The Mysterious Bell121 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 121: jodne wala mistri hissa 013 ep121-130

242 min read November 5, 2026

सलीम बक्श की हथेली में वो चीज़ पड़ी थी और गली की हवा जैसे रुक गई।

मैंने उसे गौर से देखा। बहुत छोटी थी। पीतल की, पर रंग अब पीला नहीं, गंदा हरा-भूरा हो चुका था। ज़ंग ने उसे इस तरह खाया था कि लगता था किसी पुराने सिक्के को किसी ने कील की तरह पीट दिया हो। और उसके ऊपर एक महीन छल्ला था, टूटा हुआ, जिसका एक सिरा अंदर की तरफ़ मुड़ा था, जैसे किसी ने उसे ज़ोर से खींचा हो और वो बीच से निकल आया हो।

वो घंटी की जीभ थी।

मेरी जेब में जो घंटी थी, वो काँप रही थी। काँप नहीं रही थी, हिल रही थी, जैसे किसी बूढ़े आदमी के हाथ काँपते हैं जब वो बरसों बाद अपने पुराने साथी को सामने खड़ा देखता है।

मैंने पीछे देखा।

पापा चौखट पर खड़े थे और उनके दोनों हाथ काँप रहे थे। सिर्फ़ हाथ नहीं। उनका चश्मा भी काँप रहा था, और चश्मे को कान पर पकड़े हुए टेप की चिपचिपाहट कब की खत्म हो चुकी थी, इसका अंदाज़ा इसी से लग जाता है कि चश्मा उनकी नाक पर सरक रहा था और वो उसे ठीक करना भूल गए थे।

"पापा," मैंने धीरे से कहा। "साँस लीजिए।"

वो मेरी तरफ़ देखकर भी नहीं देखा। उनकी नज़र सलीम की हथेली पर टिकी थी और उस हथेली पर पड़ी उस छोटी सी चीज़ में ऐसा कुछ था कि पचपन साल का आदमी एक झटके में साठ का लगने लगा।

तभी पीछे से रोशनी आई।

काजल लालटेन लेकर बाहर आई। उसका हाथ स्थिर था, ये देखकर मुझे ताज्जुब हुआ। यही काजल थी जो सुबह एक काग़ज़ की पर्ची देखकर रो पड़ती थी। पर आज उसके चेहरे पर वो चीज़ थी जो डर के बाद आती है। ठंडा गुस्सा।

"अंकुश," उसने मेरे कंधे के पास आकर धीरे से कहा। "माँ उठ रही हैं।"

मैंने पलटकर देखा।

माँ कुर्सी से सीधी हो रही थीं। उनका पल्लू कमर में कसा हुआ था, जैसे कोई तलवार बाँधता है। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा, काजल की तरफ़ नहीं देखा, पापा की तरफ़ भी नहीं देखा। सीधे सलीम की तरफ़ चलीं।

मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर हटा दिया।

उनके घुटनों की हालत मुझे पता थी। डॉक्टर इसरानी ने साफ़ कह दिया था कि ज़्यादा चलना नहीं। पर मैं जानता हूँ कि माँ के घुटने जब गुस्से में होते हैं तो डॉक्टर की बात याद नहीं रहती।

वो सलीम के बिल्कुल सामने आकर खड़ी हो गईं। दो कदम की दूरी।

"माँ," मैंने कहा।

"चुप कर," उन्होंने मुड़कर भी नहीं देखा।

सलीम मुस्कुराया। लेकिन उस मुस्कान में वो मिठास नहीं थी जो सुबह अस्पताल के बरामदे में थी। ये मुस्कान थकी हुई थी, जैसे कोई बहुत दूर से पैदल चलकर आया हो और यह देखकर थक जाए कि उसकी पूरी मेहनत बेकार गई।

"सुशीला जी," सलीम ने कहा।

"मुझे सुशीला मत कहो," माँ ने कहा। "तुम मेरे पति को शंकर कहते हो, तो मुझे भी उसी तरह बुलाओ। या यादव जी की बीवी कह दो। पर तुम्हारे मुँह से मेरा नाम सुनकर अच्छा नहीं लगता।"

गली में सन्नाटा था।

गुमटी की लालटेन अब भी जल रही थी और शबनम आपा अपनी गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में वो लोहे की चिमटी पकड़े, जिससे वो आम दिनों में समोसे उलटती हैं। आज चिमटी सिर्फ़ हाथ में थी, किसी काम के लिए नहीं। पीछे उस्ताद की कुर्सी पर उस्ताद बैठे थे और टिंकू उनके पास खड़ा था, हाथ में पानी का गिलास, और वो गिलास काँप रहा था।

मन ही मन मैंने सोचा, टिंकू, गिलास नीचे रख दे। वरना पानी से ही सब पता चल जाएगा कि हम सब डर रहे हैं।

पीपल की छाया में दो लालटेन जल रही थीं। एक हमारे आँगन की और एक गुमटी की। उनके बीच वो धुंध थी जो ठंडी रातों में गली की नाली से उठती है और जिसमें हर चीज़ थोड़ी बड़ी दिखती है। पीपल के नीचे पत्थर की चबूतरी खाली थी, पर मुझे पता था कि खाली नहीं है। चबूतरी के पीछे, पेड़ की जड़ के पास, तीन छोटी परछाइयाँ दिख रही थीं। सानिया, गुड्डू और चिंटू। वो तीनों वहाँ से सब सुन रहे थे और मुझे यक़ीन था कि रफ़ीक़ पेड़ पर बैठा है, क्योंकि उसकी चप्पल आम दिनों में पेड़ के नीचे नहीं मिलती।

सलीम ने अपनी हथेली थोड़ी ऊँची की।

"ये जीभ," उसने कहा। "मैं आज नहीं दूँगा।"

"क्यों?" मैंने कहा।

"क्योंकि जीभ देने से कुछ नहीं होता," सलीम ने कहा। "जीभ तो पीतल का टुकड़ा है। उसे जोड़ दिया तो घंटी बजने लगेगी। पर घंटी बजने से सच नहीं जुड़ता। पहले दोनों खानदान सच बोलें, फिर ये जीभ अपनी जगह पहुँचेगी।"

"कौन से दो खानदान?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ तेज़ थी और मुझे ये अच्छा लगा। घर में कम से कम एक आवाज़ तो तेज़ रहे।

सलीम ने काजल की तरफ़ देखा। उसने उसे ऊपर से नीचे देखा, जैसे कोई दुकानदार माल देखता है, फिर बोला — "एक यादव। और एक बक्श।"

पीछे से एक आवाज़ आई। शबनम आपा की।

"और मियाँ, तुम किस खानदान से हो?"

सलीम ने पलटकर उन्हें देखा।

"मैं उस खानदान से हूँ," उसने कहा, "जिसने दो खानदानों के बीच में खड़े होकर अपनी ज़िंदगी गँवा दी।"

शबनम आपा ने मुँह बना लिया और धीरे से कहा — "बड़ी फ़िल्मी बातें करते हैं।" पर उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सलीम तक नहीं पहुँची। शबनम आपा तेज़ ज़ुबान वाली हैं, पर वो बेवकूफ़ नहीं हैं। वो जानती हैं कि कब कितनी तेज़ बोलना है।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

वो अपनी कुर्सी पर बैठे थे और उनका चेहरा… मैं क्या कहूँ। आदमी के चेहरे पर अगर सिर्फ़ सफ़ेदी हो और कोई भाव न हो, तो ये दुनिया की सबसे डरावनी चीज़ होती है। उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। उनका हाथ कुर्सी की बाँह पर था और उनकी उँगलियाँ उसे दबा रही थीं।

"कल सुबह दस बजे," सलीम ने कहा और उसकी आवाज़ फिर वैसी ही शांत हो गई, "रज़ा सलीम असली रजिस्टर लेकर आएगा। वो रजिस्टर सलीम अहमद का है और उसमें सिर्फ़ ज़मीन का हिसाब नहीं है। उसमें नाम हैं। तुम्हारे दादा जगदीश यादव का नाम भी है और उस्ताद अली बक्श का नाम भी।"

मेरी जेब में घंटी एक बार और काँपी।

"और उस रजिस्टर के आख़िरी पन्ने पर," सलीम ने कहा और उसकी आवाज़ पहली बार ज़रा भारी हुई, "एक शर्त है। सात अंगूठे। और उन सात में से एक अंगूठा ऐसा है जो आज तक झूठा साबित नहीं हुआ, पर झूठा है भी नहीं। वो अंगूठा मजबूरी का है।"

उसने पापा की तरफ़ देखा।

पापा ने नज़र नीची कर ली।

मुझे लगा मैं कुछ बोलूँ, पर मेरी ज़ुबान ने साथ नहीं दिया। अजीब बात है न। आदमी दिन भर बोलता रहता है, हर बात पर एक जवाब तैयार रखता है, और जिस पल जवाब सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो उसी पल मुँह सूख जाता है। तुम सोच रहे होगे कि इतनी छोटी सी चीज़ से क्या होगा, तो सुन लो — घंटी की एक जीभ, और पूरे घर की ज़ुबान बंद हो गई थी।

"तुम्हें क्या चाहिए?" मैंने आख़िर पूछा। "पैसा? ज़मीन? दुकान? या तुम्हें भी वही चाहिए जो सक्सेना को चाहिए?"

"मुझे कुछ नहीं चाहिए," सलीम ने कहा। "मुझे सिर्फ़ इतना चाहिए कि जो पचास साल से झूठ बोल रहा है, वो एक बार सच बोले। बाक़ी सब अपने आप हो जाएगा।"

"पचास साल से कौन झूठ बोल रहा है?" माँ ने पूछा।

उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने तवा गरम किया हो और उस पर पानी की एक बूँद गिरा दी हो। मैंने सोचा, बस, अब सलीम कुछ बोलेगा। पर सलीम ने जवाब नहीं दिया।

"और ये जीभ तुम्हारे हाथ में कैसे पहुँची?" माँ ने आगे कहा और अब उनकी आवाज़ ज़रा ऊँची हो गई। "ये भी बताओ। टूटी चीज़ किसी के पास रखना भी एक सच है। और तुम अभी इस हथेली को बंद करके खड़े हो, जैसे कोई बच्चा चोरी में पकड़ा गया हो।"

सलीम हँसा।

नहीं, हँसा नहीं। उसके होंठ हिले, इतना ही।

"अच्छा सवाल है," उसने कहा। "सुशीला जी, ये सवाल तुमने बाईस साल पहले क्यों नहीं पूछा?"

"क्योंकि बाईस साल पहले मैं अस्पताल में थी," माँ ने कहा। "मेरी साँस ट्यूब से चल रही थी और मेरे पति फ़ाइल लिए किसी के दफ़्तर में खड़े थे। तब पूछने वाला कोई नहीं था। अब तुम्हारे सामने खड़ा है।"

सलीम ने एक पल के लिए माँ को देखा।

और उस एक पल में, मुझे यक़ीन हुआ कि ये आदमी खलनायक नहीं है। ये आदमी वो है जिसे भी किसी ने बाईस साल पहले रोका था और जो अब बोलने निकला है। वो मुस्कुराया, फिर सिर हिलाया, जैसे कोई अपने मन ही मन कोई हिसाब पूरा कर रहा हो।

"मैं आज कुछ और नहीं बोलूँगा," उसने कहा। "सुबह सब पता चलेगा। तुम्हारे बेटे को सुबह दस बजे पीपल के नीचे आना है। और हाँ, अकेले नहीं। ये गली है, इसमें अकेले कहानी नहीं बनती। सबको लेकर आना।"

वो मुड़ा।

उसके सफ़ेद जूतों ने गली की मिट्टी पर वो आवाज़ की जो धीमी होती है, जैसे कोई तेज़ चलने की कोशिश में रुक-रुककर चल रहा हो। मैंने उसे जाते देखा। उसका कुर्ता सफ़ेद था और उस पुरानी गली में सफ़ेद रंग उतना ही अलग लगता है जितना बारिश के दिन किसी छत पर सूखी जगह।

वो गली के मोड़ से मुड़ा और अंधेरे में मिल गया।

काजल ने साँस छोड़ी, इतनी ज़ोर से कि लगा लालटेन बुझ जाएगी।

"ये आदमी पागल है," उसने कहा।

"नहीं," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ पहली बार आई, और वो इतनी धीमी थी कि लगा किसी ने दूर से बोला हो। "ये पागल नहीं है। ये वही है जो पहले भी था।"

और तभी उस्ताद अली बक्श गली की दूसरी तरफ़ से आते दिखे।

वो कुर्सी से उठकर आ रहे थे — वो कुर्सी जिस पर वो अब तक बैठे थे। उनकी चाल धीमी थी। उनका मोटा चश्मा था और कान पर पेंसिल। और जब उन्होंने सलीम को मुड़ते देखा तो वो रुक गए।

रुके। और फिर मुड़कर मेरी तरफ़ आए।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"उस्ताद?"

"आज रात जो दरवाज़ा खुला," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे कान झुकाना पड़ा, "उसका सच अब पूरी गली को सुनना पड़ेगा।"

"उस्ताद, मैं समझा नहीं।"

"छुपाया हुआ सच भी एक दिन घर के बाहर आता है," उन्होंने कहा। "जिस दिन चाबी मिल जाए, उस दिन दरवाज़ा रोका नहीं जाता। तूने आज एक दरवाज़ा खोला है। अब उस दरवाज़े के अंदर जो भी है, अकेले तेरा नहीं है। पूरी गली का है।"

मैंने उनके चेहरे को देखा। उनकी सफ़ेद दाढ़ी थी और उनके होंठों पर वो आदतन चुप्पी थी जो उनके चेहरे पर पचास साल से जमी थी, जैसे दीवार पर पुराना पलस्तर।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आप सलीम को जानते हैं?"

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

"उस्ताद, मैंने पूछा—"

"चाय रखवा," उन्होंने कहा और मेरी बात काट दी।

तभी माँ ने कुर्सी की तरफ़ मुड़कर देखा, फिर मेरी तरफ़।

"उस्ताद जी," माँ ने कहा, "चाय पिएँगे? रात भर कब तक खड़े रहेंगे? काजल, चूल्हा जलाओ। और उसमें अदरक डालना, बाहर की हवा ठंडी है।"

माँ का ये तरीक़ा मुझे हमेशा से पसंद है। जब सब डर रहे होते हैं, तो उन्हें चाय की पड़ जाती है। पता नहीं ये बहादुरी है या आदत। शायद दोनों।

उस्ताद ने मुस्कुराने की कोशिश की।

"चाय रखो, बहू," उन्होंने कहा। "और तेरे बेटे को दो मिनट मेरे साथ अकेले बिठा दे।"

माँ ने उनकी तरफ़ गौर से देखा। फिर मेरी तरफ़।

"जाओ," उन्होंने कहा। "पर अंकुश, सुन ले। अगर उस्ताद आज कुछ बोलते हैं तो वो सच होगा। और सच सुनने से पहले एक बार घर की छत देख लेना।"

"छत क्यों, माँ?"

"क्योंकि कभी-कभी आदमी को ऊपर की तरफ़ देखते हुए कोई बात सुनना अच्छा लगता है," उन्होंने कहा। "नीचे देखते हुए सच बहुत भारी लगता है।"

मैं हँसा। मुझे खुद हैरानी हुई कि मैं हँस सका। उस वक़्त मेरे घर के पीछे वाला सबसे पुराना दरवाज़ा खुला था, अंदर के कमरे में लकड़ी का संदूक था जिसे मैंने अभी खोला भी नहीं था, और मेरी जेब में एक बोलती हुई घंटी थी। और मैं हँस रहा था। पता नहीं ये क्या था। शायद माँ की आवाज़ का असर।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

वो गरम थी। इतनी गरम कि मुझे लगा उसे फेंक दूँ या पानी में डाल दूँ। उसका पीतल मेरे हाथ में जैसे लोहे की रेत से भरा हुआ लगा, हल्का-सा काँपता, जैसे अंदर कोई चीज़ बाहर आने की कोशिश कर रही हो।

"बोल," मैंने धीरे से कहा। "क्या है?"

और तंत्र ने कहा, अपनी उसी पुरानी रूखी आवाज़ में —

"अंक एक सौ अठ्ठावन। नए जोड़ बंद। दरवाज़ा फिर से बंद कर दो।"

"क्यों?" मैंने पूछा। "अभी तो खुला है।"

"आज रात और मेहमान बाक़ी हैं," घंटी ने कहा। "घर खुला छोड़ेगा तो कोई ऐसा घुस जाएगा जिसे बाहर ही रुकना चाहिए था।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मैंने काजल की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।

"बंद कर दे," काजल ने कहा। "मैं अंदर रहकर सब देख लूँगी।"

"तू अकेली?"

"मैं अकेली नहीं हूँ," काजल ने कहा और लालटेन उठा ली। "दादा की तस्वीर अंदर है न। और अब माँ भी सामने हैं। अकेले कौन है भाई?"

मैंने कुंडे की तरफ़ हाथ बढ़ाया…

और तभी उस्ताद ने कहा। मुझे नहीं पता कि वो कैसे कहा। शायद मेरी तरफ़ देखकर। शायद कुंडे की तरफ़ देखकर। शायद दरवाज़े के अंदर उस अंधेरे की तरफ़ देखकर जहाँ अभी भी लकड़ी का संदूक और टूटे काँच वाली वो तस्वीर पड़ी थी।

"वो जीभ," उस्ताद ने कहा।

वो रुके। गला साफ़ किया। उनकी सफ़ेद दाढ़ी काँपी।

"वो जीभ मैंने खुद अपने हाथ से तोड़ी थी, अंकुश।"

मैंने रुककर उनकी तरफ़ देखा।

वो अपनी कुर्सी की तरफ़ बढ़े और उसमें जैसे धँस गए। उनका हाथ कुर्सी की बाँह पर था और उनका चश्मा उनकी नाक पर सरक आया। उन्होंने उसे ठीक करने की कोशिश भी नहीं की। टिंकू ने पानी का गिलास उनकी तरफ़ बढ़ाया, पर उस्ताद ने हाथ से इस तरह हटा दिया जैसे वो गिलास नहीं, कोई सवाल हो।

"और आज तक किसी को नहीं बताया।"

॥

उस्ताद ने अपना गला साफ़ किया। उनके हाथ कुर्सी की बाँह पर इस तरह टिके थे जैसे किसी बहुत पुरानी दीवार से सहारा ले रहे हों, जो अब गिरने ही वाली हो।

"ये कब हुआ, उस्ताद?" काजल ने पूछा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर वो काँप नहीं रही थी। "आप बताइए, कब हुआ था ये?"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उनकी आँखें बिना चश्मे के बहुत छोटी और बहुत थकी लग रही थीं, जैसे बहुत दूर से आ रही हों।

"पचास साल पहले," उन्होंने कहा। "ये कोई कल की बात नहीं है, बेटी। ये तब हुई थी जब मेरे हाथ अभी मज़बूत थे और मेरी सोच कमज़ोर थी।"

"पर आपने क्यों तोड़ी?" मैंने पूछा। "वो घंटी आपकी थी? वो आपके खानदान की थी?"

उस्ताद ने नहीं कहा कुछ। बस अपने चश्मे को उँगलियों के बीच घुमाते रहे, एक गोल घेरा बनाते हुए, फिर से बनाते हुए, जैसे उस घेरे में कोई जवाब छिपा हो और वो उसे ढूँढ रहे हों।

माँ आगे आईं। उन्होंने मेरे कंधे पर हल्का हाथ रखा। हल्का, पर ऐसा कि मैं टस से मस नहीं हुआ।

"उस्ताद जी," माँ ने कहा, "अभी रात है। चाय पी लीजिए। सुबह रज़ा सलीम रजिस्टर लेकर आएगा। तब सब खुलेगा। आप अभी क्यों अपना दर्द बाँट रहे हैं?"

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा। फिर कुरसी से उठकर खड़े हुए।

"क्योंकि बहू," उन्होंने कहा, "सुबह जब वो रजिस्टर खुलेगा तो मुझे उसमें अपना नाम भी देखना है। और अपने भाई का नाम भी। और उसके साथ-साथ मुझे ये भी पता होना चाहिए कि उस रजिस्टर में मेरी गलती कहाँ लिखी है।"

वो सीधे बाहर चले गए। उनकी पीठ अब भी झुकी हुई थी, पर कदम अब बूढ़े आदमी के कदम नहीं लग रहे थे। कदम उस आदमी के थे जो बहुत साल बाद एक लंबी यात्रा पर निकल रहा हो।

काजल लालटेन लेकर कमरे के अंदर गई। मैंने कुंडे को पकड़ा और दरवाज़ा बंद कर दिया। ताले ने वो पुरानी, बेडौल आवाज़ की — कट, कट, कट। फिर चाबी घूमी और आवाज़ बंद हो गई।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा।

"छत पर जा," उन्होंने कहा। "मैंने कहा था न? सच सुनने से पहले ऊपर देख लेना।"

"अब?"

"अभी। सुबह तक जो सोचना है, सोच ले। सुबह का सूरज सच नहीं सुनता, अंकुश। सुबह का सूरज सिर्फ़ काम देखता है।"

मैं सीढ़ी से चढ़कर घर की छत पर आया। रात की हवा ठंडी थी। नीचे गली में पीपल का पेड़ अंधेरे में किसी बड़े आदमी की तरह खड़ा था। दूर गुमटी पर शबनम आपा की लालटेन जल रही थी। दूर उस्ताद की दुकान की खिड़की में भी रोशनी थी।

मैंने जेब से घंटी निकाली। वो ठंडी हो चुकी थी।

"सुन," मैंने कहा। "अगर उस्ताद ने उसे तोड़ा था, तो सलीम के पास जीभ कैसे पहुँची?"

कोई जवाब नहीं आया।

"मैं तुझसे पूछ रहा हूँ।"

"आज रात सवाल मत पूछ," घंटी ने कहा। "आज रात सिर्फ़ सुन।"

"क्या सुनूँ?"

"ऊपर देख।"

मैंने सिर उठाकर देखा। आसमान में बादल थे, पर एक-एक करके बीच से हट रहे थे, जैसे कोई हाथ उन्हें खिसका रहा हो। उनके बीच से तारे दिख रहे थे — न ज़्यादा, न कम, बस इतने कि मैं गिन न सकूँ।

मैं देर तक बैठा रहा। नीचे गली में कभी कोई कुत्ता भौंकता, कभी कोई दरवाज़ा खड़कता, कभी किसी की खाँसी आती। फिर सब चुप हो गया। मैं भी चुप हो गया।

सुबह का सूरज धीरे-धीरे आया। पहले उसने गुमटी की टीन की छत को छुआ, फिर पीपल के पत्तों को, फिर मेरी आँखों को।

मैं उठा और नीचे आया। माँ चूल्हे पर थीं। काजल बाल बाँध रही थी। पापा चौखट पर बैठे चाय का गिलास पकड़े थे।

"पी ले," पापा ने कहा। बस इतना।

मैंने गिलास लिया और एक ही साँस में पी गया। कुछ नहीं बोला। पापा भी कुछ नहीं बोले। इन दो दिनों में हम दोनों की बातचीत इसी तरह चल रही थी — कुछ शब्द, कुछ ख़ामोशी, कुछ गिलास।

सुबह नौ बजे मैंने दुकान खोली। दीवार पर पीला नोटिस अब भी लगा था। दस दिन में लाइसेंस, रजिस्ट्री और हिसाब साफ़ न होने पर ताले की बात उस पर लिखी थी। मैंने उसे नहीं छेड़ा। अब वो मुझे डराता नहीं था।

टिंकू दौड़ता हुआ आया।

"उस्ताद! उस्ताद!"

"क्या है? स्कूल से छुट्टी मिल गई?"

"उस्ताद, रज़ा सलीम आ रहा है! मैंने देखा! वो गली के मुँह से चला, हाथ में कपड़े में लिपटा मोटा बंडल है, और उसके हाथ इस तरह काँप रहे हैं जैसे बुख़ार में हों!"

मैंने हाथ पोंछा। रिंच ट्रंक पर रखी। और मैं सीधे पीपल की तरफ़ चला।

चबूतरी पर अभी दो ही लोग थे। एक दुबे अंकल, जो नीली शर्ट में कुर्सी पर बैठे थे और जिनके हाथ में वो पुरानी मुड़ी कॉपी थी। दूसरे उस्ताद अली बक्श — जो अभी आए थे और अपनी पीठ सीधी करके बैठे थे, आज उन्होंने कमर नहीं झुकाई थी।

माँ आईं। काजल आई। शबनम आपा गुमटी से एक बड़ी पीतल की थाली में कुछ लेकर आई और चबूतरी के किनारे रख दिया — छह गिलास और एक तांबे का घड़ा।

"पानी है या चाय?" दुबे अंकल ने पूछा।

"पानी," शबनम आपा ने कहा। "चाय बाद में। पहले काग़ज़, फिर चाय।"

मीरा अपने कैमरे के साथ आई। उसने तिपाई फैलाई, कैमरा उस पर रखा, और फिर मेरी तरफ़ देखा।

"तू क्या सोच रही है?" मैंने पूछा।

"ये सोच रही हूँ कि अगर रज़ा सलीम सच में असली रजिस्टर लाता है तो इसे मैं पूरा रिकॉर्ड करूँगी। और अगर वो नक़ली लाता है…" वो रुकी। "…तो वो भी।"

"क्यों?"

"क्योंकि झूठ भी सबूत होता है, अंकुश," उसने कहा। "अब ये बात मैं पाँच साल पहले नहीं जानती थी।"

सवा दस बजे रज़ा सलीम आया।

वो आते ही दिख गया। कपड़े में लिपटा मोटा बंडल उसके दोनों हाथों में था, और वो बंडल इतना मोटा था कि उसे दोनों हाथ फैलाकर पकड़ना पड़ रहा था। उसके कदम धीमे थे। आँखें लाल थीं। माथे पर पसीना नहीं था, पर चेहरे पर वो ख़ालीपन था जो बहुत देर से सोचते रहने के बाद आता है।

वो चबूतरी के सामने रुका। सामने रख दिया। बंडल ज़मीन पर रखते वक़्त मैंने देखा कि उसके काँपते हाथ थे।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"सलीम साहब ने भेजा है," उसने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी। "कहा है कि तीन आदमी इसे खोलें। रज़ा सलीम, अंकुश, और उस्ताद अली बक्श।"

"सलीम खुद क्यों नहीं आया?"

रज़ा सलीम ने कुछ नहीं कहा। उसने सिर्फ़ ज़मीन की तरफ़ देखा, जैसे जवाब वहाँ लिखा हो।

"मैंने पूछा," मैंने कहा, "वो खुद क्यों नहीं आया?"

"वो नहीं आए," रज़ा सलीम ने कहा। "बस ये भेजा है। कहा है कि जो लिखा है, वो सबके सामने पढ़ा जाए। और जो नहीं लिखा, वो मुझसे मत पूछिए।"

उस्ताद आगे बढ़े। उन्होंने अपना हाथ बंडल पर रखा। उनकी उँगलियाँ उस कपड़े के ऊपर से फिसलीं, जैसे वो कपड़े को ही सुन रहे हों।

"कौन सा कपड़ा है ये?" उस्ताद ने पूछा।

"मुझे नहीं पता," रज़ा सलीम ने कहा।

उस्ताद ने कपड़े की गाँठ खोली। उनकी उँगलियाँ धीमी थीं, पर रुकी हुई नहीं। गाँठ खुली, कपड़ा खिसका, और नीचे वो रजिस्टर आया।

लाल जिल्द। किनारे उखड़े हुए। कोने पीले पड़े। ऊपर की तरफ़ एक छोटी सी चीज़ चिपकी थी, जो अब सिर्फ़ एक भूरे रंग की शक्ल बन गई थी।

"इसे मैं खोलूँगा," रज़ा सलीम ने कहा। "ये मेरी ज़िम्मेदारी है।"

"नहीं," उस्ताद ने कहा। "तीन आदमी खोलेंगे। ये सलीम ने कहा है। तो तीन आदमी खोलेंगे। साथ में।"

मैंने हाथ बढ़ाया। मेरी उँगली रजिस्टर के किनारे पर रखी। रज़ा सलीम की उँगली दूसरे किनारे पर। उस्ताद की उँगली ऊपर वाले किनारे पर।

"एक, दो, तीन," उस्ताद ने कहा।

हम तीनों ने उसे खोला।

पहला पन्ना। पीला, मुड़ा हुआ, ऊपर एक तारीख़ लिखी थी। दूसरा पन्ना। नामों की लंबी फेहरिस्त, नीली स्याही में, कुछ जगहों पर मिटी हुई। तीसरा पन्ना। छोटा, कोरे जैसा, बस एक लाइन — "यह रजिस्टर सलीम अहमद के हाथ का है।"

उस्ताद ने पन्ने पलटने शुरू किए। उनकी उँगलियाँ पहले के पन्नों पर धीरे चलीं, फिर तेज़, फिर और तेज़, जैसे अब उन्हें कोई ख़ास चीज़ ढूँढनी हो।

और फिर वो रुके।

मैंने उनके चेहरे को देखा। मैंने उनकी आँखों को देखा। बहुत देर तक वो उस पन्ने को इस तरह देखते रहे जैसे कोई पुराना डर सामने खड़ा हो और उन्हें देख रहा हो।

"क्या है, उस्ताद?" मीरा ने पूछा। उसका कैमरा पहले से चल रहा था।

उस्ताद कुछ नहीं बोले। बस एक उँगली बढ़ाई और उस पन्ने पर रख दी।

मैंने झुककर देखा।

उस पन्ने के ऊपर, दाईं तरफ़, एक नामों की लिस्ट थी। सब नाम एक-दूसरे के नीचे लिखे थे, हर नाम के आगे रकम, हर नाम के आगे कोई चीज़। पर बीच में, एक जगह, ऐसी जगह जहाँ नाम होना चाहिए था, वहाँ काग़ज़ कटा हुआ था। सीधा, साफ़ कटा हुआ। और उस कटी जगह पर बिल्कुल दूसरा पन्ना सिलाई से जोड़ दिया गया था।

सिलाई।

धागा।

उस जगह को इस तरह जोड़ा गया था जैसे कोई कपड़ा फट गया हो और उसे सी दिया गया हो। किनारे छोटे-छोटे टाँके। टाँके एक जैसे नहीं — कुछ बड़े, कुछ छोटे। कहीं धागा दो बार गया है, कहीं तीन बार।

खून मेरे सिर की तरफ़ दौड़ गया।

मैंने रज़ा सलीम का गिरेबान पकड़ लिया।

"ये क्या है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "ये क्या है, रज़ा सलीम? तुम क्या लाए हो मेरे पास? असली रजिस्टर लाने को कहा था। और तुम ये लाए हो? ये क्या है?"

"अंकुश!" उस्ताद की आवाज़। सख़्त।

मेरा हाथ ढीला नहीं हुआ। मेरा हाथ और कसने लगा।

"ये रजिस्टर सलीम अहमद के हाथ का है," मैंने कहा। "वो बोल रहा था कि आज सच खुलेगा। और तुमने ये लाकर रख दिया है? तुम सब मिले हुए हो? सब एक ही खेल है?"

"अंकुश!" माँ की आवाज़। कड़क।

मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैंने रज़ा सलीम का गिरेबान पकड़े ही रखा। उसने कोई कोशिश नहीं की छुड़ाने की। वो बस वैसे ही खड़ा रहा, मेरे हाथ में, खुली गर्दन, नीची नज़र।

"छोड़ उसे," उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पहली बार सुनाई दी — जैसे कोई हुक्म। "बेटा, छोड़। वो इसका आदमी नहीं है। वो बस पहुँचाने वाला है।"

मैंने अपने हाथ हैरानी से देखे। वो काँप रहे थे। उस पल मुझे समझ नहीं आया कि मैंने क्या किया। मैंने रज़ा सलीम को छोड़ा।

उसने अपनी गर्दन सहलाई, फिर खाँसा, फिर अपने कपड़े ठीक किए। उसने कुछ नहीं कहा। कोई शिकायत नहीं। बस खड़ा रहा, और उसकी आँखों में वो सामान था जिसे मैं पहचान नहीं पाया — डर नहीं, शर्म नहीं — कुछ और।

उस्ताद ने वो पन्ना गौर से देखा।

उन्होंने झुका हुआ चश्मा पहना, फिर हटाया, फिर फिर पहना। फिर उन्होंने चश्मा उतारकर अलग रख दिया और बिना चश्मे के वो पन्ना देखने लगे, जैसे बिना चश्मे के वो उसे और अच्छे से देख पा रहे हों।

उन्होंने उँगली सिलाई पर फेर दी।

धीरे। बहुत धीरे। जैसे घाव पर नहीं, दर्द पर।

मैंने अपनी आँखें उनके चेहरे से नहीं हटाईं।

वो कुछ नहीं बोले। बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।

दुबे अंकल ने अपनी कुर्सी पर थोड़ा सा हिलकर अपना वज़न बदला। शबनम आपा ने अपनी पीतल की थाली को थोड़ा सा और आगे खिसका दिया। मीरा के कैमरे की लाल बत्ती बिना रुक जल रही थी।

"उस्ताद जी," माँ ने धीरे से कहा। "कुछ बोलिए।"

उस्ताद ने अपनी उँगली सिलाई से हटाई।

"ये सिलाई मेरे हाथ की नहीं है," उन्होंने कहा।

फिर वो सीधे खड़े हुए। उन्होंने रजिस्टर उठाया, उसे रोशनी की तरफ़ किया — यानी डगमगाती सुबह की रोशनी की तरफ़, जो पीपल की पत्तियों से छनकर आ रही थी।

"पर ये सिलाई," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी, "मेरी मशीन की है।"

मैं खड़ा था और मुझे लगा जैसे ज़मीन मेरे पैरों के नीचे कुछ सेंटीमीटर धँस गई हो।

"क्या मतलब है, उस्ताद?" मैंने पूछा।

"मतलब ये है कि सिलाई किसी और ने की, पर उसने उस मशीन पर की जो मेरी है," उस्ताद ने कहा। "मेरी सिलाई मशीन पर। मेरी दुकान में। मेरी मर्ज़ी के बिना या… या शायद मेरी मर्ज़ी से?"

आख़िरी शब्द उन्होंने ऐसे कहा जैसे ख़ुद से पूछ रहे हों।

"उस्ताद," माँ ने कहा, "आप पर शक़ नहीं कर रहा कोई।"

"मैं कर रहा हूँ, बहू," उस्ताद ने कहा। उन्होंने गर्दन उठाई और सीधे माँ की आँखों में देखा। "मैं ख़ुद अपने पर शक़ कर रहा हूँ। पचास साल से ये सिलाई मेरे सामने थी, इस रजिस्टर में, इस शहर में। और मुझे पता नहीं था?"

"आपको कैसे पता होता?" रज़ा सलीम ने कहा। उसकी आवाज़ अब पहले से कुछ साफ़ थी। "ये रजिस्टर सलीम साहब के पास था। किसी और के पास नहीं।"

"तो सलीम के पास ये सिलाई देखने के बाद भी सवाल नहीं उठा?" उस्ताद ने पूछा। "उसने मुझसे कभी नहीं कहा?"

"वो मुझे नहीं बताते," रज़ा सलीम ने कहा। "मैं सिर्फ़ उनका मुंशी हूँ।"

मैंने अपने आप को सँभाला। मैंने फिर से उस पन्ने पर नज़र डाली। कटी हुई जगह। सिली हुई जगह। एक अलग पन्ना, जो शायद किसी और रजिस्टर से निकाला गया था, जिस पर किसी और का हिसाब लिखा होगा, और इसे यहाँ सीकर अंदर कर दिया गया।

"यहाँ दादा का नाम होना चाहिए था," मैंने कहा। "जगदीश यादव। सात अंगूठों वाली शर्त।"

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "यहाँ। बिल्कुल यहाँ। मुझे याद है। जब ये रजिस्टर भरा जा रहा था, मैं इस मेज़ के पास ही खड़ा था। मैंने अपनी आँखों से देखा था ये नाम लिखते हुए।"

"तो अब क्या है यहाँ?" मीरा ने पूछा। उसने अपना कैमरा आगे किया।

"अब यहाँ किसी और का हिसाब है," उस्ताद ने कहा। "किसी और दुकान का। कोई और नाम।"

"किसका?" मैंने पूछा।

"पता नहीं," उस्ताद ने कहा। "ये नाम मैंने नहीं देखा। ये शायद बाद में जोड़ा गया।"

मैंने रज़ा सलीम की तरफ़ देखा।

"सलीम अहमद ने ये क्यों नहीं कहा?" मैंने पूछा। "वो जानता है? वो जानता है कि उसके रजिस्टर में पन्ना कटा हुआ है?"

"मुझे नहीं पता," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने आपको पहले ही बताया — मैं सिर्फ़ पहुँचाने वाला हूँ।"

"तुम्हारे हाथ क्यों काँप रहे हैं, रज़ा सलीम?" दुबे अंकल ने पूछा। उन्होंने पहली बार बोला था। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वर्दी वाली जाँच थी।

रज़ा सलीम ने कुछ नहीं कहा।

"ये बंडल तुम लाए," दुबे अंकल ने कहा। "ये तुमने खोला? तुमने इसके अंदर देखा?"

"नहीं," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने बंद रखा। जैसे दिया था, वैसे ही लाया।"

"तो हाथ क्यों काँप रहे हैं?"

रज़ा सलीम ने अपने हाथ ऊपर उठाए। उन्हें देखा। फिर धीरे से नीचे किए।

"क्योंकि सलीम साहब ने ये देते वक़्त कहा था — ये इसे ले जाओ और जो सामने आए, उसी को दिखाओ। और मुझसे कहा कि मैं वहाँ नहीं रुकूँगा। मैं अंदर जाऊँगा, बंद दरवाज़ा खोलूँगा और भीतर बैठूँगा।"

"कहाँ?"

"मैं नहीं जानता," रज़ा सलीम ने कहा। "वो सिर्फ़ इतना कहे कि पाँच बजे तक कोई उनसे न मिले। अगर कोई मिलने आए तो बोल दूँ कि वो बैठक में हैं, मिल नहीं सकते। और मुझे ये भी कहा कि जब मैं वापस पहुँचूँ तो दरवाज़ा खटखटाऊँ, और अंदर से जवाब आए तभी अंदर जाऊँ।"

मैं चुप हो गया।

कुछ देर तक किसी ने कुछ नहीं कहा। पीपल के पत्ते हल्की हवा में हिल रहे थे। दूर किसी ने रेडियो चालू किया होगा — कोई पुराना गाना आ रहा था, धीमी आवाज़ में। स्कूल के बच्चों की आवाज़ आ रही थी, जो हर सुबह की तरह आती थी।

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।

वो पहले से गरम नहीं थी, पर बाहर आते ही फिर गरम हो गई।

"बोल," मैंने धीरे से कहा। "कुछ तो बता। कटा हुआ पन्ना कहाँ है?"

घंटी बजी।

एक बार। फिर एक बार। जैसे कोई बहुत धीरे, बहुत अंदर से हमारी तरफ़ आ रहा हो।

"जो काटा जाता है," घंटी ने कहा, "वो फेंका नहीं जाता।"

मैंने इंतज़ार किया।

"क्योंकि फेंकी हुई चीज़ कोई उठा सकता है।"

मैंने फिर इंतज़ार किया।

"छुपाई हुई चीज़ को कोई ढूँढ नहीं सकता।"

घंटी बंद हो गई।

मैंने घंटी को जेब में रखा और आगे बढ़कर रजिस्टर को फिर से देखा। सिलाई। किनारे। टाँके। और उस सिलाई के ऊपर नीचे, कहीं कोई निशान?

मैंने उँगली उन टाँकों पर फेरी। बड़े-छोटे टाँके। फर्क साफ़ था।

"उस्ताद," मैंने कहा। "अगर ये सिलाई आपकी मशीन की है, तो ये धागा किसका है? ये धागा आपकी दुकान का धागा है?"

उस्ताद कुछ पल चुप रहे। फिर वो झुके और उन्होंने भी अपनी उँगली सिलाई पर फेरी।

"ये धागा," उन्होंने कहा, "मेरी दुकान का नहीं है।"

"तो किसका है?"

उन्होंने धागे को उँगली और अँगूठे के बीच पकड़ा। हल्का खींचा। फिर गौर से देखा।

"ये रेशमी धागा है," उन्होंने कहा। "शायद किसी पुराने सफ़ेद कपड़े में बचा हुआ। पुराना है। बहुत पुराना। इतना पुराना कि इसकी चमक खत्म हो चुकी है।"

"किसी के कफ़न का धागा," शबनम आपा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी और उसमें कोई कड़वी सी बात भी।

किसी ने कुछ नहीं कहा। पर उस शब्द ने हवा में एक अजीब सा ठहराव डाल दिया।

"मुझे मशीन पर देखना है," उस्ताद ने कहा। "मेरे घर चलो। मेरी दुकान चलो। मेरी मशीन। अगर उस मशीन पर ये पन्ना सिला गया है, तो वहाँ कुछ न कुछ ज़रूर बचा होगा। कोई निशान। कोई धागा। कोई सुई।"

मैंने रज़ा सलीम की तरफ़ देखा। वो अभी भी वहीं खड़ा था, हाथ झुके हुए, आँखें नीची।

"तू चल रहा है?" मैंने पूछा।

"मैंने ये रजिस्टर पहुँचा दिया," उसने कहा। "मैं अपने काम पर जा रहा हूँ।"

"तेरे पास अभी भी सवाल हैं," मैंने कहा। "और तू उन्हें कहीं और ले जा रहा है?"

"मेरे पास कोई सवाल नहीं है," रज़ा सलीम ने कहा। "मैंने अपना काम कर दिया।"

"झूठ," मैंने कहा।

मैंने बहुत तेज़ कहा। मैंने बिना सोचे कहा। पर कहते ही मुझे पता चल गया कि मैं सही कह रहा हूँ।

रज़ा सलीम ने सिर उठाया।

"मेरे पास सवाल हैं," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब पहले से काँप रही थी, इस बार साफ़ काँप रही थी। "ढेर सारे सवाल। पर उनका जवाब आपके पास नहीं है।"

"तो किसके पास है?"

"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "वरना मैं बहुत पहले पूछ लेता।"

वो मुड़ा और चला गया।

मैंने उसे जाने दिया। मैंने सोचा, आज वो जा रहा है, कल वो आएगा। या परसों। जो आदमी सवाल लेकर चलता है, वो लौटता ज़रूर है।

मैंने रजिस्टर उठाया।

"उस्ताद," मैंने कहा। "आपकी दुकान चलते हैं।"

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"मीरा," मैंने कहा, "कैमरा साथ ले। पर अंदर जाने से पहले एक बात सुन ले। जो चीज़ अंदर मिलेगी, वो सिर्फ़ आपकी होगी, आपके कैमरे की, आपके चैनल की। पर उसे बाहर निकालने से पहले मुझसे एक बात पूछ लेना।"

"कौन सी बात?"

"कि उसे बाहर निकालने से किसी का नुक़सान तो नहीं होगा।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने कैमरा बंद किया। फिर उसे अपने बैग में रखा।

"ठीक है," उसने कहा।

"अच्छा," माँ ने कहा। "तो चलो। उस्ताद, आप आगे। अंकुश, तू उस्ताद के पीछे। मैं कुर्सी पर पीछे आ रही हूँ। काजल, तू मेरे साथ। फ़ालतू कोई नहीं आएगा।"

"मैं क्यों नहीं आऊँगी?" शबनम आपा ने कहा। "मुझे देखना है।"

"आप आइए," माँ ने कहा। "आपको मैं नहीं रोकूँगी। आपकी गुमटी की मेज़ अब भी मेरी याद है।"

शबनम आपा हँसी। उस हँसी में बहुत सी पुरानी बातें थीं।

हम उस्ताद की दुकान की तरफ़ चले। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे रहे। उन्होंने कहा, "मैं यहीं रहूँगा। जब लौटो, यहीं से गुज़रना। मुझे भी जानना है।"

हम चले। टिंकू पीछे-पीछे आ रहा था। मैंने मुड़कर देखा। सानिया, गुड्डू, चिंटू, रफ़ीक़ — सब पीछे थे। मैंने उन्हें रोका नहीं। कुछ चीज़ें बच्चों के सामने ही होनी चाहिए, ताकि वो बड़े होकर उन्हें सही तरीक़े से याद रख सकें।

उस्ताद की दुकान पीपल के पूरब वाली गली में थी। दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा था। उस्ताद गए, और उन्होंने अंदर का बल्ब जलाया।

पीली रोशनी में सिलाई मशीन सामने खड़ी थी।

वो वैसी ही थी जैसी मैंने पहले देखी थी। पुरानी, मज़बूत, काली लोहे की, सिलेंडर के आकार की। उसके नीचे धूल थी। पर आज उस पर एक अलग सी चमक थी — जैसे उसे किसी ने कल ही छुआ हो।

उस्ताद उसकी तरफ़ बढ़े।

उन्होंने अपना हाथ मशीन पर रखा। फिर उन्होंने वो धातु वाला छोटा ढक्कन उठाया जिसके नीचे सुई लगती है और धागा रखा जाता है। उन्होंने ढक्कन उठाया, और उनकी उँगलियाँ अंदर गईं।

एक पल।

दो पल।

वो रुके।

फिर उन्होंने अपना हाथ बाहर निकाला।

उनकी उँगलियों में एक छोटा सा काग़ज़ का टुकड़ा था — पीला, मुड़ा हुआ, किनारे से फटा हुआ।

उन्होंने उसे खोला।

उस पर कुछ लिखा था। उन्होंने उसे रोशनी की तरफ़ किया।

मीरा ने बिना कहे अपना कैमरा फिर से निकाला। पर इस बार उसने उसे चालू नहीं किया, बस हाथ में पकड़े रखा।

"क्या है, उस्ताद?" मैंने पूछा।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।

मैंने उसे पकड़ा।

उस पर दो लाइनें थीं, छोटी-छोटी, झुकी हुई लिखाई में। पहली लाइन के ऊपर के कोने में एक छोटा सा निशान था, जो जैसे किसी अंगूठे के आधे हिस्से का हो।

पहली लाइन पढ़ी — "पन्ना काटो, पर नाम मिटे नहीं।"

दूसरी लाइन — "मशीन पर सिलो, पर हाथ मेरा मत दिखाओ।"

मैंने काग़ज़ पढ़कर उस्ताद की तरफ़ देखा।

वो सिलाई मशीन के पास खड़े थे। उनका हाथ अब भी उस पर था।

"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा। "ये लिखाई किसकी है?"

