The Mysterious Bell111 / 50

The Mysterious Bell – Chapter 111: jodne wala mistri hissa 012 ep111-120

163 min read November 5, 2026

घंटी की आवाज़ खत्म भी नहीं हुई थी कि दुकान के अंधेरे में खड़ी वो शक्ल धीरे-धीरे बाहर निकली।

पहले सिर्फ़ एक किनारा दिखा। फिर पूरा सफ़ेद कुर्ता। फिर सफ़ेद जूते, जिन पर गली की धूल एक कण भी नहीं थी — जैसे उसने पूरी गली पैदल नहीं, हवा में तैरकर पार की हो। फिर वो हाथ, उँगली पर काली अंगूठी, जो सुबह की पीली धूप में भी ठंडी लग रही थी।

वो पापा के बगल से आगे आया। ज़रा भी जल्दी नहीं। जैसे मंच पर नहीं, अपने ही आँगन में आ रहा हो।

और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जिसे मैं कई दिनों से महसूस कर रहा था, पर देख नहीं पा रहा था। पतला चेहरा। उम्र पचास के आसपास। आँखें वही, जैसी उस्ताद की हैं — गहरी, थोड़ी झुकी हुई पलकें, जैसे बहुत सालों से किसी चीज़ का इंतज़ार कर रही हों।

पीपल के नीचे पच्चीस से ज़्यादा लोग थे। एक भी आदमी हिला नहीं। माँ व्हीलचेयर पर थीं, काजल के हाथ उनके कंधे पर। शबनम आपा के हाथ में चिमटी थी, जो हवा में ही रुक गई। मीरा का कैमरा तिपाई पर था, लाल बत्ती जल रही थी, और मीरा की उँगली बटन पर जम गई थी।

सक्सेना ने उसे देखा और उनकी मुस्कान एक बार फिर मिठास से भर गई। पर ये मिठास पहली जैसी नहीं थी। इसमें एक हल्का-सा डर था। जैसे कोई अपने ही घर में मेहमान को अचानक खड़ा देख ले।

वो आदमी दो कदम और आगे आया, और बोला — आवाज़ बहुत धीमी, बहुत साफ़।

"माफ़ करना। मैंने सोचा नहीं था कि मुझे इस तरह आना पड़ेगा।"

फिर उसने गली को देखा, बूढ़ों को, बच्चों को, और आख़िर में पापा की तरफ़ देखा।

"मेरा नाम सलीम बक्श है।"

किसी ने कुछ नहीं कहा।

"उस्ताद अली बक्श का भाई। वही उस्ताद, जिनकी दुकान से इस गली में सिलाई की टिक-टिक कई साल तक आती रही।"

उस्ताद पीछे खड़े थे, शबनम आपा की गुमटी की तरफ़, और जैसे ही ये नाम सुना, उनके हाथ से वो मोटा चश्मा छूटने ही वाला था। उन्होंने झट से पकड़ लिया। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया — सफ़ेद नहीं, राख जैसा। जैसे किसी ने पचास साल पुरानी किताब अचानक खोल दी हो।

सलीम ने आगे कहा, इतना ठंडा कि जैसे पानी पर लकीर खींच रहा हो।

"और इस वक़्त मैं चंद्रेश सक्सेना साहब का सहयोग देखता हूँ। भारद्वाज साहब के काम में। उनके ख़ास सलाहकार कह लो। नाम बड़ा है, काम छोटा। दोनों में फ़र्क़ रखना ज़रूरी है।"

फिर उसकी नज़र पापा के हाथ पर गई।

भूरी कपड़े में लिपटी फाइल।

वो एक पल के लिए रुका। सिर्फ़ एक पल। और उस पल में उसकी मुस्कान नहीं मिटी, पर आँखें ज़रूर बदल गईं। जैसे कोई पुराना हिसाब आँखों में आकर बैठ गया हो।

"शंकर भाई," उसने कहा, बहुत नरमी से। "ये काग़ज़ बहुत पुराना है।"

पापा कुछ नहीं बोले।

"मैंने इसे बचपन में देखा था। तब ये इतना मोटा नहीं था। तब इसमें सिर्फ़ एक पन्ना था, और उस पन्ने पर सात आदमियों के नाम थे। तब इस फाइल को किसी ने कपड़े में नहीं लपेटा था। तब इसे सीने से नहीं चिपकाया जाता था।"

उसने एक कदम आगे बढ़ाया।

"इसे खोलने से पहले सोच लेना चाहिए। क्योंकि जो काग़ज़ एक बार खुलता है, वो फिर बंद नहीं होता। वो सिर्फ़ पढ़ा जाता है। और जो पढ़ लिया जाए, उसे भूला नहीं जा सकता।"

गली में सन्नाटा था। इतना कि पीपल के पत्तों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और दूर, पीछे वाले प्लॉट से, किसी मशीन का बंद होता हुआ धीमा हॉर्न आया, जैसे कोई जानवर करवट बदल रहा हो।

पापा ने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने बस फाइल को और कसकर सीने से लगा लिया। दोनों हाथों से। जैसे कोई माँ अपने बच्चे को सर्दी में लपेट लेती है। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। कोई नहीं देख रहा था उँगलियाँ। मैं देख रहा था।

मैंने एक गहरी साँस ली, और अपने आप को सँभाला।

अब मेरी बारी थी।

मैंने सलीम की तरफ़ चलकर देखा। बिल्कुल सामने से। दो कदम की दूरी पर रुककर।

"सलीम साहब," मैंने कहा, आवाज़ में वो हल्का-सा हँसने वाला भाव डालकर जो मुझे बचपन से आता है, "एक बात पूछूँ?"

"पूछो, बेटा।"

"ये सलाह मुफ़्त है? या इसका भी बिल आएगा? क्योंकि इस गली में पिछले कुछ दिनों से हर चीज़ का बिल आ रहा है — दुकान का, दीवार का, ज़मीन का, और अब काग़ज़ खोलने की सलाह का भी आ गया तो हमें पहले से जान लेना चाहिए। बजट का सवाल है।"

कुछ लोग हँसे। बहुत धीरे। पर हँसे।

शबनम आपा ने चिमटी नीचे कर दी, और उनके चेहरे पर वो पुरानी, तेज़, गली वाली मुस्कान लौट आई।

सलीम मुस्कुराया। इस बार मुस्कान में कोई मिठास नहीं थी। सिर्फ़ एक थका हुआ, पुराना सच था।

"तुम उस्ताद के शागिर्द हो," उसने कहा। "बातें भी उन्हीं जैसी करते हो। वो भी जवाब देने से पहले सवाल पूछते थे।"

"उस्ताद से ज़्यादा अच्छी बात क्या होगी," मैंने कहा।

"हाँ," उसने कहा। "पर एक बात सुन लो।"

उसने हाथ जेब में डाला। धीरे से।

"चुप्पी भी एक गवाही होती है, अंकुश। जब कोई आदमी चुप रहता है, तो वो कुछ नहीं कहता — ये लोग समझते हैं। सच ये है कि चुप्पी में आदमी बहुत कुछ कह देता है। बस सुनने वाला चाहिए।"

मैंने उसकी आँखों में देखा।

"तो आप अपनी चुप्पी लेकर कहाँ बैठेंगे?" मैंने पूछा।

"उस्ताद की दुकान पर।"

गली में फिर सन्नाटा।

"वहीं जहाँ मेरी माँ की सिलाई की पेटी रखी है," सलीम ने कहा। "वहीं जहाँ से मैं पचास साल पहले निकला था। वहीं इंतज़ार करूँगा। तुम आओगे?"

"आऊँगा," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। चाय आपकी।"

वो मुस्कुराया, और यह मुस्कान पहली दोनों से अलग थी। इसमें दर्द था। बहुत पुराना दर्द।

"चाय मेरी," उसने कहा। "पर बिस्किट तुम्हारे। सलीम बक्श का हिसाब आज भी बराबर का होता है। बस बाँटने वाले नहीं रहे।"

फिर वो मुड़ा, और बिना किसी से कुछ कहे, गली के उस मोड़ की तरफ़ चल दिया जहाँ उस्ताद की दुकान थी। सफ़ेद जूते धूल पर पड़ते, पर धूल उन पर नहीं चढ़ती थी — या शायद मुझे वहम हो रहा था।

उसके जाने के बाद सभा टूट गई।

न टूटी, बिखरी। जैसे किसी ने कपड़े पर से पत्थर हटा दिया हो और कपड़ा अपनी सिलवटों में लौटने लगे।

सक्सेना ने पीली फाइल बंद कर दी। उन्होंने एक बार चारों तरफ़ देखा, और उनकी मुस्कान लौट आई थी, पर अब वो मुस्कान पहले जैसी नहीं लग रही थी। अब वो एक मुस्कान नहीं, एक आदत थी। होंठों पर चढ़ी हुई, जिसे उतारना भूल गए हों।

"तो," उन्होंने कहा, और आवाज़ में वही पुरानी मिठास डाल दी, "जैसा मैंने कहा था — प्रक्रिया। आज कोई अंगूठा नहीं आया। पर मैं निराश नहीं हूँ। काग़ज़ कभी भागता नहीं। वो किसी न किसी जेब में रहता है। और जेबें बदलती रहती हैं।"

"काग़ज़ आया है," माँ ने कहा।

उनकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर साफ़ थी। व्हीलचेयर पर बैठी माँ ने अपना सिर ऊपर उठाया।

"मेरे पति के सीने पर है। आप उसे देख रहे हैं। पर आप उसे पढ़ना नहीं चाहते, इसलिए देख भी नहीं रहे।"

सक्सेना ने माँ की तरफ़ देखा। एक पल।

"बहन जी," उन्होंने कहा, "आपकी तबीयत ठीक नहीं है। आप आराम कीजिए।"

"मैं आराम करने आई ही नहीं हूँ," माँ ने कहा। "मैं अपना काग़ज़ माँगने आई हूँ।"

और फिर माँ ने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

"आप तीन पन्नों की बात कर रहे हैं। मेरे पास एक पन्ने का जवाब है। आप उस पन्ने पर मेरे पति का अंगूठा दिखाते हैं। मैं आपको उसी अंगूठे के नीचे लिखी लाइन दिखाती हूँ, जो आपने कभी पढ़वाई ही नहीं।"

सक्सेना रुक गए।

"कौन सी लाइन?" उन्होंने पूछा।

"वो लाइन," माँ ने कहा, "जिसमें दो नाम लिखे हैं। पापा और बेटे के। और उनमें से एक नाम के आगे आज भी अंगूठा नहीं लगा।"

गली में फिर वही सन्नाटा।

मैंने सक्सेना के चेहरे पर देखा। वहाँ कुछ नहीं था। कोई चौंकना नहीं, कोई घबराना नहीं। बस एक हल्की-सी झुँझलाहट, जैसे किसी को रास्ते में एक छोटा पत्थर मिल गया हो।

"बहन जी," उन्होंने कहा, "आप बहुत थकी हुई हैं। बातें आपके दिमाग़ में बड़ी हो रही हैं।"

"मेरे दिमाग़ में सब छोटा है," माँ ने कहा। "बड़ा सिर्फ़ आपका लिफ़ाफ़ा है।"

शबनम आपा ने ज़ोर से हँस दिया। एक आदमी ने भी हँसा। फिर दो और। फिर पूरी गली धीरे-धीरे बुदबुदाने लगी, और वो बुदबुदाहट सक्सेना के लिए किसी भी हँसी से बड़ी चीज़ थी।

सक्सेना ने मनोज की तरफ़ देखा।

"काग़ज़," उन्होंने बस इतना कहा।

मनोज ने बंडल खोला, एक काग़ज़ निकाला, और सक्सेना के हाथ में रख दिया। सक्सेना ने उसे पढ़ा, फिर पीपल की तरफ़ देखा, फिर बोले —

"ठीक है। सभा आज के लिए बंद। पर एक बात लिख लो — काग़ज़ का दाम कभी देर से नहीं आता। वो आता है। चाहे तुम्हारे पास अंगूठा हो, चाहे न हो।"

और वो मुड़े।

फिर रुके, और बिना पलटे बोले, "और अंकुश — जो तुम्हारे दुकान के पीछे खड़ा था, वो मेरा आदमी नहीं है। वो अपना है। मुझे भी कल रात पता चला। मैं तुम्हें साफ़ बता रहा हूँ, क्योंकि मैं झूठ बोलकर अपना वक़्त नहीं खराब करता। मैं सिर्फ़ चीज़ें खरीदता हूँ, आदमी नहीं।"

ये बात उन्होंने मुझे ऐसे दी जैसे कोई खाली हाथ दिखाकर कहता है — देखो, मेरे पास कुछ नहीं।

और यही उनका सबसे बड़ा हथियार था। वो हमेशा आपको एक सच देकर बाकी नब्बे झूठ छिपा लेते थे।

वो चले गए। मनोज पीछे-पीछे, काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाए, जैसे किसी ने उसे ज़िंदा रखा हो।

सभा धीरे-धीरे छितराने लगी।

कोई बोलता नहीं था, पर सब देख रहे थे। देखना भी एक बात होती है, और आज पूरी गली पापा को देख रही थी — उस आदमी को जो पच्चीस साल से चुप था, जो किसी सभा में नहीं बैठा था, जो रात को सीढ़ी पर हाथ जोड़े बैठा रह गया था, और जो आज सबके सामने खड़ा था, सफ़े हाथ लेकर।

वो किसी से कुछ नहीं बोले।

वो बस माँ के पास गए। व्हीलचेयर के सामने झुके, और बहुत धीमी आवाज़ में कुछ कहा। मैंने सुना नहीं। काजल ने सुना, क्योंकि उसकी आँखें भर आईं और उसने मुँह फेर लिया।

फिर पापा सीधे खड़े हुए, और किसी से कुछ कहे बिना, दुकान की तरफ़ चल दिए।

फाइल उनके सीने पर ही थी।

मैं उनके पीछे चल पड़ा।

तभी घंटी मेरी जेब में धीरे से बजी — इतनी धीमी कि जैसे कान में साँस डाल रही हो।

"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले वो रख दे।"

मैं रुक गया।

टिंकू पीछे से दौड़कर आया। उसके हाथ में माँ का गुलाबी दुपट्टा था, जो कल गुप्तचर के भेस में उसके सिर पर बँधा था, और आज मोड़कर उसने जेब में ठूँस लिया था।

"उस्ताद," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "वो सफ़ेद जूते वाला… वो उस्ताद की दुकान की तरफ़ गया है।"

"पता है," मैंने कहा।

"और उस्ताद?" टिंकू ने पूछा। "उस्ताद भी वहीं हैं।"

"पता है," मैंने कहा।

"उस्ताद, अगर वो सच में उस्ताद का भाई है, तो पचास साल से मिला नहीं? पचास साल में आदमी इतना गुस्सा कैसे रख सकता है?"

मैंने टिंकू के सिर पर हाथ रखा।

"पचास साल में गुस्सा नहीं रहता, टिंकू," मैंने कहा। "पचास साल में बस आदमी को याद भी नहीं रहता कि गुस्सा किस बात पर था। पर चुप्पी याद रह जाती है। वो चीज़ है जो गुस्से से भी ज़्यादा ज़िंदा रहती है।"

टिंकू ने कुछ सोचा।

"तो आज चुप्पी टूटेगी?"

"आज चुप्पी बोलेगी," मैंने कहा। "टूटेगी कल।"

उस्ताद की दुकान का नीला रंग आज और फीका लग रहा था।

शटर आधा उठा था, और अंदर से वो पुरानी सिलाई मशीन दिख रही थी। उसका लोहा आज भी वैसा ही चमकदार था, पर सुई नहीं थी — कल उस्ताद ने चौदहवीं सुई तोड़ दी थी और नई नहीं लगाई थी।

सलीम अंदर था।

वो मेज़ के पास खड़ा था, और उसका हाथ सिलाई मशीन के लोहे पर था। उँगलियाँ धीरे-धीरे उस पर फिर रही थीं, जैसे किसी पुराने घाव को बिना छुए सहला रहा हो।

उस्ताद दुकान के कोने में बैठे थे। उनकी कुर्सी उसी जगह थी, पीछे की तरफ़, दीवार से सटी। उनका चश्मा हाथ में था। उन्होंने पहना नहीं था। पचास साल से पहली बार शायद उन्हें अपना चश्मा पहनने की ज़रूरत नहीं लगी — क्योंकि जिसे देखना था, वो आँखों के इतने पास आ गया था कि चश्मे की ज़रूरत ही नहीं रही।

मैं दरवाज़े पर रुका।

शबनम आपा मेरे पीछे आई, हाथ में चाय की दो गिलास लिए। उसने कुछ कहा नहीं। बस मेरे हाथ में एक गिलास पकड़ा दिया और दूसरा टिंकू को। फिर खुद बाहर, दरवाज़े के सहारे खड़ी हो गई — जैसे गुमटी नहीं, दरवाज़ा बना रही हो।

सलीम ने मेरी तरफ़ देखा।

"आ गए," उसने कहा। "समय से पहले।"

"चाय ठंडी हो जाती," मैंने कहा।

वो हँसा। पहली बार ऐसा हँसा कि चेहरे पर सफ़ेद कुर्ते से ज़्यादा सच्चाई दिखी।

उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।

"लाओ," उसने कहा। "मुझे काफ़ी चाहिए थी। चार दिन से बिना चाय का चल रहा हूँ। भारद्वाज भवन में चाय अच्छी नहीं बनती। सब कुछ है वहाँ — तीन मंज़िल, शीशा, लिफ़्ट — पर चाय नहीं है। इतने साल में एक ही कमी रह गई।"

मैंने गिलास उसके हाथ में रख दिया।

"आप वहाँ कब से हैं?" मैंने पूछा।

"बाईस साल से," उसने कहा, और घूँट भरा।

फिर उसने गिलास नीचे किया और मुझे देखा।

"ये मुझे उस्ताद ने नहीं बताया, होगा," उसने कहा। "उस्ताद ने शायद तुमसे यह भी नहीं कहा कि मैं क्यों गया था। उन्होंने बस इतना कहा होगा कि दोनों दुकानें एक थीं और झगड़ा हो गया। सही?"

"कुछ ऐसा ही," मैंने कहा।

"उस्ताद कभी पूरी बात नहीं बोलते," सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, एक अजीब-सी थकान थी। "पचास साल से। जब बोलते हैं, तो आधी बात सिलाई की तरह टाँक देते हैं, और बाकी छोड़ देते हैं कि खुद जोड़ लो। मैंने पचास साल अपनी तरफ़ का टाँका जोड़ा। फिर भी कपड़ा नहीं बना।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

उन्होंने बस गिलास रखा, जो मैंने उनके पास रख दिया था, और उनका हाथ एक पल के लिए मशीन की तरफ़ गया। फिर रुक गया।

सलीम ने मशीन पर हाथ फिराया।

"शंकर भाई की फाइल बाहर है," उसने कहा। "वो घर के सबसे पुराने दरवाज़े से आई है। मुझे पता है वो क्या है। मैंने उसे उस रात देखा था, जब वो पहली बार मेरी माँ की सिलाई पेटी के पास रखी गई थी।"

वो मेरी तरफ़ मुड़ा।

"पर अंकुश, मैं तुम्हें एक बात साफ़ बता दूँ। अगर वो फाइल आज खुली, तो उसमें सिर्फ़ सात नाम नहीं निकलेंगे। उसमें एक नाम और निकलेगा जो आज तक किसी काग़ज़ में नहीं लिखा गया।"

"किसका?" मैंने पूछा।

"मेरी माँ का," सलीम ने कहा।

दुकान में सन्नाटा छा गया। टिंकू ने चाय का गिलास मुँह से हटा लिया।

"मेरी माँ," सलीम ने दोहराया, "उस ज़मीन की सातवीं औरत थीं। सात नाम उस पन्ने पर हैं — छह मर्द और एक औरत। उस पन्ने पर उनका नाम नहीं है, क्योंकि सालों पहले उन्हें चुप रहने को कहा गया था — ज़मीन में औरत का नाम नहीं होता, बस हाथ होता है जो देता है। और वो हाथ पचास साल से मेरे और उस्ताद के बीच एक दरवाज़े की तरह खड़ा है।"

उसने गिलास मेज़ पर रखा।

"अंकुश," उसने कहा, "तुम जानते हो ये घंटी कहाँ से आई?"

मैंने एक पल सोचा। बहुत कुछ कह सकता था। पर घंटी ने कहा था — अभी नहीं।

"मुझे पता है," मैंने कहा।

"नहीं," सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार कड़क हुई। "तुम सोचते हो पता है। सब सोचते हैं पता है। आज मैं उस्ताद से पूछता हूँ, और तुम सुनना।"

वो उस्ताद की तरफ़ मुड़ा।

उस्ताद ने अपना चश्मा हाथ में घुमाया। फिर धीरे से उसे मेज़ पर रख दिया, और मशीन के पास जो कुर्सी पड़ी थी, वो खींचकर बैठ गए। उनकी हड्डियाँ बोलीं — कुर्सी तक जाने में भी।

सलीम का हाथ मशीन के लोहे पर टिका रहा। और फिर उसने बोला — धीरे से, पर ऐसे जैसे पूरी गली सुन रही हो, और सच में सुन रही थी, क्योंकि दरवाज़े के बाहर अब कोई सात-आठ लोग खड़े थे, और कोई कुछ नहीं बोल रहा था।

"उस्ताद," सलीम ने कहा, "ये घंटी हमारे खानदान ने चुराई नहीं थी।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।

"हमने इसे छुपाया था।"

उस्ताद ने आँखें एक पल के लिए बंद कीं।

"और छुपया क्यों था?" सलीम ने पूछा, पूरी गली से, मेज़ से, दरवाज़े से, हवा से। "इसलिए, क्योंकि हमारे पिता को पता था कि जिस दिन कोई इस घंटी को ज़ाहिर में लाएगा, उस दिन सात नाम वाले पन्ने पर लिखा हर आदमी इस गली में वापस लौट आएगा। और जो लौटेगा, वो हिसाब माँगेगा।"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"मैंने घंटी नहीं छुपाई थी," उसने कहा। "मैं तो शहर से भाग गया था। उस्ताद ने छुपाई। और उस्ताद ने ही उसे एक साइकिल पर लगाकर चुपचाप तुम्हारे घर भेज दिया। बहुत साल पहले। उस दिन जब तुम्हारे दादा गए थे, उस्ताद दुकान पर नहीं थे। सच जानते हो क्यों?"

मैंने सिर हिलाया — नहीं।

"क्योंकि वो उस रात जगदीश भाई के घर पर थे। चुपचाप। साये की तरह। और घंटी उन्होंने खुद बक्से में रखी थी। मुझे उस रात फोन आया था — एक ही घंटी, तीन बजे। बस एक शब्द बोले थे — 'अब नहीं।'"

उस्ताद ने अपना चश्मा फिर उठाया। पहना। उतारा। फिर बोले — पहली बार, बहुत छोटा वाक्य।

"सलीम, बैठ जा।"

"मैं बैठा हूँ," सलीम ने कहा। "पचास साल से। अब तुम बैठो।"

और उस्ताद बैठे हुए थे। पर सलीम की बात में कुछ ऐसा था कि उन्होंने कुर्सी पर अपना हाथ रखकर उसे थोड़ा और खींच लिया, जैसे बैठने की कोई नई जगह ढूँढ रहे हों।

सलीम ने मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश, तुम्हारी घंटी बजती है, है न?"

दुकान में हवा रुक गई।

मैंने एक भी शब्द नहीं कहा। मेरी जेब में घंटी थी, और जैसे ही उसने यह पूछा, घंटी ने अपनी तरफ़ से एक भी आवाज़ नहीं निकाली। जैसे वो भी चुप हो गई हो। जैसे अंदर आकर किसी कोने में बैठ गई हो और साँस तक नहीं ले रही हो।

"कैसे…" मैंने शुरू किया, और फिर रुक गया। क्योंकि झूठ मेरे गले में अटक गया था, और सच मुँह तक आते-आते रुक गया था। दोनों के बीच में मैं खड़ा था, और वो जगह बहुत तंग थी।

सलीम मुस्कुराया।

"मुझे घंटी नहीं सुनाई देती," उसने कहा। "मुझे बस पता है। उस्ताद को भी पता है। पचास साल पहले हम दोनों को भी सुनाई देती थी। फिर एक रात सब कुछ बंद हो गया। उस रात माँ की सिलाई पेटी ताले में बंद हुई, और हम दोनों भाई अलग-अलग दरवाज़ों पर सो गए।"

उसने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"तुम्हें याद है, वो रात?" उसने पूछा।

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

"मुझे याद है," सलीम ने कहा। "तुम ताले की चाबी लेकर बैठे थे, और मैंने कहा था — खोलो। तुमने कहा था — नहीं। और बस। उसके बाद पचास साल में हमारे बीच जो बोला गया, वो सब काग़ज़ों का हिसाब था, आदमी का नहीं।"

वो मेरी तरफ़ मुड़ा।

"अंकुश, मैं आज तुम्हारी सभा में इसलिए नहीं आया कि मैं कुछ लेने आया हूँ। मैं तो सिर्फ़ यह देखने आया था कि जिस आदमी को ये घंटी मिली है, वो इसके लायक़ है या नहीं।"

उसकी आँखें मेरी आँखों पर टिकी रहीं।

"और मुझे क्या दिखा? एक लड़का, जिसने मुझसे पूछा कि सलाह का बिल आएगा या नहीं। तुम्हें पता है, इस गली में पचास साल से किसी ने सलाह से पहले बिल नहीं पूछा। सब पहले डरते रहे, फिर मान गए। तुमने पहले पूछा।"

वो हँसा।

"मुझे यही चाहिए था।"

फिर उसकी मुस्कान फीकी पड़ गई।

"अब बात सुनो, और ध्यान से सुनो। जो फाइल तुम्हारे पापा के सीने पर है, वो फाइल काग़ज़ नहीं है। वो एक ताला है। उस पर सात अंगूठे हैं, और उनमें से एक भी झूठा हुआ, तो सारा काग़ज़ चुप हो जाएगा — जैसे मेरी घंटी। जैसे मेरे भाई की मशीन। काग़ज़ भी इंसान की तरह होता है — झूठ सुनकर चुप हो जाता है।"

"और सच सुनकर?" मैंने पूछा।

"सच सुनकर वो बोलता है," सलीम ने कहा। "पर सच बोलने के लिए आदमी को पहले अपना सबसे पुराना डर खोलना पड़ता है। और पापा का सबसे पुराना डर तुम्हारे सामने बैठा है।"

उसने अपनी छाती पर हाथ रखा।

"मैं," उसने कहा।

मैं चुप रहा। बहुत देर तक चुप रहा।

फिर मैंने देखा कि उस्ताद उठे हैं। उन्होंने अपना चश्मा पहन लिया था, और उनका हाथ मशीन के पास से एक छोटी सी दराज़ खींच रहा था। दराज़ चरचराई। उन्होंने उसमें से एक चीज़ निकाली और मेज़ पर रख दी।

एक चेन की कड़ी।

सिर्फ़ एक कड़ी। टूटी हुई चेन का एक टुकड़ा, जो किसी बड़ी चीज़ से अलग किया गया था।

"ये उस रात की है," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ खुरदुरी थी। "जिस रात माँ की पेटी बंद हुई। ये चेन उस पेटी की नहीं है। ये उस ताले की है जो उस रात छत की कोठरी में लगा था। और ये कड़ी मैंने पचास साल अपनी जेब में रखी, सिर्फ़ इसलिए कि मुझे पता था कि एक दिन कोई आएगा और पूछेगा — उस्ताद, ये किसकी है?"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"आज किसी ने नहीं पूछा। पर वो पूछने वाला बाहर खड़ा है, और उसके हाथ में कैमरा है।"

मैंने मुड़कर देखा।

मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी, कैमरा हाथ में, और उसके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने उसमें कभी नहीं देखा था — सिर्फ़ रिपोर्टर का नहीं, किसी ऐसी चीज़ का, जो एक रिपोर्टर के अंदर बहुत गहरे में बैठी है।

और उसके पीछे, गली के मोड़ पर, एक छाया खड़ी थी।

पापा की छाया।

फाइल अब भी उनके सीने पर थी।

और घंटी मेरी जेब में बहुत धीरे से बोली, जैसे कोई सपने में नाम पुकारता हो।

"आज तीन चीज़ें खुलेंगी," उसने कहा। "एक ताले से, एक काग़ज़ से, और एक चुप्पी से। और तीनों का ताला एक ही है।"

॥

रात को उस्ताद की दुकान से निकलकर मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ी थी, कैमरा हाथ में, पर उसने कैमरा उठाया नहीं। यही बात मुझे अजीब लगी। मीरा वो लड़की है जो सच देखते ही कैमरा उठा लेती है, जैसे भूखा रोटी देखकर हाथ बढ़ाता है। पर आज वो हाथ नीचे लटका कर खड़ी थी।

"क्या देख रही हो?" मैंने पूछा।

"तेरे पापा," उसने धीरे से कहा। "गली के मोड़ पर, फाइल सीने से चिपकाए। ऐसे खड़े हैं जैसे कोई बच्चा स्कूल के गेट पर खड़ा हो, जिसे पता हो कि घर से देर हो गई है, पर अंदर जाने की हिम्मत नहीं।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा, थोड़ी देर।

"तुम अंदर आओ," मैंने कहा। "बाहर ठंड है।"

"अंकुश," उसने कहा, "मैं अंदर नहीं आ रही। मैं उस मोड़ तक जा रही हूँ। तेरे पापा से बात करनी है।"

"क्या बात?"

"वही जो तू नहीं कर पा रहा।"

वो मुड़ गई, और उसके जाने की आवाज़ गली में देर तक रही। मैं दुकान में खड़ा रहा। उस्ताद ने मशीन पर कपड़ा डाल दिया था, और सलीम की कुर्सी खाली पड़ी थी। वो कब निकला, मुझे पता ही नहीं चला।

घंटी जेब में चुप थी। बहुत चुप। ऐसी चुप जो डाँट जैसी लगती है।

मैं घर नहीं गया। मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में चारपाई पर लेट गया, और सुबह की पहली किरण के साथ आँख खुली — आँख खुली तो लगा जैसे किसी ने रात भर मेरे कान में कोई सवाल भुनभुनाया है।

सुबह।

दुकान के बाहर बाल्टी में पानी डालने की आवाज़ आई। मैं उठकर देखने गया — पापा थे। पीठ मेरी तरफ़, हाथ में पुरानी रिंच, और वही औज़ार जो उन्होंने रात भर पोंछे थे। लोहे की किसी चीज़ पर लगी ज़ंग साफ़ करते रहे, जैसे कोई नमाज़ पढ़ता है — बिना रुके, बिना देखे कि कौन आया।

"पापा?"

