The Mysterious Bell – Chapter 495
मोहन ने अपनी मुट्ठी बेंच पर रखी। बड़ी आवाज़ हुई।
"साइकिल कहीं खड़ी है," उसने कहा। "और उस पर कोई बैठा है।"
मेरी जेब में घंटी हिली। एक हल्की सी हरकत, जैसे सोते हुए आदमी ने करवट बदली हो।
"ये बात पूरी बोल," मैंने कहा।
"बेचने के लिए मैं पहले किसी के पास गया था," मोहन ने कहा। "पर उस दिन मैंने साइकिल नहीं बेची। मैं उस दिन उसे रखने के लिए दे आया था। पुराने बाज़ार में एक दुकान थी, बिजलीघर के पीछे की तरफ़। साइकिलों की मरम्मत होती थी, और पीछे कमरे में वो लोगों की चीज़ें रखते थे — बंधक जैसी। एक आदमी था, चश्मा, ऊँचा कद, बोलता बहुत कम था। उसने कहा — छह महीने में पैसे लेकर आ जाओ, साइकिल तुम्हारी। नहीं आए तो साइकिल मेरी, और उस पर से तुम्हारा नाम कट जाएगा।"
"तूने दे दी?" गिरधारी की आवाज़ ऊपर उठी।
"मैंने दे दी। क्योंकि मेरे पास और कुछ नहीं था। छह महीने बाद मैं गया। दुकान थी ही नहीं। वहाँ ईंटें रखी थीं, नई ईंटें, और एक लोहे की टंकी। मैंने आस-पास पूछा तो लोगों ने कहा — उस दुकान वाला तो चला गया, किसी को कुछ नहीं बताया।"
"तो साइकिल?" मैंने कहा।
"साइकिल किसी और के पास चली गई।" मोहन ने सिर उठाया और पहली बार सीधे मेरी आँखों में देखा। "और मैंने तुमसे झूठ नहीं बोला था, भाई। मैंने कहा था — बेच दी। क्योंकि उस चीज़ को खो देना भी एक तरह का बेचना ही है। और बेचने वाला तो मैं ही था।"
गिरधारी ने चाय की प्याली रख दी। उसके हाथ की उँगलियाँ ठंडी हो गई थीं, मुझे बाहर से दिख रहा था।
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने सोचा — अब पूछूँ कि वो आदमी कौन था? नाम क्या था? काग़ज़ था कोई? पर मैंने घंटी की बात मानी। जल्दी मत कर।
"तुमने मुझे कभी नहीं बताया," गिरधारी ने कहा, धीमे। "इतने साल। तू मुझे बता सकता था। हम साथ जाकर ढूँढते।"
"तुम मेरे साथ जाते?" मोहन ने पूछा। और उस सवाल में इतनी हल्की हँसी थी कि वो रोने जैसी लगी। "भाई, तुमने पंद्रह साल मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने बाप का नाम बेच दिया हो। तुम्हारे सामने मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाता था। और तुम कह रहे हो कि हम साथ ढूँढते?"
गिरधारी ने कोई जवाब नहीं दिया।
दुकान के बाहर टिंकू उठ गया और उसने गेंद पकड़कर बच्चों की तरफ़ फेंकी। फिर वो वापस आया और दरवाज़े पर खड़ा हो गया, मेरी छोटी मेज़ की तरफ़ देखता हुआ, जहाँ टूटा रेडियो पड़ा था।
मैंने उसे देखा, पर अभी कुछ नहीं कहा।
अंदर मैंने बस इतना कहा, "गिरधारी भाई, अब तुम सुनो। और जो सुनो, बीच में मत बोलो। मैं भी नहीं बोलूँगा।"
गिरधारी ने सिर हिलाया।
मोहन ने अपनी मुट्ठी खोलनी चाही, पर नहीं खोली।
"उस साल," वो बोला, और उसकी आवाज़ अब पहले जैसी नहीं थी। "उस साल तुम्हें बुखार आया था।"
गिरधारी ने देखा। "कौन सा साल?"
"वही साल। जब मैं साइकिल लेकर भागा था। उससे दो महीने पहले। तुम्हें तेज़ बुखार आया था, चार दिन। डॉक्टर ने कहा था — इसे शहर ले जाओ। पर शहर ले जाने के लिए पैसे चाहिए थे, और घर में उस वक़्त एक भी रुपया नहीं था, क्योंकि बाप के इलाज में जो था, सब जा चुका था। तुम्हें याद है वो दिन? तुम्हें याद है कि उस शाम मैं घर आया था और मेरी जेब में पैसे थे?"
गिरधारी ने धीरे से कहा, "तूने कहा था — किसी से उधार लिया है।"
"और तुमने पूछा था किससे?"