उस्ताद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

फिर उन्होंने अपना हाथ मशीन से हटाया। उन्होंने अपना चश्मा फिर पहना। और वो मेरी तरफ़ मुड़े, और उनकी आँखों में वो सामान था जो मैंने आज तक उनकी आँखों में नहीं देखा था — कुछ हद तक डर, कुछ हद तक शर्म, कुछ हद तक वो चीज़ जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होती है, जिसने बहुत साल पहले कोई ऐसी गलती की हो जिसे वो भूल न सका हो।

"ये लिखाई," उन्होंने कहा, "मेरे भाई की है।"

मैंने साँस रोक ली।

"इलियास की?"

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"पर…"

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "इलियास ने ये पन्ना काटा। इलियास ने सिला। और इलियास ने ये काग़ज़ मेरी मशीन के अंदर छिपाया।"

"पर क्यों? क्यों छिपाया?"

उस्ताद कुछ देर खामोश रहे। फिर उन्होंने सिलाई मशीन की तरफ़ देखा, जैसे वो उनसे कुछ कह रही हो।

"क्योंकि," उन्होंने कहा, "वो चाहता था कि जिस दिन कोई इस मशीन को खोले, उसे सच मिले। पर उसने ये भी सोचा कि उस दिन तक मैं ज़िंदा रहूँ, तो मैं खुद सच बताऊँ।"

मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।

वो पहले से ठंडी हो चुकी थी।

मैंने उसे हथेली में रखा और धीरे से बजाया।

घंटी ने कहा —

"अब तू वो जगह पहुँच गया है जहाँ से आगे सिर्फ़ आदमी जा सकता है, हथियार नहीं।"

मैंने घंटी को जेब में रखा। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने अभी पीपल के नीचे कहा था कि ये सिलाई आपकी मशीन की है पर आपके हाथ की नहीं। पर आपने ये नहीं बताया कि ये आपके भाई के हाथ की है।"

उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा।

"मैंने कहा था न," उन्होंने कहा, "मैं खुद अपने पर शक़ कर रहा हूँ। अब करना बंद कर दिया।"

"और अब?"

"अब मुझे इलियास के पास जाना है," उस्ताद ने कहा। "उससे सीधे पूछना है कि उसने ये क्यों किया। और फिर जो जवाब मिले, उसे लेकर मुझे अस्पताल जाना है।"

"अस्पताल क्यों?"

"क्योंकि सलीम के पास घंटी की जीभ है," उस्ताद ने कहा। "अगर जीभ सलीम के पास है, तो इसका मतलब है कि एक वक़्त ऐसा था जब इलियास और सलीम ने साथ कुछ किया। और वो कुछ ऐसा था जिसके बारे में मुझे आज तक कुछ नहीं पता।"

मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में रखा।

"तो चलिए," मैंने कहा। "पहले इलियास। फिर अस्पताल।"

उस्ताद ने अपनी दुकान का दरवाज़ा बंद किया। उन्होंने ताला लगाया। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "एक बात याद रखना। जब हम इलियास के पास पहुँचें, तो तू मेरे बगल में रहना। मेरे आगे नहीं, मेरे पीछे नहीं। मेरे बगल में।"

"क्यों?"

"क्योंकि इलियास मुझसे झूठ नहीं बोलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर तेरे सामने वो वो बात कहेगा जो उसने पचास साल किसी को नहीं कही।"

मैंने सिर हिलाया।

हम बाहर निकले।

पीपल के नीचे माँ कुर्सी पर बैठी थीं। काजल उनके पास खड़ी थी। शबनम आपा ने अपनी गुमटी से एक और घड़ा पानी का मँगाकर चबूतरी पर रख दिया था। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर सीधे बैठे थे।

मैंने उन सबको देखा और मुझे लगा जैसे पिछले तीन दिनों में मैंने एक नहीं, दस साल जिए हों।

"क्या मिला?" माँ ने पूछा।

"सच," मैंने कहा। "थोड़ा सा।"

"थोड़ा सा ही सही," माँ ने कहा। "हाथ में हो तो बहुत है।"

उस्ताद मेरी तरफ़ मुड़े।

"चल," उन्होंने कहा। "इलियास का घर पीपल के पूरब वाली गली में है।"

हम चले।

टिंकू पीछे-पीछे आया।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद?"

"तू और तेरे जासूस, सब गुमटी पर जाओ। शबनम आपा तुम्हें चाय देगी। और वहाँ से नज़र रखना — कौन आता है, कौन जाता है।"

"उस्ताद—"

"टिंकू," मैंने कहा। "ये काम सबसे ज़रूरी है। तुम्हें पता है क्यों?"

"क्यों?"

"क्योंकि आज सलीम अहमद अपने घर में बंद है," मैंने कहा। "और मुझे लगता है कि कल वो कहीं और बंद होगा। और अगर कल उसका दरवाज़ा खुले, तो मुझे पता होना चाहिए कि उसके पीछे कौन खड़ा था।"

"मैं नज़र रखूँगा," टिंकू ने कहा। उसकी आँखें चमक रही थीं।

वो भागा।

मैं और उस्ताद पीपल के पूरब वाली गली में घुसे। वो गली पतली थी, पत्थर की थी, और दोनों तरफ़ की दीवारें कुछ ज़्यादा ही पुरानी थीं। एक दरवाज़ा आधा खुला था, नीले रंग का, रंग उतरा हुआ।

उस्ताद ने उस दरवाज़े पर दस्तक दी।

कोई जवाब नहीं।

दूसरी दस्तक।

कोई जवाब नहीं।

तीसरी दस्तक — और इस बार दरवाज़ा पूरी तरह खुल गया।

इलियास अली बक्श दरवाज़े पर खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, काली अंठी। वो वैसे ही थे जैसे सलीम बक्श थे — बस एक चीज़ का फर्क था। सलीम की आँखों में चोट थी, और इलियास की आँखों में थकान।

वो हमें देखकर नहीं चौंके।

"मुझे पता था," इलियास ने कहा। "आज तुम दोनों आओगे।"

उन्होंने दरवाज़ा और खोला।

"अंदर आओ," उन्होंने कहा। "बैठो। मैं चाय रखता हूँ।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

वो सीधे अंदर घुसे।

इलियास ने दरवाज़ा बंद किया।

"अंकुश यादव," इलियास ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, "तुम्हारी घंटी ने आज सुबह से मुझे बता दिया था कि तुम आने वाले हो।"

मैंने अपनी जेब की तरफ़ हाथ किया।

"आपको कैसे पता?" मैंने पूछा।

"क्योंकि मेरी मशीन ने भी बजना बंद कर दिया है," इलियास ने कहा। "और जब मेरी मशीन चुप होती है, तो समझ लो कोई पुरानी सिलाई खुलने वाली है।"

वो रसोई की तरफ़ चले।

उस्ताद उनके पीछे नहीं गए।

वो कमरे के बीच में खड़े रहे।

और फिर उन्होंने अपनी जेब से वो पीला काग़ज़ निकाला।

"इलियास," उस्ताद ने कहा, "ये क्या है?"

इलियास रुके।

वो मुड़े।

उन्होंने काग़ज़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।

"ये," उन्होंने कहा, "मेरा लिखा हुआ है।"

"हाँ," उस्ताद ने कहा। "मैं जानता हूँ।"

"तो फिर क्या पूछना?"

"मैं ये नहीं पूछ रहा कि ये किसने लिखा," उस्ताद ने कहा। "मैं ये पूछ रहा हूँ कि तूने ये क्यों लिखा?"

इलियास कुछ देर खड़े रहे।

फिर वो एक लकड़ी की कुर्सी की तरफ़ बढ़े और उस पर बैठ गए।

उनके हाथ उनके घुटनों पर थे। उनकी पीठ झुकी थी।

"बैठ जाओ तुम दोनों," उन्होंने कहा। "ये बात लंबी है। और शायद तुम इसे सुनकर खुश न हो।"

हम बैठे।

इलियास ने गला साफ़ किया।

"मैंने ये काग़ज़ इसलिए लिखा था," उन्होंने कहा, "क्योंकि जिस रात ये पन्ना कटा, मैं वहीं था। और मैंने पहला कातरा अपनी आँखों से देखा।"

इलियास ने अपने घुटनों पर रखे हाथों में एक को और कस लिया।

"और उस रात," उन्होंने कहा, "जिसने पन्ना काटने को कहा, वो मैं था नहीं।"

उस्ताद ने अपनी गर्दन उठाई।

"तो कौन था?" उन्होंने पूछा।

इलियास ने देखा उनकी आँखों में।

"तुम," इलियास ने कहा।

कमरे में हवा रुक गई।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

वो सिलाई मशीन के पास बैठे थे और अचानक वो एक बहुत बूढ़े आदमी लगने लगे।

"मैं?" उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "मैंने कब कहा?"

"तुमने उस रात खुद नहीं कहा," इलियास ने कहा। "पर तुमने उस रात से पहले ही ये बीज बो दिया था। तुमने कहा था — भाई, अगर ये घंटी और ये रजिस्टर हमारे पास रहे, तो हमें भी उसी रास्ते पर चलना पड़ेगा जिस पर हमारे बुज़ुर्ग चले। और उस रास्ते से हमारी माँ को क्या मिला? बस दर्द। माँ तो दवा की देर से चली गई।"

उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"तूने वो पन्ना काटा," उन्होंने कहा।

"हाँ," इलियास ने कहा। "मैंने काटा। पर उस रात मेरा हाथ भी काँप रहा था। मैंने पहला कातरा गलत जगह लगाया। फिर दूसरा। फिर तीसरा। जब पन्ना कट गया, तो मैंने उसे सिलने की सोची। पर सिलाई का हाथ मेरा ठीक नहीं चल रहा था। तो मैंने जो किया…"

वो रुके।

उन्होंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"…मैंने उसे उसी मशीन पर सिला जो तुम्हारी थी। क्योंकि मैं जानता था कि तुम्हारी मशीन की सिलाई पर कोई शक़ नहीं करेगा।"

कमरा खामोश हो गया।

उस्ताद ने अपने हाथ सिलाई मशीन से हटा लिए, जैसे उसने उन्हें छूकर जला दिया हो।

उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने अपनी आँखों को अपनी हथेली में छिपा लिया।

"मुझे पता था," उस्ताद ने धीरे से कहा।

इलियास ने उनकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"मुझे शक़ था," उस्ताद ने कहा। "बहुत साल पहले से। पर मैंने शक़ नहीं किया। क्योंकि मैं डरता था। क्योंकि अगर मैंने शक़ किया, तो मुझे तुझसे बात करनी पड़ती। और मैं तुझसे बात करने से डरता था।"

उन्होंने अपना हाथ आँखों से हटाया।

"बड़े भाई का सबसे बड़ा डर क्या होता है, पता है?" उन्होंने इलियास से कहा। "कि छोटा भाई एक दिन बड़ा होकर उससे सवाल करेगा। और वो सवाल का जवाब न दे पाए।"

इलियास ने कुछ नहीं कहा।

उनकी आँखें नम थीं।

"अब बड़ा हो गया," इलियास ने धीरे से कहा। "अब सवाल कर रहा हूँ। पर जवाब मुझे नहीं चाहिए। जवाब तुम्हें चाहिए।"

उस्ताद उठे। वो इलियास की तरफ़ बढ़े। उन्होंने अपना हाथ अपने भाई के कंधे पर रखा।

"अब आगे का सफ़र आसान नहीं है," उस्ताद ने कहा। "अब सलीम से मिलना है।"

इलियास ने सिर हिलाया।

"मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "और मैं तैयार हूँ।"

"पर एक बात पहले," उस्ताद ने कहा। "तूने जो अंदर वो निशान देखा था — असली पन्ने पर। वो असली पन्ना आज कहाँ है?"

इलियास ने भी अपनी जेब से कुछ निकाला।

एक काग़ज़ की पुड़िया।

"यहाँ," उन्होंने कहा। "पचास साल मेरे सीने से चिपका रहा।"

उन्होंने पुड़िया खोली।

अंदर वो कटा हुआ पन्ना था — छोटा, मुड़ा हुआ, किनारे फटे हुए, पर नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था।

आख़िरी नाम — जगदीश यादव।

और उसके नीचे एक लाइन — "हिस्सा बराबर। सातों मिलें तो शर्तनामा बोले। कोई अंगूठा झूठा हो तो चुप।"

मेरे हाथ फिर से ठंडे हो गए।

मैंने घंटी जेब से निकाली।

वो गरम थी।

"बोल," मैंने कहा।

घंटी ने कहा, "अब तेरे पास जगदीश यादव का नाम है। और कल तेरे पास सात अंगूठे भी होंगे। पर उनमें से तू जानता नहीं कौन सा अंगूठा झूठा है।"

"कैसे पता चलेगा?"

"जब वो अंगूठा बोलेगा," घंटी ने कहा। "अंगूठा चुप नहीं रह सकता, अंकुश। एक दिन बोलेगा।"

घंटी बंद हो गई।

मैंने कटा पन्ना अपनी जेब में रखा। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"अब सलीम के पास?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"अब सलीम के पास," उन्होंने कहा।

हम निकले।

इलियास भी साथ चले। उनके हाथ में वो जर्जर पुड़िया थी, और उनके पीछे उनकाइलियास भी साथ चले। उनके हाथ में वो जर्जर पुड़िया थी, और उनके पीछे उनका आधा खुला दरवाज़ा अंधेरे में छूट गया, जैसे कोई बूढ़ा आदमी दहलीज़ पर खड़ा हमें जाते हुए देख रहा हो।

रात के दो बज चुके थे। पीपल के पीछे वाली गली में एक भी दीया नहीं जल रहा था। ऊपर आसमान में चाँद था, वो भी बादल के पीछे आधा छिपा हुआ। सड़क पर पड़ी छाया ऐसी लग रही थी जैसे ज़मीन पर कोई लंबा साया लेटा हो और हम उसके ऊपर से गुज़र रहे हों।

उस्ताद आगे-आगे चल रहे थे। उनकी लाठी ज़मीन पर पड़ती तो धीरे से खटकती, पर उन्होंने लाठी उठाकर काँख में दबउन्होंने लाठी उठाकर काँख में दबा ली और चुपचाप चलने लगे। मैं उनके पीछे था, इलियास उनके पीछे, और मीरा सबसे आख़िर में अपना कैमरा सीने से चिपकाए। रात के दो बजे गली ऐसी चुप थी जैसे किसी ने उसका गला घोंट दिया हो। कहीं दूर किसी कुत्ते ने एक बार सूँघा, फिर चुप हो गया।

"उस्ताद," मैंने धीरे कहा। "सलीम कहाँ रहता है?"

"नए बाज़ार के मोड़ पर," उन्होंने कहा। "जहाँ पहले हलवाई की दुकान थी, उसके पीछे। पीली दीवार, नीला दरवाज़ा। पर अंकुश, एक बात सुन ले।"

"हाँ?"

"सलीम से आज रात बात मत करना।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज रात वो बोलेगा नहीं," उस्ताद ने कहा। "आज रात वो सिर्फ़ अपने आप से बोलेगा। और जो आदमी अपने आप से बोल रहा हो, उसके सामने खड़े होने से कुछ नहीं मिलता। कल सुबह मिलना ठीक रहेगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा। पर मन में लगा कि उस्ताद आज हर बात को टाल रहे हैं। शायद इसलिए कि वो खुद डर रहे थे। शायद इसलिए कि आज रात सलीम से मिलने का मतलब था — उस आदमी से मिलना जिसके हाथ में घंटी की जीभ थी।

हम नए बाज़ार के मोड़ पर पहुँचे।

पीली दीवार ज़रूर थी। नीला दरवाज़ा भी ज़रूर था। पर दरवाज़े पर ताला लगा था, और ताले के नीचे एक काग़ज़ मोड़कर ठूँसा हुआ था।

उस्ताद ने वो काग़ज़ निकाला। उनके हाथ काँप रहे थे, या शायद ठंड लग रही थी। इलियास ने अपनी जेब से माचिस निकाली, पर माचिस का डिब्बा खाली था। कोई तीली नहीं बची थी। मीरा ने अपना मोबाइल जलाया और उसकी सफ़ेद रोशनी में उस्ताद ने काग़ज़ पढ़ा। उनके चश्मे पर वो रोशनी ऐसे पड़ी जैसे किसी पुराने सिक्के पर।

काग़ज़ पर चार लाइनें थीं। मैंने भी पढ़ा। मेरे पीछे से मीरा ने भी पढ़ा, और उसका मोबाइल हल्का काँपा।

"सुबह दस बजे पीपल के नीचे। रज़ा रजिस्टर लाएगा। मैं नहीं आऊँगा। जीभ मेरे पास रहेगी। कोई मेरे घर की तरफ़ मत आना।"

उस्ताद ने काग़ज़ मोड़कर जेब में रख लिया।

"मैं नहीं आऊँगा," उन्होंने दोहराया, जैसे खुद को समझा रहे हों। "पचास साल से यही तो कर रहा है। नहीं आएगा।"

इलियास ने उनकी तरफ़ देखा।

"बड़े भाई," उन्होंने कहा, "वो डर रहा है।"

"मुझे पता है," उस्ताद ने कहा। "डरने वाला आदमी सबसे ज़्यादा सच छिपाता है। क्योंकि उसे लगता है सच बोलेगा तो ज़िंदा नहीं बचेगा।"

वो मुड़े और चलने लगे।

मैंने एक बार उस नीले दरवाज़े को देखा। उसके पीछे अंधेरा था, और उस अंधेरे में कोई था या नहीं, यह मैं नहीं जानता। पर एक पल के लिए ऐसा लगा कि पर्दे के पीछे कोई खड़ा है और साँस रोके हुए है। हो सकता है मेरा वहम हो। हो सकता है उस रात सलीम सचमुच उसी दीवार के पीछे खड़ा था और हमें जाते हुए देख रहा था।

घर लौटे तो रात के तीन बज चुके थे।

माँ जाग रही थीं। वो हमारी प्रतीक्षा में चूल्हे के पास बैठी थीं और उनके हाथ में चाय की केतली थी जिसकी भाप नहीं आ रही थी। यानी चाय बहुत पहले बनाई गई थी और अब ठंडी हो चुकी थी।

"पी लो," उन्होंने कहा। "ठंडी है, पर पी लो। रात में भूख से नींद जाती है।"

पापा दरवाज़े के पास बैठे थे। उनके हाथ में कुछ नहीं था। यही सबसे डरावनी बात थी। मैंने पापा को हमेशा किसी औज़ार के साथ देखा था। खाली हाथ पापा तब होते थे जब कोई बात घर के अंदर तक आ जाती थी।

"कुछ मिला?" माँ ने पूछा।

"दरवाज़ा बंद था," मैंने कहा। "काग़ज़ लगा था। सुबह दस बजे रज़ा रजिस्टर लाएगा, सलीम नहीं आएगा।"

माँ ने चाय मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने पी ली। कड़वी थी, पर मैंने पूरी पी ली। माँ को यही चाहिए था।

"तेरा उस्ताद क्या कहता है?"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो चौकी पर बैठे थे और उनका चश्मा उतरा हुआ था। बिना चश्मे के उनका चेहरा अलग लगता है। ज़्यादा थका हुआ, ज़्यादा बूढ़ा।

"कल पता चलेगा," उन्होंने कहा।

"उस्ताद जी," माँ ने कहा, "कल कब तक?"

"बहू," उस्ताद ने कहा, "पचास साल से मैं कल-कल करके आज तक आया हूँ। इस बार कल सुबह दस बजे से आगे कल नहीं होगा।"

माँ ने उनकी तरफ़ देर तक देखा। फिर वो उठीं और मेरी तरफ़ मुड़ीं।

"अंकुश, तेरे लिए बिस्तर लगा दिया है। सो जा। और हाँ — जो दरवाज़ा आज खुला खड़ा है, उसे मत बंद करना। मैंने अंदर कोई नई चीज़ नहीं रखी। जो थी, वही है।"

मैंने सिर हिलाया।

मैं बिस्तर पर लेटा तो नींद नहीं आई। सीलन की गंध आ रही थी, और कोने में खुला वो दरवाज़ा बस इतना कह रहा था कि वो वहाँ है। मैंने सोचा, अब थोड़ी देर में उठकर उस संदूक को खोल दूँ। पर शरीर ने साथ नहीं दिया।

नींद आई तो ऐसी आई जैसे कोई खाई हो।

सुबह मैं उठा कि सात बज रहे थे और गली में जीवन शुरू हो चुका था। किसी की चप्पल की आवाज़ आ रही थी, दूर किसी के घर से गर्म रोटी की गंध आ रही थी, और पीपल के नीचे पत्थर पर बाल्टी रखने की आवाज़ आ रही थी।

मैं उठा, मुँह धोया, कपड़े बदले, और जब भीतर के कमरे की तरफ़ गया तो देखा कि दरवाज़ा अब भी खुला है और काजल उसकी चौखट पर बैठी है, और उसके हाथ में चाय का गिलास है जो ठंडा हो रहा है।

"तू आज रात भर यहीं बैठी थी?" मैंने पूछा।

"कुछ देर," उसने कहा। "सो भी गई थी। माँ ने कंबल ओढ़ा दिया था। फिर जब आवाज़ आई तो उठ गई।"

"आवाज़?"

"अंदर से," काजल ने कहा। "किसी के खाँसने जैसी। पर खाँसी नहीं थी। जैसे कोई संदूक अपनी जगह से हिला हो।"

मैंने अंदर झाँका। सब वैसा ही था। संदूक वहीं, तस्वीर वहीं, बक्सा वहीं।

"बाद में देखेंगे," मैंने कहा। "पहले रजिस्टर।"

काजल ने सिर हिलाया और मेरे साथ चल दी।

नौ बजे गली में वो माहौल बन गया जो मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है। हर आदमी अपने काम पर जाने से पहले एक बार पीपल के नीचे रुक रहा था। कोई चाय लेकर आया था, कोई सिर्फ़ खड़ा था। शबनम आपा ने गुमटी के बाहर बेंच खींच दी थी और उस पर एक कटोरी रख दी थी जिसमें गुड़ की डली थी। उनका तरीक़ा है — जब गली में कोई बड़ी बात होती है, तो वो मीठा रख देती हैं। जैसे कह रही हों कि बात कड़वी होगी, मुँह मीठा रख लो।

टिंकू आठ बजे से अपनी जगह पर था। उसने चबूतरी के किनारे बैठकर चार बार मेरा नाम लिया, पाँच बार घड़ी देखी और दो बार उस्ताद की दाढ़ी की तरफ़ देखकर गर्दन हिलाई। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू पत्थर के पुल पर बैठे थे — वो पुल ठीक उस जगह है जहाँ से चबूतरी दिखती है और सुनाई भी देता है। मीरा ने अपना कैमरा तिपाई पर पीपल के तने के पास रख दिया था और लाल बत्ती जल रही थी।

उस्ताद नौ बजकर पैंतालीस पर आए। साफ़ कपड़े पहने हुए, दाढ़ी कंघी किए हुए, और हाथ में एक कपड़े में लिपटा छोटा डब्बा। उन्होंने उसे सीने से सटाकर पकड़ा हुआ था, ऐसे जैसे कोई बच्चा हो।

"उस्ताद, वो क्या है?" टिंकू ने पूछा।

"सुई," उस्ताद ने कहा।

"सुई?"

"सिलाई मशीन की सुई," उस्ताद ने कहा। "नई। आज की। अगर कहीं सिलाई निकली, तो यहीं यहीं करेंगे। किसी और की मशीन से नहीं।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा कुछ नहीं कह रहा था। पर उनकी उम्र ने कह दिया था — वो आज सच का इंतज़ार नहीं कर रहे थे, वो आज उसका सामना करने की तैयारी कर रहे थे।

नौ बजकर पचपन पर रज़ा सलीम आया।

वो गली के मुँह से आया, अकेला। काले कपड़े, हाथ में मोटे भूरे कपड़े में लिपटा एक बड़ा-सा आयताकार बंडल। बंडल इतना बड़ा था कि उसे दोनों हाथों से सीने से लगाकर चलना पड़ रहा था। और उसके हाथ काँप रहे थे। सच में काँप रहे थे। मैंने देखा कि कपड़े का एक कोना उसकी पकड़ से छूटकर हवा में फड़फड़ा रहा था।

वो चबूतरी तक आया और रुक गया। उसकी आँखें लाल थीं। नींद की कमी से या रोने से, यह मैं नहीं बता सकता।

"रजिस्टर," उसने कहा। बस इतना। आवाज़ रूखी थी।

उस्ताद ने आगे हाथ बढ़ाया।

"मैं खुद दूँगा," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने कहा है कि जिसे देना है, उसी के हाथ में देना।"

"किसे देना है?" उस्ताद ने पूछा।

रज़ा ने पहले उस्ताद को देखा, फिर मुझे। फिर चबूतरी पर रखे पत्थर को देखा।

"तीन लोगों को," उसने कहा। "उस्ताद अली बक्श। अंकुश यादव। और मुझे।"

उसने कहा और खुद ही हँसा। हँसी में कुछ नहीं था। जैसे हँसी बोलने का एक तरीक़ा भर हो, जिसका कोई मतलब न हो।

"तीन आदमी खोलेंगे," उस्ताद ने कहा।

"हाँ," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने कहा है।"

"सलीम ने और क्या कहा है?"

रज़ा ने कपड़े में लिपटा बंडल मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने दोनों हाथों से थामा। भारी था, पर इतना नहीं जितना दिख रहा था। ज़्यादा भार कपड़े का था।

"सलीम साहब ने कहा है कि रजिस्टर खोलने के बाद जो होगा, उसका हिसाब वो नहीं रखेंगे," रज़ा ने कहा। "और उन्होंने यह भी कहा कि अगर अंकुश यादव गुस्सा करे, तो उससे कहना कि गुस्सा रजिस्टर पर मत निकालना। रजिस्टर सिर्फ़ काग़ज़ है। गुस्सा उस आदमी पर निकालना जिसने काग़ज़ पर हाथ रखा।"

मेरे हाथ रुक गए।

"वो जानते हैं कि रजिस्टर में क्या है?"

रज़ा ने कुछ नहीं कहा।

"रज़ा," मैंने कहा, "वो जानते हैं?"

"मुझे नहीं पता," रज़ा ने कहा। "उन्होंने रजिस्टर खोला नहीं। उस रात सलीम अहमद साहब के जाने के बाद से यह रजिस्टर बंद ही है। कपड़े में लिपटा था, ताले में था। मैंने आज सुबह ताला खोला।"

"ताले की चाबी किसके पास थी?"

"मेरे पास," रज़ा ने कहा। "सलीम साहब ने मरने से पहले मेरी हथेली पर रखी थी। कहा था — जिस दिन यादव का लड़का आए, उस दिन खोलना।"

चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। टिंकू ने अपनी चप्पल की आवाज़ भी बंद कर दी।

मैंने बंडल चबूतरी के बीच में रखा और कपड़ा खोला।

रजिस्टर मोटा था। लाल जिल्द, कोने उखड़े हुए, और ऊपर की तरफ़ किसी चीज़ ने पानी गिराया था जिससे जिल्द पर एक गोल धब्बा बन गया था। इतना बड़ा कि उस पर अंगूठा रखा जा सके।

तीनों ने हाथ बढ़ाए। उस्ताद ने ऊपर से, रज़ा ने बीच से, मैंने नीचे से। तीन जोड़े हाथों ने एक साथ जिल्द खोली और उसकी सीलन भरी गंध बाहर आई। पुराने काग़ज़ की गंध। मुझे वो गंध पसंद है, सच बताऊँ तो। पर उस दिन वो गंध ऐसी थी जैसे किसी पुराने आदमी के कपड़ों से आ रही हो, जो अब नहीं है।

रज़ा पन्ने पलटने लगा। धीरे-धीरे, उँगली से। पहला पन्ना — हिसाब। दूसरा — हिसाब। तीसरा — कोई साल, कोई तारीख़। पाँचवाँ, छठा, सातवाँ।

"यहाँ," उस्ताद ने कहा।

उनकी उँगली रुक गई।

"ज़मीन वाला हिसाब," उन्होंने कहा। "अस्पताल की ज़मीन। सात नाम। देखो।"

मैंने झुककर देखा।

उस पन्ने पर सात नामों की सूची थी। हर नाम के आगे एक अंगूठे का निशान। लाल स्याही जैसा, पर पुराना, फीका। कोई नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था, कोई धुँधला था। पहला नाम — मंज़ूर हुसैन। दूसरा — बसंत राम। तीसरा — श्यामलाल। चौथा — नूर मोहम्मद। पाँचवाँ — रामकिशन। छठा — हाफ़िज़ निसार।

और सातवें नंबर पर…

मैंने उँगली रखी तो पता चला कि वहाँ काग़ज़ कटा हुआ है।

बिल्कुल साफ़ कटा हुआ। ब्लेड से, या किसी पतली चीज़ से, बिल्कुल सीधा। और उस कटी जगह पर एक दूसरा पन्ना सिल दिया गया था। सिलाई से। छोटे-छोटे टाँके, ज़मीन के रंग के धागे से, इतने बारीक कि अगर तुम उँगली फेरकर न देखो तो पता भी न चले।

उस सिले हुए पन्ने पर कुछ और लिखा था। कोई और हिसाब, कोई और साल, कुछ और नाम। सातवाँ नाम गायब था। जगदीश यादव गायब था।

मेरे अंदर कुछ टूटा।

मुझे नहीं पता कैसे बताऊँ। वो गुस्सा नहीं था, वो कुछ और था। जैसे तुम बरसों से एक दरवाज़े के पीछे खड़े हो और दरवाज़ा खुले और अंदर सिर्फ़ एक खाली कुर्सी हो। सारी मेहनत, सारा इंतज़ार, सारी उम्मीद — और सामने खाली जगह।

मैंने रज़ा का गिरेबान पकड़ लिया।

मुझे याद नहीं कि मैंने कब हाथ बढ़ाया। बस अगली चीज़ जो मुझे याद है, वो यह थी कि मेरी मुट्ठी में उसकी कमीज़ का कपड़ा था और वो मेरी तरफ़ झुक आया था, और उसकी आँखों में डर था। असली डर।

"तुम लोगों ने काट दिया," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी नहीं लग रही थी। "तुमने दादा का नाम काट दिया। तुमने उसे रजिस्टर से निकाल दिया। और तुम आज सुबह मेरे सामने आकर—"

"अंकुश," उस्ताद ने कहा।

"उस्ताद, ये मेरे दादा का—"

"अंकुश।" उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस थी। और वो इतनी थी कि मेरे हाथ खुद खुल गए।

मैंने रज़ा को छोड़ दिया। वो पीछे हटा, कमीज़ सीधी की, और उसकी साँस फूली हुई थी।

"मैंने नहीं काटा," उसने कहा। आवाज़ फटी हुई थी। "मैंने कसम खाई है, अंकुश यादव, मैंने नहीं काटा। मैंने तो इस रजिस्टर को आज सुबह पहली बार खोला। मुझे नहीं पता था कि इसके अंदर ऐसा है। मैं तो सिर्फ़ रजिस्टर लाया हूँ। मैं तो सिर्फ़ मुंशी हूँ।"

"फिर किसने काटा?"

रज़ा ने कोई जवाब नहीं दिया।

मैं मुड़ा। उस्ताद अब भी झुके हुए थे। उनका चश्मा नाक पर सरका हुआ था, पर उन्होंने उसे ठीक नहीं किया। उनकी उँगली उस सिलाई पर थी और वो उसे धीरे-धीरे सहला रहे थे, जैसे कोई आदमी किसी पुराने ज़ख़्म को छूता हो।

"उस्ताद?" मैंने कहा।

वो नहीं बोले।

"उस्ताद।"

उन्होंने चश्मा उतारा। धीरे से, दोनों हाथों से। और उसे अपनी कमीज़ की जेब में रख दिया।

"इलियास," उन्होंने कहा।

इलियास आगे आए।

"देख," उस्ताद ने कहा और उँगली सिलाई की तरफ़ बढ़ाई।

इलियास झुके। उन्होंने देखा। फिर वो सीधे हुए और उनका चेहरा बदल गया। ऐसे बदला जैसे किसी ने उनके सामने से कोई पर्दा हटा दिया हो।

"ये तो…" इलियास ने कहा।

"हाँ," उस्ताद ने कहा।

"भाई, ये तो—"

"हाँ," उस्ताद ने फिर कहा।

मैं उनके बीच में था और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

"क्या है?" मैंने कहा। "उस्ताद, क्या है? बोलिए।"

उस्ताद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

उन्होंने अपना हाथ उस सिलाई पर रखा। उँगली से टाँके को छुआ, एक-एक करके, जैसे कोई अक्षर पढ़ रहे हों। उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

चबूतरी पर कोई नहीं बोला। शबनम आपा ने अपनी चिमटी रख दी। मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया। टिंकू ने अपनी साँस रोक ली।

"यह सिलाई," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, "मेरे हाथ की नहीं है।"

उन्होंने आँखें खोलीं और सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"पर यह सिलाई मेरी मशीन की है।"

चबूतरी पर हवा रुक गई।

"मेरी मशीन की," उस्ताद ने दोहराया। "मेरी उस मशीन की जो पचास साल से मेरी दुकान में है। उसकी सुई से, उसके टांके से। मैं इस सिलाई को नहीं पहचानता, पर मैं अपनी मशीन को पहचानता हूँ।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।

"मतलब किसी ने आपकी मशीन से सिलाई की?"

"या फिर," उस्ताद ने कहा, "मेरी मशीन कभी मेरी नहीं थी।"

वो रुके। उनके गले में कुछ फँसा था जो बाहर नहीं आ रहा था।

"उस्ताद," इलियास ने धीरे से कहा, "वो मशीन माँ की थी।"

उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा।

"माँ की?" मैंने कहा।

"माँ सिलाई करती थीं," इलियास ने कहा। "हमारी माँ। बक्श खानदान की। वो इसी मशीन पर सिलाई करके हम दोनों को पालती थीं। उस रात के बाद मशीन भाई के पास रह गई और हम दोनों बिछड़ गए।"

"तो मशीन माँ की थी," मैंने कहा। "फिर इस सिलाई से क्या?"

"इसका मतलब यह है," उस्ताद ने कहा, "कि ये सिलाई उस रात के बाद कभी हुई है। जब मशीन मेरे पास थी। जब मैं ज़िंदा था। मेरी दुकान में।"

"तो किसी ने आपकी दुकान में आकर—"

"नहीं," उस्ताद ने कहा। "मेरी दुकान में कोई रजिस्टर लेकर नहीं आया। कोई सिलाई करने नहीं आया।"

उन्होंने एक लंबी साँस ली।

"मेरे कान पर पेंसिल है, अंकुश," उन्होंने कहा। "पचास साल से है। बस इसलिए कि जो कुछ मेरी दुकान से आता-जाता है, उसका हिसाब मुझे पता रहे। एक सुई, एक धागा, एक बटन। मुझे सब पता रहता है।"

"तो?"

"तो," उस्ताद ने कहा, "इस सिलाई के लिए मेरी मशीन कभी मेरी दुकान से बाहर नहीं गई।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"मतलब ये रजिस्टर मेरी दुकान में सिला गया है," उस्ताद ने कहा। "और मुझे पता नहीं चला।"

टिंकू ने पहली बार अपनी आवाज़ निकाली।

"उस्ताद," उसने कहा, "आपकी दुकान में कौन आता है?"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपना मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।

"पहले मैं सोचता था कोई नहीं," उन्होंने कहा। "अब सोचता हूँ कि मैंने पचास साल एक ऐसे आदमी के साथ बिताए जिसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता।"

"सलीम," मैंने कहा।

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

मैंने घंटी निकाली।

वो गरम थी। इतनी गरम कि मेरी हथेली जलने लगी। पर मैंने उसे जाने नहीं दिया।

"बोल," मैंने कहा। "जो कटा है वो कहाँ है?"

घंटी ने कहा — "कटा हुआ पन्ना बाहर है।"

"बाहर कहाँ?"

"जहाँ काटा गया है, वहाँ नहीं। जहाँ छुपाया गया है, वहाँ। अंकुश, जो चीज़ काटी जाती है, वो फेंकी नहीं जाती। फेंकने वाला काटता नहीं, काटने वाला छुपाता है।"

"क्यों छुपाता है?"

"क्योंकि काटी हुई चीज़ अपनी कटी जगह से बोलती है," घंटी ने कहा। "जिस दिन वो हिस्सा अपनी जगह पर लौटेगा, उस दिन कैंची खुद बोलेगी।"

"फिर तो हमें वो पन्ना ढूँढना होगा।"

घंटी ने एक पल रुककर कहा — "तुझे ढूँढना नहीं पड़ेगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो तेरी तरफ़ आ रहा है।"

घंटी बंद हो गई।

मैंने चारों तरफ़ देखा। गली में लोग खड़े थे — रेडियो वाला बूढ़ा, भोला भाई, किराने वाले काका का बेटा, चूड़ी वाली बाई, नल वाले रमेश भाई। सब देख रहे थे।

और मुझे लगा कि इनमें से किसी के हाथ में वो कटा पन्ना है। या किसी की जेब में। या किसी की आस्तीन में। और मुझे यह भी लगा कि मैं इसे जानता हूँ, बस उसे नाम नहीं दे पा रहा।

रज़ा सलीम ने धीरे से कहा, "अंकुश यादव।"

मैं उसकी तरफ़ मुड़ा।

"सलीम साहब ने एक बात और कही थी," उसने कहा। "कहा था कि जिस दिन रजिस्टर खुलेगा, उस दिन सिलाई वाला पन्ना किसी और के पास होगा। और अगर ऐसा हुआ, तो मेरी बात सुनना।"

"क्या बात?"

"कहा था — उस्ताद अली बक्श से कहना कि उनकी मशीन पचास साल से उनके घर में नहीं, दुकान में रही है। और घर वो होता है जहाँ लोग सच बोलते हैं।"

उस्ताद की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया।

मैंने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ नहीं पकड़ा। पर उन्होंने मेरा कंधा थाम लिया, और उनकी पकड़ में वो ताक़त थी जो पचास साल की चुप्पी से बची थी।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "आज मैं अपनी दुकान बंद करता हूँ।"

"उस्ताद—"

"बंद करता हूँ," उन्होंने कहा। "आज थोड़ी देर के लिए। क्योंकि आज मुझे अपनी मशीन के सामने बैठकर पूछना है कि तूने पचास साल में कितने टाँके ऐसे सिले जिन्हें मैंने देखा नहीं।"

वो मुड़े और चल दिए।

उनके पीछे इलियास चले। फिर रज़ा, बंडल कपड़े में लपेटकर। फिर मैं, और फिर सब। गली ऐसे चली जैसे कोई पूरा मोहल्ला एक बूढ़े आदमी के पीछे-पीछे उसकी मशीन तक जा रहा हो।

मैं जब उस्ताद की दुकान पर पहुँचा तो सिलाई मशीन का ढक्कन खुला था और उस्ताद उसके सामने बैठे थे। उनका चश्मा वापस नाक पर था। उन्होंने सुई की गड्ढी खोली, और उसमें से एक छोटी-सी धागे की लपेट निकाली जो वहाँ फँसी हुई थी।

"ये रंग," उस्ताद ने कहा, "मैंने कभी नहीं इस्तेमाल किया।"

धागा ज़मीन के रंग का था।

बिल्कुल वैसा ही जैसा रजिस्टर के सिले हुए पन्ने पर था।

मेरे पीछे किसी ने धीरे से कहा — "तो मशीन ने सिलाई की, पर धागा किसी और ने डाला।"

मैं मुड़ा।

पापा चौखट पर खड़े थे। उनके हाथ में वो भूरे कपड़े में लिपटी फाइल थी। और उनका चेहरा वैसा था जैसा मैंने सिर्फ़ उस रात देखा था — जब उन्होंने पहली बार कहा था कि घंटी आपस में नहीं टूटी, किसी ने तोड़ी थी।

"पापा?" मैंने कहा।

उन्होंने फाइल अपने सीने से अलग की और सामने रख दी।

"उस्ताद," उन्होंने कहा, "एक बात पूछनी है।"

"पूछ।"

"तुम्हारी दुकान की चाबी किसके पास है?"

उस्ताद ने सुई गड्ढी में वापस रखी। उनका हाथ काँपा।

"तीन लोगों के पास," उन्होंने कहा। "मेरे पास। मेरे भाई के पास। और एक तीसरे के पास।"

"वो तीसरा कौन है?"

उस्ताद ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

फिर वो बोले, बहुत धीरे से, जैसे खुद से कह रहे हों — "वो तीसरा आज सुबह दस बजे नहीं आया, अंकुश। क्योंकि वो नहीं आना चाहता था कि सिलाई किस मशीन की है। वो जानता है। और वो यह भी जानता है कि देर-सबेर एक कुर्सी के नीचे से, एक ताले से, या एक दरवाज़े के पीछे से वो पन्ना निकलेगा।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"आज रात तेरे घर के पीछे वाला दरवाज़ा खुला रहने दे, अंकुश। उसके पीछे जो सोया है, वो अब तक सोया है। पर आज रात वो जागेगा। और जिस दिन वो जागेगा, उस दिन रजिस्टर का कटा हुआ पन्ना खुद रास्ता बनाकर आएगा।"

॥

उस्ताद की बात सुनकर मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। उनकी मशीन की सुई ऊपर-नीचे हो रही थी, पर धागा नहीं था। खाली सुई। टिक-टिक। जैसे कोई बूढ़ा दिल बिना खून के धड़क रहा हो।

इलियास ने चुपचाप मशीन का ढक्कन बंद किया। रज़ा ने रजिस्टर कपड़े में लपेटा। माँ ने कुर्सी का पहिया घुमाया और वो चरचराकर दुकान की चौखट तक आई।

"उस्ताद," माँ ने कहा, "आज रात हमारे घर आ जाइए।"

उस्ताद ने सिर हिलाया, पर हाँ नहीं बोले।

मैं घर लौटा तो रात के ग्यारह बज चुके थे। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा अब भी खुला था — मैंने जान-बूझकर बंद नहीं किया। उसके पीछे का कमरा अंधेरे में साँस ले रहा था, जैसे बंद कमरे को भी पता हो कि आज उसकी बारी है।

पापा उसी दरवाज़े के सामने, दीवार से टिककर, फ़र्श पर बैठ गए। हाथ में एक पुराना पेचकस। बोले कुछ नहीं।

काजल ने दो चादरें लाकर हम तीनों के ऊपर डाल दीं।

"जागना है क्या पूरी रात?" काजल ने पूछा।

"पता नहीं," मैंने कहा। "जो सोया है वो जागेगा, तो हमें भी जागना पड़ेगा।"

"अंकुश," माँ ने कहा, "तू जा के सो जा। सुबह दुकान खोलनी है।"

"माँ, दुकान आज नहीं खुलेगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि आज मैं वो चीज़ खोलूँगा जो दस साल से बंद है।"

माँ कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और चली गईं।

रात का पहला पहर ऐसे ही गुज़रा। पीपल की पत्तियों की आवाज़, किसी दूर के टीवी की धुन, और हमारी गली के बिना मालिक कुत्ते की एक लंबी आवाज़, जो रात में कभी-कभी ऐसे सुनाई देती है जैसे कोई बूढ़ा नाम लेकर पुकार रहा हो।

दो बजे मैं उठा। दरवाज़ा वैसे ही खुला था। अंदर अंधेरा, देखो तो सिर्फ़ एक पुराना संदूक और दीवार पर टँगी टूटे काँच वाली तस्वीर।

मैंने घंटी जेब से निकाली। हल्की-सी घुमाई। घंटी ने कुछ नहीं कहा।

"कुछ तो बोल," मैंने धीरे से कहा।

और तब आवाज़ आई, बहुत छोटी, जैसे किसी ने नींद में करवट ली हो।

"अभी नहीं। सो जा। सुबह काम है।"

"क्या काम?"

"जोड़ने का। और यह काम तेरे हिसाब से बड़ा है।"

मैं हँसा। "मेरे हिसाब से? भाई, मैं तो पंचर भी सोच-समझकर लगाता हूँ।"

घंटी चुप हो गई।

तीन बजे कुछ गिरा। मैं उछलकर उठा। पापा पहले से खड़े थे, पेचकस हाथ में। हम दोनों अंधेरे कमरे में झाँका — बिल्ली थी। संदूक के ऊपर से कटोरा गिरा था। मिट्टी का पुराना कटोरा, दो टुकड़ों में।

पापा ने कटोरे के दोनों टुकड़े उठाए और एक-दूसरे से मिलाकर देखा। बीच में एक पतली लकीर बच गई।

"पापा," मैंने धीरे से कहा, "अगर कल कोई आए और कहे कि उसका रिश्ता ऐसे ही बीच से टूटा है, तो मैं क्या कहूँ?"