"हम्म।"

"भूरी फाइल कहाँ है?"

रिंच चलती रही।

"पापा, वो फाइल मैंने देखी है। सीने पर चिपकाए थे। सभा में। पीपल के नीचे। माँ के सामने, गली के सामने, सक्सेना के सामने। और अब —"

"औज़ार पोंछ," उन्होंने कहा।

"क्या?"

"औज़ार पोंछ। दुकान है। कुछ काम कर।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनका चेहरा साफ़ था, पर आँखों के नीचे जो गड्ढे थे, वो बता रहे थे कि रात भर नींद नहीं आई। और वो चेहरा — वो वही चेहरा था जो बाईस साल पहले सकीना बी की दुकान पर हर महीने की पाँच तारीख़ को जाता था। जो चेहरा बेटे से कुछ छिपाता है, पर छिपाते हुए भी बेटे के सामने बैठना चाहता है।

मैंने रिंच उठाई। दो मिनट पोंछी। फिर फेंक दी।

"मैं पूछ रहा हूँ, पापा। आप सुन रहे हैं न?"

वो रुके। रिंच को कपड़े पर रखा। और फिर पानी के बर्तन में हाथ डालकर कुल्ला करने लगे, जैसे मैंने कुछ पूछा ही न हो।

मैं दुकान के बाहर आया। सुबह की गली में शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था। पीपल के नीचे चबूतरी खाली थी, सिर्फ़ एक बूढ़ा अपनी लाठी के सहारे बैठा था। उसने मुझे देखा, सिर हिलाया, और फिर अपनी लाठी देखने लगा, जैसे मुझे न देखा हो। यही तो सुबह की गली होती है — रात की सभा के बाद सब एक दूसरे को ऐसे देखते हैं जैसे कल कुछ हुआ ही न हो।

घर पहुँचा। माँ चूल्हे पर थीं, पर आज चूल्हा जल रहा था और हाथ नहीं चल रहे थे। वो बस तवे पर रोटी रखकर उसे देख रही थीं, जैसे रोटी उनसे कुछ पूछ रही हो।

"माँ।"

"हाँ, बेटा।"

"पापा से बात नहीं हो रही।"

"होगी।"

"कब?"

"जब उनका मन करेगा।"

वो हिसाब की कॉपी उठाने लगीं जो चूल्हे के पास रखी थी। पर कॉपी उनके हाथ से फिसल गई। काग़ज़ फर्श पर गिरे, और मैंने देखा — उनके हाथ काँप रहे थे। मेरी माँ के हाथ, जो सुबह पाँच बजे से पूरी गली का खाना बनाते हैं, काँप रहे थे।

"माँ।"

"कुछ नहीं," उन्होंने कहा। "कल रात ठंड लग गई थी।"

"माँ, मुझे पता है आप डर रही हैं।"

वो रुकीं। तवे से रोटी उतारी, थाली में रखी, और फिर मेरी तरफ़ देखा — एक पल के लिए। बस एक पल। और उस एक पल में मैंने वो देखा जो कभी नहीं देखा था। डर। वो डर जो रोटी बनाते हुए भी पीछे देखता है।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "आज तू बाहर मत जा।"

"कहाँ?"

"कहीं भी। दुकान पर रह। मैं तेरे लिए समोसा ले आऊँगी शबनम से।"

"माँ, कल सभा में आपने खुद कहा था — अपना काग़ज़ माँगो। आपने सक्सेना के सामने खड़े होकर कहा था कि दो नामों वाली लाइन में एक अंगूठा आज भी खाली है। आपने वो कहा था, माँ। और अब —"

"और अब मैं कह रही हूँ, दुकान पर रह।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं तेरी माँ हूँ।"

"ये जवाब नहीं है।"

"मेरे पास इससे बड़ा जवाब नहीं है।"

मैं वहीं खड़ा रह गया। कभी-कभी माँ के पास कोई जवाब ऐसा होता है जो सवाल से बड़ा होता है। और मैं उस जवाब से आगे नहीं जा पाता। आज भी नहीं जा पाया।

काजल बाहर से आई। बाल बाँध रही थी, किताब दबी थी बगल में। मुझे देखकर रुकी, माँ को देखा, फिर धीरे से मेरे पास आई।

"उसे मत पूछ," उसने फुसफुसाया।

"क्यों?"

"वो कल रात से डरी हुई है। पापा रात भर नहीं सोए। मैंने उठकर देखा — वो दुकान से आकर बैठे रहे, चारपाई पर, जूते भी नहीं उतारे। और माँ ने आटे के डिब्बे में कुछ छिपाया है।"

"क्या?"

"एक चाबी। पुरानी। मैंने सुबह देखा — जब वो आटा लेने गई थी, डिब्बे के अंदर कुछ धातु की आवाज़ आई।"

"कौन सी चाबी?"

"मैं नहीं जानती। पर वो चाबी ऐसी थी जैसे बहुत पुरानी हो। और माँ ने उसे ऐसे डिब्बे में रखा, जैसे कोई चीज़ ज़मीन के नीचे दफ़्नाता है।"

मैं कुछ सोच ही रहा था कि दरवाज़े पर खटपट हुई। जैसे ही खोला, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और टिंकू — पाँचों खड़े थे, आँखें चमक रही थीं, साँस फूल रही थी।

"उस्ताद!" टिंकू ने कहा। "उस्ताद की दुकान पर!"

"क्या हुआ?"

"सलीम आया! कल रात से वहीं है!"

"तो?"

"उसने चाय माँगी थी।"

"तो?"

"चीनी नहीं माँगी!"

मैं रुक गया।

"क्या?"

"उस्ताद ने पूछा — चीनी कितनी? तो सलीम ने कहा — चीनी नहीं। बिना चीनी। और उसने अपना आदमी दुकान के बाहर खड़ा कर दिया है। बड़ा आदमी, काली शर्ट में, दरवाज़े के सामने खड़ा है।"

"क्या कर रहा है वो?"

"कुछ नहीं। बस खड़ा है। सबको अंदर जाने देता है, पर देर तक रुकने वाले को ऐसे देखता है जैसे कहे — जा, तेरा काम नहीं।"

मैं हँस पड़ा।

"अरे, चीनी छोड़ने वाला आदमी ज़रूर कोई बड़ा राज़ छिपा रहा है।"

टिंकू ने सिर हिलाया।

"मैंने भी यही सोचा, उस्ताद! मैंने कहा भी — अरे, चीनी के बिना चाय?" पाँचों बच्चों ने एक साथ सिर हिलाया, जैसे गली में सबसे बड़ी खबर यही हो।

"अंकुश," माँ ने दरवाज़े से कहा। और उनकी आवाज़ में वो कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। "इधर आ।"

मैं गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया — दोनों हाथों से। उनके हाथ ठंडे थे।

"आज तू उस्ताद की दुकान पर मत जा।"

"माँ —"

"मत जा। मैं जानती हूँ तू क्यों जाना चाहता है। सलीम तुझे बुला रहा है। वो अपना आदमी वहाँ खड़ा करके बुला रहा है। और मैं जानती हूँ, जब कोई ऐसे बुलाता है तो वहाँ जाने के बाद आदमी वैसा नहीं रहता जैसा वो गया था।"

"माँ —"

"बात बहुत आगे बढ़ चुकी है, अंकुश।"

"माँ, यही तो बात है। जब बात बहुत आगे बढ़ जाए, तो आदमी को चलना पड़ता है। पीछे नहीं हटना होता।"

"तू उस आदमी से नहीं जानता।"

"आप जानती हो?"

उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया। उनकी आँखें भर आईं।

"मैं बाईस साल से उस आदमी के नाम से डरती हूँ, अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा। "जिस रात सलीम मरा, उस रात से। और आज वो ज़िंदा है। और तेरे सामने खड़ा है। तुझे पता है ये क्या मतलब है?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"ये मतलब है," उन्होंने कहा, "कि मरा हुआ दुबारा नहीं मरता। पर ज़िंदा — ज़िंदा आदमी एक ही रात में सब कुछ बदल सकता है।"

काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।

"उस्ताद आ रहे हैं," उसने खिड़की से देखकर कहा। "और वो अकेले नहीं आ रहे। भाग रहे हैं।"

मैं खिड़की तक गया।

गली में उस्ताद अली बक्श आ रहे थे। उनका चश्मा हाथ में था। वो एक बार भी उसे लगाने की कोशिश नहीं कर रहे थे। दौड़ना उनकी उम्र का काम नहीं है, पर वो दौड़ रहे थे। और चेहरा — उनका चेहरा पीला था। जैसे किसी ने उनकी आँखों के सामने से दुनिया खींच ली हो।

वो दरवाज़े तक पहुँचे। एक पल को रुके। मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़। फिर मुझे अपनी तरफ़ खींचा, और बहुत धीरे बोले — इतना धीरे कि काजल भी न सुने।

"मेरा भाई तेरी घंटी का असली नाम जानता है।"

मैं ठिठक गया।

"क्या?"

"मेरा भाई," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "सलीम। वो तेरी घंटी का असली नाम जानता है। और वो यही नाम आज किसी को बताने आया है।"

मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया।

घंटी वहीं थी। चुप। इतनी चुप जैसे साँस भी न ले रही हो।

"किसे?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा।

"अभी नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर वो बिना चीनी की चाय पी रहा है। और बिना चीनी की चाय पीने वाला आदमी सिर्फ़ इसलिए नहीं पीता कि उसे चीनी पसंद नहीं। वो इसलिए पीता है कि उसे पता है — आज उसका मुँह कड़वा रहेगा, तो कम से कम चाय तो कड़वी न हो।"

पीछे माँ ने धीरे से कहा, "मैंने कहा था।"

उस्ताद ने पीछे मुड़कर देखा, और फिर उनसे एक पल के लिए ऐसे देखा जैसे कोई बूढ़ा अपनी ही गली में अचानक बहका हुआ लड़का देखता है।

"सुशीला जी," उन्होंने कहा, "ये बात तुम्हारे डर से नहीं रुकेगी। ये बात मेरे भाई से नहीं रुकेगी। ये तो उस घंटी से रुकेगी, और आज वो चुप है। मैं पचास साल में पहली बार उसे चुप देख रहा हूँ।"

मेरा हाथ अपने आप घंटी पर गया।

मैंने उसे उठाया। मेरी हथेली में रखा। और उसे हिलाया।

घंटी बजी। पर उसकी आवाज़ वो नहीं थी जो रोज़ की थी। उसमें कुछ था — जैसे कोई चीज़ जो बहुत दूर से आ रही हो, जैसे कोई चीज़ जो अभी रास्ते में हो, जैसे कोई चीज़ जो यह कह रही हो — अभी नहीं, थोड़ा और रुको।

"उसने कुछ नहीं कहा," मैंने कहा।

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"वो आज नहीं बोलेगी। जिस दिन उसका असली नाम बोला जाएगा, उस दिन वो चुप रहेगी।"

"क्यों?"

"क्योंकि असली नाम सुनकर हर चीज़ चुप हो जाती है। पहले वो सुनती है। फिर सोचती है — ये आदमी इसे जानकर क्या करेगा।"

मैंने घंटी जेब में रखी। मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

"आपकी मशीन, उस्ताद। जो आपने बताया कि उस रात छत की कोठरी के ताले की चेन की कड़ी है। उसका क्या?"

उस्ताद ने धीरे से कहा, "उसका ताला आज खुलेगा। वो मैं जानता हूँ। सिर्फ़ ये नहीं जानता कि खुलेगा किसके हाथ से।"

काजल ने पीछे से कहा, "माँ ने आटे के डिब्बे में कुछ छिपाया है।"

सब रुक गए।

माँ की तरफ़ सबने देखा। माँ ने काजल को देखा — एक पल के लिए क्रोध से, फिर प्यार से, फिर हार से।

"वो चाबी," उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे पापा की नहीं है। वो मेरी है। और मैंने उसे बाईस साल से रखा हुआ है। उस दिन के बाद से नहीं खोला।"

"कौन सी चाबी, माँ?" मैंने पूछा।

"वो चाबी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, "जो उस संदूक के धूल वाले हिस्से में मिली थी जिसे किसी ने कल रात खोला। वो चाबी असली ताले की है, अंकुश। बंद ताले की। उस ताले की, जो शहर में सबसे पुराना है। और वो ताला —"

वो रुक गईं।

"वो ताला आज भी लगा हुआ है," उन्होंने कहा। "और उसका पता सिर्फ़ तीन आदमी जानते हैं। मैं। तेरे पापा। और —"

माँ ने उस्ताद की तरफ़ देखा।

उस्ताद ने धीरे से कहा, "और मेरा भाई।"

मैंने गहरी साँस ली।

बाहर गली में किसी ने शटर खोला। धूप बढ़ रही थी। शबनम आपा की चिमटी की आवाज़ आई। पीपल के नीचे किसी बूढ़े ने खाँसा।

सुबह का आम दिन, एक आम गली में, एक आम शहर में।

और मेरे हाथ में एक घंटी थी, जो किसी का असली नाम जानती थी।

"उस्ताद," मैंने कहा। "आपके भाई की दुकान पर जो आदमी खड़ा है — वो कौन है?"

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"वो मेरे भाई का आदमी है। पहले भी था। पचास साल पहले भी था।"

"पचास साल पहले?"

"हाँ। उस रात भी वही आदमी बाहर खड़ा था। जब माँ की पेटी बंद हुई थी।"

मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा।

फिर मैंने घंटी जेब में डाली, अपना फटा जूता पहना, और अपना हाथ दरवाज़े की तरफ़ बढ़ाया।

"माँ," मैंने कहा, "आज मैं उस्ताद की दुकान पर नहीं जा रहा।"

उन्होंने राहत की साँस ली।

"मैं उस्ताद की दुकान पर नहीं जा रहा," मैंने फिर कहा, "क्योंकि आज सलीम मेरी दुकान पर आ रहा है।"

उनका चेहरा बदल गया।

"अंकुश —"

"माँ, वो बिना चीनी की चाय पी रहा है। अपना आदमी बाहर खड़ा करके बता रहा है कि उसे कोई नहीं सुन रहा। अब मैं उसके सामने जाकर खड़ा रहूँगा। तब देखेंगे कि चीनी बिना वो क्या कहेगा।"

मैंने पीछे मुड़कर उस्ताद को देखा।

"उस्ताद, आप कहते हैं वो मेरी घंटी का असली नाम जानता है।"

"हाँ।"

"तो आज वो नाम मेरी गली में सुनाया जाएगा। मेरी दुकान पर। मेरे पापा के सामने। मेरी माँ के सामने। और उस नाम को सुनकर अगर वो घंटी टूटी तो टूटी — पर आज ये दुकान थोड़ी देर के लिए मेरे नाम की होगी।"

पापा अभी भी दुकान के पीछे थे, औज़ार पोंछ रहे थे।

मैंने बाहर आकर देखा।

सुबह की गली में मनोज का टेम्पो नहीं था। नीला बोर्ड नहीं था। पीला नोटिस नहीं था।

पर एक आदमी था।

काली शर्ट में। दुकान से तीन कदम दूर। हाथ पीछे बँधे। सिर ऊपर। ऐसे खड़ा जैसे दस साल से खड़ा हो।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।

टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची।

"उस्ताद, वो अब भी खड़ा है।"

"हाँ।"

"क्या करें?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आज वो देखेगा कि हम क्या करते हैं।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

पापा दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। औज़ार अब भी हाथ में था। पर अब वो औज़ार नहीं पोंछ रहे थे। वो मुझे देख रहे थे।

और उनकी आँखों में कुछ था जो बाईस साल से नहीं था।

वो चुप नहीं थे।

वो डर रहे थे — पर डर के पीछे कुछ और भी था। कुछ जो कह रहा था — बेटा, तेरे पीछे मैं हूँ।

मैंने उनकी तरफ़ सिर हिलाया।

उन्होंने भी सिर हिलाया।

बस इतना। कोई शब्द नहीं। कोई लंबी बात नहीं।

पर वो सिर हिलाना — वो मेरे लिए पूरी सभा से बड़ा था।

घंटी जेब में थी।

और उस पल, बहुत धीरे से, जैसे कोई सपने में नाम पुकारता हो, उसने कहा —

"अब तेरे पापा घर के अंदर आएँगे।"

मैं रुका।

"फिर?"

"फिर तेरा सबसे पुराना दरवाज़ा खुलेगा।"

"कब?"

"जब सलीम अपना नाम बोलेगा।"

मैंने दुकान के दरवाज़े की तरफ़ देखा। पापा अंदर चले गए थे।

गली में काली शर्ट वाला आदमी खड़ा था।

उस्ताद अली बक्श मेरे पास खड़े थे, चश्मा हाथ में, वो पहन नहीं रहे थे — जैसे अभी तक उन्होंने अपनी आँखों से वो देखा ही नहीं जो कल रात देखा था।

और पीछे, दुकान के पीछे वाले कमरे में, मेरे पापा — मैंने दरवाज़े की दरार से देखा — भूरी कपड़े में लिपटी फाइल अपने सीने से उतार रहे थे। उसे खोल रहे थे। और फिर उसमें से कोई पुराना काग़ज़ निकालकर अपनी हथेली पर रख रहे थे।

उनका हाथ नहीं काँप रहा था।

पहली बार।

मैंने मुड़कर उस्ताद की तरफ़ देखा।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कभी सोचा — ये घंटी मेरे पास क्यों आई?"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा। "पचास साल सोचा। और जवाब नहीं मिला।"

"तो आज मिलेगा?"

उस्ताद ने धीरे से कहा, "आज या कभी नहीं।"

वो मेरी दुकान के पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गए। उनका चेहरा अब भी पीला था, पर अब उसमें कुछ और भी था — वो कुछ जो बूढ़े आदमी के चेहरे पर तभी आता है जब वो जानता है कि आज उसकी सबसे बड़ी बात कही जाएगी।

और गुमटी पर, शबनम आपा ने चिमटी उठाकर उस काली शर्ट वाले को देखा, और बिना कुछ कहे अपनी सबसे तेज़ आवाज़ में बोलीं —

"अरे, तू सुबह से खड़ा है। चाय पीएगा या डंडा बन जाएगा?"

गली हँसी।

काली शर्ट वाला नहीं हँसा।

पर मैंने देखा — उसके हाथ, जो पीछे बँधे थे, एक पल के लिए हिले।

और उसी पल मैंने सोचा — शायद यही तो वो आदमी है, जिसने बाईस साल पहले उस रात छत की कोठरी के बाहर खड़ा था।

वो आदमी जो हर बात का सिर्फ़ गवाह बनता है।

आज वो गवाह नहीं रहेगा।

आज वो गली के सामने खड़ा है, और गली को देख रहा है — और उसकी आँखों में डर नहीं, हिसाब है।

बच्चे उसे घूर रहे थे। शबनम आपा चाय का गिलास उसकी तरफ़ बढ़ा रही थीं। उस्ताद उसे देख नहीं रहे थे, पर मैं जानता था — उनकी हर साँस उसी की तरफ़ जा रही थी।

मैंने अपने दुकान का शटर थोड़ा और ऊपर किया।

आज गली में एक नई चीज़ होने वाली थी।

और घंटी, जेब में, बहुत धीरे से बोली —

"अब देख, आज कौन सा नाम बोला जाएगा।"

॥

"अरे, तू सुबह से खड़ा है," शबनम आपा ने फिर कहा, "चाय पीएगा या डंडा बन जाएगा?"

काली शर्ट वाला आदमी न हँसा, न बोला। उसने बस अपना सिर थोड़ा सा घुमाया — जैसे हवा में कोई पुराना दरवाज़ा हिलता है और फिर वापस अपनी जगह आ जाता है।

गली हँसती रही। पर वो हँसी अब पहले जैसी नहीं थी। वो हँसी किसी के डर को छिपाने वाली हँसी थी, जैसे बच्चे अंधेरे में सीटी बजाकर चलते हैं।

मैंने शटर पूरा ऊपर कर दिया। चरचराती आवाज़ गली में दूर तक गई।

"उस्ताद," मैंने कहा, "चलिए।"

उस्ताद अली बक्श ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चश्मा अब भी हाथ में था। उन्होंने उसे पोंछा, कान पर टाँगा, और बहुत धीरे से कहा, "चल।"

हम दोनों उनकी दुकान की तरफ़ चले। पचास कदम का रास्ता था, पर उस सुबह वो पचास कदम पचास साल जितने लंबे लग रहे थे।

टिंकू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था। सानिया और गुड्डू पीपल की चबूतरी पर बैठे थे, पर उनकी आँखें हम पर थीं। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा आँख पर लगाया और उसी से हमें देखने लगा, जैसे अब वो कुछ और साफ़ दिखेगा।

"टिंकू," मैंने कहा, "तू बाहर रुक।"

"उस्ताद —"

"बाहर रुक। अगर मैं बाहर आऊँ और मेरा चेहरा ठीक न लगे, तो समझ जाना कि अंदर कुछ भारी हुआ है।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो शरारत नहीं थी जो हमेशा होती थी। उसके चेहरे पर वही डर था जो मैंने उसके पिता के जाने के बाद देखा था।

"उस्ताद," उसने कहा, "आप मेरे पापा जैसे हो। आपको कुछ हो गया तो —"

मैं रुक गया।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "तभी तो तुझे बाहर रुकने को कहा। मेरे पीछे तू है, तो मुझे क्या होगा?"

उसका चेहरा थोड़ा सा खुला। थोड़ा सा। बहुत नहीं। उस उम्र में डर इतना आसानी से नहीं जाता।

उस्ताद की दुकान का दरवाज़ा खुला था।

अंदर से सिलाई मशीन की आवाज़ नहीं आ रही थी। न टिक-टिक। न कुछ भी। सिर्फ़ कपड़े की गंध, मशीन के तेल की गंध, और उसके ऊपर एक अजीब सी मीठी खुशबू — जैसे कोई बहुत पुराने संदूक से निकली हो।

मैं अंदर गया।

और उसे देखा।

सलीम बक्श मशीन के पास लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पायजामा, सफ़ेद जूते। जूते इतने साफ़ थे कि लगता था पहनने के पहले उन्हें चूम लिया गया हो। उसकी उँगली में वो काली अंगूठी थी, जो हर बार देखने पर लगता था कि उसने कोई बात चुपचाप लपेटकर पहन रखी है।

मेज़ पर एक गिलास था। चाय। बिना चीनी। आधा पिया हुआ।

और सलीम मुस्कुरा रहा था।

वो मुस्कान ऐसी थी जैसे कोई बूढ़ा हिसाब देखकर बड़बड़ाता है — पूरा हिसाब उसे ही पता है, तुम्हें तुम्हारी गिनती भी नहीं आती।

"आ जाओ," वो बोला। "अंकुश यादव।"

मैंने देखा — उसने मेरा पूरा नाम लिया। नाम के दो टुकड़े करके, जैसे कोई काग़ज़ पर लिखकर पढ़ रहा हो।

"बैठिए नहीं," मैंने कहा और मशीन की दूसरी तरफ़ खड़ा हो गया। "मैं साइकिल ठीक करता हूँ, साहब। मेरी उस्ताद यहाँ का काम कल की चीज़ है। आप आज का काम बोलिए।"

सलीम ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उस्ताद की तरफ़। उस्ताद दरवाज़े पर ही खुले खड़े रहे।

"अली," सलीम ने कहा, "तू अंदर नहीं आएगा?"

उस्ताद ने कहा, "जब तक बता, ये बैठक है या जवाब।"

"बैठक," सलीम ने हस्ब करते हुए कहा, "मैं जवाब लेने नहीं आया, अली। मैं जवाब देने आया हूँ।"

उस्ताद अंदर आए और दीवार से टिककर खड़े हो गए। दीवार पर टँगी कैंचियाँ थीं, कपड़े के फीते थे, एक पुराना कैलेंडर था जिसका साल भी अब पढ़ा नहीं जाता। उनका कंधा उस कैलेंडर के नीचे आ गया।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। चुप।

"तो सुनो," सलीम ने कहा। "मेरे पास एक बात है, और वो बात सीधी है। तुम भारद्वाज साहब के दफ़्तार में चले जाओ। नौकरी पक्की। साफ़ कमरा, साफ़ कुर्सी, ठीक तनख्वाह। तुम्हारी माँ का इलाज वहीं, तुम्हारी बहन की पढ़ाई वहीं — सब काग़ज़ के एक हस्ताक्षर से।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"और बदले में?" मैंने पूछा।

"बदले में कुछ नहीं," सलीम ने कहा। "बस घंटी से दूरी। और उन पुराने काग़ज़ों से दूरी जो तुम्हारे पापा ने अलमारी में दबा रखे हैं। तुम्हारी उम्र में काग़ज़ नहीं, साइकिल देखनी चाहिए।"

मैंने अपने हाथ देखे।

ग्रीस के निशान। नाखूनों के नीचे काली लकीरें। उँगली पर एक पुराना ज़ख़्म जो छोटी उम्र में रिंच फिसलने से बना था।

"साहब," मैंने कहा, "एक बात बताऊँ?"

"बोलो।"

"मुझे ग्रीस पसंद है।" मैंने अपनी उँगलियाँ दिखाईं। "ये जो काली लकीरें हैं न, ये मेरी कमाई हैं। इन्हें मैं पोंछ भी लूँ तो दो दिन में वापस आ जाती हैं।" फिर मैंने उसके जूतों की तरफ़ देखा। "और जूते चाटने की जो कला है — वो मुझे कभी नहीं आई। मैंने एक बार कोशिश की थी, उल्टी हो गई थी।"

गली से आवाज़ आई। किसी ने खिड़की में से सुना था। टिंकू की हँसी दरवाज़े के बाहर छोटी सी फूटी।

सलीम ने मुस्कुराना नहीं छोड़ा। उसने चाय का गिलास उठाया, घूँट लिया, और रख दिया।

"तू वही करता है," उसने कहा, "जो तेरे दादा करते थे। मज़ाक करके बात टालना।"

मेरा हाथ रुक गया।

"मेरे दादा?"

"हाँ," सलीम ने कहा, "जगदीश यादव। तेरे दादा। जिनकी साइकिल पर ये घंटी लगी थी। और जिनके रजिस्टर में आज भी वो लिखा है, जो तू अभी नहीं जानता।"

उस्ताद ने पहली बार बीच में बात की।

"सलीम," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो बूढ़े आदमी के गले से तभी निकलती है जब वो अपने ही खून से बोल रहा हो। "तूने जो रास्ता चुना है, उसका हिसाब मुझसे मत माँगना।"

सलीम ने उनकी तरफ़ देखा।

"मैं हिसाब नहीं माँगूँगा, अली," उसने कहा। "मैं तो हिसाब लिखता हूँ। और पचास साल से मैं एक ही हिसाब लिख रहा हूँ — कि मेरे खानदान की अमानत किसके घर में बंद है।"

कमरे में चुप्पी आ गई।

"अमानत?" मैंने कहा।

सलीम ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। जैसे उसे दिख रहा हो कि मेरी जेब में क्या है। मुझे लगा मेरी जेब चुभने लगी है।

"ये घंटी," उसने कहा, "तेरे दादा की नहीं थी। ये मेरे खानदान की थी। हमारी माँ की, हमारे बाप की, हमारी विरासत की। और तेरा परिवार इसे पीढ़ियों से छिपाकर बैठा है — जैसे कोई चोर चुराई हुई चीज़ को तकिये के नीचे दबा दे।"

मेरे अंदर कुछ जम गया।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

उस्ताद का चेहरा नहीं बदला। और यही सबसे डरावना था। अगर वो चिल्लाते, अगर वो इंकार करते, तो मुझे राहत होती। वो चुप खड़े रहे, आँखें नीची, जैसे कोई पुराना हिसाब उनके सामने खुलकर बैठ गया हो और वो उससे नज़र नहीं मिला पा रहे हों।

"उस्ताद," मैंने कहा। "ये सच कह रहा है?"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

"उस्ताद —"

"मैंने कहा था न," उस्ताद ने धीरे से कहा, "मिरासी का हिसाब भारी होता है।"

और मेरी जेब में घंटी चुप रही।

मैंने जेब में उँगली से उसे छुआ।

कुछ नहीं।

न आवाज़। न खनक। न वो धीमी साँस जो वो अक्सर छोड़ती थी, जैसे कोई बूढ़ा सोते-सोते करवट बदलता है।

उस कमरे में, सलीम के सामने, घंटी ऐसी चुप हुई जैसे उसने अपना मुँह कपड़े से ढक लिया हो।

और मुझे लगा — मेरे हाथ में जो चीज़ है, वो मेरी है ही नहीं। वो मेरे पास है, बस। जैसे कोई किराए का कमरा। जैसे कोई उधार की साइकिल।

सलीम ने मेरा चेहरा पढ़ा। वो पढ़ने में उस्ताद जैसा ही था — बस उस्ताद कपड़ा सीते थे, ये आदमी आदमी सीता था।

"अच्छा लगा न सुनकर?" उसने कहा। "जब पता चलता है कि जो ताक़त तुझे मिली है, वो तेरी नहीं, किसी और की है — तो अच्छा ही लगता है। आदमी अचानक छोटा हो जाता है। और छोटा आदमी समझदार हो जाता है।"

"साहब," मैंने कहा, "मैं छोटा हूँ ही। मेरी दुकान छोटी है, मेरी साइकिल पुरानी है, मेरे जूते फटे हैं। मुझे छोटा होने की आदत है।" मैंने उसकी तरफ़ झुककर कहा, "आप बड़े हो। आपको छोटा होने में तकलीफ़ होगी।"

सलीम की मुस्कान एक पल के लिए रुकी।

बहुत छोटा सा पल। पर रुकी।

और मुझे लगा — शुक्र है, ये आदमी भी कहीं से इंसान है।

"तू बहुत बोलता है," उसने कहा।

"मेरी माँ कहती है," मैंने कहा, "दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"

उस्ताद ने दीवार से टिककर कहा, "बात छोड़, सलीम। बता, तू किस मुँह से अमानत की बात करता है? जिस घर की चीज़ तूने खुद बेची —"

"अली।"

सलीम की आवाज़ बदल गई।

वो अब मीठी नहीं थी। वो अब ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं, लोहे जैसी। जैसे सर्दियों में गली का पानी — न जमता है, न बहता है, बस खड़ा रहता है।

"तू उस रात की बात मत कर," सलीम ने कहा। "उस रात माँ की सिलाई की पेटी छत की कोठरी में बंद हुई। और तूने चाबी नहीं दी। तूने कहा, चाबी खो गई।"

उस्ताद की साँस लंबी हुई।

"मैंने चाबी नहीं दी," उस्ताद ने कहा, "क्योंकि तूने उस रात पैसा माँगा था। गिरवी रखने के लिए कुछ नहीं बचा था, इसलिए तूने माँ की पेटी चाही थी।"

सलीम उठ खड़ा हुआ।

और मैंने देखा — दीवार पर टँगी कैंचियों ने हवा में हल्का सा हिलकर आवाज़ की। ऐसे लगा कि कमरे ने साँस ली।

"मैं उस रात की बात आज नहीं करूँगा," सलीम ने कहा। "आज मैं एक और बात करने आया हूँ। और वो बात बड़ी है।"

उसने अपना कुर्ता सीधा किया। उसकी काली अंगूठी मेज़ के किनारे पर लगकर बजी — टक।

और वो आवाज़ मुझे जानी-पहचानी लगी। वैसी ही, जैसे बबलू की सोने की चेन में लटकता चौकोर लॉकेट टिक-टिक करता था। दो अलग आदमी, दो अलग अंगूठियाँ, पर आवाज़ एक — जैसे दोनों किसी एक ही दुकान से आए हों।

"आज अस्पताल में," सलीम ने कहा, "एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लड़ेगी।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"सुन ले," उसने कहा। "आज दोपहर के आस-पास। नूर अस्पताल के नीचे वाले कमरे के बाहर। एक बूढ़ी औरत, जिसके हाथ में पुरानी पर्ची है और जिसकी बहू का इलाज तीन महीने से वहीं चल रहा है। वो अपने बेटे से लड़ेगी। सबके सामने लड़ेगी। और उस लड़ाई में वो बात निकलेगी जो तीस साल से अस्पताल की दीवारों में चुनी हुई बैठी है।"

मैंने पूछा, "आपको कैसे पता?"

