The Mysterious Bell497 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 497

7 min read November 5, 2026

"तुम पहले भी कभी उस दुकान के पीछे वाले कमरे में गए हो?"

गिरधारी चुप रहा। उसने अपना रूमाल जेब में ठूँसा, फिर दोबारा निकाला, फिर दोबारा ठूँसा। जैसे उसके हाथ को कुछ करना ही था।

"हाँ," उसने कहा। "गया था। एक बार। बहुत पहले।"

"कब?"

"जिस दिन मेरी बीवी की दवा के पैसे मोहन लेकर आया था, उससे चार दिन बाद।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "उस रात मुझे नींद नहीं आई। मुझे लगा कि इसने कहीं से पैसे जुगाड़ किए हैं। मुझे शक था। मैं सुबह उठकर सीधे उस दुकान पर गया। सोचा कि पूछूँगा कि भाई की साइकिल पकड़ी है तो बता दो।"

"और?"

"और दरवाज़े पर ताला था।"

वो एक लंबी साँस लेने लगा।

"बाहर सीमेंट की बोरियाँ पड़ी थीं। और लोहे की एक टंकी। नई। ऊपर पानी की टंकी। मैंने उस वक़्त सोचा कि कोई नया काम होने वाला है। मैं वापस लौट आया। और फिर मैं कभी उस तरफ़ नहीं गया।"

मोहन ने अपने हाथों को घुटनों पर कसकर दबाया।

"सीमेंट की बोरियाँ," उसने धीरे से दोहराया। "जब मैं दो महीने बाद गया था, तब भी बाहर बोरियाँ पड़ी थीं। मैंने सोचा कि मालिक घर बना रहा होगा।"

मैंने अपनी उँगलियों में पहिये की एक तीली पकड़ी। वो सीधी हो गई थी। मैंने उसे धीरे से घुमाया — वो अब भी चरचरा रही थी। कुछ इस दुनिया की हर चीज़ों की तरह — ज़ाहिर से सीधी, अंदर से टूटी हुई।

"भाई," टिंकू ने पीछे से कहा। बहुत धीरे। "उस्ताद, मतलब—"

"टिंकू," मैंने कहा। "एक काम कर। शबनम आपा के पास जा और कह कि तीन प्याली और भेज दे। और ये भी कह कि आज पैसे महीने के अंत में दूँगा।"

टिंकू उठा। वो जानता था कि मैंने उसे किसी काम पर नहीं, किसी बात से बाहर भेजा है। पर वो गया। दरवाज़े से निकलते वक़्त उसने एक बार पीछे देखा, फिर अपने हाथ में पड़ी रिंच को ट्रंक पर बहुत संभालकर रख दिया, और चला गया।

दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ के बाद गिरधारी ने कहा, "मैंने तुझसे कुछ पूछा था।"

"हाँ।"

"कि पहिया ठीक कर दे।"

"हाँ।"

"पर तू अभी मुझसे कुछ छिपा रहा है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

और मैंने अपने अंदर वो पुरानी आदत पकड़ी — जो हर बार कहती है कि बात को घुमा दो, हँसी में बदल दो, कह दो ये सब काग़ज़-वाग़ज़ का खेल है, भाई, तुम अपने साइकिल के पहिये पर ध्यान दो।

पर मैंने अपनी ज़ुबान को रोक लिया।

"मुझे कुछ पता है," मैंने कहा। "और वो पता होना मेरे हाथ में नहीं है। पर जो पता है, वो ये कि उस्ताद आज भी ज़िंदा हैं। और वो आज भी सिलाई करते हैं। और मेरी गली में बैठते हैं।"

गिरधारी का रूमाल उसके हाथ से गिर पड़ा।

"मेरे उस्ताद?" उसने कहा। "वो मेरे उस्ताद थे। मैंने उनसे सिलाई सीखी थी, अंकुश। पंद्रह साल की उम्र में। दो साल। उन्होंने मुझे पहली बार कैंची पकड़ना सिखाया था। और उसके बाद—"

वो रुक गया।

"उसके बाद क्या?" मैंने पूछा।

"उसके बाद मैंने सिलाई छोड़ दी। क्योंकि मैं उस दुकान के पास से होकर आता-जाता था और वो मुझे देखते थे। और मुझे लगता था कि वो मेरे चेहरे पर वो वक़्त देखते हैं जब मेरा बाप मरा था। मैंने दो साल में सब छोड़ दिया। और फिर मैं कभी उनसे मिलने नहीं गया।"

मैंने धीरे से कहा, "वो आज भी मेरी गली में हैं। रोज़ सुबह अपनी दुकान खोलते हैं, मशीन पर बैठते हैं, और कभी-कभी मेरी तरफ़ देखते हैं।"

गिरधारी ने अपना सिर नीचे कर लिया।

मैंने उसे कुछ देर चुप रहने दिया। कभी-कभी चुप्पी भी एक औज़ार होती है, और उसे भी सही जगह पर इस्तेमाल करना आना चाहिए।

"अंकुश," मोहन ने अचानक कहा।

"हाँ।"

"तू कल उस दुकान पर जाएगा?"