पापा ने टुकड़े मेज़ पर रख दिए। बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर बोले, "कहना कि लकीर रहेगी। घाव रहेगा। पर पकड़ होगी। टूटे हुए से ज़्यादा मज़बूत पकड़।"

मैंने कटोरा मेज़ पर ही छोड़ दिया।

सुबह चार बजे माँ की चूल्हे की आवाज़ आई। पाँच बजे मुर्गे नहीं थे, पर गली के मुँह पर कोई टेम्पो अपनी रस्सी खींच रहा था। छह बजे मैंने देखा कि पापा दरवाज़े के सामने दीवार से टिककर सो गए हैं, गोद में भूरी फाइल, हाथ में पेचकस।

मैंने उनके हाथ से धीरे से पेचकस निकाला। वो जाग गए।

"दरवाज़ा बंद कर दे," पापा ने कहा। "अब इसे रोशनी में खोलेंगे।"

सुबह सात बजे मैंने शटर उठाया। शटर की आवाज़ आज कुछ अलग लगी — जैसे ज़ंजीर नहीं, किसी की नींद खुल रही हो।

टिंकू वहीं मिला। नीचे बैठकर, घुटने पर पट्टी बाँधता हुआ।

"उस्ताद," वो उठा, "आज शटर सात बजे? आपको क्या हुआ?"

"आज कुछ बनाना है।"

"क्या?"

मैंने पीछे वाले कमरे से वो टूटी लकड़ी की मेज़ निकाली जिसकी एक टाँग नाप में नहीं थी — दुकान के पीछे बरसों से पड़ी थी। बच्चों की टोली तभी पहुँच गई — सानिया हाथ में रोटी लिए, गुड्डू मुँह में ब्रश दबाए, रफ़ीक़ और चिंटू आधी नींद में।

"ये मेज़ पीपल के नीचे ले चलो," मैंने कहा।

"उस्ताद, पीपल के नीचे तो बुज़ुर्गों की चबूतरी है," सानिया ने कहा।

"चबूतरी के सामने। रास्ता नहीं रोकेगी।"

चारों ने मेज़ उठाई। गुड्डू ने शिकायत की कि पैर में चोट लग रही है, चिंटू ने कहा कि तू तो खाली हाथ चल रहा है। रफ़ीक़ ने बीच में टाँग पकड़ी और बाकी तीनों ने उसे डाँटा कि वो टाँग सबसे कमज़ोर है। मज़े की बात — मेज़ गिरी नहीं। मैंने पहली बार देखा कि चार बच्चों में भी एक तरह का जोड़ होता है।

मेज़ पीपल के सामने रखी गई।

फिर मैंने पीछे वाले कमरे से कपड़े में लिपटा वो बोर्ड उठाया जो मैंने रात भर में बनाया था। पिछले हफ़्ते लाइसेंस बोर्ड के लिए जो सफ़ेद पेंट बचा था, वही इस्तेमाल हुआ था।

टिंकू ने कपड़ा खींचा।

बोर्ड पर उलटे-सीधे, बड़े अक्षरों में लिखा था —

जोड़ केंद्र

टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ

टिंकू ने उसे पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक थी जो बच्चों की आँखों में तब आती है जब उन्हें पता चलता है कि बड़ों ने भी उनके जैसा कोई खेल शुरू किया है।

"उस्ताद," उसने कहा, "ये सच में खुलेगा?"

"शटर खुला है।"

"मतलब कोई भी आ सकता है?"

"कोई भी।"

"और अगर कोई टूटी चीज़ लेकर न आए?"

"तो टूटा रिश्ता लेकर आए। कोई तो टूटा ही होगा। गली में हर घर में एक टूटी चीज़ है — या तो रेडियो, या घड़ी, या आदमी।"

टिंकू हँसा।

दस मिनट नहीं हुए थे कि बच्चे दौड़कर लौटे। सानिया के हाथ में एक टूटी गुड़िया — सिर के बाल पीछे के हिस्से से गायब, एक हाथ नदारद। गुड्डू ने एक घड़ी लाई जिसमें न काँटे थे न काँच, बस पट्टा बचा था। रफ़ीक़ ने टूटा हुआ रेडियो लाया और गर्व से कहा, "ये हमारे घर में सबसे पुरानी चीज़ है, इसे दादा जी चलाते थे।" चिंटू ने एक पुरानी तांबे की केतली के टूटे हुए ढक्कन वाला टुकड़ा लाकर रख दिया और बोला, "ये ठीक हो गया तो हमारी अम्मी वो केतली फेंकने से बचा लेंगी।"

मैंने चारों की तरफ़ देखा।

"सुनो," मैंने कहा, "मैं इन्हें ठीक करूँगा। पर एक बात साफ़ रहे — मैं सिर्फ़ तभी ठीक कर सकता हूँ जब तुम लोग बताओ कि ये किस चीज़ से टूटी हैं। कोई रिश्ता बताओ। कोई सच बताओ। वरना ये चीज़ें जुड़ेंगी नहीं।"

चारों एक-दूसरे को देखने लगे।

तभी शबनम आपा आई। एक हाथ में चाय की केतली, दूसरे में समोसों की प्लेट, और कमर में पल्लू खोंसा हुआ।

"मैंने सुन लिया," उसने कहा और प्लेट मेज़ पर रख दी। "तू यहाँ जोड़ स्कूल खोल रहा है तो एक बात पहले तय कर ले।"

"क्या?"

"जो मरम्मत करवाने आए, वो मेरी गुमटी से होकर जाएगा। चाय पिएगा, समोसा खाएगा, पैसे देगा। मैं मुफ़्त की चाय नहीं दूँगी। इसमें कोई शर्म नहीं है।"

"आपा, मैंने तो कहा भी नहीं—"

"कहने की ज़रूरत नहीं। मैं पंद्रह साल से गुमटी चला रही हूँ, मुझे पता है कि भीड़ कहाँ खड़ी होती है और पैसा कहाँ गिरता है। भीड़ तेरे पास होगी, पैसा मेरे पास। दोनों खुश।"

मैं हँस पड़ा।

टिंकू ने धीरे से कहा, "आपा, आप इतनी तेज़ कैसे बोलती हैं?"

"बेटा, जब पंद्रह साल तक कोई तेरी बात न सुने, तो तेरी ज़ुबान तेज़ हो जाती है। अब कुछ कहने की ज़रूरत नहीं रहती, बस कह देती है।"

वो चली गई। मैंने देखा कि उसने रफ़ीक़ के हाथ में एक समोसा दबा दिया था, बिना पूछे।

नौ बजे तक केंद्र पर सिर्फ़ बच्चों की भीड़ थी और मेज़ पर चार टूटी चीज़ें, जो अभी ठीक नहीं हुई थीं, क्योंकि किसी ने भी सच नहीं खोला था।

फिर सानिया और रफ़ीक़ की लड़ाई सामने आई।

सच कहूँ तो लड़ाई नहीं थी, एक चुप्पी थी। एक हफ़्ते से दोनों एक-दूसरे से नहीं बोल रहे थे। सानिया पीपल के उस तरफ़ खड़ी होती, रफ़ीक़ इस तरफ़। चिंटू बीच में फँसा रहता — उसकी बहन से बात करे या दोस्त से।

वजह पतंग थी।

पीपल के ऊपर, तीसरी डाल और छतरी के बीच, एक पतंग फँसी थी। सफ़ेद काग़ज़ की, अख़बार से बनी हुई, पूँछ में नीले रंग के कपड़े के टुकड़े। एक हफ़्ते से वहीं अटकी थी। हवा में हिलती थी, कभी फड़फड़ाती, जैसे अपने आप को छुड़ाने की कोशिश कर रही हो।

"ये पतंग दोनों ने मिलकर बनाई थी," चिंटू ने धीरे से मुझे बताया। "पिछले महीने। दो दिन लगे थे।"

"और अब?"

"अब कोई नहीं उतारता।"

मैंने सानिया को बुलाया। फिर रफ़ीक़ को। दोनों केंद्र की मेज़ के सामने दो स्टूल पर बैठे — रफ़ीक़ मुँह फेरे हुए, सानिया आँखें नीची किए हुए।

"पतंग किसने उड़ाई थी?" मैंने पूछा।

"हम दोनों ने," सानिया ने कहा।

"तो कटी कैसे?"

"रफ़ीक़ की डोर से।"

"मेरी डोर से नहीं," रफ़ीक़ सीधा होकर बोला। "मैंने तो बस खींची थी।"

"तो खींचने से कटी न?"

"मेरा मतलब—"

"रफ़ीक़," मैंने कहा, "मैं तेरी जगह पर आकर नहीं सोचूँगा। तू अपनी जगह से बोल।"

वो चुप हो गया। फिर धीरे से बोला, "हाँ। मेरी डोर ने काटी। पर मैंने जान-बूझकर नहीं काटी।"

"फिर गलती किसकी थी?"

"मेरी।" वो बैठ गया।

सानिया की आँखें भर आईं। "और मैंने कहा था कि तेरे पापा के जाने के बाद तेरी कोई चीज़ नहीं चलती।"

कमरे में सन्नाटा हो गया।

"ये तूने कहा था?" मैंने पूछा।

"हाँ।" सानिया ने मुँह नहीं छिपाया। "और मुझे पता है कि ये झूठ है। रफ़ीक़ उस दिन घर गया था और रोया था — मैंने दीवार के पीछे से सुना था। और फिर मैंने कभी उससे माफ़ी नहीं माँगी, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं माफ़ी माँगूँगी तो सबको पता चल जाएगा कि मैंने ऐसी बात कही थी।"

मैंने एक गहरी साँस ली।

"तुम दोनों एक-दूसरे से एक हफ़्ते से बात नहीं कर रहे हो," मैंने कहा, "और पतंग पेड़ पर सूख रही है। सुनो, मेरे पास एक नियम है। कोई भी चीज़ मुफ़्त नहीं जुड़ती। तुम दोनों को अपनी मर्ज़ी से एक सच्ची बात कहनी पड़ेगी। सच्ची। सुना हुआ नहीं, रटा हुआ नहीं।"

रफ़ीक़ ने पहले बोला।

"सानिया," उसने कहा, "उस दिन मैंने हँसा था जब तेरी पतंग कटी थी। और मैंने इसलिए हँसा था क्योंकि मेरे सारे दोस्त देख रहे थे और मुझे अच्छा दोस्त लगना था। पर घर जाकर मैंने अपना चेहरा दीवार की तरफ़ रख लिया था। और मुझे तेरी आवाज़ पर गुस्सा आया था, तेरे पापा की बात पर नहीं। मैं तुझे माफ़ करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं खुद भी अच्छा नहीं था।"

सानिया एक पल चुप रही। फिर उसने हाथ बढ़ाया और रफ़ीक़ की कलाई पकड़ ली।

"और मैं," उसने कहा, "उस बात के लिए माफ़ी माँगती हूँ। मैंने वो इसलिए कहा था क्योंकि मेरी पतंग कट गई थी और मुझे किसी पर चीखना था। और तू सबसे करीब था।"

"तो गलती मेरी थी," रफ़ीक़ ने कहा।

"नहीं, गलती मेरी थी," सानिया ने कहा।

"अरे, ये तो अच्छा है," चिंटू ने बीच में टपककर कहा, "हफ़्ते भर से दोनों की गलती किसी और की थी, अब अचानक दोनों की अपनी हो गई।"

मैं हँस पड़ा।

तभी जेब में घंटी बजी।

मेरी जेब में। मेरे हाथ में कुछ नहीं था।

"छोटा जोड़," आवाज़ आई। "दस अंक।"

और फिर, बहुत धीरे से, जैसे कोई हिसाब लिख रहा हो — "कुल एक सौ अड़सठ।"

मैं वहीं खड़ा रह गया।

पतंग अचानक हवा में घूमी, पूँछ ने पीपल की एक टहनी पकड़ी, और तभी टिंकू पेड़ पर चढ़ चुका था। दो मिनट में पतंग नीचे आई। सानिया ने उसे झटके से पकड़ा और रफ़ीक़ के हाथ में दिया। रफ़ीक़ ने भी उसे सानिया के हाथ में वापस दिया।

"आधी-आधी," सानिया ने कहा।

"आधी-आधी," रफ़ीक़ ने कहा।

बच्चे चीखे, शबनम आपा गुमटी से बाहर आई और बोली कि अब पतंग उड़ाने वाले चाय पीकर जाएँ, और मैं मेज़ के पीछे खड़ा रहा।

दस अंक।

दस अंक। जबकि मेरे सामने एक रजिस्टर था जिसका सिला हुआ पन्ना खुल चुका था, सलीम के पास घंटी की टूटी जीभ थी, आज रात बारह बजे अस्पताल की मुख्य सीढ़ी बंद होनी थी, दो दिन बाद सुबह सात बजे प्लॉट पर मशीन आनी थी, और रणवीर भारद्वाज के पास वो सफ़ेद चमकते जूते थे जिन्हें आज भी किसी ने धूल में नहीं देखा था।

दस अंक।

अंकों की सूची मुझे याद थी। टूटने से पहले की आवाज़ — दस अंक। यानी जितना आज मिला, उतने में सिर्फ़ इतना ही खरीदा जा सकता था कि कौन सी चीज़ टूटने वाली है। और मैं खुद जानता था कि क्या टूटने वाला है। सब कुछ।

टिंकू मेरे पास आया।

"उस्ताद, आप खुश नहीं हो?"

"हूँ।"

"नहीं लग रहा।"

मैंने उसका सिर थपथपाया।

"टिंकू, एक बात सीख ले," मैंने कहा। "जब तू साइकिल की चेन जोड़ता है, तो एक कड़ी जोड़ने से गाड़ी नहीं चलती। चेन में सौ कड़ियाँ होती हैं। और अगर बीच में दस कड़ियाँ टूटी हों, तो एक जोड़ने पर गाड़ी उलटी भी नहीं चलेगी, वो बस वहीं खट-खट करेगी।"

"आपको कितनी जोड़नी हैं?"

मैंने सामने गली को देखा। उस्ताद की दुकान का शटर आज आधा गिरा था। उनकी मशीन बंद थी। पीपल के नीचे मेरी टूटी मेज़ खड़ी थी और उस पर चार टूटी चीज़ें रखी थीं, जिनमें से एक भी अभी ठीक नहीं हुई थी।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर ज़्यादा हैं। और सबसे बड़ी कड़ी वो होगी जो घंटी की जीभ से जुड़ेगी।"

दिन ऐसे ही चढ़ता गया।

ग्यारह बजे भोला भाई आए। शटर आधा गिरा, पर उन्होंने अपना रेडियो थाम रखा था — वही जो हमने सुबह सुना था। बोले, "अंकुश, इसे ठीक कर दे। पर मैं बता दूँ, ये टूटा नहीं है। मैंने खुद तोड़ दिया था उस दिन, जब साहब के आदमी ने कहा था कि दुकान अच्छी चल रही है तो गली में और लोग भी दुकान खोल लेंगे।" उन्होंने रेडियो मेज़ पर रखा और सिर झुका लिया। मैंने उनसे सच पूछा। उन्होंने बताया कि उन्होंने अपनी बीवी को एक बात कही थी — कि वो ठीक होने का बहाना बनाती है — और अगले दिन उन्होंने खुद वो रेडियो पटक दिया था, क्योंकि अपने आप को भी कोई क़सूर नहीं देना था। फिर दोनों ने एक-दूसरे से सच बोला। अंकुश कुछ नहीं बोला, बस रेडियो अपनी छोटी सी मेज़ पर उठा लिया।

"भोला भाई," मैंने कहा, "आज नहीं। ये आज नहीं जुड़ेगा।"

"क्यों?"

"क्योंकि आपने और भाभी ने माफ़ी माँग ली, पर सच्ची बात कहने से पहले आपने रेडियो तोड़ दिया था। मेरे हिसाब से ये पूरा नहीं है। जब आप भाभी के सामने कहेंगे कि आपने उनकी बात से नहीं, अपनी मजबूरी से तोड़ा था — तब ले आइएगा।"

भोला भाई ने मुझे देखा। फिर हँसे। "तेरे पास शब्द बहुत हैं, अंकुश।"

"दुकान में औज़ार कम हैं, इसलिए शब्दों से काम चला रहा हूँ।"

वो हँसते हुए गए।

दोपहर में और लोग आए। एक बूढ़ा नल की टूटी रिंग लेकर आया। एक औरत साड़ी का टूटा हुक लेकर आई और करीब आधे घंटे तक अपनी बहू की शिकायत करती रही, और जब मैंने कहा कि माफ़ी के बिना हुक नहीं जुड़ेगा, तो वो उठकर चली गई और कह गई, "तेरे पास जादू नहीं है, तू तो बस बातें करता है।"

मैंने उसके पीछे हाथ हिलाया। "आपा, ठीक कह रही हैं। पहली बार ठीक कह रही हैं।"

टिंकू दिन भर मेज़ के पास बैठा रहा और हर आने-जाने वाले को देखता रहा। एक बार वो बोला, "उस्ताद, ये केंद्र आगे बढ़ेगा तो क्या हम इसे दुकान से बड़ा नहीं बना सकते?"

"क्यों?"

"क्योंकि लोग दुकान से डरते हैं, पर केंद्र से नहीं। दुकान में हिसाब होता है। केंद्र में बात।"

माँ दोपहर में रोटी लेकर आईं। प्लेट मेज़ पर रखी, फिर बोर्ड पढ़ा। कुछ देर खड़ी रहीं।

"जोड़ केंद्र?" उन्होंने कहा।

"हाँ, माँ।"

"जोड़ने की चीज़ें तो घर से शुरू होनी चाहिए थीं।"

"माँ—"

"मैं कुछ नहीं कह रही," उन्होंने कहा। "बस आज रात सीढ़ी पर तू खड़ा होगा, और मैं कुर्सी पर। मेरे पास भी एक टूटी चीज़ है।"

"क्या?"

"बाईस साल की चुप्पी। और उसका ताला मेरे ही हाथ में था।"-फिर उन्होंने प्लेट आगे सरका दी और कहा, "इसे गरम खा। ठंडा खाया तो मैं बोलूँगी नहीं।"

शाम पाँच बजे शबनम आपा ने तीन बार केतली भरी। बच्चे मेज़ के इर्द-गिर्द बैठे थे और टिंकू एक-एक टूटी चीज़ उठाकर गिन रहा था — गुड़िया का सिर, घड़ी का पट्टा, रेडियो की जाली, केतली का ढक्कन। सात चीज़ें। और सात में से एक भी ठीक नहीं हुई थी।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "आज सिर्फ़ एक पतंग जुड़ी।"

"और वो भी टूटी नहीं थी, बस फँसी थी," मैंने कहा।

"तो अंक क्यों मिले?"

"क्योंकि रिश्ता टूटा था, चीज़ नहीं।"

टिंकू ने सिर हिलाया, जैसे उसने कुछ समझ लिया हो और कुछ नहीं भी।

सूरज पीपल की छतरी से नीचे उतर रहा था। गली में वो पीली रोशनी आ रही थी जो दिन में कभी नहीं आती और रात में कभी नहीं टिकती। उस्ताद की दुकान का शटर अब भी आधा गिरा था। अस्पताल के गेट के सामने किसी ने पीली पट्टी नहीं बदली थी, काग़ज़ वहीं चिपका था। मैंने मन में गिना — आज रात बारह बजे सीढ़ी बंद। सात घंटे बाकी।

और मैं यहाँ खड़ा था, एक टूटी मेज़ के पीछे, दो चाय की केतलियों के खाली होने का इंतज़ार करते हुए।

तभी सामने वाली गली से एक औरत आई।

कद मझोला। उम्र शायद चालीस के आसपास। सिर पर फीका हरा दुपट्टा, जिसके किनारे पीले पड़ गए थे। साड़ी धोती हुई, पर उतनी ही साफ़ जितनी साफ़ करके भी पुरानी दिखती है। पैर नंगे नहीं थे, पर चप्पल इतनी घिसी थी कि आवाज़ नहीं कर रही थी।

वो चुपचाप मेज़ के सामने आकर खड़ी हो गई।

उसके हाथ में एक पलड़ा था।

पीतल का। पुराने तराज़ू का एक पलड़ा, जिसका एक किनारा मुड़ा हुआ था और जिसमें से टाँग टूटकर लटक रही थी। ज़ंग लगी, पर पीतल अब भी वहाँ-वहाँ चमक रहा था जहाँ किसी के हाथ ने उसे बरसों छुआ था।

उसने पलड़ा मेज़ पर नहीं रखा। दोनों हाथों से सीने से लगाए रखा, जैसे कोई बच्चा हो।

"आपका नाम?" मैंने पूछा।

"बाद में," उसने कहा। आवाज़ सूखी थी, जैसे दिन भर किसी ने कुछ न पिया हो।

"ठीक है," मैंने कहा। "बैठिए।"

"नहीं।"

"तो खड़ी रहिए। पर एक बात पहले सुन लीजिए। यहाँ मरम्मत मुफ़्त नहीं है। किसी भी चीज़ को जोड़ने के लिए दो लोगों में सच्ची बात जुड़नी पड़ती है। झूठ बोलेंगी तो चीज़ वैसी ही रहेगी।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। थकान थी। वो थकान जो बहुत लंबी सफ़र के बाद आती है और जिसमें इंसान को यह भी याद नहीं रहता कि वो कहाँ जा रहा था।

"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं इसलिए आई हूँ।"

और तभी मेरी जेब में घंटी धीरे-से हिली।

कोई अंक नहीं, कोई हिसाब नहीं। बस एक आवाज़, इतनी धीमी कि मुझे लगा कि शायद मैंने सुना नहीं, खुद से कहा हो।

"ये औरत झूठ बोलेगी। तोलकर सुनना।"

॥

"ये औरत झूठ बोलेगी। तोलकर सुनना।"

घंटी की आवाज़ जेब में घुल गई, जैसे चाय में गुड़ घुल जाता है। मैंने हाथ जेब पर रखा और सामने खड़ी औरत को देखा। वो पलड़ा सीने से चिपकाए खड़ी थी, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को भीड़ में छिपाए खड़ी हो।

"नाम बताइए," मैंने फिर कहा। "बाद में नहीं, अभी। यहाँ नाम के बिना हिसाब नहीं खुलता।"

उसने पलड़े पर से नज़र हटाई। आवाज़ सूखी थी, पर शब्द साफ़।

"नसीमा बाई। गली के मुँह पर छोटी राशन की दुकान है। नसीमा राशन भंडार।"

"अच्छा," मैंने कहा। "वो दुकान जिसके बाहर दाल की बोरियाँ रखी रहती हैं और जिसके शटर पर पीली पट्टी चिपकी है?"

"हाँ। वही।"

"तो बैठिए।"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं बैठने नहीं आई। मैं तराज़ू ठीक कराने आई हूँ।"

मैंने मेज़ पर रखी सात टूटी चीज़ों की तरफ़ देखा। सानिया की गुड़िया, गुड्डू की घड़ी, चिंटू का केतली का ढक्कन, भोला भाई का रेडियो, पतंग, एक बिना काँटे की घड़ी और अब ये पलड़ा। सात में से एक भी ठीक नहीं हुआ था। मेज़ के पीछे लगा सफ़ेद बोर्ड हवा में हिल रहा था, जिस पर मैंने खुद पेंट से लिखा था — टूटी चीज़ लाओ, टूटा रिश्ता साथ लाओ।

"दीदी," मैंने कहा, "तराज़ू ठीक हो जाएगा। पर पहले ये बताइए, आपकी तराज़ू में क्या टूटा है?"

"काँटा टेढ़ा हो गया है।"

"बस?"

"और क्या होगा?"

"पलड़ा?"

"ये दूसरा है। एक पलड़ा गिरकर टूट गया था। दूसरा मैंने संभालकर रखा है।"

मैंने हाथ बढ़ाया। उसने पलड़ा नहीं दिया। मैंने हाथ वापस नहीं खींचा, हवा में ही रखा। उसने मेरी आँखों में देखा, फिर धीरे से पलड़ा मेरी हथेली पर रख दिया। पीतल ठंडा था। किनारा मुड़ा हुआ था, टाँग टूटकर लटक रही थी, पर जहाँ-जहाँ किसी के हाथ ने उसे बरसों छुआ था, वहाँ पीतल अब भी चमक रहा था।

"ये तो आधे घंटे का काम है," मैंने कहा। "टाँग जोड़ दूँगा, किनारा सीधा कर दूँगा। पर दीदी, ये पलड़ा अकेला नहीं टूटा। तराज़ू का काँटा टेढ़ा है, मैंने दुकान से देखा है। वो भी ठीक हो जाएगा। असली सवाल ये है कि आपकी तराज़ू से सामान तोलना कब बंद हुआ?"

उसने नज़र नीचे कर ली।

"जब से लोग कहने लगे कि मैं कम तोलती हूँ।"

"कब से?"

"तीन हफ़्ते से।"

"और आपने तोलना बंद कर दिया?"

"मैंने नहीं, लोगों ने आना बंद कर दिया।"

मैंने पलड़ा मेज़ पर रखा और उसके सामने वाली खाली कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।

"दीदी, एक बात सुन लीजिए। यहाँ मरम्मत मुफ़्त नहीं है। मैं लोहा जोड़ सकता हूँ, पर उसके लिए दो इंसानों के बीच एक सच्ची बात जुड़नी पड़ती है। झूठ बोला, तो चीज़ वैसी ही रहेगी।"

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में डर नहीं था। थकान थी। वो थकान जो लंबे सफ़र के बाद आती है, जिसमें इंसान को याद भी नहीं रहता कि वो कहाँ जा रहा था।

"मुझे पता है," उसने कहा। "मैं इसलिए आई हूँ।"

"तो फिर बताइए, किसका रिश्ता टूटा है?"

"मैंने कहा न, तराज़ू टूटी है।"

"तराज़ू लोहा है, दीदी। लोहे से रिश्ता नहीं टूटता।"

वो कुछ नहीं बोली। बस पलड़े को फिर उठाकर सीने से लगा लिया।

तभी मेरी जेब में घंटी हिली। धीरे-से, जैसे कोई कान के पास आकर साँस छोड़े।

"यहाँ लोहा नहीं टूटा। तोलने वाला टूटा है।"

मैंने होंठ कसे। टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था। उसने पूछा, "उस्ताद, क्या हुआ?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "दीदी, आपकी दुकान चलिए। मुझे तराज़ू देखना है।"

"अभी?"

"अभी। सूरज डूबने से पहले।"

उसने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया। "दुकान पर मेरा बेटा है। साजिद।"

"तो बेहतर है," मैंने कहा। "दो लोग होंगे तो जुड़ाई जल्दी होगी।"

उसने कुछ ऐसा देखा जैसे मैंने कोई गलत बात कह दी हो।

"साजिद से उम्मीद मत रखिए," वो बोली। "वो अब दुकान में मन ही नहीं लगाता।"

चलते वक़्त मैंने टिंकू को टूलबॉक्स उठाने को कहा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू भी पीछे लग गए। सानिया ने कहा, "उस्ताद, हम भी चलें?"

"तुम लोग यहाँ रुको," मैंने कहा।

"पर हमें भी देखना है," चिंटू ने कहा।

"देखना है तो खिड़की से देखना।"

"आप हमें बाहर रखेंगे, और अंदर कुछ बड़ा हो जाएगा," सानिया ने कहा।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुम लोगों ने आज पहले ही एक पतंग जोड़ी है। बाकी काम बड़ों का है।"

"पतंग तो हमने जोड़ी थी," रफ़ीक़ ने कहा, और सानिया ने उसे कोहनी मारी।

गुमटी के पास पहुँचे तो शबनम आपा ने हमें रोक लिया।

"कहाँ?"

"दीदी की दुकान," मैंने कहा।

"नसीमा की दुकान?" उसने भौंहें चढ़ाईं। "उसका बेटा सुबह से बैठा है, मुँह लटकाए। दोपहर में मुझे चाय के पैसे भी नहीं दिए, कहता है हिसाब बिगड़ा है।"

"तो आपने दी?"

"दिया क्यों नहीं। पर ये लो, चाय पीकर जाओ। जोड़ केंद्र से कोई भूखा नहीं जाएगा। मेरी शर्त है।"

उसने तीन कुल्हड़ चाय के रख दिए। एक मैंने, एक टिंकू ने, एक नसीमा बाई ने हाथ में लिया पर पिया नहीं।

"तू जानती है उसे?" मैंने धीरे से पूछा।

"जानती हूँ," शबनम आपा ने कहा। "अच्छी औरत है। बस ज़ुबान ऐसी है कि मक्खन भी कह दे तो घी जल जाए।"

"बेटा?"

"साजिद?" उसने कुल्हड़ पोंछा। "बुरा लड़का नहीं है। बस उसके पापा दुकान छोड़कर गए थे, तब से इसे लगता है कि दुकान भी इसे छोड़ देगी।"

"पापा कहाँ गए?"

"यही तो," उसने कहा, "कोई नहीं जानता। कहते हैं शहर में काम करने गए थे। लौटे नहीं।"

नसीमा बाई ने चाय का कुल्हड़ वापस थाली में रख दिया। "अब चलिए," वो बोली। "देर हो रही है।"

दुकान गली के मुँह पर थी, जहाँ सड़क का शोर सबसे पहले आता है और सबसे आख़िर में जाता है। शटर आधा खुला था। अंदर दाल की बोरियाँ खुली पड़ी थीं, गुड़ की टोकरी पर कपड़ा ढका था, सरसों तेल की केन दीवार से टिकी थीं। दीवार पर लोहे का काँटा लटक रहा था, जिसका सिरा टेढ़ा था। तराज़ू का एक पलड़ा मेज़ पर रखा था, दूसरा नहीं था। जगह खाली थी, जैसे किसी ने दाँत तोड़ दिया हो।

साजिद बोरियों के पास लकड़ी के बक्से पर बैठा था। बीस साल का लड़का, दुबला, काले बाल आँखों पर गिरे हुए, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी और पेन। उसने हमें देखा तो पेन रख दिया।

"अम्मी," उसने कहा, "फिर किसी को बुला लाईं।"

"तराज़ू देखने आए हैं," नसीमा बाई ने कहा।

"तराज़ू ठीक कराने में पैसा लगेगा। हमारे पास पैसा नहीं है।"

"मैंने पैसे की बात नहीं की," मैंने कहा।

"आप कौन हैं?"

"अंकुश। साइकिल मरम्मत की दुकान, पीपल के नीचे।"

उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा। मेरे घुटने पर फटी जीन्स, उँगलियों पर ग्रीस, गले में पुरानी चाबी। उसकी नज़र चाबी पर रुकी, फिर हट गई।

"वही जोड़ केंद्र वाले हैं?" उसने कहा। "जो टूटी चीज़ें जोड़ते हैं?"

"हाँ।"

"और लोगों से माफ़ी माँगवाते हैं?"

"माफ़ी नहीं, सच बुलवाते हैं," मैंने कहा।

"यही सब है?" उसने हाथ फैलाया। "देखिए, दुकान में घाटा है। बिजली का बिल बढ़ा है, किराया देना है, उधार की बोरियाँ पड़ी हैं। और अम्मी को लगता है कि तराज़ू ठीक हो गया तो सब ठीक हो जाएगा।"

"साजिद," नसीमा बाई ने कहा।

"क्या? सच बोल रहा हूँ।"

"चुप रह।"

"क्यों चुप रहूँ? सच बोलने पर आपको गुस्सा आता है।"

मैं बीच में बैठ गया। बोरियों के पास एक खाली बोरा था, उस पर। नसीमा बाई खड़ी रहीं, साजिद बक्से पर बैठा रहा।

"भाई साहब," मैंने कहा, "एक बात सुन लो। तराज़ू और इंसान दोनों एक ही चीज़ हैं। ज़रा सब्र से तोलिए, वरना दोनों तरफ़ वज़न कम दिखता है।"

टिंकू हँस पड़ा। साजिद के होंठ हिले, फिर रुक गए।

"आप मज़ाक कर रहे हैं," उसने कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि यहाँ माहौल बहुत भारी हो रहा है। और भारी माहौल में तराज़ू भी हल्का तोलने लगता है।"

"दुकान का घाटा मज़ाक नहीं है।"

"कितना घाटा?"

"आपसे क्या?"

"बताओ न।"

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, "आठ हज़ार से ऊपर। उधार की बोरियाँ, बिजली का बिल, दुकान का किराया। और अब तराज़ू भी।"

"इतना कैसे?"

"क्योंकि लोग आना बंद कर रहे हैं। कहते हैं अम्मी कम तोलती हैं।"

"तुम क्या कहते हो?"

"मैं कहता हूँ कि तराज़ू टेढ़ा है, इसलिए तोल कम दिखता है। पर कौन सुनता है?"

नसीमा बाई ने कपड़े से हाथ पोंछे। उनके हाथ काँप रहे थे। "मैं कम नहीं तोलती," वो बोलीं, आवाज़ थोड़ी ऊँची। "मैंने आज तक किसी का हक़ नहीं मारा।"

"मैंने कहा कब कि आपने मारा?" साजिद उठ खड़ा हुआ। "मैं तो कह रहा हूँ कि ये दुकान अब नहीं चलेगी। मुझे कुछ और करना है।"

"क्या करना है?"

"नए बाज़ार में एक आदमी है। कहता है उसकी कंपनी में तनख्वाह अच्छी है, रहने की जगह भी देगा।"

नसीमा बाई ने उसकी तरफ़ देखा। "कौन आदमी?"

"एक आदमी है। सफ़ेद कुर्ता पहनता है। कहता है मेरे जैसे लड़कों को काम चाहिए।"

"तूने उससे बात की?"

"हाँ।"

"कब?"

"कुछ दिन पहले।"

"और मुझे नहीं बताया?"

"क्योंकि आप सुनती ही नहीं। आपको बस यही दुकान दिखती है।"

नसीमा बाई की आवाज़ तेज़ हो गई। "जाना है तो जा। मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"

कमरे में चुप्पी उतर गई। टिंकू ने टूलबॉक्स पकड़ लिया, जैसे कहीं भागना हो। साजिद के चेहरे का रंग उतर गया।

"ठीक है," वो बोला। "आपने कह दिया।"

"हाँ, कह दिया।"

"तो मैं चला जाऊँगा।"

"जा।"

"अम्मी—"

"जा, कह दिया न!"

वो आवाज़ इतनी ऊँची थी कि दुकान के बाहर खड़ी सानिया ने झाँककर देखा। मैंने हाथ उठाकर उसे रोका।

नसीमा बाई ने मुँह फेर लिया और बोरियों को ऐसे सीधा करने लगीं जैसे उनमें कुछ गिरा हो। पर कुछ नहीं गिरा था। बस उनके हाथ काँप रहे थे।

साजिद ने कॉपी उठाई, फिर पटक दी। "ये सब बेकार है," वो बोला। "आपको लगता है तराज़ू ठीक करके सब ठीक हो जाएगा। पर सच ये है कि मैं पहले ही उस आदमी से कुछ पैसे ले चुका हूँ।"

नसीमा बाई रुक गईं।

"कितने?"

"दो हज़ार।"

"किसलिए?"

"आपकी दवा के लिए।"

वो बोरियों के सहारे बैठ गईं। उनके घुटने जवाब दे गए, जैसे कोई अंदर से ताला खोल दे।

"तूने पैसे लिए?" वो धीरे से बोलीं। "बिना बताए?"

"आप मना करतीं।"

"तूने पैसे लिए?" उन्होंने फिर कहा, जैसे खुद को सुना रही हों।

"अम्मी—"

"मैंने तुझे पैसे माँगने को कहा था?"

"किससे माँगता? आपके पास था?"

"मैं किसी से माँग लेती।"

"किससे? उस पीपल वाले बुज़ुर्ग से? उनके पास खुद के लिए दवा नहीं है।"

मैंने बीच में टोका। "रुको।"

दोनों रुके।

"साजिद, एक बात साफ़ करो। ये पैसे तुमने नौकरी के लिए लिए या माँ की दवा के लिए?"

वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, "मैंने कहा न, दवा के लिए।"

"और उस आदमी ने पैसे किस बात के दिए?"

"कहता है चार दिन में शहर चलो। काग़ज़ पर अंगूठा लगाना है। बस।"

"काग़ज़?"

"कोई काग़ज़ है। मैंने पढ़ा नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि मुझे पढ़ना नहीं आता," वो झल्लाकर बोला। "स्कूल में रहा ही नहीं। हिसाब कर लेता हूँ, पढ़ना-लिखना कमज़ोर है। उस आदमी ने कहा, तुम्हें पढ़ने की ज़रूरत नहीं।"

मेरे पेट में एक ठंडी गोली घूम गई। सफ़ेद कुर्ता। अंगूठा। काग़ज़। ये बात मुझे पहचानी लगी। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला, जहाँ मनोज की सूची रखी थी, जहाँ वो पीला नोटिस मोड़ा था।

"वो काग़ज़ दिखा सकते हो?"

"क्यों?"

"देखना है।"

"आप कौन होते हैं?"

"अंकुश।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "और मुझे लगता है कि वो काग़ज़ तुम्हारे लिए नहीं, माँ के लिए है।"

साजिद की ज़ुबान रुक गई। उसने नसीमा बाई की तरफ़ देखा। वो अब भी उसी तरह बैठी थीं, बोरियों के सहारे, हाथ गोद में, आँखें ज़मीन पर।

घंटी मेरी जेब में फिर हिली।

"यहाँ लोहा नहीं टूटा। तोलने वाला टूटा है।"

मैंने दुकान के अंदर आँख घुमाई। दीवार पर टेढ़ा काँटा, मेज़ पर एक पलड़ा, खाली जगह। साजिद की लाल कवर कॉपी। उसके पीछे एक सफ़ेद कार्ड दिख रहा था, जिस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा नहीं, पर देख लिया।

"साजिद," मैंने कहा, "ये तराज़ू मैं आधे घंटे में ठीक कर सकता हूँ। पर तुम दोनों को कुछ करना पड़ेगा।"

"क्या?"

"एक-एक सच्ची बात। एक-दूसरे से। जो अंदर दबी है।"

साजिद हँसा। "ये कोई काम है? माँ से माफ़ी माँग लो और तराज़ू चल पड़ेगा?"

"माफ़ी नहीं," मैंने कहा। "सच। माफ़ी बाद में आएगी, पहले सच आता है।"

"बकवास है।"

"हो सकता है। पर तुम्हारी दुकान खुली है और वो सात टूटी चीज़ें बाहर मेज़ पर पड़ी हैं। मैं झूठ नहीं बोल रहा।"

नसीमा बाई उठीं। "मैं कुछ नहीं बोलूँगी," वो बोलीं। "मैंने बहुत बोला है। अब नहीं।"

"दीदी—"

"जो कहना है, ये कहे।" उन्होंने साजिद की तरफ़ देखा। "मैं सुन लूँगी।"

साजिद ने मुँह फेर लिया। "मुझे कुछ नहीं कहना।"

"ठीक है," मैंने कहा। "तो तराज़ू भी वैसा ही रहेगा।"

मैं उठने लगा। टिंकू ने टूलबॉक्स उठाया। साजिद ने कॉपी पकड़ी। नसीमा बाई ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गईं।

"दीदी, एक बात और," मैंने कहा। "आपने आज मुझे पलड़ा दिया, इसलिए मैं आपको एक बात देता हूँ। ये पलड़ा अकेला नहीं टूटा। आपकी तराज़ू का काँटा टेढ़ा है और आपके बेटे की जेब में एक सफ़ेद कार्ड है। दोनों एक ही आदमी के हैं, मुझे लगता है।"

नसीमा बाई ने साजिद की तरफ़ देखा। साजिद ने कॉपी के नीचे से कार्ड निकालकर जेब में डाल दिया।

"ये मेरा काम है," वो बोला।

"और ये मेरा काम है," मैंने कहा। "तुम दोनों का झगड़ा मैं नहीं सुलझाऊँगा। पर अगर तुम दोनों में से कोई भी आज एक सच्ची बात बोल दे, तो ये तराज़ू आधे घंटे में ठीक हो जाएगा।"

मैं दुकान से बाहर आया। धूप अब पीपल की जड़ तक पहुँच गई थी। बच्चे बाहर बैठे चुप थे। सानिया ने पूछा, "उस्ताद, झगड़ा हो गया?"

"थोड़ा," मैंने कहा।

"तराज़ू ठीक होगा?"

"देखते हैं।"

मैं पीपल के नीचे लौटा और मेज़ के पीछे बैठ गया। घंटी जेब में चुप थी, पर मुझे पता था वो सुन रही है।

मन में हिसाब चला। कुल अंक एक सौ अड़सठ थे। पतंग वाले जोड़ में दस कट गए। बचे एक सौ अठ्ठावन। छिपा दर्द देखने की शक्ति चालीस अंक की है। अगर मैं वो खर्च करूँ, तो एक सौ अठ्ठावन में से चालीस जाएँगे, एक सौ अठ्ठावन से उन्नीस निकलेंगे… मैंने गिनती को दिमाग़ में सीधा किया — एक सौ अठ्ठावन में से चालीस निकाले तो एक सौ अठ्ठावन में से एक सौ और अठ्ठावन निकले, यानी एक सौ अठ्ठावन में से चालीस कम, एक सौ अठ्ठावन में से… मैं उलझ गया। मैंने सिर हिलाया। मतलब साफ़ था — अंक कम हो जाएँगे। और कल बड़ी चीज़ें होने वाली थीं।

पर घंटी ने जो कहा था, वो मेरे अंदर चुभ रहा था।

तोलने वाला टूटा है।

मैं अपनी दुकान के उस पुराने तराज़ू के बारे में सोचने लगा जो पापा के औज़ारों के साथ पड़ा था। जब कभी वो ठीक करते थे, वो कहते थे, "काँटा टेढ़ा हो तो तोल कम दिखता है, और इंसान का दिल टेढ़ा हो तो हर बात कम दिखती है।"

मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल मेरी हथेली में ठंडा था।

"कितना?" मैंने धीरे से पूछा।

"चालीस अंक," घंटी ने कहा।

मैंने होंठ भींचे।

"पर सुन ले," घंटी ने कहा। आवाज़ अब साफ़ थी, जैसे कोई कान के पास नहीं, सीधे सिर के अंदर बोल रहा हो। "जो दर्द तू आज देखेगा, वो तेरे अंदर भी एक दरवाज़ा खोल देगा।"

मैंने घंटी को जेब में वापस रखा। दूर दुकान के आधे शटर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी। साजिद की कॉपी उसी मेज़ पर खुली थी। नसीमा बाई बोरियों के पास खड़ी थीं। और बीच में वो टेढ़ा काँटा लटका था, जैसे कोई सवाल।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। "उस्ताद, क्या करना है?"

मैंने टूलबॉक्स उठाया।

"पहले देखना है," मैंने कहा। "कि इस तराज़ू में असली में क्या टूटा है।"

और मैं उस दुकान की तरफ़ बढ़ा, जहाँ एक औरत अपने बेटे से कह चुकी थी कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, और एक लड़का अपनी माँ से कह चुका था कि मैं चला जाऊँगा।

दोनों झूठ बोल रहे थे। और दोनों को पता था।

॥

मैं दुकान के अंदर घुसा। पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा, तो टिंकू मेरे पीछे आ गया। उसके हाथ में मेरा पुराना टूलबॉक्स था, जो उससे भारी था, इसलिए वो दोनों हाथों से उसे सीने से चिपकाए चल रहा था।

"उस्ताद, मैं अंदर आऊँ?"

"नहीं," मैंने कहा।

वो रुक गया। मैंने उसका चेहरा देखा। उसमें वो सवाल था जो उसने पूछा नहीं था — कि तुम मुझे अकेले क्यों छोड़ रहे हो।

"टिंकू," मैंने कहा, "तू बाहर बैठ। मेज़ के पास। धूप में। जो भी आए, कह देना उस्ताद अंदर काम में हैं। और किसी को अंदर मत आने देना।"

"नसीमा बाई आएँ तो?"

"ख़ास तौर पर उन्हें मत आने देना।"

टिंकू ने सिर हिलाया। उसने टूलबॉक्स ज़मीन पर रख दिया और पलटकर बाहर चला गया। मैंने कमरे का दरवाज़ा बंद किया।

अंदर अंधेरा था। एक ही बल्ब जल रहा था, वो भी गुनगुनाता हुआ, जैसे बूढ़ा आदमी सोते-सोते कोई पुरानी ग़ज़ल गा रहा हो। मैंने चारपाई पर बैठकर जेब से घंटी निकाली।

पीतल हथेली में ठंडा था। मैंने उसे एक बार हिलाया।

घन।

आवाज़ छोटी थी, पर कमरे की दीवारों से टकराकर वापस आई और मेरे कानों में बैठ गई।

"कितना?" मैंने पूछा।

"चालीस अंक," घंटी ने कहा। "छिपा दर्द। देखेगा तो भूल नहीं पाएगा।"

"मुझे दिखाना है।"

"सोच ले।"

"मैंने सोच लिया।"

घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, "आँख बंद कर।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

पहले कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ अंधेरा, और बल्ब की गुनगुनाहट, और दूर कहीं गली में किसी बच्चे की हँसी। फिर अंधेरा गरम होने लगा। मेरे सिर के अंदर एक दरवाज़ा खुला, जिसकी आवाज़ मैंने सुनी — चरचराती, जैसे बरसों से कोई उसे नहीं खोलता हो।

और मैं अंदर चला गया।

पहला दृश्य।

रात। नसीमा बाई की दुकान। शटर आधा गिरा हुआ, अंदर एक पीली बत्ती जल रही है। दाल की बोरियाँ एक तरफ़ ढकी पड़ी हैं, गुड़ की टोकरी ऊपर रखी है। नसीमा बाई फ़र्श पर चटाई बिछाकर बैठी हैं। उनके सामने एक लोहे की छोटी स्टूल है, और उस स्टूल पर तस्वीर रखी है — काँच के फ्रेम में। एक आदमी है उसमें, मूँछ वाला, कंधे सीधे, आँखों में हल्की सी शर्म।

नसीमा बाई उस तस्वीर के सामने एक स्टील की थाली रखती हैं। उस पर दो रोटियाँ हैं, एक कटोरी में सब्ज़ी, और एक गिलास में पानी। फिर वो हाथ जोड़कर बैठ जाती हैं।

"आज दाल महँगी हो गई," वो कहती हैं। आवाज़ धीमी है, जैसे कोई बच्चे को सुलाने के बाद बात कर रहा हो। "पर तू चिंता मत कर। मैंने तेरे हिस्से की दाल अलग रख दी है। साजिद ने पूछा भी नहीं।"

वो चुप हो जाती हैं। तस्वीर देखती हैं।

"क्या करूँ, बता," वो कहती हैं। "वो कहता है शहर जाऊँगा। कहता है यहाँ कुछ नहीं है। और मैं सोचती हूँ — यहाँ क्या है? ये दुकान? ये तराज़ू? ये दाल की बोरी जिसमें चूहे घुस गए हैं?"