सलीम ने कहा, "क्योंकि जो लड़ाई आज होने वाली है, वो कल रात तय हुई है। और उस तय में मेरा हाथ है।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।

"आप गली को क्यों बेचते हैं?" मैंने कहा। "आप इस गली के नहीं हो? आपकी माँ का यहीं क्या —"

"मेरी माँ की पेटी आज भी उस छत की कोठरी में बंद है," सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो मीठा नहीं था, ठंडा नहीं था — बस थका हुआ था। "और जब तक वो पेटी बंद है, मैं इस गली का नहीं। मैं किसी का नहीं।"

वो दरवाज़े की तरफ़ चला।

उस्ताद ने उसे जाने से नहीं रोका। पर जब वो उनके पास से गुज़रा, तब उस्ताद ने कहा, "सलीम।"

सलीम रुका।

"तेरी माँ की आवाज़," उस्ताद ने कहा, "अभी भी उस पेटी में है। मैंने उसे पचास साल से सुना नहीं। पर मुझे याद है जैसे कल की बात हो।"

सलीम ने कुछ नहीं कहा।

उसका कंधा थोड़ा सा झुका।

और फिर मैंने कुछ ऐसा देखा जो मुझे नहीं देखना चाहिए था — उस आदमी की आँख में पानी आया और वो तुरंत उलट गया, जैसे कोई गिलास ज़मीन पर रखने से पहले उसे पोंछ देता है।

वो दरवाज़े से बाहर निकला।

मैंने सुना, बाहर काली शर्ट वाले ने उससे कुछ कहा — बहुत धीमी आवाज़ में। सलीम ने बस "हाँ" कहा। और फिर दोनों जाने लगे।

मैं उस्ताद की तरफ़ मुड़ा।

"उस्ताद," मैंने कहा, "ये सब —"

और तभी सलीम दरवाज़े से लौटा।

वो दरवाज़े के चौखट पर खड़ा था। पीछे से सुबह की धूप उसके कुर्ते पर पड़ रही थी और वो पूरा सफ़ेद दिख रहा था। जैसे कोई काग़ज़ खड़ा हो।

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"एक बात बाक़ी थी," उसने कहा। "अभी-अभी याद आई।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"आज अस्पताल में जो लड़ाई होगी," सलीम ने कहा, "उसमें एक चीज़ बिकने वाली है। एक औज़ार। छोटा सा। पुराना सा। जिसकी बोली दस-बारह साल में एक बार लगती है।"

मेरे अंदर कुछ ठंडा फैला।

"और सुन ले," सलीम ने कहा, "उस औज़ार का नाम तेरे दादा जगदीश यादव के रजिस्टर में लिखा है। उसी रजिस्टर में, जिसकी एक लाइन आज भी खाली है।"

वो मुस्कुराया। इस बार मुस्कुराहट पूरी थी। जैसे कोई पूरा हिसाब करके कलम रख देता है।

"अब जाकर अपनी बहन को संभाल," उसने कहा, "वो अस्पताल में है न?"

और वो चला गया।

धूप उसके पीछे से आई, कमरे में घुसी, और मशीन के पहिये पर रुक गई।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

वो कुर्सी पर बैठ गए। इतने धीरे से बैठे जैसे उनकी हड्डियाँ उनसे पूछ रही हों कि अब कितना और चलना है।

"उस्ताद," मैंने कहा, "कौन सा औज़ार?"

उस्ताद ने आँख बंद कर ली।

"रजिस्टर," वो बोले।

"रज़ा सलीम वाला रजिस्टर?"

"हाँ। सलीम का रजिस्टर। जिसमें हर मोहर का हिसाब है। और जिसमें तेरे दादा का नाम भी है।"

"और औज़ार?"

उस्ताद ने आँख खोली। उन्होंने मशीन की दराज़ की तरफ़ देखा, फिर अपनी मेज़ पर पड़े कपड़े के टुकड़ों की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "उस औज़ार की बात मैं तुझे आज नहीं बताऊँगा। क्योंकि जिस दिन तू उसे जानेगा, उस दिन तेरे हाथ काँपेंगे। और आज तेरे हाथ नहीं काँपने चाहिए। आज तुझे गली में खड़ा होना है।"

मैंने जेब में हाथ डाला।

घंटी वहीं थी।

और अब, सलीम के जाने के बाद, बहुत धीरे से, बहुत मद्धम, उसने कहा —

"देखा?"

मैं रुका।

"क्या देखा?"

"मैं चुप रही," घंटी ने कहा। "क्योंकि जो बोलता है, वो हिसाब माँगता है। और मैं आज हिसाब नहीं माँग सकती थी।"

"क्यों?"

घंटी कुछ पल चुप रही। फिर बोली —

"क्योंकि आज जो हिसाब माँगा जाएगा, वो मेरा नहीं होगा। वो तेरे दादा का होगा।"

दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद!" वो दौड़ता हुआ अंदर आया। उसका चेहरा लाल था, और साँस फूली हुई। "उस्ताद, मीरा दीदी मिल गईं!"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"कहाँ?"

"अस्पताल में," टिंकू ने कहा। "नीचे वाले कमरे के बाहर। बेंच पर। एक बूढ़ी औरत के पास बैठी हैं। और वो औरत —" वो रुका, साँस लेने के लिए। "उस्ताद, वो औरत अपने बेटे को गाली दे रही है। पूरी गली सुन रही है। काजल दीदी भी वहीं है।"

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

उस्ताद ने अपना चश्मा उतारा। उसे कपड़े से पोंछा। फिर बहुत धीरे से मेज़ पर रख दिया।

"जा," उन्होंने कहा। "और सुन ले — आज तू वहाँ पहुँचेगा, तो तीन चीज़ें एक साथ होंगी। एक लड़ाई, एक औज़ार, और एक रजिस्टर।"

"और आप?"

उस्ताद ने मशीन की दराज़ की तरफ़ देखा, जहाँ वो टूटी चेन की कड़ी रखी थी।

"मैं किसी और काम पर जा रहा हूँ," उन्होंने कहा। "आज मुझे अपने भाई की माँ का ताला नहीं खोलना। आज मुझे उस दरवाज़े पर जाना है, जो पचास साल से बंद है।"

मैंने पूछा, "अकेले?"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए — पहली बार उस सुबह।

"तू भी अकेले जा रहा है," उन्होंने कहा, "यही तो हमारी गलती है। चल, चार बजे तक मिलते हैं। उससे पहले दोनों अपने-अपने काम कर लें।"

मैं बाहर निकला।

गली में धूप दो कदम और आगे बढ़ आई थी। पीपल की छाया छोटी हो रही थी।

और पीछे, उस्ताद की बंद दुकान से, मुझे बहुत धीरे सिलाई मशीन की एक आवाज़ सुनाई दी — जैसे कोई पचास साल बाद पहली बार आँख खोलकर करवट बदल रहा हो।

मैंने साइकिल उठाई। घंटी जेब में थी। और मेरे हाथ में एक ही सवाल।

वो कौन सा औज़ार है, जिसका नाम मेरे दादा के रजिस्टर में लिखा है?

और मेरा दादा — जो बुखार में चले गए, जिनकी दवा देर से आई — वो क्या सच में किसी औज़ार के बारे में कुछ जानते थे?

मैंने साइकिल का हैडल पकड़ा और अस्पताल की तरफ़ मुड़ा।

गली मेरे पीछे छूट रही थी।

और मुझे लगा — आज गली में जो होगा, वो गली में नहीं होगा। आज गली में जो होगा, वो अस्पताल की उस बेंच पर होगा जहाँ एक बूढ़ी माँ अपने बेटे से लड़ रही है।

और उस लड़ाई में, कहीं न कहीं, मेरा नाम भी बोला जाएगा।

॥

मैंने साइकिल का हैडल घुमाया और पैडल पर ज़ोर डाला। टिंकू पीछे की सीट पर बैठा था — या कहो लटक रहा था, क्योंकि उसकी टाँगें ज़मीन को छू रही थीं, और वो हर मोड़ पर मुझे बताता जा रहा था कि दाएँ मुड़ना है, बाएँ नहीं, जैसे गली में ड्राइविंग का सर्टिफ़िकेट उसके पास हो।

"उस्ताद, ज़रा धीरे। आगे चाय वाले भैया हैं।"

"दिख रहे हैं।"

"नहीं, वो दूसरे हैं। उनके पीछे वाले नहीं, आगे वाले।"

"टिंकू, तू सीट पर बैठा है या नक़्शा पढ़ रहा है?"

उसने मेरी कमर पर एक हल्का धक्का दिया और हँसने लगा। दोपहर जैसे-जैसे सिर पर चढ़ने लगी, गली से धूल उठने लगी। साइकिल के पहिये से जो हवा उड़ती थी, वो गरम थी। अस्पताल के मुहाने पर नीम का पेड़ आया, और जैसे ही हम उसकी छाया में घुसे, पीठ पर लगी धूप हट गई।

पर छाया के साथ कुछ और भी आया।

दूर से ही सुनाई दिया।

किसी औरत की आवाज़ — बूढ़ी, धँसी हुई, पर टूटी हुई नहीं। ऐसी आवाज़ जो तीन दशक से लड़ना जानती हो। और उसके सामने एक आदमी की आवाज़ — जवान नहीं, पर बूढ़ा भी नहीं। कहीं बीच की उम्र। पर आवाज़ में वो थकान थी जो उम्र से नहीं, हिसाब से आती है।

मैंने साइकिल रोकी।

टिंकू ने गर्दन आगे की।

"उस्ताद, वो वही औरत है।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "जिसके बारे में मीरा दीदी बता रही थीं।"

मैंने साइकिल साइड में खड़ी की और दोनों आगे बढ़े।

अस्पताल की पुरानी सीढ़ियों के नीचे, जहाँ दीवार पर पीला रंग उतरा हुआ था और नीचे की तीन सीढ़ियाँ टूटी हुई थीं, वहाँ लोग जमा थे। दस-बारह लोग होंगे। कोई मरीज़ के साथ बैठा था तो कोई खड़ा सुन रहा था, और कोई — जो आज यहाँ किसी काम से आया था — अपना काम भूलकर इसी लड़ाई को देख रहा था।

औरत सीढ़ी की दूसरी पायदान पर बैठी थी। साड़ी पुरानी, घिसी हुई, पर साफ़ धुली। सिर पर बाल उतने ही सफ़ेद जितने सफ़ेदी दीवार पर थी। कमर में एक बड़ा सा लोहे का बक्सा चिपकाए बैठी थी। बक्सा ऐसा जैसे पचास साल से किसी अलमारी के नीचे पड़ा हो और आज पहली बार बाहर आया हो। उसकी ज़ंग लगी धार, उसका फटा कोना, और बक्से पर बंधी रस्सी — एक ज़माने की रस्सी, जिसका रंग पहचानना मुश्किल था।

सामने खड़ा आदमी — पैंतीस-चालीस के आसपास — सिर पर हाथ रखे बार-बार कह रहा था —

"अम्मा, सुन लो। सुन लो ना। तारीख़ सिर पर है।"

औरत ने अपनी आँखें उस पर उठाईं।

"मैंने तेरी तारीख़ नहीं छिपाई। मैंने तेरा कर्ज़ नहीं किया।"

लोग हँसे। पर हँसी में वो स्वाद नहीं था जो गली की हँसी में होता है — जब शबनम आपा किसी को ताना मारती हैं। इस हँसी में शर्म थी। ये हँसी किसी और के झगड़े पर आती है, जब आदमी खुद को बचाने के लिए हँसता है।

आदमी ने एक कदम आगे बढ़ाया।

"अम्मा, ये बक्सा रखे रखे लोहे का बोझ बन गया है। मैं कह रहा हूँ, इसमें जो भी है, मैं इसका कोई सामान बेच नहीं रहा। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि — जो चीज़ें पड़ी हैं, ज़ंग खा रही हैं, उनका कुछ तो काम हो।"

औरत ने बक्से को और कसकर अपने सीने से लगाया। ये कोई चीज़ पकड़ने का तरीक़ा नहीं था। ये कोई चीज़ गिरने से बचाने का तरीक़ा नहीं था। ये कोई आदमी अपने आपको बचाने के लिए अपनी छाती से कोई दीवार बनाता है — वैसा तरीक़ा था।

"ये लोहे के टुकड़े नहीं हैं," उसने कहा। उसकी आवाज़ अब धीमी थी, पर सुनने वालों की भीड़ पूरी चुप हो गई। "ये तेरे पिता की आख़िरी साँस हैं। जब वो अस्पताल में पड़े थे, तब भी इन्हें हाथ से नहीं छोड़ा। इनमें से एक औज़ार पर तेरे पिता का नाम खुदा है। ये अगर कबाड़ में गया, तो मैं भी जाऊँगी।"

आदमी ने सिर पकड़ लिया। फिर पीछे मुड़कर भीड़ की तरफ़ देखा, जैसे कोई उसे बचाने वाली बात कहे। कोई नहीं बोला।

उसकी आवाज़ अब काँप रही थी।

"अम्मा, मुझे कबाड़ नहीं बेचना। वो आदमी कह रहा है, औज़ार पुराने हैं, तो कीमत भी पुरानी मिलेगी — पर वो जानता है इनमें किसका नाम है। कह रहा है, दस हज़ार देगा। दस हज़ार, अम्मा। तेरी दवा इस महीने के आठ-आठ सौ में चल रही है। मैं और कहाँ से लाऊँ?"

"तो मुझे बेच दे। मेरी दवा बंद कर दे। मरने दे।"

ये सुनते ही वो आदमी झुक गया। सीधे ज़मीन पर बैठ गया — सीढ़ी के पास, उस पत्थर पर जो वहाँ सालों से पड़ा था — और अपनी हथेलियों में सिर दबा लिया।

लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

कोई बोला, "बेटा कह रहा है ना, बुढ़िया भी ज़िद कर रही है।"

कोई बोला, "हाँ, ऐसे तो घर चलता है?"

मुझे ये हँसी अच्छी नहीं लगी। नहीं, हँसी नहीं। ये निर्णय अच्छा नहीं लगा — जो भीड़ ले लेती है जब वो किसी चीज़ को ठीक से नहीं समझती और किसी एक पक्ष को अपना बना लेती है।

मैं आगे बढ़ा।

टिंकू मेरे पीछे था, पर उसकी नज़र कहीं और थी। वो दीवार के उस कोने की तरफ़ देख रहा था जहाँ धूल में कुछ पड़ा था।

मैंने देखा।

अस्पताल की उसी दीवार के किनारे, जहाँ पीले रंग पर धूल की महीन परत जमी थी, एक पुरानी व्हीलचेयर पड़ी थी। या कहो, एक व्हीलचेयर का ढाँचा, जिसके दोनों तरफ़ के पहिये निकाले जा चुके थे — एक तरफ़ का पहिया टूटा हुआ पड़ा था, तीलियाँ मुड़ी हुई; और दूसरी तरफ़, एक पहिया लगा था पर उसकी रिम इतनी ज़ंग खाई थी कि लोहा लकड़ी जैसा लग रहा था। कुर्सी की पीठ पर कहीं कोई लिखावट घिसी हुई थी, कोई नंबर शायद, पर पढ़ा नहीं जा रहा था।

मुझे कुछ हुआ। हाथ वैसा ही हुआ जैसा मरम्मत करने से पहले होता है — जब तुम टूटी चीज़ देखते हो और तुम्हारी उँगलियाँ बिना तुम्हारे पूछे हवा में हिलने लगती हैं।

मैंने अपनी आवाज़ ठीक की, जैसे कोई मज़ाक शुरू कर रहा हो — क्योंकि भाई, उस वक़्त सीधे बोलना भी तो मज़ाक जैसा ही लगता है। और मैंने कहा —

"अरे भाई साहब, एक बात कहूँ?"

आदमी ने सिर उठाया। उसकी आँखें लाल थीं।

"कौन हो तुम?"

"मैं वो हूँ जो इन टूटी चीज़ों के साथ रोज़ उठता-बैठता हूँ।" मैंने व्हीलचेयर की तरफ़ उँगली की। "औज़ार बेचने से पहले ये कुर्सी ठीक कर लो।"

वो चुप रहा।

"क्यों?"

"क्योंकि अगर तुम अम्मा के बक्से को बेचने के लिए जा रहे हो — तो अम्मा को उस बक्से तक लाना-ले जाना भी किसी तरह करना पड़ेगा। और उस तरह से कहीं अच्छा है, ये कुर्सी चले।"

भीड़ हँसी।

बूढ़ी माँ ने गर्दन घुमाई। उसकी आँखें मुझ पर पड़ीं और मुझे एहसास हुआ — ये उन आँखों में से एक है जो इंसान को उस वक़्त भी देख लेती हैं जब आदमी चुप होता है। वो मुझे तौल रही थीं।

"तुम कौन हो, बेटा?" उन्होंने पूछा। आवाज़ में जो अभी डंडा था, वो अब भी था। "कहाँ से आए हो? ये मेरे घर का मामला है।"

"मैं बेटा हूँ, अम्मा।"

"किसका?"

"बस — गली का। साइकिल वाला।"

"तो साइकिल ठीक कर। मेरा घर नहीं।"

लोग फिर हँसे।

मुझे बुरा नहीं लगा। सच कहूँ, तो हँसी आयी मुझे भी। अम्मा जैसी औरतें हँसी नहीं जीततीं — वो हँसी को ऐसे मोड़ देती हैं कि हँसने वाला खुद को छोटा पा लेता है।

"अम्मा," मैंने कहा, "घर तो मैं करता नहीं, बस जोड़ता हूँ।"

"तो जोड़ के दिखा।"

"यही तो सोच रहा हूँ।"

वो मुझे देखती रहीं। फिर धीरे से बक्से पर अपना हाथ रख दिया, जैसे कोई सोए बच्चे के सिर पर रखता है।

तभी टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद!"

मैं मुड़ा।

वो व्हीलचेयर के पास घुटनों के बल बैठा था और बीच में कुछ कर रहा था। मेरी टूलकिट — जो उसने मेरी साइकिल के पीछे बंधी सीट के नीचे से निकाल ली थी — खुली पड़ी थी। उसने रिंच निकाली थी, फिर पोंछा, फिर धुरी पर लगी ज़ंग पर हाथ रगड़ा।

"अरे, इसे छू क्यों रहा है?" मैंने कहा। "उससे हाथ खराब होगा।"

"हाथ तो ठीक हो जाएगा उस्ताद, पहिया नहीं हो रहा।"

और फिर, बिना परवाह किए, उसने जेब से एक पुरानी ग्रीस की डिब्बी निकाली — जो मैंने उसे दो हफ़्ते पहले दी थी, चेन पर लगाने को, "जितनी ज़रूरत हो उतनी ले" कहकर — और उसने उसमें से एक उँगली भर ग्रीस लेकर पहिये की धुरी पर लगा दी।

फिर अपने माथे को उसी उँगली से सहलाया।

ये क्या किया!

ग्रीस से उसका माथा काला हो गया। फिर वो चश्मा ठीक करने के लिए हाथ ले गया — चश्मा भी काला। फिर उसने मुझे देखकर हँसा — और दाँत अब खुद चमक रहे थे, बाकी चेहरा रात जैसा।

बच्चे हँस पड़े।

सानिया जो पीछे खड़ी थी, हँसते-हँसते दीवार पकड़कर झुक गई। गुड्डू ने अपनी टाट की टोपी माथे पर रखी और "जासूस बाबू की जय" चिल्लाया। रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा आँख पर चढ़ाकर टिंकू को देखने लगा और बोला, "अब तो ये काले साहब लग रहे हैं।" चिंटू ने सबसे ऊँची आवाज़ में कहा, "उस्ताद, ये आपका शागिर्द है या काला चोर?"

टिंकू ने बिना हिचके कहा, "चोर नहीं, मिस्त्री। चोर चुपके आता है। मिस्त्री को सब देखते हैं।"

शबनम आपा की आवाज़ पीछे से आई — वो भी अस्पताल के गेट पर आ खड़ी थीं, गुमटी किसी को सौंपकर।

"बारह साल की कमाई से पहली बार किसी मिस्त्री को सब देख रहे हैं!"

बूढ़ी माँ ने एक बार टिंकू की तरफ़ देखा।

और फिर — ज़रा देर के लिए — उनके चेहरे पर कुछ बदला। कुछ पिघला। कोई ऐसा जो सालों से जम गया था और अब एक बच्चे के काले माथे को देखकर, ज़रा-सा हिल गया।

पर ये सिर्फ़ एक पल था।

क्योंकि तभी उनका बेटा उठा।

उसने ज़मीन से हाथ टेके, उठा। धूल झाड़ी। फिर सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा और अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया।

"अम्मा —"

"चुप।"

"अम्मा, सुन तो —"

"मैंने सुना।" उन्होंने कहा। "तू बेचने की बात कर रहा है। बेच।"

सब चुप हो गए।

"पर पहले ये कुर्सी चले," उन्होंने कहा। "क्योंकि अगर मैं मरने से पहले ये बक्सा बेचे जाना देखूँगी, तो मुझे कम से कम उठने की ताक़त चाहिए। और अगर तू मुझे उठाकर ले जाएगा — तो याद रख, जब तू मुझे उठाएगा, तब तेरे पिता की तस्वीर तेरे हाथ से गिर जाएगी।"

आदमी ने एक लंबी साँस ली, और फिर वो व्हीलचेयर की तरफ़ मुड़ा।

टिंकू अभी भी उसके पास बैठा था। उसने एक पहिया जोड़ लिया था, दूसरा अभी भी मुड़ा हुआ था।

आदमी ने देखा। कुछ बोला नहीं। बस वहीं पास में बैठकर अपने हाथ पर सिर रख दिया।

मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।

"भाई साहब —"

"मत बोलो," उसने कहा। आवाज़ रुँधी थी। "मुझे पता है तुम क्या बोलोगे। तुम बोलोगे कि बूढ़ी माँ की बात सुनो। पर तुमने उस काग़ज़ को नहीं देखा जो मेरी जेब में है। उस पर तारीख़ लिखी है। पंद्रह दिन बाद। उसके बाद ब्याज भी नहीं, सिर्फ़ —" वो रुका। "सिर्फ़ बक्सा, औज़ार, और मेरी माँ की साड़ी।"

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर मैंने अपना हाथ उसके कंधे से हटाया और व्हीलचेयर के पास बैठ गया।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, धुरी जाम है।"

"धुरी जाम है तो जाम है," मैंने कहा। "तू ग्रीस क्यों लगा रहा था?"

"क्योंकि जाम है तो खुलेगी।"

मैंने सोचा। ये बच्चा कभी-कभी वो बात कह देता है जो बड़े लोग किताबों में ढूँढते हैं और नहीं मिलती।

"सही बोल रहा है," मैंने कहा — और खुद उस धुरी पर झुक गया।

मेरे हाथ पहिये पर गए। ज़ंग उँगली में चुभी। मैंने एक बार साइकिल के पिछले पहिये से रिंच निकाली, फिर उस पहिये के बोल्ट खोले, फिर ज़ंग पर एक बूँद तेल डाला — जो मेरी साइकिल की चेन के लिए लाया था — और उसे धैर्य से अंदर भिगोने दिया।

औरत मुझे देख रही थी।

मैंने एक बार गर्दन उठाई। उनकी आँखें मुझ पर थीं। और उनके हाथ अब भी बक्से पर थे। पर उँगलियाँ ढीली थीं।

"तुम इसे ठीक कर दोगे?" उन्होंने पूछा।

"कोशिश करूँगा, अम्मा।"

"क्यों?"

मैं रुका।

"क्योंकि मेरी माँ भी आज एक टूटी कुर्सी पर बैठी हैं। और किसी ने उनके लिए भी एक दिन पहिया ठीक किया था।"

औरत ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही, और फिर — मुझे लगा — उन्होंने बक्से पर से एक हाथ उठाया और अपनी साड़ी के पल्लू से आँख पोंछी।

मेरी जेब में घंटी थी।

वो अब तक चुप थी। एक बार भी नहीं बोली थी। मुझे लगा शायद वो सलीम के सामने जैसे चुप हुई थी — वैसे ही अब भी चुप है। पर जब मैंने पहिये को पूरा घुमाया, और वो पहला हल्का चरचराकर घूमा, और टिंकू ने खुशी में चिल्लाकर कहा, "उस्ताद, घूम गया!" — तब घंटी ने ज़रा-सा बजकर इतना कहा —

"देख।"

और चुप हो गई।

पहिया घूम गया। पर कुर्सी चलने के लिए काफ़ी नहीं था। दूसरा पहिया भी मुड़ा था, पीठ का एक हिस्सा टूटा था, और उसका हैंडल भी ढीला था।

मैं उठा।

टिंकू को अपनी टूलकिट समेटने को कहा, पर वो अपनी हथेली को कमीज़ पर रगड़ रहा था — जिससे कमीज़ भी ग्रीस से काली होती जा रही थी।

"टिंकू, वो पीछे पानी का नल है। जाकर मुँह धो।"

"उस्ताद, ग्रीस पानी से नहीं जाती।"

"तो गली में आकर धो लेना — साबुन से। अभी जा।"

वो गया।

मैंने उस आदमी की तरफ़ मुड़कर देखा।

वो सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठा था, सिर झुकाए, हाथों में कुछ मसल रहा था — शायद वही काग़ज़, शायद कुछ और। उसकी माँ अब भी बक्सा लिए बैठी थीं।

भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी।

फिर मुझे मीरा याद आई।

मैंने अपना सिर उठाया। अस्पताल की बेंच पर — नीचे वाले कमरे के बाहर — काजल और मीरा, दोनों बैठी थीं। मीरा अपना कैमरा गोद में रखे थी, काजल उसके कंधे पर हाथ रखे थी। दोनों की नज़रें यहीं थीं।

मीरा उठी। मेरे पास आई।

"अंकुश, काजल को माँ की दवा के बारे में फार्मेसी से पता चला — नई खेप अभी नहीं आई। डॉक्टर इसरानी के पास जाना होगा।"

मैंने सिर हिलाया।

"मैंने सुना," मैंने कहा। "मैं जा रहा हूँ।"

पर मैं मुड़ा नहीं।

मैं फिर उस बूढ़ी माँ की तरफ़ देख रहा था।

और फिर मेरी नज़र उस बक्से पर गई — उसके कोने पर, जहाँ ज़ंग ने कुछ गोल सा बना दिया था। एक आकार। एक वृत्त।

मेरा दिल एक कदम आगे बढ़ गया।

"अम्मा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी थी, पर धीमी। "इस बक्से में कितने औज़ार हैं?"

उन्होंने ऊपर देखा।

"क्यों?"

"बस, पूछ रहा हूँ।"

उनकी नज़र मुझ पर थी।

"बारह," उन्होंने कहा। "बारह औज़ार हैं। और तेरहवीं चीज़।"

"तेरहवीं क्या?"