मैंने सोचा। कल सुबह मुझे क्या करना था? दुकान खोलनी थी। माँ की नई दवा का इंतज़ाम देखना था। चंद्रेश की फ़ाइल वाली बात सोचनी थी। बेंच के नीचे पड़ा वो अजनबी का बैग खोलना था, जिसे मैंने अभी तक नहीं छुआ था, और जिसके बारे में मुझे लगता था कि उसे खोलते ही कोई नई मुसीबत निकलेगी।

पर मैंने सोचा — अगर किसी आदमी की साइकिल पंद्रह साल से एक बंद कमरे में पड़ी है, तो दवा और फ़ाइल और बैग थोड़ी देर रुक सकते हैं।

"हाँ," मैंने कहा। "कल सुबह, दुकान खोलने से पहले।"

"मुझे साथ ले चल।"

"तुम?"

"मैं साथ चलूँगा," मोहन ने कहा। "मैंने वहाँ साइकिल रखी थी। मैं ही उसे लेने जाऊँगा।"

और तभी गिरधारी ने कुछ ऐसा कहा जो मेरे अंदर कहीं ठहर गया।

"नहीं," उसने कहा। "पहले मैं जाऊँगा।"

मोहन ने उसकी तरफ़ देखा।

"मैं उनसे माफ़ी माँगूँगा," गिरधारी ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "पंद्रह साल की नहीं। पच्चीस साल की। मैं सिलाई छोड़कर भाग गया था। और वो आज तक मेरी गली में बैठे हैं।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गर्म थी। बहुत गर्म। और उसके गर्म होने में एक अजीब सी बात थी — जैसे वो खुश नहीं, बस इंतज़ार कर रही हो।

"अभी माफ़ी नहीं," घंटी ने कहा। "अभी सिर्फ़ सच। माफ़ी बाद में।"

"पर सच तो आ गया," मैंने मन में कहा। "दोनों ने बोल दिया।"

"आधा आया," घंटी ने कहा। "इसने कहा कि मैंने स्टूल खिसका दिया। पर इसने ये नहीं कहा कि वो उसे छोड़कर क्यों भागा था। और स्टूल खिसकाना माफ़ी नहीं होती।"

और तभी मुझे लगा कि ये बात सही है। गिरधारी ने स्टूल खिसकाया था, पर उसने अपना एक भी शब्द नहीं खोला था। सारी बातें मोहन ने कही थीं। सारी कबूलनामे मोहन के हिस्से आए थे।

मैंने गिरधारी की तरफ़ देखा और कहा, "भाई, एक बात कहूँ? बुरा मत मानना।"

"बोल।"

"तुमने आज सिर्फ़ दो बातें कहीं। एक कि बैठ। दूसरी कि मैं साथ जाऊँगा। और मोहन ने सारी बातें कहीं।"

गिरधारी ने मेरी तरफ़ देखा।

"तो?"

"तो जो अंदर दबा है, वो मोहन का नहीं, तुम्हारा भी है। और वो बाहर नहीं आएगा तो पहिया ठीक होकर भी साइकिल नहीं चलेगी।"

गिरधारी की आँखों में पहले गुस्सा आया। मैंने देखा कि उसका जबड़ा कस गया और उसने अपना हाथ उठाया, जैसे कुछ कहने से पहले हवा में ही रोक देना हो।

फिर वो हाथ गिर गया।

"मैंने मोहन की साइकिल नहीं छिपाई थी," उसने कहा। "मैंने बस ये छिपाया कि मुझे पता था कि वो कहाँ गया था।"

"क्या?"

"उस रात मैं जाग रहा था," गिरधारी ने कहा। "मैंने दरवाज़े की आवाज़ सुनी। मैंने खिड़की से देखा। वो साइकिल धकेलकर बाहर जा रहा था, अंधेरे में। मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने आँखें बंद कर लीं और सोने का नाटक किया।"

मोहन ने अपना सिर उठाया।

"तुमने देखा था?"

"देखा था।"

"और तुमने कहा नहीं?"

"मैंने सोचा कि अगर बोलूँगा तो सुबह झगड़ा होगा। और उस वक़्त मुझे झगड़े से ज़्यादा नींद प्यारी थी।" गिरधारी ने अपना चेहरा उठाया। "ये बात मैंने आज तक किसी को नहीं कही। अब कह दी।"

दुकान में चुप्पी।

टिंकू बाहर से आया, एक थाली में तीन प्यालियाँ लिए, और दहलीज़ पर रुक गया, जैसे उसे लगा कि अंदर आना ठीक नहीं होगा।

मैंने उसे हाथ से इशारा किया, वो चुपचाप प्यालियाँ बेंच पर रखकर वापस अपनी जगह बैठ गया।

चाय की भाप ऊपर उठ रही थी।

"ये तीसरी प्याली किसकी है?" गिरधारी ने पूछा।

"तुम्हारी," मैंने कहा।

"मुझे चाय नहीं चाहिए।"

"फिर भी पी लो," मैंने कहा। "और पीते वक़्त सोचना। सोचना कि कल सुबह उस्ताद के सामने क्या बोलोगे।"

गिरधारी ने प्याली उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे और चाय की सतह काँप रही थी।

मैंने अपनी प्याली उठाई और एक घूँट लिया।

फिर गिरधारी ने धीरे से कहा, "अंकुश।"

"हाँ।"

"उस्ताद की दुकान, तो वो साइकिल आज भी वहीं है।"

मैंने कहा, "शायद।"

"नहीं," गिरधारी ने कहा। उसने चाय नीचे रख दी। "मैं उस गली से रोज़ गुज़रता हूँ।"

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