The Mysterious Bell496 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 496

7 min read November 5, 2026

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी ठंडी थी। ठंडी, पर बर्फ़ जैसी नहीं। अब वो बरसात के पहले की हवा जैसी लग रही थी — जो ठंडी तो होती है, पर जिसमें कुछ आने वाला होता है।

"मैंने झूठ बोला," मैंने कहा।

दुकान में चुप्पी छा गई। इतनी गहरी कि बेंच पर पड़े पहिये की बॉल बियरिंग की चरचराहट भी बंद हो गई, जैसे पहिया भी सुन रहा हो।

"मैंने कहा कि मोहन ने सब कबूल कर लिया," मैंने कहा। "ये झूठ था। मुझे पूरी बात नहीं पता, गिरधारी भाई। कुछ पता है। कुछ नहीं पता। और जो नहीं पता, वो मैं अपनी ज़ुबान से नहीं बनाऊँगा। चाहे तुम्हारे सामने मेरी छोटी सी इज़्ज़त ही क्यों न जाए।"

मेरी जेब से घंटी ने बहुत धीरे, इतनी धीरे कि मुझे भी यक़ीन नहीं हुआ, कहा, "अब सही।"

गिरधारी ने एक कदम पीछे किया।

"तू झूठ बोल रहा था?" उसने कहा। आवाज़ हैरान थी, गुस्से में नहीं।

"हाँ। और अब शर्म आ रही है।"

"क्यों बोला फिर?"

"क्योंकि तुम्हारा चेहरा देखकर लगा कि एक झूठ से तुम्हारा पंद्रह साल का बोझ हल्का हो जाएगा।" मैंने अपने हाथ पोंछे। "पर यहाँ चीज़ें झूठ से ठीक नहीं होतीं, भाई। अगर मैं झूठ बोलकर तुम्हारा पहिया सीधा कर दूँ, तो वो दो दिन बाद फिर मुड़ जाएगा। और अगर मैं सच बोलकर ठीक करूँ, तो वो शायद तुम्हारे पोते के बेटे तक चले।"

पीछे, ट्रंक के पास, टिंकू बैठा था। उसने कोई चीज़ गिरा दी — शायद रिंच। खनक हुई और फिर वो फौरन झुककर उसे उठाने लगा।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा।

"चुप, टिंकू," मैंने कहा। "अभी बैठा रह।"

गिरधारी कुछ देर खड़ा रहा। फिर उसने अपने हाथ से अपना चेहरा सहलाया, जैसे नींद से उठा हो। फिर उसने पीछे पड़ा दूसरा स्टूल खींचा और उसे मोहन की तरफ़ सरका दिया।

ये छोटी सी बात थी। बस एक स्टूल, ज़मीन पर चार आवाज़ करता हुआ, कोई दो हाथ खिसकता हुआ। पर मैं जानता हूँ कि कई रिश्ते इससे बड़ी चीज़ों से नहीं जुड़ते। वो एक स्टूल से जुड़ते हैं।

"बैठ," गिरधारी ने कहा।

मोहन ने उसकी तरफ़ देखा। पहली बार उसकी आँखों में डर नहीं था। थकान थी।

"भाई—"

"बैठ," गिरधारी ने फिर कहा, और इस बार आवाज़ फटी हुई थी। "मैं पूछता हूँ। तू बता। और मैं सुनूँगा। पूरा सुनूँगा। बीच में नहीं बोलूँगा।"

मोहन बैठ गया। उसके घुटने एक-दूसरे से टकरा रहे थे। उसने अपनी हथेलियाँ घुटनों पर रखीं और कुछ देर छत की तरफ़ देखता रहा, जहाँ बल्ब गुनगुना रहा था।

फिर उसने कहा, "वो साइकिल मैंने बेची नहीं थी।"

गिरधारी की पलकें झपकीं, पर वो बोला नहीं।

"मैंने उसे उस्ताद अली बक्श की दुकान के पीछे छोड़ी थी।"

मेरे हाथ से वो रिंच छूटते-छूटते बची जिससे मैं पहिये की एक तीली सीधी कर रहा था। वो बेंच पर गिरी और एक लंबी, पतली आवाज़ करके खड़ी हो गई।

मैंने जेब में हाथ डाला।

घंटी ठंडी नहीं थी। पर वो चुप भी नहीं थी। वो ऐसे काँप रही थी जैसे बहुत दूर कोई चीज़ अपनी जगह से खिसक रही हो।

"उस्ताद अली बक्श," मैंने धीरे से दोहराया।

"हाँ," मोहन ने कहा। "तुझे पता है?"

मुझे क्या कहना था? कि वो आदमी मेरी दुकान से तीन कदम दूर सिलाई मशीन पर बैठता है? कि वो घंटी को देखकर रुक जाता है और हाथ उठाकर रास्ता रोक देता है? कि उसने बस यही कहा था कि ये मिरासी है और हर आवाज़ का हिसाब होता है? कि पचास साल पहले उसने किसी सवाल के जवाब में अपना भाई खो दिया था?

"मैं जानता हूँ," मैंने बस इतना कहा।

गिरधारी की तरफ़ देखा तो मेरा हाथ ठंडा हो गया।

उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। जैसे किसी ने उसके चेहरे से खून ही खींच लिया हो। वो स्टूल पर से उठा नहीं, बस वहीं खड़ा रहा, और उसकी उँगलियाँ अपनी जाँघ पर ऐसे दबने लगीं जैसे किसी चीज़ को पकड़ना चाहती हों।

"अली बक्श," उसने धीरे से कहा। "वो दर्ज़ी?"

