The Mysterious Bell – Chapter 131: jodne wala mistri hissa 014 ep131-140
उस रात मैंने आँख नहीं लगाई।
माँ की बात कान में रह गई थी — आज रात इस डिब्बे को यहीं छोड़। और मैंने छोड़ तो दिया, पर मेरा हाथ उस पर से नहीं हटा। दीये की लौ धीरे-धीरे छोटी होती गई, फिर एक बार लड़खड़ाई, फिर बुझ गई। अंधेरे में डिब्बे की परछाईं दीवार पर नहीं थी। मैंने आँखें मलीं, दुबारा देखा, तब भी नहीं थी। जैसे वो बैठकर सुन रहा हो कि मैं कब सोता हूँ।
टिंकू फ़र्श पर, ट्रंक से सिर टिकाकर सो गया था। उसके हाथ में वही छोटा पेचकस था जिससे रात को उसने चार पेंच खोले थे। सोते में भी उसकी उँगलियाँ उसे पकड़े हुई थीं, जैसे कोई चीज़ भाग न जाए।
रात कटती ही नहीं थी। दुकान के पीछे वाली गली से कभी कुत्ता भौंकता, कभी किसी के घर का पानी का नल टपकता। तीन बजे पीपल की तरफ़ से एक झोंका आया, दरवाज़े का कुंडा हिला, और मुझे लगा कोई पूछ रहा है — अंकुश, तैयार है?
मैं तैयार नहीं था। मैं सिर्फ़ जाग रहा था।
चार बजे काजल उठी। अस्पताल जाने की तैयारी में उसने अपनी किताबें बैग में रखीं, फिर निकालीं, फिर रखीं। मैंने कहा, "काजल, सो ja थोड़ी देर।" उसने मुझे देखा और बोली, "भाई, तुमने सोया भी?" मैंने कहा, "मैं सोच रहा था।" वो हँसी, "सोचना सोने से ज़्यादा थका देता है, ये तो मुझे अस्पताल में पता चला।"
पाँच बजे माँ के चूल्हे की आवाज़ आई। घर में चाय की खुशबू फैली। यही मेरे घर की सबसे सच्ची घड़ी है — पाँच बजे। न किसी से झगड़ा, न कोई काग़ज़, न कोई अंगूठा। बस चूल्हा, चाय और माँ की बड़बड़।
और फिर छह बजे पीपल की तरफ़ से मस्जिद की आवाज़ आई, उसके पीछे गली के मंदिर की घंटी, और उसके पीछे कौवों का शोर। हमारी गली में सुबह किसी एक धर्म से नहीं आती। सब मिलकर आती है, जैसे गली खुद अपनी नींद खोल रही हो।
टिंकू अचानक उठ बैठा।
"उस्ताद!"
"मरा नहीं हूँ," मैंने कहा।
"मैंने सपना देखा," वो हाँफते हुए बोला, "डिब्बे में कोई मेरा नाम बोल रहा था। बहुत धीरे, जैसे मुँह बंद करके बोल रहा हो।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा। "क्या बोल रहा था?"
वो एक पल रुका। फिर बोला, "बोल रहा था — टिंकू, तू मुझे खोल दे। तेरे उस्ताद के हाथ छोटे हैं।"
मैंने उसके सिर पर हल्का हाथ मारा। "तेरे दिमाग़ में डिब्बा ही घूम रहा है।"
"तो फिर खोलो न," उसने कहा, "सुबह हो गई।"
मैंने खिड़की से बाहर देखा। सूरज निकला नहीं था, पर आसमान का रंग बदल चुका था — नीला नहीं, हल्का दूधिया। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं, और चबूतरी पर कोई बैठा था। इतनी सुबह कौन? पर मैंने ध्यान नहीं दिया।
"लाओ," मैंने कहा।
डिब्बा कमरे के बीच में पड़ा था, बोरी हटी हुई। सफ़ेद टेम्पो वाले ने उसे इतनी आसानी से भेज दिया था, जैसे कोई मरी हुई चीज़ घर लौटा रहा हो।
टिंकू ने ढक्कन पर हाथ रखा। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"पहले सुन ले," मैंने कहा।
"क्या?"
"जो अंदर है, वो चीज़ नहीं हो सकती। चीज़ पूछती नहीं है। चीज़ इंतज़ार नहीं करती है।"
टिंकू ने गर्दन हिलाई, जैसे समझ गया हो, पर उसकी आँखें ढक्कन पर ही टिकी थीं।
ऊपरी ढक्कन के कोने पर सीसे की मोहर थी। छोटी, गोल, ऊपर कंपनी की मोहर दबी हुई। पर वो मोहर अब आधी टूटी थी, और मोहर के नीचे की धातु पर चार-पाँच पतली लकीरें थीं।
मैंने उन लकीरों को उँगली से छुआ।
लकीरें चिकनी थीं। इतनी चिकनी कि उन पर ज़ंग खड़ी होने का वक़्त ही नहीं मिला था। यानी ये पुरानी नहीं थीं। ये कुछ दिनों की थीं।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "ये ढक्कन पहले भी कोई खोल चुका है।"
मेरी साँस थोड़ी भारी हुई। "हाँ।"
"तो फिर जो अंदर है, वो…"
"वो वही है जो उसने छोड़ा," मैंने कहा। "या जो उसने छोड़ना चाहा।"
टिंकू ने पेचकस ढक्कन के किनारे पर लगाया। "कहीं मैं ही तो नहीं था, उस्ताद? रात में नींद में मैंने…" उसकी आवाज़ टूट गई।
मैंने उसका कंधा थामा। "अगर तू नींद में ही इतना काम कर सकता है, तो तेरा तो पूरा करियर है। खोल।"
ढक्कन ज़रा-सा चरचराया, फिर खुला।
अंदर से कोई बदबू नहीं आई। मैंने इंतज़ार किया कि गंध आएगी — सीलन, ज़ंग, या वो पुरानी बंद गंध जो डिब्बों से आती है। पर नहीं। अंदर हवा साफ़ थी, जैसे अभी-अभी कोई इसे खोलकर हवा कर गया हो।
सबसे ऊपर अख़बार की एक तह थी। मैंने उसे खोला। अख़बार पर कोई बड़ी खबर नहीं थी — सिर्फ़ एक तारीख़, पाँच महीने पुरानी, और एक कोने पर चाय का छल्ला।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "अख़बार पाँच महीने पुराना है, पर ढक्कन के पेंच में तेल नया है।"
"तू ठीक जा रहा है," मैंने कहा।
"कहाँ?"
"मेरे साथ। नीचे।"
अख़बार के नीचे जूट का एक टुकड़ा था। जूट के नीचे सफ़ेद कपड़ा — मोटा खादी जैसा, पर थोड़ा पीला पड़ा हुआ। और उस कपड़े में कुछ लिपटा हुआ।
लिपटे हुए आकार को देखकर टिंकू तुरंत बोला, "दूसरा पेचकस!"
मैंने कपड़े को उठाया। वज़न बहुत कम था। इतना कम कि मुझे अपनी ही उँगलियों पर शक हुआ। पेचकस का आकार था, पेचकस का कपड़ा था, पर वज़न गायब था। जैसे किसी ने पेचकस की लाश भेजी हो और अंदर से सब निकाल लिया हो।
मैंने कपड़ा खोला।
अंदर एक छोटा, गहरा लोहे का टुकड़ा था।
टिंकू ने गर्दन ऊपर की। "ये क्या है? चम्मच का टूटा हत्था?"
मैंने टुकड़ा उठाया। हथेली में रखकर देखा। ठंडा था — इतना ठंडा कि जैसे अभी भी अंदर कहीं पानी हो। रंग पर ज़ंग नहीं थी, सिर्फ़ एक तरफ़ भूरे रंग की पतली पपड़ी थी। आकार उँगली से थोड़ा ही बड़ा था, बीच से हल्का मुड़ा हुआ, जैसे किसी ने उसे ज़ोर से दबाया हो। एक कोने पर छोटा-सा छेद था। दूसरे कोने पर एक खाँचा — इतना पतला कि नाखून ही जाए।
"इसकी गंध ले," मैंने टिंकू को थमाया।
उसने सूँघा। "मिट्टी… और कुछ, जैसे गुमटी का स्टोव जब बुझता है।"
"मिट्टी का तेल," मैंने कहा। "और पीतल की गंध।"
"पर ये तो लोहा है," टिंकू ने कहा।
"तू अभी भी लोहे को पहचान रहा है," मैंने कहा, "मैं पुरानी गंध को पहचान रहा हूँ।"
मैंने उसे अपनी हथेली पर घुमाया। बाहर से ये किसी चीज़ का बेकार टुकड़ा लगता है। पर मैं साइकिल मिस्त्री हूँ। मैंने ज़िंदगी में हज़ार टुकड़ों को हाथ लगाया है। किसी टुकड़े पर ज़ंग होती है, किसी पर खुरचन। इस टुकड़े पर खुरचन एक जगह नहीं थी — चारों तरफ़ थी, हल्की, बराबर। जैसे इसे बहुत साल तक किसी छोटे बक्से में रखा गया हो, और वो बक्सा इतना ठीक-ठीक बना हो कि टुकड़ा हिले भी नहीं।
जिस चीज़ को कोई नहीं हिलाता, वो चीज़ अंदर से खटकती नहीं। पर आज सुबह ये डिब्बे के ऊपरी ढक्कन के नीचे खटखटा रही थी।
"टिंकू," मैंने कहा, "ये टुकड़ा घंटी के पास रख।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लग रहा है घंटी इसे पहचानती है।"
टिंकू ने उसे तीन उँगलियों में पकड़ा और घंटी के पास ले गया। घंटी मेज़ पर रखी थी, दीये की जली हुई बाती के बगल में। जैसे ही टुकड़ा घंटी के चार अंगुल के दायरे में आया, घंटी के पीतल पर मुझे कुछ दिखा — नहीं, कुछ नहीं दिखा। मुझे महसूस हुआ। जैसे कान के अंदर हवा का दबाव बदलता है।
टिंकू ने घंटी को उठाया। मेरी साँस रुक गई — क्योंकि उसके हाथ में घंटी बजती नहीं, ये मैं जानता हूँ। तंत्र सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानता है।
पर चीज़ शरीर नहीं पहचानती। चीज़ सिर्फ़ आकार पहचानती है।
और टिंकू ने वो टुकड़ा घंटी के उस छोटे-से मुँह में फँसा दिया जो घंटी के नीचे, फूल के ठीक बीच में था।
मुझे रोकना चाहिए था। मैंने हाथ बढ़ाया भी, पर देर हो चुकी थी।
आवाज़ पहली बार में नहीं आई।
पहले आया — चुप्पी। ऐसी चुप्पी जिसमें आदमी अपनी धड़कन सुन सके।
फिर घंटी बोली। पर बोली नहीं — फटी। जैसे दो आवाज़ें एक साथ ज़ोर लगाकर किसी टूटे दरवाज़े को खोल रही हों। एक आवाज़ पीतल की, साफ़, ऊँची। दूसरी आवाज़ लोहे की, मोटी, चरचराती। दोनों एक ही समय पर, और दोनों एक-दूसरे को काट रही थीं।
"दो…"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया था। इतना डरा हुआ कि वो अपनी छाया से भी चिपक जाना चाहता था।
"उस्ताद," वो फुसफुसाया, "मैंने नहीं किया… मैंने सिर्फ़…"
"हिलना मत," मैंने कहा।
मेरे कान में घंटी ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो मैं जानता हूँ। इसमें एक चीज़ जुड़ गई थी, जैसे किसी बच्चे की पहाड़ी आवाज़ के साथ बूढ़े की खाँसी आ जाए।
"दो… आधी… जीभ…"
और फिर मेरा सिर घूम गया।
सच में घूमा। कमरा मेरी आँखों के सामने टेढ़ा झूला, मेज़ का कोना मेरी तरफ़ झुक आया, ट्रंक बड़ा हो गया, दरवाज़ा दूर चला गया। मेरे घुटने गए, और मैं बैठकर नहीं गिरा — मैं जैसे पानी में उतर गया।
"उस्ताद!" टिंकू ने घंटी छोड़ दी। वो टुकड़ा घंटी में फँसा ही रहा।
मैंने आँखें बंद कीं। कान में बज़ रहा था — "दो… आधी… जीभ…" और उसके पीछे एक और शब्द, जो इतना धीमा था कि लगा किसी ने मेरे कंधे के पीछे से फुसफुसाया हो।
"कड़ी… काटी…"
फिर चुप हो गई।
पूरी घंटी चुप हो गई। इतनी चुप कि उस चुप्पी से मुझे डर लगा। मैंने अपना हाथ टिंकू के कंधे पर रखा, दो बार साँस ली, और आँखें खोलीं।
कमरा जस का तस था। दीवार पर दरार वही थी। मेज़ पर औज़ार वहीं थे। और बाहर गली की आवाज़ें चल रही थीं — किसी की चप्पल, किसी का बर्तन, किसी की खाँसी।
दुनिया को इस बात का पता भी नहीं चला।
"निकाल," मैंने कहा।
टिंकू के हाथ काँप रहे थे। उसने टुकड़ा खींचा, पर वो अंदर फँस गया था। वो और खींचने लगा — तभी दरवाज़े की तरफ़ से पाँव पड़े। तेज़ पाँव। कोई दौड़ा आ रहा था।
दरवाज़ा खुला और उस्ताद अली बक्श अंदर आए।
उनका मुँह मुँह नहीं लग रहा था। उनके हाथ में कैंची थी, जो सुबह उन्हें दुकान में रखनी चाहिए थी, और उनका चश्मा, जो सुबह उनकी नाक पर होना चाहिए था, उनके हाथ में लटक रहा था।
वो एक पल दरवाज़े पर खड़े रहे, हाँफते हुए। उनकी आँखों ने पहले मुझे देखा, फिर टिंकू को, फिर टिंकू के हाथ में फँसी घंटी को।
और फिर वो टिंकू के पास पहुँचे। घंटी उनके हाथ में ली — घंटी उनके हाथ में नहीं बजी, हाँ, मैं जानता हूँ — और उन्होंने उस छोटे टुकड़े को देखा।
उसके देखते ही उनका चेहरा पीला पड़ गया।
मैंने उस्ताद को ज़िंदगी में कई बार देखा था — मेज़ पर झुके हुए, मशीन पर झुके हुए, मेरे पिता की चुप्पी पर गम में बैठे हुए। पर ऐसे नहीं देखा था। उनका चेहरा ऐसे पीला पड़ता है जैसे कोई चीज़ अंदर से खून खींच ले।
उन्होंने घंटी और टुकड़ा मेज़ पर रख दिए, और फिर फ़र्श पर बैठ गए। बूढ़े आदमी का फ़र्श पर बैठना — इसमें कुछ होता है। जो आदमी सत्तर साल सख्त कुर्सी पर बैठकर काम करता है, वो फ़र्श पर इसलिए बैठता है क्योंकि उसके पैर उसे नहीं पकड़ पा रहे।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपको किसी ने कुछ कहा? आप ऐसे…"
"चुप।" उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
हम दोनों चुप हो गए।
फिर उन्होंने आँखें खोलीं और मुझे देखा। उनकी आवाज़ जब निकली तो बहुत सूखी थी।
"अंकुश, मुझे बता, जब इसने टुकड़ा अंदर फँसाया, तो तुझे क्या सुनाई दिया?"