कुछ देर चुप।

"तेरहवीं चीज़ का नाम मैं नहीं जानती," उन्होंने कहा। "वो बक्से में नहीं है। वो मेरे पति के सीने में था। और वो उनके साथ अस्पताल से चला गया।"

मैं खड़ा रहा।

उस दिन जो टिंकू ने सड़क पर कहा था — याद आया। "उस्ताद, रुकिए, चाय वाले भैया हैं।" जाने क्यों वो याद आया। शायद इसलिए कि जब बात कुछ और हो रही होती है, तब छोटी बातें भी याद आ जाती हैं।

और तभी —

आदमी उठा।

अचानक उठा। वो हाथ जो अब तक सिर पर थे, उन्हें नीचे किया, फिर एक कदम आगे बढ़कर उसने बक्से की तरफ़ हाथ बढ़ा दिया।

"अम्मा," उसने कहा।

उसकी माँ ने बक्सा नहीं छोड़ा।

"मैं इन्हें बेचूँगा," उसने कहा।

उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। वो धीमी थी। पर थी ठोस — जैसे किसी ने गीली मिट्टी को अचानक ईंट बना दिया हो।

"मैं इन्हें बेचूँगा," उसने दोहराया। "पर पहले ये कुर्सी चले।"

वो उसे ले जाने से पहले, उस कुर्सी पर बैठकर उसे माँ को ले जाना होगा।

"अम्मा," उसने कहा, "अगर तुम कहो कि ये कुर्सी ठीक हो जाएगी, तो मैं इस बक्से को तेरे कमरे में वापस रख दूँगा और बाहर जाकर अपनी मेहनत से कुछ और ढूँढूँगा।"

माँ ने उसकी तरफ़ देखा।

फिर मेरी तरफ़ देखा।

फिर टिंकू की तरफ़ — जो अब भी मुँह धोकर लौटा था, गाला धोया, पर माथे पर अब भी एक हल्का काला निशान था।

"तुम बता," उन्होंने कहा — मुझसे। "ये कुर्सी चलेगी?"

और मैं खड़ा रहा।

मैंने पहले कुर्सी देखी। फिर बक्सा। फिर उसका बेटा। फिर उसकी माँ।

"अम्मा," मैंने धीरे से कहा, "इसे चलने में सिर्फ़ पहिया नहीं लगेगा।"

"तो?"

"कुछ और भी लगेगा।"

"क्या?"

और जवाब में — जैसे मेरे कंधे के पीछे से कोई आवाज़ आई हो, बिल्कुल जेब से, बहुत मद्धम —

"एक कुर्सी," घंटी ने कहा। "दो टूटे दिल।"

बूढ़ी माँ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। कुछ नहीं बोलीं। पर उनका हाथ बक्से पर था, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जैसे उन्होंने वो आवाज़ सुनी हो — या सिर्फ़ सुना होने का भ्रम हुआ हो, और वो भ्रम वो किसी को नहीं बताएँगी।

क्योंकि ये बात जानने के लिए उस घंटी को जानना पड़ता है।

और उस घंटी को कोई नहीं जानता — सिवाय उनके, जो इसे हर रोज़ जेब में रखते हैं।

मैंने गर्दन हिलाई। अचानक सूरज की रोशनी तेज़ लगी।

टिंकू मेरे पास खड़ा हो गया।

"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये कुर्सी घर ले चलें?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"ले चलें," मैंने कहा। "पर पहले किसी से पूछना पड़ेगा — ये कुर्सी किसकी है।"

मैं उस बूढ़ी माँ की तरफ़ मुड़ा।

"अम्मा," मैंने कहा, "ये कुर्सी किसकी है?"

उन्होंने बक्सा छाती से लगाया रहा, सिर उठाया।

"ये मेरे पति की थी," उन्होंने कहा। "अस्पताल में पड़े थे, उस ज़माने की है। मरने के बाद यहीं छोड़ दी। कोई नहीं उठाता। कोई नहीं बेचता।"

"तो अब?" मैंने कहा।

कुछ पल चुप।

"अब?" उन्होंने कहा। "अब जो इसे चलाए।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

फिर उसने अपनी कमीज़ की जेब से, वही पुरानी ग्रीस की डिब्बी निकाली — और अपनी हथेली पर उँगली से एक लकीर खींच दी, जैसे कोई मिस्त्री शपथ लेता है।

"उस्ताद," उसने कहा, "ये मेरा पहला काम है।"

और फिर — मुझे याद रहेगा — उसने अपना सिर ऊँचा किया, और उस काले निशान वाले माथे के नीचे, आँखों में वो चमक थी जो गली के बच्चों की आँखों में तभी आती है जब उन्हें लगता है कि कोई उन्हें बड़ा आदमी समझ रहा है।

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।

"चल," मैंने कहा। "पहले माँ की दवा। फिर कुर्सी।"

हम मुड़े।

और मेरे पीछे, बूढ़ी माँ ने अपनी आवाज़ में, पहली बार, इतना ही कहा —

"बेटा —"

मैं रुका।

"तू कल आ जाना। यहीं सीढ़ी के पास। मैं तेरे लिए बैठी मिलूँगी।"

मैंने सिर हिलाया।

"आ जाऊँगा, अम्मा।"

और मैं आगे बढ़ा — अस्पताल की तरफ़।

पर अंदर जाते वक़्त, एक पल के लिए, मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी — और उस ज़ंग लगे कोने पर, फिर से।

और मुझे लगा — वो तेरहवीं चीज़, जो उनके पति के सीने में थी और अस्पताल से साथ चली गई थी —

वो कहीं मेरे दादा के रजिस्टर में लिखी न हो।

॥

दवा की खिड़की पर जो आदमी बैठा था, उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उसके कान पर कलम थी, चश्मे का एक काँच धागे से बँधा हुआ था, और सामने मोटा रजिस्टर खुला पड़ा था। मैंने परची खिड़की के भीतर सरका दी।

"यादव?" उसने कहा, बिना सिर उठाए।

"जी।"

"नई खेप रुकी है।"

"कब तक?"

"जब तक काग़ज़ साफ़ न हो।"

मैंने अपनी उँगली खिड़की की जाली पर रखी और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। काग़ज़। हर बात का जवाब काग़ज़। माँ की साँस, माँ की दवा, माँ का पलंग — और जवाब में हमेशा एक काग़ज़।

"भाई साहब," मैंने कहा, "दवा काग़ज़ नहीं पढ़ती। दवा बीमारी पढ़ती है।"

उसने पहली बार सिर उठाया। थका चेहरा था, ऐसा जैसे वो भी इस जाल में फँसा हो, पर अपनी नौकरी बचाने के लिए ऊपर वालों की तरफ़ देख रहा हो।

"बेटा," उसने धीरे से कहा, "मेरे हाथ में सिर्फ़ रजिस्टर है। दवा ऊपर वाले रैक में बंद है।"

मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है," मैंने कहा। "रजिस्टर संभालो।"

मैं मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ चला।

पीछे से उसकी आवाज़ आई — "सुनो —"

मैं रुका।

"डॉक्टर साहब ऊपर हैं। वो कुछ कर पाएँ, तो करें। मेरी तरफ़ से कह देना।"

मैंने हाथ उठाया, पीछे देखे बिना।

नीचे उतरकर मैंने देखा — बूढ़ी माँ अब भी सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठी थीं, बक्सा सीने से चिपका हुआ, और आँखें उस दरवाज़े पर जहाँ से लोग आते-जाते थे। उनका बेटा चार कदम दूर, दीवार की तरफ़ मुँह किए खड़ा था, दोनों हाथ जेब में, और कंधे ऐसे झुके हुए जैसे किसी ने उन पर बोरी रख दी हो।

टिंकू मेरे पीछे खड़ा था, कंधे पर औज़ारों का थैला और हाथ में व्हीलचेयर का ढाँचा, जो चलते-चलते उसकी टाँग से टकरा रहा था।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "कुर्सी ऐसे लटक रही है जैसे कोई मुर्दा।"

"तो उसे ज़िंदा करना पड़ेगा," मैंने कहा।

"कब?"

"पहले बात।"

टिंकू ने मुझे देखा, फिर माँ को, फिर बेटे को।

"बात?" उसने कहा। "उस्ताद, ये लोग तो बात करने के मूड में नहीं हैं।"

"इसीलिए तो," मैंने कहा।

मैंने दोनों को उठाया और पीछे वाले बरामदे में ले गया। वो बरामदा अस्पताल का सबसे पुराना हिस्सा था — जहाँ पहले लोग बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार करते थे, और अब टूटी बेंचें रखी थीं। छत पर पंखा लटका था, जिसके ब्लेड पर धूल की मोटी परत थी, जैसे सालों से कोई छत को भूल गया हो। एक तरफ़ जालीदार खिड़की थी, जिससे धूप आड़ी-तिरछी पट्टियों में आ रही थी, और उन पट्टियों में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे हवा में कोई बहुत धीरे से साँस ले रहा हो।

फ़र्श पर पुरानी टाइलें थीं, दो-तीन उखड़ी हुई, और एक जगह पानी टपकने से काला निशान बन गया था। दीवार पर पीली रंगत थी, जिस पर नीचे की तरफ़ कोई चारपाई सरका देता था तो रगड़ के निशान रह जाते थे।

मैंने एक बेंच का पाया ठीक से ज़मीन पर रखा — वो हिल रही थी — और उस पर कपड़ा बिछाया।

"अम्मा," मैंने कहा, "यहाँ आ जाइए।"

वो बैठीं। बक्सा उनकी गोद में आ गया। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, ऐसे जैसे कोई बच्चा गिर जाने के डर से चादर का कोना पकड़ता है।

"और तुम," मैंने बेटे से कहा, "सामने बैठो।"

"मैं खड़ा हूँ," उसने कहा।

"मुझे पता है। बैठो।"

वो खड़ा रहा। मैंने उसकी तरफ़ देखा, उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।

टिंकू ने व्हीलचेयर का ढाँचा लाकर उन दोनों के बीच, फ़र्श पर, टेढ़ा खड़ा कर दिया — जैसे बीच में कोई मेज़ रख दी गई हो, जिस पर कुछ रखा जाना है।

फिर मैंने कहा।

"अम्मा, तुम्हारे बेटे ने ये सामान दस हज़ार में बेचने का सोचा है। मैं उसे रोक नहीं सकता, मेरा कोई हक़ नहीं है। पर मेरे यहाँ एक नियम है — और वो मेरा नहीं, मेरे उस्ताद का है, जो पचास साल से इस गली में सिलाई करते हैं।"

मैंने एक पल रुककर दोनों को देखा।

"टूटी चीज़ ठीक करने से पहले दो आदमी को एक सच्ची बात बोलनी पड़ती है। एक-दूसरे से। अपनी ज़ुबान से। अपने फ़ायदे के लिए नहीं — सामने वाले के लिए।"

बेटे ने घूरकर मेरी तरफ़ देखा।

"तुम हो कौन?" उसने कहा। आवाज़ में वो ज़हर था जो भूखा आदमी की आवाज़ में आ जाता है। "तुम क्या हो? यहाँ हर कोई आज सच की बातें कर रहा है। सभा, नियम, जोड़ — गली में सब ऋषि बन गए हैं, सिर्फ़ मैं बेटा रह गया हूँ जो दवा के पैसे जोड़ता है।"

"मैं कोई नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं उस घर में गाड़ियों की चेन ठीक करता हूँ जहाँ से तुम रोज़ गुज़रते हो।"

"तो चेन ठीक करो। मेरी माँ को मत छेड़ो।"

"तेरी माँ ने मुझे नहीं, तूने छेड़ा है," मैंने कहा, और इस बार मैंने मज़ाक नहीं किया। "आज सुबह से मैं देख रहा हूँ — तू इस बक्से को बेचने की बात कर रहा है, पर बक्से की तरफ़ देखता भी नहीं। ऐसे दिखता है जैसे बक्सा तेरा नहीं, कोई और है जिससे तू डरता है।"

उसका जबड़ा कसा।

टिंकू ने चुपचाप औज़ारों का थैला नीचे रख दिया, और उसकी चेन की आवाज़ से बरामदे की चुप्पी और गहरी हो गई। उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर उस आदमी की तरफ़, और फिर वो ऐसे खड़ा हो गया जैसे मिस्त्री हाथ में पेचकस लेकर इंतज़ार करता है — न कुछ कहता है, न टालता है, बस पकड़ाए रहता है।

बेटे ने अपनी जेब में हाथ डाला।

मुझे लगा वो रूमाल निकालेगा। उसने एक काग़ज़ निकाला।

सफ़ेद काग़ज़, मुड़ा हुआ, किनारों से मैला, और उस पर धुँधली सी स्याही। उसने उसे खोला भी नहीं, बस उँगलियों के बीच पकड़कर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया, जैसे कोई गवाही का काग़ज़ पकड़ा देता है।

"ये देखो," उसने कहा। "ये मुझे पिछले हफ़्ते मिला।"

"किसने दिया?"

"एक आदमी मिला था। सफ़ेद कुर्ता, साफ़ बोलने वाला। कहता था — तेरी माँ का इलाज यहीं चल रहा है, ना?"

मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।

"आगे बोल," मैंने कहा।

"कहता था — इस अस्पताल का काग़ज़ ठीक हो जाएगा, तो इलाज मुफ़्त चलेगा, दवा भी। पर पंद्रह दिन में। उसके बाद न ये पलंग, न ये दवा, न ये डॉक्टर।"

"और?"

"और कहता था — घर में पुराना माल हो तो बता देना। पुराने औज़ार, पुरानी गाड़ियाँ, पुरानी कुर्सी। हम खरीद लेंगे।"

वो रुका। उसकी गर्दन की नस खिंची हुई थी।

"तो मैंने सोचा," उसने कहा, धीरे, "माँ का इलाज चल जाएगा। पंद्रह दिन। बस पंद्रह दिन और।"

मैंने वो काग़ज़ लिया। देखा। सिर्फ़ एक लाइन थी — पंद्रह दिन की तारीख़, और नीचे एक मोहर, जिसकी स्याही मिटने लगी थी, पर जिसका आकार मैं पहचानता था। नीली गोल मोहर।

"तूने पढ़ा?" मैंने पूछा।

"मैंने सिर्फ़ तारीख़ पढ़ी," उसने कहा। "बाकी आँखें नहीं गईं।"

बूढ़ी माँ ने तब पहली बार कुछ कहा। आवाज़ बहुत धीमी, पर साफ़।

"तूने मुझे नहीं बताया।"

वो एक लम्हे के लिए रुका, फिर भड़क उठा — और उसका गुस्सा सीधा मेरी तरफ़ आया, जैसे मैंने ही उसका राज़ खोल दिया हो।

"बताता तो क्या?" उसने कहा, आवाज़ ऊपर। "बताता कि तेरे बेटे को कोई सफ़ेद कुर्ता वाला रोककर कहता है — तेरी माँ का काग़ज़ तेरे बस का नहीं? बताता कि मैं रोज़ सुबह उठकर हिसाब जोड़ता हूँ और हर बार पैसा कम पड़ता है? क्या बताता?"

"बात सिर्फ़ पैसे की नहीं है," मैंने कहा।

वो रुका।

"क्या?" उसने कहा।

"मैं तेरी जेब नहीं देख रहा," मैंने कहा। "मैं तेरा चेहरा देख रहा हूँ। जो आदमी बाप के औज़ार बेचता है, वो औज़ार को घूरता है। तू नहीं घूरता। तू उस बक्से से ऐसे कतराता है जैसे उसमें साँप हो। तो मुझे लगता है तेरा डर पैसा नहीं है।"

वो खामोश हो गया।

बरामदे में सिर्फ़ पंखे के हिलने की आवाज़ आई — हवा से वो धीरे-धीरे घूम रहा था, बिना किसी काम के।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को उँगलियों से छुआ। ठंडी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस एक हल्की सी झुरझुरी मेरी हथेली में गई, जैसे किसी ने पानी में उँगली डालकर हिला दी हो।

बेटे ने एक लंबी साँस ली। फिर वो बेंच के किनारे पर बैठ गया — जैसे घुटने जवाब दे गए हों।

"मैं डरता हूँ," उसने कहा।

फिर उसने अपनी आवाज़ नीची कर ली, जैसे इस बात को हवा में तैरने नहीं देना चाहता।

"हर रोज़ सुबह मैं सोचता हूँ — आज माँ कुछ ऐसा कहेगी। मैं कुछ ऐसा करूँगा। और फिर वो कहेंगी…"

वो रुका। गला भरा हुआ था।

"क्या कहेंगी?" मैंने पूछा।

"वो नहीं कहेंगी," उसने कहा। "वो कभी नहीं कहतीं। वो सिर्फ़ मेरी तरफ़ देखती हैं। ऐसे देखती हैं जैसे तराज़ू पर तोल रही हों। मेरे बाप के हाथ थे — कुछ भी उठाते, ज़िंदा हो जाता। मेरे हाथ में… मेरे हाथ में औज़ार आता है तो ऐसे लगता है जैसे किसी और की चीज़ छू रहा हूँ।"

वो मेरी तरफ़ देखने लगा।

"तुम सब सोचते हो ना — ये कमज़ोर है? ये बाप का नाम नहीं उठा पाया?"

"मैं कुछ नहीं सोच रहा," मैंने कहा। "मैं सुन रहा हूँ।"

"मैं डरता हूँ कि एक दिन वो मेरी तरफ़ देखकर कहेंगी — तू नाकारा है। और फिर मैं कुछ नहीं बचूँगा। इसलिए जब मैंने सुना कि ये औज़ार अच्छे पैसे में बिक सकते हैं, मुझे लगा — चलो, बक्सा चला जाए, तो माँ के पास कहने को एक बात रहेगी कि बेटे ने हिम्मत की। बल्कि मैं खुद को ये समझा रहा था कि मैंने कुछ किया।"

बरामदा खामोश था।

मैंने अपनी घंटी को जेब में और गहरा दबाया। वो चुप थी, और ये चुप्पी अच्छी थी। कुछ पल ऐसे होते हैं जब घंटी को बोलने का हक़ नहीं होना चाहिए।

बूढ़ी माँ ने बक्सा धीरे से अपनी गोद से उतारा। उसे अपने पैर के पास ज़मीन पर रखा — पहली बार पूरे दिन उन्होंने उसे अपने शरीर से अलग किया।

फिर उन्होंने अपनी साड़ी का कोना उठाया।

उस कोने में, अंदर की तरफ़, कपड़े से सिली हुई एक ऐसी जगह थी जिसे देखकर लगता था कि इसे अच्छे से, चुपचाप, किसी ने छिपाया है। उन्होंने उँगली डालकर एक काग़ज़ निकाला।

काग़ज़ नहीं — कपड़े जैसा हो गया था वो। मुड़ा हुआ, बार-बार मुड़ा हुआ, किनारों से फटता हुआ, रंग में हल्का भूरा।

"इसे मैंने उनके तकिये के नीचे से निकाला था," उन्होंने कहा। "उस रात के बाद, जिस रात उन्हें अस्पताल ले गए थे। मैंने किसी को नहीं दिखाया। मैं पढ़ भी नहीं पाती थी, बस इतना पहचाना कि उनकी लिखाई है।"

उन्होंने वो काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"तू पढ़ता है," उन्होंने कहा। "पढ़।"

मैंने लिया। काग़ज़ हल्का था, पर हाथ में ऐसे भारी लगा जैसे कोई ईंट थमा दी हो।

मैंने खोला।

स्याही नीली थी, पर हर अक्षर टेढ़ा-मेढ़ा, जैसे बहुत कम लिखने वाले हाथ की लिखाई हो। शब्द छोटे, टूटे, जैसे हर शब्द को लिखने से पहले सोचा गया हो।

मैंने पढ़ा — अपनी आवाज़ में, धीरे, ताकि दोनों सुन सकें।

"अम्मा से कहना… मेरे औज़ार मत बेचना।"

बेटे का सिर उठा।

"बारह औज़ार हैं। बारहों ऊपर हैं, उनमें से एक पर मेरा नाम है। उसे मत बेचना। बेटे को हुनर सिखाना। हुनर बेचने से नहीं जाता। हुनर सिखाने से बढ़ता है।"

मेरी आवाज़ हल्की हुई। मैंने एक साँस ली और आगे पढ़ा।

"अगर बेटे को हाथ न आए, तो मुझे कोई शिकायत नहीं। पर उसे ये मत कहना कि वो नाकारा है। बाप का हाथ बेटे में आना ज़रूरी नहीं। बेटे का हाथ बेटे का होता है। वो अपना हुनर खुद बनाएगा। उसे ऐसा कुछ सिखाना जो उसके हाथ में बैठे।"

वो काग़ज़ पर एक लाइन और थी, जो कुछ अलग तरह से, जैसे बाद में जोड़ी गई हो, नीचे लिखी थी।

"और अम्मा — तेरहवीं चीज़ का नाम मैंने कहीं नहीं लिखा। वो किसी काग़ज़ में नहीं है। जो उसे ढूँढने निकले, वो पहले हुनर सीखे। हुनर सीखेगा तो तेरहवीं खुद उसके हाथ में आ जाएगी।"

मैंने काग़ज़ बंद किया।

बरामदे में एक लंबी चुप्पी रही।

फिर बेटे ने आवाज़ निकाली — और वो आवाज़ टूटी हुई थी, बच्चों जैसी, जैसे गला सालों बाद खुला हो।

"उन्होंने ये लिखा था?" उसने कहा। "मेरे बारे में?"

"तेरे बारे में," माँ ने कहा।

"और तूने मुझे नहीं पढ़कर सुनाया?"

उन्होंने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनमें वो थकान थी जो सालों की होती है।

"मैंने किसी को नहीं सुनाया," उन्होंने कहा। "मैं डरती थी। मुझे लगा — इसे सुनकर तू अपने बाप से लड़ने लगेगा। कि वो चला गया और मुझे अकेला छोड़ गया। मुझे लगा तू कहेगा, जब वो खुद ही नहीं रहा, तो उसकी बातें क्यों सुनूँ।"

वो रुकीं।

"और एक बात थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ सबसे धीमी हो गई। "मैं खुद ये सुनना नहीं चाहती थी कि उन्होंने मुझे बेटे को हुनर सिखाने की ज़िम्मत सौंपी और मैं नहीं कर पाई।"

बेटा उठा।

वो एक कदम आगे आया, फिर रुक गया, फिर एक और, और फिर उसने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया — इतना बड़ा आदमी, इतना, और उनकी गोद में उसका सिर ऐसे चला गया जैसे तीस साल पहले जाता था।

वो रोया।

और रोने की आवाज़ नहीं थी, यही सबसे बुरा था — सिर्फ़ कंधे हिल रहे थे, कपड़े से आवाज़ दब रही थी, और उँगलियाँ माँ की साड़ी में घुसी हुई थीं।

बूढ़ी माँ ने अपना हाथ उसके बालों पर रखा।

"मैंने तुझे नाकारा कब कहा," उन्होंने कहा। आवाज़ में गुस्सा नहीं, बस थकान थी। "मैंने तो बस एक बार ये कहा था — तेरे बाप जैसा हाथ तेरे में कब आएगा। और तू उस एक लाइन को रोज़ अपने खिलाफ़ सुनता रहा। मैंने तुझे नहीं तोला था, बेटा। मैं तो बस उन्हें याद कर रही थी।"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

उसकी आँखों में पानी था, और उसने उसे छिपाने के लिए सिर नीचे कर लिया — पर मैं देख गया, और मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ चीज़ें होने देनी चाहिए बिना टिप्पणी के।

मैं एक पल के लिए दीवार से टिक गया और उन्हें देखता रहा।

तुम सोच रहे होगे कि मैंने वहाँ कुछ बड़ा किया। मैंने कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ़ दो लोगों को एक खाली बरामदे में बैठाया और कहा कि बात करो। बाकी सब उन्होंने खुद किया। यही तंत्र का सबसे ईमानदार नियम है — वो किसी के लिए माफ़ी नहीं माँगता। वो सिर्फ़ इतना करता है कि तुम्हें अपनी ज़ुबान खुद उठानी पड़ती है।

तभी मेरी जेब में घंटी हिली।

बहुत हल्की। रुकी हुई। जैसे कोई सिर्फ़ इतना कह रहा हो — अब।

मैंने व्हीलचेयर का ढाँचा उठाया और उसे उनके सामने धूप वाली जगह में रखा।

"अब मेरा काम," मैंने कहा।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "मैं?"

"तू मेरा हाथ है।"

वो समझ गया।

उसने औज़ारों का थैला खोलकर मेरे पास खड़ा कर दिया, और फिर वो चुप खड़ा रहा — औज़ार पकड़ाए हुए, बिना एक सवाल के। ये बात मैं उसके बारे में हमेशा याद रखूँगा। ज़ुबान तेज़ है उसकी, पर काम के वक़्त वो अपनी ज़ुबान को जेब में रख लेता है।

मैंने पहले धूल देखी। कुर्सी की सीट के नीचे, जोड़ों में, सालों की धूल जमी थी — वो धूल जो सिर्फ़ छोड़ी हुई चीज़ों पर बैठती है।

"कपड़ा," मैंने कहा।

टिंकू ने कपड़ा दिया।

मैंने पोंछना शुरू किया। धूल के नीचे से लोहे का रंग निकलने लगा, और फिर वो जगहें जहाँ पेंट उतर गया था।

"ये पहिया मुड़ा है," मैंने कहा। "ये तो ज़ंग से जाम है।"

"तेल?" टिंकू ने कहा।

"तेल।"

उसने छोटी शीशी खोली। मैंने धुरी पर दो बूँदें डालीं और एक पल रुका। फिर रिंच लिया, हल्का हिलाया — एक तरफ़, दूसरी तरफ़। ज़ंग ऐसे टूटी जैसे कोई पुरानी हड्डी कड़कती है।

"देख," मैंने कहा, "अगर ज़ोर से घुमाएँगे, तो धुरी ही चली जाएगी। पुरानी चीज़ को ज़ोर नहीं, सब्र चाहिए।"

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "मेरी माँ भी यही कहती है।"

"क्या कहती है?"

"कहती है — तू ज़िद में सब तोड़ देता है।"

"तो आज हम दोनों अपनी-अपनी माँ की बात मान लेते हैं," मैंने कहा।

और फिर वो हुआ जो हर बार होता है। पहिया घूमा।

धीरे, बहुत धीरे, जैसे कोई सालों सोया हुआ आदमी पहली बार करवट ले। एक चौथाई घेरा, फिर आधा, फिर पूरा। और जब वो पूरा घूमा, तो उससे एक ऐसी आवाज़ आई — बहुत हल्की, बहुत पुरानी, जैसे कोई बहुत दूर से अपना नाम पुकार रहा हो।

बेटे ने सिर उठाया।

"घूम रहा है," उसने कहा। आवाज़ में बच्चों वाली हैरानी थी।

"अभी नहीं," मैंने कहा। "अभी सिर्फ़ पहिया घूमा है। कुर्सी नहीं चली।"

मैंने पीछे की तरफ़ देखा। पीठ का जोड़ ढीला था — दो पेच गायब, और एक जगह पर लोहे में छेद था, जहाँ पहले कोई पिन बैठती थी।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

मेरी जेब में हमेशा कुछ न कुछ पड़ा रहता है। कोई ढीला नट, कोई पुराना पेच, कोई बंधा हुआ तार। लोग मुझे इसके लिए चिढ़ाते हैं — कहते हैं तेरी जेब कबाड़खाना है। पर मुझे पता है, कबाड़ कभी कबाड़ नहीं होता, बस उसे अपनी जगह का इंतज़ार होता है।

और उस दिन मेरी उँगलियों को वो पेच लगा, जो मेरे पास सालों से था। छोटा, मोटा, सिरा घिसा हुआ, ऊपर की चूड़ी में एक जगह दबी हुई। मुझे नहीं याद कहाँ से आया था। शायद दादा के औज़ारों से। शायद किसी पुरानी गाड़ी से।

मैंने उसे उस छेद में रखा। ठीक बैठा। जैसे वो पेच सालों से उसी छेद का इंतज़ार कर रहा था।

"हथौड़ी," मैंने कहा।

टिंकू ने दी।

मैंने दो हल्की चोटें लगाईं — ज़ोर से नहीं, क्योंकि ज़ोर से पुरानी चीज़ मर जाती है।

और कुर्सी सीधी हो गई।

मैंने उसे घुमाया। पहिया चला। चटकन नहीं, चरचराहट नहीं — बस एक साफ़, छोटी सी आवाज़, जैसे कोई गली के मोड़ पर मुड़ रहा हो।

टिंकू ने हाथ जोड़कर अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे हम कोई पूजा कर रहे हों। फिर उसने धीरे से कहा — "उस्ताद, ये चल रही है।"

"आगे बढ़," मैंने कहा।

सी, चल दो कदम।"

मैंने धक्का दिया और वो कुर्सी आगे बढ़ी — तीन कदम, बिना रुके, टेढ़ी नहीं, झुकी नहीं।

दो पहियों के बीच में वो लोहे की पट्टी ज़मीन पर हल्की सी खुरच कर रह गई और बरामदे में एक पतला निशान बन गया — जैसे किसी ने रेत पर लकीर खींची हो।

और तभी, मेरी जेब से, ज़ोर से नहीं, पर इतना साफ़ कि मैं ही नहीं, टिंकू भी रुक गया —

"छोटा जोड़," घंटी ने कहा। "ग्यारह अंक।"

टिंकू ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।

"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "ये —"

"बाद में," मैंने कहा।

"पर —"

"टिंकू। बाद में।"

वो चुप हो गया, पर उसकी आँखें बड़ी थीं, और मुझे पता था कि आज रात वो मुझसे सौ सवाल पूछेगा और मैं उसके उन्नीस का जवाब दे पाऊँगा, बाकी एक टाल दूँगा।

मैं बूढ़ी माँ की तरफ़ मुड़ा।

"अम्मा," मैंने कहा। "कुर्सी चल गई।"

उन्होंने उसे देखा। अपने हाथ से पहिए को छुआ, जैसे किसी ज़िंदा चीज़ को छूते हैं।

फिर वो उठीं।

बेटे ने हाथ बढ़ाया। उन्होंने उसे थामा — नहीं, उन्होंने उसका हाथ अपनी उँगलियों में कसकर पकड़ा, जैसे गिरने के डर से नहीं, बल्कि सहारा देने के लिए।

और वो कुर्सी पर बैठीं।

बेटे ने झुककर बक्सा उठाया — दोनों हाथों से, जैसे पहली बार किसी चीज़ की कीमत समझ आई हो — और अपनी बगल में दबा लिया।

फिर वो अपनी माँ की तरफ़ देखने लगा।

और माँ ने अपने बेटे की तरफ़ देखा।

और उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा, पर दोनों के चेहरे पर वो हल्की सी मुस्कान आई जो माफ़ी के बाद आती है — जो हँसी नहीं होती, बस आँखों का हल्का हो जाना होती है।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो अपना मुँह दबाकर हँस रहा था, और उसके माथे पर वो काला निशान अब भी था, और मुझे लगा कि आज से वो निशान उसके लिए शर्म का नहीं, काम का निशान है।

"अम्मा," मैंने कहा, "अब आगे बढ़िए। दरवाज़े तक।"

उन्होंने सिर हिलाया। बेटे ने कुर्सी पकड़ी। टिंकू ने रास्ता साफ़ किया — एक टूटी बेंच को किनारे सरका दिया, जो रास्ते में पड़ी थी।

कुर्सी आगे बढ़ी।

और जब वो बरामदे के आख़िरी हिस्से में पहुँची, जहाँ से नीचे वाले हॉल में जाने का रास्ता था — तभी पहिए ने उखड़ी हुई टाइल पर एक झटका खाया।

कुर्सी हिली।

और सीट के नीचे से कुछ गिरा।

मैंने आवाज़ सुनी — काग़ज़ के गिरने की आवाज़, हल्की, ऐसी जैसे कोई चिट्ठी ज़मीन पर आ गिरी हो।

मैंने नीचे देखा।

फ़र्श पर, धूल में, एक मुड़ी हुई पर्ची पड़ी थी। सफ़ेद, छोटी, चार बार मोड़ी हुई, किनारे से पीली पड़ चुकी।

मैंने उसे उठाया।

टिंकू मेरे पास आ गया।

मैंने मोड़ खोला — एक, दो, तीन।

एक छोटा काग़ज़ निकला, जिस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था, और नीचे एक गोल मोहर थी — वही नीली मोहर जो मैंने आज सुबह सूची पर देखी थी, और उस आदमी के हाथ से गिरे कोने पर भी।

मोहर के ऊपर लिखा था — "सामान सूची।"

और उसके नीचे, चार लाइनों में:

"कुर्सी — एक।"

"बक्सा — लोहे का।"

"औज़ार — बारह।"

"कुल — तेरह।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

पंद्रह दिन की वो तारीख़ इसी पर्ची के कोने पर भी लिखी थी।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और उसके चेहरे से हँसी उतर गई।

"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये कुर्सी…"

"हाँ," मैंने कहा। "ये कुर्सी उनकी सूची में पहले से लिखी थी।"

बूढ़ी माँ की आवाज़ आई, बहुत धीमी — "क्या हुआ?"

