेरी चाय में कम बताए!”
मैं हँसने लगा। रुक नहीं पाया।
“आपा,” मैंने कहा, “आप इन दोनों को पाँच मिनट में सुलह करा देंगी, उस्ताद की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”
“मैं तो चाय देने आई थी,” आपा ने कहा और दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठ गईं। “बाकी तुम देख लो।”
उस्ताद ने तब तक कुछ नहीं कहा था। वो इस तरह बैठे थे जैसे कोई जज बैठा हो — पर ऐसा जज जो खुद भी एक मुकदमे में फँसा हुआ हो।
फिर उन्होंने आँखें उठाईं।
“एक बात पूछूँ?” उन्होंने कहा।
“पूछिए, उस्ताद जी,” बंसी बाबा ने कहा।
“दुकान का पुराना नाम क्या था?”
और फिर वो हुआ जिसका मुझे इंतज़ार था, पर फिर भी जिसने मुझे अंदर से हिला दिया।
दोनों ने एक साथ कहा —
“बंसी–निसार भंडार।”
एक ही साँस। एक ही शब्द। दो आवाज़ें जो बत्तीस साल से अलग चल रही थीं, और आज हवा में मिल गईं।
और फिर, जैसे किसी ने उन्हें बिजली की तरह छुआ हो, दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और चुप हो गए।
बंसी बाबा ने स्टूल पकड़ लिया। हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह पकड़ ली।
दुकान में इतनी चुप्पी हो गई कि सड़क पर से गुज़रती साइकिल की घंटी बाहर से सुनाई दी।
मैंने धीरे से साँस ली।
“बस,” मैंने कहा। “इतना ही काफ़ी है।”
“क्या मतलब?” बंसी बाबा ने पूछा।
“मतलब यह,” मैंने कहा, “कि आज हम काग़ज़ नहीं खोलेंगे। आज कोई चाबी नहीं बदलेंगे। आज सिर्फ़ आधी चाबी लौटेगी।”
“आधी?” हाफ़िज़ बाबा ने सिर उठाया।
“जी,” मैंने कहा। “बंसी बाबा अपनी निसार की चाबी लौटाएँगे। हाफ़िज़ बाबा अपनी बंसी की चाबी लौटाएँगे। पर काग़ज़ आज नहीं।”
“तो कब?” बंसी बाबा ने कहा।
“पाँच बजे,” मैंने कहा। “पूरी गली के सामने। भंडार के सामने।”
बंसी बाबा ने सिर हिलाया — पहले धीरे, फिर ज़ोर से। “पर एक बात है, अंकुश।”
“कहिए।”
“मैं चाबी नहीं लूँगा।”
दुकान में फिर चुप्पी।
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह रोक दी। “क्यों नहीं लेगा?”
“क्योंकि पहले हिसाब है,” बंसी बाबा ने कहा। “चाबी बाद में।”
“कौन सा हिसाब?” मैंने पूछा।
बंसी बाबा ने अपनी लाठी के सिरे को फ़र्श पर टिकाया। फिर धीरे से, ऐसे जैसे मुँह से शब्द निकालने में ताक़त लग रही हो, बोले —
“मैंने इससे पैसे लिए थे।”
दुकान में सन्नाटा। और उस सन्नाटे में शबनम आपा की केतली से भाप निकल रही थी, बस वही आवाज़ थी — फुस-फुस।
“कब?” मैंने पूछा।
“आग से पहले,” बंसी बाबा ने कहा। “दुकान की मरम्मत के लिए। चार सौ रुपये। उस ज़माने के हिसाब से बहुत थे।”
हाफ़िज़ बाबा ने उनकी तरफ़ देखा।
“मैंने कभी माँगा नहीं,” उन्होंने कहा।
“तभी तो पता चलता है कि यह मेरा दोष है,” बंसी बाबा ने कहा, और उनकी आवाज़ टूटी। “न माँगने से ऋण नहीं मिटता। मैंने लौटाया नहीं। मैं हर महीने सोचता था — अगले महीने लौटा दूँगा। और महीना बत्तीस साल का हो गया।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद की आँखें बंद थीं। वो कुछ नहीं बोले।
“बस इतना ही?” मैंने कहा। “चार सौ रुपये?”