"दो… आधी… जीभ," मैंने कहा। "और फिर कुछ — कड़ी काटी।"
उस्ताद ने टिंकू की तरफ़ देखा। "और तुझे?"
"मुझे कुछ नहीं," टिंकू ने घबराकर कहा। "सिर्फ़ ये आवाज़ आई जैसे दो घंटियाँ एक साथ बजीं, और उनमें से एक फट गई।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। बहुत धीरे। जैसे वो किसी पुरानी बात को अपने अंदर हाँ कह रहे हों।
"ये कबाड़ नहीं है," उस्ताद ने कहा।
"मुझे पता है," मैंने कहा। "कबाड़ से मेरा सिर नहीं घूमता।"
"ये जोड़ तंत्र की पुरानी कड़ी का हिस्सा है," उन्होंने कहा। "और सुन ले — ये कोई आम कड़ी नहीं है। ये वो कड़ी है जो दोनों घंटियों को जोड़ती थी।"
कमरे में एक पल के लिए मेरी अपनी साँस की आवाज़ आई।
"मतलब…" मैंने कहा।
"मतलब, अंकुश," उस्ताद ने कहा, "रात में जो मैंने कहा — दो घंटियाँ, एक साँचा, एक फूल, एक जीभ वाली, एक बिना जीभ वाली — उसमें एक चीज़ छूट गई थी। एक तीसरा टुकड़ा भी था। ये। दो घंटियाँ कभी खुद से एक नहीं होतीं। उनके बीच यही छोटी कड़ी बैठती थी। इसी में दोनों की जीभ की धुरी टिकती थी। इसके बिना दोनों अलग-अलग बजेंगी। और अलग-अलग बजने वाली घंटियाँ — किसी काम की नहीं।"
मैंने टुकड़े को उठाया। अब वो पहले से भारी लग रहा था। या मेरा हाथ कमज़ोर हो गया था।
"ये रणवीर के डिब्बे में कैसे आया?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने अपना चश्मा जेब में रखा, और बहुत सीधे से कहा, "ये आया नहीं है, अंकुश। इसे जान-बूझकर भेजा गया है।"
"कौन भेजेगा? मनोज को तो अपने ही डिब्बे के अंदर का पता नहीं था। वो तो तल्ले की आवाज़ से ही काँप गया था।"
"मनोज टेम्पो वाला है," उस्ताद ने कहा, "टेम्पो वाले को कभी माल का पता नहीं होता। उसे सिर्फ़ सफ़र का पता होता है।"
"तो भी क्यों भेजा?" मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ अब भी हल्के काँप रहे थे। "अगर किसी को पता है कि ये टुकड़ा क्या है, तो वो इसे अपने पास रखता। किसी की दुश्मनी में नहीं देता। इस टुकड़े से तो हमारा तंत्र पूरा हो सकता है।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "और यही वजह है कि उसे भेजा गया है।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद जी, मुझे समझ नहीं आया।"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ दया से देखा, और मुझे लगा इस वक़्त वो टिंकू से ज़्यादा मुझसे बात कर रहे हैं।
"जो चीज़ तुम्हें भेजी जाए," उस्ताद ने कहा, "वो तुम्हें दी नहीं जाती। वो तुम्हारे हाथ में रखकर देखी जाती है। अगर तुम उसे पहचान लो, तो भेजने वाले को पता चल जाता है कि तुम कितना जानते हो। और अगर तुम उसे कबाड़ समझकर फेंक दो, तो उसे पता चल जाता है कि तुम कुछ नहीं जानते।"
"यानी ये तोहफ़ा नहीं," मैंने कहा, "ये सवाल है।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "और हमने सुबह-सुबह इसका जवाब दे दिया।" उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा। "हमने उसे अंदर फँसा दिया। अब वो जानता है कि हमने इसे पहचान लिया है।"
मेरे मुँह का स्वाद कड़वा हो गया।
मैं दरवाज़े तक गया और बाहर गली में देखा। सुबह की धूप अब पीपल की जड़ तक पहुँच रही थी। चबूतरी पर वही अनजान बुज़ुर्ग बैठे थे जिन्हें मैंने छह बजे देखा था। दूर शबनम आपा की गुमटी का स्टोव जल रहा था, धुआँ सीधा ऊपर जा रहा था। सब कुछ आम था। पर मुझे लगा कि गली की हवा में कुछ है — जैसे किसी ने घर में आकर कुछ बदल दिया हो और वापस चला गया हो।
मैं लौटा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ? आपने रात में कहा था कि आपको नहीं पता था कि जीभ कब अलग हुई। पर ये कड़ी?"
उस्ताद एक पल रुके।
"मैं यही सोचता रहा, पचास साल," उन्होंने कहा। "मैंने हमेशा सोचा कि हमारे बीच सिर्फ़ जीभ गई। मैंने कभी ये नहीं सोचा कि जिस चीज़ पर जीभ टिकती थी, वो भी गई। क्योंकि कड़ी गई होती, तो घंटी की आवाज़ बदल जाती। और मेरी घंटी की आवाज़…" उनकी आवाज़ रुक गई। "मेरे घर वाली घंटी की आवाज़ पचास साल से नहीं बदली।"
"तो फिर ये कड़ी…"
"ये कड़ी हमारी नहीं है," उस्ताद ने कहा।
मैं सकपका गया। "मतलब?"
"मैंने आज से पहले ये टुकड़ा नहीं देखा," उस्ताद ने कहा। "हमारी दोनों घंटियाँ एक साँचे की थीं। पर ये टुकड़ा… देख, इसका छेद थोड़ा बड़ा है। और यहाँ, इस किनारे पर, जो खाँचा है — हमारी घंटी की कड़ी में खाँचा नहीं था। समझा?"
मैंने घंटी से टुकड़ा निकाला और उसे दोबारा देखा। अब मुझे दिख रहा था। छेद किनारे से ज़रा-सा बड़ा था, जैसे किसी और जीभ के लिए बना हो।
"तो ये किसका है?" मैंने पूछा।
"ये किसी ऐसे जोड़ का हिस्सा है," उस्ताद ने धीरे से कहा, "जो हमारे जोड़ से भी पुराना है।"
टिंकू ने गला साफ़ किया। "उस्ताद जी, माफ़ करना, पर आपने अभी कहा कि जोड़ तंत्र एक ही था। दो घंटियाँ, एक साँचा। अब पुराना जोड़ कहाँ से आ गया?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ ऐसे देखा जैसे पहली बार देखा हो। फिर बहुत धीरे कहा, "बेटा, तू आज सुबह से तीसरा सवाल पूछ रहा है जिसका जवाब मेरे पास नहीं है।"
टिंकू का चेहरा उतर गया। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "ये अच्छी निशानी है," मैंने कहा। "अब तक सिर्फ़ मैं सवाल पूछता था।"
मैंने टुकड़े को कपड़े में लपेटा और मेज़ पर रख दिया। फिर मैं बैठ गया — उस्ताद के सामने, फ़र्श पर।
"उस्ताद," मैंने कहा, "अब वो बात जो आप मुझे नहीं बता रहे हैं।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें बूढ़ी थीं, पर इस वक़्त उनमें डर नहीं था। थकान थी। जो आदमी पचास साल से किसी बात की तरफ़ पीठ किए बैठा हो, और अब उसे पता चले कि वो बात उसके पीछे ही नहीं थी, उसके चारों तरफ़ थी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं तुझे डराना नहीं चाहता। पर आज सुबह दस बजे पीपल पर जो चार आदमी रजिस्टर खोलेंगे, उनमें से एक भी ये नहीं जानता कि ये टुकड़ा क्या है।"
"और जो जानता है?"
"जो जानता है," उस्ताद ने कहा, "वो इस टुकड़े को भेजकर खुद पीछे बैठा है, और देख रहा है कि हम क्या करते हैं।"
मैंने मेज़ पर पड़ी घंटी उठाई। वो ठंडी थी। फूल वही था, लकीर वही थी। मैंने उसे कान के पास लाया।
कुछ नहीं बोली।
"उस्ताद," मैंने कहा, "जब मैंने इसे अंदर फँसाया, तो घंटी ने कहा — दो, आधी, जीभ। और फिर कहा — कड़ी काटी। इसका मतलब?"
उस्ताद ने बहुत देर सोचा। इतनी देर कि बाहर शबनम आपा की गुमटी से किसी ने आवाज़ दी, "अंकुश भाई, चाय भेजूँ?" और मुझे जवाब देने की हिम्मत नहीं हुई।
फिर उस्ताद ने कहा, "दो — यानी दो जोड़। हमारा और कोई पुराना। आधी जीभ — यानी जो जीभ सलीम के पास है, वो भी पूरी नहीं है। और कड़ी काटी — यानी किसी ने दोनों जोड़ों को एक-दूसरे से अलग किया था। जान-बूझकर।"
"किसने?"
"जिसने ये टुकड़ा पचास साल संभालकर रखा," उस्ताद ने कहा। "और आज हमें भेज दिया।"
टिंकू ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गया। फिर बोला, "उस्ताद जी, अगर उसके पास ये टुकड़ा था, तो वो इसे हमें क्यों देगा? ये तो हमारी ताक़त बढ़ाने जैसी बात है।"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा और हल्का-सा मुस्कुराए। मुस्कुराहट नहीं थी — मुँह का कोई कोना ज़रा-सा ऊपर गया था।
"बेटा," उन्होंने कहा, "अगर कोई तुम्हें तुम्हारी ताक़त का हिस्सा भेज दे, तो तुम पहले ये सोचो कि उसने अपनी ताक़त का हिस्सा क्यों छोड़ा।"
मैंने पूछा, "तो क्यों छोड़ा?"
उस्ताद ने घंटी और टुकड़े की तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "क्योंकि जिसके पास ये टुकड़ा है, वो अब इस घंटी के बिना भी काम चला सकता है।"
मेरा हाथ रुक गया।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप क्या कह रहे हैं?"
"मैं कह रहा हूँ," उन्होंने कहा, "कि पचास साल में उसने अपना जोड़ बना लिया। हमारा अधूरा है। उसका पूरा हो चुका है। और पूरा जोड़ अधूरे जोड़ से हमेशा एक कदम आगे रहता है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
फिर उस्ताद ने वो टुकड़ा उठाया और उसे रोशनी में घुमाया। सुबह की धूप दरवाज़े से अंदर आ रही थी, पतली-सी। उस रोशनी में टुकड़े पर एक निशान दिखा — बहुत छोटा, बहुत घिसा हुआ, जैसे किसी ने सुई से खुरचा हो।
उस्ताद ने अपना चश्मा दुबारा निकाला, पहना, और उस निशान को काफ़ी देर देखा।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"कुछ लिखा है," उस्ताद ने कहा। "पढ़ा नहीं जा रहा।"
टिंकू झपटा। "मैं देखूँ?"
"तू अभी ये देख," मैंने कहा, और उसके हाथ से चश्मा लेकर उस्ताद को दिया।
टिंकू ने टुकड़ा आँख के बहुत पास लाया, ज़रा दूर किया, फिर सूरज की रोशनी में घुमाया और बोला, "ये कोई अक्षर नहीं है, उस्ताद। ये दो लकीरें हैं। और उनके बीच में एक तिनका सा।"
"तिनका नहीं," उस्ताद ने धीरे से कहा। "सुई।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"हमारे पास कितना वक़्त है?" मैंने पूछा।
"सलीम बक्श दस बजे आएगा," उस्ताद ने कहा।
"और सफ़ेद कुर्ते वाला?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
मैं खिड़की के पास गया। पीपल के नीचे चबूतरी पर अब तीन आदमी बैठे थे। और गली के मुँह पर, दूर, एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, पर चेहरा दूर था। वो हिल नहीं रहा था। बस खड़ा था, जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो, या गिन रहा हो कि कितने लोग आए।
मैंने उस्ताद की तरफ़ पीठ करके कहा, "उस्ताद, एक सवाल और। आपने कहा कि ये टुकड़ा जान-बूझकर भेजा गया है।"
"हाँ।"
"तो भेजने वाले को पता था कि ये डिब्बा मेरे पास आएगा। पता था कि मैं इसे खोलूँगा। पता था कि मैं इसे घंटी में फँसाऊँगा।"
"हाँ।"
"और ये सब पता था, तो वो अब तक…"
मैं रुक गया। मैंने घंटी को देखा। मैंने टुकड़े को देखा। मैंने उस कमरे को देखा जिसमें मैं पैदा हुआ था… नहीं, वो कमरा ऊपर था। ये दुकान के पीछे का कमरा था, जो न मेरा था न पापा का। इसका कोई काग़ज़ नहीं था। इसका कोई मालिक नहीं था। इसमें सिर्फ़ औज़ार थे और एक चारपाई और एक गुनगुनाता पुराना बल्ब।
और फिर उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे वो खुद उन शब्दों को सुनकर डर गए हों:
"जो इस टुकड़े को ढूँढ रहा है, वो तुमसे पहले इस घंटी तक पहुँच चुका है।"
मैंने पलटकर देखा।
उस्ताद फ़र्श पर बैठे थे, टुकड़ा उनकी हथेली पर था, और उनकी उँगलियाँ उस पर ऐसे बंद थीं जैसे वो किसी चिड़िया को पकड़े हों और छूट जाने का डर हो।
"कब?" मैंने पूछा।
"मैं नहीं जानता," उस्ताद ने कहा। "पर जिस चीज़ पर पचास साल की धूल होनी चाहिए थी, उस पर तेल की परत है।"
मैंने टुकड़ा उनके हाथ से लिया और उसे अपनी हथेली में रखा।
वो ठंडा था।
बाहर पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं। गुमटी से चाय की खुशबू आ रही थी। कहीं कोई बच्चा हँस रहा था। और मैं अपनी ही दुकान के पीछे वाले कमरे में खड़ा था, हाथ में एक टुकड़ा लिए, ये सोचकर कि आज सुबह कौन सबसे पहले इस घंटी के इतने पास आया था।
मैंने पीछे मुड़कर घर के उस पुराने बंद दरवाज़े की तरफ़ देखा, जिसके पीछे माँ ने आज रात कुछ न खोलने को कहा था।
वो दरवाज़ा बंद था।
पर उसके नीचे की धूल में, आज सुबह, किसी के पैर की परछाईं का निशान था — जो अंदर की तरफ़ नहीं, बाहर की तरफ़ मुड़ा हुआ था।
॥
उस पैर के निशान को देखकर मेरा पेट अंदर से ठंडा हो गया। धूल में बना वो निशान बहुत साफ़ नहीं था, पर इतना ज़रूर था कि समझ आ जाए — कोई दरवाज़े के पास खड़ा था, और उसके पैर दरवाज़े की तरफ़ नहीं, बाहर की तरफ़ मुड़े हुए थे।
मतलब कोई दरवाज़ा खोलने नहीं आया था। कोई सिर्फ़ दरवाज़े तक आया था, झुका था, देखा था, और लौट गया था।
"अंकुश।" उस्ताद की आवाज़ पीछे से आई। "अभी ये मत देख।"
मैंने पलटकर उन्हें देखा। वो अब भी फ़र्श पर बैठे थे, टुकड़ा उनकी हथेली में था, और उनका चेहरा वैसा था जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा। डर नहीं था उस चेहरे पर। कुछ और था। जैसे कोई आदमी पचास साल बाद अपनी ही गली में खड़ा हो और पहचान न पाए कि कौन सा घर उसका था।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये दरवाज़ा —"
"मैं जानता हूँ ये दरवाज़ा क्या है," उन्होंने कहा। "और मैं जानता हूँ कि इसके नीचे का निशान क्या कह रहा है। पर ये बात यहाँ नहीं होगी।"
"तो कहाँ?"