मैंने काग़ज़ मुट्ठी में कर लिया।

और तभी — दरवाज़े पर ताली बजी।

एक ताली। फिर दूसरी। फिर तीसरी।

धीरे, ताल पर, जैसे कोई तमाशा देखकर तारीफ़ कर रहा हो।

मैंने सिर उठाया।

पीले रंग के बरामदे के दरवाज़े के फ्रेम में, धूप की आड़ी रोशनी में, सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और उँगली में काली अंगूठी — सलीम बक्श खड़ा था।

वो मुस्कुरा रहा था।

"वाह," उसने कहा। "बहुत अच्छा। कुर्सी चल गई। माँ बैठ गई। बेटा रोया।"

उसने हाथ जोड़कर हल्का सा झुककर सलाम किया।

"मैं तुम्हें बता रहा था," उसने कहा, "कि आज ये बूढ़ी औरत अपने बेटे से सबके सामने लड़ेगी। मैंने सोचा था, झगड़ा होगा, औज़ार बिकेंगे, काग़ज़ बनेंगे। पर तुमने…"

उसने मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने ग्यारह अंक के लिए मेरा पूरा हिसाब बिगाड़ दिया।"

वो दो कदम आगे आया। टिंकू मेरे आगे आ गया, और मैंने उसका कंधा हल्का सा दबाया — नहीं, ये लड़ाई तेरी नहीं।

"पर एक बात पूछूँ?" सलीम ने कहा। उसने पर्ची की तरफ़ इशारा किया, जो मेरी मुट्ठी में थी। "कुर्सी तुमने ठीक कर दी। बहुत खूब। पर ये पूछा किसी ने — कुर्सी किसकी है?"

मैंने गर्दन हिलाई।

"और ये?" उसने कहा, और मुस्कुराकर मेरी मुट्ठी की तरफ़ देखा। "ये पूछा किसी ने — ये सूची कुर्सी के नीचे कैसे पहुँची? चलती कुर्सी से गिरी, या वहाँ बैठकर रखी गई थी?"

मेरी जेब में घंटी हिली।

बहुत हल्की। बस इतना —

"देख। अब इसे कौन ठीक करेगा।"

सलीम ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा और भीतर झाँका।

॥

ताली की आवाज़ बरामदे की पीली छत से टकराकर लौटी, और मेरे कानों में दो बार गूँजी।

मैंने मुट्ठी में दबी वो पर्ची जेब में डाली। मेरी हथेली में पसीना था, और पर्ची के कोने ने उँगली पर एक काग़ज़ी चुभन छोड़ दी थी, जैसे किसी ने नाखून से हल्की सी लकीर खींच दी हो।

सलीम बक्श दरवाज़े की चौखट पर खड़ा था। धूप उसके पीछे से आ रही थी, इसलिए उसका चेहरा अंदर की तरफ़ छाया में था, पर सफ़ेद कुर्ता इतना साफ़ था कि उस पर बरामदे की धूल भी चमकती दिख रही थी। सफ़ेद जूते। और दाहिने हाथ की उँगली में वो काली अंगूठी, जो लोहे जैसी थी पर लोहे से ज़्यादा ठंडी लगती थी।

"वाह," उसने कहा। "क्या बात है। टूटी कुर्सी ठीक हो गई। पहिया घूम गया। माँ बैठ गई। बेटा रो पड़ा। और बक्सा अभी भी दोनों हाथों से दबा हुआ है।"

बूढ़ी माँ ने कुर्सी के हैंडल पर अपनी उँगलियाँ कस लीं। बेटा कुछ कहने को हुआ, पर माँ ने उसकी कलाई पर हाथ रख दिया और वो चुप हो गया।

सलीम ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखकर भीतर झाँका। "पर एक बात है, बेटा।"

"बोलिए," मैंने कहा। "आज मेरी सुनने की आदत है। सुबह से सुन रहा हूँ, अब तो कान भी गरम हो गए हैं।"

टिंकू ने पीछे से हल्की सी हँसी दबाई।

सलीम ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोला, "तुमने कुर्सी ठीक कर दी। मान लिया। पर इस कुर्सी का काग़ज़ी मालिक तो ट्रस्ट है।"

बरामदे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।

मैंने उसे देखा। फिर व्हीलचेयर को देखा। फिर उस पर्ची को याद किया जो मेरी जेब में थी — कुर्सी एक, बक्सा लोहे का, औज़ार बारह, कुल तेरह।

"काग़ज़ी मालिक," मैंने धीरे कहा।

"हाँ। काग़ज़ी मालिक।"

मैंने सिर हिलाया, जैसे कोई नई बात सुनकर सोच रहा हो। फिर मैंने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया और कहा, "तो फिर आप अपना काग़ज़ लाइए, उसे कुर्सी पर बैठाइए, और देख लीजिए कि कुर्सी उसे उठा पाती है या नहीं।"

सलीम की भौंहें ज़रा ऊपर गईं।

"जो काग़ज़ कुर्सी पर बैठ न सके," मैंने कहा, "वो काग़ज़ है या पर्ची? और जो औरत बैठी है, वो आज सुबह से इस कुर्सी पर बैठी है। तो मालिक काग़ज़ होगा या वो जिसे ये कुर्सी आज से चलाकर ले जानी है?"

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और बोला, "उस्ताद, काग़ज़ को बैठाने के लिए कुर्सी चाहिए होगी या काग़ज़ को?"

"काग़ज़ को कुर्सी चाहिए," मैंने कहा। "और कुर्सी को कोई जो उसे सँभाले। तुम्हारे पापा की कुर्सी थी, तुम सँभालो।"

टिंकू ने सीना फुला लिया। "मैं सँभाल लूँगा।"

सलीम हँसा। ठंडी हँसी, जिसमें मज़ाक नहीं, सिर्फ़ गिनती थी।

"तुम बातें बड़ी अच्छी करते हो, अंकुश यादव," उसने कहा। "तेरे दादा भी ऐसे ही बोलते थे। और देखो, आज उनकी दुकान का काग़ज़ किसके हाथ में है।"

मैंने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मेरे होंठ पहले से ही हँसी में थे, इसलिए कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। "काग़ज़ जिसके हाथ में है, उसे दुकान कहते हो? मैंने तो सीखा था कि दुकान वो होती है जहाँ लोग आते हैं। बाकी सब तो दफ़्तर होता है।"

बरामदे के दरवाज़े पर जमा भीड़ में से कोई हँसा। कोई नहीं भी हँसा। मुझे दोनों ठीक लगे। ये सभा नहीं थी, ये बरामदा था, जहाँ लोग सिर्फ़ देखने आते हैं और भूल जाते हैं कि उन्हें भी दिख रहा है।

सलीम ने अपनी अंगूठी वाली उँगली उठाई, जैसे किसी चीज़ की गिनती कर रहा हो।

"मैं तुम्हें बता रहा था," उसने कहा, "कि आज ये बूढ़ी औरत अपने बेटे से सबके सामने लड़ेगी। मैंने सोचा था, औज़ार बिकेंगे, काग़ज़ बनेंगे, कुर्सी बिकेगी, और मैं वो सब उठाकर ले जाऊँगा जो पंद्रह दिन में यहाँ से उठना है। पर तुमने…"

उसने ठहरकर मेरी तरफ़ देखा।

"तुमने ग्यारह अंक के लिए मेरा पूरा हिसाब बिगाड़ दिया।"

मेरी जेब में घंटी हल्की सी हिली। बहुत हल्की, जैसे कोई सोते हुए आदमी करवट बदले।

"ग्यारह अंक?" मैंने कहा। "साहब, अंक तो मैं रोज़ गिनता हूँ। कभी दस, कभी बीस, कभी इकतालीस। आप कौन सा हिसाब लगा रहे हैं?"

"वो हिसाब जिसमें तुम्हारा नाम बारह लोगों की सूची में नहीं है," सलीम ने कहा। "अभी तक नहीं था।"

उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई, जो पैसे वाले लोग तब लाते हैं जब वो सोचते हैं कि उन्होंने आख़िरी पत्ता खोल दिया है।

"तेरे पास वो सूची है," उसने कहा। "मनोज का टेम्पो, गिरा हुआ कोना, तेरे बच्चे — सबको पता है। मुझे भी पता है। सूची में बारह नाम हैं। बारह नाम, हर नाम के आगे रकम, और आगे लिखा है — दूर।"

"आपने लिखी है?"

"मैंने नहीं। मैं लिखता नहीं, मैं पढ़ता हूँ।" उसने कंधे उठाए। "जो चीज़ पंद्रह दिन में ट्रस्ट को जानी है, उसका हिसाब किसी को रखना होता है। और तुम्हारी इस कुर्सी का भी। कुर्सी एक, बक्सा लोहे का, औज़ार बारह, कुल तेरह।"

मेरे हाथ ठंडे रह गए, पर मैंने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया। मैंने उस पर्ची को याद किया जो मेरी जेब में थी। वो मेरे हाथ में आई थी, मेरे पास थी, मेरी जेब में थी। फिर भी उसे ऐसे बोल रहा था जैसे उसने खुद मेरी जेब में हाथ डालकर पढ़ ली हो।

तभी मेरे दिमाग़ में एक बात चटकी।

बारह औज़ार। और तेरहवीं चीज़।

बूढ़ी माँ ने कहा था — बक्से में बारह औज़ार हैं, और तेरहवीं चीज़ बक्से में नहीं, उनके पति के सीने में थी, जो उनके साथ अस्पताल से चली गई।

और उनके पति के काग़ज़ पर लिखा था — तेरहवीं चीज़ हुनर से मिलेगी।

तो तेरहवीं चीज़ कोई चीज़ नहीं थी। तेरहवीं — हुनर था। बारह औज़ार, और उन बारह औज़ारों को चलाने वाला हाथ। यानी हुनर।

और ट्रस्ट की सूची में तेरहवें पर कुर्सी लिखी थी।

दो तेरहवीं। एक जो सीने में थी, और एक जो कुर्सी के नीचे से गिरी।

मेरे भीतर कुछ ठंडा सा फैल गया — वो एहसास जो तब आता है जब कोई काग़ज़ किसी इंसान की जगह लेने आता है।

"कुछ सोच रहे हो?" सलीम ने पूछा।

"सोच रहा हूँ," मैंने कहा, "कि आपने कभी किसी औज़ार से अपना नाम खुदवाया है?"

वो एक पल रुका। "नहीं।"

"तो फिर आप औज़ार की बोली क्यों लगाते हैं? औज़ार वो चीज़ है जो इंसान के हाथ में आकर नाम कमाती है। काग़ज़ में आकर वो सिर्फ़ वज़न बन जाती है।"

बरामदे में खड़े लोगों में से किसी ने धीरे से कहा, "सही कह रहा है।"

सलीम ने वो आवाज़ सुनी, पर देखा नहीं। उसकी नज़र मेरे चेहरे से नहीं हट रही थी।

फिर उसकी नज़र नीचे खिसकी।

मेरे हाथ पर।

मेरी कलाई पर, जहाँ पीतल की घंटी का छल्ला उँगली में फँसा हुआ था। मैं उसे बरामदे में आते वक़्त ही हाथ में ले आया था। आदत थी। घंटी जेब में रहती थी, पर जब भी कोई बात भारी होती, मेरी उँगली उसे निकाल लेती थी, जैसे कोई चाबी को जेब में टटोलता है।

सलीम ने उसे देखा।

और उसकी मुस्कान बदल गई। पहले वो मुस्कान थी जो काग़ज़ दिखाने वाला दिखाता है। अब वो मुस्कान थी जो किसी पुरानी चीज़ को पहचानने पर आती है।

"अरे," उसने धीरे कहा। "ये तो वही है।"

मेरी उँगलियाँ घंटी पर कस गईं।

"ये घंटी," सलीम ने कहा, और एक कदम आगे आया, "तुम्हारे खानदान ने चुराई नहीं है, अंकुश।"

मेरे भीतर का मज़ाक अचानक रुक गया। ऐसे रुका जैसे कोई चलती साइकिल की चेन अचानक उतर जाए — पहिए घूमते रहते हैं, पर आवाज़ बंद हो जाती है।

"छुपाई है," उसने कहा।

मैंने कुछ नहीं कहा।

"छुपाई है," उसने दोहराया, "उस हाथ से जिसने इसे तोड़ा था। और वो हाथ आज भी ज़िंदा है। आज भी उसके जूते चमकते हैं।"

मेरी उँगली में घंटी और ठंडी हो गई।

मेरी जेब से बहुत धीमी आवाज़ आई, इतनी धीमी कि मुझे ही सुनाई दे।

"सच है।"

मैंने साँस रोक ली।

"अभी पूछ।"

मैंने सलीम की आँखों में देखा। "किसने तोड़ी थी?"

सलीम मुस्कुराया। "जब तेरे पापा की चुप्पी बोलेगी, तब पूछना।"

"मैं पूछ रहा हूँ आपसे।"

"और मैं तुम्हें बता रहा हूँ कि आज नहीं।" उसने हाथ उठाया, जैसे तराज़ू के पलड़े बराबर कर रहा हो। "आज का दिन कुर्सी का है। कल का दिन तेरे घर का होगा।"

उसने एक पल के लिए मेरे कंधे के पीछे, बरामदे के अंधेरे कोने में, बूढ़ी माँ और बेटे को देखा, फिर वापस मेरी तरफ़।

"जिस दिन सच खुलेगा," उसने बहुत धीरे कहा, इतना धीरे कि बाहर खड़ी भीड़ को सिर्फ़ उसके होंठ हिलते दिखे, "उस दिन तेरा घर हिलेगा। और तेरे पापा की चुप्पी बोलेगी। उस दिन तुम मुझे याद करोगे — कि जो आदमी तुम्हें काग़ज़ दिखाकर डरा रहा था, वो सबसे कम डरने वाला आदमी था।"

मेरी जेब से फिर आवाज़ आई, बहुत छोटी।

"अभी नहीं।"

मैंने होंठ कसे।

"आप बड़े साहब के सलाहकार हैं," मैंने कहा, "और मेरे पापा की चुप्पी का हिसाब आप रखते हैं। ये अच्छा है। हिसाब रखने वाले कभी किसान नहीं होते, वो हमेशा बटाईदार होते हैं — फ़सल का नहीं, आदमी के डर का।"

सलीम के चेहरे पर कुछ हिला। बहुत थोड़ा, बहुत तेज़ — जैसे पानी पर एक पल की लकीर। फिर फिर से वही ठंडी मुस्कान।

"तू अपने दादा की तरह बोलता है," उसने कहा। "वो भी बोलता था। और देख, आज उसकी दुकान की जगह तेरे हाथ में एक पीला नोटिस है।"

"नोटिस तो काग़ज़ है," मैंने कहा। "दुकान दीवार है। और दीवार पर लिखने वाला कोई और है।"

तभी बरामदे के दूसरे दरवाज़े से, जो नीचे वाले हॉल में जाता था, एक आवाज़ आई।

"सलीम।"

सबने सिर घुमाया।

उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था और कान पर पेंसिल वैसे ही फँसी थी। उनके हाथ में कुछ नहीं था — न कैंची, न धागा, न कोई काग़ज़। सिर्फ़ खुली हथेली, जैसे कोई खाली बाज़ार में खड़ा हो।

सलीम का शरीर एक पल के लिए अकड़ गया। और उस अकड़न में मुझे एक चीज़ दिखी जो उसने आज तक नहीं दिखाई थी — वो बड़ा भाई की आवाज़ सुनकर छोटा भाई हो गया था।

उस्ताद ने एक कदम आगे रखा।

"तूने जो रास्ता चुना," उन्होंने कहा, बहुत सादा आवाज़ में, "उसका हिसाब मुझसे मत माँगना।"

बस इतना।

कोई शिकायत नहीं। कोई ताना नहीं। कोई पुरानी बात नहीं। सिर्फ़ दो वाक्य, जैसे कोई अपनी ही किताब का आख़िरी पन्ना फाड़कर रख दे।

सलीम ने उनकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने धीरे से कहा, "भाईसाहब…"

"मैं तेरा भाई हूँ," उस्ताद ने कहा। "इसीलिए ये बता रहा हूँ। अगर ग़ैर होता, तो तेरे साथ खड़ा होता और तुझे बचाता।"

सलीम ने नज़र नीचे कर ली।

बरामदे में इतना सन्नाटा था कि दूर, नीचे की गली में किसी साइकिल की घंटी सुनाई दी — कोई बच्चा होगा, स्कूल से लौटते वक़्त हैंडल पकड़कर बजा रहा होगा।

सलीम ने साँस ली। और एक पल में वो फिर सलीम बक्श हो गया — सफ़ेद कुर्ता, ठंडी मुस्कान, सीधी कमर।

"ठीक है," उसने कहा। "भाईसाहब ने अपनी बात कह दी। अब मेरी बात भी सुन लो।"

वो मेरे पास आया। दो कदम। मैंने पीछे नहीं हटा — नहीं, ये लड़ाई का वक़्त नहीं था, ये गिनती का वक़्त था, और गिनती में पैर पीछे रखने से हिसाब बिगड़ता है।

वो मेरे बहुत पास आकर रुका। उसकी जेब से साबुन और धूप की गंध आ रही थी। वो गंध मुझे जानी-पहचानी लगी — वही गंध जो उस्ताद ने उस पीले लिफ़ाफ़े में सूँघी थी।

"ये रख," उसने कहा।

और उसने कोई काग़ज़ नहीं, एक छोटा सा बंद लिफ़ाफ़ा मेरी शर्ट की जेब में डाल दिया — इतनी तेज़ी से कि जैसे कोई रुमाल जेब में ठूँसता हो।

मैंने हाथ नीचे किया, पर उसने मेरी कलाई नहीं रोकी।

"आज रात," उसने धीरे कहा, "अस्पताल की सीढ़ी बंद होने से पहले पढ़ लेना।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। "क्यों?"

"क्योंकि सीढ़ी बंद होने के बाद," उसने कहा, "वहाँ सिर्फ़ दीवार रहेगी। और दीवार से सवाल नहीं पूछे जाते।"

वो पीछे हटा।

उसने एक बार बूढ़ी माँ की तरफ़ देखा, फिर बेटे की तरफ़, फिर उस लोहे के बक्से की तरफ़ जो बेटे के हाथों में था। उसकी नज़र उस बक्से पर एक पल ज़्यादा रुकी, और मुझे लगा कि वो बक्सा गिन रहा है — जैसे किसी ने उसे बता रखा हो कि अंदर क्या है।

"माँ जी," उसने कहा, "आपकी कुर्सी अच्छी चलती है। मेरी तरफ़ से बधाई।"

बूढ़ी माँ ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ अपने बेटे की कलाई पकड़ी और कहा, "बक्सा नीचे रख, बेटा। हाथ दुख रहे होंगे।"

बेटे ने बक्सा नीचे नहीं रखा। वो उसे और कसकर पकड़े रहा।

सलीम मुस्कुराया और दरवाज़े की तरफ़ मुड़ गया। चौखट पर वो रुका, और बिना पीछे देखे बोला, "भाईसाहब, आपकी दुकान के पीछे की कोठरी का ताला आज भी वही है?"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

"अच्छा," सलीम ने कहा। "फिर तो चाबी कहीं सही जगह ही होगी।"

वो निकल गया।

उसके जूतों की आवाज़ सीढ़ियों तक गई, फिर नीचे उतरी, फिर गुम हो गई। बरामदे में धूल वैसे ही तैरती रही, जैसे उसे कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा।

तभी सब एक साथ बोले।

"ये क्या था?" — टिंकू ने पूछा, और मेरे आगे आ गया।

"उस्ताद, आपने उसे जाने क्यों दिया?" — बरामदे के दरवाज़े पर खड़े एक आदमी ने कहा।

"वो जेब में क्या डाल गया?" — ये आवाज़ पीछे से आई, और मैंने मुड़कर देखा।

मीरा खड़ी थी। उसके हाथ में कैमरा था, और उसके पीछे काजल, जिसकी आँखें लाल थीं और जिसके हाथ में एक प्लास्टिक की थैली थी जिसमें दवा के दो पत्ते दिख रहे थे।

मीरा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।

"अंकुश," उसने कहा, "जेब से निकाल।"

मैंने लिफ़ाफ़ा निकाला।

वो सादा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था। न नाम, न मोहर, न कोई लिखाई। सिर्फ़ एक कोना ज़रा मुड़ा हुआ, जैसे किसी ने जल्दी में जेब में डाला हो। मेरे हाथ में वो इतना हल्का लगा जैसे अंदर कुछ न हो।

"हल्का है," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, अगर हल्का है तो इसमें कुछ है ही नहीं। ये डराने के लिए है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू अब जासूसी की किताबें पढ़ने लगा?"

"नहीं, उस्ताद। मैं तो आपको देखकर सीखता हूँ।"

काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "भैया, ये हमें नहीं खोलना चाहिए। डॉक्टर इसरानी को दिखाते हैं।"

"काजल," मैंने धीरे कहा, "दवा की थैली तेरे हाथ में है और दवा भी नहीं आई, है ना?"

उसकी आँखें और लाल हो गईं।

"नहीं आई," उसने कहा। "खिड़की वाला कह रहा था कि काग़ज़ साफ़ न हों तब तक नई खेप नहीं उतरेगी। माँ की आख़िरी पत्ती आज रात की है।"

मैंने साँस ली।

और लिफ़ाफ़ा खोल दिया।

टिंकू मेरे कंधे के पास आ गया। मीरा ने कैमरा नीचे किया, पर उसकी लाल बत्ती जलती रही। बूढ़ी माँ ने कुर्सी पर झुककर देखा।

अंदर एक काग़ज़ था। मोटा नहीं, साधारण, पर ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की वो नीली गोल मोहर थी जो आज सुबह मैंने सूची पर देखी थी।

नीचे साफ़ अक्षरों में लिखा था —

"नूर अस्पताल की मुख्य सीढ़ी। आज रात बारह बजे से बंद। मरम्मत तब तक, जब तक नई इमारत का काम तय न हो जाए। इस दौरान कोई प्रवेश नहीं।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा और धीरे से बोली, "बारह बजे। आज रात।"

"ये तो पहले से पता था," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, वो आदमी भी यही कह रहा था। इसमें नई बात क्या है?"

मैंने काग़ज़ को थोड़ा और खोला।

और नीचे, मोटी लकीर के बाद, एक लाइन थी।

और उस लाइन में एक नाम था।

मैंने उसे दो बार पढ़ा। तीन बार पढ़ा। मेरी आँखें उस पर अटक गईं, जैसे कोई सीढ़ी का पायदान तोड़कर उस पर पैर रख दे।

"क्या है?" काजल ने पूछा। "भैया, क्या लिखा है?"

मेरे होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।

तभी बरामदे के आख़िरी कोने से, जहाँ छाया सबसे गहरी थी, एक हल्की आवाज़ आई — किसी के जूते का तला फ़र्श पर सरकने की आवाज़।

मैंने सिर उठाया।

डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे। उनके हाथ में वही पुराना टेप लिपटा स्टेथोस्कोप था, और उनका चश्मा नाक पर फिसला हुआ था। उन्होंने बस एक नज़र उस काग़ज़ पर डाली, और मुझे लगा कि उन्हें पहले से पता था कि उसमें क्या लिखा है।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा।

वो पास आए और बिना कुछ कहे मेरे हाथ से काग़ज़ लेकर पढ़ने लगे। जैसे-जैसे उनकी नज़र नीचे जाती गई, उनका चेहरा वैसे ही ढीला पड़ता गया, जैसे बरसों से तना हुआ कोई धागा अचानक ढीला कर दिया गया हो।

"ये… ये नाम," उन्होंने धीरे कहा।

"हाँ," मैंने कहा। "ये नाम।"

काजल ने काग़ज़ खींच लिया और उसे पढ़ने लगी। उसकी आँखें घूमती गईं, फिर उसके हाथ काँपने लगे। "भैया, ये… ये पापा का नाम है।"

मीरा काग़ज़ के पीछे आई। उसने एक बार पढ़ा और सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उसने कहा, "काग़ज़ पर लिखा है कि सीढ़ी बंद होने के बाद उसकी चाबी किसे दी जाएगी। और नीचे लिखा है — 'सीढ़ी की चाबी सौंपने वाला: शंकर यादव।'"

बरामदा चुप हो गया।

मैंने काग़ज़ को अपने हाथ में वापस लिया और उस लाइन को फिर पढ़ा। पढ़ी हुई लाइन पर भी आँख फिसलती है, ये मुझे आज पता चला।

सीढ़ी की चाबी सौंपने वाला — शंकर यादव।

मेरे पापा।

और माँ की आटे के डिब्बे में पिछले बाईस साल से एक चाबी रखी हुई है।

मेरी जेब में घंटी हिली। एक बार। छोटी, साफ़ आवाज़, जैसे कोई मेरे कान के पास आकर बोला हो।

"चाबी।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"अब समझा?"

मैंने साँस धीरे छोड़ी।

टिंकू ने मेरी कुहनी पकड़ी और धीरे से कहा, "उस्ताद, ये कुर्सी का हिसाब था या घर का?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा, फिर बूढ़ी माँ की तरफ़, जो मेरी आँखों पर ही तक रही थी, फिर काग़ज़ की तरफ़।

"दोनों," मैंने कहा। "आज सुबह से जो भी चल रहा है, वो एक ही सीढ़ी पर जाकर मिल रहा है।"

मैंने काग़ज़ को तीन बार मोड़ा और अपनी शर्ट की जेब में रख लिया — ठीक उसी जेब में जहाँ सलीम ने लिफ़ाफ़ा डाला था, और जहाँ अब उस काग़ज़ ने एक और चीज़ की जगह ले ली थी।

काजल ने धीरे से पूछा, "अब क्या करेंगे?"

मैंने व्हीलचेयर की तरफ़ देखा। बूढ़ी माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, और बेटे ने बक्सा अपनी छाती से नहीं, अब घुटनों पर रख लिया था।

"अब?" मैंने कहा। "अब ये कुर्सी अपना काम कर चुकी। अब इस काग़ज़ को अपना काम करने देंगे।"

डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, तेरे पापा से पूछा?"

मैंने सिर हिलाया। "नहीं।"

"तो पूछ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सिर्फ़ उन लोगों की होती है जिन्होंने बहुत साल उन मरीज़ों को देखा है जिनके पास कोई और नहीं था। "पूछ, और सीधा पूछ। क्योंकि आज रात बारह बजे के बाद, जो सीढ़ी बंद होगी, वो सिर्फ़ सीढ़ी नहीं होगी। वो रास्ता होगा।"

मैंने एक पल सोचा।

फिर मैंने उस पुराने बरामदे में खड़े सब लोगों को देखा — बूढ़ी माँ, उसका बेटा, टिंकू, मीरा, काजल, डॉक्टर साहब, और दरवाज़े पर खड़े वो लोग जो देखने आए थे और अब चुप थे।

"बारह बजे तक," मैंने कहा, "हम सब वहाँ होंगे। और सीढ़ी अपनी चाबी से ही बंद होगी।"

मेरी जेब में घंटी फिर हिली, और इस बार उसकी आवाज़ में वो धीमी हिम्मत थी जो तब आती है जब कोई बहुत पुरानी चीज़ आख़िरकार अपना रास्ता देख लेती है।

"देख," उसने कहा। "अब घर।"

॥

अस्पताल के पुराने बरामदे से बाहर निकले तो शाम की रोशनी पीली पड़ चुकी थी। गली के मुँह पर लगी बत्ती हवा में हिल रही थी और उसके नीचे नींबू-मिर्ची वाला अपना ठेला समेट रहा था। उसने मुझे देखा, कुछ कहने को मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। कल वही मुझे सभा का ताना मार रहा था। आज चुप था। चुप्पी भी एक तरह का ताना होती है, तुम जानते हो ना।

टिंकू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था और उसकी जेब से औज़ार की आवाज़ आ रही थी। दो रिंचें, एक पेचकस, और वो ग्रीस की डिब्बी जिसका ढक्कन वो कभी ठीक से बंद नहीं करता।

"उस्ताद," उसने कहा, "कुर्सी चल गई, तो अंक कहाँ गए?"