वो अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करती हैं। फिर धीरे से बोलती हैं —

"मुझे एक बात का डर है। ये तराज़ू का नहीं है। ये किसी को नहीं बताया।"

वो रुक जाती हैं।

"मुझे डर है कि बुढ़ापे में मेरा नाम भी कोई नहीं पूछेगा। कि किसी दिन मैं यहाँ बैठी मर जाऊँगी, और दो दिन तक किसी को पता नहीं चलेगा। साजिद शहर में होगा। वो मेरा नाम सुनकर भी नहीं लौटेगा, क्योंकि वो सोचेगा — अम्मी तो खुद ही कहती थीं, मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"

वो तस्वीर की तरफ़ देखती हैं।

"मैंने झूठ कहा था, सुनील। तुझसे नहीं, उससे। मैंने कहा था — मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। और अब वो जाने को तैयार बैठा है। और मैं उससे कह भी नहीं सकती कि रुक जा, क्योंकि कहने की हिम्मत नहीं है।"

उनकी आवाज़ टूटती है। वो अपने हाथ से मुँह ढक लेती हैं। छोटी, सिसकती सी आवाज़ निकलती है — ऐसी आवाज़ जो बहुत बरसों से अंदर दबी थी।

मैंने आँख खोली। हाथ काँप रहा था।

लेकिन घंटी ने कहा था — दोनों।

दूसरा दृश्य शुरू हुआ, और वो कमरे का नहीं, दुकान के पीछे छत का था।

साजिद। वो आधी रात को छत पर बैठा है। नीचे दुकान का शटर गिरा हुआ है, और ऊपर वो चादर ओढ़े बैठा है। उसके हाथ में लाल कवर वाली कॉपी है, पर वो उसमें नहीं देख रहा। वो आसमान देख रहा है, जिसमें एक तारा भी ठीक से नहीं दिख रहा।

वो फ़ोन निकालता है। स्क्रीन जलती है। उस पर एक नंबर है, बिना नाम का। वो उँगली रखता है, फिर हटा लेता है। फिर फिर रखता है।

और फिर बोलता है — धीरे से, जैसे खुद से।

"मुझे पढ़ाई नहीं आती। मुझे हिसाब नहीं आता। मुझे दुकान चलानी नहीं आती। माँ सोचती है मैं आलसी हूँ। मैं आलसी नहीं हूँ, मैं डरा हुआ हूँ।"

वो कॉपी खोलता है। उसमें नंबर भरे हैं, पर उलटे-सीधे, कुछ काटे हुए।

"जब वो दुकान में खड़ी होती हैं, तो सब कुछ ठीक चलता है। जब मैं अकेला होता हूँ, तो काँटा टेढ़ा लगता है। मैं हर बार सोचता हूँ कि कोई मुझे ठग रहा है। और फिर मैं कम तोल देता हूँ, ताकि मैं ठगा न जाऊँ। और फिर वो आती हैं और सबके सामने मेरा हाथ पकड़कर कहती हैं — ये क्या किया?"

वो कॉपी बंद करता है।

"शहर जाना आसान है। यहाँ रहना मुश्किल है। यहाँ हर दिन माँ की आँखों में यही सवाल है — तू क्या करेगा? और मैं जवाब नहीं दे पाता। इसलिए मैं भाग रहा हूँ। और मुझे पता है ये भागना है, कोई नौकरी नहीं।"

वो चुप हो जाता है। फिर बहुत धीरे कहता है, "पर अगर मैं चला गया और वो अकेली रह गई, तो मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा कोई। खुद मैं भी नहीं।"

मैंने आँखें खोलीं। मेरा गला सूख रहा था।

और तभी, आख़िरी झलक आई — छोटी, बिना बुलाए।

अस्पताल का नीचे वाला कमरा। वही पीली दीवार, वही पुराना लोहे का पलंग। माँ लेटी हैं। उनके हाथ पतले हैं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा है। उनकी आँखें बंद हैं, पर वो सो नहीं रही हैं — उनके होंठ हिल रहे हैं, जैसे कोई नाम ले रही हों, या कोई हिसाब कर रही हों।

और मैं देख रहा हूँ कि उनके हाथ के नीचे, तकिये के नीचे, एक काग़ज़ दबा है। वही काग़ज़ जो सात सौ इकहत्तर रुपये वाला है। जिस पर उन्होंने लिखा है कि जाँच में कुछ निकले तो लिफ़ाफ़ा काजल को देना, अंकुश को नहीं।

मेरा हाथ काँपने लगा।

कमरा घूमने लगा। मैंने घंटी को मज़बूती से पकड़ा।

"बस," मैंने कहा। "बस, बंद कर।"

और घंटी ने कहा, "चालीस अंक। अब एक सौ अठारह।"

फिर कमरा वापस आया। बल्ब अब भी गुनगुना रहा था। मैं चारपाई पर बैठा था, और मेरे माथे पर पसीना था।

मैंने घंटी को जेब में रखा। फिर हटाया। फिर सामने मेज़ पर रख दिया।

और मैं चुप बैठा रहा।

कितनी देर, पता नहीं। बाहर से टिंकू की आवाज़ आई — "उस्ताद?" — और फिर कुछ नहीं। मैंने जवाब नहीं दिया।

मन में नसीमा बाई का चेहरा आ रहा था। वो अकेली बैठी थीं, तस्वीर के सामने रोटी रखकर, और कह रही थीं — "मुझे तेरी ज़रूरत नहीं" — ये वो अपने बेटे से कह रही थीं, और अंदर से काँप रही थीं कि कहीं वो सच में चला न जाए।

और साजिद का चेहरा आ रहा था। वो छत पर बैठा था, कॉपी सीने से लगाए, और कह रहा था — मैं आलसी नहीं हूँ, मैं डरा हुआ हूँ।

मैंने देखा कि दोनों एक ही डर के दो सिरों पर बैठे थे। माँ डर रही थी कि बेटा छोड़ जाएगा। बेटा डर रहा था कि माँ उसे कभी काबिल नहीं मानेगी। और दोनों इसे कहने की जगह बहस कर रहे थे।

और तीसरी झलक… मैं उसे सोचते ही रुक गया। माँ, अस्पताल में, अकेली। तकिये के नीचे काग़ज़।

मैंने घंटी को उठाया। हथेली में भींचा।

धीरे से बोला, "आज केंद्र नहीं खुलेगा।"

घंटी चुप रही।

"आज सिर्फ़ एक काम है," मैंने कहा।

बाहर आया तो टिंकू सचमुच धूप में बैठा था। मेज़ पर सात टूटी चीज़ें पड़ी थीं — गुड़िया, घड़ी, ढक्कन, रेडियो, आधी पतंग, बिना काँटे की घड़ी और पलड़ा। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू चारों पीपल की जड़ के पास बैठे थे।

"उस्ताद," टिंकू उठा। "कुछ हुआ?"

"केंद्र आज बंद," मैंने कहा।

सब एक साथ बोल पड़े — क्यों, कब तक, फिर वो सात चीज़ें क्या होंगी?

"सुनो," मैंने कहा। सब चुप हुए।

"आज कुछ नहीं ठीक होगा। आज हम सिर्फ़ एक काम करेंगे। हमें उस आदमी का नाम चाहिए।"

"कौन सा आदमी?" सानिया ने पूछा।

"सफ़ेद कुर्ते वाला। जो बच्चों को टॉफ़ी देता है, बुज़ुर्गों को कंबल, और जवान लड़कों से बिना पढ़े अंगूठा लगवाता है।"

रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "वो तो सफ़ेद गाड़ी में आता है। चारों तरफ़ शीशे।"

"हाँ," मैंने कहा। "और जब तक हम उसका नाम नहीं जानेंगे, कोई काग़ज़ बंद नहीं होगा।"

मैंने सात चीज़ों को उठाकर टूलबॉक्स में रखा और बोर्ड को कपड़े से ढक दिया।

सानिया ने देखा, बोली, "तो ये सब यूँ ही पड़ी रहेंगी?"

"टूटी चीज़ें पड़ी रह सकती हैं," मैंने कहा। "इंसान नहीं।"

वो समझी नहीं, पर उसने सवाल नहीं किया।

दोपहर ढलने लगी। मैं अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे में लौटा। कमरा अब भी वैसा ही था — चारपाई, लोहे की अलमारी, ट्रंक, गुनगुनाता बल्ब। पर अब लग रहा था कि कमरे में मेरे अलावा भी कोई है। वो नसीमा बाई और साजिद का दर्द था, जो हवा में लटका था, और जाने का नाम नहीं ले रहा था।

मैं चारपाई पर बैठ गया।

फिर घंटी निकाली।

"एक बात पूछनी है," मैंने कहा।

"पूछ।"

"आज उस झलक में… जो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी दिखा। जब वो साजिद के कान में कुछ कह रहा था। वो क्या था?"

घंटी चुप रही। मुझे लगा वो नहीं बोलेगी। फिर उसकी आवाज़ आई — और इस बार उसमें वो रूखापन नहीं था जो हमेशा रहता था। इसमें कुछ और था। थकान।

"तूने झलक में सुना नहीं?" घंटी ने कहा।

"थोड़ा-थोड़ा।"

"सुन ले पूरा। जब तू साजिद के पास खड़ा था, तब भी वो वहाँ था। खंभे के पीछे। सफ़ेद कुर्ता। काले जूते। उसकी उँगली में वो अंगूठी थी जो तेरे पापा के काग़ज़ की रात से जुड़ी है। और वो साजिद से कह रहा था — बेटा, तेरी माँ की दुकान के काग़ज़ साहब के पास सुरक्षित हैं। जब तक अंगूठा नहीं लगा, काग़ज़ नहीं मिलेंगे। और जब तक काग़ज़ नहीं मिलेंगे, माँ की दवा रुकी रहेगी।"

मेरा हाथ भींच गया।

"तो वो वही है," मैंने कहा।

"हाँ। वही है। और वो तेरे पापा के काग़ज़ की रात भी था। और उसने सिर्फ़ साजिद से बात नहीं की।"

"किससे की?"

घंटी चुप हो गई।

"किससे की?" मैंने फिर पूछा।

"तेरे घर के उस दरवाज़े के पीछे जो सोई चीज़ है," घंटी ने कहा, "वो भी उसी से जुड़ी है।"

मैं उठ खड़ा हुआ। कमरे में घूमने लगा। दीवारों से टकराया, वापस आया।

"तू मुझे सीधा जवाब क्यों नहीं देती?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैं छिपाना चाहता था।

"क्योंकि मैं सीधा जवाब नहीं जानती," घंटी ने कहा। "मैं सिर्फ़ जोड़ देखती हूँ। नाम मुझे नहीं पता। साया पता है।"

मैं रुका। "साया?"

"नाम का साया। जब किसी आदमी का नाम सब जगह मिटा दिया जाए, और लोग सिर्फ़ उसकी तारीफ़ करें, तो बचता है साया। उसका साया तेरे पापा के काग़ज़ पर लगे अंगूठे में है, साजिद के सफ़ेद कार्ड में है, और उस रात में है जब घंटी तोड़ी गई थी।"

मैंने घंटी को मुट्ठी में कस लिया।

"तो आज मरम्मत नहीं होगी," मैंने कहा। "आज मुझे उस आदमी का नाम चाहिए।"

"नाम नहीं," घंटी ने कहा, और आवाज़ धीमी हो गई। "नाम का साया।"

कमरा फिर चुप हो गया।

मैं बाहर आया। शाम पाँच बज रही थी। गुमटी की तरफ़ से शबनम आपा का बुलावा आया — "अंकुश, चाय!" — पर मैंने हाथ उठाकर मना कर दिया। वो पीपल के नीचे आई, पीतल की थाली में कप लेकर।

"क्या हुआ?" उसने पूछा। और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी, सिर्फ़ सीधा सवाल।

"आपा," मैंने कहा, "सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने साजिद से क्या कहा, आप अंदाज़ा लगा सकती हैं?"

वो रुकी। थाली पीपल की चबूतरी पर रखी।

"अंदाज़ा नहीं," उसने कहा। "सुना है मैंने। उस दिन गुमटी पर आया था। साजिद को कोने में बुलाकर कह रहा था — तेरी माँ के पास कुछ काग़ज़ हैं, उन्हें साहब के पास रखना होगा। बेटा, जवान है, समझ जाएगा।"

"और आपने कुछ कहा नहीं?"

"मैंने कहा था — भाई साहब, चाय पी जाइए।" उसने पल्लू ठीक किया। "पर जब वो मुड़ा, तो मैंने उसकी जेब से एक काग़ज़ का कोना बाहर निकला देखा। नीली स्याही थी उस पर। और वो काग़ज़ ठीक वैसा था जैसा तेरे पापा के बंडल में था।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"आपने किसी को क्यों नहीं बताया?"

"किसको बताती?" उसने कहा। "तेरे पापा से? जो खुद उसी दिन से चुप थे?" उसने कप उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "चाय ठंडी हो रही है। पी ले।"

मैंने कप लिया।

शाम को बच्चे गली में खेलने लगे। सानिया और रफ़ीक़ ने फिर पतंग बनानी शुरू की। गुड्डू ने चिंटू की रिम लेकर उसे सड़क पर घुमाया। टिंकू मेरे पास बैठा रहा, चुप।

"उस्ताद," उसने कहा, "आपने अंदर जाकर क्या देखा?"

"बहुत कुछ," मैंने कहा।

"डरावना था?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। तेरह साल का लड़का, घुटने पर पट्टी, आँखों में सवाल।

"डरावना नहीं," मैंने कहा। "दुखद था।"

"फ़र्क़ क्या है?"

"डरावना तब होता है जब कोई तुझे डराना चाहता है। दुखद तब होता है जब कोई खुद डरा हुआ हो और कह न पा रहा हो।"

टिंकू ने सोचा। फिर बोला, "तो नसीमा बाई डरी हुई हैं?"

"बहुत।"

"और साजिद भाई?"

"वो भी।"

"तो फिर वो झगड़ते क्यों हैं?"

"क्योंकि डर को भी बोलना होता है," मैंने कहा। "और जब इंसान उसे माँ-बेटे की ज़ुबान में नहीं बोल पाता, तो वो बहस बनकर निकलता है।"

टिंकू चुप बैठा रहा। फिर उसने कहा, "उस्ताद, मेरी माँ भी रोज़ डाँटती हैं।"

"तेरी माँ भी डरी हुई है," मैंने कहा। "उसका डर है कि तू बड़ा होकर क्या करेगा। और उसे पता नहीं कि वो तुझे कैसे बताए।"

टिंकू ने सिर नीचा कर लिया।

फिर मैंने उसका कंधा थपथपाया और उठ गया। मुझे घर जाना था।

घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थीं। काजल दवा की प्लास्टिक थैली लेकर आई थी और चुपचाप रख रही थी। पापा अपने औज़ारदान के पास बैठे थे, कुछ पोंछ रहे थे।

मैंने कुछ नहीं कहा। सीधे छत पर चला गया।

रात हो चली थी। गली की बत्तियाँ जल रही थीं। नीचे से किसी के हँसने की आवाज़ आ रही थी। मैंने घंटी निकाली और हथेली में रखकर देखा।

फिर मन में वो दृश्य आया — साजिद, खंभे के पीछे वो सफ़ेद कुर्ता, और मुझे साफ़ सुनाई दिया — "तेरी माँ की दुकान के काग़ज़ साहब के पास सुरक्षित हैं।"

मैंने होंठ भींचे।

"तेरे पास दुकान के काग़ज़ कैसे पहुँचे?" मैंने धीरे से पूछा, जैसे खुद से। "किसने दिए?"

घंटी चुप रही।

मैंने उसे फिर हिलाया।

घन।

"पूछ," घंटी ने कहा।

"क्या तू जानती है कि वो आदमी साजिद को दुकान के काग़ज़ कैसे देता है?"

"काग़ज़ नहीं देता," घंटी ने कहा। "काग़ज़ लेता है। और बदले में काग़ज़ देता है। यही तो उसका तंत्र है।"

मैं हिल गया।

"मतलब — वो सिर्फ़ अंगूठा नहीं लेता। वो पहले कुछ लेता है, फिर देता है। और फिर वो लिया हुआ हमेशा उसके पास रहेगा।"

"हाँ।"

"तो फिर — मेरे पापा के साथ भी?"

घंटी चुप रही।

"क्या पापा से भी पहले कुछ लिया गया था?"

"तेरे पापा के पास क्या था जो उसने लिया?"

मैंने सोचा। फाइल? नहीं। माँ का इलाज? नहीं। फिर मुझे याद आया — उस्ताद ने उस रात कहा था कि उनकी पुरानी दुकान से पापा ने पच्चीस साल पहले साइकिल गिरवी रखी थी। और उस साइकिल पर घंटी थी।

"उसने पापा से घंटी ली थी," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी।

"नहीं," घंटी ने कहा। "उसने घंटी नहीं ली। उसने घंटी की राह देखी। और जब मिली, तो उसने उसे तोड़ा।"

मैं छत पर खड़ा रह गया।

रात की हवा चल रही थी। नीचे गली में कहीं बच्चा रो रहा था। और मेरे हाथ में पीतल की घंटी थी, जो मेरे खानदान की थी, जिसे कोई तोड़ना चाहता था, और जिसे तोड़ने वाला आज भी ज़िंदा था।

मैंने उसे मुट्ठी में दबाया।

"आज मरम्मत नहीं," मैंने धीरे से कहा। "आज पहले उस आदमी का नाम चाहिए।"

घंटी ने बहुत धीमे से कहा, "नाम नहीं। नाम का साया।"

और उसके बाद वो चुप हो गई।

मैं देर तक छत पर खड़ा रहा। ऊपर आसमान था, जिसमें तारे थे, पर मुझे अब भी साजिद के चेहरे पर वो नंबर दिख रहा था — बिना नाम का नंबर, जिसे वो उँगली से छू रहा था और हटा रहा था।

मुझे लगा कि उस रात उस सफ़ेद कुर्ते वाले की बात ने किसी और से भी कुछ कहा होगा। किसी ऐसे से, जो मेरे ही घर में था।

मैं नीचे उतरा। पापा अब भी औज़ारदान के पास बैठे थे। उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा, पर उनका हाथ रुक गया था।

"पापा," मैंने कहा।

वो नहीं बोले।

"पापा, उस आदमी ने आपसे घंटी के अलावा कुछ और माँगा था?"

उन्होंने धीरे से सिर उठाया। आँखें थकी हुई थीं। उन्होंने कुछ सोचा, फिर बोले — "उसने कुछ नहीं माँगा। उसने बस देखा। और जब कोई बस देखता है, तो समझ लो कि वो लेने आया है।"

वो फिर झुक गए।

मैं वहीं खड़ा रहा।

और मेरे हाथ में घंटी थी, और घंटी के अंदर एक नाम का साया था, जो अभी बाहर आने को बेचैन था।

अगली सुबह, सभा में, रज़ा सलीम रजिस्टर लाने वाला था। और मैं जानता था कि उस रजिस्टर में सिर्फ़ सात नाम नहीं थे। वहाँ एक आठवाँ भी था — बिना नाम का। और वही सबसे खतरनाक था।

मैंने घंटी को जेब में रखा।

और सोचा — कल सुबह, पीपल के नीचे, सिर्फ़ रजिस्टर नहीं खुलेगा। एक नाम का साया भी खुलेगा। और उसे खोलने के लिए मुझे वो आदमी चाहिए — वो नहीं, जो सफ़ेद गाड़ी में आता है, बल्कि वो, जो सफ़ेद कुर्ते में चलता है और किसी के काग़ज़ किसी और के हाथ में रख देता है।

मैंने छत से नीचे देखा। गली सो रही थी। नसीमा बाई की दुकान का शटर गिरा था। साजिद की छत पर चादर हवा में हिल रही थी।

और मुझे लगा — जब तक वो दोनों अपनी सच्ची बात नहीं कहेंगे, तराज़ू नहीं जुड़ेगा। पर आज रात मुझे तराज़ू नहीं चाहिए था।

आज रात मुझे उस आदमी का नाम चाहिए था।

घंटी ने कहा था — नाम नहीं, नाम का साया।

तो फिर, कल, मैं साया ही खींचूँगा।

॥

शाम को जब मैंने पीपल के नीचे पहला दीया जलाया, तो हवा ने उसे एक बार झुकाया और फिर छोड़ दिया। दीया बुझा नहीं। बस झुककर फिर सीधा हो गया।

मैंने देखा और सोचा — आज की शाम कुछ वैसी ही है।

सूरज स्कूल की छत के पीछे जा रहा था। आसमान में नारंगी और धूल मिलकर ऐसा रंग बना रहे थे, जैसे किसी ने पुरानी तस्वीर पर पानी फेर दिया हो। चबूतरी पर बुज़ुर्ग बैठे थे, बंसी बाबा, हाफ़िज़ बाबा, क़ादिर बाबा — सब एक ही चादर पर, कंधे से कंधा मिलाकर, जैसे पचास साल की चुप्पी का कोई हिसाब ही न हुआ हो।

पीपल के नीचे वो टूटी लकड़ी की मेज़ रखी थी, जिसे मैंने दुकान के पीछे से निकालकर ठीक किया था। उस पर सफ़ेद पेंट का बोर्ड टँगा था, जिस पर मेरी ही लिखाई में उलटे-सीधे अक्षर थे — जोड़ केंद्र। टूटी चीज़ लाओ। टूटा रिश्ता साथ लाओ। सच बोलोगे, तभी जुड़ेगा।

आज शाम यहाँ सात टूटी चीज़ें रखी थीं। सानिया की गुड़िया, जिसके सिर के पीछे के बाल और एक हाथ गायब था। गुड्डू की वो घड़ी, जिसमें न काँटे बचे थे, न काँच, सिर्फ़ पट्टा। चिंटू का तांबे की केतली का ढक्कन। भोला भाई का खुद तोड़ा हुआ रेडियो। आधी पतंग, जो पीपल की डाल में एक हफ़्ते फँसी रही थी। बिना काँटे की एक और घड़ी, जिसे रफ़ीक़ लाया था। और नसीमा बाई का पीतल का पलड़ा।

सातों अभी भी टूटे थे। एक भी ठीक नहीं हुआ था।

पर आज मेज़ पर एक और चीज़ रखी थी, जो टूटी नहीं थी। वो थी चाय के कुल्हड़ों की ट्रे, जिसे शबनम आपा खुद उठाकर लाई थीं।

"शर्त याद है ना," उन्होंने ट्रे मेज़ पर रखते हुए कहा। "मेरी गुमटी से चाय लेकर ही कोई यहाँ बैठेगा। यह जोड़ केंद्र है, कोई मुफ़्त की पंचायत नहीं।"

"आपा, आप हर बात में हिसाब लगा देती हैं," मैंने कहा।

"हिसाब से ही गली चलती है, बेटा। जिस दिन हिसाब टेढ़ा हुआ, उस दिन सब टेढ़े हो गए।" उन्होंने चिमटी से समोसे की प्लेट भी रख दी और बिना कुछ कहे अपनी गुमटी की तरफ़ लौट गईं।

बच्चे दीये जला रहे थे। सानिया और चिंटू स्टील की थाली में छोटे-छोटे दीये रखकर लाए थे, गुड्डू तेल की बोतल से ज़्यादा तेल अपनी कमीज़ पर गिरा रहा था, और रफ़ीक़ माचिस की डिब्बी को दोनों हाथों से पकड़े ऐसे खड़ा था, जैसे उसमें बारूद हो।

टिंकू हर दीये को क्रम से रखवा रहा था।

"पहला दीया पीपल के तने की तरफ़," वो कह रहा था, "दूसरा पूरब, तीसरा मेज़ के पास। दीया जलाने का भी नियम होता है, भाई।"

"तेरे पास हर चीज़ का नियम है," गुड्डू ने कहा।

"होता है। और जिसके पास नियम नहीं, उसके पास सिर्फ़ बहाने होते हैं।"

मैं मुस्कुराया। यह लड़का जिस दिन स्कूल जाएगा, वहाँ का मास्टर ज़रूर एक बार अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो जाएगा।

तभी गली के मुँह से नसीमा बाई आईं।

उनके हाथ में कुछ नहीं था। साड़ी का पल्लू कंधे पर था, माथे पर लाल टीका, और चेहरे पर वो थकान, जो रोज़ सुबह चूल्हे के धुएँ से शुरू होकर रात के हिसाब तक चलती है। उनके पीछे साजिद था। दुबला, कंधे अंदर की तरफ़ धँसे हुए, हाथ जेब में, और आँखें ज़मीन पर।

वो आकर मेज़ के सामने खड़े हो गए। नसीमा बाई ने आसपास देखा। चबूतरी पर बुज़ुर्ग, पीछे खड़े लोग, मीरा एक कोने में कैमरा नीचे किए, काजल हाथ में स्टील का गिलास लिए, और पापा — पापा गली की दीवार के सहारे खड़े थे, जैसे कोई सब कुछ देखने आया हो, पर किसी को दिखना नहीं चाहता हो।

"बैठिए," मैंने कहा और दो पुराने लकड़ी के स्टूल आगे कर दिए, जो मैं दुकान से उठाकर लाया था।

नसीमा बाई बैठीं। साजिद नहीं बैठा। वो माँ के पीछे खड़ा रहा।

"बेटा, बैठ," नसीमा बाई ने कहा।

"मैं खड़ा ठीक हूँ।"

शबनम आपा ने दो कुल्हड़ आगे बढ़ाए। दोनों ने लिए, पर किसी ने पिया नहीं।

मैंने एक दीया मेज़ के किनारे रखा और सबकी तरफ़ देखा।

"आज यहाँ कोई माँ नहीं है," मैंने कहा। "कोई बेटा नहीं है। कोई दुकानदार नहीं, कोई ग्राहक नहीं। आज यहाँ सिर्फ़ दो लोग हैं, जिन्होंने एक-दूसरे से कुछ नहीं कहा। और सुनो — जो नहीं कहा जाता, वही सबसे ज़्यादा तोलता है। तराज़ू का काँटा लोहे से नहीं टेढ़ा होता। वो उस बात से टेढ़ा होता है, जो हमने अंदर दबा रखी है।"

नसीमा बाई ने कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़ा। उनकी उँगलियों पर मेहंदी का उतरा हुआ रंग था और नाखूनों के किनारे गुड़ की चाशनी जैसी चमक।

कुछ देर कुछ नहीं हुआ। पीपल की पत्तियाँ हिलीं। दूर कहीं किसी के घर में कुकर की सीटी बजी और बंद हो गई। चिंटू ने बोलना चाहा, पर सानिया ने उसकी कमीज़ खींच ली।

फिर नसीमा बाई बोलीं।

"मैं जानती हूँ, तुम सब मुझे क्या कहते हो।" उनकी आवाज़ सामान्य थी, पर उसमें वो कंपन था जो आमतौर पर रोने से पहले आता है। "कम तोलने वाली। जिसे कोई भी तोल कर नहीं लेता। चार लोग ऐसे भी हैं, जो कहते हैं — अम्मा, तुम तोल देती हो, बस काँटा टेढ़ा है।"

वो रुकीं।

"मैंने अपनी सारी ज़िंदगी हिसाब में लगा दी। सुबह से आटा, चावल, दाल, गुड़। एक-एक पैसा ऊपर-नीचे। सुनील जब थे, तब भी यही हिसाब था। उनके जाने के बाद भी यही हिसाब है।" उन्होंने कुल्हड़ नीचे रखा। "और सच यह है, बेटा — मुझे अकेले रहने से डर लगता है।"

आवाज़ टूट गई।

"रात को शटर गिराती हूँ, तो लगता है कि आज कोई दरवाज़ा खटखटाएगा नहीं। चूल्हा जलाती हूँ, तो लगता है कि यह आग मेरे साथ ही बुझेगी। दुकान में घड़ी की टिक-टिक सुनती हूँ और सोचती हूँ — यह आवाज़ किसी और को सुनाई नहीं देती, सिर्फ़ मुझे देती है।"

उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, जो पहले से सीधा था।

"बेटे के लिए दुआ करती हूँ कि वो लौटे, और उसी बेटे को यह भी नहीं कह पाती कि तू मत जा। क्योंकि अगर कहूँगी, तो लगेगा कि मैं उसके पैरों में ज़ंजीर बाँध रही हूँ।" उन्होंने आँखों पर हाथ फेरा। "और उस दिन मैंने उससे जो कहा — मुझे तेरी ज़रूरत नहीं — वो मेरा शब्द नहीं था, बेटा। वो मेरा डर था जो मेरी ज़ुबान से बोल गया।"

गली में सन्नाटा था। इतना सन्नाटा कि पीपल की एक पत्ती गिरी और उसकी आवाज़ सबको सुनाई दी।

तभी साजिद बोला।

"माँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ से कुल्हड़ काँप रहा था और चाय के छींटे उसकी उँगलियों पर गिर रहे थे।

"माँ, मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता।"

उसकी आवाज़ पतली थी। जैसे किसी पुरानी साइकिल की चेन जो चढ़ी तो है, पर कड़ी घिस गई है।

"मैं रोज़ सुबह उठता हूँ और कॉपी खोलता हूँ। हर महीने वही लिखा होता है। घाटा आठ हज़ार से ऊपर, कभी नौ। दुकान का किराया, बिजली, तेरी दवा, और वो ब्याज जो मैंने किसी को नहीं बताया।" उसने एक गहरी साँस ली। "मैं हिसाब भूल सकता हूँ, पर ब्याज नहीं भूलता। वो रात-रात मेरे सिरहाने बैठकर गिनता है।"

मीरा ने कैमरा और नीचे कर दिया। शबनम आपा ने चिमटी रख दी। टिंकू ने अपनी कॉपी बंद कर दी, जिसमें वो हर बात लिखता था।

"जब दुकान की हालत देखता हूँ, तो लगता है कि मैं इस लायक़ ही नहीं हूँ। पढ़ाई में कमज़ोर हूँ, हिसाब में धीमा हूँ, बोलने में कमज़ोर हूँ। मेरे ही उम्र के लड़के साइट पर हज़ार कमाते हैं, और मैं माँ की दुकान पर बैठा रह जाता हूँ। बस — कभी-कभी लगता है कि भाग जाना ही एक रास्ता है। शहर चला जाऊँ, किसी गोदाम में काम कर लूँ, कोई मुझसे कुछ न पूछे।"

"तो तू जाना चाहता है?" नसीमा बाई ने पूछा। उनकी आवाज़ रुखी थी, पर उसमें माँ थी।

"नहीं।" साजिद ने कुल्हड़ मेज़ पर रख दिया, ऐसे जैसे अब उसे संभालना मुश्किल हो। "नहीं, माँ, मैं जाना नहीं चाहता। मैं डरता हूँ।"

वो रुका। उसके गले में कुछ अटका।

"मैं डरता हूँ कि कहीं मैं तुझे अकेला छोड़कर चला गया, और फिर कभी न लौटा, तो कोई मुझे तेरा बेटा नहीं कहेगा। और मैं यह भी डरता हूँ कि अगर यहीं रहा, तो एक दिन तेरी दुकान, तेरा घर, तेरी साड़ी — सब बिक जाएगा, और उसका इल्ज़ाम भी मुझ पर ही आएगा।"

वो अब सीधा माँ की तरफ़ देख रहा था। पहली बार।

"उस आदमी ने मुझे दो हज़ार दिए। कहा — यह तेरी माँ की दवा के लिए है, लौटाने की जल्दी नहीं। और कहा — जब वक़्त आएगा, मैं खुद तेरे पास आ जाऊँगा। मैंने पूछा, कब? तो वो हँसा और बोला — जब तेरी ज़रूरत सबसे ज़्यादा होगी।" साजिद ने अपनी जेब से वो मोड़ा हुआ सफ़ेद कार्ड निकाला और मेज़ पर रख दिया। "यह आज तक मेरी जेब से नहीं निकला। छत पर बैठकर रोज़ इसे छूता रहा। कभी सोचता — फेंक दूँ। कभी सोचता — नहीं, दुकान घाटे में है, रख ले। और रोज़ लगता कि मैंने माँ से बड़ा झूठ बोला है।"

वो फिर माँ की तरफ़ देखकर बोला।

"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता, माँ। बस डरा हुआ बेटा हूँ।"

नसीमा बाई कुछ देर उसे देखती रहीं। फिर उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया और उसका हाथ पकड़ लिया।

दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। और मैं खड़ा देख रहा था कि गली का सारा शोर कैसे रुक गया — शबनम आपा के गैस बर्नर की आवाज़, बच्चों की फुसफुसाहट, पीपल की पत्तियाँ। सब रुका हुआ।

साजिद ने हाथ नहीं छुड़ाया।

"मैं शहर नहीं जाऊँगा," उसने धीरे से कहा।

"क्यों?" नसीमा बाई ने पूछा। उनकी आवाज़ में शक नहीं था, सिर्फ़ थकान।

"क्योंकि तूने कहा था कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। और मैंने सोच लिया था कि ठीक है, मुझे भी किसी की ज़रूरत नहीं।" उसने हाथ और कसकर पकड़ा। "पर झूठ दोनों का था, माँ। तेरा भी, मेरा भी। अब नहीं बोलूँगा तो कब बोलूँगा।"

नसीमा बाई ने कुछ सोचा। फिर उन्होंने हाथ खींचकर अपने सीने से लगा लिया। उनकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे पर गिर गया।

"जाना हो, तो साथ लेकर जाना," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरी दुकान का ट्राली में क्या रखना है, मेरा हिसाब, मेरी चीज़ें — सब साथ। मैं तेरे पीछे की ज़ंजीर नहीं बनूँगी, पर तेरे साथ चलने में मुझे शर्म नहीं। बस एक बात — मुझे अकेले मत छोड़कर जाना। किसी भी हाल में मत छोड़ना।"

"नहीं छोड़ूँगा," साजिद ने कहा। उसकी आवाज़ अब पतली नहीं थी। वो भर गई थी। "और माँ, वो दो हज़ार — मैं कल उस आदमी को लौटा दूँगा। पक्का। मुझे उसके पैसे नहीं चाहिए।"

"लौटाने से पहले उसका नाम चाहिए," मैंने कहा।

वो दोनों मेरी तरफ़ मुड़े।

"क्योंकि जो पैसा नाम बताए बिना दिया जाता है, वो पैसा नहीं होता। वो लगाम होती है।"

साजिद ने वो सफ़ेद कार्ड उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे नहीं लिया।

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी इसे मेज़ पर उसी पलड़े के पास रखो। जब तक उस आदमी का नाम नहीं खुलता, यह यहीं रहेगा। गली की नज़र में।"

उसने कार्ड पलड़े के पास रख दिया और दोनों कदम पीछे हट गए, जैसे उस चीज़ से छुटकारा मिल गया हो।

मैंने टिंकू को इशारा किया।

"टूलबॉक्स।"

वो फ़ौरन दौड़ा। टूलबॉक्स लाया और मेज़ पर रख दिया। उसने टॉर्च भी जला दी, जबकि अभी पूरी रोशनी थी।

"टॉर्च की ज़रूरत नहीं, दिन है।"

"उस्ताद, बुरा वक़्त कभी भी आ सकता है।"

मैं हँस पड़ा। इसका कोई जवाब नहीं।

मैंने वो पीतल का पलड़ा उठाया। किनारा मुड़ा हुआ था, और जिस छोटी टाँग से वो तराज़ू की बाँह से लटकता है, वो नीचे से टूटी थी। पलड़े का रंग पीतल से ज़्यादा जंग जैसा लग रहा था, पर जहाँ पहले की सफ़ाई हुई थी, वहाँ से एक पतली पीली लकीर चमक रही थी। बरसों तक लोहे को किसी ने नहीं छुआ था, इसीलिए उसने अपनी चमक अपने अंदर ही छिपा रखी थी।

मैंने रेती निकाली। जंग छुड़ाने लगा।

"यह पलड़ा मेरे ससुर का है," नसीमा बाई ने कहा। "पुराने बाज़ार से तराज़ू आया था। सुनील के पापा का था। फिर हमारे पास आया। यही एक चीज़ मेरे पास बची है उनकी।"

"और कुछ नहीं बचा?" मैंने पूछा।

"और सब बिक गया," उन्होंने धीरे से कहा। "और सब बेचने के बाद भी हिसाब नहीं मिला।"

मैंने हथौड़ा उठाया। मेज़ पर लकड़ी का एक मोटा टुकड़ा रखा, पलड़े की टूटी टाँग को उस पर रखा और हल्के हाथ से ठोका। कोई जल्दी नहीं थी। पीतल ऐसी चीज़ है, जिसे ज़्यादा चोट लगा दो तो वो चटक जाता है, और मरम्मत की जगह बड़ी दरार बन जाती है।

पीछे से कोई बोला।

"उसकी टाँग की कड़ी तिरछी हो गई है। सीधी नहीं करोगे तो फिर टूटेगी।"

मैं रुका। मुड़ा।

पापा खड़े थे। हाथ में उनका पुराना पेचकस था, जो वो हमेशा जेब में रखते थे, जैसे किसी के ज़रिए ही निकलेगा।

"बैठिए," मैंने धीरे से कहा।

वो दो कदम आए। किसी ने कुछ नहीं कहा। और वो मेरे बगल में पलड़े के दूसरी तरफ़ बैठ गए।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उन्होंने नहीं देखा। बस पलड़ा उठाया, दोनों हाथों से घुमाया, और उँगली से टाँग की कड़ी की तरफ़ इशारा किया।

"इधर," उन्होंने कहा।

मैंने प्लायर उनकी तरफ़ बढ़ा दिया। उन्होंने लिया, बिना नाम लिए, बिना शुक्रिया। दबाकर मरोड़ी, फिर हथेली पर रखकर देखा।

"अब ठोक सकते हो।"

मैंने ठोका। एक, दो, तीन हल्के हाथ। पीतल धीरे-धीरे अपनी जगह पर लौट रहा था।

तभी घंटी ने कहा — "लील जगह पर। ज़्यादा नहीं।"

"लील?" मैंने धीरे से पूछा।

"मरम्मत में एक हिस्सा छोड़ना पड़ता है। जो सब कुछ जोड़ देता है, वो कभी-कभी तोड़ भी देता है।"

मैंने हथौड़ा नीचे रख दिया।

पापा ने पलड़े को उठाया, उँगली से किनारा सहलाया और मेरे हाथ पर रख दिया। फिर बिना कुछ कहे वहीं बैठे रहे। उनका पेचकस उनकी उँगलियों में घूमता रहा।

मैंने तराज़ू का काँटा उठाया। वो मेज़ के पीछे, लकड़ी के स्टैंड पर टिका हुआ था। मुड़ी हुई धातु, जिसे नसीमा बाई ने बरसों तक अपने ही हाथ से दबाया था, ताकि ग्राहक को लगे कि सब ठीक है।

मैंने उसे सीधा किया। धीरे-धीरे। टिंकू ने अपनी साँस रोक ली थी। साजिद कुछ आगे खिसक आया। नसीमा बाई की गोद में उनका ही हाथ काँप रहा था, जैसे हिसाब की कॉपी के ऊपर होता है।

फिर एक क्षण ऐसा आया कि पीतल ने हल्की-सी आवाज़ दी। जैसे किसी पुराने जोड़ में हड्डी वापस जगह पर आ गई हो।

मैंने तराज़ू को हैंडल से पकड़कर ऊपर उठाया। दोनों तरफ़ पलड़े लगाए। और फिर खाली तराज़ू को हवा में लहराया — अंत में इधर कुछ नहीं था, उधर कुछ नहीं था।

काँटा सीधा रुका।

"अब तोलकर देखिए," मैंने कहा।

नसीमा बाई ने उठने की कोशिश की, पर उनके घुटने जवाब दे गए। साजिद ने हाथ थामा। वो खड़ी होकर तराज़ू के सामने गई।

शबनम आपा ने चिमटी पटक दी।

"एक मिनट," वो बोलीं, "मैं अपनी चीनी लेती हूँ।"

वो गुमटी की तरफ़ दौड़ीं, दौड़ते हुए एक कटोरी चीनी लेकर आईं, और वो चीनी सीधे तराज़ू के पलड़े पर रख दी।

"एक किलो होना चाहिए।"

तराज़ू का काँटा बिलकुल बीच में आकर रुक गया।

गली में पहले एक सन्नाटा आया, और फिर इतनी आवाज़ आई कि पीपल के पत्तों तक काँप उठे। गुड्डू ताली बजा रहा था, रफ़ीक़ अपने सफ़ेद जूते पटक रहा था, चिंटू कूदकर दीये गिराने ही वाला था। बंसी बाबा ने हँसकर हाफ़िज़ बाबा के कंधे पर हाथ रख दिया और दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा, जैसे कह रहे हों — पचास साल बाद भी कुछ चीज़ें सीधी हो जाती हैं।

"आज से गली का हिसाब सीधा!" शबनम आपा ने कड़ाही जैसी आवाज़ में ऐलान किया। "जो कोई कहे कि नसीमा आपा कम तोलती हैं, वो मेरी गुमटी पर आकर मेरे सामने तोलकर दिखाए। फिर देखते हैं किसका काँटा टेढ़ा है।"

नसीमा बाई हँसने लगीं और साथ ही रोने भी लगीं, जो औरतों के साथ कभी-कभी एक ही साँस में होता है। उन्होंने साजिद का सिर पकड़कर अपने माथे से लगाया।

"माफ़ कर दे, बेटा," उन्होंने कहा। "और सुन — मैं भी एक बात कहूँ।"

सब चुप हुए।

"कभी-कभी मैंने… कुछ ग्राहकों को थोड़ा कम तोल दिया। जिन्हें लौटकर नहीं देखते, जो मुझ पर आँख बंद करके भरोसा करते हैं। चार आने, छह आने, यही। पहले ब्याज के डर से। फिर आदत से। उस दिन मैंने सुनील की तस्वीर के सामने खड़े होकर कहा था कि मैं ऐसा नहीं करूँगी। पर की।"

अब गली में फिर सन्नाटा था, पर यह पहले वाला नहीं था। यह वो सन्नाटा था, जिसमें लोग शर्मिंदा होते हैं, अपने लिए नहीं, सामने वाले के लिए।

नसीमा बाई ने सबकी तरफ़ देखा।

"जो मैंने कम तोला, वो मैं लौटाऊँगी। एक-एक को। नाम लिखा हुआ नहीं है, इसलिए सबको — जो भी मेरी दुकान पर आए, उससे कहूँगी कि चेक कर ले। और जो मैंने बरसों में कम किया, उतनी चीनी आज रात पीपल के नीचे रखवा दूँगी, चिट्ठी के साथ। जिसका नाम लिखा होगा, वो ले जाएगा। जिसका नहीं, वो भी ले जाएगा।"

"आपा, यह तो घाटा हो जाएगा," शबनम आपा ने कहा, पर हँसते हुए।

"होने दो," नसीमा बाई ने कहा। "सच्चा घाटा झूठे फ़ायदे से बेहतर है।"

मैंने घंटी को जेब से निकाला।

अब घंटी का स्वर बदला हुआ था। साफ़, थोड़ा गहरा, जैसे किसी ने उस पर से धूल हटा दी हो।

"छोटा जोड़," घंटी ने कहा। "बारह अंक। कुल एक सौ तीस।"

मैंने मन में हिसाब लगाया। मेरे पास एक सौ अठारह थे। बारह जुड़े, तो एक सौ तीस हो गए। पर इससे पहले, दो दिन पहले, मैंने छिपा दर्द देखने के लिए चालीस अंक खर्च किए थे। और आज की इस मरम्मत में मुझे सिर्फ़ बारह मिले।

"आज का जोड़ पूरा," घंटी ने कहा। "पर तेरा हिसाब आज घाटे में है।"

"पता है," मैंने धीरे से कहा।

"बुरा लगा?"

"थोड़ा।"

"अच्छा है। जो घाटा देखता है, वो दोबारा नहीं करता। जो हमेशा फ़ायदे में रहता है, उसे लगता है कि वो कभी ग़लत नहीं हो सकता।"

"और अगर मुझे यह घाटा कभी पूरा न हो?"