उन्होंने टुकड़ा कपड़े में लपेटा, अपनी जेब में रखा, और उठने लगे। घुटने ने जवाब नहीं दिया, मैंने हाथ बढ़ाया, उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और खड़े हो गए।
"मेरी दुकान पर," उन्होंने कहा। "जहाँ मशीन है। जहाँ ये चीज़ पहली बार टूटी थी।"
टिंकू ने शटर की तरफ़ देखा। "उस्ताद, दस बजने वाले हैं। सलीम बक्श आएगा, रजिस्टर लेकर।"
"तो आए," उस्ताद ने कहा। "रजिस्टर काग़ज़ है। काग़ज़ इंतज़ार कर सकता है। ये टुकड़ा नहीं।"
हम निकले। गली में धूप अब पूरी तरह फैल चुकी थी। शबनम आपा की गुमटी पर केतली चढ़ी थी और भाप उठ रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर वो तीन अनजान आदमी अब भी बैठे थे — वही तीन, वही जगह, और वही चुप्पी। उनमें से कोई चाय नहीं पी रहा था। कोई बात नहीं कर रहा था। वो बस बैठे थे, जैसे कोई चीज़ शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हों।
मैंने उनकी तरफ़ देखा तो उनमें से एक ने आँख मिलाई और फिर अपनी गोद में रखे काग़ज़ की तरफ़ देखने लगा।
गली के मुँह पर वो सफ़ेद कुर्ते वाला अब भी खड़ा था।
हम उस्ताद की दुकान के अंदर घुसे और उन्होंने दरवाज़ा अंदर से कुंडी कर दिया। दुकान में अंधेरा था, सिलाई मशीन पर धूल की पतली परत थी, और दीवार पर टँगे कपड़ों से कपूर और इस्तरी की गंध आ रही थी।
उस्ताद ने मशीन के सामने वाली लकड़ी की स्टूल खींची, बैठे, और अपनी मेज़ पर से कपड़ा उठाकर झाड़ा। फिर उन्होंने वही टुकड़ा मेज़ पर रखा।
"बैठ जाओ," उन्होंने कहा। "दोनों।"
मैं और टिंकू फ़र्श पर बैठ गए। टिंकू अपने घुटनों को सीने से लगाकर बैठा, आँखें मेज़ पर जमी हुई।
"तूने मुझसे पूछा था," उस्ताद ने कहा, "कि घंटी दो घंटियों का जोड़ कैसे है। आज सुन ले। और तू —" उन्होंने टिंकू की तरफ़ देखा — "तू भी सुन ले, क्योंकि जो बात एक बार भूल जाए, वो दोबारा सीखनी पड़ती है, और दोबारा सीखने में उम्र लग जाती है।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
"पचास साल पहले," उस्ताद ने कहा, "मेरी और इलियास की एक ही दुकान थी। लोहे का काम, पीतल का काम, घंटियाँ, ताले, चाबियाँ — सब। दुकान के पीछे हमारी माँ रहती थीं। और दुकान के बीच वाले खंभे पर एक घंटी टँगी थी। वो हमारे बाबा ने बनाई थी। उस घंटी की जीभ हमारे घर की सबसे कीमती चीज़ थी, समझे? सोना नहीं थी, पीतल थी। पर उसकी आवाज़ —"
वो रुके। मशीन पर हाथ रखा।
"उसकी आवाज़ ऐसी थी कि गली के आख़िर में बैठा बूढ़ा भी सुन लेता था और कहता था — अली, तेरी घंटी बोली, तो आज कुछ अच्छा होगा।"
उन्होंने चश्मा निकाला, पोंछा, और वापस नहीं पहना। चश्मा हाथ में पकड़े रहे।
"जिस रात दुकान जली," उन्होंने कहा, "उस रात हमारी माँ दुकान में सो रही थीं। हम सब बाहर थे, दूसरी गली में एक शादी में बुलाए गए थे। जब लौटे तो दुकान के पीछे का हिस्सा जल रहा था। मैं अंदर घुसा, इलियास अंदर घुसा, और हम दोनों मिलकर माँ को बाहर निकाल लाए। पर धुआँ — धुआँ बहुत था।"
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"माँ पाँच दिन बाद चली गईं। उनकी दवा देर से आई। बस इतना। पाँच दिन।"
मैंने कुछ नहीं कहा। टिंकू ने भी नहीं कहा। मशीन की टिक-टिक बंद थी, पर मुझे लगा वो अब भी गिन रही है।
"उस आग में ये घंटी गिरी और टूटकर दो हो गई।" उस्ताद ने टुकड़े की तरफ़ उँगली बढ़ाई। "एक हिस्सा वो जिसमें जीभ थी। एक हिस्सा वो जिसमें जीभ निकल गई और सिर्फ़ छल्ला बचा। और ये —" उन्होंने टुकड़े को छुआ — "ये वो कड़ा है जो दोनों को जोड़कर एक घंटी बनाता था। जीभ दोनों के बीच बैठती थी, कड़े पर टिकी रहती थी, और दोनों हिस्से उसे पकड़े रहते थे।"
"तो घंटी दो नहीं थी," टिंकू ने धीरे से कहा। "घंटी एक थी, और वो टूटकर दो हो गई।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "और उसके बाद मैंने एक हिस्सा अपने पास रख लिया और इलियास ने दूसरा। हमने कभी नहीं कहा कि हम दोनों इसे जोड़ेंगे। हम बस चुप हो गए।"
"और ये कड़ा?" मैंने पूछा।
"ये कड़ा उस रात के बाद किसी और के पास था," उस्ताद ने कहा। "उस रात दुकान में मेरे सिवा, इलियास के सिवा, सिर्फ़ एक और आदमी था।"
"कौन?"
"जो माँ को बाहर निकालकर भाग गया और फिर कभी नहीं लौटा।"
मैं उठकर खड़ा हो गया। "शंकरलाल।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "जब से मुझे पेचकस के हत्थे में उसका नाम मिला है, मैं यही सोच रहा हूँ — वो भागा क्यों। और आज जब रणवीर का डिब्बा खुला और अंदर से ये कड़ा निकला, तब समझ आया। वो भागा नहीं था, अंकुश। उसे भगाया गया था। उसके हाथ में यही कड़ा था, और उसके बाद ये कड़ा किसी और के हाथ में पहुँचा, और उसके बाद —"
वो रुके। उन्होंने टिंकू की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"उसके बाद ये कड़ा पचास साल तक चुप बैठा रहा, जब तक कि रणवीर भारद्वाज ने इसे मेरे दरवाज़े पर नहीं भेज दिया।"
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो मेरी हथेली में ठंडी थी। मैंने उसे बजाया।
और घंटी बोली — बहुत छोटा, बहुत रूखा, जैसे कोई नींद में बोल रहा हो:
"कड़ा आया। कड़ी नहीं।"
"कड़ी क्या है?" मैंने पूछा।
"जो दो को एक करे।"
"और जीभ?"
घंटी चुप हो गई।
"बोल ना," मैंने कहा। "जीभ क्या है?"
"जीभ सच बोलती है। कड़ी पकड़ती है। दोनों अलग हैं।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, आँखें बड़ी करके। "उस्ताद, इसका मतलब —"
"इसका मतलब ये है," उस्ताद ने कहा, "कि अगर हम ये कड़ा अपनी घंटी में लगा दें, तो शायद जीभ बिना जीभ वाले हिस्से को भी पकड़ ले। पर उसके लिए —"
दुकान के बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
तीन दस्तकें। बराबर, ठहरी हुई, बिना जल्दबाज़ी। जैसे खटखटाने वाले को पता हो कि अंदर कोई सो रहा है और उसे जगाना नहीं है, बस याद दिलाना है कि वक़्त हो गया।
टिंकू उठा। मैंने उसका कंधा पकड़ा। उस्ताद ने मेज़ पर रखा कपड़ा उठाकर टुकड़े पर डाल दिया और फिर बहुत आराम से बोले, "खोल दे।"
दरवाज़ा खुला।
सलीम बक्श अंदर आया।
वो आज भी सफ़ेद कुर्ते में था। सफ़ेद जूते। बाल साफ़ किए हुए। और उसकी उँगली में वही काली अंगूठी। उसके हाथ में लाल कपड़े में लिपटा मोटा रजिस्टर था, जिसे वो दोनों हाथों से ऐसे पकड़े था जैसे कोई बच्चा पकड़ता है।
वो अंदर आया। दुकान में एक कदम, दो कदम। और फिर रुक गया।
उसकी नज़र मेज़ पर पड़ी। कपड़े के नीचे से टुकड़े का कोना बाहर झाँक रहा था — बस एक छोटा सा कोना, कुछ भी नहीं। और उसका चेहरा बदल गया।
उसकी आँखें वैसी नहीं हुईं जैसी किसी को चीज़ मिलने पर होती हैं। उसकी आँखें वैसी हुईं जैसी किसी को अपनी खोई चीज़ मिलने पर होती हैं।
"ये," उसने धीरे से कहा, "ये तुम्हारे पास कहाँ से आया?"
उस्ताद ने जवाब नहीं दिया।
सलीम ने रजिस्टर मेज़ पर रख दिया, बहुत संभाल से, जैसे कोई बीमार आदमी को लिटाता है। फिर उसने कपड़ा उठाया।
टुकड़ा वहाँ था।
सलीम ने उसे देखा। उसने छुआ नहीं। वो बस देखता रहा, और उसकी साँस एक बार टूटी, फिर ठीक हो गई।
"ये मुझे देना होगा," उसने कहा।
"नहीं," उस्ताद ने कहा।
"उस्ताद —"
"नहीं।"
"आप सुनिए —"
"मैं सुन रहा हूँ," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ आ गई जो पचास साल की चुप्पी में जमा होती है। "मैं पचास साल से सुन रहा हूँ। तू बता, ये टुकड़ा तेरी खोज का हिस्सा कैसे है?"
सलीम ने होंठ भींचे। फिर उसने कहा, "मैं इसे बीस साल से ढूँढ रहा हूँ। मेरे पास एक हिस्सा है। उस हिस्से में जगह खाली है। जिस दिन ये जगह भरेगी, उस दिन मैं —"
"तू क्या?" उस्ताद ने कहा। "तू अपने बाप की जगह लेगा?"
सलीम पत्थर की तरह खड़ा रहा।
"तेरे बाप सलीम अहमद ने," उस्ताद ने कहा, "रजिस्टर में जो पन्ना देखा था, वो काटकर सिल दिया गया। तेरे बाप उस दिन से चुप थे, और आज तक कोई नहीं जानता कि उनके सीने में क्या दबा था। और तू — तू उसी घंटी को जोड़ना चाहता है जिसने उन्हें तोड़ा?"
"मैं घंटी नहीं जोड़ रहा," सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार थोड़ी ऊँची हुई। "मैं उसके दो हिस्से कर रहा हूँ। एक हिस्सा उसके पास रहेगा जो इसका हक़दार है।"
"और हक़दार कौन है?"
सलीम ने जवाब नहीं दिया।
तभी उसने अपना रुख बदला। उसने मेज़ पर रखा लाल कपड़ा उठाया और रजिस्टर खोला। दोनों तरफ़ से। और मुझे वो पन्ने दिखाए जिनके बारे में रज़ा सलीम बता चुका था — सात नाम, सात अंगूठे, और सबसे नीचे एक अंगूठा जिसके आगे कोई नाम नहीं था।
"ये देखो," उसने कहा। "ये सात लोगों की ज़मीन है। इसमें तुम्हारे दादा जगदीश यादव भी हैं। और ये —" उसने उस बिना नाम वाले अंगूठे पर उँगली रखी — "ये वो अंगूठा है जिसका नाम कोई नहीं जानता। मैं बीस साल से इस अंगूठे का नाम ढूँढ रहा हूँ।"
"और मुझे क्या?" मैंने कहा।
"तुम्हें ये मिलेगा," सलीम ने कहा, "कि तुम्हारे पास वो टुकड़ा है जो मेरी खोज का आख़िरी हिस्सा है। और मेरे पास वो रजिस्टर है जो तुम्हारी लड़ाई का पहला हिस्सा है।"
"तो हम सौदा करें?"
सलीम ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने वो किया जो मुझे सबसे ज़्यादा डराता है।
वो मुस्कुराया।
"सौदा नहीं," उसने कहा। "परीक्षा।"
"कैसी परीक्षा?"
"रणवीर ने तुम्हें ये डिब्बा भेजा। तुमने सोचा, वो तुम्हें खरीद रहा है।" सलीम ने सिर हिलाया। "वो तुम्हें खरीद नहीं रहा था, अंकुश। वो ये देख रहा था कि तुम उस डिब्बे का क्या करते हो।"
"और उसे क्या मिला?"