“नहीं,” बंसी बाबा ने कहा। “ये चार सौ रुपये नहीं हैं, अंकुश। ये वो शर्म है जो मुझे हर हफ़्ते उसकी दुकान के सामने से गुज़रते वक़्त होती थी। और मैंने उस शर्म को गुस्सा बना दिया। मैंने अपनी गुस्से को उस पर डाला। मैंने उसके बारे में बातें फैलाईं।”
हाफ़िज़ बाबा ने धीरे से कहा, “कौन सी बातें?”
बंसी बाबा ने आँखें नहीं उठाईं।
“वो बातें,” उन्होंने कहा, “जो आग के बाद हर किसी ने कहीं। मैंने भी एक बार कह दी। उस रात गुस्से में। गली के मोड़ पर।”
हाफ़िज़ बाबा ने लंबी साँस ली। ऐसी लंबी कि मुझे लगा वो कमरे की पूरी हवा खींच लेंगे।
“उस रात मेरी बीवी वहाँ खड़ी थी,” उन्होंने कहा।
बंसी बाबा ने सिर उठाया।
“वो सुन रही थी,” हाफ़िज़ बाबा ने कहा। “और मैंने सुना। मैंने उसे रोक लिया — अपने आप को नहीं रोक पाया, पर उसे रोक लिया। वो घर गई और बत्तीस साल तक उसने उस रात का नाम नहीं लिया।”
अब मुझे समझ आया कि हाफ़िज़ बाबा की बीवी की आँखों में वो चुप्पी कहाँ से आई थी, जो मैंने उनके घर के बाहर एक बार देखी थी, जब मैं छोटा था और वो चबूतरी पर बैठी थीं, कुछ नहीं कह रही थीं।
“तो अब आप बताइए,” मैंने हाफ़िज़ बाबा से कहा। “आपने क्या किया?”
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह को अपनी हथेली में लपेटा। फिर बोले।
“मैंने गुस्से में उसकी बीवी के बारे में बुरा कहा था।”
दुकान में अब सिर्फ़ भाप नहीं थी। अब कुछ और भी था — जैसे किसी पुराने बंद कमरे का दरवाज़ा खुला हो।
“क्या कहा था आपने?” मैंने पूछा। मेरी आवाज़ धीमी थी।
“यही कि वो अपने भाई के घर इसलिए गई थी कि उसे दुकान का हिस्सा चाहिए। कि आग लगने की रात वो घर पर थी ही नहीं। कि उसने कहीं और जाकर दुकान की बातें बताईं।”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
“और आपको पता था?”
“नहीं,” हाफ़िज़ बाबा ने कहा। “मुझे पता था कि झूठ बोल रहा हूँ। बस इतना पता था। और झूठ भी किसी और से नहीं, खुद अपने गुस्से से बोला था।”
बंसी बाबा ने लाठी फ़र्श पर पटक दी।
“बत्तीस साल!” वो बोले। “बत्तीस साल मैंने सोचा कि वो मेरी बीवी पर इल्ज़ाम लगा रहा है, और सच ये था कि मैंने उसकी बीवी पर इल्ज़ाम लगाया था!”
“और मैंने तेरे ऋण को नहीं माँगा,” हाफ़िज़ बाबा ने कहा। “क्योंकि मुझे लगा कि माँगने से मेरी छोटी बात और छोटी लगेगी।”
मैं बीच में बैठा था, और मुझे लगा जैसे मैं किसी नदी के दो किनारों के बीच पुल बना हुआ हूँ, और अभी दोनों किनारे हिल रहे हैं।
मैंने दोनों की तरफ़ देखा।
“अब सुनो,” मैंने कहा। “बंसी बाबा ने कहा कि उसने ऋण लिया। हाफ़िज़ बाबा ने कहा कि उसने इल्ज़ाम लगाया। दोनों आधी-आधी बात कह रहे हैं।”
“आधी कैसे?” बंसी बाबा ने पूछा।
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