"तो हिसाब का मतलब क्या? हिसाब अंकों का नहीं होता, बेटा। हिसाब इस बात का होता है कि तू किस काम के बाद सो पाता है और किस काम के बाद नहीं।"

और फिर घंटी चुप हो गई।

मैंने घंटी जेब में रखी और अपनी कॉपी में आज का जोड़ लिखा। टिंकू ने उसकी तरफ़ झाँका और अपनी कॉपी में भी कुछ लिख लिया — मुझे पक्का यकीन है कि उसने भी बारह लिखा है, बस उसके अक्षर उलटे-सीधे हैं और उसके नीचे एक तीर बना है, जो ऊपर की तरफ़ जाता है।

शाम ढल चुकी थी। दीये एक-एक करके जल रहे थे और गली का सारा पत्थर उनकी रोशनी में पीला लग रहा था। काजल माँ के व्हीलचेयर को दुकान की तरफ़ ले गई थी, पर माँ ने बीच में हाथ उठाया — ज़रा रुको। पर मैंने किसी को सोचने नहीं दिया, क्योंकि माँ के चेहरे पर थी एक हल्की मुस्कान, जो कई दिनों से गायब थी।

लोग जाने लगे। बंसी बाबा धीरे-धीरे उठे। हाफ़िज़ बाबा ने उनकी लाठी उठाकर उन्हें पकड़ा दी। बच्चे दीये समेटने लगे। भोला भाई अपना रेडियो उठाने वाले थे, थाम जाएँ, पर मैंने कहा — "भोला भाई, वो अभी भी टूटा है। जब अपनी बात कहेंगे, तब जुड़ेगा।"

उन्होंने रेडियो वापस रख दिया और कुछ नहीं कहा। पर उनका हाथ जाते वक़्त मेरे कंधे पर पड़ा, सिर्फ़ एक पल।

नसीमा बाई ने साड़ी सँभाली और साजिद का हाथ पकड़कर चलने लगीं। तीन कदम चली थीं कि रुक गईं।

वो मुड़ीं।

दीये की रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी और उनकी आँखों में वो नमी अभी भी थी, जो रोने के बाद कुछ देर रह जाती है।

"बेटा," उन्होंने कहा।

"हाँ, आपा।"

"एक बात रह गई।" उन्होंने साजिद का हाथ और कसा। "दो हज़ार वाली बात मैं सबको बता दी। पर उस आदमी ने साजिद से एक और काग़ज़ दिखाया था।"

मेरे पैर वहीं जम गए।

"कैसा काग़ज़?"

नसीमा बाई ने साजिद की तरफ़ देखा। साजिद ने सिर झुका लिया, फिर उठाया, और उसकी आवाज़ फिर वैसी पतली हो गई, जैसी कुछ देर पहले थी।

"दुकान का काग़ज़," उसने कहा। "नीले निशान वाला। सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा कि यह तेरे पापा के ही अंगूठे वाला काग़ज़ है। उसने इसे मेरी आँखों के सामने खोला और बोला — तेरे पापा ने हमें दुकान दी थी, तो अब तेरा भी अंगूठा यहाँ मिलेगा।"

मैंने नसीमा बाई की तरफ़ देखा।

"सुनील भाई का अंगूठा?" मैंने धीरे से पूछा।

"सुनील ने कोई काग़ज़ नहीं दिया था," नसीमा बाई ने कहा। उनकी आवाज़ अचानक और सख़्त हो गई। "मैं जानती हूँ। उनके जाने से पहले हमने दुकान नहीं बेची, न गिरवी रखी, न किसी को दी। वो काग़ज़ अगर है, तो वो बना हुआ है।"

"आपने वो काग़ज़ देखा?"

"नहीं। साजिद ने देखा।"

साजिद ने धीरे से कहा, "मैंने सिर्फ़ कोना देखा, माँ। उसने काग़ज़ पूरा खोला ही नहीं। बस उँगली रखकर कहा — देख, यह तेरे पापा का अंगूठा है।"

"और तूने क्या किया?"

"मैं खड़ा रह गया," उसने कहा। "मुझे कुछ समझ नहीं आया। और मैं वहाँ खड़ा रहा जैसे… जैसे कोई मुझे वहाँ बाँधकर चला गया हो।"

मैं कुछ देर चुप रहा।

मेरे हाथ में घंटी थी और वो खुद हिल रही थी, हल्की-हल्की, जैसे कोई अंदर से खड़खड़ा रहा हो।

फिर घंटी ने बहुत धीमे से एक शब्द कहा। इतना धीमे कि सिर्फ़ मैंने सुना।

"फिर से अंगूठा।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

पापा का अंगूठा। सकीना बी के शर्तनामे पर सात अंगूठे। जगदीश दादा का अंगूठा। मेरी दुकान के काग़ज़ पर मेरा नाम और मेरे पापा का अंगूठा। और अब सुनील भाई का अंगूठा, किसी ऐसे काग़ज़ पर, जो साजिद ने देखा और कोई नहीं देख सका।

इस शहर में अंगूठे उग रहे थे। जैसे बरसात के बाद गली में काई उगती है।

"वो काग़ज़ कहाँ है?" मैंने पूछा।

"उसके पास," साजिद ने कहा। "वो वापस नहीं दिया।"

"कब दिखाया था?"

"तीन दिन पहले। रात में। गुमटी बंद हो चुकी थी। वो पीछे की तरफ़ से आया।"

मैंने साजिद के कंधे पर हाथ रखा।

"कल सुबह दस बजे पीपल पर सभा है। तुम दोनों आना। और जो तुमने अभी मुझे बताया, वही वहाँ सबके सामने कहना। बिना डरे। बिना बढ़ा-चढ़ाकर। जैसा देखा, वैसा।"

नसीमा बाई ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कुछ तोल रही हों।

"तुम क्या सोच रहे हो, बेटा?"

"मैं सोच रहा हूँ कि वो आदमी हर घर में एक ही चीज़ छोड़कर जाता है," मैंने कहा। "किसी के पास पैसा छोड़ता है, किसी के पास काग़ज़, किसी के पास डर। और फिर वो इंतज़ार करता है कि घर खुद-ब-खुद टूटे। उसे तोड़ना नहीं पड़ता।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"पर आज आपने एक काम किया है। आपने वो बात बाहर निकाल दी। जो बात बाहर आ जाती है, उसे कोई अंगूठा नहीं दबा सकता।"

नसीमा बाई ने कुछ सोचा। फिर अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और साजिद का हाथ पकड़कर चल दीं।

मैंने उन्हें जाते देखा। साजिद चलते-चलते एक बार मुड़ा और उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर अभी भी था, पर उसके नीचे कुछ और भी था। कुछ जो पहली बार जाग रहा था।

मैंने उसकी तरफ़ सिर हिलाया। वो भी हिलाया और चला गया।

मैं मेज़ के पास लौटा। सफ़ेद कार्ड वहीं पड़ा था, पीतल के पलड़े के पास। मैंने उसे उठाया और उँगलियों में घुमाया। काग़ज़ मोटा था, अच्छा था। किसी ने इसे बनवाया था, किसी दफ़्तर में छपवाया था, सोच-समझकर।

और उस पर कुछ नहीं लिखा था।

सिर्फ़ एक कोना, जहाँ नीली स्याही का एक छोटा-सा धब्बा था। जैसे जल्दी में किसी ने मोहर लगाई हो और मोहर फिसल गई हो।

मैंने टिंकू को बुलाया।

"यह कार्ड सँभालकर रख। कल सभा में मेज़ पर रहेगा।"

"और अगर कोई इसे उठा ले जाए?"

"तो ले जाए। अब यह सिर्फ़ काग़ज़ है। इसका ज़ोर तब तक है जब तक इसे छिपाकर रखा जाए।"

टिंकू ने कार्ड दोनों हाथों से लिया, अपनी कॉपी के बीच रखा और कॉपी अपनी कमीज़ के अंदर ठूँस दी।

"उस्ताद, एक बात पूछूँ?"

"पूछ।"

"ये अंगूठे… जो बार-बार आ रहे हैं। ये असली हैं?"

मैं कुछ देर उसकी तरफ़ देखता रहा।

"कुछ असली हैं," मैंने कहा। "और कुछ ऐसे हैं जिन्हें असली बनाया गया है। फ़र्क़ यही है — पहचानना कि कौन सा किसने दबाया।"

"और सुनील भाई का अंगूठा?"

"वो सुनील भाई का है या नहीं, यह हमें कल पता चलेगा।"

वो कुछ सोचता हुआ चला गया।

मैंने एक लंबी साँस ली और मेज़ पर रखी सात टूटी चीज़ों की तरफ़ देखा। सातों वैसी ही थीं। एक भी नहीं जुड़ी थी। पर आज जो जुड़ा, वो मेज़ पर नहीं था। वो गली में चल रहा था — माँ और बेटे की आवाज़ में, शबनम आपा के एक किलो चीनी…शबनम आपा के उस हाथ में, जो उस वक़्त एक किलो चीनी तोल रहा था।

और वो किलो, बिल्कुल एक किलो निकला।

अब तुम सोच रहे होगे कि इसमें क्या बड़ी बात है? एक किलो चीनी एक किलो ही होती है। तो सुनो, नसीमा बाई का तराज़ू पिछले कई सालों से ठीक नहीं तोल रहा था। काँटा टेढ़ा था, पलड़ा टूटा हुआ था, और पूरी गली उस पर उँगली उठा रही थी। जिस दिन कोई कहे कि तुम चोरी करती हो, उस दिन इंसान का सबसे ज़्यादा नुक़सान उसकी जेब में नहीं, उसकी आवाज़ में होता है।

शबनम आपा ने चीनी की पुड़िया को तराज़ू पर से उठाया, फिर वापस रखा, फिर फिर उठाया। उनका हाथ काँप रहा था, पर काँपने की वजह डर नहीं थी। वजह कुछ और थी।

"देखो, देखो," वो चिल्लाईं, जैसे गली में किसी ने खज़ाना खोद निकाला हो। "एक किलो चीनी, एक किलो। न एक दाना ऊपर, न एक दाना नीचे।"

फिर उन्होंने पास में रखा गुड़ उठाया और तोला। आधा किलो, ठीक आधा किलो।

"अरे वाह," गुड्डू बोला, आँखें बड़ी करके। "आंटी, अब तो आप ठीक तोलती हो!"

"मैं पहले भी ठीक ही तोलती थी," नसीमा बाई ने कहा। पर उसमें वो कड़कपन नहीं था, जो सुबह उनकी आवाज़ में था। "तराज़ू ही मेरी इज़्ज़त पर शक कर रहा था।"

और यह कहते-कहते वो रो पड़ीं।

रोना अजीब होता है। किसी के घर में रोना दुख होता है, पर किसी बाज़ार में, किसी चबूतरी के पास, इतने लोगों के बीच रोना — वो दुख नहीं होता। वो एक बोझ होता है, जो सालों बाद कंधों से उतरता है, और उतरते वक़्त एक आवाज़ करता है।

बच्चे घबरा गए। चिंटू ने मेरी कमीज़ खींची।

"उस्ताद, आंटी रो रही हैं।"

"रोने दे," मैंने कहा। "ये रोना नहीं है, ये हिसाब बराबर हो रहा है।"

फिर घंटी बोली।

"छोटा जोड़। बारह अंक।"

मैं एक पल के लिए रुक गया।

"कितने?"

"बारह।"

"और कुल?"

"एक सौ तीस।"

मैंने मन में हिसाब लगाया। एक सौ अठारह थे। बारह जुड़े। हो गए एक सौ तीस।

और मेरे पास से निकले थे — चालीस।

आठ अठाईस का घाटा।

मैंने तराज़ू के काँटे को देखा। वो अब सीधा था। पीतल चमक रहा था, जैसे बरसों बाद पानी पिया हो। नसीमा बाई का हाथ अब भी उस पर टिका था, और वो हटाने को तैयार नहीं थी।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि कोई सुन न सके।

"हूँ।"

"मैंने चालीस खर्च किए। तूने बारह लौटाए। ये उल्टा सौदा है।"

"तूने आज तक का सबसे ईमानदार सौदा किया है," घंटी ने कहा।

"कैसे?"

"जो जोड़ बाहर से दिखता है, वो छोटा होता है। असली जोड़ उनके अंदर हुआ, और वो मेरे हिसाब में नहीं आता। मैं सिर्फ़ उतना नापता हूँ जितना गली ने देखा।"

"मतलब?"

"मतलब — कुछ चीज़ें तेरे खाते से कटती हैं और उनका फ़ायदा किसी और के खाते में जाता है। उसे नेकी कहते हैं। तूने आज नेकी की, अंकुश। इसमें तू हमेशा घाटे में रहेगा।"

मैं हँस पड़ा। हँसी में वो कड़वाहट नहीं थी, जो पहले हुआ करती थी। पर कुछ तो थी।

टिंकू ने मेरी जेब में हाथ डाल दिया, जहाँ घंटी रहती है।

"उस्ताद, कितने हैं?"

"एक सौ तीस।"

"कम हो गए?"

"हाँ।"

"पर तराज़ू जुड़ गया ना?"

"जुड़ गया।"

तो वो खड़ा हो गया, दोनों हाथ कमर पर रखकर, और उसने ऐसे घोषणा की जैसे कोई मंत्री भाषण दे रहा हो।

"तो फिर घाटा नहीं हुआ! हिसाब और इज़्ज़त अलग-अलग थैलियों में रखे जाते हैं, उस्ताद। मेरी माँ कहती है।"

मैंने उसे देखा। तेरह साल का लड़का, जिसने स्कूल छोड़ दिया था, जिसके पापा छह महीने पहले गए थे, और जिसका असली डर यह था कि कहीं उसे भी दुकान से निकाल न दिया जाए। वो मेरे सामने खड़ा था और इज़्ज़त की थैली की बात कर रहा था।

"तेरी माँ को ज्ञान देने के लिए कहूँगा," मैंने कहा।

"माँ को नहीं, माँ रूठ जाएगी। मुझे कहिए, मैं लिख लेता हूँ।"

"लिख।"

उसने सच में जेब से पेंसिल निकाली और अपनी हथेली पर कुछ लिख लिया। फिर पोंछ दिया, क्योंकि स्याही नहीं थी, सिर्फ़ दबाव था।

तराज़ू अब भी चबूतरी के पास रखा था। मैंने उसे उठाया नहीं। मैंने सिर्फ़ उसका काँटा एक बार उँगली से छुआ, और देखा कि पीतल के पलड़े का फटा किनारा जुड़ चुका था। जोड़ वैसा ही था जैसे दादा की साइकिल की चेन जुड़ी थी, या उस मिट्टी के कटोरे की लकीर कायम रह गई थी। तंत्र किसी को नया नहीं करता। वो सिर्फ़ टूटन को इतना भर देता है कि चीज़ फिर काम करने लगे।

शाम अब पूरी तरह उतर आई थी।

पीपल के नीचे बच्चों ने मिट्टी के तेल के दीये जलाए थे। छह दीये। किसी ने पुरानी ईंटों पर रखे थे, किसी ने सीधे ज़मीन पर, और एक दीया चिंटू ने पत्थर की चबूतरी के उस कोने पर रखा था जहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं। हवा के साथ उनकी लौ कभी झुकती, कभी सीधी हो जाती, और उसी हिलती रोशनी में गली की सारी चीज़ें दो बार दिख रही थीं — एक बार जैसी थीं, और एक बार जैसी लग रही थीं।

शबनम आपा ने तराज़ू के पास आकर मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश।"

"हाँ, आपा।"

"आज गली का हिसाब सीधा हो गया।"

"हुआ तो है।"

"अब तू एक काम कर। मेरी गुमटी में एक तराज़ू है, वो भी टेढ़ा है। कल उसे भी सीधा कर दे।"

"आपा, आपका तराज़ू टेढ़ा नहीं है।"

"तो?"

"आप का काँटा सीधा है। बस आप किसी को कम तोलती नहीं, और लोगों को यह पसंद नहीं आता।"

वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने अपनी लोहे की चिमटी उठाई, जो हमेशा उनकी कमर में अटकी रहती है, और हवा में हिलाई।

"तेरी ज़ुबान भी किसी दिन तेरा गला काटेगी," उन्होंने कहा। "चाय पी। ठंडी हो रही है।"

मैंने कुल्हड़ उठाया।

नसीमा बाई और साजिद के हाथ में भी कुल्हड़ थे। दोनों चबूतरी के किनारे बैठे थे, एक-दूसरे से थोड़ी दूर, पर उतनी दूर नहीं जितनी सुबह थे। साजिद कुल्हड़ को दोनों हाथों से पकड़े हुए था, जैसे वो उसका नहीं, किसी और का हो और उसे संभालना पड़े।

शबनम आपा ने अपनी गुमटी से एक प्लेट समोसे की लाकर मेज़ पर रख दी, जहाँ जोड़ केंद्र का बोर्ड रखा था। प्लेट बोर्ड के ऊपर से आधा ढक गया, और पढ़ने में अब सिर्फ़ इतना बचा — "टूटी चीज़ लाओ।"

रफ़ीक़ ने यह देखकर कहा, "उस्ताद, बोर्ड अब अधूरा पढ़ा जा रहा है। ऐसे लग रहा है कि सिर्फ़ टूटी चीज़ लाओ, रिश्ता मत लाओ।"

"तो प्लेट हटा।"

"नहीं, समोसा ठंडा हो जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। दस साल का लड़का, और उसकी प्राथमिकताएँ बिल्कुल साफ़ थीं। मुझे हँसी आ गई, और वो हँसी उस वक़्त निकली जब कई दिनों से मेरे अंदर कुछ कसा हुआ बैठा था।

सानिया ने मेज़ पर रखी छह टूटी चीज़ें गिनीं।

"उस्ताद, सात थीं।"

"अब छह हैं।"

"पलड़ा जुड़ गया?"

"जुड़ गया।"

"तो छह बाकी।"

"हाँ।"

वो गुड़िया उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ा दी। गुड़िया का एक हाथ गायब था और सिर के पीछे के बाल उखड़े हुए थे। उसके चेहरे पर वो हँसी बनी हुई थी, जो कारखाने में बनती है और जो कभी सच्ची नहीं होती।

"इसे कब जोड़ोगे?"

"जिस दिन तू अपनी बात सच बोलेगी।"

"मैंने सब बोल दी थी रफ़ीक़ को।"

"सब नहीं बोली। तूने यह नहीं बताया कि तू उस दिन रोई क्यों थी।"

उसका चेहरा उतर गया। उसने गुड़िया वापस मेज़ पर रख दी, इस बार सीधी रखी, पहले टेढ़ी पड़ी थी। फिर वो चुपचाप वहाँ से हट गई।

टिंकू मेरे पास आकर खड़ा हो गया।

"उस्ताद, आज पूरे दिन में सिर्फ़ एक जोड़ हुआ।"

"हाँ।"

"और सात चीज़ें आई थीं।"

"हाँ।"

"तो क्या हम धीमे चल रहे हैं?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चिंता थी जो बड़ों की आँखों में होनी चाहिए, और जो बच्चों की आँखों में इतनी जल्दी आ जाए तो इंसान का दिल भारी हो जाता है।

"टिंकू, सुन। एक बार में एक ही रिश्ता जुड़ता है। दो नहीं। ये तंत्र का नियम है, और नियम टूटता है तो हम सब टूटते हैं।"

"पर हमारे पास वक़्त कितना है?"

मैं चुप हो गया।

क्योंकि मेरे पास इसका जवाब नहीं था।

सामने अस्पताल था। अस्पताल की दीवार पर वो नीला बोर्ड लगा था, जिसे देखने से मेरी छाती में कुछ होता था। और उसके पीछे का प्लॉट, जहाँ दो दिन बाद सुबह सात बजे मशीन खड़ी होनी थी। और मेरी दुकान का नोटिस, जिसमें दस दिन लिखे थे। और माँ की दवा, जो काग़ज़ साफ़ होने तक रुकी थी।

वक़्त था, पर वो हमारा नहीं था। वो किसी और की घड़ी पर चल रहा था।

मैंने कुल्हड़ में से आख़िरी घूँट लिया और खड़ा हो गया।

"आज बस," मैंने कहा। "बाकी कल।"

बच्चे उठने लगे। शबनम आपा दीयों को बुझाने लगीं, पर मैंने उन्हें रोक दिया।

"रहने दीजिए, आपा। रात भर जलेंगे।"

"तेल कौन देगा?"

"मैं दूँगा।"

"तेरे पास तेल के पैसे कहाँ हैं?"

"नहीं हैं। पर दीया बुझा देना उससे भी महँगा पड़ता है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और फिर अपनी गुमटी की तरफ़ चल दीं। दो कदम जाकर रुकीं और बिना मुड़े बोलीं — "कल सुबह की सभा में मैं चाय लाऊँगी। सारी गली के लिए। पैसे बाद में। और अगर कोई पैसे माँगने आए, तो मेरी गुमटी के नीचे छिपा देंगे।"

मैं हँसा। वो चली गईं।

अब चबूतरी के पास सिर्फ़ नसीमा बाई और साजिद बचे थे।

नसीमा बाई ने अपना कुल्हड़ ज़मीन पर रखा, उसे ऐसे सीधा किया जैसे कोई चीज़ सहेज रही हों, और फिर उठीं। उन्होंने साजिद के कंधे पर हाथ रखा, और साजिद उस हाथ के नीचे से उठा — न झुककर, न हटकर, बस उठा।

वो दोनों मेरी मेज़ के सामने आए।

"अंकुश बेटा," नसीमा बाई ने कहा।

"हाँ, आंटी।"

"आज जो हुआ, वो मैं नहीं भूलूँगी।"

"भूल जाइए। अगर याद रखा तो फिर कभी झगड़ा नहीं होगा, और झगड़ा नहीं होगा तो हमारा धंधा क्या रहेगा?"

उन्होंने एक छोटी-सी हँसी दी। पर हँसी में पानी था।

वो चलने को मुड़ीं। साजिद ने मेरी तरफ़ देखकर सिर हिलाया। मैंने भी हिलाया।

फिर वो दोनों दीयों की रोशनी से बाहर निकलने लगे, अंधेरे की तरफ़, गली के उस हिस्से की तरफ़ जहाँ मिट्टी है और नाली का पत्थर पुल है।

और तभी नसीमा बाई रुकीं।

वो रुकीं, मुड़ीं, और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा अब आधा दीये की रोशनी में था और आधा अंधेरे में, और अंधेरे वाले हिस्से पर वो चीज़ साफ़ दिख रही थी जिससे मुझे पहले भी डर लगता था — कुछ कहने की जल्दी।

वो लौटकर आईं। इस बार साजिद उनके साथ नहीं आया। वो वहीं खड़ा रह गया, हाथ में कुल्हड़, और उसने कुछ नहीं कहा।

नसीमा बाई मेज़ के बिल्कुल पास आईं और उन्होंने आवाज़ इतनी धीमी रखी कि मुझे उनके होंठ पढ़ने पड़े।

"बेटा, एक बात रह गई।"

"कहिए।"

उन्होंने पीछे देखा। साजिद अब भी वहीं खड़ा था, और वो हमें नहीं देख रहा था, वो ज़मीन देख रहा था।

"तराज़ू का झगड़ा तो तीस साल का है," वो बोलीं। "पर जो आज जुड़ा, वो मेरे बेटे का नहीं, मेरा है। मैंने उससे कहा था — मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। ये मैंने झूठ कहा था।"

"ये तो घंटी ने मुझे पहले ही बता दिया था।"

"फिर भी मैंने तुम्हारे सामने नहीं कहा। मैंने अपने अंदर कहा। मेरे पति सुनील जब गए थे, तब साजिद आठ साल का था। उस रात मैंने तस्वीर के सामने रोटी रखी और कहा — अब मैं अकेली हूँ। उस दिन के बाद मैंने कभी किसी से ये नहीं कहा कि मुझे डर लगता है।"

वो रुकीं।

"पर ये बात बाद की है," उन्होंने कहा, आवाज़ थोड़ी कसकर। "पहले एक और बात है, जो मुझे आज कहनी चाहिए।"

मैंने घंटी जेब में पकड़ ली।

"वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी," नसीमा बाई बोलीं। "जो साजिद से दो हज़ार रुपये के बदले अंगूठा लगवा रहा है।"

"हाँ।"

"उसने साजिद को एक काग़ज़ दिखाया था। दुकान का काग़ज़। और उस काग़ज़ पर एक अंगूठा है।"

"किसका?"

वो एक पल चुप रहीं। फिर उन्होंने आँखें बंद कीं और ऐसे कहा जैसे दाँत के नीचे से कोई चीज़ निकल रही हो।

"मेरे मरहूम पति का।"

मेरे हाथ से कुल्हड़ फिसल ही रहा था। मैंने उसे बचाया।

"सुनील भाई का?" मैंने कहा, और मेरी आवाज़ तेज़ निकली। मैंने खुद को धीमा किया। "आंटी, सुनील भाई को गए…"

"ग्यारह साल हो गए।"

"तो उनका अंगूठा दुकान के काग़ज़ पर कैसे?"

"मैंने यही पूछा था।"

"और उसने क्या कहा?"

नसीमा बाई ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और उनकी उँगलियाँ उसमें उलझ गईं।

"उसने कहा — आंटी, काग़ज़ पुराना है। जब आपके साहब ज़िंदा थे, तब ही तैयार हुआ था। आपने तो नहीं देखा। आपने कभी काग़ज़ माँगा ही नहीं।"

"क्या आपने माँगा था?"

"मैंने कभी सोचा नहीं था कि माँगना पड़ेगा।"

मैंने तराज़ू की तरफ़ देखा। सीधा काँटा, जुड़ा पलड़ा, और उसके नीचे चबूतरी का पत्थर। अभी दस मिनट पहले यही तराज़ू पूरी गली के सामने हिसाब कर रहा था। और अब यही जगह एक और हिसाब माँग रही थी।

घंटी ने फुसफुसाया। इतने धीमे कि मुझे कान पकड़कर झुकना पड़ा।

"फिर से अंगूठा।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

फिर से अंगूठा।

पापा का अंगूठा। मुन्शी का अंगूठा। दुबे अंकल की कॉपी में जगदीश यादव का अंगूठा। रजिस्टर में सात अंगूठे। बूढ़ी माँ के औज़ार वाले काग़ज़ पर बेटे का अंगूठा। भोला भाई का बिना पढ़ा अंगूठा। चार लोगों के चार अंगूठे सिर्फ़ दो महीने में। और अब एक अंगूठा जो किसी ऐसे आदमी का था जो ग्यारह साल पहले मर चुका था।

अगर कोई मुर्दे का अंगूठा काग़ज़ पर लगा सकता है, तो फिर इस शहर में कोई भी अंगूठा किसी का नहीं है।

"आंटी," मैंने कहा, "वो काग़ज़ आपने देखा?"

"देखा। पर दूर से। साजिद के हाथ में था, और वो आदमी मेरे सामने खड़ा था।"

"उस पर और क्या लिखा था?"

"मुझे पढ़ना नहीं आता। पर जो उसने पढ़कर सुनाया, वो मैंने याद रखा।"

"क्या?"

"उसने कहा — आंटी, ये काग़ज़ कहता है कि दुकान आपके साहब ने उधार पर ली थी। और उधार वाला पैसा अब भी बाकी है। और जब तक पैसा नहीं चुकता, दुकान अपनी नहीं कही जा सकती।"

मैंने साँस ली।

"कितना बाकी?"

"उसने कहा — दो हज़ार।"

मेरे पैरों के नीचे ज़मीन का होना कम हो गया।

दो हज़ार। वही दो हज़ार जो साजिद ने उससे लिए थे। वही दो हज़ार जो माँ की दवा में लगे थे। वही दो हज़ार जो एक काग़ज़ के बदले दिए गए थे, जिस पर कुछ नहीं लिखा था, सिर्फ़ एक कोने पर नीली स्याही का फिसला हुआ धब्बा था।

"आंटी," मैंने धीरे से कहा, "वो आपको शुरू से जानता है?"

"मुझे नहीं। मेरे साहब को जानता था, ऐसा कह रहा था।"

"नाम बताया?"

"नहीं।"

"कभी नहीं?"

"कभी नहीं।"

मैंने अपने हाथ से मेज़ पकड़ी। मेज़ की टाँग अब भी नाप में नहीं थी, वो हिल रही थी। और उस हिलने में मुझे कुछ सहारा मिल रहा था।

"आंटी, एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"सुनील भाई ने कभी आपको बताया था कि दुकान के काग़ज़ किसी के पास रखे हैं?"

उन्होंने कुछ सोचा। फिर उनका चेहरा वैसे बदला जैसे पुरानी तस्वीर का रंग बदलता है जब उसे धूप में रखा जाए।

"एक बार," वो बोलीं। "बीमार पड़ने से एक हफ़्ता पहले। उन्होंने कहा था — नसीमा, दुकान के काग़ज़ किसी अच्छे आदमी के पास रखे हैं। मैंने पूछा किसके पास। तो वो हँसे और बोले — जिसके पास मेरी साइकिल है।"

मैंने आँखें खोलीं।

"साइकिल?" मैंने कहा। "आंटी, साइकिल?"

"हाँ। पर साहब की कोई साइकिल तो थी नहीं। उनके पास एक पुरानी तिपहिया थी, वो भी बेच दी थी। इसलिए मैंने सोचा कि बुख़ार में उल्टा-सीधा बोल रहे हैं।"

मैं वहीं खड़ा रह गया।

मुझे उस्ताद की बात याद आई। उनकी पुरानी दुकान। पीछे की गली। नीला दरवाज़ा। और उस कमरे में कपड़े से ढकी काली साइकिल, जिसका अगला पहिया गायब था और चेन बीच से टूटी थी।

और पापा। पापा ने पच्चीस साल पहले उसी दुकान पर साइकिल गिरवी रखी थी।

"आंटी," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ मुझे अपनी ही नहीं लगी, "आपने कभी उस्ताद अली बक्श का नाम सुना?"

वो रुकीं।

और उनके चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी किसी के चेहरे पर नहीं देखा था। वो डर नहीं था। वो पहचान थी।

"अली बक्श," उन्होंने धीरे से दोहराया। "सिलाई वाला?"

"हाँ।"

"वो… वो अभी यहाँ हैं?"

"आपा, वो तीन दुकान छोड़कर आगे हैं। पीपल के पास।"

नसीमा बाई ने एक कदम पीछे लिया।

"मेरे साहब उनसे मिलते थे," उन्होंने कहा, और आवाज़ में वो झिझक आ गई जो सच बोलने से पहले आती है। "कभी-कभी शाम को। मैंने पूछा तो बोले — हिसाब की बात है।"

"कैसा हिसाब?"

"मैंने पूछा नहीं।"

मैंने सिर नीचे किया।

गली में हवा चल रही थी। दीयों की लौ काँप रही थी। कहीं दूर एक टेम्पो का हॉर्न बजा और फिर बुझ गया। शबनम आपा की गुमटी से बर्तन की आवाज़ आ रही थी। और टिंकू मेरी कमीज़ के पीछे खड़ा था, बिना एक शब्द बोले, जो उसके लिए बहुत बड़ी बात थी।

"आंटी," मैंने कहा, "आज रात आप साजिद को अकेला मत छोड़िए।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो आदमी जानता है कि साजिद डरा हुआ है। और डरे हुए लड़के से काग़ज़ पर अंगूठा लगवाना सबसे आसान काम है।"

"उसने कहा था — चार दिन बाद।"

"तो चार दिन हमारे पास हैं। चार नहीं। चार दिन से एक दिन भी कम नहीं।"

उन्होंने सिर हिलाया। फिर वो मुड़ीं और साजिद की तरफ़ चलीं, और इस बार उन्होंने उसका हाथ नहीं पकड़ा। उन्होंने उसका कंधा थामा, और उस कंधे पर अपना हाथ रखकर वो चलीं, जैसे कोई बूढ़ी औरत नहीं, कोई हिसाब लिखने वाली चल रही हो।

वो अंधेरे में घुल गए।

टिंकू ने तब आवाज़ की।

"उस्ताद।"

"हाँ।"

"मरे हुए आदमी का अंगूठा?"

"काग़ज़ पर सिर्फ़ स्याही का निशान होता है, टिंकू। पता नहीं कौन सा अंगूठा है। कोई किसी और की उँगली दबा सकता है। कोई नक़ल कर सकता है। कोई पुराने काग़ज़ पर नया निशान बना सकता है।"

"तो फिर सच क्या है?"

"सच ये है कि कोई चाहता है कि हम सब मान लें कि ये सच है। और जब सब मान लेंगे, तो उसे कुछ करना ही नहीं पड़ेगा।"

टिंकू कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "मतलब जो झूठ सबको पता हो, वो सच से ज़्यादा ताक़तवर हो जाता है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तू तेरह साल का है न?"

"हाँ।"

"तेरह साल की उम्र में इतनी समझ कहाँ से आती है?"

"भूख से, उस्ताद। जब रोटी कम होती है, तो दिमाग़ ज़्यादा चलता है।"

मैं हँस पड़ा। पहली बार उस दिन में।

हम दोनों गुमटी की तरफ़ चले। शबनम आपा बर्तन धो रही थीं। उन्होंने हमें देखा और बिना पूछे दो कुल्हड़ चाय के भर दिए।

"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।

"आपा," मैंने कहा, "कल अगर मैं आपसे कुछ माँगूँ, तो मना मत करना।"

"क्या माँगेगा?"

"एक किलो चीनी।"

उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ा माँग लिया हो।

"बस?"

"बस।"

"ले लेना। कल से क्या, आज से ही ले ले।"

"आज नहीं। कल। जब वो दोनों मेरे सामने बैठेंगे।"

उन्होंने कुल्हड़ मेरे हाथ में पकड़ाया और कुछ सोचकर बोलीं, "तू कुछ और भी माँगेगा, अंकुश। मुझे पता है। तेरी आँखों में वो बात है जो उस रात भोला भाई की आँखों में थी — जब उसने अपना रेडियो लाकर मेज़ पर रखा था।"

"आपा, आपको सब पता है।"

"मुझे सिर्फ़ ये पता है कि तू आज तक मेरी गुमटी से एक भी चीज़ मुफ़्त नहीं लिया। तो जब तू मुफ़्त माँगेगा, तो उसके पीछे कोई बड़ी वजह होगी।"

मैंने चाय की चुस्की ली।

"वजह बड़ी है, आपा। लेकिन वो वजह मुझे खुद नहीं पता। मुझे बस इतना पता है कि जब कोई इंसान अपना सबसे बड़ा डर किसी और के सामने खोलता है, तो उस वक़्त वो सबसे ज़्यादा सच्चा होता है। और उस सच्चे वक़्त को अगर कोई और न देख रहा हो, तो वो सच फिर खोखला हो जाता है।"

शबनम आपा मेरी तरफ़ देखती रहीं।

"तू कहना क्या चाहता है?"

"मैं कहना चाहता हूँ कि कल शाम जब नसीमा बाई और साजिद बैठें, तो आप वहाँ होना। उस्ताद को भी बुलाऊँगा। और माँ को भी, अगर वो आ सकें। कोई मंच नहीं, कोई सभा नहीं। बस चार-पाँच लोग, दो कुल्हड़ चाय, और ईमानदारी।"

"और तेरी घंटी?"

"वो भी होगी। पर वो बोलेगी नहीं। वो सिर्फ़ सुनेगी।"

उन्होंने कपड़े से हाथ पोंछे।

"ठीक है," उन्होंने कहा। "कल शाम मैं आऊँगी। और चीनी भी लाऊँगी।"

मैंने सिर हिलाया और टिंकू के साथ दुकान की तरफ़ चल पड़ा।

रास्ते में टिंकू ने पूछा, "उस्ताद, उस्ताद अली बक्श से तराज़ू के बारे में पूछें?"

"नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि उस्ताद की बातें हमेशा सिलाई की तरह आती हैं। धीरे-धीरे, टाँके लेकर। जल्दी करेंगे तो तागा ही उलझेगा।"

वो समझ गया।

उस रात मैं देर तक बैठा रहा।

दुकान के पीछे वाले कमरे में बल्ब गुनगुना रहा था। ट्रंक खुला था। औज़ार बिखरे थे। और उनके बीच, एक कोने में, पीतल का वो टूटा पलड़ा रखा था, जो नसीमा बाई सीने से लगाकर लाई थीं।

मैंने उसे उठाया।

हल्का था। बहुत हल्का। और उसके किनारे पर टूटकर लटकती टाँग थी, जिसे किसी ने बाद में जोड़ने की कोशिश की थी — शायद सोल्डर से, शायद केवल तार से। जोड़ा नहीं गया था।

मैंने उसे हथेली पर रखकर देखा।

"तू किससे टूटा है?" मैंने धीरे से पूछा। "लोहे से, या तोलने वाले के हाथ से?"

घंटी जेब में थी। वो खुद नहीं बजी। पर मुझे लगा जैसे उसने कुछ कहा हो, बिना आवाज़ के।

मैंने पलड़ा वापस रखा और चारपाई पर लेट गया।

छत पर पंखा नहीं था। बस एक पुराना बल्ब था, जो कभी तेज़, कभी धीमा होता था। और उसकी रोशनी में मुझे अपने हाथ दिख रहे थे — ग्रीस से भरे, उँगलियों के नाखूनों के नीचे काली लकीरें, और हथेली पर एक पुराना सफ़ेद निशान, जो पंद्रह साल पहले पीतल का टुकड़ा जोड़ने के बाद आया था।

मैंने हाथ बंद कर लिया।

सुबह मुझे नींद नहीं आई थी। पर जब आँख खुली, तो सूरज निकल चुका था और गली में बच्चों की आवाज़ें थीं।

टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था।

"उस्ताद! उठिए! नसीमा आंटी की दुकान पर आज सुबह कोई नहीं आया। साजिद कह रहा है कि दो बोरी आटा गीला हो गया।"

मैं उठा।

और मुझे पता था कि दिन शुरू हो गया है।

दिन भर मैंने जोड़ केंद्र नहीं खोला। टिंकू ने पूछा भी, पर मैंने कहा, "आज केंद्र नहीं। आज सिर्फ़ तैयारी।"

पीपल के नीचे मैंने खुद चबूतरी साफ़ की।

सानिया और रफ़ीक़ ने दीये लाकर रखे। गुड्डू ने पुरानी चटाई बिछाई। चिंटू ने शबनम आपा की गुमटी से एक बड़ी पीतल की थाली उठाई, जिसमें मैंने वो टूटा पलड़ा रख दिया। नसीमा बाई का पलड़ा।

और उसके पास, एक दूसरी थाली में, मैंने टूलकिट से वो सब निकालकर रखा जो उन्होंने कभी नहीं देखा था — छोटी रिंच, पेचकस, रेती, और एक मोटा बोल्ट।

टिंकू ने पूछा, "ये किसलिए?"

"ताकि तराज़ू देख सके कि हमारे पास क्या है," मैंने कहा।

वो समझ नहीं पाया।

"टिंकू," मैंने कहा, "जब कोई इंसान अपनी टूटी चीज़ लेकर आता है, तो वो सिर्फ़ चीज़ नहीं लाता। वो अपना सबसे बड़ा डर लाता है। और अगर हम उस डर को उसी वक़्त ठीक कर दें, तो वो इंसान फिर कभी सच नहीं बोलेगा।"

"तो क्या करना है?"

"उसे अपने हाथ से ठीक करने देना।"

टिंकू ने कुछ सोचा।

"मतलब आज मरम्मत मैं करूँगा?"

"नहीं। आज मरम्मत वो दोनों करेंगे। मैं सिर्फ़ हाथ बताऊँगा।"

शाम छह बजे पीपल के नीचे दीये जल उठे।

हवा थी, इसलिए सानिया ने दीयों के चारों तरफ़ मिट्टी की छोटी दीवार बनाई। गुड्डू ने पीछे से पुरानी चादर तान दी, ताकि हवा सीधी लौ पर न लगे। रफ़ीक़ ने एक तरफ़ बाल्टी में पानी भरकर रखी, "आग लगे तो", और चिंटू ने कहा कि पहले आग लगेगी तब पता चलेगा पानी कितना काम आता है।

बच्चे हँसे।

पर हँसी धीमी थी। सब जानते थे कि आज शाम कुछ और होने वाला है।

सात बजने से पहले नसीमा बाई आईं।

उनके हाथ में वो पुरानी लाल कवर वाली कॉपी थी, और कंधे पर एक मैला थैला। साजिद उनके पीछे था। उसने आज सफ़ेद कुर्ता पहना था, जो कहीं से धोकर सुखाया हुआ लग रहा था, और जेब पर एक छोटा सा काला धब्बा था, जो शायद स्याही का था।

वो आकर चबूतरी के किनारे खड़े रहे।

"बैठिए," मैंने कहा।

नसीमा बाई बैठीं। साजिद नहीं बैठा।

"बेटा," शबनम आपा ने गुमटी से आवाज़ दी, "बैठ जा। चाय ठंडी हो रही है।"

वो बैठ गया।

शबनम आपा आईं और दोनों के हाथ में कुल्हड़ पकड़ा दिए। फिर उस्ताद आए। वो चुपचाप एक कोने में बैठ गए। उन्होंने आज अपना मोटा चश्मा नहीं पहना था और आँखें थोड़ी लाल थीं।

मीरा अपने कैमरे के साथ आई, पर मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया।

उसने कैमरा नीचे कर लिया।

"आज रिकॉर्डिंग नहीं," मैंने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि आज जो होगा, वो किसी को सुनाने के लिए नहीं होगा। आज जो होगा, वो बस ठीक होने के लिए होगा।"

उसने कैमरा बैग में रखा और चबूतरी की सीढ़ी पर बैठ गई।

मैंने अपना कुल्हड़ उठाया और एक घूँट लिया। फिर मैंने पलड़ा उठाकर बीच में रखा।

"नसीमा बाई," मैंने कहा, "आज यहाँ कोई मंच नहीं है। कोई वकील नहीं है, कोई काग़ज़ नहीं है।"

"मैं देख रही हूँ," उन्होंने कहा।

"आज यहाँ एक माँ है," मैंने कहा, "और एक बेटा। और बीच में एक टूटा तराज़ू।"

साजिद ने मेरी तरफ़ देखा।

"और मैं आप दोनों से एक बात कहूँगा, जो शायद आपको बुरी लगे। आपकी दुकान का हिसाब कभी नहीं बिगड़ा। आपका तराज़ू कभी झूठा नहीं तोला। जो बिगड़ा है, वो बीच में है — दो लोगों के बीच, दो साँसों के बीच।"

नसीमा बाई ने अपना कुल्हड़ दोनों हाथों से पकड़ा।

"जो नहीं कहा गया है," मैंने कहा, "वही सबसे ज़्यादा तोलता है। आपकी दुकान में आठ हज़ार का घाटा दिख रहा है, नसीमा बाई। पर मुझे लगता है कि घाटा उससे बहुत बड़ा है, और काग़ज़ पर वो दिखता ही नहीं।"

कुछ देर चुप्पी रही।

दीये जल रहे थे। पीपल की पत्तियाँ हल्की-हल्की हिल रही थीं। मीरा की चप्पल सीढ़ी पर धीरे-धीरे ज़मीन को छू रही थी, जैसे वो भी बेचैन हो।

फिर नसीमा बाई ने कुल्हड़ नीचे रखा।

और उन्होंने कहा — "मुझे अकेलेपन से डर लगता है।"

बस। इतना।

कोई लंबा भाषण नहीं। कोई कहानी नहीं। बस एक लाइन, और वो लाइन सुनते ही उनकी आवाज़ टूट गई।

"रात को जब दुकान बंद करती हूँ," वो बोलीं, "तो कुर्सी पर बैठती हूँ। कुछ देर तक। खाली दुकान देखती हूँ। बोरियों पर रखी दालें, गुड़ की टोकरी, और वो तराज़ू, जो अब कोई नहीं देखता। फिर सोचती हूँ — सुबह उठकर किसके लिए छोटी रोटी बनाऊँगी? साजिद उठता है, अपना काम करता है, चला जाता है। और मैं… मैं रह जाती हूँ।"

उन्होंने साजिद की तरफ़ नहीं देखा।

"मैंने उससे कह दिया था कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं।"

साजिद का हाथ रुक गया।

"गुस्से में नहीं कहा था," वो बोलीं। "डर में कहा था। मैंने सोचा, अगर मैं कह दूँगी कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं, तो शायद जाने के वक़्त उसे कम तकलीफ़ होगी।"

उन्होंने लंबी साँस ली।

"जाने के वक़्त उससे ज़्यादा तकलीफ़ किसी को नहीं होती जो यहीं रह जाता है। और मैंने उसे यही नहीं बताया।"

अब साजिद ने कुल्हड़ रखा।

उसके हाथ काँप रहे थे। उसने एक बार शबनम आपा की तरफ़ देखा, फिर उस्ताद की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।

"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता," उसने कहा।

आवाज़ पतली थी, टूटी हुई।

"मैं बुरा बेटा नहीं बनना चाहता, उस्ताद जी। सच कह रहा हूँ। रात को जब मैं कॉपी खोलता हूँ, तो हर महीने वही आता है — घाटा। और हर महीने वो थोड़ा बड़ा होता है। पहले दो हज़ार, फिर तीन, फिर आठ। और मैं बैठकर सोचता हूँ कि जो आदमी ठीक से तोल भी नहीं सकता, वो क्या कर सकता है? पढ़ाई में भी कमज़ोर हूँ। माँ कहती है दिमाग़ लगा। लगाता हूँ उस्ताद जी, सच में लगाता हूँ। पर हर महीने पेपर आता है और मेरा नाम नीचे होता है, और माँ की नज़र में वो अपमान मुझे ऐसे देखता है जैसे… जैसे मैंने जानबूझकर किया हो।"

उसने आँखें मसलीं।

"और फिर वो आदमी आया। मुस्कुराते हुए आया। उसने माँ की दवा के लिए पैसे दिए — बार-बार, तीन हिस्सों में — और एक बार भी ये नहीं कहा कि कब लौटाऊँगा। जब इंसान कुछ बिना शर्त देता है, तो मैं घबरा जाता हूँ। मुझे लगता है वो मुझसे कुछ ऐसा माँगेगा जो मैं नहीं दे सकूँगा। और वो सच में माँग रहा है ना? एक अंगूठा। बस एक अंगूठा।"

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

"और मैं… मैं उस रात से सोच रहा हूँ कि अगर मैं शहर भाग जाऊँ, तो सब कुछ पीछे छूट जाएगा। घाटा, दुकान, माँ की नज़र, अपना नाम — सब। मुझे लगता है भाग जाना ही इकलौता रास्ता है।"

वो चुप हो गया।

दीये की लौ हिल रही थी। पीपल से एक पत्ता गिरा और उसके कंधे पर रुक गया, और उसने उसे हटाया नहीं।

नसीमा बाई ने उसकी तरफ़ देखा।

पहली बार, उस शाम, उन्होंने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई माँ अपने बेटे को नहीं, किसी अजनबी को देख रही हो — जिसे वो जानना चाहती हैं।

"तू भागना चाहता है?" उन्होंने पूछा।

"नहीं," साजिद ने कहा। और फिर सच बोला — "पर रुकने से डर लगता है।"

नसीमा बाई ने सिर हिलाया।

"मुझे भी," उन्होंने कहा।

और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने नहीं सोचा था।

नसीमा बाई मुस्कुराईं।

छोटी सी मुस्कान। थकी हुई। पर मुस्कान।

"तेरे पापा भी ऐसे ही थे," उन्होंने कहा। "रोज़ दुकान पर बैठते, और रोज़ शाम को कहते — नसीमा, आज अगर कोई ग्राहक न आया तो मैं दुकान बंद करके तीर्थ करने चला जाऊँगा। और मैं हँसती थी। तीस साल तक हँसती रही। वो एक दिन भी नहीं गए।"

साजिद ने उनकी तरफ़ देखा।

"मरने से पहले वो बोले थे — दुकान संभालना, नसीमा। और मैं समझी थी कि वो दुकान की बात कर रहे हैं।"

उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया।

"अब समझ आता है कि वो मुझसे कह रहे थे कि अकेली मत बैठना। मुझे उस वक़्त नहीं सूझा।"

साजिद कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा — "माँ।"

वो शब्द इतने सालों में पहली बार ऐसे निकला, जैसे उसने कहा हो कि माफ़ कर दे।

"मैं शहर नहीं जाऊँगा।"

नसीमा बाई ने उसकी तरफ़ देखा।

"भागने से कुछ ठीक नहीं होगा," उसने कहा। "मैंने सोचा था कि जब मैं जाऊँगा, तब माँ को फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पर आज सुना, तो पता चला कि फ़र्क़ पड़ता है। मुझे नहीं पता उस आदमी के पैसे कैसे लौटाऊँगा। मुझे नहीं पता दुकान कैसे चलेगी। मुझे नहीं पता खुद का नाम कैसे ऊपर आएगा। पर मैं भाग नहीं रहा।"

नसीमा बाई ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"और अगर मैं जाऊँ," उन्होंने कहा, "तब भी साथ लेकर जाऊँगी।"

साजिद ने उनका हाथ पकड़ा।

दोनों हाथ एक-दूसरे को पकड़े रहे, और कुछ देर तक कुछ नहीं बोले। कोई काग़ज़ नहीं खुला। कोई वकील नहीं बोला। कोई अंगूठा नहीं लगा।

बस दो हाथ।

और उस वक़्त मेरे हाथ की घंटी, जेब में पड़ी हुई, धीरे से बजी।

मैंने उसे जेब से निकाला।

पीतल की सतह पर दीयों की रोशनी पड़ रही थी। और उसकी आवाज़ आई — बहुत धीमी, जैसे कोई दूर से बोल रहा हो।

"सच्ची माफ़ी," उसने कहा।

मैंने सिर हिलाया।

और फिर मैं उठा।

मैंने पलड़ा उठाया और नसीमा बाई की तरफ़ बढ़ाया।

"ये आपका है," मैंने कहा। "पर आज इसे मैं ठीक नहीं करूँगा।"

वो चौंकीं।

"तो कौन करेगा?"