"उसे ये मिला," सलीम ने कहा, "कि तुम डिब्बा खोलते हो, अंदर झाँकते हो, और फिर सबको बताते हो। यानी तुम अकेले नहीं रह पाते। ये तुम्हारी ताक़त है, और यही तुम्हारी कमज़ोरी भी।"
मुझे गुस्सा आया। वो गुस्सा जो ठीक उस वक़्त आता है जब कोई तुम्हारे बारे में सच बोल दे और तुम उसे झूठ नहीं कह सकते।
"तो अब?" मैंने कहा।
"अब वक़्त ख़त्म हो रहा है," सलीम ने कहा। "तुम्हारे पास टुकड़ा है, रजिस्टर है, घंटी है, और पूरी गली है। और मेरे पास —"
वो रुका।
"मेरे पास वो आदमी है जो ये सब देख रहा है कि तुम इन चीज़ों का क्या करते हो।"
उसने रजिस्टर बंद किया, लाल कपड़े में लपेटा, और मेज़ पर ही छोड़ दिया।
"ये तुम्हारे पास रहेगा," उसने कहा। "मैं इसे लेने नहीं आया था। मैं सिर्फ़ ये देखने आया था कि तुमने डिब्बा खोला या नहीं।"
"तो तुम्हें पता चल गया," मैंने कहा। "खोला।"
"हाँ," सलीम ने कहा। "और उसी में तुमने वो चीज़ निकाल ली जो पचास साल से किसी और के पास थी।" उसने उस्ताद की तरफ़ देखा। "उस्ताद, आप जानते हैं ये टुकड़ा क्या है। आप जानते हैं कि ये किस चीज़ से जुड़ता है। आप जानते हैं कि अगर ये गलत हाथ में रहा तो क्या होगा।"
"मैं जानता हूँ," उस्ताद ने कहा।
"तो फिर —"
"इसीलिए ये तेरे हाथ में नहीं जाएगा," उस्ताद ने कहा। "तेरे हाथ में जाने का मतलब है रणवीर के हाथ में जाना। और रणवीर के हाथ में जाने का मतलब है —"
"मतलब?" सलीम ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो सफ़ेद कुर्ते और काली अंगूठी के नीचे छिपा था। "मतलब क्या, उस्ताद? मैं रणवीर का आदमी नहीं हूँ। मैं सिर्फ़ अपने बाप का बेटा हूँ, जिसने मरने से पहले एक बात कही थी — उसने कहा था, बेटा, उस रजिस्टर में एक पन्ना सिला हुआ है, और जिस दिन वो सिलाई खुलेगी, उस दिन तेरे बाप का नाम साफ़ होगा। मैं पचास साल से उसी सिलाई को खोलने की कोशिश कर रहा हूँ, और तुम लोग मुझे रणवीर का आदमी कहते हो।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर। फिर उन्होंने कहा, बहुत धीरे, "तो सिलाई खोल। आज। सबके सामने।"
सलीम ने कुछ कहना चाहा, पर तभी बाहर से दौड़ते पैरों की आवाज़ आई।
दरवाज़ा खुला और मीरा अंदर घुसी। उसका कैमरा कंधे पर लटक रहा था, बैग का पट्टा टूटा हुआ था, और उसके माथे पर पसीना था। वो सीधी मेज़ तक आई और उसने मेरे हाथ पर एक काग़ज़ रख दिया।
"ये अभी मिला," उसने कहा, साँस लेते हुए। "स्कूल की छत की नई रिपोर्ट है।"
मैंने काग़ज़ उठाया। ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली गोल मोहर थी, नीचे तारीख़, और बीच में लिखा था कि छत खतरनाक है, तुरंत बंद की जाए।
"मैंने इसका पीछा किया," मीरा ने कहा। "मुझे लगा कि ये मोहर पहले भी देखी है। और मैंने देखा — ये रिपोर्ट किसी पुराने इंजीनियर ने नहीं बनाई। ये नई बनाई गई है।"
"किसने बनाई?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी आँखों में देखा।
"शालिनी नाम की एक युवा इंजीनियर ने," उसने कहा। "और उसके हस्ताक्षर के बिना ये रिपोर्ट पूरी नहीं होती।"
मैंने काग़ज़ को उलटा किया। पीछे की तरफ़ हल्की स्याही में नाम का पहला हिस्सा लिखा था, जैसे किसी ने लिखना शुरू किया हो और फिर हाथ रोक लिया हो।
"तो ये काग़ज़ अधूरा है," मैंने कहा। "इसका कोई मतलब नहीं।"
"इसका मतलब है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ भारी हो गई, "कि ये रिपोर्ट जिस लड़की से बनवाई जा रही है, उसके पापा की छोटी कंपनी रणवीर के काम पर टिकी है।"
मैंने काग़ज़ नीचे रख दिया।
उस्ताद ने अपना चश्मा पहना। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। सलीम बक्श ने अपनी काली अंगूठी वाली उँगली से मेज़ पर धीरे-धीरे टैप किया, जैसे कोई घड़ी चल रही हो।
और मेरे कान में घंटी बोली, इतने धीरे से जैसे कोई दूर किसी कुएँ से बोल रहा हो:
"अब काग़ज़ नहीं। अब लड़की टूटी है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"शालिनी कहाँ है?"
"पता नहीं," मीरा ने कहा। "पर मुझे इतना पता है कि वो आज सुबह स्कूल गई थी, और स्कूल का गेट बंद था।"
मैंने मेज़ से रजिस्टर उठाया, टुकड़े की तरफ़ देखा, और फिर सलीम बक्श की तरफ़।
"तुम कह रहे थे कि वक़्त ख़त्म हो रहा है," मैंने कहा। "ठीक है। तुम सही हो। पर वक़्त तुम्हारा भी ख़त्म हो रहा है। आज दस बजे पीपल पर सब आएँगे। तुम भी आना। रजिस्टर लेकर। और अपने बाप की कसम लेकर।"
सलीम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला, पर मैं नहीं कह सकता कि क्या।
"और टुकड़ा?" उसने पूछा।
मैंने टुकड़ा उठाया। मैंने उसे अपनी घंटी के पास ले जाकर रखा। घंटी काँपी।
"टुकड़ा यहीं रहेगा," मैंने कहा। "जब तक तुम सच नहीं बोलते।"
सलीम मुस्कुराया। फिर वो पलटा और बाहर चला गया, और उसके जाने के बाद भी दुकान में उसकी काली अंगूठी की टैप-टैप कुछ देर तक गूँजती रही।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "एक बात है।"
"क्या?"
"स्कूल की छत वाली रिपोर्ट मैंने पढ़ी। उसमें एक लाइन है कि छत की मरम्मत पर पहले ही बीस लाख खर्च हो चुके हैं। और वो बीस लाख —" उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा — "वो किसी मरम्मत में नहीं गए। वो किसी और काम में गए हैं।"
"किस काम में?"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "उसी काम में जिसका हिसाब आज पीपल पर खुलेगा।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रख लिया, टुकड़ा कपड़े में लपेटकर उस्ताद को दिया, और उन्होंने उसे अपने सीने से लगा लिया, ऐसे जैसे कोई पचास साल बाद अपना बच्चा वापस पा रहा हो।
फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
"कहाँ जा रहा है?" उस्ताद ने पूछा।
"स्कूल," मैंने कहा। "शालिनी को ढूँढने।"
"और अगर वो न मिले?"
मैंने पलटकर उनकी तरफ़ देखा।
"तो उसके पापा को ढूँढूँगा," मैंने कहा। "क्योंकि जो लड़की हस्ताक्षर नहीं कर रही, उसके पापा के पास कोई न कोई काग़ज़ ज़रूर होगा। और जिस दिन वो काग़ज़ बोलेगा, उस दिन छत नहीं गिरेगी।"
टिंकू पीछे-पीछे चल पड़ा।
बाहर निकले तो धूप आँखों में लगी। गली के मुँह पर वो सफ़ेद कुर्ते वाला अब भी खड़ा था। पर इस बार, मुझे लगा, वो हमें नहीं देख रहा था।
वो स्कूल की तरफ़ देख रहा था।
और मेरे कान में घंटी ने एक आख़िरी बात कही, इतनी धीमी कि मुझे लगा मैंने सुनी ही नहीं:
"छत नहीं गिरेगी। हस्ताक्षर गिरेगा।"
॥
स्कूल की गली में घुसते वक़्त टिंकू मेरे पीछे-पीछे चल रहा था और बार-बार मेरी कमीज़ खींच रहा था।
"उस्ताद, अगर वो लड़की नहीं बोली तो?"
"तो हम बोलेंगे," मैंने कहा।
"और अगर वो भाग गई तो?"
"टिंकू, स्कूल है, जेल नहीं। भागने की जगह नहीं होती।"
"पर उस्ताद, आज स्कूल बंद है। गेट पर ताला है। फिर वो अंदर कैसे?"
मैंने पलटकर उसे देखा। सच कह रहा था। स्कूल का लोहे का गेट आधा खुला था, और उसके एक पल्ले पर नया सफ़ेद ताला झूल रहा था, जैसे किसी ने जल्दी में लगाया हो और ताली न भेज पाया हो।
गली के मोड़ से स्कूल की दीवार दिखती है। पीली दीवार, ऊपर प्लास्टर उखड़ा हुआ, और बीच में वो बड़ी सी खिड़की जिसके काँच पर बच्चों ने चाक से पतंगें बनाई हैं। बरसों से वही पतंगें हैं। कोई नया बच्चा आता है, पुरानी पतंग के ऊपर नई बना देता है, और इस तरह दीवार पर एक के ऊपर एक पतंगों का ढेर जमा हो गया है, जैसे पूरी गली के सपने चाक से चिपके हों।
गेट के अंदर घुसते ही रामलाल दिखे। स्कूल के चौकीदार। सत्तर के पार, कमर झुकी, हाथ में पीतल की चाय का गिलास। मुझे देखकर उन्होंने गिलास पीछे छिपाया, फिर याद आया कि यह स्कूल है, चोरी नहीं हो रही, तो वापस सामने ले आए।
"अंकुश बेटा," उन्होंने कहा, "आज स्कूल बंद है। छुट्टी है।"
"पता है, रामलाल काका," मैंने कहा। "मुझे छुट्टी वाली लड़की से मिलना है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे, फिर आँगन की तरफ़, फिर वापस मेरी तरफ़। उनका चेहरा कुछ कहना चाहता था, पर ज़ुबान रुकी हुई थी। सत्तर साल की आदत है — जो ऊपर से आता है, उसके बारे में चुप रहना।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "वो सुबह से बैठी है। चाय भी नहीं पी।"
"कहाँ?"
"छत के नीचे। जहाँ से पिछले महीने प्लास्टर गिरा था। वहीं टेबल-कुर्सी डालकर बैठी है। कह रही है काग़ज़ देखने हैं।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसकी आँखें बड़ी हो गईं।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाया, "छत के नीचे? जो गिरने वाली है?"
"वही तो," मैंने कहा। "देखना है कि गिरने वाली है या नहीं।"
आँगन में धूप फैली थी। सुबह के दस बजे हैं, पर भोपाल की धूप दस बजे ही आधी दोपहर जैसी लगती है। ज़मीन गरम, हवा में धूल की महक, और पीपल का पेड़ आँगन के कोने में खड़ा, जिसकी छाया आधे आँगन को ढक रही थी।
उसी छाया के पास, दीवार से सटा, एक टूटी बेंच पर मैंने पहले सानिया को देखा। वो चुपचाप बैठी थी, हाथ में लाल कवर वाली कॉपी, और उसके बगल में गुड्डू दीवार से चिपका खड़ा था। रफ़ीक़ और चिंटू आगे वाली बेंच के नीचे बैठे थे, जैसे स्कूल में छिपकर बात करने वाले बच्चे बैठते हैं। चारों ने मुझे देखा और सानिया ने होंठों पर उँगली रखी।
मैं धीरे-धीरे उनके पास गया और बेंच के सहारे बैठ गया।
"क्या हुआ?" मैंने फुसफुसाया।
"वो सुबह सात बजे आई," सानिया ने कहा, आवाज़ इतनी धीमी जैसे किताब के पन्नों से आ रही हो। "हम लोग रोज़ की तरह पतंग ढूँढने आए थे, पर गेट खुला था। अंदर आए तो ये बैठी थी।"
"किससे बात की?"
"किसी से नहीं," गुड्डू ने कहा। "रामलाल काका ने चाय दी, उसने हाथ में पकड़ ली और ठंडी हो गई। फिर मैंने पूछा — दीदी, कुछ चाहिए? तो उसने सिर हिलाया। बस।"
"और फिर?"
"और फिर वो यही कर रही है," रफ़ीक़ ने कहा, और उसने काग़ज़ सीधा करने का हाव-भाव किया। "बस काग़ज़ सीधे कर रही है। उलट रही है, पलट रही है, फिर सीधा कर रही है। मैंने गिना —"
"तूने गिना?" मैंने कहा।
"हाँ, सात बार।" रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा ठीक किया, जिसका एक काँच गायब था। "पर उस्ताद, सबसे अजीब बात ये है कि उसने एक बार भी छत की तरफ़ नहीं देखा। जबकि वो ठीक छत के नीचे बैठी है।"
मैंने स्कूल के पिछले हिस्से की तरफ़ देखा।
छत के नीचे, दीवार से सटी, एक लंबी मेज़ रखी थी, जिस पर कोई पुराना हरा कपड़ा बिछा था। दो कुर्सियाँ थीं — एक पर वो बैठी थी, दूसरी खाली। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर, एक पीली फ़ाइल, दो पेन, और पानी का एक स्टील का गिलास, जिसमें पानी वैसा ही भरा था जैसा सुबह भरा गया होगा।
वो छब्बीस-सत्ताईस साल की होगी। पतला चेहरा, चश्मा, बाल पीछे बँधे, और सफ़ेद कुर्ते के ऊपर एक हल्का नीला जैकेट, जिसकी बाँह कलाई तक चढ़ी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। साफ़ दिख रहा था। वो काग़ज़ उठाती, सीधा करती, रखती, फिर उठाती — और हर बार उसकी उँगलियाँ काग़ज़ के किनारे को इतना दबाती कि किनारा मुड़ जाता।
मैंने देखा कि उसने पहले ही उस काग़ज़ का कोना मोड़ दिया है। तीन बार। एक ही कोना।
जो आदमी डरा हुआ होता है, वो चीज़ें खराब करता है। बिना जाने। काग़ज़ का कोना मोड़ देता है, चाय का गिलास छोड़ देता है, कुर्सी की टाँग से खेलने लगता है।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "तू यहीं रुक।"
"पर उस्ताद —"
"यहीं रुक, टिंकू। और बच्चों, तुम लोग भी।"
सानिया ने कहा, "हम यहीं से सुनेंगे।"
"सुनो," मैंने कहा। "पर अगर मैं हाथ उठाऊँ, तो स्कूल के पिछले दरवाज़े की तरफ़ भागना। समझे?"
वो सब चुप हो गए।
मैं उठा और उस मेज़ की तरफ़ चला।
मेरे जूतों की आवाज़ आँगन में गूँज रही थी। चार कदम, पाँच कदम, और फिर मैं उस मेज़ के सामने खड़ा था। धूप मेरी पीठ पर थी और छत की छाया उसके चेहरे पर।
उसने सिर नहीं उठाया।
मैंने खाली कुर्सी खींची, बैठ गया, और दोनों हाथ मेज़ पर रख दिए, ऐसे जैसे कोई मुर्गा लड़ाई से पहले हाथ रखता है — नहीं, ग़लत मिसाल। ऐसे जैसे कोई दुकानदार ग्राहक को दिखाता है कि मेरे हाथ ख़ाली हैं, कुछ छिपा नहीं है।
"शालिनी मैडम," मैंने कहा।
उसने सिर उठाया। एक पल के लिए। फिर वापस काग़ज़ पर।
"मैं अंकुश हूँ," मैंने कहा। "साइकिलों की गली में। जहाँ से आपने वो रिपोर्ट लिखवाई है।"
अब उसने सिर उठाया, और इस बार उठाया रखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत बार देखी है — गुस्सा नहीं, शर्म नहीं, कुछ तीसरा। जैसे कोई चोर पकड़ा जाए और जानता हो कि पकड़ा जाएगा, फिर भी पकड़ा जाना नहीं चाहता।
"आप वही हैं," उसने कहा। आवाज़ रूखी थी, पर हल्की।
"हाँ, वही हूँ।"
"जिसके बारे में रणवीर सर ने कहा था?"
मैंने एक पल सोचा। "उन्होंने क्या कहा था?"
"कहा था कि एक लड़का है, जिसे लगता है कि वो शहर बचा रहा है।"
"और आपने क्या कहा?"
उसने कुछ नहीं कहा। काग़ज़ सीधा किया।
"मैडम," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ में थोड़ा मज़ाक डालने की कोशिश की, "अगर आप ये काग़ज़ इतनी बार सीधे करेंगी, तो इनका कोना घिस जाएगा और फिर काग़ज़ कहेगा कि मरम्मत करा दो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो हुआ जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
"आप यहाँ मज़ाक करने आए हैं?" उसकी आवाज़ तेज़ हो गई। "आपको पता है मेरे पास कितना वक़्त है? आपको पता है कि अगर मैंने ये हस्ताक्षर नहीं किए तो क्या होगा?"