"हाँ," मोहन ने कहा। "पुराने बाज़ार में, बिजलीघर के पीछे, उस्ताद की एक छोटी दुकान थी। सिलाई की नहीं — उससे भी पुरानी। बस एक कमरा, टीन का, और उसके पीछे एक और कमरा जिसमें लोग अपनी चीज़ें रखते थे। कोई गिरवी, कोई मरम्मत के लिए। उस्ताद खुद वहाँ बैठते थे, अपनी मशीन नहीं — बस एक पुरानी कुर्सी पर।"

"तूने वहाँ क्यों रखी?" गिरधारी ने पूछा।

"क्योंकि उसके पहिये की तीलियाँ टूटी थीं और मेरे पास ठीक कराने के पैसे नहीं थे। और उस्ताद ने कहा था — जब पैसे हों, आ जाना। जल्दी मत करना। चीज़ें जल्दी में नहीं सँभलतीं।"

मोहन ने अपनी आवाज़ नीची की।

"मैं दो दिन बाद गया। उस्ताद ने कहा — दो महीने बाद आ। तब मैं दो महीने बाद गया। और उस दिन दुकान पर ताला लगा था। मैं वहीं सड़क पर खड़ा रहा। शाम तक। फिर अगले दिन गया। फिर अगले हफ़्ते। कोई नहीं आया।"

"फिर?" गिरधारी ने कहा।

"फिर मैंने सोचा कि साइकिल खो गई। चोरी हो गई। या उस्ताद ने बेच दी। मैंने खुद से कह दिया कि साइकिल गई। और उस दिन के बाद मैं उस गली की तरफ़ नहीं गया।"

मोहन ने सामने बेंच पर पड़ा टूटा पहिया देखा।

"पर सच ये है, भाई, मैं वहाँ से लौटते वक़्त हर बार सोचता था — काश कोई मुझसे पूछ ले कि तू कहाँ जा रहा है। तू क्या ढूँढ रहा है। तब मुझे कहने का बहाना मिल जाता। पर कोई नहीं पूछता था। तुम पूछते, तो मैं बता देता।"

मैंने उसी वक़्त कुछ कहा होता, पर मैंने अपना मुँह बंद रखा।

घंटी ने कहा था — सिर्फ़ सुनना। और आज मुझे पहली बार लगा कि सुनना भी एक काम है, और वो काम मरम्मत से ज़्यादा मुश्किल है।

गिरधारी ने अपनी जेब से रूमाल निकाला। पुराना, फटा, धोया हुआ। उसने उससे अपना माथा पोंछा और फिर वो रूमाल ही अपने हाथ में मरोड़ने लगा।

"मैंने एक बार उस दुकान के सामने से गुज़रते हुए अंदर झाँका था," उसने कहा। "तब मुझे नहीं पता था कि तेरी साइकिल वहाँ है। मुझे लगा कोई और आदमी रखता है। मैंने देखा कि अंदर अंधेरा है और एक लोहे का ट्रंक पड़ा है। और मैं चला गया।"

दुकान में हवा रुक गई।

"तुम्हें पता था कि साइकिल उसी दुकान पर है?" मैंने पूछा।

"नहीं," गिरधारी ने कहा। "उस दिन नहीं पता था। आज पता चला।"

अब मुझे तुमसे एक बात कहनी है, सुनने वाले। जब कोई कहानी में ऐसा होता है कि चीज़ें अचानक जुड़ जाती हैं, तो लोग समझते हैं कि जादू है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा था और मेरे पेट में एक ठंडी गाँठ बन रही थी।

क्योंकि ये जो नाम अभी मोहन के मुँह से निकला था — अली बक्श — यही नाम मेरे पापा की ज़ुबान पर पच्चीस साल से दबा हुआ था।

पच्चीस साल पहले, दादा के बुखार में, पापा ने अपनी साइकिल उस्ताद के पास गिरवी रखी थी। "तीन दिन" के लिए। और तीन दिन कभी ख़त्म नहीं हुए। पापा उसे वापस कभी नहीं माँगने गए। और वो साइकिल आज तक उस्ताद की दुकान से आई नहीं।

अब मोहन कह रहा है कि उसने भी अपनी साइकिल उसी आदमी की उसी दुकान के पीछे छोड़ी थी।

तो उस दुकान के पीछे वाले कमरे में क्या-क्या पड़ा है?

कितनी साइकिलें?

कितने आदमी?

कितने पंद्रह साल?

कितने पच्चीस साल?

मैंने अपनी जेब में घंटी को कसकर पकड़ा। वो अब गर्म लग रही थी। गर्म, पर धीरे-धीरे — जैसे किसी ने अभी-अभी उसे हाथ में पकड़ा हो।

"घंटी," मैंने मन में कहा।

वो चुप रही।

"घंटी," मैंने फिर कहा।

"अभी कुछ मत पूछ," उसने कहा। "ये सुन रहा है।"

"कौन?"

"ये बड़ा वाला। ये अब भी तेरी बात सुन रहा है। तू इससे ज़ुबान से माँग, मुझसे नहीं।"

मैंने जेब से हाथ निकाला।

"गिरधारी भाई," मैंने कहा।

वो मेरी तरफ़ देखने लगा।

"एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

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