"आप।"

"मैं?"

"आप," मैंने कहा। "और साजिद।"

मैंने टूलकिट से छोटी रिंच निकाली और साजिद की तरफ़ बढ़ाई।

"तराज़ू का काँटा टेढ़ा है," मैंने कहा। "इसे कोई लोहा सीधा करता है — बस एक छोटी सी चीज़ चाहिए। एक बोल्ट, एक रिंच, और हाथ जो सीधा रखे।"

साजिद ने रिंच पकड़ी।

"माँ को पकड़ना होगा।"

नसीमा बाई ने पलड़े को दोनों हाथों से पकड़ा।

"अब धीरे से," मैंने कहा। "काँटा नीचे देख रहा है। उसे ऊपर लाना है।"

साजिद ने रिंच लगाई।

उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने देखा, पर कुछ नहीं कहा।

"उस्ताद," उसने कहा, "मुझसे नहीं होगा।"

"होगा," मैंने कहा। "क्योंकि आज तू माँ का हाथ पकड़े हुए है। जब हाथ जुड़ा हो, तो काँटा खुद सीधा आता है।"

उसने धीरे से घुमाया।

काँटा पहले थोड़ा हिला। फिर थोड़ा और। फिर जैसे किसी पुरानी हड्डी की चरचराहट के साथ, वो सीधा हो गया।

"अब छोड़ो," मैंने कहा।

साजिद ने रिंच हटाई।

नसीमा बाई ने पलड़ा सावधानी से तराज़ू के काँटे पर टाँग दिया। टाँग फँसी नहीं। वो सीधी बैठ गई।

तराज़ू अब पूरा था।

दीयों की रोशनी में वो दोनों पलड़े बराबर लटक रहे थे — धीमे-धीमे हिलते हुए, जैसे कोई साँस ले रहा हो।

तभी शबनम आपा उठीं।

"रुको," उन्होंने कहा।

वो गुमटी में गईं और एक किलो की चीनी की बोरी लेकर आईं।

"ये मेरी गुमटी की चीनी है," उन्होंने कहा। "आज इसे इसी तराज़ू पर तोलो।"

नसीमा बाई ने पुराने बाट उठाए। साजिद ने बोरी पलड़े पर रखी। और तराज़ू ने तोला — सीधा, बिना हिचक।

एक किलो।

न ज़्यादा, न कम।

शबनम आपा ने देखा और ज़ोर से हँसी।

"अरे, आज से गली का हिसाब सीधा हो गया!" उन्होंने आवाज़ दी। "सुनो सब! नसीमा की दुकान का तराज़ू सीधा हो गया!"

चबूतरी पर बैठे बच्चे ताली बजाने लगे। गुड्डू ने कहा कि उसे पहले ही पता था। चिंटू ने कहा कि उसे तो पता ही नहीं था। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाकर देखा और कहा कि अब तोल ठीक दिख रहा है — जबकि वो चश्मे से देख ही नहीं रहा था।

मैं हँसा।

और उसी वक़्त घंटी फिर बजी।

इस बार साफ़। पूरी। दीयों की लौ हिली।

"छोटा जोड़," उसने कहा। "बारह अंक।"

मैंने उसे हथेली में उलटा।

"कुल?"

"एक सौ तीस।"

मैं कुछ देर खड़ा रहा।

एक सौ तीस।

तीस अंक से ज़्यादा का घाटा। एक जोड़ पर बारह मिले, पर छिपा दर्द देखने के चालीस पहले ही कट चुके थे, और रजिस्टर की परत के सत्तर भी।

मैंने मुस्कुराकर घंटी को जेब में रखा।

"घाटा हो गया," मैंने धीरे से कहा।

"हो गया," घंटी ने कहा।

"फिर भी?"

"फिर भी।"

मैंने सिर हिलाया।

यही तो तंत्र का सबसे सच्चा हिसाब था — कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें आपका नुक़सान होता है, और आपको फिर भी करना होता है, क्योंकि उस नुक़सान से बड़ी कोई चीज़ बच जाती है।

नसीमा बाई उठीं।

उन्होंने साजिद को साथ लिया और चलने लगीं।

फिर वो रुकीं।

"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी ही थी — थकी, धीमी, पर सच्ची।

"हाँ, आंटी?"

"एक बात है जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"

"कहिए।"

वो मेरे पास आईं और उन्होंने धीरे से कहा — वैसे ही धीरे, जैसे कोई किसी को अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी बता रहा हो।

"उस आदमी ने साजिद को दुकान का एक काग़ज़ दिखाया था। उसने कहा था कि चार दिन बाद लौटाना है। पर वो काग़ज़…"

वो रुकीं।

"उस काग़ज़ पर मेरे मरहूम पति के हाथ का अंगूठा था।"

मेरे हाथ रुक गए।

दीये की लौ काँपी।

पीपल की पत्तियाँ हिलीं।

और घंटी, जेब में पड़ी, यह भी धीरे से जैसे किसी ने बहुत कम आवाज़ में, बस इतना कहा — "फिर से अंगूठा।"

वो दोनों अंधेरे में चले गए।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

पलड़ा मेज़ पर रखा था, और अब वो सीधा था — और मुझे लगा कि उस एक सीधे पलड़े के नीचे एक और झूठ बैठा है, बड़ा वाला, जिसमें एक मुर्दे का अंगूठा स्याही बनकर काग़ज़ पर चल रहा है।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "अब?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"अब," मैंने कहा, "अब हमें उस काग़ज़ का पता चाहिए जो उसने साजिद को दिखाया। और वो काग़ज़ किसी ताले में होगा — उसी तरह, जैसे दादा का काग़ज़ था।"

"और वहाँ भी कोई रजिस्टर?" टिंकू ने पूछा।

"शायद।"

"तो हमें क्या ढूँढना है?"

मैंने पीपल के ऊपर देखा। आसमान में एक पतला बादल था, जो चाँद के सामने से गुज़र रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा, "अब तक हमने दादा के काग़ज़, पापा के काग़ज़, सलीम के काग़ज़, दादी के काग़ज़ ढूँढ़े हैं। सब अलग-अलग कोने से खोले गए।"

"हाँ।"

"पर कोई ऐसा काग़ज़ है जो सबको एक साथ जोड़ता है।"

"कौन सा?"

"तू जानता है वो कौन सा है?"

टिंकू ने सिर नीचे किया।

"मरहूम का अंगूठा," उसने कहा।

"हाँ। और जब कोई मुर्दे का अंगूठा काग़ज़ पर लगवाता है, तो कोई मुर्दे से भी बड़ी चीज़ माँग रहा होता है। वो काग़ज़ ज़मीन का है, टिंकू। और उस ज़मीन में वो सब पड़ा है जो हमने अभी जोड़ा है।"

टिंकू ने कुछ सोचा।

"आंटी ने क्यों नहीं पहले बताया?"

"क्योंकि उन्हें भी डर था।"

"किससे?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"इस बात से कि अगर वो बता देंगी, तो साजिद फँस जाएगा।"

मैंने घंटी जेब में मज़बूती से रखी।

"आज की सुलह एक चीज़ पर खड़ी है, टिंकू। अगर वो काग़ज़ बाहर आया और उस पर मुर्दे का नाम सही साबित हुआ, तो ये सुलह धूल में मिल जाएगी। और उसके साथ नसीमा बाई का तराज़ू भी।"

"तो हमें उस काग़ज़ को पहले ढूँढ़ना है।"

"हाँ।"

"कहाँ?"

मैंने पीपल के नीचे रखे दीयों की तरफ़ देखा। फिर उस पीतल के पलड़े की तरफ़, जो अब सीधा लटक रहा था।

"टिंकू," मैंने कहा, "कल सुबह सभा में हम सब रजिस्टर खोलेंगे। पर आज रात खुद जागेंगे। क्योंकि अगर उस काग़ज़ पर किसी मुर्दे का नाम चल रहा है, तो हमें उसे उस तरह खड़ा करना होगा जैसे हमने सातवें नाम को खड़ा किया था।"

"और अगर वो मुर्दा सच में अंगूठा लगवाने वाला निकला?"

"तब," मैंने कहा, "तब हम उस ज़मीन का हिसाब अपने हाथ में लेंगे — पर मुर्दे की नहीं, उनके बचे हुए लोगों की गवाही से।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

शबनम आपा ने दीये बुझाने के बजाय और तेल डाला।

"आज रात जलते रहेंगे," उन्होंने कहा।

मैं पीपल के नीचे से निकला।

गली सो रही थी। नसीमा राशन भंडार का शटर धीरे-धीरे नीचे आ रहा था। साजिद का चादर वाला छत का दीपक अभी बुझा नहीं था।

और मेरे कंधे पर जो घंटी थी, वो खुद बजकर नहीं बोली।

पर मुझे पता था कि जब सुबह दस बजे वो रजिस्टर खुलेगा, तो उसके पीछे का अंगूठा भी खुलेगा। और उस अंगूठे ने नसीमा बाई के मरहूम पति को भी छुआ था — वो आदमी जिसकी दुकान में कोई लेन-देन नहीं हुआ, पर जिसका अंगूठा कहीं और गया।

दुनिया में काग़ज़ कई तरह के होते हैं। पर स्याही एक जैसी होती है।

और वो स्याही, जो एक बार किसी मुर्दे की उँगली पर लग गई, फिर किसी और की उँगली पर भी लगेगी — क्योंकि जो हाथ ऐसा करता है, वो एक बार में नहीं रुकता।

मैंने चलते-चलते धीरे से कहा, "घंटी।"

"हूँ।"

"अब मुझे पता है कि तू उस रात क्यों नहीं बोली, जब सब लोग सो रहे थे। तू चुप थी क्योंकि तुझे मेरे सिवा किसी और की आवाज़ चाहिए थी — कोई ऐसा, जो उस काग़ज़ पर अपना हाथ रख सके और हमें बता सके कि उस पर किसका अंगूठा है।"

घंटी ने कहा, "कल तीन आदमी रजिस्टर खोलेंगे। एक और भी है जिसे तू नहीं जानता।"

मैं रुका।

"कौन?"

घंटी चुप हो गई।

मैंने एक लंबी साँस ली और चल पड़ा।

गली के मोड़ पर जब मैं मुड़ा, तो दूर, सफ़ेद गाड़ी की लकीरों वाली जगह पर, कोई खड़ा था। सिर्फ़ एक आकृति — सफ़ेद कुर्ते में, एक हाथ में कुछ, दूसरे हाथ से शायद कुछ माँग रहा हो।

पर वो आकृति एक पल में गायब हो गई, जैसे सुबह की धूप में पड़ी परछाई।

मैंने देखा।

फिर मैंने घंटी जेब में कसकर दबाई और सीधा दुकान की तरफ़ चल दिया — क्योंकि कल सुबह दस बजे, सिर्फ़ एक रजिस्टर नहीं खुलने वाला था।

एक मरहूम आदमी का अंगूठा भी खुलने वाला था।

और उसके पीछे का साया — जो अभी तक किसी नाम से नहीं बँधा था।

॥

गली के मोड़ पर जब टेम्पो का हॉर्न बजा, तो मैं रुक गया।

पीछे मुड़ा। सफ़ेद टेम्पो नाली के किनारे-किनारे आ रहा था। उसकी एक हेडलाइट टूटी थी, इसलिए रोशनी आधी थी और परछाई दुगनी। ऐसा लगा जैसे रोशनी खुद अपने साथ एक अंधेरा लेकर चल रही हो।

मैंने घंटी जेब में दबाई।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "ये टेम्पो मुझे पसंद नहीं आ रहा।"

घंटी चुप रही।

"कम से कम ये तो बता," मैंने कहा, "अंदर कौन है?"

तब भी चुप।

टेम्पो रुका। ड्राइवर उतरा, पीछे का दरवाज़ा खोला। अंदर से मनोज निकला — वही दुबला आदमी, जिसके काग़ज़ों का बंडल कभी सीने से चिपका रहता था। आज उसके हाथ खाली थे।

और यही सबसे डरावनी बात थी।

खाली हाथ वाला आदमी उससे ज़्यादा खतरनाक होता है, जिसके हाथ में काग़ज़ हों।

"अंकुश भाई," उसने कहा, "साहब ने भेजा है।"

"साहब को इतनी रात को नींद नहीं आ रही?" मैंने पूछा।

मनोज मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में भी कुछ सीखा हुआ था — जैसे किसी ने उसे रटा दिया हो कि मुस्कुराने से बात शुरू होती है।

"ये रात नहीं है भाई," उसने कहा। "शाम ही तो ढली है।"

"गली के हिसाब से देखो," मैंने कहा, "तो यहाँ सूरज जल्दी सो जाता है।"

मनोज हँसा। फिर उसने टेम्पो के अंदर हाथ डाला और एक डिब्बा बाहर खींचा।

मैंने देखा।

वो डिब्बा चमक रहा था।

ऐसा चमक रहा था जैसे हमारी गली में कभी आया ही न हो।

लोहे का, मोटा, ऊँचाई में मेरे घुटने तक। ऊपर का ढक्कन गोल नहीं, सपाट था और उस पर किसी कंपनी का नाम खुदा था। किनारों पर पीली धातु की पट्टियाँ, कुंडे पीतल के, और नीचे चार छोटे पहिये — इतने छोटे कि लगे डिब्बा खुद चलना चाहता हो।

एक डिब्बा जिसमें पहिये हों। मैंने सोचा, अब औज़ार भी सफ़र करेंगे।

और डिब्बे के साथ, मनोज के दूसरे हाथ में, एक मोटा काग़ज़ का लिफ़ाफ़ा था। बादामी रंग का, ऊपर कोई मोहर नहीं, सिर्फ़ एक नीली लकीर। वो लकीर किसी अंगूठे के निशान जैसी थी, पर नहीं भी थी।

"रखो," मनोज ने कहा और डिब्बा ज़मीन पर रख दिया।

धातु ने गली के पत्थर पर जो आवाज़ की, वो आवाज़ गली में कभी किसी औज़ार की नहीं हुई थी।

फिर मनोज ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये भी," उसने कहा। "साहब ने खुद पढ़कर भेजा है।"

मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। हल्का नहीं था। अंदर एक ही काग़ज़ नहीं था, कुछ मोटा था। मेरी उँगलियों ने उसे दबाकर महसूस किया — कुछ मुड़ा हुआ, कुछ कड़ा।

तभी नसीमा राशन भंडार का शटर रुका।

उसने आधा शटर उठाया और बाहर झाँका।

"ये क्या है?" उसने पूछा।

"तोहफ़ा," मनोज ने कहा, बिना नाम लिए।

"किसका?"

"साहब का।"

नसीमा बाई ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर डिब्बे की तरफ़, और उसकी नज़र उस चमक पर अटक गई। वो चमक जानी-पहचानी थी। उसने अपने पलड़े की टाँग सीधी करते वक़्त यही चमक देखी थी — किसी और की चीज़, किसी और की स्याही से चमकती हुई।

"साजिद को बुला लूँ?" उसने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा।

पर तब तक टिंकू आ चुका था।

वो रोज़ घर जाने से पहले दुकान की तरफ़ एक चक्कर लगाता था। आज उसका चक्कर सीधा डिब्बे पर आकर रुका।

"ये क्या है उस्ताद?" उसने पूछा।

"मुझे भी देखना है," मैंने कहा।

"ये तो… ये तो स्कूल का दफ़्ता है।" उसने ढक्कन पर हाथ रख दिया। "हमारे स्कूल के स्टोर में ऐसा ही एक है। उसमें रोल नंबर की कॉपियाँ रखी हैं। मैंने एक बार उठाने की कोशिश की थी — ढक्कन इतना भारी था कि उँगली दब गई।"

"तो इसमें कॉपियाँ होंगी?"

"नहीं," उसने ऊपर देखकर कहा। "इसमें औज़ार होंगे। पर मैंने सोचा… हम तो स्कूल के दफ़्ते में भी ऐसा ही ढक्कन उठाते थे।"

"उठाया करते थे?"

टिंकू ने मुँह सिकोड़ा।

"पकड़े भी गए थे," उसने कहा।

मैं हँसा। बिना आवाज़ के। उस तरह की हँसी जो अंदर ही रह जाती है, बाहर नहीं आती — क्योंकि बाहर हँसने की जगह इस वक़्त सही नहीं थी।

तभी गुड्डू दौड़कर आया। पीछे सानिया, रफ़ीक़ और चिंटू।

"क्या लाया है?" गुड्डू ने कहा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा।

"फिर बड़ा डिब्बा क्यों है?"

"स्टोर करने के लिए।"

"हमें दिखाओ।"

"नहीं।"

"एक झलक।"

"नहीं।"

चिंटू ढक्कन के पास पहुँच गया।

"इस पर लिखा क्या है?" उसने पूछा।

"कंपनी का नाम," टिंकू ने कहा।

"कौन सी कंपनी?"

"जो चमकदार चीज़ें बनाती है," मैंने कहा।

"ये मुफ़्त में मिला है?" सानिया ने पूछा।

मैंने लिफ़ाफ़े को देखा।

"यही सवाल," मैंने कहा, "मेरे मन में भी है।"

रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया और डिब्बे के पास झुककर देखा, जैसे उस पर कोई राज़ लिखा हो।

"उस्ताद," उसने कहा, "इस पर धूल नहीं है।"

"तो?"

"तो ये सफ़र में नहीं आया। ये सीधा आया है — कहीं से, बिना रास्ता देखे।"

बच्चा सही बोल रहा था। और मुझे लगा कि आजकल गली के बच्चे बड़ों से ज़्यादा देखने लगे हैं। शायद इसलिए कि बड़ों ने देखना छोड़ दिया है।

तभी शबनम आपा आईं।

उनके हाथ में चिमटी थी, पर आज वो बंद मुट्ठी में थी। सिर्फ़ नुकीला हिस्सा बाहर था, और उस नुकीले हिस्से ने डिब्बे की चमक को छुआ जैसे कोई उँगली से दूध की तपिश जाँचता है।

"शबनम आपा," टिंकू ने कहा, "आप देखिए, ये स्कूल का दफ़्ता है ना?"

शबनम आपा ने डिब्बा देखा।

फिर उन्होंने अपनी चिमटी वापस कमर में खोंसी और कहा —

"बेटा, साहब की मुस्कान भी इसी डिब्बे में पैक होकर आई है। ज़रा सँभालकर खोलना।"

गली चुप हो गई।

क्योंकि जब शबनम आपा मज़ाक करती हैं, तो बात में नमक होता है। और जब वो सीधे बोलती हैं, तो उसमें काँटा।

आज उनकी बात में दोनों थे।

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।

अंदर से एक काग़ज़ निकला। मोटा, सफ़ेद, ऊपर रेशे वाला। उस तरह का काग़ज़ जो गली की किराने की दुकान पर नहीं मिलता, जो शहर के बड़े दफ़्तारों में रखा जाता है।

और नीचे नीली स्याही में चार लाइनें।

मैंने पढ़ा।

पहली लाइन — "अंकुश बेटा, हुनर की भी क़ीमत होनी चाहिए।"

दूसरी लाइन — "तुमने गली में जो किया, वो मैंने देखा है।"

तीसरी लाइन — "ये तोहफ़ा सिर्फ़ शुरुआत है।"

चौथी लाइन — सिर्फ़ दो शब्द थे। "तुम्हारा।"

और नीचे, किनारे पर, बाईं तरफ़, छोटे अक्षरों में एक नाम —

"गोविंद भाई।"

मैंने काग़ज़ पढ़ना बंद कर दिया।

मैं मुस्कुराया नहीं।

गली में हर आदमी मेरी तरफ़ देख रहा था। मुझे पता था कि वो मेरे चेहरे पर उसकी परछाई ढूँढ़ रहे थे जो पिछले कई दिनों से मेरे चेहरे पर थी। पर आज मेरे चेहरे पर कुछ और था। कुछ शांत।

शांत आदमी सबसे डरावना होता है — क्योंकि उसका डर बाहर नहीं आता, अंदर ही काम कर रहा होता है।

मैंने लिफ़ाफ़ा उलटा।

अंदर कुछ और था। छोटा काग़ज़। मुड़ा हुआ। किसी पुराने रसीद जैसा। पर उसे मैंने नहीं निकाला।

मीरा गुमटी से आ रही थी।

उसकी चाल देखकर लगा कि वो दौड़ी है और सांस रोककर आई है।

"क्या है ये?" उसने पूछा।

मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया।

उसने पढ़ा। फिर डिब्बे की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

"वापस कर दो," उसने कहा।

"मैंने अभी पढ़ा ही है।"

"मैं जानती हूँ। और मैं यही कह रही हूँ — वापस कर दो।"

"क्यों?"

मीरा ने अपना बैग कंधे से उतारा। वो अब भी फटा था। वो रफ़्तार में चलती है, भले खड़ी हो।

"अंकुश," उसने कहा, "मैं पाँच साल से इस शहर की हर चमकदार चीज़ का पीछा कर रही हूँ। और मैंने एक बात सीखी है। दफ़्तार से आई हर चीज़ के पीछे एक काग़ज़ होता है।"

"यह काग़ज़ भी साथ में है।"

"हाँ। और उस काग़ज़ के पीछे एक शर्त होती है।"

गली फिर चुप हुई।

पीपल के पत्ते भी चुप थे। लगा जैसे उन्होंने भी सुन लिया।

टिंकू ने ढक्कन से हाथ हटा लिया।

"तो खोलें नहीं?" उसने पूछा।

"खोलने से पहले," मीरा ने कहा, "यह देखो कि खोलने की ज़रूरत किसे है। हमें या उन्हें?"

मैंने काग़ज़ को फिर देखा। नीली स्याही सूखी थी। पर धूप की गंध आ रही थी — वो गंध जो पुराने लिफ़ाफ़ों से आती है, जो किसी दराज़ में बंद रहे हों।

"काग़ज़ किसने लिखा?" मीरा ने मनोज से पूछा।

मनोज ने कंधे उठाए।

"साहब ने दिया," उसने कहा, "मैं तो सिर्फ़ पहुँचाने वाला हूँ।"

"और गोविंद भाई का नाम नीचे क्यों है?"

मनोज ने मेरी तरफ़ देखा।

"ये साहब ही जानें," उसने कहा।

"तुम जानते हो," मीरा ने कहा।

मनोज के चेहरे पर वो वाली मुस्कान आ गई जो मुनीमों के चेहरे पर होती है जब वो सोचते हैं कि वो बच गए।

"बहन जी," उसने कहा, "मैं सिर्फ़ सर्वे करता हूँ।"

"सर्वे नहीं," मीरा ने कहा। "तुम हिसाब करते हो। और जो हिसाब करता है, वो जानता है कि काग़ज़ पर किसका नाम क्यों है।"

मनोज चुप रहा।

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा —

"अंकुश भाई, साहब ने कहा था — धीरे से देना। मैंने धीरे से दिया।"

"तुमने डिब्बा पटक दिया," मैंने कहा।

"डिब्बा नहीं," उसने कहा, "सिर्फ़ ज़मीन पर रखा है।"

"फर्क क्या है?"

"फर्क यह है," मनोज ने कहा, "कि पटकने पर ताले टूटते हैं, रखने पर नहीं।"

मैंने उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ था — कोई बात कहने की जल्दी, जो वो नहीं कह सकता था।

"मनोज," मैंने कहा, "उस डिब्बे के अंदर क्या है?"

उसने कुछ नहीं कहा।

पर उसकी गर्दन की नस हिली।

तभी दुकान के अंधेरे से एक परछाई हिली।

मैंने देखा।

पापा दुकान के पीछे वाले हिस्से में खड़े थे। उनका एक हाथ दरवाज़े की चौखट पर था, दूसरा शरीर के साथ चिपका हुआ। उन्होंने डिब्बा नहीं देखा था, वो लिफ़ाफ़ा देख रहे थे।

यह देखकर कि मैंने उन्हें देख लिया, वो पीछे मुड़े और अंदर चले गए।

बिना कुछ कहे।

चलने में भी कोई आवाज़ नहीं हुई। पापा के कदम आज भी चुप थे।

मैंने उस चमकदार डिब्बे की तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मैं उसे जेब में दबा लूँ जैसे घंटी दबाता हूँ।

"ठीक है," मैंने मनोज से कहा, "डिब्बा वापस ले जाओ।"

मनोज ने उसी मुस्कान से कहा, "साहब ने कहा था कि अगर तुम न लो, तो ऐसे ही रखकर आ जाना।"

"मैंने मना किया है।"

"मैंने सुना है," मनोज ने कहा। "पर साहब ने भी कहा था कि अंकुश भाई मना करेंगे, इसलिए मैं लिफ़ाफ़ा भी साथ लाया हूँ।"

वो मुस्कुराया।

"अब मैं जाऊँ?" उसने पूछा।

"हाँ," मैंने कहा।

वो मुड़ा। फिर रुका। फिर मेरी तरफ़ आधा मुड़कर बोला —

"हाँ, एक बात और। साहब ने कहा था कि अगर तुम वापस करना चाहो, तो सुबह दस बजे के बाद खुद ले आना।"

"कल सुबह दस बजे मेरी सभा है।"

मनोज की आँखें हल्की सिकुड़ीं।

"मुझे पता है," उसने कहा। "इसीलिए साहब ने कहा कि सभा के बाद आ जाना।"

फिर वो टेम्पो में चढ़ा और चला गया।

टेम्पो ने मोड़ पर आकर एक बार हॉर्न बजाया। वो हॉर्न का नहीं, किसी पुराने रेडियो की धुन जैसा था — जैसे मुझे याद दिला रहा हो कि भोला भाई का रेडियो अभी जोड़ा नहीं गया है।

गली में लोग खड़े रह गए।

डिब्बा वहीं ज़मीन पर पड़ा था।

बच्चे उसके चारों तरफ़ घेरा बनाकर खड़े थे।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अब?"

"अब क्या?"

"अब खोलें या नहीं?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वही चीज़ थी जो हर तेरह साल के लड़के की आँखों में होती है — डर नहीं, बस उत्सुकता। डिब्बे की चमक उसकी आँखों में उतर आई थी।

"टिंकू," मैंने कहा, "जो चीज़ इतनी चमकती है, वो अपनी नहीं होती। वो अपना रास्ता खुद नहीं चुनती। उसके लिए किसी ने मोम लगाया है।"

"मोम?"

"मतलब," मीरा ने कहा, "जो इसे भेजा है, उसने इसे चमकाया है ताकि हम इसे देखते ही उठा लें।"

टिंकू ने सिर हिलाया। फिर भी उसके हाथ डिब्बे के करीब थे।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "मैं सिर्फ़ देखना चाहता हूँ कि अंदर क्या है। खोलूँ नहीं, बस… झाँक लूँ।"

"झाँक लेना भी खोलना ही है," शबनम आपा ने कहा। "और खोलने में पसीना बह जाता है बेटा, झाँकने में नहीं।"

मैंने डिब्बे के पास घुटने रखकर बैठकर उसे गौर से देखा।

ऊपर पर एक चौकोर प्लेट थी, जिस पर दो पेंच थे। बाईं तरफ़ एक छोटा कुंडा था और उसके साथ एक छोटा ताला — पर ताला खुला था। उसके अंदर से एक काग़ज़ का टुकड़ा निकला हुआ था। किसी ने जान-बूझकर ताला खुला छोड़ा था।

मैंने वो टुकड़ा खींचा।

उस पर लिखा था — "पहली नज़र में।"

मैंने उसे मनोज को नहीं दिखाया। मैंने उस काग़ज़ को जेब में रख दिया।

टिंकू ने देखा।

"क्या था?" उसने पूछा।

"हिसाब," मैंने कहा।

"किसका?"

"उसका, जो इसे बनाकर भेजता है।"

मीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं पूछा, पर उसकी आँखों में सवाल था। सवालमीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं पूछा, पर उसकी आँखों में सवाल था। सवाल वही, जो मेरी जेब में काग़ज़ का टुकड़ा बनकर पड़ा था। और सवाल वह भी, जो अभी डिब्बे के भीतर बंद था।

मनोज दो कदम आगे आया। उसने काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाया हुआ था, जैसे कोई बच्चा अपनी कॉपी छिपाता है। उसकी आवाज़ में वही मिठास थी जो सक्सेना की आवाज़ में होती है। मीठी, पर ऐसी कि दाँत में चिपक जाए।

"अंकुश भाई," उसने कहा, "ये लिफ़ाफ़ा भी साथ है। साहब ने खास तौर पर कहा है कि डिब्बा और लिफ़ाफ़ा, दोनों साथ खोलना। एक बिना दूसरे का कोई मतलब नहीं।"

मैंने लिफ़ाफ़ा नहीं लिया।

"अगर मैं न खोलूँ?" मैंने पूछा।

मनोज मुस्कुराया।

"तो साहब को बुरा नहीं लगेगा। साहब कह रहे थे, बेटा है, अपनी दुकान का मालिक है। जबरदस्ती कहाँ की।"

"और अगर खोल लूँ?"

"तो साहब खुश होंगे।"

"अच्छा," मैंने कहा। "और खुशी का हिसाब कौन रखेगा?"

मनोज की मुस्कान एक पल के लिए हिली। फिर वापस आ गई, जैसे दीवार पर टँगी तस्वीर हवा से हिलकर सीधी हो जाए।

"भाई साहब," उसने कहा, "हिसाब तो हम सबके यहाँ रखा जाता है। बस किसी को पता नहीं चलता।"

यही बात थी। मैंने इस आदमी को पहले नहीं देखा था, पर इसकी ज़ुबान पहचानी हुई लगी। जैसे किसी पुराने रजिस्टर का कोई पन्ना ज़ुबान बनकर बोल रहा हो।

डिब्बा ज़मीन पर रखा था। उसका रंग गहरा लाल था, किनारे पर काली पट्टी और ऊपर चमकता लोहे का ढक्कन। नया इतना था कि उस पर गली की धूल अभी तक नहीं बैठी थी। जब मज़दूर उसे टेम्पो से उतार रहे थे, तो उन्हें ज़ोर लगाना पड़ा था। और ज़मीन पर रखते वक़्त उसमें से धातु की एक हल्की खनक निकली थी, जैसे अंदर कोई चीज़ अपनी जगह से खिसक गई हो।

उस वक़्त मैंने उसे खाली डिब्बे की आवाज़ समझा था। तुम सोच रहे होगे कि एक आवाज़ से क्या फ़र्क़ पड़ता है। पड़ता है। पर उस वक़्त नहीं पड़ा। उस वक़्त मेरे सामने लिफ़ाफ़ा था।

टिंकू ने डिब्बे के चारों तरफ़ घूमकर देखा।

"उस्ताद," उसने कहा, "ये तो स्कूल का दफ़्ता लग रहा है।"

"दफ़्ता?"

"हाँ, वैसा ही। जैसा मास्टर जी के कमरे में रखा है। जिसमें रजिस्टर रखते हैं।"

"तो तुम ढक्कन खोलना चाहते हो?"

टिंकू ने देखा कि मैं हँस रहा हूँ। उसका चेहरा लाल हो गया।

"मैं सिर्फ़ देखना चाहता था," उसने कहा।

"देखना और खोलना, दोनों एक ही हैं," मैंने कहा। "फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि एक को हम पाप कहते हैं, दूसरे को जिज्ञासा।"

तभी सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू आगे आ गए। चारों ने ऐसा धक्का-मुक्की शुरू किया, जैसे डिब्बा खेल का सामान हो, बम न हो।

"अंकुश भैया, एक झलक?" गुड्डू ने कहा।

"एक ही झलक," चिंटू ने कहा।

"तो सबसे पहले मैं," रफ़ीक़ ने कहा।

"पहले मैं," चिंटू ने कहा।

"तुम्हारी चप्पल मुझसे छोटी है," रफ़ीक़ ने कहा।

"चप्पल से उम्र नहीं नापते," चिंटू ने कहा।

मैंने देखा, शबनम आपा चिमटी हाथ में लेकर गुमटी से बाहर आ गई थीं। उनके चेहरे पर वो भाव था, जो गली में कुछ मुफ़्त बँटते देखकर आता है।

"क्या है ये?" उन्होंने पूछा।

"साहब का तोहफ़ा," मनोज ने कहा।

शबनम आपा ने डिब्बे को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर उन्होंने चिमटी को हल्का सा उठाया।

"तोहफ़े की मुस्कान भी अंदर है?" उन्होंने पूछा।

मनोज हँसा। "आपा जी, आप भी…"

"मैं कुछ नहीं," शबनम आपा ने कहा। "मैं बस इतना कह रही हूँ कि साहब जो भी भेजते हैं, उसमें उनकी मुस्कान भी साथ में पैक करके भेजते हैं। ढक्कन खोलते ही वो मुस्कान निकलती है और बाकी सब अंदर रह जाता है। ज़रा सँभालकर खोलना।"

मैंने मनोज के हाथ से लिफ़ाफ़ा लिया।

वो भारी था। ऐसा नहीं था जैसे काग़ज़ भारी होता है। ऐसा था जैसे किसी ने उसमें एक और चीज़ रख दी हो। लिफ़ाफ़े पर कोई नाम नहीं था, कोई पता नहीं। बस ऊपर बाईं तरफ़ नीले रंग की एक छोटी गोल मुहर थी, जिस पर पहाड़ जैसी कोई आकृति बनी थी।

मैंने उँगली से उसका कोना फाड़ा।

अंदर से मोटे काग़ज़ की एक तह निकली।

काग़ज़ ऐसा था कि उसे छूकर लगा, जैसे इसे छापने वाले ने सोचकर छापा है। उसके ऊपर अक्षर एकदम बराबर थे, छपी हुई नीली स्याही में।

मैंने पढ़ा।

"अंकुश बेटा,

गली में जो तुम कर रहे हो, वो अच्छा काम है। पर अच्छे काम की भी क़ीमत होनी चाहिए। हुनर बाँटने वाले को भूखा नहीं रखा जाता। यह छोटा डिब्बा तुम्हारे औज़ारों के लिए है, ताकि तुम्हारी दुकान की मेज़ पर ठीक वो चीज़ें रहें जो एक मिस्त्री के हाथ में होनी चाहिए, न कि वो जो कबाड़े में पड़ी मिलती हैं।

तुम्हारी दुकान मेरा मोहल्ला है, बेटा। मैं उसे जानता हूँ, जैसे अपने दफ़्तार का हिसाब जानता हूँ। और जिस चीज़ को मैं जानता हूँ, उसे मैं अधूरा नहीं छोड़ता।

यह तोहफ़ा सिर्फ़ शुरुआत है। आगे और भी है।

तुम्हारा शुभचिंतक।"

नीचे हस्ताक्षर था। रणवीर भारद्वाज। नीले रंग में, बड़ा और गोल।

और हस्ताक्षर के नीचे, एकदम कोने में, जहाँ आम तौर पर कोई कुछ नहीं लिखता, एक छोटी सी लाइन थी, ज़्यादा बड़ी नहीं, जैसे किसी ने जल्दी में जोड़ी हो।

"तैयार किया — गोविंद भाई, दफ़्तार।"

मैंने वो लाइन दो बार पढ़ी।

फिर तीसरी बार।

तीन बार पढ़ने पर भी शब्द वही रहे। फ़र्क़ सिर्फ़ यह हुआ कि मेरे हाथ में जो काग़ज़ बहुत भारी लग रहा था, अब और भारी लगने लगा।

मैं चुप हो गया।

तुम मुझे जानते हो, तो तुम जानते हो कि मैं चुप कम होता हूँ। अगर मैं चुप हो जाऊँ, तो मतलब कुछ ऐसा हुआ है जिसे मेरी ज़ुबान अभी पचा नहीं पाई।

टिंकू ने पहले पाया।

"उस्ताद?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"उस्ताद, क्या लिखा है?"

मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ सरका दिया। उसने पढ़ा। उसकी पढ़ाई धीमी है, वो मुझे पता है। वो शब्द-शब्द पढ़ता रहा। और जब आख़िरी लाइन पर पहुँचा, तो उसका चेहरा बदल गया।

"गोविंद भाई?" उसने कहा। "दफ़्तार का गोविंद भाई?"

"हाँ," मैंने कहा।

"वो जो रोज़ अस्पताल के बाहर नींबू-मिर्ची का हार लेकर खड़े रहते हैं? जिनके हाथ काँपते हैं?"

"हाँ।"

टिंकू ने काग़ज़ वापस मेरी तरफ़ बढ़ा दिया, जैसे उसने छुआ भी हो तो अब नहीं छूना है।

मीरा आगे आई। उसने काग़ज़ पढ़ा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आवाज़ एकदम सूखी थी।

"ये वापस कर दो।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो चीज़ उस दफ़्तार से आती है, उसके पीछे एक काग़ज़ होता है।" उसने काग़ज़ की तरफ़ इशारा किया। "और उस काग़ज़ के पीछे एक शर्त। और वो शर्त बड़े अक्षरों में नहीं लिखी होती, अंकुश। वो हमेशा आख़िरी लाइन में लिखी होती है, किसी के नाम के साथ।"

"मैं जानता हूँ," मैंने कहा।

"तो फिर?"

"तो फिर," मैंने कहा, "मैं ये वापस नहीं करूँगा।"

मीरा रुक गई।

"अंकुश—"

"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं इसे वापस कर दूँ, तो साहब को इतना पता चल जाएगा कि मैं डर गया। और जो डर जाता है, उसके पास जो कुछ बचा होता है, वो भी वो ले लेते हैं।"

"तो तुम क्या करोगे? इसे कबूल कर लोगे?"

"मैं इसे नहीं कबूल करूँगा और न ही नकारूँगा।" मैंने काग़ज़ को मोड़कर लिफ़ाफ़े में डाला। "मैं इसे इसी तरह रखूँगा, जैसे कोई काग़ज़ किसी मुकदमे में रखा जाता है। और जब सही वक़्त आएगा, तो इसी काग़ज़ को उनके सामने पढ़कर सुनाऊँगा।"

मीरा ने मेरी आँखों में देखा।

"तुम्हें पता है ना," उसने कहा, "कि ये चीज़ इसलिए भेजी गई है कि अगर तुमने इसे छुआ, तो कल की सभा में कोई उठकर कहेगा कि अंकुश ने साहब का तोहफ़ा ले लिया। और फिर तुम्हारी हर बात में एक शक जुड़ जाएगा।"

"मुझे पता है।"

"और अगर तुमने इसे नहीं छुआ, तो कल कोई कहेगा कि अंकुश को साहब का दिया हुआ औज़ार भी नहीं चाहिए, क्योंकि वो पहले से कोई और हाथ रख चुका है।"

मैं मुस्कुराया।

"तो इसमें दोनों तरफ़ शक है," मैंने कहा। "मतलब हिसाब बराबर। जो हिसाब बराबर हो, उसमें इंसान अपनी मर्ज़ी चुन सकता है।"

तभी मेरी नज़र दुकान की तरफ़ गई।

पापा दरवाज़े पर खड़े थे।

वो पहले भी वहीं खड़े थे, मुझे याद है। जब डिब्बा उतर रहा था, तब भी वो वहीं थे, पर थोड़ा पीछे। अब वो दरवाज़े के एकदम किनारे पर थे, कंधा दीवार से टिका हुआ, और चेहरा… चेहरा ऐसा जैसे कोई पुराना हिसाब बंद कॉपी से खुद बाहर आ गया हो।

उन्होंने काग़ज़ नहीं पढ़ा। उन्होंने सिर्फ़ मनोज को देखा। फिर डिब्बे को। फिर मेरी तरफ़।

और फिर वो अंदर चले गए। एक शब्द नहीं कहा। पैर भी ज़मीन पर ऐसे नहीं टिके जैसे पहले टिकते थे। लगा, जैसे कोई चीज़ उनके कंधों पर लाद दी गई हो, जो बहुत पहले उतार दी गई थी।

मैंने उन्हें रोकना चाहा।

पर मैं नहीं रोका। क्योंकि मैं जानता हूँ कि पापा की चुप्पी में जो है, वो अकेले में ही खुलता है। और मेरे पास अभी उनके लिए एक ज़ुबान थी, जो सिर्फ़ एक ही बात कहती है — गोविंद भाई।

उस्ताद अली बक्श भी आ गए थे। वो अपने मोटे चश्मे के बिना थे, हाथ में कपड़े का एक टुकड़ा था। उन्होंने लिफ़ाफ़ा ऊपर से नीचे तक देखा, फिर डिब्बे को देखा।

"यह डिब्बा," उन्होंने धीरे से कहा।

"क्या?"

"कुछ भी बोलने से पहले," उन्होंने कहा, "इसके तल्ले को उलटकर देखना।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"तल्ला?"

"जो चीज़ ऊपर से साफ़ हो," उस्ताद ने कहा, "उसके नीचे का हिसाब वैसे देखा जाता है। दस साल में मैंने एक ही चीज़ सीखी है — अच्छे डिब्बे के नीचे हमेशा एक पुराना तल्ला होता है।"

मनोज ने हँसकर कहा, "उस्ताद जी, ये डिब्बा साहब ने खास बनवाया है। नया है।"

"तभी तो," उस्ताद ने कहा, "नए का पुराना तल्ला पहले देखना चाहिए।"

मनोज की मुस्कान थोड़ी और मुश्किल में आ गई।

"अंकुश भाई," उसने कहा, "डिब्बा तो आप ले लीजिए, बाकी बातें साहब से हो जाएँगी। मैं अब चलूँ? मेरा काम बाकी है, टेम्पो भी रुका हुआ है।"

"रुक जाइए," मैंने कहा।

"भाई साहब—"

"दो मिनट," मैंने कहा। "हम सिर्फ़ डिब्बा उलटकर देखेंगे। जो चीज़ साहब ने भेजी है, उसे देखने का हक़ तो हमें है ना?"