"नहीं पता," मैंने कहा, सीधा। "इसीलिए तो आया हूँ।"
वो रुक गई।
उसने काग़ज़ नीचे रखा, दोनों हाथ मेज़ पर रखे, और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। वो छिपाने की कोशिश कर रही थी, पर छिपाना मुश्किल था। हाथ काँपते हैं तो मेज़ काँपती है। मेज़ काँपे तो काग़ज़ काँपते हैं। काग़ज़ काँपे तो सब पता चल जाता है।
"आपको क्या चाहिए?"
"सच," मैंने कहा।
वो हँसी। एक छोटी, थकी हुई हँसी। "सच की क़ीमत पता है आपको?"
"पता है," मैंने कहा। "मुझे एक दुकान वाले ने बताया था कि सच की क़ीमत हमेशा उससे ज़्यादा होती है जो हम सोचते हैं।"
"और फिर भी आप माँग रहे हैं?"
"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि सच न माँगें तो झूठ बोलना पड़ता है। और झूठ बोलने में मैं कच्चा हूँ।"
वो फिर चुप हो गई। दूर, पीपल के पीछे, सानिया की कॉपी का पन्ना पलटने की आवाज़ आई — ज़ोर से, जैसे किसी ने जान-बूझकर आवाज़ की हो कि हम यहाँ हैं।
तभी उसका फ़ोन बजा।
वो काँपी। फ़ोन मेज़ के किनारे पर रखा था, काग़ज़ों के नीचे। उसने काग़ज़ों को हटाया, फ़ोन उठाया, स्क्रीन देखी, और मुझे लगा कि वो फ़ोन को वापस रख देगी। पर उसने नहीं रखा। उसने अपनी कुर्सी थोड़ी मोड़ी, मुँह दूसरी तरफ़ किया, और फ़ोन कान पर लगाया।
और फिर वो बोली — बहुत धीरे, बहुत छोटे से, इतने धीरे कि मैंने जैसे-तैसे सुना:
"पापा, मैं कर दूँगी हस्ताक्षर।"
एक वाक्य। बस एक वाक्य। और मुझे लगा जैसे स्कूल का पूरा आँगन, पूरी दीवार, वो चाक से बनी पतंगें, सब एक साथ चुप हो गए।
उसने फ़ोन काट दिया। वो कुछ देर वैसे ही बैठी रही, मुँह मेरी तरफ़ नहीं, फ़ोन हाथ में। फिर उसने फ़ोन मेज़ पर रखा, और उसकी आवाज़ पहले से धीमी थी जब उसने कहा:
"अब आप कुछ कहिए।"
मैंने कहा, "मुझे पता है वो फ़ोन किसने किया।"
"नहीं, आपको नहीं पता।"
"ठीक है, मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर मुझे इतना पता है कि जो आदमी वो फ़ोन कर रहा है, वो उस फ़ोन में ऐसी बात कह रहा है जो वो मुँह पर नहीं कह सकता। क्योंकि मुँह पर कहने के लिए उसे अपना चेहरा दिखाना पड़ेगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ टूट रहा था। टूटने की आवाज़ नहीं आती, ये तो मुझे पता है। बस आदमी की आँखें भारी हो जाती हैं, जैसे किसी ने उनमें पानी भर दिया हो और अब वो छलकने ही वाली हों।
"मेरे पापा की कंपनी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी। "पंद्रह साल से चल रही है। आठ मज़दूर हैं। छह महीने से तनख्वाह लटकी है। और अगर ये काम हाथ से जाए —"
वो रुक गई।
"तो क्या?" मैंने पूछा।
"तो फिर कोई काम नहीं देगा," उसने कहा। "पूरे शहर में कोई नहीं देगा। क्योंकि जिसका नाम एक बार रणवीर भारद्वाज की सूची में चढ़ जाता है, वो फिर किसी सूची में नहीं चढ़ता।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
फिर मैंने कहा, "मैडम, मुझे एक बात समझाइए।"
"पूछिए।"
"जब आपने ये रिपोर्ट लिखी, तब आपने छत देखी थी?"
"बीस बार," उसने कहा।
"और छत कैसी है?"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अपने बैग से एक पीला काग़ज़ निकाला। ज़ाहिर है वो काग़ज़ पहले से उसके हाथ में आना चाहिए था — वो उसी की तरफ़ बार-बार जा रही थी, काग़ज़ों में उसे ढूँढ रही थी, और उसे नहीं मिल रहा था।
पीला काग़ज़। उस पर छत की तस्वीर थी — सिर्फ़ तस्वीर। कोई लिखाई नहीं। कोई लाइन नहीं।
"ये तस्वीर मैंने ली थी," उसने कहा। "छत पर जाकर। चार दिन पहले।"
मैंने काग़ज़ हाथ में लिया।
तस्वीर में छत का एक कोना दिख रहा था, जहाँ से प्लास्टर उखड़ा था। पर मैं साइकिल बनाने वाला हूँ, मैं चीज़ें देखकर उनकी उम्र बता सकता हूँ। और वो टूटा हुआ हिस्सा — वो टूटा नहीं था। वो खुरचा हुआ था। प्लास्टर के किनारे पर वो सीधी लकीर थी जो लोहे की छड़ या हथौड़े से बनती है, जब कोई जान-बूझकर ठोकर मारता है। अंदर से नमी नहीं दिख रही थी। अंदर से सूखा था। सूखा प्लास्टर अपने आप नहीं गिरता। सूखा प्लास्टर तभी गिरता है जब कोई गिराए।
मैंने तस्वीर को करीब किया और उँगली से उस किनारे को छुआ।
"ये —" मैंने शुरू किया।
"मैं जानती हूँ," उसने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी हो गई। वो मेज़ के आर-पार झुकी, दोनों हाथ मेज़ पर, काग़ज़ों के बीच, और उसने वो कहा जो मैं सुनने आया था — पर उस तरह से जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी।
"रिपोर्ट में लिखना है कि छत गिरने वाली है, जबकि छत सिर्फ़ मरम्मत माँग रही है।"
आँगन में हवा रुकी हुई लगी।
मैंने काग़ज़ रख दिया। मैंने उसकी तरफ़ देखा और मैंने कुछ नहीं कहा, क्योंकि कुछ पलों में बोलना ग़लत होता है। जब कोई इंसान पहली बार अपना सबसे बड़ा डर बोल देता है, तो उसे बोलने देना चाहिए। तुरंत जवाब देना चाहिए तो नहीं।
वो बोलती रही।
"मैंने पापा से कहा था कि ये ग़लत है। उन्होंने कहा —" उसकी आवाज़ लड़खड़ाई — "उन्होंने कहा कि ये ग़लत नहीं है, बेटा, ये काम है। और काम में हम वही लिखते हैं जो हमें लिखने को कहा जाता है।"
"और बीस लाख?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने चाकू निकाल लिया हो।
"आपको कैसे —"
"मीरा ने रिपोर्ट पढ़ी। उसमें मरम्मत के नाम पर बीस लाख का खर्च लिखा है। और उन बीस लाख की कोई रसीद नहीं है। केवल एक लाइन है।"
उसने सिर झुका लिया।
"वो बीस लाख," उसने कहा, "मेरे पापा की कंपनी को मिले थे। पिछले साल। स्कूल की मरम्मत के नाम पर।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"और वो पैसे किसी मरम्मत में नहीं लगे," उसने कहा, और उसका हाथ फिर काग़ज़ के कोने पर गया, और इस बार उसने कोना नहीं मोड़ा, बस उसे पकड़ लिया, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी किसी चीज़ को पकड़ता है। "वो पैसे पापा ने एक और काम में लगा दिए। एक ऐसे काम में जो उन्हें रणवीर सर ने दिया था। और अब वो काम अटका हुआ है। पैसे लग गए, काम नहीं निकला, और अगर अब ये स्कूल वाला काम भी हाथ से जाए —" वो रुक गई और उसने गहरी साँस ली — "तो पापा के पास कुछ नहीं बचेगा। न कंपनी, न मज़दूर, न घर।"
"और आपके पास?"
"मेरे पास?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट आई जो सिर्फ़ उस इंसान में आती है जिसने बहुत देर तक खुद से झगड़ा किया हो। "मेरे पास ये हस्ताक्षर हैं। बस ये।"
मैं कुछ देर बैठा रहा। स्कूल की दीवार पर चाक से बनी पतंगें देखता रहा। ऊपर छत की तरफ़ देखा। छत वाकई ठीक थी। एक कोना टूटा था, पर बाकी पूरी छत सालों खड़ी रह सकती थी। मैंने एक बार फिर वही सोचा जो हर बार सोचता हूँ — कितनी चीज़ें टूटी नहीं होतीं, बस टूटी हुई दिखाई जाती हैं। और टूटी हुई दिखाना भी एक काम है, जो बहुत पैसा देता है।
तभी मेरे कान में घंटी बोली। पर इस बार पहले जैसी नहीं। इस बार आवाज़ साफ़ थी, जैसे किसी ने मेरे कान में झाँककर बोला हो।
"देखा?"
"देखा," मैंने धीरे से कहा।
"किससे कह रहे हो?" शालिनी ने पूछा।
"अपने आप से," मैंने कहा। "मेरी आदत है। बोलता हूँ तो सोचना आसान हो जाता है।"
उसने मेरी तरफ़ थोड़ी देर देखा, फिर पूछा, "आप मुझे क्या कहने आए हैं?"
मैंने कुर्सी पर पीछे झुककर कहा, "मैं आपको कुछ नहीं कहने आया।"
"तो?"
"मैं आपसे एक सवाल पूछने आया हूँ।"
"पूछिए।"
"अगर आप आज हस्ताक्षर कर दें," मैंने कहा, "तो कल सुबह सात बजे पीछे वाले प्लॉट पर मशीन खड़ी हो जाएगी। छत गिरेगी। स्कूल बंद हो जाएगा।" मैंने रुककर उसकी तरफ़ देखा। "और उस छत के नीचे जो बच्चे पढ़ते हैं — उनमें एक बच्चा है, चिंटू। दस साल का। पिछले हफ़्ते वो स्कूल की सीढ़ी पर चढ़ा था, प्लास्टर गिरा और वो फिसल गया। अगर छत पूरी गिरी, तो वो नीचे रहेगा।"
शालिनी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं आपको दोष नहीं दे रहा," मैंने कहा। "मैं खुद डर में क्या-क्या नहीं करता।" मैंने अपनी जेब से पुराना पेचकस निकाला — नहीं, वो तो पापा के पास था, मैंने अपनी जेब से वो टूटा हुआ बोल्ट निकाला जो मैं हमेशा रखता हूँ, जो किसी काम का नहीं, बस अच्छा लगता है। "ये देखिए। ये बोल्ट टूटा है। मैं इसे चार साल से जेब में रखे हुए हूँ। न काम आता है, न फेंक पाता हूँ। क्यों? क्योंकि एक दिन लगा था कि किसी काम आएगा।"
उसने बोल्ट को देखा।
"और आपकी नज़र में," उसने कहा, "मैं यही बोल्ट हूँ?"
"नहीं," मैंने कहा। "आप वो हाथ हैं जो बोल्ट पकड़े बैठे हैं और सोच रहे हैं कि क्या करें।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर उसने चश्मा उतारा, आँखें मसलीं, और वापस लगाया। उसका चेहरा थोड़ा बदल गया था। जैसे किसी ने अंदर से एक ताला खोल दिया हो और अब वो सोच रही हो कि बाहर क्या करना है।
"आपको पता है," उसने कहा, "मैंने ये रिपोर्ट दो बार लिखी। पहली बार मैंने सच लिखा था। कि छत में एक कोना कमज़ोर है, ज़रूरत सिर्फ़ मरम्मत की है, इमारत सुरक्षित है।" उसने पीला काग़ज़ उठाया। "और ये — ये उसी रिपोर्ट की तस्वीर है।"
"फिर क्या हुआ?"
"फिर रिपोर्ट वापस आई। लाल पेन से चार जगह काटी हुई। और नीचे लिखा था — 'भाषा ठीक करें।'"
"किसने काटी?"
"मेरे पापा ने वापस दी," उसने कहा। "पर जो लिखा था, वो उनकी लिखाई नहीं थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पर मैं वो समझ गया जो वो कह रही थी। काग़ज़ अकेले नहीं आते। काग़ज़ के पीछे हाथ होते हैं। और हाथ के पीछे नाम होते हैं। और नाम के पीछे वो कुर्सी होती है जिस पर बैठकर आदमी सोचता है कि शहर उसका है।
"मैडम," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"आज दस बजे पीपल पर सभा है। आप आएँगी?"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर लौट आया जो एक पल के लिए गया था।
"मैं क्या कहूँगी वहाँ?"
"आप जो अभी मुझसे कहा है, वही कह दें।"
"पर अगर मैंने कह दिया," उसने कहा, धीरे-धीरे, जैसे हिसाब लगा रही हो, "तो मेरे पापा की कंपनी —"
"आपके पापा की कंपनी," मैंने कहा, "अभी भी चल रही है। बस अब किसी और के हाथ से। उन्होंने जो हस्ताक्षर किए, वो अपने हाथ से नहीं किए। उनसे कराए गए। मुझे पता है, क्योंकि मेरे पापा से भी कराए गए थे।"
वो रुक गई।
"आपके पापा से भी?"
"पाँच साल पहले," मैंने कहा। "मेरे पापा एक काग़ज़ पर अंगूठा लगा आए। और वो अंगूठा अब भी उनका पीछा करता है। हर रात। आपके पापा के साथ भी यही होगा। मैंने उन्हें नहीं देखा, पर मैं दावे से कह सकता हूँ कि वो रात को उठकर बैठते होंगे और सोचते होंगे कि उस दिन दरवाज़ा बंद करके क्यों नहीं सो गए।"
शालिनी ने आँखें बंद कर लीं।
तभी उसका फ़ोन फिर बजा।
इस बार उसने फ़ोन उठाया, स्क्रीन देखी, और देखने से ही पता चल गया कि कौन है। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कुछ नहीं कहा। उसने फ़ोन उठाया।
"हाँ, पापा।"
वो सुनती रही। सुनती रही। और उसका चेहरा धीरे-धीरे बदल रहा था। जैसे फ़ोन से कोई आवाज़ नहीं, कोई तार निकल रहा हो और उसके चेहरे से लिपट रहा हो।
"पापा," उसने बीच में कहा। "पापा, एक मिनट रुकिए।"
पर दूसरी तरफ़ से बोलना बंद नहीं हुआ। वो फिर सुनती रही। और फिर उसने बहुत धीरे से कहा:
"पापा, मैं हस्ताक्षर नहीं करूँगी।"
एक पल का पूरा आँगन सुन रहा था। मुझे पीछे बच्चों की साँसें सुनाई दीं — सानिया की कॉपी रुक गई, गुड्डू की चप्पल ज़मीन से चिपक गई।
दूसरी तरफ़ से आवाज़ तेज़ हुई। शालिनी ने फ़ोन थोड़ा कान से दूर किया। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"पापा, सुनिए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो मैंने अपनी माँ में देखी है — जब वो चूल्हे के पास खड़ी होकर कहती हैं कि अब बहुत हुआ। "पापा, वो बीस लाख हमारे पास नहीं थे। वो हमारे थे ही नहीं। हमने उन्हें अपना समझ लिया, बस। और अब मैं जानती हूँ कि आप रात को क्यों उठकर बैठते हैं।"
फ़ोन पर कुछ कहा गया।
"नहीं, पापा," उसने कहा। "मैं सोच नहीं रही। मैं पहली बार सोच रही हूँ।"
फिर वो कुछ देर सुनती रही, और फिर उसने फ़ोन काट दिया।
वो कुर्सी पर पीछे टिक गई, जैसे सारी ताक़त चली गई हो। उसने चश्मा उतारा, आँखों के कोने पोंछे, और उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर अब वो रो नहीं रही थी। वो उस तरह की शांत थी जो रोने के बाद आती है।
"आज दस बजे?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"पीपल पर?"