"अंक तेरे मोज़े में हैं," मैंने कहा। "जा, गिन।"

वो हँसा। काजल नहीं हँसी। वो मेरे बगल में चल रही थी और उसका हाथ मेरी कुहनी पर था, हल्का-सा, जैसे किसी बीमार के बगल से चलते हैं।

मीरा गेट पर रुकी।

"मैं दो घंटे में आती हूँ," उसने कहा। "कैमरा चार्ज करना है, और…" वो रुकी। "और उस्ताद से एक बात पूछनी है।"

"पूछ ले," मैंने कहा।

"नहीं। अकेले में।"

वो मुड़कर चली गई, और मुझे लगा कि उसके कंधे आज थोड़े झुके हुए हैं। मीरा के कंधे झुकते नहीं। मीरा के कंधे हमेशा आगे की तरफ़ रहते हैं, जैसे किसी खबर को पकड़ने के लिए दौड़ रहे हों।

बूढ़ी माँ और उसका बेटा बरामदे में ही रह गए। बेटे ने लोहे का बक्सा अब घुटनों पर रखा था, छाती से नहीं। ये छोटी बात है, पर मेरे लिए बड़ी थी। जो चीज़ छाती से घुटनों पर आ जाए, वो बोझ से हिस्सा बन जाती है।

काजल ने चलते-चलते पूछा, "भैया, वो काग़ज़ पापा को दिखाओगे?"

"दिखाऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले माँ को।"

"माँ को?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "माँ तो सुनते ही…"

"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए पहले माँ को।"

वो चुप हो गई।

रास्ते में पीपल के नीचे बुज़ुर्गों की चबूतरी खाली पड़ी थी। दिन में यहाँ बैठक, झगड़ा, सुलह, सब चलता है। रात में सिर्फ़ पीपल रह जाता है। पीपल सब सुनता है और किसी को नहीं बताता। मुझे लगता है अगर पीपल को बोलना आता, तो इस गली के आधे झगड़े कभी शुरू ही न होते।

शटर उठाया तो अंदर अंधेरा था और हवा में ग्रीस की गंध। पीछे के कमरे से रोशनी आ रही थी। पापा वहीं थे।

उनकी पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी। वो बैठे थे और एक-एक औज़ार उठाकर कपड़े से पोंछ रहे थे। रिंच, फिर पेचकस, फिर पाना, फिर वही रिंच। जो औज़ार पहले पोंछ चुके थे, उसे फिर पोंछ रहे थे।

मैं दरवाज़े पर खड़ा रह गया।

मैंने कहा, "पापा।"

वो नहीं रुके।

"पापा, काग़ज़ में आपका नाम है। सीढ़ी की चाबी सौंपने वाला — शंकर यादव।"

उनका हाथ एक पल रुका, फिर फिर चलने लगा।

"माँ के आटे के डिब्बे में एक चाबी है," मैंने कहा। "बाईस साल पुरानी।"

वो उठे। औज़ार को ट्रंक में रखा, कपड़े को मोड़ा, और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें आज और भी धँसी लगीं।

"तेरी माँ से पूछ ले," उन्होंने कहा। "जो वो कहेगी, वही होगा।"

और वो बाहर निकल गए।

बस इतना। एक वाक्य। मैं वहीं खड़ा रह गया ये सोचकर कि आदमी इतना कम बोलकर इतना भारी कैसे हो जाता है।

मैंने ट्रंक से रिंच निकाली, वही जिसे टिंकू हर रोज़ छूना चाहता है। उसे हाथ में पकड़ा। ठंडी थी। और मुझे लगा कि पापा ने जो औज़ार आज पोंछे, वो सब पोंछने से साफ़ नहीं हुए। उनसे सिर्फ़ धूल गई, बात नहीं।

घर पहुँचा तो माँ चारपाई पर बैठी थीं और काजल उनके बाल में तेल लगा रही थी। कमरे में सरसों के तेल की गंध थी और दवा की, दोनों मिलकर एक अलग ही खुशबू बना रही थी — वो खुशबू जो आजकल हमारे घर की हवा में रहती है।

"आ गया," माँ ने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे।

"आ गया," मैंने कहा और उनके बगल में बैठ गया।

मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला। सलीम का दिया हुआ लिफ़ाफ़ा पहले खोला था, फिर अलग काग़ज़। दोनों मेरे पास थे। मैंने काग़ज़ माँ की तरफ़ बढ़ाया।

"ये सलीम ने दिया है। इसमें लिखा है कि आज रात बारह बजे से अस्पताल की मुख्य सीढ़ी बंद रहेगी। और उसकी चाबी सौंपने वाला…"

मैं रुक गया।

माँ ने काग़ज़ नहीं लिया। उन्होंने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। उन्होंने बस मेरा हाथ थामा और दबाया।

"रख दे," उन्होंने कहा।

"माँ, इसमें पापा का नाम है।"

"पढ़ने की ज़रूरत नहीं। मुझे पता है।"

कमरा चुप हो गया। काजल के हाथ तेल की डिब्बी पर रुक गए।

"माँ…"

"आज रात," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी थी जैसे किसी ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया हो, "घर का सबसे पुराना दरवाज़ा मत खोलना।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"कौन सा दरवाज़ा?"

"तू जानता है कौन सा।"

जानता था। घर के पिछले हिस्से में, चूल्हे के पीछे, एक दरवाज़ा है जो मेरे होने से पहले से बंद है। छोटा दरवाज़ा, नीचा, जिस पर तीन बार पेंट चढ़ चुका है और हर पेंट के नीचे पुराना रंग फिर झाँक आता है। उस पर ज़ंग लगा कुंडा है जो कभी बजता नहीं, क्योंकि उसे कोई छूता ही नहीं। बचपन में मैंने एक बार उसे खींचा था। माँ ने मेरा हाथ पकड़कर खींच लिया था, और उस दिन उन्होंने मुझे डाँटा नहीं था। उस दिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं कहा था। और वो ज़्यादा डरावना था।

"उसके पीछे क्या है?" मैंने पूछा।

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भर आईं। वो रोई नहीं, बस भर आईं — जैसे किसी बर्तन में पानी किनारे तक आ जाए और बहने से पहले थम जाए।

"जो अब तक नहीं खुला," उन्होंने कहा, "वो ही अच्छा है।"

"माँ, घंटी कहती है कि उसके पीछे वो आदमी है जिसने पापा को बचाया था।"

माँ का हाथ मेरे हाथ पर कस गया।

"घंटी," उन्होंने धीरे कहा, "बहुत सच बोलती है। पर वो ये नहीं बताती कि सच का बोझ किसके सिर आता है।"

फिर वो लेट गईं, चादर सीने तक खींची, और बगल की तरफ़ मुँह कर लिया।

मैं कमरे से बाहर आया। आँगन में खड़ा रहा। गले में पापा की दी हुई चाबी थी — पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी, और तब कहा था, "संभाल के रखियो।" किस चीज़ की है, आज तक नहीं बताया।

मैंने चाबी उँगलियों में ली। उसके दाँते घिसे हुए हैं, जैसे बहुत पुरानी चीज़ पर बहुत पुराने हाथ चले हों।

जेब में घंटी हिली।

"अभी नहीं," उसने कहा।

"कब?"

"जब तेरा पापा खुद खोलेंगे।"

"वो खोलेंगे भी?"

एक पल चुप्पी। फिर एक छोटी-सी आवाज़, जैसे किसी ने दूर से कहा हो — "वो डर रहे हैं।"

मैं आँगन में खड़ा रह गया।

मेरे पापा डर रहे हैं। मैंने कभी सोचा ही नहीं था कि पापा डर सकते हैं। पापा वो आदमी हैं जो सुबह से रात तक चुप रहते हैं, और चुप रहने वाले आदमी को लोग डरता नहीं समझते। लोग समझते हैं वो सिर्फ़ कम बोलने वाला है। कोई नहीं पूछता कि वो कम क्यों बोलता है।

मैं दुकान पर लौटा।

तभी काजल आई। उसके हाथ में चाय का गिलास था, पर वो गिलास उसने मुझे नहीं दिया। वो उसे अपने हाथ में ही पकड़े रही और मेरे सामने मेज़ पर रख दिया, बिना कहे।

"भैया," उसने कहा।

"हाँ।"

"मुझे कुछ बताना है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। काजल की आवाज़ में जो आज एक अलग ही तरह की थकान थी, वो चाय की भाप से भी नहीं छिप रही थी।

"बता," मैंने कहा।

"वो रात…" उसने हाथों को एक-दूसरे में पकड़ा। "जब पापा रणवीर के दफ़्तर से रोते हुए निकले थे।"

मेरा हाथ रिंच पर रुक गया।

"मैंने तुझे बताया था," मैंने कहा।

"नहीं। मैंने बस ये बताया था कि मैंने देखा। पूरा नहीं बताया।"

वो रुकी।

"मैं उस रात नर्सिंग की क्लास से लौट रही थी। ग्यारह बजे के करीब। मैंने देखा कि भारद्वाज भवन के बाहर गली की बत्ती के नीचे पापा बैठे थे। फुटपाथ पर। उनकी गोद में वो पीली फाइल थी और वो फाइल से चिपके बैठे थे, जैसे कोई बच्चा खिलौने से चिपकता है।"

"और?"

"और वो रो रहे थे।" काजल की आवाज़ धीमी हो गई। "भैया, मैंने पापा को कभी रोते नहीं देखा था। मैं वहीं खड़ी रह गई। मैं कुछ कर ही नहीं पाई। फिर एक चौकीदार आया और उन्होंने अपना चेहरा पोंछा और उठकर चल दिए।"

"तूने उस दिन क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि उन्होंने मुझे देख लिया था," उसने कहा। और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं गली के उस तरफ़ खड़ी थी। उन्होंने मुझे देखा ज़रूर, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। और मैंने भी कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा — अगर मैं बोलूँगी तो वो शर्मिंदा होंगे।"

वो चुप हो गई।

मैंने चाय उठाई। ठंडी हो रही थी।

"आज तक किसी को नहीं बताया?" मैंने पूछा।

"किसी को नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तुझे भी नहीं बताया।"

मैंने सिर हिलाया।

"अब बताया।"

"अब बताया।"

वो एक स्टूल खींचकर मेरे सामने बैठ गई।

"भैया, पापा उस दिन उस दफ़्तर से जो लेकर निकले थे, वो काग़ज़ नहीं था। वो उनकी अपनी डर थी। और मुझे लगता है वो आज भी उन्हीं के साथ चल रही है।"

तुम सोच रहे होगे कि ये सब बातें और सीढ़ी वाली रात में क्या ताल्लुक है। ताल्लुक है। क्योंकि जब आदमी बारह बजे किसी सीढ़ी की चाबी सौंपने जाता है, तो वो चाबी नहीं सौंपता। वो अपना डर सौंपता है।

तभी बाहर शोर हुआ।

मैंने दरवाज़े से झाँका। गली के पाँच जासूस खड़े थे। टिंकू सबसे आगे, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू।

मज़ेदार बात ये थी कि सबके पैरों में काला मोज़ा था और चप्पलें उतार रखी थीं। पाँचों नंगे पैर, मोज़े पहने हुए, गली की धूल में खड़े थे और ऐसे मुँह बना रहे थे जैसे उन्होंने कुछ बहुत बड़ा पकड़ लिया हो।

"क्या है?" मैंने पूछा।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "हमने तय किया है कि आज रात हम पापा जी के पीछे जाएँगे।"

"तुम पापा जी के पीछे?"

"जी।" उसने सीना ताना। "गुप्तचर के पाँच नियम हैं। पहला — काला मोज़ा। दूसरा — नंगे पैर। तीसरा — बात नहीं करना। चौथा — साँस धीरे लेना। पाँचवां…"

"पाँचवां?"

"पाँचवां — अगर पकड़े जाएँ तो कहना कि हम पतंग ढूँढ रहे थे।"

सानिया ने उसकी तरफ़ देखा और गुस्से से बोली, "और ये रफ़ीक़ है कि सफ़ेद जूते पहनकर आया है।"

सब रफ़ीक़ की तरफ़ देखने लगे। रफ़ीक़ ने अपने पैरों की तरफ़ देखा। सच में, उसके नंगे पैरों में काला मोज़ा था, पर मोज़े के ऊपर उसने सफ़ेद जूते पहन रखे थे।

"अरे," रफ़ीक़ ने कहा, "मुझे लगा जूते पहनने से चलने में आसानी होगी।"

"जासूसी में सफ़ेद जूते नहीं पहनते!" सानिया ने कहा। "सफ़ेद जूते दिखते हैं। तू अंधेरे में जाएगा और दूर से ऐसा लगेगा जैसे दो चूहे भाग रहे हैं।"

"मैं एक ही हूँ," रफ़ीक़ ने कहा।

"तो एक चूहा।"

गुड्डू हँसने लगा। चिंटू ने उसका मुँह दबा दिया।

मैं हँसा। सच कहूँ, उस वक़्त हँसी बहुत ज़रूरी थी। दिन भर से मेरे अंदर कुछ भारी जमा हो रहा था और ये पाँच बेवकूफ़ उसे हल्का कर गए।

"सुनो," मैंने कहा और उनके सामने बैठ गया। "तुम पापा के पीछे नहीं जाओगे।"

"पर उस्ताद—"

"तुम पापा के आगे जाओगे।"

पाँचों चुप हो गए।

"अस्पताल के गेट से लेकर सीढ़ी तक का रास्ता है। उस रास्ते पर रात ग्यारह बजे कौन खड़ा है, कौन आता है, कौन जाता है — ये तुम देखोगे। और मुझे खबर दोगे। सीधे मुझे, किसी और को नहीं।"

टिंकू की आँखें चमकीं।

"और रफ़ीक़," मैंने कहा, "जूते उतार दे।"

उसने उतार दिए और मोज़ों में खड़ा हो गया और फिर उसे एहसास हुआ कि गली की ज़मीन गरम है, तो वो एक पैर पर कूदने लगा।

शाम ढल गई थी। मैं उस्ताद अली बक्श की दुकान पर गया।

वो अपनी मशीन के पास बैठे थे और उनके हाथ में सुई थी जो आज टूटी थी। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सुई मेज़ पर रख दी।

"बोल," उन्होंने कहा।

मैंने काग़ज़ उनके सामने रखा। उन्होंने पढ़ा। उनका चेहरा नहीं बदला, बस उन्होंने चश्मा उतारा और उसे पोंछने लगे।

"तेरे पापा जाएँगे," उन्होंने कहा।

"आपको कैसे पता?"

"क्योंकि जिस आदमी ने एक बार डर के मारे अंगूठा लगाया हो, वो अपनी पूरी ज़िंदगी ये सोचता है कि एक दिन उसे उस अंगूठे की कीमत चुकानी है।" उन्होंने चश्मा पहना। "और आज वो दिन है।"

"उस्ताद, घर का सबसे पुराना दरवाज़ा…"

वो रुके।

"माँ कहती हैं मत खोलो। घंटी कहती है वहाँ वो आदमी है जिसने पापा को बचाया।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रहे।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "हर घर में एक दरवाज़ा ऐसा होता है जो बंद नहीं होता। वो थमा हुआ होता है। किसी के हाथ से। और जिस दिन वो खुलता है, उस दिन पता चलता है कि उसे थामे हुए कौन था।"

"और अगर वो गिर जाए?"

"तो जो थामे हुए था, वो भी गिरेगा।" उन्होंने सुई उठाई। "इसीलिए वो रात में खोलना। दिन में लोग देखते हैं, और जहाँ लोग देखते हैं वहाँ आदमी अपना चेहरा बचाने के लिए झूठ बोल देता है।"

मैं उठा।

"उस्ताद, आप आज रात आएँगे?"

वो एक पल रुके।

"मैं पचास साल से उस तरह की रातों से दूर रहा हूँ," उन्होंने कहा। "आज के बाद नहीं रहूँगा।"

ग्यारह बजे मैं घर से निकला।

गली में सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा नहीं था जिसमें कुछ न हो। वो सन्नाटा था जिसमें लोग अपने दरवाज़ों के पीछे से सुन रहे होते हैं। शबनम आपा की गुमटी का शटर आधा गिरा था, पर अंदर बत्ती जल रही थी। उस्ताद की दुकान से टिक-टिक की आवाज़ आ रही थी, और वो इस वक़्त नहीं आनी चाहिए थी।

पीपल के नीचे से गुज़रा। ऊपर पत्ते हिले। मैंने ऊपर देखा, कुछ नहीं था।

मेरे पीछे, बहुत पीछे, मुझे नंगे पैरों की आवाज़ आई। पाँच जोड़ी। और फिर एक आवाज़ आई — सानिया की, जो फुसफुसा रही थी, "रफ़ीक़, तेरे मोज़े चरचरा रहे हैं।"

मैं मुस्कुराया और आगे बढ़ता रहा।

अस्पताल का गेट खुला था। अंदर की बत्ती जल रही थी, और सीढ़ी की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर लाल बत्ती टिमटिमा रही थी। मैंने एक बार पीछे देखा। गली खाली थी।

अंदर घुसा।

जूतों की आवाज़ गूँजती है ऐसी जगह में। आधा अस्पताल सो रहा था। कहीं दूर एक बच्चा खाँस रहा था और कोई औरत उसे चुप करा रही थी।

मैं सीढ़ी के मोड़ पर पहुँचा और रुक गया।

वहाँ, लाल बत्ती की रोशनी में, मेरे पापा खड़े थे। हाथ में वही भूरी कपड़े में लिपटी फाइल। पीठ सीधी। कमर झुकी हुई, पर आज उसमें एक अलग तरह का तनाव था। जैसे कोई बहुत दिनों तक बैठा रहा हो और अब खड़ा हो गया हो।

वो मेरी तरफ़ नहीं देख रहे थे। वो सीढ़ी की तरफ़ देख रहे थे।

मैंने एक कदम आगे रखा।

और तभी सीढ़ी के नीचे से एक आवाज़ आई।

"आ जाओ, शंकर जी। देर नहीं हुई।"

वो सलीम बक्श था। सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते, और उसी हाथ में वो काली अंगूठी जो अब मुझे हर बार एक ही बात याद दिलाती थी — कुछ चीज़ें गहरी नहीं होतीं, बस काली हो जाती हैं।

वो मुड़ा और उसकी नज़र मुझ पर पड़ी।

उसके चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। मानो उसे पता था कि मैं आऊँगा। मानो वो मेरा ही इंतज़ार कर रहा था।

उसने हाथ के इशारे से सीढ़ी की तरफ़ दिखाया और धीरे से कहा, "आ जा, अंकुश। बैठ। आज तेरे पापा का सच तेरे सामने रखते हैं।"

मेरी जेब में घंटी हिली और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे लगा किसी ने मेरे कान में साँस भर दी हो।

"अब देख," उसने कहा, "तेरा पापा बोलेंगे।"

॥

"आ जाओ, शंकर जी। देर नहीं हुई।"

सलीम बक्श की आवाज़ सीढ़ी के नीचे से आई और पत्थर की सीढ़ियों से टकराकर ऊपर तक आ गई। लाल बत्ती टिमटिमा रही थी, और उसकी रोशनी में सलीम का सफ़ेद कुर्ता गुलाबी दिख रहा था। वो सीढ़ी के नीचे खड़ा था, एक हाथ लोहे की रेलिंग पर, दूसरा जेब में। जैसे कोई मालिक अपनी ही दुकान के दरवाज़े पर खड़ा हो और ग्राहक का इंतज़ार कर रहा हो।

मेरे पापा उसके सामने खड़े थे। सीना सीधा, आँखें नीची, और हाथ में वो भूरे कपड़े में लिपटी फाइल — सीने से चिपकाई हुई, जैसे कोई औरत अपने बच्चे को चिपकाकर खड़ी हो। उन्होंने सलीम को देखा और फिर मुझे देखा। मेरी तरफ़ देखकर उनकी आँखों में जो आया, वो डर नहीं था। वो शर्म थी। और शर्म, भाई, डर से ज़्यादा भारी चीज़ होती है। डर से आदमी भाग सकता है। शर्म से नहीं।

मैंने एक कदम आगे रखा।

"पापा।"

वो नहीं बोले।

सलीम मुस्कुराया और उसने अपना हाथ जेब से निकालकर सीढ़ी की तरफ़ फैलाया, जैसे कोई रास्ता दिखा रहा हो।

"बैठो, शंकर जी। सीढ़ी साफ़ है। रोज़ पोंछता हूँ।"

पापा नहीं बैठे। वो वहीं खड़े रहे। सलीम को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। उसने कंधे उचकाए और अपनी तरफ़ से बात शुरू की, जैसे कोई हिसाब की कॉपी खोल रहा हो।

"इस फाइल में दो चीज़ें हैं," उसने कहा। "एक, दान का काग़ज़। वही जिस पर सात नाम हैं, सात अंगूठे हैं, और आख़िर में तेरे दादा जगदीश यादव का हाथ है। और दूसरी चीज़ — एक पुरानी चिट्ठी। सलीम अहमद की लिखी हुई। तुम्हें पता है सलीम अहमद कौन था?"

मुझे पता था। डॉक्टर इसरानी का पुराना कंपाउंडर। वो आदमी जिसके नाम के आगे पुराने खाते में दो शब्द लिखे थे — कोई बाकी नहीं। मैंने कुछ नहीं कहा।

"अच्छा, नहीं पता," सलीम ने खुद ही जवाब दिया। "कोई बात नहीं। उस चिट्ठी में एक लाइन है, अंकुश। एक ही लाइन। और वो लाइन कहती है कि अस्पताल की ज़मीन वाले काग़ज़ों पर जो अंगूठे लगे, वो ख़ुशी से नहीं लगे। डर में लगे।"

वो रुका। मुझे लगा वो मुझे उस लाइन का मतलब खुद समझने दे रहा है, जैसे कोई बच्चे को पहेली देकर मुस्कुराता है।

"अब सोच," उसने कहा। "कल सुबह ये फाइल खुलती है। काग़ज़ सामने आता है। उस लाइन को कोई पढ़ता है जो काग़ज़ों का मतलब समझता है। फिर क्या होगा?"

"फिर पता चलेगा कि अंगूठा डर में लगा था," मैंने कहा। "और फिर पापा बेकसूर निकल जाएँगे। इससे बुरा क्या होगा तुम्हारे लिए?"

सलीम हँसा। धीरे से हँसा, जैसे कोई अच्छा मज़ाक सुन लिया हो।

"बेकसूर," उसने दोहराया। "अंकुश, तुम्हारी उम्र में मुझे भी लगता था कि सच्चाई एक तलवार है। काट देगी और काम ख़त्म। पर सच्चाई तलवार नहीं होती, बेटा। सच्चाई काग़ज़ होती है। और काग़ज़ जिसके हाथ में हो, वही तय करता है कि वो काटेगा या चिपकाएगा।"

उसने रेलिंग पर हाथ फेरा।

"कल अगर ये चिट्ठी खुली, तो शहर में ये नहीं लिखा जाएगा कि शंकर यादव डरा हुआ था। शहर में ये लिखा जाएगा कि शंकर यादव ने काग़ज़ पर अंगूठा लगाया, और जब पकड़ा गया तो बोला — मैं डरा हुआ था। एक आदमी अंगूठा लगाता है, पाँच साल चुप रहता है, और जब काग़ज़ उसके ख़िलाफ़ जाता है तब उसका डर याद आता है। कानून में इसका एक ही नाम है। और वो नाम मैं नहीं बोलूँगा, क्योंकि तेरे पापा के सामने बोलने की मुझे आदत नहीं है।"

मेरी मुट्ठी बंध गई।

"और फिर," सलीम ने अपनी आवाज़ थोड़ी और धीमी की, "जब अंगूठा झूठा साबित हो जाएगा, तो उसके साथ ये भी साबित हो जाएगा कि अस्पताल की ज़मीन का जो काग़ज़ आज चल रहा है, वो भी उसी डरे हुए अंगूठे की टेक पर खड़ा है। यानी ज़मीन का काग़ज़ कमज़ोर। कमज़ोर काग़ज़ का मतलब — नई कमेटी, नई जाँच, नई मोहर। और नई मोहर वाले जगह पर, अंकुश, आम तौर पर वही आदमी बैठता है जिसके पास पैसा और वकील दोनों हों।"

वो सीधा मेरी आँखों में देखकर बोला।

"तेरी माँ का इलाज इसी अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर टिका है। मुफ़्त इलाज, मुफ़्त दवा, वो सब उसी एक शर्त पर टिका है। काग़ज़ कमज़ोर हुआ तो इलाज की शर्त भी हवा में। डॉक्टर इसरानी साठ के पार हैं। काग़ज़ में गड़बड़ निकली तो उनका नाम भी उसी काग़ज़ के साथ जाएगा। और उनकी उम्र में नाम बचाना, इलाज से ज़्यादा मुश्किल होता है।"

मेरे पीछे सीढ़ियों पर मेरी साँस सुनाई दे रही थी। पापा अब भी नहीं बोले थे। एक शब्द नहीं। वो बस फाइल पकड़े खड़े थे, और उनकी उँगलियाँ कपड़े पर इतनी कसी हुई थीं कि मुझे लगा कपड़ा नहीं, उनके ही हाथ की नसें दिख रही हैं।

मुझे गुस्सा आया। और मेरा गुस्सा जब आता है तो मेरी ज़ुबान पहले बोलती है, दिमाग़ बाद में आता है। आज भी वही हुआ।

"सलीम भाई," मैंने कहा, "आपने अभी इतनी बड़ी बात कह दी, डर, काग़ज़, जाँच, इलाज — इतनी बात कह दी और एक कुर्सी भी नहीं दी। ये आपकी सलाह का बिल पिछले हफ़्ते का भी बाकी है, आज का अलग।"

सलीम के चेहरे पर वो मुस्कान आई जो उसे खुद भी पसंद है। मुझे पता है वो इसीलिए मुस्कुराया कि वो समझ गया कि मैंने मज़ाक से अपनी आवाज़ को सँभालने की कोशिश की है। मज़ाक मेरी ढाल है, भाई। जब अंदर कुछ टूटने लगता है, मैं हँस देता हूँ। सबको लगता है अंकुश को फ़र्क़ नहीं पड़ता। फ़र्क़ पड़ता है। बहुत पड़ता है।

"पर एक बात सुन लो," मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ से मज़ाक खिसक गया। "जो सच डर में लिखा गया हो, उसे तुम अपने फ़ायदे का काग़ज़ मत बनाओ। अगर उस चिट्ठी में लिखा है कि अंगूठा डर में लगा, तो उस चिट्ठी का काम ये नहीं कि तुम उसे काटने के लिए इस्तेमाल करो। उसका काम ये है कि जिसने डर दिया, उसका नाम सामने आए।"

"और वो नाम क्या मेरा है?" सलीम ने पूछा। बड़े आराम से पूछा।

"तुम्हारा नहीं," मैंने कहा। "पर तुम उस नाम का दरवाज़ा ज़रूर हो। और दरवाज़े भी कभी-कभी गिरते हैं।"

सलीम कुछ कहता, उससे पहले ही सीढ़ी के नीचे से एक आवाज़ आई। ऐसी आवाज़ जो अस्पताल में बहुत कम सुनाई देती है, पर जब सुनाई देती है तो सब रुक जाते हैं।

पहिये की आवाज़।

लोहे का पहिया, पुराना, ज़ंग खाया, जिसे मैंने और टिंकू ने पिछले कुछ घंटों में अपने हाथों से चलाया था। वो पहिया अब अस्पताल के फ़र्श पर चल रहा था, और हर घूमने पर ज़रा-सा चरचरा रहा था।

मैंने पीछे देखा।

काजल व्हीलचेयर के हैंडल पर हाथ रखे खड़ी थी। उसका चेहरा लाल था, साँस फूली हुई थी, और स्कूल की सीढ़ियों से कोई उतरकर नहीं आ रहा था — वो इमारत की ओर से नहीं, गेट की ओर से आई थी। उसने माँ को पूरे रास्ते धक्का देकर लाया था। अकेले।

और कुर्सी पर माँ बैठी थीं।

गुलाबी साड़ी, माथे पर चंदन, पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में कोई कॉपी नहीं — आज हाथ खाली थे। वो सीधी बैठी थीं। बीमार आदमी सीधा नहीं बैठता, भाई। बीमार आदमी थोड़ा झुक ही जाता है। पर आज माँ नहीं झुकी थीं। माँ ने पीठ ऐसी सीधी रखी थी जैसे किसी ने उनकी रीढ़ में तार खींच दिया हो।

काजल की आँखें भरी हुई थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और होंठ हिलाए, बिना आवाज़ — "रोक नहीं पाई।"

मैंने सिर हिलाया। मैं जानता था। माँ को कोई नहीं रोक सकता। माँ को रोकने की कोशिश करने वाला आदमी आज तक कोई नहीं है जो जीत गया हो।

सलीम ने मुड़कर देखा। उसकी मुस्कान ज़रा-सी कम हुई, पर मिटी नहीं। वो आगे बढ़ा, जैसे कोई मेज़बान देर से आए मेहमान का स्वागत करने जा रहा हो।

"सुशीला जी," उसने कहा। "आपको तकलीफ़ नहीं उठानी थी। इतनी रात, इतनी सीढ़ी—"

"तकलीफ़?" माँ ने कहा। उनकी आवाज़ नीची थी, पर साफ़। "जिस आदमी के अंगूठे की बात हो रही है, साहब, वो मेरा आदमी है। उसके अंगूठे को कोई काग़ज़ बताए और मैं घर में बैठी रहूँ, ऐसा मेरे यहाँ नहीं होता।"

सीढ़ी पर सन्नाटा हो गया। अस्पताल की आवाज़ें भी जैसे दूर चली गईं। कहीं कोई बच्चा खाँस रहा था, वो भी रुक गया।

"मैं सिर्फ़ एक बात कहने आई हूँ," माँ ने कहा, और अब उन्होंने सलीम को नहीं, सीढ़ी के नीचे खड़े पापा को देखा। "मेरे पति का अंगूठा झूठा नहीं है। मजबूर था।"

पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने मुँह फेर लिया। पापा जब रोते हैं तो मुँह फेरते हैं। मैंने उन्हें अपनी ज़िंदगी में दो बार रोते देखा है, और दोनों बार उन्होंने मुँह फेरा था। आदमी को रोना मना नहीं होता, भाई, पर गली के आदमी को सामने रोना मना होता है। यही सिखाया जाता है। और ये सिखाने वाले हमें ये कभी नहीं बताते कि जो आँसू सामने नहीं आते, वो सीने में पत्थर बनकर बैठ जाते हैं।

माँ आगे बोलीं, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उस औरत में आती है जिसने अपने आदमी की चुप्पी का बोझ सालों उठाया हो।

"मैं जानती हूँ वो क्यों लगाया," उन्होंने कहा। "मैं उस वक़्त इसी अस्पताल में पड़ी थी। मेरी साँस गिनी जा रही थी। मेरे आदमी के पास पैसा नहीं था, नौकरी नहीं थी, और दो बच्चे थे। जिस दिन वो काग़ज़ लेकर लौटे, उस दिन उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। रात भर छत पर बैठे रहे। सुबह आँखें लाल थीं और हाथ ठंडे थे। मैंने पूछा नहीं। मैं भी उस दिन से चुप हूँ। तो साहब, जब मैं ही चुप हूँ, तो आप किस मुँह से उन्हें झूठा कह रहे हैं?"