मनोज की आँखें एक पल के लिए मेरी जेब की तरफ़ गईं। फिर डिब्बे की तरफ़।

"देखिए," उसने कहा, "ऐसा मतलब नहीं है मेरा।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

मैंने टिंकू को इशारा किया।

वो साथ आया। सानिया, गुड्डू और रफ़ीक़ भी पीछे आए। चिंटू ने उँगली उठाई, "अंकुश भैया, मैं भी?" और मैंने सिर हिलाया।

"चारों तरफ़ से उठाना है," मैंने कहा। "धीरे। कोई जल्दी नहीं।"

हमने डिब्बे को उठाया। वो भारी था, पर खाली डिब्बे जितना नहीं। हमने उसे उलटा किया। उसका तल्ला ऊपर आ गया। तल्ला लोहे का था, चमकता हुआ, और उस पर चार पेंच थे — दो किनारों पर, दो बीच में।

टिंकू ने पहले पेंच पर उँगली रखी।

"ये पेंच तो कसा हुआ है," उसने कहा। "हमारे यहाँ वाले पेंच घूमते हैं। ये नहीं घूमेगा।"

"हिलता है?" मैंने पूछा।

उसने ज़ोर लगाया।

और जैसे ही उसने ज़ोर लगाया, तल्ले की परत हिली।

एक शब्द नहीं, एक हल्की-सी हरकत — जैसे किसी पुराने दरवाज़े का पल्ला अपनी जगह से एक उँगली भर खिसक जाए।

और फिर भीतर से आवाज़ आई।

खट।

खट-खट।

धातु की आवाज़ थी। छोटी, धीमी, पर साफ़। जैसे कोई चीज़ बंद होकर भी बोल रही हो। जैसे किसी ने अंदर कुछ रखकर ढक्कन ऊपर से दबा दिया हो, और वो चीज़ अभी तक अपनी जगह से हिल नहीं पाई हो, बस उँगली उठाकर दरवाज़ा खटखटा रही हो।

मैंने झट से हाथ पीछे किया।

टिंकू ने भी।

सानिया ने मुँह पर हाथ रख लिया।

रफ़ीक़ ने चश्मा आँख पर लगाया।

चिंटू ने चप्पल कसकर पकड़ ली।

शबनम आपा ने चिमटी नीचे कर दी।

उस्ताद ने कपड़े का टुकड़ा अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

और मनोज — मनोज का रंग उड़ गया था। उसका चेहरा वैसा हो गया जैसे उसने पहली बार देखा हो कि वो डिब्बा अपने साथ क्या लेकर आया है।

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसने आँखें चुरा लीं।

"ये क्या है?" मैंने पूछा।

"मुझे नहीं पता," उसने कहा।

"मनोज भाई।"

"मुझे सच में नहीं पता," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ डिब्बा उतारने आया था। साहब ने कहा था—"

"क्या कहा था?"

"साहब ने कहा था," उसने धीमे से कहा, "कि डिब्बा अंकुश भाई के हाथ में दे देना। बस। और कहा था कि खोलने से पहले दो मिनट सोच ले। अगर सोचकर भी खोलना हो, तो कोई रोक नहीं रहा।"

मैंने घंटी जेब से निकाली।

उसे हथेली पर रखा।

और घंटी बजी।

एक बार नहीं। दो बार। छोटी, हल्की, ऐसी जैसे कोई सोई चीज़ जगाकर बैठ गई हो।

और तंत्र बोला।

"तोहफ़ा नहीं," उसने कहा।

सब चुप हुए।

"हिसाब है," तंत्र ने कहा।

मैंने उसे हथेली पर दबाया।

"किसका हिसाब?"

"जिसका नाम नीचे," तंत्र ने कहा, "उसका हाथ ऊपर।"

फिर चुप।

फिर बोला।

"गोविंद काँपता है।"

और फिर चुप हो गया।

मैंने घंटी को जेब में रखा और उस डिब्बे को देखा, जो उलटा पड़ा था, और जिसके तल्ले से अब भी वो धातु की आवाज़ धीरे-धीरे आ रही थी। खट। खट-खट। जैसे कोई अंदर बैठकर उँगली से गिन रहा हो कि बाहर कितने लोग खड़े हैं।

तुम सोच रहे होगे कि ये क्या है। मैं भी सोच रहा था।

पर सोचने से पहले मुझे एक बात समझ आई।

साहब ने यह डिब्बा मुझे इसलिए नहीं भेजा कि मेरी दुकान अच्छी चल रही है। उन्होंने इसे इसलिए भेजा कि वो जानते हैं कि मेरे पास कोई चीज़ है जो उनके हिसाब में नहीं है। और एक नए डिब्बे के नीचे कोई पुराना तल्ला बंद करके वो देखना चाहते हैं कि मैं उस तल्ले तक पहुँचता हूँ या नहीं।

और मनोज… मनोज को भी नहीं पता था। या शायद पता था। शायद जानते हुए भी वो नहीं जानता।

जो आदमी अपने यहाँ काम करने वाले को भी नहीं बताता कि डिब्बे में क्या है, वो आदमी अपने आपको ईश्वर समझने लगता है।

मैंने इस बार डिब्बे को छुआ नहीं।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"कह रही थी वापस कर दो," मैंने कहा।

"अब भी कह रही हूँ," उसने कहा।

"अब वापस करने से क्या होगा?"

"तुम बताओ।"

मैंने एक लंबी साँस ली। मैंने उस उलटे डिब्बे के चारों तरफ़ खड़े लोगों को देखा — टिंकू जो अब भी झुककर उसे देख रहा था, सानिया जिसकी आँखें बड़ी थीं, उस्ताद जिनके होंठ एक लकीर में बंद थे, शबनम आपा जो चिमटी नीचे किए खड़ी थीं और मनोज जो अब अपना बंडल सीने से अलग करके हाथ में ले चुका था, जैसे वो बंडल अब उसके और मेरे बीच ढाल न रहा हो।

"मीरा," मैंने कहा, "अगर मैं ये डिब्बा वापस भेज दूँ, तो ये खट-खट उनके पास वापस चली जाएगी। और जो चीज़ उनके पास है, वो हमारे पास नहीं। हमें नहीं पता कि अंदर क्या है। इसलिए मैं इसे वापस नहीं भेजूँगा, पर कबूल भी नहीं करूँगा।"

"तो?"

"मैं इसे यहीं रखूँगा।" मैंने ज़मीन पर इशारा किया, उस जगह, जहाँ जोड़ केंद्र के सात टूटे सामान रखे थे और आठवाँ नहीं था। "पीपल के नीचे। सबके सामने। जो चीज़ आई है, वो छिपी नहीं रहेगी।"

मैंने मनोज की तरफ़ देखा।

"मनोज भाई," मैंने कहा, "आप जाकर साहब को यही बता दीजिए। कहिए, डिब्बा मिल गया। डिब्बे को खोला नहीं गया, पर उलटा ज़रूर देखा गया। और ये भी कह दीजिए कि उसके अंदर से एक आवाज़ आई, जिसकी हमें आदत नहीं है।"

मनोज ने एक पल सोचा।

"और ये भी बता दूँ कि आपने लिफ़ाफ़ा खोल लिया है?"

"हाँ," मैंने कहा। "ये भी बता दीजिए।"

"और ये कि आपने उस पर क्या जवाब दिया?"

"जवाब आज नहीं," मैंने कहा। "जवाब कल सुबह सभा में। सबके सामने।"

मनोज ने सिर हिलाया और जाने लगा।

तभी टिंकू ने पीछे से कहा, "उस्ताद, अगर डिब्बे में वो चीज़ बोल रही है, तो क्या हम उससे बात कर सकते हैं?"

मैं रुका।

मनोज भी रुका।

मैंने मुड़कर टिंकू को देखा। वो सच में सोच रहा था। उसकी आँखों में डर नहीं था, बस एक सवाल था।

"टिंकू," मैंने कहा, "अभी नहीं। जो चीज़ बंद है, वो पहले हमें बताना चाहिए कि बंद किसने किया।"

"और अगर वो नहीं बताए?"

"तो हम उसकी ज़ुबान नहीं सुनेंगे। हम उसकी आवाज़ सुनेंगे। और आवाज़ हमेशा सच नहीं होती।"

टिंकू ने सिर हिलाया। पर उसने वो डिब्बा देखना नहीं छोड़ा।

मनोज टेम्पो की तरफ़ बढ़ा और अपने मज़दूरों को बुलाया।

डिब्बा वहीं पीपल के नीचे रखा रहा, उलटा, और उसके तल्ले से खट-खट धीरे-धीरे आती रही।

मैंने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा और दुकान की तरफ़ चल पड़ा। तीन कदम चला था कि मेरे कान में घंटी की आवाज़ आई।

"अंकुश।"

"हूँ।"

"जो डिब्बा नीचे से बोलता है," घंटी ने कहा, "उसे ऊपर से कोई चुप नहीं करा सकता।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"और गोविंद," घंटी ने कहा, "आज रात सो नहीं पाएगा।"

मैं रुक गया।

"क्यों?"

"क्योंकि जिसका नाम नीचे लिखा जाता है," घंटी ने कहा, "उसे पता चल जाता है कि उसका नाम कहीं और भी लिखा जा चुका है।"

फिर वो चुप हो गई।

मैंने दुकान का दरवाज़ा खोला।

अंदर पापा फर्श पर बैठे थे, पुराना पंखा खोलकर सामने रखा था, और उसके तार को उँगली से सीधा कर रहे थे। हाथ काँप रहे थे। फिर भी तार सीधा हो रहा था।

मैंने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "पापा।"

वो नहीं बोले।

"पापा, उस डिब्बे के तल्ले में कुछ है जो बोल रहा है।"

उन्होंने तार सीधा करना जारी रखा।

"और उस लिफ़ाफ़े पर गोविंद भाई का नाम है।"

अब उनका हाथ रुका।

उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें बहुत थकी थीं। उन्होंने धीरे से कहा — बहुत धीरे, जैसे कोई अपना ही राज़ खुद से कह रहा हो — "तो अब तू जान गया कि वो क्यों काँपता है।"

मैं अंदर आकर उनके सामने बैठ गया।

"नहीं जाना," मैंने कहा। "मुझे ये जानना है कि वो किससे काँपता है।"

पापा ने पंखा बंद कर दिया।

"रोशनी जाने के बाद," उन्होंने कहा, "वो आदमी कुछ देर अपने दफ़्तार में बैठता है। अकेला। और उस वक़्त वो अपने हाथ अपने ही हाथ से पकड़ता है, जैसे किसी और की उँगली पकड़ रहा हो।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"गोविंद किसी इंसान से नहीं," उन्होंने कहा, "अपने ही अंगूठे से काँपता है।"

बाहर गली में टिंकू की आवाज़ आई, "उस्ताद, डिब्बा वहीं रखा है, पर मैंने पेचकस उसके पास रख दिया है, सुनने के लिए नहीं, बस—"

मैं मुस्कुराया।

पर मेरी मुस्कुराहट पूरी नहीं हुई।

क्योंकि जब घंटी "गोविंद" कह रही थी, तो उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो वो हमेशा रखती है। उसकी आवाज़ में एक चीज़ और थी।

बेचैनी।

जैसे वो भी जानती हो कि इस डिब्बे के नीचे जो बंद है, वो आज नहीं, कल खुलेगा। और कल सुबह दस बजे, पीपल के नीचे, जब रजिस्टर खुलेगा, तो मेज़ पर एक और चीज़ रखी होगी — ये डिब्बा। और उस डिब्बे में से अगर वो बात निकली जो मुझे लग रही है, तो सभा का रुख बदल जाएगा।

मैंने दुकान की मेज़ पर अपना हाथ रखा।

मेज़ पर पुराना डेंट था, दो साल पुराना, तब का जब मैंने गुस्से में कोई रेडियो पटका था।

आज मैंने कुछ नहीं पटका।

आज मैंने सिर्फ़ मन में कहा — जो चीज़ मुफ़्त आती है, वो अपने साथ एक और चीज़ लाती है।

और वो "और" चीज़, हमेशा सबसे महँगी होती है।

॥

दुकान के पीछे वाले कमरे में पुराना बल्ब गुनगुना रहा था। उसकी रोशनी में डिब्बा उलटा पड़ा था — लोहे का, चमकदार, ऊपर कंपनी का नाम, चारों तरफ़ पीली धातु की पट्टियाँ और चार छोटे पहिये। दिन में पीपल के नीचे जो खट-खट आ रही थी, अब भी वही थी, बस अब कमरे की दीवारों से टकराकर थोड़ी तेज़ लग रही थी, जैसे कोई अंदर से उँगली उठाकर कह रहा हो — मैं हूँ, यहाँ हूँ।

टिंकू फ़र्श पर पेट के बल लेटा था, ठुड्डी हाथों पर रखे, और डिब्बे के तल्ले से कान सटाकर सुन रहा था। उसने अपना पेचकस डिब्बे के पास ही रखा हुआ था — ठीक उसी तरह जैसे कोई दरवाज़े पर कोई चीज़ रखकर कहे कि देखो, हम भी तैयार हैं।

काजल अस्पताल से अभी लौटी थी। उसके हाथ में दवा की प्लास्टिक की थैली थी, जिसे उसने कोने में रख दिया और फिर चारपाई के किनारे बैठ गई। उसकी नर्सिंग की किताब आज भी उसके बैग से आधी बाहर लटक रही थी। वो बोली नहीं, बस बैठकर डिब्बे को देखती रही।

मीरा ट्रंक पर बैठी थी, कैमरा उसके सामने बंद पड़ा था, और वो घुटनों पर हाथ रखकर चुप थी। आज उसने एक भी सवाल नहीं पूछा।

मैंने डिब्बे को दोनों हाथों से उठाकर सीधा किया।

"तो," मैंने कहा, "जब ये आया था, तब इसके ऊपर तोहफ़े की खुशबू थी। अब देखते हैं नीचे क्या बोलता है।"

टिंकू उठ बैठा।

"उस्ताद, मैंने सोचा था, ऊपर का ढक्कन उठाऊँ…"

"ढक्कन नहीं है इसमें," मैंने कहा। "ये बंद ही आया है। नीचे से खुलेगा।"

"मतलब तल्ला अलग है?"

"तल्ला अलग नहीं है," काजल ने पहली बार कुछ कहा। "तल्ले के नीचे कुछ और है। जब भी किसी डिब्बे से बात सुनाई दे और ढक्कन बंद मिले, समझ लेना कि अंदर दो परतें हैं।"

मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।

"तुम्हें कैसे पता?"

"अस्पताल में लाश की अलमारी भी एक डिब्बा ही है," काजल ने कहा। "कभी-कभी उसमें भी आवाज़ आती है। और हर बार जवाब ऊपर नहीं, नीचे की परत में होता है।"

कमरे में सन्नाटा हो गया।

टिंकू ने धीरे से कहा, "दीदी, आप ऐसी बातें मत किया करो। मैं अकेले में सोता हूँ।"

काजल के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

"तो अब अकेले में सोना छोड़ दे।"

मैंने डिब्बे को फ़र्श पर रखा और उसके तल्ले को देखा। चार कोनों पर चार पेंच। हर पेंच पर धूल नहीं थी, जबकि डिब्बे के बाकी हिस्से पर धूल की पतली परत थी। यानी इन पेंचों को कुछ दिन पहले खोला गया है। कुछ दिन पहले, या कुछ हफ़्ते पहले।

"टिंकू।"

"हाँ उस्ताद।"

"अपना पेचकस उठा।"

उसने अपना पेचकस उठाया, मेरी तरफ़ बढ़ाया, फिर रुक गया।

"उस्ताद, ये डिब्बा साहब का है। साहब के डिब्बे में हमारा पेचकस…"

"लगा।"

"और अगर डिब्बे के अंदर कोई कैमरा हो?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तो उसे देखने को मिलेगा कि साइकिल गली का एक लड़का साहब का डिब्बा खोलते वक़्त घबरा रहा है।"

टिंकू ने गहरी साँस ली, फिर पेचकस को पहले पेंच पर रखा। पेंच थोड़ा मुड़ा हुआ था, ज़ंग खा रहा था, पर पकड़ मज़बूत थी। उसने दबाया — एक चरचराहट, फिर ढील।

पहला पेंच निकला।

दूसरा।

तीसरा।

तीसरे पेंच के साथ ही डिब्बे के अंदर से आती खट-खट धीमी पड़ी। कमरे में सिर्फ़ चौथा पेंच बचा था और मेरी साँस।

टिंकू ने पेचकस रखा, उँगलियों से पोंछा, फिर मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, चौथा पेंच आप लगाइए।"

"क्यों?"

"क्योंकि अगर अंदर कुछ ऐसा हुआ जो ठीक नहीं है, तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मैंने खोला।"

मैंने पेचकस उसके हाथ से लिया।

"ठीक है," मैंने कहा, "तो जब अंदर कुछ अच्छा निकले, तब भी तुम कहना कि तुमने खोला।"

उसका चेहरा चमक गया।

"सौदा पक्का?"

"पक्का।"

चौथा पेंच घूमा।

डिब्बे के अंदर से खट-खट एक आख़िरी बार आई — और फिर पूरी तरह चुप।

उस सन्नाटे में कानों में जो आवाज़ आई, वो डिब्बे की नहीं, बल्ब की थी — और जैसे बल्ब भी साँस दबाकर बैठा हो।

मैंने डिब्बे का तल्ला उतारा।

नीचे एक और लोहे की तली थी, पर उस पर एक सफ़ेद पतली परत चिपकी थी, जिसे कोई पहले खोल चुका था। मैंने उसे उँगली से उठाया। नीचे एक सील बंद जगह थी, और उस जगह में कपड़े की पोटली।

पोटली छोटी थी। एक हथेली में आ जाए, ऐसी।

मैंने उसे बाहर निकाला।

कपड़ा सफ़ेद था, पर अब उस पर पीले और भूरे धब्बे पड़ चुके थे। खोलते ही एक गंध उठी — पुरानी, तेल की, थोड़ी धातु की। वो गंध मेरे नाक से सीधे बचपन तक चली गई। दुकान के पीछे, पापा के औज़ारों का ट्रंक, और उसमें से निकलने वाली ठीक ऐसी ही गंध — ग्रीस और लोहे की।

पोटली खोली।

अंदर एक पेचकस था।

पहली नज़र में वो कोई ख़ास चीज़ नहीं लगी। धातु की लंबाई मझोली, हत्था लकड़ी का, थोड़ा चिकना और फटा हुआ। पर जब मैंने उसे उठाया, तो हत्था मेरे हाथ में ऐसा बैठा जैसे पहले भी कभी बैठा हो। उसकी लकड़ी पर तेल और उँगलियों का असर पूरी तरह जम चुका था। और उसके ऊपर, बहुत छोटे अक्षरों में, किसी कील या सुई से कुछ खुदा हुआ था — बेतरतीब, टेढ़े-मेढ़े अक्षर।

"शंकर।"

टिंकू झुककर पढ़ने लगा।

"उस्ताद, ये तो…"

मैंने उसे रोका नहीं।

"ये तो हमारे यहाँ का ही माल है," उसने कहा और हँसने लगा। "साहब ने चोरी का माल भी नया पैक करके भेज दिया। पेपर में लपेटकर, फ़ीते से बाँधकर। मतलब अंकल जी, ये तोहफ़े का दूसरा हिस्सा है।"

काजल हँसी नहीं।

मीरा ने अपना कैमरा उठाया, फिर रख दिया।

और मैं हँसा नहीं।

मैंने पेचकस को हथेली पर रखकर देखा।

मेरे हाथ में कोई औज़ार आज पहली बार काँप रहा था।

ये वही पेचकस था।

बारह-तेरह साल पहले की बात है। उस वक़्त हमारे घर में एक पुराना पंखा था — फ़र्श पर खुला पड़ा, तार टूटा हुआ, और उसकी मरम्मत के बहाने पापा घंटों उसके पास बैठते थे। उनके हाथ में दो चीज़ें हमेशा रहती थीं — एक छोटी रिंच, और ये पेचकस। उस पेचकस का हत्था उनकी उँगलियों से इतना चिकना हो गया था कि नई चीज़ के मुक़ाबले वो एक अलग ही चीज़ लगता था — जैसे औज़ार नहीं, कोई पुराना सिक्का जो हाथ में रखने से गरम हो जाए।

मुझे याद है, मैंने एक बार उस पेचकस को छुपा दिया था।

मैं नौ-दस साल का रहा होऊँगा। पापा उसे ढूँढ रहे थे, दुकान में, संदूक में, ट्रंक में। वो किसी से कुछ नहीं पूछ रहे थे, बस ढूँढ रहे थे, चुपचाप। घंटे भर बाद मैंने खुद उसे उनके सामने रख दिया — मुझे लगा वो डाँटेंगे। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस पेचकस उठाया, अपनी हथेली पर रखा, और इतना ही बोले — "जो चीज़ हाथ की आदत बन जाए, वो खो जाए तो हाथ सूना लगता है।"

और अब वही पेचकस साहब के डिब्बे के तल्ले से निकल रहा था।

मैंने उसे ध्यान से देखा। हत्थे के आख़िरी सिरे पर लाल धागा बँधा था — पुराना, फीका, पर बँधा हुआ। मेरे पापा की आदत थी, अपने औज़ारों के आख़िरी सिरे पर लाल धागा बाँधने की। निशान बनाने के लिए नहीं, पहचान बनाने के लिए नहीं — कहते थे "जिस चीज़ पर लाल धागा हो, वो कभी पूरी खो नहीं जाती। कहीं कोना छूट जाए तो धागा दिख जाता है।"

मेरे कान में घंटी की आवाज़ आई।

बहुत धीमी, बहुत सपाट।

"हाथ पहचान गया।"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

"ये तेरा नहीं है," घंटी ने कहा। "ये तेरे से पहले का है, और तेरे बाद भी रहेगा। पर आज ये तेरे हाथ में आया है — यानी इसका वक़्त आ गया।"

"किसका वक़्त?"

घंटी चुप हो गई।

मैंने पेचकस की धातु देखी। उसका सिरा घिसा हुआ था, पर एक अलग तरह से। दुकान के पेचकस का सिरा मशीन से बनता है। इसका सिरा पत्थर पर रगड़कर बनाया गया था — किसी ने धैर्य से, बार-बार, एक ही कोण पर रगड़कर उसे अपने हाथ की शक्ल दी थी।

"काजल," मैंने कहा। "मैं बाहर जा रहा हूँ।"

"अभी?"

"अभी।"

"अंकुश, डिब्बे में और कुछ नहीं है?"

"नहीं," मैंने कहा। "बाकी सब लिफ़ाफ़े में था। ये सिर्फ़ औज़ार है।"

काजल ने मेरी आँखों में देखा।

"औज़ार नहीं है तब," उसने कहा। "अगर तुम्हारा चेहरा ऐसा है, तो ये औज़ार नहीं, गवाह है।"

मैं कमरे से बाहर निकला।

बाहर आँगन में ठंडी हवा चल रही थी। तुलसी के पास जलती अगरबत्ती का धुआँ सीधा ऊपर जा रहा था — हवा नहीं, बस धुआँ ऐसे ही जा रहा था। चबूतरी पर कोई नहीं था। गली सूनी थी। दूर कहीं एक कुत्ता भौंका और चुप हो गया।

पापा आँगन के कोने में बैठे थे — पुराने मूँड़े पर, पीठ दीवार से सटाकर, हाथ में चाय का गिलास। मेरे पैरों की आवाज़ सुनकर उन्होंने सिर उठाया, और उनके चेहरे पर वो भाव आया जो पिता के चेहरे पर तब आता है जब बेटा देर रात बिना आवाज़ दिए आ जाए — थोड़ी शिकायत, थोड़ी राहत, और थोड़ा डर।

"चाय ले लेना," उन्होंने कहा। "आग पर से उतारी है अभी।"

मैंने जवाब नहीं दिया।

मैं उनके सामने खड़ा हो गया।

और मैंने हथेली खोल दी।

पेचकस उनके सामने था — लकड़ी का चिकना हत्था, खुदा हुआ नाम, लाल धागा।

पापा का गिलास उनके हाथ से छूटा।

चाय ज़मीन पर गिरी, गिलास तीन टुकड़ों में बँटा, और उनकी गोदी में भी छींटे पड़े। वो हिले नहीं। उनका हाथ हवा में वैसे ही रहा — जैसे कोई चीज़ छूट गई हो और हाथ अभी भी उसे पकड़ने की कोशिश कर रहा हो।

उनका चेहरा एक झटके में पीला पड़ गया। ऐसा पीला, जैसे बल्ब की रोशनी भी उनके चेहरे को छोड़ गई हो।

"पापा।"

वो नहीं बोले।

उन्होंने पेचकस देखा। फिर मेरे हाथ को देखा। फिर पेचकस को।

और मुझे लगा कि उनके चेहरे पर सबसे पहले जो आया, वो डर नहीं था। शर्म थी।

इतनी साफ़ शर्म कि मैंने नज़र हटा ली।

अंदर से माँ की आवाज़ आई।

"क्या टूटा?"

वो दौड़कर बाहर आईं — साड़ी का पल्लू कमर में खोंसते हुए, माथे पर चंदन का टीका आधा बहा हुआ, हाथ में हिसाब की कॉपी। उन्होंने फ़र्श पर गिलास देखा, फिर पापा का चेहरा देखा, और फिर वो चुप हो गईं।

"शंकर," उन्होंने धीरे से कहा। "तुम्हारा चेहरा…"

काजल पीछे-पीछे आई, हाथ में लालटेन उठाए। उसने लालटेन ऊपर की और उसकी पीली रोशनी में पापा के चेहरे की पीलापन और भी साफ़ दिखी। फिर उसने मेरी हथेली की तरफ़ देखा और उसकी साँस रुक गई।

"ये पापा का…"

"हाँ," मैंने कहा।

माँ ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गईं। वो पेचकस को देख रही थीं, पर ऐसे नहीं जैसे पहली बार देख रही हों। ऐसे, जैसे बहुत साल पहले देखा था और उम्मीद की थी कि फिर कभी नहीं देखेंगी।

"ये तुम कहाँ से लाए?" माँ ने पूछा।

"साहब के डिब्बे के तल्ले से," मैंने कहा।

माँ ने कुछ नहीं कहा। बस पापा की तरफ़ देखा।

और पापा — पापा बहुत देर तक चुप खड़े रहे। उनका शरीर एक जगह पर स्थिर था, पर उनकी आँखों में कुछ ऐसा चल रहा था जैसे पुरानी फ़िल्म रिवाइंड हो रही हो। उन्होंने अपनी कमीज़ के छोर को देखा, फिर आँगन की ज़मीन को, फिर उस टूटे गिलास के टुकड़ों को, जैसे उनमें उनका जवाब बंद हो।

काजल ने लालटेन नीचे रखी और अपने पॉकेट से रुमाल निकालकर पापा के हाथ पर पड़ी चाय पोंछने लगी। पापा ने हाथ हटा लिया। काजल का हाथ हवा में रह गया, फिर धीरे से नीचे आ गया।

"पापा," मैंने कहा। "मैं कुछ पूछने से पहले एक बात कहना चाहता हूँ।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"ये पेचकस साहब के डिब्बे में था। साहब मुझे तोहफ़े भेजते हैं। और तोहफ़े में मेरे ही घर की चीज़ आती है। अब चाहे आप कुछ भी कहें, पर मेरे दिमाग़ में एक ही बात आ रही है — साहब को मालूम है कि ये पेचकस हमारा है। और साहब मालूम होने के बाद भी मुझे ये भेज रहे हैं। इसका मतलब वो कुछ कह रहे हैं।"

पापा ने आँखें बंद कर लीं।

"नहीं," उन्होंने कहा। "वो कुछ नहीं कह रहे। वो सिर्फ़ दिखा रहे हैं कि उनके पास क्या-क्या है।"

माँ ने कहा, "शंकर, अंदर चलो। सुबह बात करेंगे।"

"नहीं," पापा ने कहा। "अब बात होगी।"

उनका हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा, और मैंने पेचकस उनकी हथेली पर रख दिया। उन्होंने उसे उँगलियों में दबाया — पूरी ताक़त से नहीं, पर इतना कि हत्थे पर उनकी उँगलियों के निशान पड़ जाएँ।

बहुत देर तक वो उसे ऐसे ही देखते रहे।

फिर उन्होंने धीरे से, बहुत धीरे से कहा, जैसे हर शब्द उनके मुँह से निकलने से पहले किसी पुरानी मेज़ पर तोला जा रहा हो, "ये चीज़ रणवीर के दफ़्तर से कभी बाहर नहीं आनी चाहिए थी।"

माँ ने होंठ कस लिए।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़, फिर लालटेन की लौ में कुछ ढूँढ़ने लगी।

कमरे में सिर्फ़ अगरबत्ती का धुआँ चल रहा था।

मैंने एक गहरी साँस ली और पूछा, "पापा, आपने ये पेचकस खोया था, या कहीं रखा था?"

पापा ने सिर उठाया।

उनकी आँखों में कुछ था जो पहले कभी नहीं दिखा था। कोई डर नहीं, कोई शर्म नहीं। कुछ और — एक तरह की सफ़ाई, जैसे बरसों से बंद कमरे में पहली बार खिड़की खुली हो।

"मैंने इसे खोया नहीं था," उन्होंने कहा।

माँ ने कुछ कहना चाहा, पर पापा ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया। पहली बार मैंने देखा कि माँ उनके इशारे पर रुक गईं।

पापा ने पेचकस को सीने से लगाया, और इतना ही बोले — "मैंने इसे खुद उसके दराज़ में रखा था। अपनी चुप्पी का सबूत बनाकर।"

मैं कुछ कह नहीं पाया।

काजल ने लालटेन को वहीं रख दिया, क्योंकि उसके हाथ काँप रहे थे।

माँ दीवार के सहारे खड़ी हो गईं।

और आँगन में एक पल के लिए ऐसा लगा कि गली की सारी आवाज़ें भी रुक गई हैं — पीपल की पत्तियाँ, दूर का पंप, नाली का पानी। सब कुछ चुप।

मैंने धीरे से पूछा, "क्यों?"

पापा ने आँखें मेरी तरफ़ कीं।

"क्योंकि जो अपना औज़ार किसी के दराज़ में रख आए," उन्होंने कहा, "वो ये कहकर आता है कि मैं तुम्हारा हूँ। और जो अपना औज़ार अपने पास रखे, वो ये कहता है कि मैं अभी भी अपना हूँ। मैं उस दिन ये नहीं कह पाया कि मैं अपना हूँ। इसलिए अपना औज़ार वहीं छोड़ आया।"

उनके होंठ काँपे।

"और उस दिन के बाद जब भी मैंने कोई पेचकस उठाया," उन्होंने कहा, "मुझे लगा कि मैं किसी और का औज़ार उठा रहा हूँ।"

माँ ने कुछ कहा — बहुत धीमी आवाज़ में, मुझे सुनाई नहीं दिया।

पर पापा ने उनकी तरफ़ देखकर सिर हिलाया। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश।"

"हाँ।"

"सुबह तक मुझे ये पेचकस अपने पास रखने दे।"

मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा। पेचकस उनकी हथेली पर पड़ा था — पुराना, चिकना, थका हुआ।

"रखिए," मैंने कहा। "पर सुबह पीपल पर, सबके सामने, ये आपके हाथ में ही रहेगा।"

पापा ने एक लंबी साँस ली।

"हाँ," उन्होंने कहा। "अब ये मेरे हाथ में ही रहेगा।"

काजल ने चुपचाप टूटे गिलास के टुकड़े उठाए। माँ ने उसकी मदद की, और दोनों चुपचाप अंदर चलीं — माँ पहले, काजल पीछे। काजल दरवाज़े पर रुकी और पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था, जो मुझे रात भर परेशान करने वाला था।

वो बोली, "अंकुश, कल सुबह जब रजिस्टर खुलेगा, तब पीपल पर पापा के हाथ में ये पेचकस होगा। और अगर सलीम बक्श उस वक़्त वहाँ मौजूद हो, तो सोच — उसका चेहरा क्या होगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

वो अंदर चली गई।

मैं आँगन में अकेला खड़ा रह गया। पापा वहीं मूँड़े पर बैठे थे, पेचकस सीने से लगाए, आँखें बंद किए।

और मेरे कान में घंटी की आवाज़ आई, बहुत धीरे — पहली बार ऐसी आवाज़ में जैसे वो खुद भी कुछ गिन रही हो।

"अब समझा?"

"क्या?"

"जो चीज़ रणवीर के दराज़ में रखी जाती है," घंटी ने कहा, "वो चीज़ चुप नहीं होती। वो बस इंतज़ार करती है कि उसका मालिक उसे वापस लेने आए।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

"और आज वो चीज़ वापस आ गई," घंटी ने कहा। "पर वापस आने के साथ एक सवाल भी लाई है। जो दराज़ में रखा गया, उसे रणवीर ने क्यों नहीं फेंका? इतने साल तक क्यों रखा?"

मैं रुक गया।

"क्योंकि वो अब भी उसका सबूत है," मैंने कहा। "पापा की चुप्पी का नहीं — रणवीर के किसी काम का।"

घंटी चुप हो गई।

और उस चुप्पी में मुझे लगा कि वो सहमत है।

इससे पहले कि मैं कुछ और पूछता, गली के मुँह से टिंकू की आवाज़ आई — "उस्ताद! उस्ताद! डिब्बा!"

मैं दौड़कर बाहर गया।

टिंकू दुकान के बाहर खड़ा था, हाथ में अपना पेचकस, आँखें बड़ी।

"डिब्बे में…" वो हाँफ रहा था। "डिब्बे में खट-खट फिर शुरू हो गई है। पर अब आवाज़ नीचे से नहीं आ रही।"

"तो कहाँ से?"

"ऊपर से।"

मैं दुकान के अंदर गया और कमरे में देखा। डिब्बा वहीं फ़र्श पर पड़ा था, तल्ला खुला हुआ, अंदर से खाली। पर उसके ऊपरी ढक्कन के कोने से — जो पहले बंद था और अभी भी बंद था — एक हल्की खट-खट आ रही थी।

जैसे डिब्बे के अंदर कुछ और भी हो, जो पहले सो रहा था और अब जाग गया।

मैंने अपना हाथ डिब्बे पर रखा।

ठंडा था।

बिलकुल नहीं, इस डिब्बे में अभी भी कोई चीज़ बाकी है।

और वो इस पेचकस के बाद आने वाली चीज़ थी — उससे पहले नहीं।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। आँगन में पापा अब भी मूँड़े पर बैठे थे, पेचकस सीने से लगाए।

और मुझे लगा कि आज रात के बाद साइकिल गली में सबसे ज़्यादा डरने वाला आदमी रणवीर भारद्वाज नहीं, कोई और है।

कोई और, जिसका नाम शंकर यादव है — और जो आज पहली बार बरसों बाद अपना औज़ार अपने हाथ में लेकर सोएगा।

॥

डिब्बा ठंडा था।

मैंने हथेली उस पर रखी और मुझे लगा जैसे किसी बंद कमरे में कोई साँस रोके बैठा हो। खट-खट अब भी आ रही थी — धीमी, बराबर, ऊपर वाले ढक्कन के कोने से। जैसे डिब्बे के अंदर कोई चींटी नहीं, कोई घड़ी नहीं, बल्कि कोई ऐसी चीज़ करवट ले रही हो जो बहुत दिनों से सोई थी।

टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था। उसके हाथ में अपना छोटा पेचकस था, जिसे वो हर वक़्त जेब में रखता है, जैसे मैं घंटी रखता हूँ।

"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "ये ज़िंदा है क्या?"

"नहीं," मैंने कहा। "ज़िंदा होता तो अच्छा था।"

"कैसे?"

"ज़िंदा को तू डाँट सकता है, सुला सकता है, रोटी दे सकता है।" मैंने पीछे से पुरानी बोरी उठाई और डिब्बे पर डाल दी। "ये इंतज़ार कर रहा है। और इंतज़ार करने वाले से बुरा कुछ नहीं होता, टिंकू।"

बोरी के नीचे से खट-खट थोड़ी धीमी हो गई, पर बंद नहीं हुई।

मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।

"तू घर जा। सो जा।"

"पर उस्ताद—"

"कुछ नहीं पर उस्ताद। कल सुबह दस बजे पीपल पर सब खुलेगा। तब तक ये डिब्बा अपनी जगह रहेगा, और तू अपने घर में।"

टिंकू ने एक पल डिब्बे को देखा, फिर मुझे। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो बच्चों की आँखों में होता है। उसमें बेचैनी थी — कहीं कुछ छूट न जाए, वो बेचैनी।

"उस्ताद," वो जाते-जाते रुका, "अगर वो ऊपर वाला ढक्कन खुद खुल गया, तो मुझे फ़ोन कर देना।"

"तू सोएगा?"

"मैं सोऊँगा नहीं," उसने कहा और अंधेरे में भाग गया।

मैंने दुकान का आधा शटर गिराया, ताला लगाया, और आँगन की तरफ़ मुड़ा। पीछे डिब्बे से आती खट-खट मेरे कानों में रह गई थी, जैसे कोई मच्छर कमरे से निकल जाए पर उसकी भिनभिनाहट सिर में रह जाए।

आँगन में दीया जल रहा था।

माँ ने उसे दीवार के उसी कोने में रखा था जहाँ हमेशा रखती हैं — चूल्हे के पास, उस पुरानी ईंट पर जिसका एक कोना टूटा है। दीये की लौ मंद थी। कभी ऊँची होती, कभी नीची, जैसे वो भी हमारी बातें सुन रही हो और बीच में साँस ले रही हो।

माँ चटाई पर बैठी थीं। उनके हाथ में पानी का स्टील का गिलास था जिसे उन्होंने अभी भरा था और अभी तक पिया नहीं था। काजल उनके पास बैठी थी, नर्सिंग की किताब सीने से लगाए, जैसे वो कोई ढाल हो।

और पापा — वहीं मूँड़े पर। कमर झुकी हुई, चश्मा कान पर टेप से बँधा, और दोनों हाथों में वो पेचकस। सीने से लगाए हुए। आँखें ज़मीन पर।

मैं भी बैठ गया। घुटनों पर ग्रीस लगी थी, जीन्स पर धूल, पर कुछ साफ़ नहीं किया। कुछ देर तक कोई नहीं बोला।

बाहर गली से किसी साइकिल की घंटी आई, फिर दूर किसी के टीवी की आवाज़, फिर सब चुप।

तभी पापा ने साँस ली — लंबी, गहरी, जैसे वो बहुत देर से पानी के नीचे थे और अब ऊपर आए हों।

"अंकुश।"

"हाँ, पापा।"

"तूने पूछा था कि मैंने ये पेचकस उसके दराज़ में क्यों रखा था।"

"हाँ।"

"तो सुन।"

उन्होंने पेचकस को अपनी हथेली पर रखा और उसे धीरे से घुमाया, जैसे वो कोई चीज़ नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ हो जो उनकी उँगलियों को पहचानती हो।

"अंगूठा लगाने के कुछ दिन बाद की बात है," पापा ने कहा। "तेरी माँ अस्पताल से लौट चुकी थी। दवा चल रही थी। घर में…" उन्होंने रुककर गिलास की तरफ़ देखा, फिर आगे कहा, "घर में उस वक़्त तीन वक़्त की रोटी भी मुश्किल से बन रही थी। तू दुकान पर बैठता था, दो-चार साइकिलें आती थीं, पर हिसाब नहीं मिलता था। काजल की फ़ीस आने वाली थी। मैंने सुना कि भारद्वाज साहब की नई साइट पर मज़दूर चाहिए — दिन का हिसाब अच्छा है, नगद मिलेगा, उसी शाम।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"मैं वहाँ गया," पापा ने कहा। "सुबह सात बजे। गेट पर आदमियों की लाइन लगी थी। जवान, बूढ़े, औरतें, बच्चे तक। सबके चेहरे पर वही बात — आज का दिन निकल जाए तो बस। मैंने अपनी एक अच्छी कमीज़ पहनी थी, और जेब में ये पेचकस रखा था। मुझे लगा, अंदर कुछ ठीक करने को मिल जाए तो काम आएगा। मज़दूर जो हूँ, औज़ार के बिना अधूरा हूँ।"

उन्होंने पेचकस के हत्थे को अँगूठे से सहलाया।

"अंदर भेजा गया। कहा गया, ऊपर के कमरे से एक बक्सा उतारो। मैं गया। कमरा बड़ा था। फ़र्श पर सफ़ेद पत्थर, और हवा में ऐसी ठंडक जो सिर्फ़ पैसे वालों के कमरों में होती है — जैसे वहाँ गर्मी होती ही नहीं। मैंने बक्सा उतारा। फिर साहब का एक आदमी आया और बोला, तेरे हाथ खाली हैं ना, तो ये काग़ज़ उस दराज़ में रख दे।"

"दराज़ खुला था?" मैंने पूछा।

"खुला था।" पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "और बेटा, उस दराज़ में मैंने पहली चीज़ जो देखी, वो ये पेचकस नहीं थी। वो मेरा ही काग़ज़ था। वही पीली शीट। ऊपर मेरा नाम, नीचे लाल अँगूठा।"

दीये की लौ हिली। माँ ने गिलास ज़मीन पर रख दिया। काजल ने किताब और कसकर पकड़ ली।

"मैंने उसे हाथ में लिया," पापा ने कहा। "मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने सोचा, फाड़ दूँ। फिर सोचा, फाड़ने से क्या होगा? मेरा अंगूठा मेरे हाथ पर है, काग़ज़ पर नहीं। वो काग़ज़ जाएगा, दूसरा आ जाएगा। जिस आदमी के पास इतनी बड़ी इमारत है, उसके पास काग़ज़ों की कमी नहीं होती।"

"तो आपने पेचकस रख दिया," मैंने कहा।

"हाँ। उसी दराज़ में। उन काग़ज़ों के नीचे।"

"क्यों?"

पापा ने एक लंबी साँस ली। फिर बोले, "क्योंकि उस वक़्त मुझे लगा कि ये औज़ार मेरे हाथ में है, तो मैं अभी भी वही शंकर हूँ जो साइकिल ठीक करता था। और मैंने सोचा — जिस दिन मैं इसे वहाँ से लेने जाऊँगा, उस दिन मैं अपना अंगूठा भी वापस माँगने जाऊँगा।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"मैंने वो चीज़ इसलिए नहीं छोड़ी कि खो गई थी," पापा ने कहा। "मैंने जान-बूझकर छोड़ी। ताकि जब भी मैं उस इमारत के सामने से गुज़रूँ, मुझे याद रहे कि मैं कहाँ और किस हाल में बिका हूँ।" उन्होंने पेचकस को सीने से लगाया। "मैं उस दिन वहाँ मज़दूरी करने गया था। और मज़दूरी से पहले मैंने अपना औज़ार गिरवी रख दिया।"

माँ उठ खड़ी हुईं।

उन्होंने साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा — वो हरकत जो वो तभी करती हैं जब कुछ बड़ा होने वाला हो। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी। बिलकुल साफ़।

"शंकर यादव।"

पापा ने सिर उठाया।

"मैं तुम्हारी बीवी हूँ," माँ ने कहा। "कोई मेहमान नहीं हूँ जो चार दिन आई, दो रोटी खाई और चली गई।"

"सुशीला—"

"नहीं। सुनो।" उन्होंने पहले दीये की लौ की तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़। "जिस रात तुम देर से लौटे थे और तुम्हारे हाथ काँप रहे थे, उसी रात मैं जान गई थी कि कुछ हुआ है। तुमने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, सीधे चारपाई पर गिरे और सो गए। मैंने पूछा नहीं। जानती हो क्यों?"

पापा चुप।

"क्योंकि मुझे डर था," माँ ने कहा। "डर था कि अगर तुमने उस रात बताया, तो तुम टूट जाओगे। और मैं तुम्हें टूटा हुआ नहीं देख सकती थी। तो मैं चुप रही। पाँच साल।"

उनका गला भर आया, पर वो रुकीं नहीं।

"पर तुमने इतना बड़ा सच मुझसे क्यों छुपाया? मैं तुम्हारे साथ सोई, तुम्हारी थाली में रोटी रखी, तुम्हारी कमीज़ के बटन सिले, और तुमने मुझे ये तक नहीं बताया कि तुम खुद को कहाँ बेच चुके हो। मैं तुम्हारे डर की साझीदार नहीं बन सकती थी?"