गिरधारी चुप।
"नहीं पूछा था," मोहन ने कहा। "तुमने एक बार भी नहीं पूछा कि किससे उधार लिया। तुमने पैसे लिए, दवा ली, सो गए। और मैं उस रात बैठकर अपनी कलाई देखता रहा — खाली कलाई।"
मेरे हाथ की चाय ठंडी हो रही थी। मैंने प्याली नीचे रख दी।
"मैंने साइकिल नहीं बेची थी, भाई," मोहन ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार टूटी। "उस दिन मैंने अपनी घड़ी बेची थी। बाप की दी हुई घड़ी। जो उन्होंने मुझे चुपचाप दी थी, जब तुम कहीं गए थे। कहा था — ये चलती रहती है, तुझे वक़्त का पता चलेगा। और मैंने वो घड़ी बेच दी, भाई की दवा के लिए। और तुमने आज तक पूछा भी नहीं।"
दुकान में हवा रुक गई।
गिरधारी का हाथ उठा और उसकी कलाई पर आकर रुक गया। कलाई खाली थी। दोनों की खाली थी।
मैंने बेंच पर रखा टूटा पहिया देखा। उसकी तीलियाँ अब नहीं हिल रही थीं। बॉल बियरिंग की चरचराहट बंद हो गई थी। जैसे पहिया भी सुन रहा हो।
"तूने मुझे कभी नहीं बताया," गिरधारी ने कहा। आवाज़ बहुत छोटी थी। "पंद्रह साल। तू बता सकता था।"
"तुम पूछते तो बता देता," मोहन ने कहा। "पर तुमने बाप की साइकिल पूछी, मेरी कलाई नहीं।"
गिरधारी ने अपना चेहरा दोनों हाथों में छिपा लिया।
और मैं वहीं बैठा रहा।
मैंने जेब में घंटी को छुआ। वो अब भी ठंडी थी, पर उसकी ठंडक बदल गई थी। पहले जैसे बर्फ़, अब जैसे बरसात के बाद की मिट्टी।
"मैंने कुछ नहीं कहा," घंटी ने फुसफुसाया।
"हाँ," मैंने मन में कहा।
"अभी कुछ नहीं मिला।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
"जब माफ़ी सच्ची होगी, तब मिलेगा। ज़ुबान से निकली माफ़ी नहीं। इस आदमी के सीने से निकली माफ़ी।"
"और साइकिल?" मैंने पूछा।
घंटी चुप रही।
मैंने अपनी हथेली देखी। खाली थी। कोई अंक नहीं, कुछ नहीं। बस ग्रीस और उस पुराने पहिये की कालिख।
"अंकुश," गिरधारी ने कहा, चेहरा हाथों से हटाकर। उसकी आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रहा था। "ये पहिया ठीक कर दे।"
"भाई," मैंने कहा, "पहिया ठीक हो जाएगा। पर साइकिल कहाँ है, ये अभी मुझे नहीं पता। और मैं झूठ नहीं बोलूँगा।"
"मुझे पता है," मोहन ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो आदमी तब बोलता है जब वो बहुत देर तक कुछ अंदर दबाए बैठा हो। "मुझे पता है वो आदमी कहाँ मिलेगा।"
"कहाँ?"
"वो अब दुकान नहीं चलाता," मोहन ने कहा। "वो अब काग़ज़ चलाता है। और उसके पास सफ़ेद कुर्ता है।"
मेरे हाथ से प्याली छूटते-छूटते बची।
बेंच के नीचे, मेरे पैर के पास, वो अजनबी का पुराना बैग अब भी पड़ा था। मैंने उसे नहीं खोला था। मैंने उसे छुआ भी नहीं था।
आज शाम को छूना पड़ेगा।
और मेरी जेब में घंटी ने करवट बदली, इतनी धीरे कि मुझे लगा जैसे किसी ने बहुत दूर, किसी और गली में, एक पुरानी साइकिल की घंटी बजाई हो।
एक बार।
बस एक बार।
जैसे कोई कह रहा हो — मैं आ गया। अब मुझे पहचान।
॥
मेरी ज़ुबान पर बात आ चुकी थी।
गिरधारी मेरी तरफ़ देख रहा था। आँखें लाल, होंठ काँपते हुए, और चेहरे पर वो भूख जो आदमी को तब लगती है जब वो पंद्रह साल से एक ही सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रहा हो। उसे कोई सच नहीं चाहिए था। उसे बस एक आवाज़ चाहिए थी जो कहे — तुम गलत नहीं थे।
और मेरा मुँह खुद-ब-खुद खुल गया। जैसे दुकान का वो पुराना दरवाज़ा जो हवा के एक झोंके से खुल जाता है और फिर अपने आप बंद नहीं होता।
"गिरधारी भाई," मैंने कहा, "मोहन ने सब कबूल कर लिया। सारी बात। जो तुम सुनना चाहते हो, वो सब उसने मुझे बता दिया है।"
बात पूरी भी नहीं हुई थी कि मेरी जेब में घंटी बर्फ़ की तरह ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी कि मेरी जाँघ पर लगा कपड़ा भी जैसे सख़्त हो गया। जैसे किसी ने मेरी जेब में बर्फ़ का एक टुकड़ा डाल दिया हो और वो पिघलने से मना कर रहा हो।
"झूठ," घंटी ने कहा।
एक ही शब्द। छोटा। सूखा। बिना गुस्से के। और शायद इसीलिए वो इतना चुभा।
मेरी ज़ुबान मुँह में ही रुक गई।
मैंने गिरधारी की तरफ़ देखा। वो अब भी मेरी तरफ़ देख रहा था, पर उसके चेहरे पर कुछ बदल गया था। जैसे किसी को बहुत दूर से आती हुई रोशनी दिखे और फिर वो बुझ जाए।
"क्या कहा तूने?" उसने पूछा।
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