"हाँ।"
"मैं आऊँगी," उसने कहा।
मैंने कुर्सी से उठने की कोशिश की और फिर रुक गया। "एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"वो रिपोर्ट — जो लाल पेन से काटी हुई वापस आई थी। वो आपके पास है?"
उसने कुछ देर सोचा। फिर उसने अपना बैग खोला, अंदर से एक और फ़ाइल निकाली, और उसमें से काग़ज़ों का एक सेट निकाला। वो काग़ज़ पुराने थे, पर उन पर लाल पेन के निशान साफ़ थे। चार जगह कटी हुई। और नीचे वो लाइन — 'भाषा ठीक करें।'
"इसे मैंने फेंका नहीं," उसने कहा। "मैं हर बार फेंकने जाती, फिर लौटा देती।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन किसी को दिखाना पड़ेगा," उसने कहा, और फिर उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखकर एक छोटी सी थकी मुस्कान दी, जो उस चेहरे पर बहुत दिनों बाद आई थी। "पर मुझे नहीं पता था कि वो कोई साइकिल मरम्मत वाला होगा।"
"मुझे भी नहीं पता था," मैंने कहा। "आपको क्या लगता है, मुझे मालूम था कि मैं ज़िंदगी में क्या करूँगा? मुझे तो टिंकू ने बताया — उस्ताद, आप बड़े आदमी बनेंगे।"
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई, "मैंने ऐसा कहा था?"
"अब मत बिगाड़," मैंने बिना पलटे कहा।
शालिनी हँसी। छोटी सी हँसी। पर हँसी ज़रूरी होती है।
मैंने फ़ाइल माँगी और वो काग़ज़ मेरे हाथ में दिए। मैंने उन्हें ध्यान से देखा। तारीख़, हस्ताक्षर, लाल पेन। सब कुछ। और उन काग़ज़ों में वो भी था जिसकी मुझे तलाश थी — एक काग़ज़ जिस पर छत की मरम्मत का कुल हिसाब था, और उसके नीचे एक लाइन: "काम पूरा — भुगतान बाकी।"
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"यही सबसे बड़ी चीज़ है," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर धीमी हुई। "ये काग़ज़ कहता है कि छत की मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। पर भुगतान बाकी है। और भुगतान बाकी है क्योंकि —"
वो रुकी और उसने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि?" मैंने कहा।
"क्योंकि मेरे पापा की कंपनी ने वो मरम्मत की ही नहीं," उसने कहा। "वो रसीद झूठी है। मेरे पापा ने कभी मरम्मत की ही नहीं। उन्होंने सिर्फ़ काग़ज़ पर हाँ लिख दी।"
मैंने काग़ज़ नीचे रखा।
"तो छत टूटी नहीं है," मैंने कहा।
"छत ठीक है," उसने कहा। "टूटा हुआ एक भी नहीं है। जो टूटा है, वो ये काग़ज़ है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "और काग़ज़ के टूटने से छत नहीं गिरती।"
"नहीं गिरती," उसने कहा। "पर काग़ज़ के टूटने से आदमी गिरता है।"
बाहर, स्कूल के गेट पर, किसी ने लोहे का गेट खटखटाया। तीन दस्तकें। उस तरह की दस्तकें जो कोई आगंतुक नहीं करता, बल्कि वो करता है जिसे पता है कि अंदर कोई है और वो चाहता है कि अंदर वाला जान जाए कि बाहर कोई खड़ा है।
मैंने पलटकर देखा।
गेट के पार, धूप में, वो सफ़ेद कुर्ता खड़ा था।
पर इस बार वो अकेला नहीं था। उसके पीछे, गली के मुँह पर, एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, और गाड़ी का दरवाज़ा खुला था।
शालिनी ने भी देखा। उसका हाथ फिर काग़ज़ पर गया और इस बार उसने कोना नहीं मोड़ा। उसने काग़ज़ पकड़ लिया, सीने से लगाया, और उसने कहा — उसकी आवाज़ में डर नहीं था, थकान थी, बहुत पुरानी थकान:
"वो मेरे पापा को लेकर आया है।"
मुझे कुछ नहीं कहना था। पर मेरे कान में घंटी ने धीरे से कहा:
"आज हस्ताक्षर नहीं गिरेंगे। आज नाम गिरेगा।"
और गेट खुल गया।
॥
गेट खुल गया।
और बाहर, धूप में, वो सफ़ेद कुर्ता खड़ा था। काली अंगूठी वाली उँगली से उसने गेट की सलाख पकड़ी हुई थी, जैसे कोई दरवाज़ा खटखटाने के बाद अंदर आने की इजाज़त का इंतज़ार कर रहा हो — जबकि उसे पता था कि इजाज़त मिल चुकी है।
पर मैंने जो देखा, वो उसके पीछे था।
गली के मुँह पर एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी, दरवाज़ा खुला हुआ। और उस दरवाज़े से उतरकर एक आदमी स्कूल की तरफ़ आ रहा था।
छोटा कद, पतला शरीर, फीकी सफ़ेद कमीज़ जिसकी आस्तीनें कोहनी पर सिकुड़ी हुई थीं। हाथ में एक मोटा बैग — वो बैग जिसके कोनों से काग़ज़ झाँक रहे थे। चलते वक़्त उसकी चप्पलें धूल में आवाज़ कर रही थीं, और वो आवाज़ किसी बूढ़े ताले की तरह थी।
वो शालिनी के पापा थे।
मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था। पर मैंने उन्हें पहचान लिया। इंसान को पहचानने के लिए चेहरा ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी उसके चलने का ढंग काफ़ी होता है।
शालिनी ने उन्हें देखा, और उसका पूरा चेहरा नहीं बदला — बदली तो उसके हाथों की पकड़। काग़ज़ का जो बंडल उसने सीने से लगाया हुआ था, वो एकदम सख़्त हो गया, जैसे किसी ने उसके बीच में लोहे की पट्टी डाल दी हो।
"पापा," उसने कहा। आवाज़ बहुत छोटी थी।
उन्होंने जवाब नहीं दिया। उन्होंने पहले गेट से बाहर, सफ़ेद गाड़ी की तरफ़ देखा, फिर अंदर, अपनी बेटी की तरफ़। और जब बोले, तो आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने रेडियो को बहुत धीरे पर चालू किया गया हो।
"बेटा, साहब कह रहे हैं कि काग़ज़ आज ही हो जाना चाहिए। काम रुका हुआ है।"
"पापा —"
"मैंने उनसे कहा कि मेरी बेटी समझदार है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो विनती थी जो बाप अपनी बेटी से नहीं, दुनिया से करता है। "मैंने कहा कि वो ग़लत काग़ज़ पर हाथ नहीं लगाएगी, पर सही काग़ज़ पर लगाएगी।"
सफ़ेद कुर्ते वाले ने बीच में बहुत नरमी से कहा, "अंकल जी, कोई जल्दी नहीं है। बस साहब का ख़याल है कि बच्ची का नाम किसी ग़लत काग़ज़ में न आ जाए। बच्ची का भविष्य है।"
मुझे ये लाइन अंदर तक चुभ गई। "बच्ची का भविष्य।" इतनी मीठी आवाज़ में इतनी सफ़ाई से कही गई बात कि उसमें कहीं भी धमकी नहीं लगती — और फिर भी वो पूरी धमकी ही होती है।
मैं आगे आया।
"अंकल," मैंने कहा, "मैं अंकुश हूँ। इस गली में साइकिल ठीक करता हूँ।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। मेरी जीन्स पर ग्रीस के निशान थे, हाथों पर भी। उन्हें यक़ीन नहीं हुआ कि मैं वो आदमी हूँ जिसकी बात उनकी बेटी करती रही है।
"तुम वही हो?" उन्होंने कहा।
"हाँ। और मैं एक बात कहूँ, अंकल?"
"कहो।"
"मैं जो पहिया ठीक करता हूँ, उसे बल से सीधा नहीं करता।" मैंने धीरे से कहा। "जिस पहिये की तीलियाँ तनी हुई हों, उसे अगर ज़ोर से सीधा करने की कोशिश करो, तो वो सिर्फ़ टूटता है। बल से पहिया ठीक नहीं होता अंकल। बल से सिर्फ़ ब्रेक लगता है।"
वो चुप हो गए।
और उस चुप्पी में शालिनी ने कहा, बहुत साफ़ और बहुत धीमे, "पापा, मैं उस काग़ज़ पर हस्ताक्षर नहीं करूँगी।"
सफ़ेद कुर्ते वाले ने कुछ कहना चाहा, पर इस बार उन्होंने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। अपनी बेटी के सामने, अपने ही हाथ से, उसने उस आदमी को रोका।
फिर वो थोड़ा हिले, थोड़ा और झुके, और बोले, "बेटा, मैं तुझसे कुछ नहीं माँगता। बस इतना कह रहा हूँ कि कंपनी में बाईस आदमी हैं। तीन महीने से मज़दूरी बाकी है। अगर ये काम निकल गया तो…" उन्होंने बात पूरी नहीं की। "मैं तुझसे कुछ नहीं माँगता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मुझे वो चीज़ दिखाई दी जो बहुत कम लोग देख पाते हैं — एक आदमी जो अपनी बेटी से पहली बार कुछ माँग रहा है, और इस डर में माँग रहा है कि माँगने के बाद वो बेटी थोड़ी कम रह जाएगी।
"अंकल," मैंने कहा, "शाम पाँच बजे पीपल के नीचे। आप भी आइए। काग़ज़ मत लाइए। फ़ाइल मत लाइए। सिर्फ़ आप आइए।"
"मैं क्या करूँगा वहाँ?"
"आप कुछ नहीं करेंगे," मैंने कहा। "बस सुनिएगा। कभी-कभी बाप को अपनी बेटी की आवाज़ सुनने के लिए किसी और की छत की ज़रूरत पड़ती है।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर पलटे, और अपने बैग के साथ, धीरे-धीरे गली के मुँह की तरफ़ चल दिए। सफ़ेद कुर्ते वाला उनके पीछे-पीछे गया — पर जाने से पहले उसने एक बार पलटकर देखा। मुझे नहीं, मेरी जेब की तरफ़। जैसे उसे पता हो कि मेरी जेब में क्या रखा है और वो चीज़ उसे कितनी परेशान करती है।
गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ और गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई।
शालिनी वहीं खड़ी रही, काग़ज़ सीने से लगाए। फिर उसने धीरे से कहा, "आपने उन्हें पाँच बजे बुला लिया। आपको पता भी है मैं क्या कर रही हूँ?"
"नहीं पता," मैंने कहा। "इसीलिए तो पाँच बजे तक इंतज़ार कर रहा हूँ।"
उस दिन बीच में जो हुआ, सुबह की सभा, रज़ा सलीम का रजिस्टर, दुबे अंकल का लिफ़ाफ़ा — वो सब अपनी जगह है। पर शाम पाँच बजे, जब सूरज पीपल की डालों में उलझा हुआ था और गली की दीवारें गरम थीं, मैं शालिनी को जोड़ केंद्र पर ले आया।
वो मेरे पीछे-पीछे चल रही थी, काग़ज़ का बंडल अब भी सीने से लगाए, जैसे कोई बच्चा टूटा खिलौना लिए चलता है — न फेंक सकता है, न छोड़ सकता है।
पीपल के नीचे टूटी लकड़ी की मेज़ रखी थी। उस पर सफ़ेद पेंट का बोर्ड — बच्चों ने उलटे-सीधे अक्षरों में लिखा था, "जोड़ केंद्र। टूटी चीज़ लाओ। टूटा रिश्ता साथ लाओ।"
उस्ताद अली बक्श अपनी लकड़ी की स्टूल पर बैठे थे, चश्मा कान पर पेंसिल दबाए हुए। मीरा चबूतरी के किनारे खड़ी थी और उसका कैमरा तिपाई पर था — पर लाल बत्ती बंद। उसने आज अपनी मर्ज़ी से कैमरा बंद रखा था।
टिंकू मेज़ के पीछे खड़ा था, हाथ में वो छोटा पेंचकस जो उसे रात में भी पकड़े रहने की आदत पड़ गई थी। शबनम आपा गुमटी से एक ट्रे में चार गिलास चाय रखकर आई और मेज़ के कोने पर रख दी, फिर अपनी लोहे की चिमटी कमर में खोंसकर वहीं खड़ी हो गई। उसका बोलना शुरू ही नहीं हुआ था, पर उसके चेहरे पर साफ़ लिखा था कि आज किसी को जाने नहीं देगी।
और पीछे, चबूतरी के दूसरे सिरे पर, बच्चे बैठे थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। किसी ने हँसी नहीं की। ये बहुत बड़ी बात थी। इन चारों ने जिस दिन हँसना बंद कर दिया, उस दिन समझ लेना चाहिए कि गली में कुछ भारी हो रहा है।
मैंने शालिनी के लिए कुर्सी खींची।
"बैठिए।"
वो बैठी। काग़ज़ का बंडल उसने गोद में रखा।
मैंने चारों तरफ़ देखा और सीधा बोला, "आज जोड़ केंद्र खुला है। पर आज मुझे टूटी चीज़ नहीं चाहिए।"
टिंकू ने तुरंत पूछा, क्योंकि वो बिना पूछे रह ही नहीं सकता था, "तो क्या चाहिए, उस्ताद?"
"टूटा सच," मैंने कहा।
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैडम," मैंने कहा, "नसीमा बाई का तराज़ू का पलड़ा जुड़ गया, आपको पता है क्यों? क्योंकि उन्होंने और साजिद ने एक-दूसरे से वो बात कही जो सालों से अंदर दबी थी। बेटे ने कहा कि वो घर से भागना चाहता था। माँ ने कहा कि वो खुद को अकेला समझती है। दोनों ने एक-दूसरे से ऐसी बात कही जो उन्होंने किसी को नहीं बताई थी। उसके बाद पलड़ा अपने आप नहीं जुड़ा — उन्होंने जोड़ा। हमने सिर्फ़ हाथ लगाया।"
मैंने रुककर उसकी तरफ़ देखा।
"आपने मुझे स्कूल में सच बता दिया। काग़ज़ भी दे दिया। ये आधा है।"
"आधा?" उसने कहा। "मैंने आपको सब बताया। रिपोर्ट, लाल पेन, पापा की कंपनी, बीस लाख — सब।"
"हाँ," मैंने कहा। "और यही आधा है।"
तभी मेरी जेब से वो आवाज़ आई। धीमी। फटी। जैसे दो आवाज़ें एक साथ बोल रही हों और बीच में एक धागा टूट रहा हो।
"आधा सच। आधा जोड़।"
शालिनी चौंककर पीछे हटी।
"ये क्या था?"