सलीम ने एक पल सोचा। फिर उसने वो किया जो वो हमेशा करता है। उसने गुस्सा नहीं किया। उसने मुस्कुराया।

"सुशीला जी," उसने कहा, "मैं किसी को झूठा नहीं कह रहा। मैं तो बस काग़ज़ की बात कर रहा हूँ। काग़ज़ झूठा कहता है या सच्चा, ये मैं नहीं तय करता। ये तारीख़ तय करती है।"

"तारीख़?" काजल बोली। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो बोली। "कैसी तारीख़?"

सलीम ने अपनी कलाई की तरफ़ देखा, जहाँ कोई घड़ी नहीं थी। फिर उसने कहा, बड़े ठंडे ढंग से, "मजबूरी की भी एक तारीख़ होती है, बेटा। हर मजबूरी पर एक तारीख़ लिखी होती है। जिस दिन वो मजबूरी आई, वो एक तारीख़। और जिस दिन आदमी ने उसे छिपाया, वो दूसरी तारीख़। दोनों तारीख़ें मिलकर एक कहानी बनाती हैं। और कहानी अगर काग़ज़ पर हो, तो अदालत में वो कहानी दलील बन जाती है।"

वो सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखकर ज़रा ऊपर आया। अब उसका चेहरा लाल बत्ती में ठीक दिख रहा था। उस चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था जो डरा हुआ हो। उस चेहरे पर सिर्फ़ इंतज़ार था। जैसे रसोई में सब्ज़ी पक रही हो और आदमी बैठकर सिर्फ़ वो पल सोच रहा हो जब उसे परोसी जाएगी।

"कल वो तारीख़ सबको दिखेगी," उसने कहा। "और किसी को कुछ करना नहीं पड़ेगा। बस फाइल खुलेगी। खुद-ब-खुद सब दिख जाएगा।"

तभी मेरी जेब में घंटी हिली। बहुत हल्की। इतनी हल्की कि अगर मैं उसे बीस साल से न जानता, तो मुझे लगता कि मेरी ही साँस में कुछ हिला।

"तारीख़," घंटी ने कहा। बस इतना। एक शब्द। "तारीख़ पर स्याही सूखी है।"

मैंने जेब पर हाथ रखा और आगे बढ़कर पापा का हाथ पकड़ लिया।

उनका हाथ ठंडा था। बहुत ठंडा। जैसे अभी-अभी नल के पानी में डुबोया हो। मैंने उनकी उँगलियाँ अपनी उँगलियों में ले लीं, ठीक वैसे जैसे बचपन में वो मेरी उँगली पकड़कर गली पार कराते थे। आज उलटा हो रहा था।

"पापा," मैंने धीरे से कहा। "फाइल मुझे दे दीजिए।"

वो नहीं बोले।

"पापा, मैं खोल लूँगा। सबके सामने। आज रात। अभी।" मेरी आवाज़ भारी हो रही थी, पर मैं रुका नहीं। "जो सच है, सच बोल देंगे। जो डर था, डर बोल देंगे। फिर जो होगा, साथ में होगा। पर अब आप इस फाइल को सीने से नहीं चिपकाए रहिए। ये काग़ज़ नहीं है, पापा। ये आपके सीने पर पत्थर है।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

और उस पल, उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। पछतावा नहीं। डर नहीं। बस एक थकान। ऐसी थकान जो सालों से मिल रही हो और जिसका कोई आराम नहीं।

उन्होंने मेरी उँगलियाँ खोल दीं।

धीरे से। बिना झटके। जैसे कोई बच्चे के हाथ से चीज़ छीनता नहीं, बल्कि उसकी उँगली एक-एक करके खोलता है।

"अंकुश," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी। "तू मेरी फाइल नहीं छीन सकता। मैंने ये पाँच साल उठाई है। पाँच साल, हर रात, हर सुबह। अब मैं इसे तेरे हाथ में देकर नहीं जा सकता।"

"जाना कहाँ है, पापा?"

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने फाइल कसकर पकड़ी, मेरे कंधे पर हाथ रखा — एक पल के लिए, बस एक पल — फिर हाथ हटाकर सीढ़ी से नीचे उतरने लगे।

धीरे उतरे। एक-एक पायदान। मैंने पीछे से देखा, और मुझे लगा कि मेरे पापा बूढ़े नहीं हुए हैं। वो बस बहुत देर तक एक ही जगह खड़े रहे हैं, और अब चल रहे हैं।

सीढ़ी के नीचे माँ की कुर्सी थी।

पापा रुके। उन्होंने माँ को देखा। माँ ने उन्हें देखा। दोनों ने कुछ नहीं कहा। पर वो चुप्पी वैसी नहीं थी जैसी पाँच साल से घर में थी। वो चुप्पी अलग थी। उसमें कुछ टूट रहा था। अच्छे वाला टूटना, भाई — वो टूटना जिसके बाद आदमी हल्का हो जाता है।

पापा ने झुककर माँ की साड़ी का पल्लू ठीक किया। बस इतना। कोई शब्द नहीं। फिर वो गेट की तरफ़ बढ़े और अंधेरे में चले गए।

काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था।

"जाने दो," मैंने कहा। "वो जो कर रहे हैं, वो उन्हें खुद करना है। हमारा काम है साथ खड़ा होना। पीछे नहीं, साथ।"

तभी सलीम अपनी जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछने लगा। जैसे उसने कुछ छुआ हो जो उससे गंदा था।

"अच्छा," उसने कहा, "तो फाइल आज नहीं खुली। कोई बात नहीं। काग़ज़ को जल्दी नहीं है। काग़ज़ कभी नहीं भागता। भागते तो हम हैं।"

वो खुद सीढ़ी से नीचे उतरने लगा। सीढ़ी की पहली पायदान पर पैर रखा, फिर रुका, फिर मुड़ा। उसका हाथ रेलिंग पर था और उसकी काली अंगूठी लाल बत्ती में चमक उठी।

"एक बात याद रखना, अंकुश," उसने कहा। "काग़ज़ आज इसलिए नहीं खुला कि तेरे पापा ने नहीं खोला। कल इसे कोई और खोलेगा। और वो कोई और तेरा पापा नहीं होगा।"

मैंने कुछ नहीं कहा।

सलीम रुका, मानो मेरे जवाब का इंतज़ार कर रहा हो। जब जवाब नहीं आया तो उसने कंधे उचकाए और नीचे उतरता गया। आधी सीढ़ी उतरकर वो फिर बोला, और इस बार उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पूरी रात नहीं थी। जल्दबाज़ी। हल्की-सी। पर थी।

"कल सुबह दस बजे रज़ा सलीम रजिस्टर लेकर आएगा। सलीम अहमद का असली रजिस्टर। उसमें हर मोहर का हिसाब है, हर अंगूठे का हिसाब है, और उसमें तेरे दादा जगदीश यादव का नाम भी है। उस दिन देखेंगे, अंकुश — मजबूरी किसे कहते हैं।"

वो मुड़ा और अस्पताल के गेट की तरफ़ चल दिया। सफ़ेद कुर्ता अंधेरे में सबसे आख़िर में गया। पहले उसके जूतों की आवाज़ गई, फिर कुर्ता, फिर सब कुछ।

मैं सीढ़ी पर खड़ा रह गया।

मेरे पीछे काजल ने माँ की कुर्सी का हैंडल कसकर पकड़ लिया। "भैया," उसने धीरे से कहा, "वो रजिस्टर…"

"हाँ," मैंने कहा। "वो रजिस्टर।"

"उसमें क्या है?"

मैंने जेब से घंटी निकाली। अस्पताल की लाल बत्ती में पीतल ज़रा-सा चमका। घंटी चुप थी। बहुत चुप। जिस तरह आदमी बहुत सोचने से पहले चुप होता है।

"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "रज़ा सलीम कौन है?"

एक पल कुछ नहीं हुआ। फिर आवाज़ आई, बहुत धीमी, बहुत थकी, जैसे किसी पुराने ताले में से हवा निकली हो।

"वो नाम सलीम अहमद की किताब में लिखा है," घंटी ने कहा। "और तेरे पापा की फाइल में भी।"

"मतलब?"

"मतलब," घंटी ने कहा, "कल सुबह तीन आदमी एक ही रजिस्टर खोलेंगे। एक सलीम का भेजा हुआ। एक तेरा। और एक वो, जो पचास साल से उस रजिस्टर में अपना नाम ढूँढ रहा है।"

मैंने घंटी जेब में रखी और माँ की कुर्सी की तरफ़ मुड़ा। माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सूखी थीं, पर उनका हाथ कुर्सी के हैंडल पर इतनी ज़ोर से बँधा था कि उँगलियाँ सफ़ेद हो गई थीं।

"अंकुश," माँ ने कहा, "तेरे पापा बाहर अंधेरे में खड़े हैं। उन्हें अकेला मत छोड़।"

"और आप?"

"मैं काजल के साथ हूँ," माँ ने कहा। "और मैं अब घर में बैठने वालों में नहीं हूँ, समझे?"

मैं दौड़ा।

अस्पताल के गेट से बाहर निकला तो सड़क खाली थी। दूर, नीम के पेड़ की छाया के पार, एक झुकी हुई परछाई दिख रही थी। पापा। वो धीरे चल रहे थे, फाइल सीने से चिपकाए।

मैंने उन्हें आवाज़ नहीं दी। मैं बस पीछे-पीछे चलता रहा। कुछ दूर। इतनी दूर कि वो जानते रहें कि कोई है। और इतने पास कि अगर वो गिरें, तो मैं पहुँच जाऊँ।

उस रात मैंने अपने पापा को देखा — बिना कुछ बोले, बिना कुछ पूछे, बस चलते हुए। और मुझे लगा कि शायद यही जोड़ने की शुरुआत होती है। बड़ी बातों से नहीं। बस साथ चलने से।

पीछे, बहुत पीछे, गली की तरफ़ से नंगे पैरों की आवाज़ आई। पाँच जोड़ी। और सानिया की फुसफुसाहट, "गुड्डू, चुप! वो अंकुश भैया का पापा हैं!"

और फिर टिंकू की आवाज़ आई, बहुत धीरे, "उस्ताद से कहना पड़ेगा। ये रात ख़त्म नहीं हुई है।"

मेरी जेब में घंटी ने एक बार हल्का-सा धक्का दिया, जैसे किसी ने सहमति में सिर हिलाया हो।

और मैं अपने पापा के पीछे-पीछे चलता रहा, उस अंधेरे में जिसमें आज कुछ चीज़ें खुली नहीं, पर सब कुछ हिल गया था।

॥

मैं चलता रहा। पीछे-पीछे। अंधेरे में पापा की झुकी हुई परछाई जैसे हवा में चल रही हो, फाइल सीने से चिपकी हुई। उनके कदम कभी लंबे पड़ते थे, कभी छोटे, जैसे आदमी सड़क पर चल भी रहा हो और सोच भी रहा हो कि चलना चाहिए या नहीं।

नीम के पेड़ के पास पहुँचकर वो रुके। रुके और मुड़े। मुझे देखा। उन्हें पता था कि मैं पीछे हूँ। बाप को पता होता है। माँ को नहीं पता होता, बाप को पता होता है। बाप चुप रहता है, बस।

"तू आ गया," उन्होंने कहा। आवाज़ जैसे पहली बार बाहर निकली हो।

"आ गया," मैंने कहा। "आपके बिना घर जाना ठीक नहीं लगा। कहीं आप रास्ता भूल जाएँ, तो गली वाले क्या कहेंगे — शंकर यादव अपने ही मोहल्ले में रास्ता नहीं पहचाने?"

उन्होंने कुछ नहीं कहा। पर लगा कि उनके कंधे ज़रा-से नीचे आए। ज़रा-से।

हम साथ चले। अब मैं पीछे नहीं, बराबर में था। बात नहीं हुई।

गली के मुँह पर पहुँचे तो पीपल के नीचे अब भी वो जलती तपेरी की पीली रोशनी बाकी थी। किसी ने बुझाई नहीं थी। खाली चबूतरी पर रोशनी पड़ी थी, और उस रोशनी में धूल के कण तैर रहे थे, जैसे छोटे-छोटे सितारे।

घर पहुँचे तो दरवाज़ा खुला था। काजल ने शायद पहले ही खोल दिया था। अंदर बल्ब जल रहा था, पुराना गुनगुनाता बल्ब। माँ की कुर्सी कमरे के बीच में रखी थी, और माँ उस पर सीधी बैठी थीं, गुलाबी साड़ी में, हाथ गोद में, आँखें दरवाज़े पर। काजल पास खड़ी थी, आँखें लाल।

मैंने पापा के लिए कुर्सी खींची। वो बैठे। फाइल घुटनों पर रखी, दोनों हाथ उसके ऊपर, जैसे कोई किताब पढ़ते वक़्त ढकता है।

कमरे में छत का पुराना पंखा घूम रहा था, धीरे-धीरे, जैसे थका हुआ। पंखे के नीचे माँ का टिफ़िन वाला बड़ा डिब्बा रखा था, ढक्कन बंद। चूल्हे के पास आटे का डिब्बा, जिसमें माँ ने चाबी छिपाई थी। और चूल्हे के पीछे — वो दरवाज़ा।

तीन बार पेंट चढ़ा, ज़ंग लगा कुंडा, नीचे लकड़ी फूली हुई। सालों से बंद। मैंने उसे बचपन में कभी खुलते नहीं देखा। कभी सोचा भी नहीं कि उसके पीछे क्या है — क्योंकि जब आदमी दरवाज़ा बंद देखकर बड़ा होता है, तो उसे लगता है कि दरवाज़ा बंद ही होता है, खुलता नहीं।

मैं पापा के सामने वाली कुर्सी पर बैठा। घुटनों पर हाथ रखे। पहले मैंने सोचा था कि जब ये पल आएगा तो मैं चिल्लाऊँगा। पूछूँगा — क्यों, पापा, क्यों? कैसे कर लिया आपने? मेरे होते हुए? मैं आपका बेटा हूँ, किसी से कुछ कहता, कुछ करता। पर अब बैठा था, तो गला सूखा था, और गुस्सा कहीं पीछे रह गया था, नीम के पेड़ के पास।

"पापा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी लगी नहीं।

वो चुप रहे।

"पापा," मैंने फिर कहा, "मैं गुस्से में नहीं हूँ। सच में नहीं हूँ। आप मेरी तरफ़ देखिए।"

उन्होंने देखा। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, और उस टेप का एक सिरा उखड़ा हुआ था। आँखें छोटी, थकी, और उनमें वो चीज़ जो बूढ़े आदमी की आँखों में तभी आती है जब वो बहुत दिनों से कुछ पी रहा हो — बिना बोतल के।

वो बोले नहीं। बहुत देर तक बोले नहीं। इतनी देर कि काजल ने एक बार पानी का गिलास मेज़ पर रखा, और गिलास की आवाज़ कमरे में ऐसे गई जैसे किसी ने थाली बजा दी हो।

फिर पापा ने हाथ फाइल पर से उठाया, और मेरी तरफ़ नहीं, दीवार की तरफ़ देखकर बोले।

"उस रात मैं अस्पताल में था।"

मैं चुप रहा।

"तेरी माँ के पास पैसे नहीं थे, अंकुश। दवा का हिसाब देखा तो हाथ काँप गए। डॉक्टर ने कहा था कि दो दिन में पैसा नहीं दिया तो जाँच रुक जाएगी। और तेरी माँ उस वक़्त इतनी कमज़ोर थी कि बोल नहीं सकती थी। बस देखती थी। दीवार की तरफ़। जैसे दीवार से उम्मीद हो।"

उन्होंने साँस ली। साँस जैसे छाती में फँसी हो और ज़ोर लगाकर निकालनी पड़ी।

"शाम को एक आदमी आया। सफ़ेद कुर्ता। मीठी ज़ुबान। मुंशी जी जैसा। वो नहीं — कोई और। वो काग़ज़ दिखाया। कहा — बस अंगूठा लगाओ, इलाज चलता रहेगा। मुफ़्त। जाँच, दवा, सब। तुम्हारे बेटे का नाम भी सूची में है। मैंने कहा — मेरे बेटे को पता है? उसने कहा — बेटे को क्यों तकलीफ़ देना, वो छोकरा है, इतना बोझ क्यों डालना।"

मेरा हाथ कुर्सी के हैंडल पर कस गया।

"मैंने उस रात अंगूठा लगाया," पापा ने कहा। "एक अंगूठा। सिर्फ़ एक। और मुझे लगा कि एक अंगूठे से कुछ नहीं होता। काग़ज़ होता है, काग़ज़ ऐसे ही पड़े रहते हैं।" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा, और इस बार आँखें सूखी नहीं थीं। "पर काग़ज़ पड़े नहीं रहते, अंकुश। काग़ज़ चलते हैं। धीरे-धीरे। रेंगते हैं। और बीस साल में पहाड़ बन जाते हैं।"

"आपने माँ को क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा। आवाज़ धीमी थी, तेज़ नहीं।

"बताया था।" उन्होंने कहा। "अगली सुबह।" और फिर मुड़कर माँ की तरफ़ देखा।

माँ ने सिर हिलाया। एक बार। छोटा-सा।

"और माँ ने क्या कहा?" मैंने पूछा।

"तेरी माँ ने कहा," माँ ने खुद जवाब दिया, आवाज़ सपाट, "कि अब रोने से कुछ नहीं होगा। जो हो गया, सो हो गया। इलाज चलता रहे, बच्चे पढ़ते रहें, और ये बात इस घर से बाहर न जाए।"

कमरा चुप हो गया।

मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो कुर्सी पर सीधी बैठी थीं। गोल चेहरा, माथे पर चंदन का टीका, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ। जिस औरत ने सुबह पाँच बजे से चूल्हा जलाया, जो पूरे मोहल्ले को टिफ़िन पहुँचाती थी, जो कहती थी कि मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता और बात में भी नहीं — वही औरत पाँच साल से अपने अंदर एक ऐसी बात दबाए बैठी थी जो उसे रात में जगाती होगी।

"माँ," मैंने कहा। "आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"

"क्या बताती?" माँ ने कहा। आवाज़ में वो कड़क वापस आ गई, जो गुमटी पर भी आती है, घर पर भी। "यही बताती कि तेरे पापा ने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था, और उसी काग़ज़ से तेरी माँ का इलाज चला? तू अठारह साल का था। तेरे हाथ में क्या था? साइकिल की रिंच और गली के बच्चों का होमवर्क?"

"तो मैं बड़ा होने का इंतज़ार करता।"

"बड़ा होने का इंतज़ार करते-करते आदमी बूढ़ा हो जाता है," माँ ने कहा। "और मैं तुझे बोझ नहीं बनाना चाहती थी।" उन्होंने एक पल रुककर कहा, और आवाज़ धीमी हो गई। "ये मेरी गलती थी, अंकुश। मैंने सोचा कि चुप रहकर मैं इस घर को बचा रही हूँ। सच ये है कि मैंने सिर्फ़ उसे सुला दिया। और सोई हुई चीज़ें बाद में ज़्यादा ज़ोर से उठती हैं।"

काजल रो रही थी। बिना आवाज़ के। ऐसे रोना बुरा होता है, जब आवाज़ न निकले। वो दीवार से टिकी खड़ी थी और आँखों से पानी गिर रहा था, और वो पोंछ भी नहीं रही थी।

"काजल," मैंने कहा। "आ जा।"

वो आई। मेरे पास नहीं बैठी, फ़र्श पर बैठ गई, मेरे घुटनों के पास, सिर झुकाए। मेरा हाथ उसके सिर पर गया। बाल रूखे थे। वो आज सुबह से नहा भी नहीं पाई थी।

"और मुझे कब पता चलता?" मैंने पापा से पूछा। "अगर आज रात ये सलीम न आता, तो कब?"

पापा ने फाइल की तरफ़ देखा।

"कभी नहीं," उन्होंने कहा।

"कभी नहीं," मैंने दोहराया।

"मैं बाईस साल से डर में जी रहा हूँ, अंकुश।" उनकी आवाज़ अब टूट रही थी, पर वो रो नहीं रहे थे, बस आवाज़ जैसे किसी पुराने पाइप से निकल रही थी। "हर सुबह उठता हूँ, और सोचता हूँ — कहीं आज मेरा बेटा मुझे कायर न समझ ले। मैं तेरे सामने बैठता हूँ, और मुझे लगता है कि तू मेरी आँखों में देख रहा है और सब पढ़ रहा है। तू मेरे पास से गुज़रता है, मैं सीधा हो जाता हूँ। जब तू बड़ा हुआ, तू अपने हाथों से कमाने लगा, गली में लोग तेरी इज़्ज़त करने लगे — और मैं हर बात पर सोचता रहा कि इस लड़के के सामने मैं क्या हूँ।"

मैंने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की। छोड़ दिया। कभी-कभी आदमी को बोलने देना चाहिए, चाहे बात छुरी जैसी हो।

"और आज," पापा ने कहा, "जब सलीम ने कहा कि रजिस्टर लाएगा, तो मुझे पता था कि अब नहीं बचेगा। मैं सीढ़ी से उतरा, क्योंकि मुझे लगा कि अगर मैं तेरी आँखों के सामने उतर जाऊँ, तो कुछ कहने की ज़रूरत न रहेगी। बूढ़ा आदमी कितनी देर भागेगा?"

काजल ने सिर उठाया। "पापा," उसने रुँधी आवाज़ में कहा, "मैंने आपको देखा था।"

कमरा ठहर गया।

"भारद्वाज भवन के बाहर। उस रात। आप रो रहे थे।" काजल का गला भर गया। "मैं उस दिन से आपके सामने नहीं बैठ पाई, पापा। मुझे लगता था कि मैं कुछ गलत देख रही हूँ। मैं डर गई थी कि कहीं आप ऐसे ही रोते रहे, और मैं चुप रही।"

पापा ने काजल की तरफ़ देखा। बहुत देर देखा। फिर बोले, बहुत धीमे, "आ जा, बेटी।"

और काजल उठकर उनके पास गई, और उनके घुटनों पर गिरकर रोने लगी। पापा का हाथ उसके सिर पर रखा, और मैंने देखा कि उनकी उँगलियाँ काँप रही हैं। काँप रही थीं, पर सिर पर थीं।

मैं खिड़की के पास गया। रात गहरी हो रही थी। बाहर पीपल की छाया दीवार पर पड़ी थी, और उस छाया में एक-दो बच्चों की परछाई भी दिख रही थी। टिंकू और सानिया। वो लोग अब भी गली में थे। नंगे पैर, और इंतज़ार में। कभी उन बच्चों को देखता हूँ तो लगता है कि गली का सबसे बड़ा सच यही है — बड़े लड़ते हैं, छोटे इंतज़ार करते हैं।

मैं पापा के सामने वापस आया।

"पापा," मैंने कहा। "आप मेरी तरफ़ देखिए।"

वो देखा।

"मैं आपको बता दूँ कि कायर कौन होता है।" मैंने धीरे कहा, पर साफ़। "कायर वो होता है जो सच छिपाकर दूसरों को बर्बाद करता है। वो जो पीछे बैठकर सफ़ेद कुर्ते में मुस्कुराता है, और किसी की दुकान बंद करवा देता है, किसी का घर उजाड़ देता है, किसी के अंगूठे का इंतज़ार करता है।" मैंने एक पल रुका। "वो कायर नहीं होता, पापा, जो माँ को बचाने के लिए डरकर एक अंगूठा लगा देता है। वो सिर्फ़ एक ऐसा आदमी होता है, जिसे उस रात ऐसा रास्ता दिया गया जो रास्ता नहीं था।"

पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने कुछ कहने की कोशिश की, आवाज़ नहीं निकली।

"और आप मेरे पापा हैं," मैंने कहा। "इससे ज़्यादा बड़ा कुछ नहीं होता, और इससे ज़्यादा छोटा भी कुछ नहीं होता। मुझे आप उस रात के काग़ज़ से नहीं जानते, मैं आपको उस रिंच से जानता हूँ जो आपने मुझे पहली बार दी थी। बाकी सब बाद की बात है।"

फिर मैंने वो कहा जो सच में कहना था, और जो मुँह से निकला तो आवाज़ थोड़ी ऊपर चली गई।

"और एक बात साफ़ कर दूँ। मैं अकेले कुछ नहीं सँभालने वाला। जो मैंने पिछले कुछ हफ़्तों में किया, वो सब बस इसलिए हुआ कि कोई शबनम आपा चिमटी पटक देती थी, कोई उस्ताद दुकान खोल देता था, कोई मीरा अपना कैमरा उठा लेती थी, और ये छोकरी मेरे पास फ़र्श पर बैठ जाती थी।" मैंने काजल की तरफ़ देखा। "इसलिए जब मैं कहूँ कि अब मैं सँभालूँगा, तो इसका मतलब है — हम सँभालेंगे। बस।"

माँ ने तब कहा, और उनकी आवाज़ में फिर वही पुरानी कड़क लौटी, "अब सुन मेरी बात।"

हम सब उनकी तरफ़ देखने लगे।

"ये चुप्पी का कर्ज़ है," माँ ने कहा। "पाँच साल का। और कर्ज़ उतारना पड़ता है। मैंने तेरे पापा को नहीं रोका, ये मेरी गलती। मैंने खुद चुप रहकर सब सँभालने की सोची, ये मेरी गलती।" उन्होंने काजल की तरफ़ देखा। "और काजल — जो तूने देखा, वो तूने मुझे नहीं बताया, ये भी मेरी गलती है, क्योंकि मैंने इस घर में ऐसा माहौल बना दिया था कि बच्चे डरकर बात छिपाने लगे। अब ये नहीं होगा।"

"माँ," काजल ने कहा।

"और तेरे पापा," माँ ने कहा, "ये काग़ज़ देखकर मेरी ज़ुबान नहीं रुकेगी। पाँच साल से मैंने बहुत सह लिया। अब ये घर वो नहीं जो सिर्फ़ सहता है।"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़। और फिर धीरे-धीरे, दोनों हाथों से वो भूरी फाइल उठाई।

उनके हाथ काँप रहे थे। इतने कि फाइल बीच से फिसलने लगी और मैंने आगे हाथ बढ़ा दिया। पर वो मुझे देने से पहले एक पल रुके। मेरी तरफ़ देखा। आँखों में उस वक़्त कुछ था जो मैंने पापा की आँखों में पहले कभी नहीं देखा था — इजाज़त माँग रहा था। बाप अपने बेटे से इजाज़त माँग रहा था।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "इस फाइल में वही काग़ज़ हैं जो मैंने बाईस साल से छिपाए हैं। और उसमें कुछ ऐसा भी है जो मुझे उस रात मिला था, और जो मैंने तुझे नहीं दिया। अब…"

उन्होंने साँस ली, जैसे कोई बोझ पहली बार उतार रहा हो।

"अब तू सँभाल।"

मैंने फाइल पकड़ी। दोनों हाथों से। उसे सीने से लगाया। कपड़ा ठंडा था, पर जैसे ही छाती से लगा, लगा कि वो ठंडा नहीं, उलटा गरम है। चीज़ें पास आकर गरम होती हैं। सच भी। सच्छ से भी।

मैंने फाइल को नीचे नहीं देखा। सीधे पापा की तरफ़ देखा।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"

"क्या?"