पापा ने धीरे से कहा, "तू डर की साझीदार नहीं, सुशीला। तू सहारे की थी। और सहारे को डर नहीं दिखाते।"

"कौन कहता है?" माँ की आवाज़ टूटी। "सहारा भी इंसान होता है। सहारा भी रोता है। बस उसके रोने की जगह नहीं होती।"

मैंने उन्हें गिलास उठाकर दिया। उन्होंने पानी पिया, एक लंबा घूँट, जैसे गला धो रही हों — आँसुओआँसुओं को पीछे धकेलने के लिए।

फिर उन्होंने गिलास मेरे हाथ में वापस रखा और सीधी पापा की तरफ़ देखा।

"अब बोलो," माँ ने कहा। "पूरी बात। एक-एक करके। मैं आज रात सोने से पहले सब सुन लेना चाहती हूँ।"

पापा ने दीये की लौ की तरफ़ देखा। लौ हिल रही थी, क्योंकि गली के मुँह से हवा आ रही थी। पापा की आँखों में भी वैसी ही हलचल थी।

"अंगूठा लगाने के चार-पाँच दिन बाद," पापा ने शुरू किया, आवाज़ बहुत धीमी, "मैं रणवीर के दफ़्तार गया। मज़दूरी के लिए।"

काजल ने घुटनों के बीच हाथ रखे हुए थी। उसने सिर उठाया।

"मज़दूरी?" वो बोली। "पापा, आप तो कहते थे कि आप साइकिल का काम जानते हैं, कभी किसी के नीचे काम नहीं किया।"

"मैंने झूठ कहा था, बेटा।" पापा ने कहा। "पहली बार उस दिन झूठ बोला था। उसके बाद हर बार।"

मैंने दीये को अपनी उँगलियों से छुआ। गरम था। बात करने से पहले मैंने एक बार गली के मुँह की तरफ़ देखा — वहाँ सब शांत था, बस दूर किसी टेम्पो का इंजन गुनगुना रहा था।

"उस दिन," पापा बोले, "भारद्वाज भवन के बाहर कतार लगी थी। पचास आदमी। नाम लिखवा रहे थे। किसी को हाथ में हथौड़ा था, किसी को कंधे पर बोरी। मैं उस कतार में खड़ा था — मेरे हाथ में कुछ नहीं था, सिर्फ़ एक पुरानी कमीज़ और जेब में वो काग़ज़, जिस पर मेरा अंगूठा लग चुका था।"

"फिर?" काजल ने कहा।

"फिर एक आदमी आया — दुबला, काले चश्मे वाला — और उसने कहा कि अंदर जाओ, बड़े साहब आज आदमी खुद देखेंगे।" पापा रुके। "मैं अंदर गया। दो मंज़िल चढ़ा। सीढ़ी पर काला फ्रेम टँगा था, जिसमें कोई पुराना काग़ज़ था। मैंने उसे देखा भी नहीं। मेरी आँखें सिर्फ़ ज़मीन पर थीं।"

"और फिर?" माँ ने पूछा।

"फिर मैं एक कमरे में पहुँचा। बड़ी मेज़, काँच की, और उस पर काग़ज़ों के ढेर। साहब वहाँ नहीं थे। एक मुनीम बैठा था — गोविंद भाई। उसने मुझे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। बोला — तुम यहाँ क्यों आए? मैंने कहा — काम चाहिए। वो बोला — यहाँ से चले जाओ, कुछ नहीं मिलेगा।"

"और आप गए नहीं," मैंने कहा।

"नहीं।" पापा ने पहली बार मेरी तरफ़ सीधा देखा। "मैं नहीं गया। क्योंकि उस वक़्त मुझे भूख लगी थी, बेटा। असली भूख। जो चार दिन से पेट में कुत्ता बनकर बैठी थी। जब आदमी भूखा होता है, तो उसकी हिम्मत भी भूखी हो जाती है।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मेरा गला सूख गया था।

"गोविंद भाई ने मुझे एक कोने में बैठने को कहा और खुद काग़ज़ों में सिर झुकाकर बैठ गया। मैं वहाँ बैठा था। फिर गोविंद भाई उठकर बाहर गया — किसी को बुलाने। और मैं अकेला रह गया, उस बड़ी मेज़ के सामने।"

"और दराज़ खुला था," माँ ने कहा। पूरी बात अब वो जोड़ रही थीं, खुद।

"हाँ।" पापा ने सिर हिलाया। "मेज़ की दूसरी तरफ़ लोहे की अलमारी थी, और उसका नीचे वाला दराज़ आधा खुला था। मैंने अंदर देखा। काग़ज़, फाइलें, पुरानी चिट्ठियाँ। सब उलटा पड़ा था, जैसे किसी ने जल्दी में कुछ ढूँढ़ा हो। और उन्हीं काग़ज़ों के बीच, एक कोने में, मुझे अपना पेचकस दिखा।"

काजल की साँस रुक गई।

"आपका पेचकस रणवीर के दराज़ में कैसे पहुँचा?" मैंने पूछा। "वो तो आपके पास था।"

"था," पापा ने कहा। "और उसी दिन मैंने उसे वहीं रख दिया। जानबूझकर।"

चुप्पी। पूरी गली में चुप्पी। दीये की लौ भी थम गई, जैसे सुन रही हो।

"क्यों?" माँ की आवाज़ में अब भी गुस्सा था, पर उसके पीछे कुछ और भी था।

पापा ने दीये को देखा।

"क्योंकि मुझे लगा था," उन्होंने कहा, "कि अगर कभी हिम्मत आई, तो मुझे कोई चीज़ याद दिलाएगी कि मैं कहाँ और किस हाल में बिका हूँ। मैं चाहता था कि एक चीज़ वहाँ रहे — उसी कमरे में, उसी दराज़ में — जो मेरी हो, और जो रोज़ उस आदमी के हाथ लगे। जब वो दराज़ खोलेगा, तो उसे मेरा पेचकस मिलेगा, और वो मेरा नाम पढ़ेगा। बस इतना चाहता था। कि वो एक पल मेरा नाम पढ़े।"

पापा की आवाज़ धीमी हो गई, फिर भी साफ़ थी।

"मैं उस दिन उस दराज़ पर हाथ रखकर खड़ा था," उन्होंने कहा, "और सोच रहा था — ये दराज़ बंद है, पर मेरा नाम इसके अंदर बंद है। जितनी देर वो नाम इस दराज़ में रहेगा, उतनी देर मैं भी उस आदमी के अंदर कैद रहूँगा।"

माँ ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढँक लिया।

"हे भगवान," वो बोलीं, रोते हुए। "शंकर। ये क्या दिमाग़ लेकर घूम रहे हो तुम पाँच साल?"

"डर का दिमाग़, सुशीला।" पापा ने रोते हुए कहा। "डर इंसान से सिर्फ़ इतना कहलवाता है कि तू कुछ भी कर सकता है — बस सच मत बोलना।"

काजल अब तक चुप बैठी थी। अचानक उसने अपनी नर्सिंग की कॉपी सीने से लगाई, और उसकी आवाज़ फूट पड़ी।

"पापा," वो बोली। "मुझे भी कुछ कहना है।"

पापा ने उसकी तरफ़ देखा।

"वो रात," काजल ने कहा, "जिस रात आपने अंगूठा लगाया, मैं जानती हूँ कि आप कहाँ गए थे।"

मैंने उसकी तरफ़ घूमकर देखा।

"क्या?" मैंने कहा।

काजल की आँखें भरी हुई थीं, पर उसने मुझसे नज़र नहीं चुराई।

"उस रात मैं ट्यूशन से लौट रही थी," वो बोली। "रास्ते में मेरा दोस्त था — रेशमा। उसके घर के पास से निकली थी, उसकी तबीयत खराब थी, तो मैं दो मिनट उसके घर बैठी। जब निकली तो रात साढ़े नौ बजे थे। और नए बाज़ार से आते वक़्त मुझे भारद्वाज भवन की तरफ़ से आवाज़ आई — कोई रो रहा था।"

माँ ने हाथ नीचे कर लिए।

"मैं गई नहीं," काजल ने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "मैं रुकी थी, दूर से देखा, और वो आप थे, पापा। आप दीवार के पास बैठे थे, सिर झुकाए। और कोई आपके पास खड़ा था — गोविंद भाई। उन्होंने आपको कुछ दिया और आपने हाथ जोड़े — किसी को नहीं, उस दीवार से।"

पूरी गली चुप थी।

"मैं वापस आ गई," काजल ने कहा। "मैंने किसी से कुछ नहीं कहा। आपके सामने भी नहीं।"

"तूने क्यों नहीं पूछा?" पापा ने कहा, धीमे से।

"क्योंकि मैं डर गई थी," काजल फूट पड़ी। "मुझे लगा अगर पूछूँगी तो आप टूट जाएँगे, और अगर आप टूटे तो घर टूटेगा, और मेरी पढ़ाई छूटेगी। मैं पाँच साल से उसी रात को सीने में रखकर जी रही थी, पापा। और आज जब आपने पेचकस निकाला…" उसकी आवाज़ रुक गई।

"तो तेरा रात का वो सच भी वो वाला है," माँ ने कहा। उन्होंने काजल की तरफ़ देखा और हाथ बढ़ाकर उसका सिर अपनी तरफ़ खींचा।

काजल उनके कंधे पर रोने लगी।

मैंने पीछे की तरफ़ देखा। मेरे हाथ ठंडे हो गए थे।

"तो आपको पता था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में कुछ था जो मुझे खुद भी बाहरी लगा। "आपको पता था, काजल को पता था, माँ को पता था। सब को पता था।"

"अंकुश—" माँ ने कहा।

"नहीं, माँ।" मैंने कहा, और मेरे अंदर कुछ ऐसा फूटा जो मैंने पहली बार अंदर से सुना — उस तंत्र की आवाज़ नहीं, अपनी आवाज़। "मैं इस घर में रहता हूँ। मैं इसी चबूतरी पर आज से दो साल पहले उस आदमी को नमस्ते करता था, जिसे आप लोग डर से चुपचाप देखा करते थे। मैं अकेला था इस घर में जो यह नहीं जानता था कि हमारी रोटी के नीचे एक अंगूठा दबा है।"

मेरी आवाज़ भर आई, पर मैं रुका नहीं।

"मुझे हर बात सबसे आख़िर में बताई जाती है। स्कूल में भी। अरे, दुकान की जो हालत थी वो भी पता चली आज — कि जब मैं यहाँ पंद्रह साल का था, दुकान बंद हो चुकी थी, और ये काग़ज़ पर पापा की थी। पाँच साल से तो पापा यहाँ औज़ार पोंछते आ रहे हैं — और मुझे कभी नहीं बताया कि यह दुकान उनकी है!"

पापा उठे। उनका शरीर धीमा था, पर उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली — ठंडे हाथों से, धीरे से।

"बेटा।"

"क्या?"

"मुझे माफ़ कर दे।"

मैं रुक गया।

"मैं तुझे सबसे आख़िर में बताता था," पापा ने कहा, "क्योंकि तू सबसे छोटा था। पर वो सच नहीं है। तू सबसे छोटा नहीं था, तू सबसे दूर था। तेरे पास से मैं गुज़रता था, देखता था तू रिंच उठाता, दुकान सँभालता, और मुझे लगता — ये लड़का मेरे सच का बोझ न उठा पाएगा। मैं तुझे कमज़ोर समझता रहा, और तू उतना ही मज़बूत होता गया। ग़लती मेरी थी।"

मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।

"डर सच नहीं बोलता, बेटा," पापा ने कहा। "डर चुप रहता है। और चुप्पी — चुप्पी इंसान को बचाती नहीं, वो बस उसे अकेला कर देती है। मैं पाँच साल अकेला रहा, इस घर में रहते हुए।"

मुझे कुछ कहना था, पर गला अटक गया।

तभी दरवाज़े पर खड़ी परछाईं हिली।

मैंने पलक उठाकर देखा — उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा और सफ़ेद दाढ़ी आधे अंधेरे में थे। हाथ में कुछ लपेटा हुआ था — एक छोटी पोटली, जो उन्होंने दरवाज़े के बाहर रख दी, जैसे पहले कुछ नहीं।

"उस्ताद," माँ ने कहा। "आइए।"

वो अंदर आए, अपना चश्मा ठीक किया, और सीधे पापा की तरफ़ बढ़े।

"शंकर," उन्होंने कहा। "पेचकस दो।"

पापा ने रुककर उनकी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "मेरे खानदान के औज़ारों का हत्था कभी सादा नहीं होता।"

माँ ने घूमकर उनकी तरफ़ देखा।

"क्या मतलब?"

"हमारे पुराने सिलसिले में सुनार, लोहार, दर्ज़ी — किसी के औज़ार पर काम का नाम खुदता है। पर उस खुदाई के नीचे," उस्ताद ने अपनी उँगली पेचकस के चिकने हत्थे की तरफ़ बढ़ाई, "हर हत्थे के अंदर एक खोखली जगह होती है। छोटी सी। इंच भर। किसी में पैसा, किसी में काग़ज़, किसी में दुआ का कोई लफ़्ज़। पर खोखली जगह होती हर हत्थे में है — चाहे वो पचास साल पुराना हो, चाहे आज का।"

पापा ने पेचकस अपने सीने से हटाया।

"उस्ताद," पापा ने कहा, "मैंने ये पेचकस तीस साल से पकड़ा है। इसे बनाने वाले मास्टर ने मुझे कभी नहीं बताया—"

"क्योंकि बताना नहीं होता," उस्ताद ने कहा। "आदमी को खुद पता चलना होता है कि उसकी चीज़ में कब, किस वक़्त, क्या छिपा है।"

उस्ताद ने पेचकस उनसे लिया। उनकी उँगलियाँ पेचकस पर धीरे-धीरे चलीं, जैसे वो किसी चीज़ को टटोल रही हों। फिर वो हथेली पर उसे परत-परत देखने लगे।

"अंकुश," उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "लोहार का एक औज़ार उठा। छेनी।"

मैं उठकर दुकान गया। मेज़ पर पड़ी औज़ार की पेटी खोली और हल्की छेनी लेकर लौटा। उस्ताद ने उसे दीये की लौ में देखा, फिर पेचकस के हत्थे के आख़िरी सिरे पर रख दिया।

"अब सुनो, सब।"

उन्होंने छेनी को इतना हल्का रखा, जितना छेनी से कोई अपनी ही नाखून को छूए। फिर धीरे से मोड़। एक बार। दो बार। और फिर जोर दिया — धीरे पर सीधा।

हत्थे के सिरे पर बनी लकड़ी की गोल पट्टी, जिसे मैं बस चिकना लकड़ी मानता था, एक छोटी सी आवाज़ के साथ घूम गई — जैसे पुराने ताले की चाबी अपनी जगह बैठ जाए।

पापा ने साँस रोक ली।

उस्ताद ने पेचकस उलटकर हमारी तरफ़ किया। हत्थे के अंदर की खोखली जगह दिख रही थी। छोटी, इंच भर, और उसमें —

उसमें एक पतला, मुड़ा हुआ काग़ज़ था।

मैंने देखा। माँ ने देखा। काजल ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। पापा ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई चीज़ उनके सामने से गुज़रने वाली हो और वो उसे पकड़ नहीं पा रहे हों।

उस्ताद ने काग़ज़ बाहर निकाला और धीरे से खोला। बहुत पुराना था — रंग पीला पड़ चुका था, किनारों से परत छूट रही थी — पर स्याही अब भी साफ़ थी। नीली स्याही।

"क्या है ये?" माँ ने पूछा।

उस्ताद ने उस काग़ज़ पर उँगली रखी।

"एक हिसाब," उन्होंने कहा। "और एक माफ़ी। दोनों एक ही काग़ज़ पर लिखे हैं।"

मैंने आगे बढ़कर झाँका। काग़ज़ पर जो लिखा था, वो आज की तारीख़ की भाषा नहीं थी — पुरानी लिखाई, जैसे कोई इसे लिखते वक़्त हड़बड़ी में हो या रो रहा हो।

"ये मेरे पास कैसे पहुँचा?" पापा ने पूछा। "मैंने ये काग़ज़ कभी नहीं लिखा।"

उस्ताद ने काग़ज़ ऊपर उठाया। दीये की लौ काग़ज़ पर पड़ी और स्याही में एक अक्षर चमका — बहुत ही छोटा, फिर भी साफ़।

"यहाँ कोई नाम लिखा है," उस्ताद ने कहा, "जो इसे इस पेचकस में रखने वाले का नहीं है। यह नाम उस आदमी का है जिसने इसे रखा — और फिर पचास साल से लोगों से छिपाया।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखा था। दया नहीं। डर नहीं। अपराधबोध।

"उस्ताद," मैंने कहा। "क्या आप ये काग़ज़ जानते हैं?"

उन्होंने काग़ज़ मेरी हथेली पर रख दिया और पलटकर दरवाज़े की तरफ़ मुँह कर लिया।

उनकी आवाज़ में पहली बार सालों की मिट्टी थी।

"इलियास का हाथ जो पचास साल पहले मुझसे मेरी ही दुकान की मशीन पर सिलाई करके गया था," वो बोले, "उसका निशान आज भी उस काग़ज़ पर है।"

और फिर उस्ताद ने एक ऐसी बात कही जिस पर मैं तैयार नहीं था।

"अंकुश।"

"हाँ।"

"ये पेचकस खोलो। और अगर मेरा अंदाज़ा सही है," उन्होंने कहा, "तो इस हत्थे के अंदर वो बात बंद है जिसने पचास साल पहले दो भाइयों को अलग किया।"

मैंने पेचकस हाथ में लिया। हल्का था — जैसे अब भी कुछ न बोले, बस इंतज़ार करे।

"और आज," उस्ताद ने कहा, "अगर सच में तेरा जोड़ केंद्र है, तो ये पहली परीक्षा है उसकी — कि तू अपने घर के सच को भी उसी तरह सह सके, जैसे दूसरों का सहता है।"

मैंने उस काग़ज़ को दोबारा देखा। नीली स्याही, मुड़ा हुआ काग़ज़, और नीचे — मैंने अपनी नज़र सिकोड़कर देखा — नीचे एक छोटी सी लकीर थी।

उस लकीर के ऊपर जो नाम था, वो पढ़ते ही मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।

वो नाम था — शंकर।

नहीं, मेरे पापा का नाम नहीं। बस अक्षर वही थे।

वो नाम था — शंकरलाल।

मैं मुड़ा। पापा ने काग़ज़ देखा और उनका चेहरा राख जैसा हो गया।

"शंकरलाल," पापा ने धीरे से दोहराया। "ये नाम मेरे पिता का नहीं था। मेरे दादा का भी नहीं।"

"ये तेरे दादा जगदीश यादव के बड़े भाई का नाम है," उस्ताद ने कहा। "जो पचास साल पहले गली से उसी रात गायब हुए जिस रात साझा दुकान जली थी। और जिसका नाम आज तक किसी काग़ज़ पर नहीं आया — सिर्फ़ इस हत्थे में।"

मैंने पेचकस और कसकर पकड़ लिया।

अब मुझे पता था, आज रात के बाद, सुबह पीपल पर, उस रजिस्टर के साथ — एक और नाम खुलेगा। और वो नाम उस सात अंगूठों वाली शर्त में आठवाँ बनकर घुसेगा, चाहे सलीम बक्श कुछ भी बोले।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा और फुसफुसाई, "अंकुश, ये सब क्या है?"

मैंने दीये की लौ की तरफ़ देखा।

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर आज रात के बाद ये बात किसी पेचकस के अंदर नहीं रहेगी।"

माँ ने धीरे से कहा, "अंकुश, सुबह तक सब्र कर।"

मैंने सिर हिलाया। पर मेरे हाथ में पेचकस अब भारी लग रहा था — और मुझे पता था, यही भार सुबह पीपल तक ले जाना है।

॥

पेचकस मेरे हाथ में था, और मुझे लग रहा था जैसे किसी ने गली की सारी हवा इसी लकड़ी के हत्थे में भर दी हो।

कमरे में दीये की लौ हिल रही थी। माँ के हाथ में दीया था, और उनका हाथ काँप रहा था, इसलिए लौ भी काँप रही थी। पापा दरवाज़े के पास खड़े थे, एक हाथ चौखट पर, जैसे अंदर आने के लिए भी उन्हें सहारा चाहिए हो। काजल मेरे पीछे खड़ी थी और उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी।

उस्ताद अली बक्श ने अपना मोटा चश्मा उतारकर कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर से लगाया।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "इसे खोलते वक़्त हाथ हिले नहीं।"

"उस्ताद, मेरे हाथ तो ऐसे ही नहीं हिलते," मैंने कहा। "मेरे हाथ साइकिल की चेन जोड़ते हैं, घड़ी के पुर्ज़े नहीं। पर आज रात ये हत्था खुलेगा।"

"सुबह तक सब्र कर," माँ ने फिर वही बात दोहराई, पर इस बार आवाज़ में हुक्म नहीं था, थकान थी।

"माँ," मैंने कहा, "सुबह पीपल पर सब जमा होंगे। उस वक़्त अगर ये बात मेरे सीने में बंद रही, तो मैं सबके सामने खड़ा कैसे होऊँगा? जो दूसरों के घर का सच खोलता फिरता है, उसके अपने घर का सच उसकी जेब में क्यों सोए?"

माँ ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गईं।

पापा ने दरवाज़े से कहा, "पीछे वाले कमरे में चलो। यहाँ दीये की रोशनी कम है और सामने से कोई आ जाए तो…"

उन्हें पूरा वाक्य कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हम सब समझ गए।

पीछे वाला कमरा। वही कमरा जहाँ मेरी चारपाई थी, जहाँ लोहे की अलमारी थी, जहाँ औज़ारों का ट्रंक था और जहाँ का पुराना बल्ब रात भर गुनगुनाता रहता था, जैसे उसे भी हर बात सुननी हो।

काजल ने ट्रंक के ऊपर से कपड़ा हटाकर एक मेज़ साफ़ की — मेरी वही छोटी मेज़ जिस पर रात में हिसाब की कॉपी रखता हूँ। माँ ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा निकाला, पुराना सूती कपड़ा, साफ़ धोया हुआ, और उसे मेज़ पर बिछा दिया।

"औज़ार ज़मीन पर मत रखना," माँ ने कहा। "जो चीज़ पचास साल से किसी के सीने में बंद थी, वो मेज़ पर रखी जाएगी, फ़र्श पर नहीं।"

पापा अंदर आए और दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर सोचकर उसे आधा खुला छोड़ दिया। मुझे पता था क्यों — पूरी बंद गली में कान हमेशा किसी न किसी की खिड़की पर होते हैं।

तभी दरवाज़े पर हल्की खड़खड़ाहट हुई। टिंकू।

उसका सिर दरवाज़े की दरार से अंदर आया, बाल बिखरे, आँखें सूजी हुई, और हाथ में वही काला एक काँच वाला चश्मा।

"टिंकू, तू गया नहीं?" काजल ने कहा।

"दीदी, मैं गया था," उसने कहा। "पर घर के दरवाज़े पर पहुँचकर लगा कि मेरे पीछे कुछ छूट रहा है। माँ ने डाँटा भी, बोली कि सो जा। मैंने कहा कि मैं सो जाऊँगा, पर पहले उस्ताद के पास जाना है।"

"और वो मान गई?" मैंने पूछा।

"नहीं," टिंकू ने कहा। "मैं चुपचाप निकल आया।"

माँ ने एक लंबी साँस ली, फिर उसका सिर सहलाया और पीछे खड़ा कर दिया।

उस्ताद ने कुर्सी खींचकर बैठने की जगह बनाई, पर बैठे नहीं। वो मेज़ के पास खड़े रहे और अपनी जेब से एक छोटी, पतली छेनी निकाली — वही जो उनकी सिलाई मशीन की मरम्मत में काम आती है। फिर उन्होंने हाथ फैलाया।

मैंने पेचकस उनकी हथेली पर रख दिया।

उस्ताद ने उसे दीये की रोशनी में घुमाया। लकड़ी का हत्था चिकना था, पापा के हाथों की गरमी से पचास साल में ऐसा चिकना हुआ था जैसे पत्थर। उस पर “शंकर” खुदा था, छोटे टेढ़े अक्षरों में। और आख़िरी सिरे पर वही गोल लकड़ी की पट्टी, जिसे देखकर उस्ताद की भौंहें सिकुड़ीं।

"ये पट्टी घूमती है," उन्होंने कहा। "और जो घूमती है, उसके पीछे कुछ रखा जाता है।"

"उस्ताद, आपको कैसे पता?" पापा ने पूछा।

उस्ताद ने मेरी तरफ़ नहीं, पापा की तरफ़ देखा।

"क्योंकि ये पेचकस मेरी दुकान के सामने से गुज़रा है," उन्होंने कहा। "बहुत पुरानी बात है। उस वक़्त भी इसके हत्थे में कुछ था।"

"क्या था?" काजल ने पूछा।

"वो मुझे नहीं पता," उस्ताद ने कहा। "पर इतना पता है कि जो चीज़ थी, उसने दो भाइयों में ऐसी दरार डाली जो पचास साल में नहीं भरी।"

छेनी की नोक पट्टी के किनारे पर रखी गई। उस्ताद ने हल्का-सा दबाया, न हल्का, न ज़्यादा — जैसे कोई दर्ज़ी कपड़े को फाड़े बिना सीवन खोलता हो।

पट्टी घूमी। धीरे-धीरे। एक आधा चक्कर। फिर रुक गई।

"अंदर कुछ है," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई। "कुछ है, अंकुश। और ये हल्का नहीं है।"

मैंने मेज़ पर झुककर देखा। हत्थे के अंदर एक छोटी सी खोखली जगह थी, इंच भर की, और उसमें एक पतला-सा मुड़ा हुआ काग़ज़।

वो काग़ज़ पीला था, पर उस पीलेपन में भी कुछ अलग था — जैसे बरसों तक किसी के पसीने और साँस के बीच रहकर उसने रंग बदल लिया हो। किनारे मुलायम थे, जैसे सूखा हुआ पत्ता। और मोड़ इतने गहरे थे कि लगता था काग़ज़ खुद भूल गया है कि खुला कैसा दिखता है।

उस्ताद ने उसे दो उँगलियों से निकाला। फिर मेज़ पर रखकर, बिना जल्दी किए, एक-एक मोड़ खोलने लगे।

पहला मोड़ खुला — काग़ज़ का किनारा चटका, जैसे किसी बूढ़े की हड्डी।

दूसरा मोड़ — माँ ने दीया और पास कर दिया।

तीसरा मोड़ — पापा ने साँस रोक ली।

चौथा मोड़ — और काग़ज़ पूरा खुल गया।

उस पर नीली स्याही में लिखाई थी। साफ़, झुकी हुई, थोड़ी हड़बड़ाई हुई लिखाई। पाँच लाइनें। और उनके नीचे, अलग से, थोड़ी दूर पर, एक तारीख़।

उस्ताद ने झुककर पढ़ा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने पढ़ा — इस बार धीरे, पर इतनी साफ़ कि कमरे की हर दीवार सुन ले।

“जो इसे पढ़े, वो दोनों खानदानों को सामने बुलाकर सच बोले। जो छिपाएगा, उसका जोड़ टूटेगा, और टूटा हुआ फिर कभी न जुड़ेगा। मैंने अपनी तरफ़ का सच लिख दिया। बाकी जो पढ़ रहा है, उसका है।”

उस्ताद रुके। उनका गला सूखा था, मैं सुन सकता था।

"और नीचे?" मैंने पूछा।

उन्होंने काग़ज़ को दीये के और करीब किया।

“भाई, माफ़ी माँगने की हिम्मत मुझमें नहीं रही। इसलिए ये काग़ज़ मशीन के नीचे रखे जा रहा हूँ। जो इसे पढ़े, वो मेरी तरफ़ से बोले — मैंने जो किया, वो मेरी मर्ज़ी से किया, किसी के कहने से नहीं।”

और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नाम।

इलियास।

उस्ताद का हाथ खुला और पेचकस मेज़ पर गिरा। ठक। इतनी देर में कोई चीज़ इतनी ज़ोर से नहीं गिरी थी। फिर वो कुर्सी की तरफ़ लड़खड़ाए और बैठ गए, दोनों हाथ घुटनों पर, सिर झुका हुआ।

कमरे में एक भी आवाज़ नहीं थी। दीये की लौ भी जैसे साँस रोककर जल रही थी।

"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा और उनके पास बैठ गया। "उस्ताद, ये सलीम के हाथ की लिखाई है?"

उन्होंने सिर हिलाया। बस एक बार।

"है," वो बोले। आवाज़ ऐसी जैसे किसी कुएँ से आ रही हो। "ये मेरे भाई के हाथ की लिखाई है। मैं इसे किसी भी काग़ज़ पर पहचान लूँगा। उसका ‘मा’ ऐसा ही टेढ़ा आता था। बचपन में मैं उसकी कॉपी देखकर हँसता था — कहता था, तेरा ‘मा’ ऐसे क्यों गिरता है जैसे पहाड़ से उतर रहा हो।"

फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया, और मैंने पहली बार देखा कि उस्ताद अली बक्श की आँखें बिना चश्मे की कितनी छोटी और कितनी थकी हुई लगती हैं।

"पचास साल," वो बोले, "मैंने सोचा कि उसने मेरी दुकान जलाई। मैंने सोचा कि वो भाग गया, क्योंकि उसे पता था कि मैं उसे कभी माफ़ नहीं करूँगा। मैंने सोचा कि वो हमारी माँ की दवा के पैसे लेकर गया। पचास साल, अंकुश। पचास साल मैंने एक आदमी को मन में मार रखा था, और वो आदमी यहाँ लिखकर गया था कि उसने कुछ मेरी मर्ज़ी के खिलाफ़ नहीं किया।"

काजल ने कुछ कहना चाहा, पर मैंने आँख से रोक दिया।

कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिन्हें पूरी जगह मिलनी चाहिए। अगर बीच में कोई बोल पड़े, तो दर्द अधूरा रह जाता है और फिर सालों तक आधा जमा हुआ पड़ा रहता है।

माँ ने कुर्सी के पास आकर उस्ताद के कंधे पर हाथ रखा।

"उस्ताद जी," उन्होंने कहा, "पानी पिइए।"

उन्होंने पानी नहीं पिया। उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरका दिया।

मैंने उसे उठाया। बहुत हल्का था। इतना हल्का कि लगा किसी ने पचास साल का बोझ लिखकर इतने पतले काग़ज़ पर रख दिया हो और काग़ज़ ने बिना शिकायत उठा लिया हो।

और तभी मेरे दिमाग़ में वो सवाल आया जो कमरे में सबसे पहले मुझे आना चाहिए था।

मैंने धीरे से पूछा, "उस्ताद, ये काग़ज़ इस पेचकस के हत्थे में था, है ना?"

"हाँ।"

"और ये पेचकस कल रात तक रणवीर के दफ़्तार से आए लोहे के डिब्बे में बंद था। उस डिब्बे में जो चीज़ थी, वो रणवीर के दफ़्तार से आई थी।"

"हाँ।"

"तो फिर ये पर्ची, ये लिखाई, ये सलीम का हाथ — ये सब उस आदमी के दफ़्तार पहुँचा कैसे?"

कमरे में फिर वही चुप्पी। पर इस बार चुप्पी में डर था।

पापा ने दरवाज़े से कदम आगे बढ़ाया।

"रुको," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहले से ज़्यादा साफ़ थी, जैसे सारी थकान एक झटके में उतर गई हो। "मैंने ये पेचकस भारद्वाज भवन में छोड़ा था। उस रात। उनके दराज़ में। जिस दराज़ में मुझे अपना ही अंगूठा लगा पीला काग़ज़ मिला था।"

"तो फिर ये उन्हीं के पास से आया," काजल ने कहा।

"नहीं," उस्ताद ने कहा। उन्होंने सिर उठाया और चश्मा फिर से लगाया। उनकी आवाज़ अब टूटी नहीं थी, सिर्फ़ भारी थी। "ध्यान से सोचो। अगर रणवीर ये चीज़ पचास साल से अपने दराज़ में रखे बैठा था, तो उसने इसे आज क्यों भेजा? आज। जिस दिन तेरा जोड़ केंद्र खुला। जिस दिन गली में सभा की बात चल रही है। जिस दिन मैंने अपना सच कबूल किया।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, आप क्या कह रहे हैं?"

"मैं यह कह रहा हूँ," उन्होंने कहा, "कि शंकर यादव ने ये पेचकस उस दराज़ में रखा था। रणवीर ने उसे नहीं उठाया। उसने उसे ऐसे ही पड़ा रहने दिया, क्योंकि उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता था। लेकिन किसी और ने उसे उठाया। किसी ने उसे वहाँ से निकाला, और इस डिब्बे में लाकर रख दिया।"

"यानी कोई है जो हमें खेल खेलने पर मजबूर कर रहा है," मैंने कहा।

"कोई है," उस्ताद ने कहा, "जो हमें वो काग़ज़ पढ़वाना चाहता है जो हम पचास साल से नहीं पढ़ना चाहते थे। और ऐसा आदमी कभी बिना वजह नहीं होता।"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर मेरी जेब में घंटी गरम हो गई।

सच कहूँ, तो पहले मैं चौंका नहीं, मैं डर गया। घंटी आम दिनों में ठंडी रहती है। बरसाती दिनों में भी ठंडी। जब तंत्र बोलता है तो बस बजती है, हल्की-सी काँपती है। पर आज वो ऐसे गरम थी जैसे किसी ने उसे आग पर रख दिया हो, और जब मैंने उसे जेब से निकाला, तो मेरी हथेली पर लाल निशान पड़ गया।

काजल ने देखा और चीख दबा ली।

घंटी बजी। एक बार। हमेशा की तरह नहीं — नहीं, आज उसकी आवाज़ में कुछ और था। जैसे कोई एक नहीं, दो आवाज़ें साथ बोल रही हों।

“अब तीन नहीं,” तंत्र ने कहा, “चार आदमी उस रजिस्टर को खोलेंगे। चौथा वो है, जो पचास साल से अपना ही नाम नहीं पढ़ पाया।”

और चुप हो गई।

उस्ताद ने घंटी की तरफ़ देखा। उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके सामने उनका ही पुराना नाम लिख दिया हो।

"पचास साल से अपना ही नाम नहीं पढ़ पाया," पापा ने धीरे से दोहराया। "इसका क्या मतलब है?"

उस्ताद नहीं बोले।

"उस्ताद," मैंने कहा।

"मतलब यह," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़हर था जो बूढ़े लोग सालों बाद निकालते हैं, "कि उस काग़ज़ पर जो सात अंगूठे हैं, उनमें एक अंगूठा ऐसा है जिसका नाम पढ़ा ही नहीं गया। न रजिस्टर में, न शर्तनामे में, न किसी दस्तावेज़ में। बस अंगूठा था। और जिसका अंगूठा हो पर नाम न हो, वो आदमी खुद नहीं जानता कि वो किस हिसाब में बैठा है। और जब तक वो अपना नाम नहीं पढ़ता, रजिस्टर अधूरा है।"

मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा।

"तो चौथा आदमी," मैंने कहा, "वो शंकरलाल हो सकता है?"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा था जो डर नहीं, हिम्मत नहीं, बस थकी हुई सच्चाई थी।

"या वो इलियास हो सकता है," उन्होंने कहा। "या मैं। या कोई और, जो इस गली में पचास साल से बैठा है और जिसका नाम किसी काग़ज़ ने पूछा ही नहीं।"

तभी दरवाज़े की दरार से एक आवाज़ आई।

"अंकुश भाई।"

मीरा। उसके हाथ में कैमरा था, पर लाल बत्ती बंद। और मैंने पहली बार देखा कि उसने कैमरा कंधे पर लटकाकर छोड़ दिया है, जैसे कोई औज़ार उतारकर रख देता है।

"मैंने रिकॉर्डिंग बंद कर दी है," उसने दरवाज़े से कहा, न अंदर आकर, न बाहर जाकर, बीच में खड़ी। "जब तुमने घंटी जेब से निकाली, तब मैं बंद कर चुकी थी। ये तुम्हारा घर है। ये रिकॉर्ड नहीं होगा। पर ये पर्ची मुझे एक बार दिखाओ।"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।

मीरा अंदर आई, और मुझे बता दूँ, उसने काग़ज़ को हाथ नहीं लगाया। उसने अपनी जेब से एक मोड़ा हुआ सफ़ेद काग़ज़ निकाला, उसे मेज़ पर उस्ताद के काग़ज़ के पास रखा, और फिर बहुत हल्की आवाज़ में कहा, "दीया उस्ताद की तरफ़ करो, रोशनी दूसरी तरफ़ पड़े ताकि स्याही का रंग धोखा न दे।"

माँ ने दीया घुमाया।

मीरा झुकी। उसने बाल कान के पीछे किए। फिर उसने उँगली से हवा में काग़ज़ के ऊपर लकीर खींची बिना छुए और बोली, "ये लिखाई एक ही बैठक की है। पाँच लाइनें, एक ही हाथ, एक ही स्याही, बीच में साँस लेने की जगह भी नहीं। यानी लिखने वाले ने एक बार बैठकर पूरा लिखा और उठ गया। वो रुका नहीं, सोचा नहीं। या तो वो बहुत जल्दी में था, या वो रो रहा था और उसे पता था कि अगर वो रुका तो लिख ही नहीं पाएगा।"

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा।

मीरा ने उँगली नीचे की तरफ़ सरकाई।

"और ये," उसने कहा, "ये तारीख़।"

वो एक पल रुकी।

"ये तारीख़ इसी स्याही में नहीं है," उसने कहा।

कमरे में हवा भारी हो गई।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा।

"मतलब ये कि ऊपर के अक्षर जितने पुराने हैं, ये तारीख़ उतनी पुरानी नहीं," मीरा ने कहा। "देखो, रंग थोड़ा और नीला है, और ये अक्षर बहते नहीं, ठहरे हुए हैं। जो आदमी पचास साल पहले लिख रहा था, उसका हाथ काँप रहा था। जिसने ये तारीख़ लिखी, उसका हाथ नहीं काँपा। वो बैठा, उसने तारीख़ सोची, और उसने लिखी।"

मैंने पूछा, "कौन सी तारीख़ है?"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने उसमें सिर्फ़ एक बार देखा था — जिस दिन उसने अपना दाग़ खोला था।

"आज से पाँच दिन बाद," उसने कहा।

कमरे में सन्नाटा।

"पाँच दिन बाद?" काजल ने कहा। "यानी कोई आगे की तारीख़ लिखकर गया है?"

"कोई आगे की तारीख़ लिखकर गया है," मीरा ने कहा, "और वो चाहता है कि हम जानें कि वो उस दिन का इंतज़ार कर रहा है। ये तारीख़ चेतावनी नहीं है, अंकुश। ये बुलावा है।"

उस्ताद ने अचानक कुर्सी पकड़ ली।

मैंने देखा, उनका चेहरा बदल रहा था। वो काग़ज़ की तरफ़ ऐसे देख रहे थे जैसे उन्होंने तारीख़ नहीं, कोई चेहरा देख लिया हो।

"उस्ताद?"

"पाँच दिन बाद," उन्होंने धीरे से कहा। "उंगलियों पर गिनो। आज से पाँच दिन बाद।"

उन्होंने अपनी उँगलियाँ उठाईं और हवा में गिनने लगे। मैंने भी मन में गिना।

और फिर उस्ताद ने वो बात कही जिसने कमरे की सारी हवा खींच ली।

"ये तारीख़," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी, "मेरी माँ की तारीख़ है। जिस दिन वो गई थीं। उस आग की रात के पाँचवें दिन।"

काजल ने मुँह पर हाथ रख लिया।

"उस्ताद, आप यक़ीन से कह रहे हैं?" पापा ने पूछा।

"मैं पचास साल से ये दिन नहीं भूला," उस्ताद ने कहा। "मैं हर साल इस दिन अपनी दुकान बंद रखता हूँ। कोई नहीं जानता क्यों। इस साल भी बंद रखूँगा। और इस बार… इस बार कोई उसी दिन हमसे कुछ करवाना चाहता है।"

मीरा ने धीरे से कहा, "यानी जो आदमी ये तारीख़ लिखकर गया, वो जानता है कि वो दिन क्या है। वो हमारे घर का सबसे दर्द भरा दिन जानता है।"

"वो हमारा दर्द जानता है," उस्ताद ने कहा, "क्योंकि वो हमारे दर्द का हिस्सा है।"

तभी टिंकू ने कुछ किया जो बड़ों को करना चाहिए था, पर बच्चे ने कर दिया।

वो मेज़ के पास आया, पेचकस उठाया — मैंने मना नहीं किया, क्योंकि उसका हाथ हल्का था — और उसने अपनी छोटी उँगली हत्थे के अंदर डाल दी।

"उस्ताद," उसने कहा, "यहाँ एक खोखला घेरा है।"

"हाँ, वो हमने खोला।"

"नहीं उस्ताद," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो बच्चों में होती है जब वो कुछ ऐसा देख लेते हैं जो बड़ों की आँख से फिसल जाता है। "ये घेरा खाली है, पर गोल है। पूरा गोल। जैसे कोई चीज़ इसके अंदर बैठी थी और उसका घेरा छोड़ गई।"

उसने उँगली घुमाई।

"और उस्ताद," उसने कहा, "बाहर से आवाज़ आ रही है।"

हम सब चुप हो गए।

"कैसी आवाज़?" मैंने पूछा।

"खनखन," टिंकू ने कहा। "वो डिब्बे की परत से। जैसे कोई चीज़ अभी भी उसमें खनक रही हो। बोरी के नीचे।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

कोने में वो डिब्बा रखा था, बोरी से ढका हुआ। वही डिब्बा जो मनोज सफ़ेद टेम्पो में लाया था। जिसका तल्ला हमने खोला था। जिसके तल्ले से पापा का पेचकस निकला था। जिसके ऊपरी ढक्कन से कल रात खट-खट की आवाज़ आ रही थी और हमने उसे सुना, और फिर दीये के पास बैठकर उसे भुला दिया, क्योंकि इंसान का दिमाग़ एक बार में एक ही डर उठा सकता है।

मैं उठा। कमरे में कोई नहीं बोला।

मैंने बोरी खींची। डिब्बा वैसा ही था — चमकदार, भारी, पीली धातु की पट्टियाँ, ऊपर कंपनी का नाम। पर अब उसकी चमक में कुछ अलग था। जैसे दिन में वो एक डिब्बा था और रात में वो अपनी परतों के अंदर कुछ समेटे बैठा हो।

मैंने हाथ रखा। ठंडा था। फिर कान लगाया।

खनखन।

बहुत हल्की। इतनी हल्की कि अगर कमरे में दीये की लौ न होती, शायद सुनाई भी न देती। पर थी। अंदर। परत के नीचे। जैसे कोई छोटी-सी चीज़ हिल रही हो, बहुत धीरे, जैसे साँस ले रही हो।

और तभी मेरी जेब में घंटी फिर हिली।

इस बार गरम नहीं हुई। इस बार वो ऐसे काँपी जैसे किसी बूढ़े के हाथ काँपते हैं जब वो कोई पुराना नाम सुन ले। मैंने उसे हथेली पर रखा और देखा — उसका पीतल अंधेरे में भी चमक रहा था, जैसे अंदर से कोई रोशनी आ रही हो।

और तंत्र ने फुसफुसाया। इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे लगा मैं सुन रहा हूँ या मेरा दिमाग़ खुद बोल रहा है।

“आज तेरी घंटी में किसी और की आवाज़ भी मिल गई है, अंकुश। और वो आवाज़ मुझसे ज़्यादा पुरानी है।”

मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में घंटी थी, और घंटी में एक आवाज़ थी, और उस आवाज़ में एक दूसरी आवाज़ थी जो मेरी नहीं थी, तंत्र की नहीं थी, किसी की नहीं थी जिसे मैं जानता था।

काजल ने धीरे से कहा, "अंकुश?"

"हाँ।"

"तेरा चेहरा सफ़ेद है।"

"मेरा चेहरा हमेशा सफ़ेद रहता है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भी सफ़ेद निकली, सूखी। "ग्रीस लगाना पड़ेगा।"

कोई नहीं हँसा।

मैंने घंटी को दीये की रोशनी में घुमाया। पीतल पर फूल खुदा था। वही फूल जो हमेशा था। पर आज उसके नीचे, फूल की पंखुड़ियों के बीच, एक पतली-सी लकीर दिख रही थी। जैसे किसी ने बहुत पुराने हाथ से, बहुत छोटे औज़ार से, कुछ खुरचा हो।

मैंने उँगली रगड़ी। लकीर गई नहीं।

उस्ताद उठे और मेरे पास आए। उन्होंने घंटी मेरी हथेली से उठाई — हाँ, उस्ताद के हाथ में घंटी बजती नहीं, मैं जानता हूँ, तंत्र सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानता है — और उसे बहुत देर तक देखा।

फिर उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो बात थी जो पचास साल की चुप्पी के बाद आती है, "अंकुश, ये घंटी एक नहीं है।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"मैंने आज तक तुझे ये नहीं बताया," उन्होंने कहा, "क्योंकि मुझे लगा कि ये बात तेरे लिए भारी होगी, और मैं खुद इसे उठाने से डरता था। पर आज रात, इस काग़ज़ के बाद, मैं अपनी चुप्पी नहीं ढो सकता।"

"उस्ताद," मैंने कहा, "आप बोलिए। मैं सुन रहा हूँ।"

"जिस घंटी को तू पीतल की घंटी समझता है," उन्होंने कहा, "वो असल में दो घंटियों का जोड़ है। एक जीभ वाली, और एक बिना जीभ वाली। दोनों एक ही साँचे में ढली थीं। दोनों पर यही फूल। एक मेरे भाई के पास गई, एक हमारे घर में रही।"

मैंने सलीम बक्श का चेहरा याद किया, और वो हथेली जिसमें उसने टूटी जीभ दिखाई थी।

"तो टूटी जीभ," मैंने धीरे से कहा।

"टूटी जीभ इसी घंटी की है," उस्ताद ने कहा। "और जिस दिन ये जीभ वापस इस घंटी में बैठेगी, उस दिन… उस दिन ये घंटी वो बोलेगी जो पचास साल से बोलना चाहती थी।"

टिंकू ने कहा, "तो फिर तंत्र क्यों कह रहा है कि घंटी में किसी और की आवाज़ है?"

अच्छा सवाल था। इतना अच्छा कि उस्ताद भी एक पल रुके।

और उसी एक पल में मैंने सुना — डिब्बे की परत से वो खनखन अब ज़्यादा साफ़ थी, और अब वो खनखन जैसी नहीं लग रही थी। वो धीमी-धीमी बज रही थी, जैसे बहुत दूर किसी बंद कमरे में कोई घंटी बज रही हो, और उस तक पहुँचने के लिए आवाज़ को पचास साल लग रहे हों।

मैंने डिब्बे के ऊपरी ढक्कन पर हाथ रखा।

और तभी घंटी मेरी हथेली पर फिर काँपी और एक आख़िरी बात बोली, इतनी धीमी कि लगा जैसे वो खुद डर रही हो अपनी ही आवाज़ से।

“अंकुश। सुबह चार आदमी रजिस्टर खोलेंगे। पर उससे पहले, चौथे आदमी की आवाज़ तुझे खुद ढूँढनी पड़ेगी। और वो आवाज़ इस डिब्बे के अंदर नहीं… इस डिब्बे के नीचे है।”

मैंने दीये की लौ देखी। वो अब भी काँप रही थी।

और मेरे पीछे माँ ने, बिना मेरी तरफ़ देखे, बहुत धीरे से कहा, "अंकुश बेटा, आज रात इस डिब्बे को यहीं छोड़। सुबह पीपल पर जो होगा, होगा। पर अभी जो इस घर में बैठा है, वो पहले से ही इस घर का नहीं है।"

मैंने सिर हिलाया। पर मेरा हाथ डिब्बे से नहीं हटा।

और कमरे की सबसे अंधेरी दीवार पर, दीये की लड़खड़ाती रोशनी में, मुझे लगा जैसे डिब्बे की परछाईं मेरी तरफ़ नहीं, पीछे की तरफ़ झुक रही है — जहाँ दरवाज़ा था, जहाँ गली थी, जहाँ पीपल था, और जहाँ कल सुबह सारा सच खुलने वाला था।

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