"ये मेरी घंटी है," मैंने कहा। "और आज ये सही बोल रही है, इसलिए मैं इसे बंद नहीं करूँगा।"
उस्ताद ने पहली बार बात की। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो लोहा था जो सिर्फ़ सत्तर साल की सिलाई में आता है।
"बेटी," उन्होंने कहा, "सच तीन तरह का होता है। एक, जो अंदर दबाकर जीना पड़ता है — वो सबसे भारी है। दूसरा, जो एक आदमी को बताकर हल्का कर लिया जाता है — वो आधा है। और तीसरा, जो उन सबके सामने बोला जाता है जिनसे छिपाया गया था। जोड़ सिर्फ़ तीसरे से बनता है।"
"मैं सबके सामने बोल दूँ?" शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़वाहट आ गई जो डरे हुए लोगों में आती है। "क्या बोलूँ? कि मेरे पापा की कंपनी साहब के काम पर टिकी है? कि मैं रोज़ सुबह उठकर सोचती हूँ कि आज कोई फोन आएगा और सब खत्म हो जाएगा? क्या फ़ायदा बोलने से?"
"फ़ायदा यह है," मैंने कहा, "कि जो बात आपने अभी मुझसे कही, वो अब सिर्फ़ आपके अंदर नहीं है। और जो बात एक सभा में कही जाती है, वो किसी एक आदमी के दबाव में नहीं रहती।"
वो चुप बैठी रही। फिर उसने काग़ज़ का बंडल गोद में और कसकर पकड़ लिया, और मुझे लगा कि वो कुछ कहेगी — कुछ तेज़, कुछ गुस्से में।
पर वो नहीं कही।
वो रोई।
और ये रोना वो नहीं था जो धीरे-धीरे आता है। ये वो था जो एक ही झटके में टूटता है। उसने अपना मुँह हाथ से ढक लिया, कंधे हिलने लगे, और काग़ज़ का बंडल गोद से फिसलकर ज़मीन पर गिर गया — पर उसने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की। जैसे वो चीज़ अब उसकी नहीं रही।
शबनम आपा तुरंत आगे आई और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसके पास बैठ गई। कुछ नहीं बोली। मेरी जानकारी में शबनम आपा के पास अगर कोई सबसे बड़ी कला है, तो वो यही है — उन्हें पता है कब चुप रहना है। और ये कला उन लोगों में आती है जिन्हें खुद बहुत बोलना पड़ा हो।
कुछ देर बाद शालिनी ने हाथ नीचे किया।
"बाईस आदमी हैं," उसने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी। "मेरे पापा की कंपनी में बाईस आदमी काम करते हैं। जब पापा ने शुरू किया था तब नौ थे। पापा कहते हैं कि हर आदमी के घर में एक चूल्हा है और वो चूल्हा मेरे हाथ में है।"
उसने सामने पीपल की जड़ की तरफ़ देखा।
"तीन महीने से मज़दूरी बाकी है। पापा रात को सोते नहीं। उठकर बैठ जाते हैं और उसी हिसाब की कॉपी खोलते हैं जिसमें लिखा होता है कि किसको कितना देना है। मैंने एक बार पूछा, 'पापा सो जाइए', तो उन्होंने कहा, 'सो जाऊँ तो क्या वो कम हो जाएगा?'"
वो रुकी। फिर बोली, "साहब के दफ़्तार में उन्हें 'बेटा' कहकर बुलाया जाता है। मेरे पापा पचास के हैं। उन्हें 'बेटा' कहकर बुलाया जाता है और वो हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। मुझे वो सबसे ज़्यादा चुभता है। किसी को 'बेटा' कहकर बुलाना उनका हथियार है। वो बड़ा नहीं दिखना चाहते, वो छोटा करना चाहते हैं।"
मैं चुप बैठा रहा। मुझे कुछ कहना नहीं था। जिस वक़्त आदमी बोल रहा हो, उस वक़्त टोकना सबसे बड़ी ग़लती है। ये मैंने अपने पापा से सीखा। उन्होंने पाँच साल में जो नहीं कहा, वो मैंने पाँच साल में सीखा — कि चुप्पी में भी बहुत कुछ कहा जाता है।
"पहली रिपोर्ट मैंने सच लिखी थी," शालिनी ने कहा। "मैंने छत नापी। मैंने कोना देखा। मैंने लिखा कि छत ठीक है, मरम्मत की ज़रूरत नहीं, बस कोना पुराना है। और जो बीस लाख का हिसाब दिखाया जा रहा है, वो छत का नहीं है — वो गली के पीछे की नाली और उसके साथ जुड़े दूसरे काम का है, जो इसी काग़ज़ में छिपाया जा रहा है।"
"और फिर?" उस्ताद ने कहा।
"फिर वो काग़ज़ मेरे पास वापस आया," उसने कहा। "चार जगह लाल पेन से कटा हुआ। नीचे एक लाइन — 'भाषा ठीक करें।' जैसे मैं कोई ग़लत अंग्रेज़ी लिख रही हूँ। जैसे मैंने 'छत ठीक है' की जगह 'छत ठीक हौ' लिख दिया हो।"
टिंकू ने कहा, "पर आपने ठीक लिखा था ना?"
"हाँ," उसने कहा। "मैंने ठीक लिखा था। और यही ग़लती थी।"
मीरा ने पहली बार कुछ कहा। उसने कैमरा नहीं छुआ, बस कहा, "मैं एक बात कहूँ?"
"कहिए," शालिनी ने कहा।
"जो सच आधा छोड़ दिया जाता है, वो बाद में पूरा होकर वापस आता है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत सपाट थी, जैसे कोई चीज़ जो उसने खुद बहुत बार सोची हो। "और जब वो वापस आता है, तब वो तुम्हारा नहीं रहता। वो सिर्फ़ किसी और की ख़बर होता है। उस वक़्त तुम बोलने वाले नहीं, तुम बोले जाने वाले होते हो।"
शालिनी ने मीरा की तरफ़ देखा, और कुछ देर देखती रही। उसे नहीं पता था कि ये बात मीरा खुद अपने बारे में कह रही है। गली में किसी को नहीं पता था।
"मैंने दूसरी रिपोर्ट लिखी," शालिनी ने कहा, आवाज़ फिर से धीमी हो गई। "उसमें छत खतरनाक हो गई। तुरंत बंद करने की सिफ़ारिश आ गई। बीस लाख की लाइन भी अंदर आ गई। सब कुछ… साफ़ और सुंदर।"
वो रुकी, और उसके होंठ हिले बिना उसने कुछ कहा, फिर आवाज़ देकर बोली, "पर मैंने उस पर हस्ताक्षर नहीं किए।"
"नहीं किए?" मैंने कहा।
"उसके नीचे हस्ताक्षर की जगह खाली छोड़ दी," उसने कहा। "तीन दिन से वो जगह खाली है। और आज उसे भरना था।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे समझ आया कि ये तीन दिन उसके लिए क्या रहे होंगे। एक खाली जगह। काग़ज़ पर एक खाली जगह — और वो खाली जगह अंदर तक फैलती जाती है। आदमी सो नहीं पाता, क्योंकि सोने के लिए सबसे पहले ये पता होना चाहिए कि तुम्हारी जगह कौन सी है।
"और कल रात पापा का फोन आया," उसने कहा।
वो रुकी।
"कहिए," मैंने धीरे से कहा।
"उन्होंने कहा — 'बेटा, मैं तुझसे कभी कुछ नहीं माँगा।'" शालिनी की आवाज़ अचानक बैठ गई, जैसे किसी ने उसके गले पर हाथ रख दिया हो। "और यही सबसे बुरा है। सच में, यही सबसे बुरा है। अगर उन्होंने पहले कुछ माँगा होता, तो मैं मना करना सीख जाती। पर उन्होंने कभी कुछ नहीं माँगा। कभी नहीं। और अब जब माँगा, तो मैं मना भी नहीं कर पा रही, और हाँ भी नहीं कह पा रही।"
वहाँ कुछ देर चुप्पी रही। सिर्फ़ पीपल के पत्ते हिल रहे थे, और दूर गुमटी पर किसी के चाय के गिलास की खनक आ रही थी।
तभी मेरी जेब से घंटी फिर बोली। इस बार आवाज़ और ज़्यादा चरचरी थी, जैसे पीतल के अंदर कोई लोहा घिस रहा हो।
"आधा सच। आधा जोड़।"
शालिनी ने आँसू पोंछे और सीधी होकर बैठ गई।
"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो चीज़ आ गई जो थकान के बाद आती है — एक ठंडी, साफ़ सख़्ती। "मुझे बताइए कि पूरा सच क्या है। मैं क्या करूँ?"
तभी टिंकू ने वो सवाल पूछा जो किसी बड़े ने नहीं पूछा था। वो मेज़ के पीछे से निकला और उसने सीधे शालिनी से कहा, "दीदी, एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपको डर किसका है?" उसने कहा। "पापा के काम जाने का, या इस बात का कि पापा आपसे नाराज़ हो जाएँगे?"
शालिनी ने बहुत देर तक उसकी तरफ़ देखा। फिर वो बोली, "तुम्हारी उम्र कितनी है?"
"तेरह।"
"तेरह साल के बच्चे ऐसे सवाल नहीं पूछते।"
"तेरह साल के बच्चे ऐसे सवाल सबसे ज़्यादा पूछते हैं," टिंकू ने कहा, बिल्कुल सीधे। "बड़े लोग पूछना बंद कर देते हैं।"
शालिनी हँसी — छोटी सी, एक झटके में, और वो हँसी अचानक आई इसलिए थोड़ी अजीब भी लगी। फिर वो गंभीर हो गई और बोली, "डर इस बात का है कि पापा मुझसे नाराज़ हो जाएँगे। काम का डर उससे छोटा है। काम चला जाए तो कुछ और हो जाएगा। पर अगर पापा मुझे ऐसे देखने लगे जैसे मैंने उनका घर तोड़ दिया है, तो…"
उसने बात अधूरी छोड़ दी।
उस्ताद ने स्टूल पर थोड़ा आगे झुककर कहा, "बेटी, एक बात कान खोलकर सुन लो। माफ़ी और सच, दोनों का एक ही नियम है। जो माफ़ी डर से कही जाए, वो माफ़ी नहीं। जो सच खुद के बचाव के लिए बोला जाए, वो सच नहीं।"
"तो फिर सच बोलने से क्या होगा?" शालिनी ने पूछा।
"सच बोलने से ये होगा," उस्ताद ने कहा, "कि वो अब सिर्फ़ तुम्हारे अंदर नहीं रहेगा। आज तक वो बात एक ही आदमी के दबाव में थी — तुम्हारे। कल से वो सबके सामने होगी। और सबके सामने की बात पर कोई एक आदमी मुहर नहीं लगा सकता।"
"पर उनके सामने बोलने का मतलब है साहब के सामने बोलना," शालिनी ने कहा। "आप समझ रहे हैं ना? मैं जो बोलूँगी, वो सीधे उनके दफ़्तार तक जाएगा। और उसके बाद मेरे पापा की कंपनी के पास कुछ नहीं बचेगा।"
"और अगर नहीं बोलोगी?" मीरा ने कहा।
"तो ये काग़ज़ अनाथ रहेगा," शालिनी ने कहा। "और मैं अपनी सारी ज़िंदगी उस खाली जगह को देखती रहूँगी।"
"तो फिर जवाब तुम्हारे पास है," मीरा ने कहा।
शबनम आपा ने चाय का गिलास उसकी तरफ़ सरका दिया और कहा, "पहले पी लो। ठंडी हो गई तो फिर गरम करने का बहाना ढूँढना पड़ेगा, और आज मैं तुम्हें बहाना नहीं दूँगी।"
शालिनी ने गिलास उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे, इसलिए दोनों हाथों से उठाया। दो घूँट पिए। फिर गिलास रखा और कहा, "मैं एक बात साफ़ कर दूँ। मैं रो रही हूँ इसका मतलब ये नहीं कि मैं मान गई हूँ। मैं रो रही हूँ क्योंकि तीन दिन से मैं ये सब किसी को नहीं बता रही थी, और अब बता दिया तो आँसू अपने आप आ गए।"
"ठीक है," मैंने कहा। "रोना और मानना अलग-अलग चीज़ें हैं। मैं भी जब पहली बार अपने पापा के काग़ज़ के बारे में जाना था, तो मैंने दो दिन किसी से बात नहीं की थी। रोया भी नहीं और माना भी नहीं। इसलिए मैं समझ सकता हूँ।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखकर कहा, "आपको क्या लगता है मेरे पापा समझेंगे?"
मैंने सोचा। सच में सोचा। और फिर वही कहा जो सच था, "नहीं जानता। कुछ पापा समझते हैं और कुछ पापा समझने में ज़िंदगी भर लगा देते हैं। मेरे पापा पाँच साल ले लिए थे।"
तभी उस्ताद ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और चश्मा पोंछने लगे — और ये उनका इशारा था कि वो कुछ कहने जा रहे हैं जो उनके लिए आसान नहीं है।
"बेटी," उन्होंने कहा, धीरे-धीरे, जैसे हर शब्द सिलाई की तरह तोलकर डाल रहे हों, "तुम्हें पता है मेरे पास एक दुकान है और एक भाई था? पचास साल से मैं उससे नहीं बोला। एक बात पर। एक छोटी बात पर, जो दो महीने में सुलझ सकती थी। और उसे सुलझाने के लिए मुझे जो एक बात कहनी थी, वो मैंने नहीं कही। मुझे लगा, कहे बिना भी हो जाएगा। पचास साल में वो नहीं हुआ।"
उन्होंने चश्मा पहना।
"मैं तुम्हें ये नहीं कह रहा कि तुम अपने पापा से लड़ो। मैं ये कह रहा हूँ कि जो बात ब"…जो बात बोलने से रिश्ता बचता है, वो बात चुप रहने से रिश्ता खा जाती है," उस्ताद ने कहा। "और उसके बाद जो बचता है, वो रिश्ता नहीं होता, बेटी। आदत होती है। मैंने पचास साल आदत में गुज़ार दिए। तुम्हें पचास दिन भी न दूँ।"
शालिनी ने उनकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो पानी था जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था, पर वो ज़िद कर रही थी कि गिरे नहीं। उसने होंठ कसकर बंद कर लिए, जैसे अंदर से कोई आवाज़ निकलने से रोक रही हो।
शाम हो रही थी। पीपल की छाया लंबी हो चली थी और चबूतरी पर बैठे लोगों के चेहरे उस छाया में धुँधले पड़ रहे थे। शबनम आपा ने गुमटी से एक और गिलास उठाया और चुपचाप मेज़ पर रख दिया। उसकी चिमटी आज पीतल की थाली पर नहीं पड़ी थी। आज वो चुप थी, और शबनम आपा का चुप रहना अपने आप में एक बात थी।
"शालिनी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ वैसी ही रखी जैसी दुकान पर किसी अनजान ग्राहक से बात करते वक़्त रखता हूँ, "मैं तुमसे कोई बड़ी बात नहीं कहूँगा। न उपदेश दूँगा, न डराऊँगा। बस एक बात पूछूँगा।"
उसने गिलास उठाया, और इस बार घूँट बड़ा लिया।
"पूछिए," उसने कहा।
"ये काग़ज़ जो तुमने मुझे दिए," मैंने कहा, और उँगली उन काग़ज़ों पर रखी जो मेज़ पर खुले पड़े थे, "ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं हैं। ये तुम्हारे हाथ की लिखाई हैं। तुमने ये लिखे हैं। इन पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं।"
"हैं," उसने कहा।
"तो जब तुमने ये लिखे, तब क्या सोचा था?"