"जब मैं इसे खोलूँगा, आप साथ होंगे। अकेले नहीं खोलूँगा। और न आप अकेले खोलेंगे।" मैंने थोड़ा मज़ाक डालने के लिए हल्की आवाज़ में जोड़ा, "क्योंकि इस घर का हिसाब निकलेगा तो दोनों के हाथ काँपेंगे, तो कम से कम दोनों मिलकर फाइल सँभाल लेंगे।"

पापा ने पहली बार उस रात में हँसने जैसा किया। न हँसी थी, न रोना। कुछ बीच का। उन्होंने चश्मा उतारा, टेप वाला हिस्सा ठीक किया, फिर पोंछा, फिर लगाया। और फिर उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। बस रखा। कुछ नहीं कहा। कहने की ज़रूरत भी नहीं थी।

माँ कुर्सी पर सीधी हो गईं, और उन्होंने कहा, "अब सब सुनो। ये फाइल कल हम सभा में रखेंगे। सबके सामने। और जो सलीम कह गया कि रजिस्टर आएगा — तो आए। पर पहले हम अपना काग़ज़ सबके सामने रखेंगे। ऐसे नहीं कि कोई हमें अंगूठे वाला कहे और हम सिर झुका लें।"

"पर माँ," काजल ने कहा, "अगर अंगूठा झूठा साबित हो गया तो अस्पताल की ज़मीन का काग़ज़ कमज़ोर पड़ेगा — सलीम ने वही कहा था।"

माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "काग़ज़ कमज़ोर पड़ेगा तो पड़े," उन्होंने कहा। "पर इलाज किसी एक काग़ज़ से नहीं चलता, काजल। इलाज ज़मीन से नहीं चलता, डॉक्टर से चलता है। और डॉक्टर इसरानी उस काग़ज़ के नीचे नहीं बैठे होंगे।" फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। "अंकुश, तेरे हाथ में गली है। इस फाइल में जो है, उसे सँभालना तेरा काम है। और अगर कल कुछ टूटे, तो याद रखना — तोड़ने वाले से ज़्यादा ज़रूरी जोड़ने वाले होते हैं।"

मैंने सिर हिलाया।

उस वक़्त मेरी जेब में कुछ हिला।

हल्का-सा। जैसे किसी ने उँगली से धक्का दिया हो।

मैंने फाइल एक हाथ में ली और दूसरे हाथ से घंटी निकाली। पीतल, कम रोशनी में अब भी चमकता हुआ, और उस पर फूल का निशान, जो उस्ताद ने बड़ी मेहनत से खुदा था।

घंटी चुप थी। एक पल के लिए पूरा कमरा रुका, जैसे घंटी से पहले खुद कमरा इंतज़ार कर रहा हो।

फिर आवाज़ आई।

बहुत धीमी। इतनी धीमी कि जैसे किसी ने बहुत दूर से, किसी पुराने कुएँ से बात कही हो।

"आज सच ने एक दरवाज़ा खोला है।"

मैं रुका। पापा ने मेरी तरफ़ देखा।

"और?" मैंने कहा।

"और ये दरवाज़ा अब बंद नहीं होगा," घंटी ने कहा। "पर सुन — जो ताले सच से खुलते हैं, वो सच से ही बंद होते हैं। इसका हिसाब रखना।"

"समझ गया," मैंने कहा। "हिसाब आपका, मेहनत मेरी। यही हमारा पुराना सौदा है।"

घंटी ने इस पर कुछ नहीं कहा। कभी-कभी घंटी मज़ाक का जवाब नहीं देती। कभी-कभी वो बस चुप हो जाती है, जैसे बूढ़ा उस्ताद जो ताना सुनकर अनसुना कर देता है।

पर फिर उसने वो कहा जो मुझे किसी और वक़्त सुनना था, और वो इस कमरे में जैसे ठंडी हवा की तरह आया।

"अंकुश," घंटी ने कहा। "घर का सबसे पुराना बंद दरवाज़ा आज रात बारह बजे खुलेगा।"

मेरा हाथ ठिठक गया। पीछे चूल्हा था, और उसके पीछे वो दरवाज़ा — तीन बार पेंट चढ़ा, ज़ंग लगा कुंडा, नीचे से फूली लकड़ी।

माँ के चेहरे पर वो भाव आया जो मैं कभी नहीं भूलूँगा। डर नहीं था। पहचान थी। जैसे किसी ने पुराने रिश्तेदार का नाम लिया हो, जिससे मिलना बाकी था।

"और उसके पीछे," घंटी ने कहा, और इस बार आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं था — जैसे कोई बहुत दिनों बाद अपनी नींद से हिला हो, "एक चीज़ सोई है।"

मैंने घंटी को करीब लाया।

"कौन सी चीज़?"

घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, इतने धीमे कि मुझे लगा कि ये बात मैंने सुनी नहीं, समझी है।

"वो चीज़ जो तेरे नाम से बोलेगी।"

कमरे में पंखा घूमता रहा। एक चक्कर। दूसरा। तीसरा।

पापा की आँखों में जो डर आया, वो उस रात के डर से अलग था — ये डर इंतज़ार का था, बारह बजे का, उस दरवाज़े का जिसे उन्होंने शायद कभी खोला था और कभी नहीं खोला।

मैंने फाइल सीने से लगाई रखी, और दूसरे हाथ से घंटी को जेब में डाला।

"कितना वक़्त है?" मैंने पूछा।

"अभी ग्यारह बजकर पैंतालीस मिनट हुए हैं," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क वापस आ गई जो हिसाब रखती है, जो कभी एक मिनट भी नहीं भूलती। "तो पंद्रह मिनट।"

मैंने कुर्सी पीछे सरकाई। उठा।

"कहाँ जा रहा है?" काजल ने पूछा, आँखें अब भी गीली।

"पंद्रह मिनट में एक चीज़ तय करनी है," मैंने कहा। "कि वो दरवाज़ा मैं अकेले नहीं खोलूँगा।"

और मैंने पापा की तरफ़ देखा।

"पापा," मैंने कहा। "तैयार हैं?"

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की तरफ़। फिर माँ की तरफ़। और फिर बहुत धीरे, जैसे कोई बहुत पुरानी आदत तोड़ रहा हो, उन्होंने सिर हिलाया।

"तैयार हूँ," उन्होंने कहा। "बाईस साल बाद।"

माँ ने कुर्सी के हैंडल पर हाथ रखा और कहा, "तो चलो। इस बार इस घर में कोई पीछे नहीं रुकेगा।"

मैंने जेब में हाथ डाला और वो पुरानी चाबी निकाली जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है। और फिर मुझे याद आया — माँ ने आटे के डिब्बे में एक चाबी छिपाई थी, बाईस साल पुरानी।

दोनों चाबियाँ आज रात इसी घर में थीं।

और दोनों का ताला शायद एक ही था।

काजल उठी और मेरे पीछे आ गई। पापा उठे और माँ की कुर्सी पकड़ी। और मैंने चूल्हे के पीछे वाले उस पुराने दरवाज़े की तरफ़ देखा, जिस पर तीन बार पेंट चढ़ा था, और जिसे कभी किसी ने खोला नहीं।

बाहर गली में किसी ने आवाज़ दी। टिंकू की आवाज़। "उस्ताद! उस्ताद! अरे उस्ताद ज़रा बाहर आओ ना — घड़ी देखो, ग्यारह बज गए!"

और पीपल की छाया में, किसी कुर्सी पर बैठे उस्ताद अली बक्श ने धीरे से कहा, इतना धीरे कि मुझे सुनाई दिया — "हाँ। अब वक़्त है।"

मैंने फाइल कसकर पकड़ी, घंटी जेब में धक्का दे रही थी, और मैं उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, जिसके पीछे कोई चीज़ सोई थी और जो आज रात मेरे नाम से बोलने वाली थी।

॥

बारह बजने में शायद दो मिनट बाकी थे।

चूल्हे के पीछे वाली जगह इतनी तंग थी कि चार लोग खड़े हों तो कंधे टकराएँ। माँ की कुर्सी हमने तिरछी करके रखी, क्योंकि सीधी रखते तो दरवाज़े तक हाथ न पहुँचता। काजल ने हाथ में एक छोटी लालटेन पकड़ी थी, जिसकी बत्ती धीमी थी और जो हर दो मिनट में फुँफकारती थी, जैसे खुद डर रही हो।

और सामने वो दरवाज़ा।

मैंने ज़िंदगी में बहुत दरवाज़े देखे थे। दुकान का शटर, जो बारिश में फूल जाता था। उस्ताद की दुकान का नीला दरवाज़ा, जो उतर चुका था। स्कूल का लोहे का गेट, जो बूढ़े की खाँसी जैसी आवाज़ करता था। पर ऐसा दरवाज़ा नहीं देखा था।

इस पर तीन बार पेंट चढ़ा था। सबसे ऊपर हरा, उसके नीचे नीला, और सबसे नीचे कहीं गहरे में वो रंग जो मुझे नहीं पता — शायद लाल, शायद भूरा। पेंट इतना मोटा था कि लकड़ी की लकीरें ही गायब हो गई थीं, जैसे किसी ने बार-बार ऊपर से पोतकर कुछ छिपाने की कोशिश की हो।

कुंडा ज़ंग खाया था। नीचे से लकड़ी फूली हुई थी, इसलिए दरवाज़ा ज़मीन को चूम रहा था। और उस पर कोई निशान नहीं था — न ताला, न चिट्ठी, न कोई कील। बस एक बंद दरवाज़ा, जो बाईस साल से अपनी साँस रोके बैठा था।

"टिंकू!" मैंने पीछे मुड़कर आवाज़ दी। "अंदर आ जा।"

टिंकू दरवाज़े की चौखट पर खड़ा था, आँखें बड़ी किए, और उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू चार गिलहरियों की तरह एक-दूसरे के पीछे छिप रहे थे।

"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "मैं अंदर आ जाऊँ?"

"हाँ।"

"पक्का?"

"टिंकू, तू पाँच महीने से मेरी दुकान पर रोज़ आता है। मेरे औज़ार उठाता है। मेरी चाय पीता है। मेरी गाड़ी के पहिये में हवा भरता है। और अब घबरा रहा है?"

"वो दुकान थी," टिंकू ने गला साफ़ करके कहा। "ये… ये दरवाज़ा है।"

पीछे से उस्ताद अली बक्श की आवाज़ आई, जो गली से आ रही थी, धीमी पर साफ़ — "अंदर आ जा, बेटा। जो दरवाज़ा बंद रहे, वही तो सबसे ज़्यादा बोलता है।"

टिंकू ने एक गहरी साँस ली और अंदर घुस आया। उसके पीछे बच्चों की टोली भी सरका दी, जैसे एक ही शरीर हो।

माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में और कसकर खोंसा। ये उनका इशारा था — जब वो पल्लू कसकर खोंसती हैं, तो मतलब वो अब किसी बहाने को जगह नहीं देंगी।

"चाबी," माँ ने कहा। सिर्फ़ एक शब्द।

मैंने गले से पापा वाली चाबी निकाली। पुरानी, घिसी, छोटी। बचपन से मेरे गले में, और मैंने कभी नहीं जाना कि ये किस चीज़ की है। मैंने उसे पापा की तरफ़ बढ़ाया।

"पापा, आप की चीज़ है। आप खोलिए।"

पापा का हाथ बढ़ा, फिर रुक गया। उनकी उँगलियाँ हवा में ही काँप रही थीं, जैसे चाबी तक पहुँचने से पहले ही थक गई हों।

"मैंने ये दरवाज़ा…" पापा ने धीरे से कहा, आवाज़ कहीं गले में ही अटक गई, "…बाईस साल में एक बार भी नहीं छुआ।"

"तो आज छू लीजिए," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो किसी को बहाना नहीं बनने देती। "एक बार छू लो, शंकर। बाईस साल का हिसाब एक ही रात में नहीं उतरता, पर शुरुआत तो कहीं से होगी।"

पापा ने चाबी ली। उन्होंने उसे कुंडे की तरफ़ बढ़ाया। चाबी का सिरा कुंडे के छेद पर रखा।

और फिर वो घुसी नहीं।

पापा ने हिलाया। घुमाया। ज़ोर लगाया। चाबी छेद पर टकराकर रह गई, जैसे कोई अजनबी दरवाज़े पर आकर खड़ा हो और अंदर वाला पहचानने से इनकार कर दे।

"नहीं जा रही," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी राहत थी, जो मुझे अच्छी नहीं लगी।

"तो ये इसकी नहीं है," काजल ने कहा।

"नहीं, ये इसकी है," माँ ने कहा। "पर ताला एक नहीं है।"

सबने उनकी तरफ़ देखा।

माँ ने अपनी साड़ी के कोने में हाथ डाला, फिर कमर से झुककर कुर्सी के साथ जुड़ी छोटी थैली से कुछ निकाला। मैंने देखा — उनके हाथ में एक और चाबी थी। इससे बड़ी, मोटी, और उस पर ज़ंग के धब्बे थे, जैसे किसी पुराने ज़माने के ताले की हो।

"मैंने ये बाईस साल संभाली है," माँ ने कहा। "आटे के डिब्बे में, नीचे, दालों के पीछे। हर बार जब आटा निकालती थी, उँगली उस पर लगती थी। और हर बार लगता था कि किसी दिन…"

वो पूरी बात नहीं कह पाईं।

"किसी दिन क्या, माँ?" काजल ने पूछा।

"किसी दिन इसकी ज़रूरत पड़ेगी," माँ ने कहा, और चाबी पापा की तरफ़ बढ़ा दी। "ले। और अब देर मत कर।"

पापा ने वो चाबी ली। इस बार उनका हाथ कम काँप रहा था। शायद इसलिए कि अब वो अकेले नहीं थे।

उन्होंने चाबी छेद में डाली।

और चाबी अंदर चली गई।

एक आवाज़ आई — धातु का धातु से टकराना, फिर कुंडे के अंदर किसी पुरानी स्प्रिंग का कराहना।

"घुमाओ," माँ ने कहा।

पापा ने घुमाया।

पहला घुमाव — कुछ नहीं हुआ।

दूसरा घुमाव — दरवाज़े के नीचे से धूल की एक पतली लकीर फ़र्श पर गिरी, जैसे किसी ने नींद में करवट ली हो।

तीसरा घुमाव —

क्लिक।

और फिर वो आवाज़, जो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा। दरवाज़ा खुला नहीं — पहले कराहा। लकड़ी फूली हुई थी, इसलिए वो ज़मीन से अलग होने के लिए ज़ोर लगा रही थी। पापा ने कंधा लगाया। टिंकू दौड़कर आया और उनके पीछे से धक्का दिया। तीन लोगों के ज़ोर से दरवाज़ा ज़मीन से उठा और फिर बड़ी मुश्किल से अंदर की तरफ़ घूमा।

और तभी धूल निकली।

इतनी धूल कि मुझे लगा कि बाईस साल की सारी साँस एक ही बार में बाहर आ गई। काजल खाँसने लगी। टिंकू ने मुँह कमीज़ में छिपा लिया। रफ़ीक़ और चिंटू पीछे हट गए। माँ ने आँखें बंद कर लीं पर हटीं नहीं।

धूल जब बैठी, तो अंदर से एक गंध आई।

बंद कमरे की गंध। पुरानी लकड़ी। कपूर। और कुछ ऐसा जो मैं पहचानता था पर नाम नहीं बता सकता था — जैसे किसी पुराने कपड़े में लिपटी हुई दुआ, जो बरसों से बोली नहीं गई।

मैंने लालटेन आगे की।

अंदर का कमरा छोटा था। छह फुट चौड़ा, शायद आठ फुट लंबा। एक तरफ़ दीवार पर छोटी खिड़की थी, जिसे अंदर से लकड़ी के पटिये से बंद किया गया था। फ़र्श पक्का था, पर सीलन से उस पर हरी परत जमी थी। कोने में मकड़ी का जाला इतना मोटा था कि उस पर धूल की परत जम गई थी, जैसे कोई सफ़ेद चादर टँगी हो।

और सामने, दीवार से सटा, एक पुराना संदूक रखा था।

लकड़ी का, ढक्कन पर पीतल की पट्टियाँ, और पट्टियों पर छोटे-छोटे फूल खुदे हुए। उस पर रस्सी बँधी थी, पर रस्सी उतनी ही पुरानी थी जितना संदूक — जगह-जगह से उधड़ी, रेशे बाहर निकले हुए।

"ये…" काजल ने धीरे से कहा, "ये तो हमारे घर में ही था।"

"हमारे घर के अंदर एक कमरा था जो हमने कभी नहीं देखा," मैंने कहा। "तो ये भी हमारा ही है।"

संदूक के बगल में, दीवार से टिकी, एक तस्वीर थी। लकड़ी के फ्रेम में, काँच टूटा हुआ, और उस पर धूल की इतनी मोटी परत कि पहले तो कुछ दिखा ही नहीं।

मैंने अपनी आस्तीन से उसे पोंछा। धूल गई, और काँच के नीचे से चेहरे बाहर आए।

काजल ने लालटेन करीब की।

और मेरा हाथ वहीं रुक गया।

तस्वीर में तीन आदमी खड़े थे।

बीच में — जगदीश यादव। मेरे दादा। मैंने उनकी कोई तस्वीर नहीं देखी थी, पर पहचान लिया। उसी चेहरे की बनावट मेरे पापा के चेहरे पर है, और मेरे चेहरे पर भी कहीं छिपी बैठी है। वो जवान थे। मूँछें घनी, बाल घने, कमीज़ की बाँह मोड़ी हुई, और आँखों में वो हँसी जो किसी बात को गंभीरता से नहीं लेती।

उनके दाईं तरफ़ — एक जवान आदमी, दुबला, चश्मा पहने, और कान पर पेंसिल खोंसी हुई।

"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। "ये… ये उस्ताद अली बक्श हैं ना?"

हाँ। दाढ़ी नहीं, झुर्रियाँ नहीं, झुकी कमर नहीं। पर वो चश्मा, वो कान पर टँगी पेंसिल, वो आदत — ये उस्ताद ही थे। जवान उस्ताद।

और बाईं तरफ़ —

मैंने तस्वीर को और करीब लाया।

एक तीसरा आदमी। लंबा, साफ़ चेहरा, सफ़ेद कुर्ता, और हाथ में एक छड़ी जैसी पतली चीज़। उसकी उम्र उस वक़्त तीस के आसपास रही होगी। और उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो दिखावे की नहीं, आदत की थी।

"ये कौन है?" काजल ने पूछा।

मैंने बहुत देर तक देखा। फिर मैंने कहा, "सलीम।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"सलीम बक्श?" काजल ने कहा, जैसे यक़ीन न आ रहा हो।

"हाँ। जवान सलीम।"

माँ ने तस्वीर की तरफ़ देखा और उनके होंठ सिकुड़ गए। पापा ने देखा ही नहीं। उन्होंने नज़र फ़र्श पर टिका दी थी, जैसे तस्वीर में आग लगी हो।

और तीनों के बीच में —

मैंने देखा और मेरा सीना एक झटके से ठंडा हो गया।

तस्वीर में साइकिल खड़ी थी।

काली साइकिल। हैंडल पर हाथ रखे हुए। और हैंडल के बीच में वो छोटी, गोल, पीतल की घंटी — जैसे बिल्कुल मेरी घंटी। एक ही आकार, एक ही रंग, एक ही पुरानी चमक।

मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया।

और घंटी जेब में ठंडी नहीं थी। वो गरम थी। गरम, जैसे किसी ने उसे उँगलियों में दबाकर रखा हो।

"उस्ताद," टिंकू ने मेरी आस्तीन खींची। "वहाँ कुछ और भी है।"

मैंने लालटेन का रुख़ किया।

संदूक के बगल में, दीवार के कोने में, फ़र्श पर एक छोटा लकड़ी का बक्सा रखा था।

बहुत छोटा। मेरी हथेली भर का। ऊपर से ढक्कन, जिस पर कोई नक्काशी नहीं, बस एक पतली लकीर। और बक्से के ऊपर, कपड़े का एक मैला टुकड़ा पड़ा था, जो उस पर चिपक गया था, जैसे बरसों में उससे जुड़ गया हो।

मैंने कपड़ा हटाया। बक्से पर धूल जमी थी, और मैंने उसे उँगली से पोंछा।

और फिर मैं वहीं बैठ गया।

क्योंकि बक्से का आकार…

मैंने जेब से घंटी निकाली। मेरी घंटी। जिसके नीचे का हिस्सा थोड़ा चौड़ा है, और जिस पर छोटे फूल खुदे हैं, और जिसके अंदर की जीभ अब भी महसूस होती है जब वो हिलती है।

बक्से का ऊपरी हिस्सा बिल्कुल वैसा ही था। गोल, थोड़ा चौड़ा, फूलों जैसा उभार।

मैंने हाथ बढ़ाया। डर रहा था, ये मैं साफ़ कह सकता हूँ। मेरे हाथ से औज़ार गिरते नहीं, पर उस वक़्त मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, जैसे पहली बार किसी टूटे हुए पहिये की तीलियाँ जोड़ रहा होऊँ।

मैंने बक्से का ढक्कन उठाया।

और अंदर देखा।

अंदर कपड़े की परत बिछी थी, जो अब पीली पड़ चुकी थी। और उस पर एक घंटी रखी थी।

दूसरी घंटी।

मेरी घंटी की जुड़वाँ। एक ही आकार, एक ही पीतल, एक ही फूलों वाली नक्काशी।

पर इसकी जीभ नहीं थी।

अंदर का हिस्सा खोखला था, और जहाँ जीभ लटकनी चाहिए थी, वहाँ बस एक छोटा-सा टूटा हुआ छल्ला बचा था, जैसे किसी ने जीभ को ज़ोर से खींचकर निकाल दिया हो।

"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "ये बजेगी नहीं?"

"नहीं बजेगी," मैंने कहा। "इसकी जीभ ही नहीं है।"

"तो फिर ये…"

"ये आधी है," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजीब लगी।

और तभी —

मेरी जेब में घंटी काँपी।

नहीं, काँपी नहीं। वो हिली। जैसे किसी ने उसे छुआ हो। और लकड़ी के बक्से में रखी वो बिना जीभ वाली घंटी भी हिली।

मैंने अपनी आँखों से देखा।

वो धीरे-धीरे हिल रही थी। बक्से के अंदर, कपड़े की परत पर, बिना किसी हाथ के। एक हल्की कँपकँपी, जैसे ठंड लगी हो। और उसकी खोखली देह से एक आवाज़ निकल रही थी — नहीं, आवाज़ नहीं, कुछ और। एक ऐसी सनसनाहट जो मेरी छाती में पहुँच रही थी।

काजल पीछे हट गई। टिंकू ने मेरी कमर पकड़ ली।

और मेरी घंटी — जो मेरी जेब में थी, जिसे मैंने बीसियों बार बजाया था, जिस आवाज़ पर मैंने गली की आधी सच्चाइयाँ सुनी थीं —

वो खुद बज उठी।

टिंग।

एक बार। छोटी-सी आवाज़, पर उस कमरे में वो इतनी तेज़ लगी जैसे दीवारें हिल गई हों।

और फिर तंत्र बोला।

"ये मेरा टूटा जोड़ा है।"

मैंने घंटी निकाली। वो मेरी हथेली में गरम थी, बहुत गरम, और उसका पीतल अब भी काँप रहा था।

"क्या कहा?" मैंने धीरे से पूछा।

"ये मेरा टूटा जोड़ा है," तंत्र ने दोहराया। आवाज़ वही थी, पर इसमें कुछ नया था — जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो, या जैसे कोई बहुत दिनों से बोल नहीं पाया हो।

"मतलब?"

"मैं आधा हूँ," तंत्र ने कहा। "वो आधी है।"

मैंने बक्से में देखा। वो बिना जीभ वाली घंटी अब भी हिल रही थी, धीरे-धीरे, कम होती हुई, जैसे रो रही हो।

"तो इसे जोड़ दे," मैंने कहा। "तू जोड़ता है ना सब कुछ? तो इसे जोड़।"

तंत्र चुप रहा।

"सुन रहा है? मैंने पूछा—"

"दो खानदान," तंत्र ने कहा।

मैं रुका।

"क्या?"

"इसे जोड़ने के लिए दो खानदान सच में माफ़ी माँगेंगे," तंत्र ने कहा। "झूठी माफ़ी से ये जुड़ेगी तो टूट जाएगी। और जुड़कर टूटी चीज़ के अंक दोगुने कटते हैं। ये तुझे पता है।"

मैंने घंटी को हल्के से दबाया।

"कौन से दो खानदान?"

पर तंत्र चुप हो गया।

"अरे—"

चुप्पी।

मैंने पीछे देखा।

पापा पीछे हट गए थे।

नहीं, पीछे नहीं हटे थे — वो दरवाज़े की चौखट तक गए थे, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके सामने से कोई परदा खींच दिया हो। उनकी आँखें उस लकड़ी के बक्से पर टिकी थीं और उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।

"पापा?" काजल ने कहा।

"पापा, क्या हुआ?" मैंने पूछा।

और फिर पापा ने कुछ कहा। इतना धीमे कि मुझे लगा हवा ने कहा है।

"ये चीज़ यहाँ नहीं होनी चाहिए थी।"

कमरे में सन्नाटा।

"क्या बोले?" मैंने कहा।

पापा ने इस बार अपनी आवाज़ ऊँची की, और उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो डर से नहीं, गुस्से से आता है।

"ये चीज़ यहाँ नहीं होनी चाहिए थी," उन्होंने कहा। "मैंने इसे… मैंने इसे अपनी आँखों से बाहर जाते देखा था। मैंने सोचा था ये गई। मैंने सोचा था इस घर में अब ये नहीं है।"

"पापा, ये क्या है?" मैंने पूछा।

"ये वो चीज़ है," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, "जिसकी वजह से उस्ताद ने पचास साल तक अपने भाई से बात नहीं की।"

माँ ने कुर्सी पर हाथ रखा और धीरे से बोलीं, "शंकर, अब बैठ जाओ।"

"मैं नहीं बैठूँगा," पापा ने कहा, और ये पहली बार था जब मैंने उन्हें इतनी साफ़ आवाज़ में माँ के आगे कुछ कहते सुना।

"तो खड़े रहो," माँ ने कहा, "पर बात करो। बाईस साल से तुम बात कर रहे हो तो आज पूरी करो।"

मैंने घंटी जेब में डाली और बक्से के पास बैठ गया। मेरे घुटनों पर धूल थी। मेरे हाथों में ग्रीस का पुराना निशान था और उस पर अब धूल भी चढ़ गई थी, जैसे मैं बिना कुछ किए ही कोई काम कर रहा हूँ।

"टिंकू," मैंने कहा।

"हाँ उस्ताद?"

"आँगन से पानी ला। एक गिलास टेबल पर रखना जहाँ उस्ताद बैठे हैं।"

"क्यों?"

"क्योंकि अब उन्हें यहाँ आना पड़ेगा," मैंने कहा।

टिंकू समझ गया। वो दौड़कर बाहर गया। सानिया ने पीछे से कहा, "मैं भी चलूँ?" और मैंने कहा, "हाँ, और उस्ताद से कह देना — दरवाज़ा खुला है।"

बच्चे भाग गए।

अंदर माँ, पापा, काजल और मैं रह गए।

मैंने बक्से को गोद में उठाया और उसे उजाले में लाया। घंटी की टूटी जीभ का छल्ला बहुत महीन था, और उस पर ज़ंग की एक परत थी जो पीतल को खा रही थी।

"पापा," मैंने कहा, "आपने कहा कि आपने इसे अपनी आँखों से बाहर जाते देखा था।" मैंने उनकी तरफ़ देखा और इस बार मैंने अपनी आवाज़ में कोई मज़ाक नहीं रखा, क्योंकि उस कमरे में मज़ाक की जगह नहीं थी। "कब? किसने ले जाते देखा?"

पापा ने अपना चश्मा उतारा। उन्होंने उसे साफ़ किया, फिर वापस पहना, फिर उतारा। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था और टेप की चिपचिपाहट अब कम हो चुकी थी।

"उसी रात," पापा ने कहा। "जिस रात घंटी टूटी थी।"

मेरा हाथ रुक गया।

"घंटी टूटी थी?" काजल ने कहा। "मतलब…"

"घंटी तोड़ी गई थी," पापा ने कहा। "आपस में नहीं टूटी। किसी ने तोड़ी।"

मैंने बहुत धीरे साँस ली।

"पापा," मैंने कहा। "आपने ये बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई?"

"क्योंकि तू छोटा था," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो सालों से जमा हो। "फिर तू बड़ा हो गया, पर मैं डरपोक रह गया।"

माँ ने कुछ कहा, धीरे से, इतने धीरे कि मैंने सिर्फ़ आख़िरी शब्द पकड़े — "अब बहाने नहीं।"

और तभी बाहर गली से एक आवाज़ आई।

ठंडी आवाज़। साफ़ आवाज़। इतनी साफ़ कि लगा किसी ने कमरे के अंदर ही बोला हो।

"शंकर यादव।"

पापा सन्न रह गए।

"शंकर यादव, दरवाज़े के सामने आ जाओ।"

मैं उठा। मैंने बक्सा काजल के हाथ में दिया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा — उनकी पकड़ मज़बूत थी, जैसे किसी पुरानी आदत से — और फिर छोड़ दिया।

गली में धुंध थी। पीपल की छाया में दो लालटेन जल रही थीं, एक हमारे आँगन की और एक गुमटी की। और उन्हीं के बीच, हमारे घर के सामने खड़ा था — सलीम बक्श।

सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। काली अंगूठी। हाथ पीछे बँधे। और चेहरे पर वो ठंडी मुस्कान जो सुबह अस्पताल में भी थी, पर इस बार उसमें कुछ और था। कोई दर्द। कोई पुराना हिसाब।

उसके पीछे, थोड़ी दूर, उस्ताद अली बक्श की कुर्सी थी जिस पर वो अब भी बैठे थे। टिंकू उनके पास खड़ा था, हाथ में पानी का गिलास लिए, और वो गिलास काँप रहा था।

"तुमने दरवाज़ा खोल दिया," सलीम ने कहा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसकी आवाज़ में सिर्फ़ एक लंबी थकान थी, जैसे कोई बहुत दूर से चलकर आया हो और यह देखकर थक गया हो कि उसकी मेहनत बेकार गई।

"अब तुमने वो दरवाज़ा खोल दिया जो मैं बाईस साल से बंद रखना चाहता था।"

मैंने कदम बढ़ाया। मेरे पीछे पापा आए, माँ की कुर्सी काजल ने धकेली, और माँ सीधी बैठकर सामने देख रही थीं।

"सलीम साहब," मैंने कहा। मेरी आवाज़ शांत थी, ये मुझे खुद अच्छी लगी। "दरवाज़ा मैंने नहीं खोला। चाबी ने खोला। और चाबी माँ के पास थी।"

सलीम ने माँ की तरफ़ देखा।

और माँ ने उसकी नज़र से नज़र मिलाई। ऐसे, जैसे वो बाईस साल से इस पल का इंतज़ार कर रही हों।

"और मैंने वो दरवाज़ा बंद क्यों रखना चाहा था," सलीम ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में मुस्कान भी नहीं थी, "वो तुम अगले दो मिनट में खुद समझ जाओगे।"

उसने अपना हाथ पीछे से आगे किया।

और उसकी हथेली में एक चीज़ थी।

एक घंटी।

बहुत छोटी, बहुत पुरानी, और उसकी जीभ… वो जीभ उसके हाथ में थी।

मेरी जेब में घंटी ज़ोर से काँपी।

और तंत्र ने कहा, इतने धीरे कि मुझे लगा मैंने खुद सोचा है —

"अब सारे खानदान सामने आए। अब सच बोलो।"

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