वो रुकी। गिलास नीचे रखा। और फिर उसने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी कहेगी।
"मैंने सोचा था कि ये सिर्फ़ एक काम है," उसने कहा। "एक रिपोर्ट है। कोई इंसान नहीं मर रहा, कोई घर नहीं गिर रहा। बस एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर हैं, और बदले में पापा की कंपनी के मज़दूरों का तीन महीने का हिसाब चल जाएगा। मैंने खुद से कहा — शालिनी, तू इंजीनियर है, तेरा काम सिर्फ़ सिफ़ारिश करना है। फ़ैसला बड़े लोग लेंगे।"
"और बाद में?" मीरा ने पूछा। उसने कैमरा बंद कर रखा था, पर उसकी आवाज़ में वो कड़कपन नहीं था जो अक्सर होता है। आज वो सिर्फ़ पूछ रही थी।
"बाद में," शालिनी ने कहा, "अगली सुबह जब मैं स्कूल आई और छत के नीचे खड़ी हुई, तो मुझे लगा कि छत मेरी तरफ़ झुक रही है। मुझे पता है छत नहीं झुकती। पत्थर नहीं झुकता। पर उस दिन लगा कि वो मुझे देख रही है, और कह रही है — तू झूठ बोली है।"
उसने अपनी हथेलियों को मेज़ पर रखा और फिर उन्हें वापस गोद में रख लिया।
"और आज जब मैंने आपको काग़ज़ दिए," उसने कहा, "तो लगा कि जो बोझ मैं तीन हफ़्ते से सीने पर उठाए फिर रही थी, वो थोड़ा हल्का हो गया।"
"थोड़ा," मैंने कहा। "पूरा नहीं।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"पूरा नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि जो सच सिर्फ़ मुझे बताया जाता है, वो आधा सच रहता है। जो सच एक बंद कमरे में, एक मेज़ के नीचे, एक गिलास चाय के साथ बोला जाता है, वो राहत देता है, पर मुक्ति नहीं देता। मुक्ति के लिए उसे खुली हवा में बोलना पड़ता है।"
"मैंने आपको सब बता दिया," उसने कहा, थोड़ा तेज़। "मैंने काग़ज़ दिए, रिपोर्ट दी, कटी हुई लाइनें दिखाईं, पापा की बात बताई, कंपनी की बात बताई। और क्या चाहिए?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे मेज़ पर रख दिया। पीतल की घंटी, जो अब बहुत पुरानी दिखने लगी थी। और मैंने उसे छुआ।
घंटी बोली, और उसकी आवाज़ वैसी ही थी जैसी पुरानी हो चुकी हो और अब ठीक से बोल भी नहीं पाती —
"आधा सच… आधा जोड़…"
शालिनी ने घंटी की तरफ़ देखा। पहली बार उसने उसे ध्यान से देखा। वो चुप हो गई। और फिर उसने धीरे से पूछा, "ये क्या है?"
"ये वो चीज़ है," मैंने कहा, "जो सिर्फ़ तब बोलती है जब दो लोगों के बीच कुछ सच्चा जुड़ता है। अभी ये बोली कि तुम्हारा सच आधा है।"
"मेरा सच आधा नहीं है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब थोड़ी नाराज़गी थी, वो नाराज़गी जो डर के सामने खड़ी होती है। "मैंने कुछ नहीं छिपाया।"
"छिपाया नहीं है," उस्ताद ने कहा, और उन्होंने बीच में पड़कर बात सँभाली, "पर बोला भी नहीं है। ये दो अलग बातें हैं, बेटी। मैं भी पचास साल से कुछ छिपाया नहीं था। मैंने तो अपने भाई से बात ही नहीं की। छिपाना क्या था? चुप रहना छिपाना नहीं होता, पर उसका असर वही होता है।"
उन्होंने अपनी मोटी उँगली मेज़ पर रखी।
"तुमने सच मुझे बताया," उन्होंने कहा, "अंकुश को बताया, मीरा को बताया। यहाँ बैठे चार लोगों ने सुना। पर कल सुबह जब पीपल के नीचे पूरी गली जमा होगी, जब वो बूढ़े बैठे होंगे जिन्होंने अपने बेटों की शादियाँ इसी गली में की हैं, जब रामलाल चौकीदार अपनी रुकी हुई घड़ी लेकर आएगा, जब सुनीता दीदी अपनी कटोरी रखकर खड़ी होगी, तब तुम क्या करोगी?"
शालिनी ने कोई जवाब नहीं दिया।
"तब तुम चुप रहोगी," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था, सिर्फ़ वो सच था जो बूढ़े लोग बड़ी आसानी से बोल देते हैं। "और तुम्हारी चुप्पी कोई सुनेगा नहीं। पर उसकी गूँज सुनाई देगी — उन लोगों को जो तुम्हारे पापा की कंपनी में काम करते हैं। और उन्हें लगेगा कि सच बोलने से कुछ नहीं होता। फिर वो भी चुप रहेंगे। फिर चुप्पी आगे बढ़ेगी। बस इसी तरह, एक-एक कदम, आधी गली चुप हो जाती है।"
शालिनी ने आँखें बंद कर लीं।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुझे वो रात याद आई जब मैंने पापा को सच बोलते सुना था। तब मुझे भी लगा था कि मैं सब जान गया हूँ। पर जानना और बोलना, दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। जानने वाला आदमी अकेला रह सकता है। बोलने वाले को सामने खड़ा होना पड़ता है।
"मैं तुमसे कुछ नहीं कहूँगा," मैंने कहा। "पर एक बात कहूँगा जो मेरे साथ हुई। पाँच साल मेरे पापा ने एक बात अंदर दबाकर रखी। वो रोज़ मेरे सामने बैठते थे, रोज़ मेरी साइकिल ठीक करते थे, रोज़ मेरे लिए पानी लाते थे। और मुझे लगता था कि सब ठीक है। मुझे नहीं पता था कि वो अंदर से कितने टूटे हुए थे। और जिस दिन पता चला, मुझे उन पर गुस्सा आया — ये नहीं कि उन्होंने गलती की, इस बात पर कि उन्होंने मुझे बताया क्यों नहीं। मुझे लगा कि मैं उनका बेटा हूँ, मैंने साइकिल की चेन जितनी आसानी से सँभाली होती, उतनी आसानी से ये भी सँभाल लिया होता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा भी शायद यही सोचते होंगे," मैंने कहा। "कि तू उनकी बेटी है और तेरे ऊपर ये बोझ नहीं डालना।"
शालिनी ने आँखें खोलीं। उसकी आँखों में वो पानी अब भी था, पर अब वो थोड़ा और भारी हो गया था।
"मेरी माँ नहीं है," उसने कहा, अचानक, बिना किसी तैयारी के। "यानी है, पर दस साल पहले चली गईं। किसी और के साथ। पापा ने उनका नाम कभी नहीं लिया, मैंने भी नहीं लिया। बस अब हम दो हैं। पापा और मैं। और पापा ने मेरी पढ़ाई के लिए जो किया, वो कोई नहीं करता। उन्होंने अपनी दुकान बेच दी थी, अपना पुराना स्कूटर बेच दिया था, मुझे इंजीनियरिंग कराई। और आज पूरी कंपनी चलाते हैं — छोटी कंपनी, चार मज़दूर, एक ट्रक।"
वो रुकी। उसने अपना चेहरा हाथों में नहीं छिपाया, बस सीधा देखती रही, मानो कह रही हो कि अब जो कह रही हूँ, वो भी सुन लो पूरा।
"और तीन हफ़्ते पहले जब बड़े साहब का आदमी दफ़्तर आया," उसने कहा, "तो उसने पापा से कहा — ये रिपोर्ट लिखवा दो, बदले में तुम्हारी अगली साइट का काम पक्का। पापा ने मुझे नहीं बताया कि वो क्या कर रहे हैं। वो सिर्फ़ मुझसे कहते रहे — बेटी, जैसा कहा जाए, लिख दो।"
"और तुमने लिख दिया," मीरा ने कहा।
"मैंने लिख दिया," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी।
वो टूटी, सच में टूटी। पहली बार उसने अपना चेहरा हाथों में लिया। कंधे हिलने लगे। आवाज़ आ रही थी, दबी हुई, कसी हुई, जैसे किसी बंद कमरे से आ रही हो।
टिंकू मेरे पास खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में सवाल था कि वो क्या करे। मैंने सिर हिलाकर मना कर दिया — कुछ मत कर। कभी-कभी सबसे बड़ी मदद यही होती है कि तुम रोने दो, टोको मत।
शबनम आपा ने चुपचाप मेज़ पर एक रूमाल रख दिया। साफ़, धुला हुआ, इस्तेमाल किया हुआ, पर साफ़। शालिनी ने वो रूमाल उठाया और उससे आँखें पोंछीं।
बहुत देर तक कुछ नहीं बोला गया। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं, और कभी-कभी कोई पत्ता नीचे आकर चबूतरी पर गिरता था। चिंटू दूर खड़ा था और उसने उसे उठाने के लिए झुकना चाहा, पर सानिया ने उसका हाथ पकड़ लिया — अभी नहीं, अभी चुप रहो।
फिर शालिनी ने रूमाल नीचे रखा और उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब भीगी थी, पर साफ़ थी, "मुझे लगता है कि मैंने ये काम इसलिए किया क्योंकि मैं डर गई थी। पापा का हाथ काँपता है, जब वो चाय का कप पकड़ते हैं। मैंने पिछले साल देखा था। वो कहते हैं बस थकान है। पर मैं जानती हूँ वो थकान नहीं है, वो डर है। आगे क्या होगा, गाड़ी का क़िस्त आएगा, मज़दूरों को तनख्वाह चाहिए, ट्रक की मरम्मत करानी है।"
उसने रूमाल मोड़ा।
"और मैंने सोचा," उसने कहा, "कि अगर मैं भी डर गई, तो हम दोनों डूब जाएँगे। इसलिए मैंने हस्ताक्षर कर दिए। और मैं सोचती रही कि कोई नहीं जानेगा।"
"कोई नहीं जानता," उस्ताद ने कहा, "जब तक कि किसी को पता न चले।"
"अब पता चल गया," शालिनी ने कहा।
"तो अब केवल एक सवाल बचा है," मैंने कहा। "और वो ये है — कल दस बजे तुम क्या करोगी?"
मैंने कुर्सी पीछे सरका दी और अपनी मेज़ के पीछे से एक काग़ज़ निकाला, और उसे सामने रख दिया। वो जगह, वो मेज़, वो काग़ज़ — कुछ भी बड़ा नहीं था। मैंने सिर्फ़ कहा, "देखो, यहाँ मैंने लिखा है। पीपल के नीचे, टूटी मेज़ पर, सुबह दस बजे, सबके सामने। और ये काग़ज़ किसी काम का नहीं। बस याद दिलाने के लिए लिखा था, कि मुझे भूलना नहीं है।"
शालिनी ने काग़ज़ की तरफ़ देखा। फिर उसने कहा, बहुत धीरे से, "आप मुझे मंच पर बोलने के लिए कह रहे हैं।"
"मैं तुम्हें किसी चीज़ के लिए नहीं कह रहा," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि अगर तुम मंच पर बोलोगी, तो जो काग़ज़ तुम्हारे हाथ में हैं, वो किसी दराज़ में बंद काग़ज़ नहीं रहेंगे। वो गली की हवा में बोलेंगे। और जो सच हवा में बोलता है, उसका डर हवा में उड़ जाता है।"
शालिनी ने गिलास फिर उठाया, और इस बार उसमें चाय नहीं बची थी। उसने खाली गिलास देखा, और फिर उसे वापस मेज़ पर रख दिया, बहुत सँभालकर, जैसे वो कोई कीमती चीज़ हो।
"मैं डरती हूँ," उसने कहा।
"ठीक है," मैंने कहा। "डरो। पर एक बात याद रखो — डरना और न बोलना, दोनों अलग-अलग हैं। तुम डरते हुए भी बोल सकती हो। डरते हुए बोलने का मतलब ये नहीं होता कि डर नहीं है। मतलब ये होता है कि डर से बड़ा कुछ और भी है।"
"और वो क्या है?" शालिनी ने पूछा।
मैं सोचने लगा। ईमानदारी से सोचा। और फिर मैंने वो कहा जो शायद मुझे कहना चाहिए था।
"वो सिर्फ़ तुम जानती हो," मैंने कहा। "मैं नहीं जानता। पर मैं इतना जानता हूँ कि जो आदमी ख़ुद के झूठ से डरने लगे, उसमें अभी कुछ बचा है। तुम्हारे पापा में भी कुछ बचा है। मैंने उन्हें नहीं देखा, पर तुम्हारी बातें सुनकर लगता है कि उनमें भी वही डर है जो मेरे पापा में पाँच साल तक रहा।"
"और आपके पापा ने सच बोला था?" उसने पूछा। "फिर क्या हुआ?"
"फिर कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "और यही सबसे बड़ी बात है। मैंने सोचा था कि जब वो सच बोलेंगे तो आसमान गिरेगा, गली में तूफ़ान आएगा, सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा। पर हुआ ये कि उन्होंने सच बोला, मैंने सुना, हम दोनों रोए, और फिर अगली सुबह चाय पी। और मैंने अपनी साइकिल पर तेल डाला। उतना ही हुआ।"
"बस?" शालिनी ने पूछा।
"बस," मैंने कहा। "पर उसके बाद जो हुआ वो 'बस' नहीं था, वो बहुत कुछ था। उसके बाद जब भी मैंने उनकी तरफ़ देखा, मुझे ये नहीं लगा कि वो मेरे पापा हैं जो सब जानते हैं और मैं उनका बेटा हूँ जिसे कुछ नहीं पता। मुझे लगा कि वो भी एक आदमी हैं, जो एक दिन डर गए थे और फिर पाँच साल में उस डर से लड़ते रहे। और उस दिन से मैं उनसे डरना बंद कर दिया — सिर्फ़ इज़्ज़त करने लगा।"
शालिनी ने अपना रूमाल मोड़कर जेब में रखा। उसने मेज़ पर पड़े काग़ज़ों को समेटा, एक-एक करके, और अपने बैग में रख दिया। फिर उसने बैग का चेन खींचा।
"मैं मंच पर बोलूँगी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ साफ़ थी, "पर एक बात मान लो — मैं पूरी बात नहीं कहूँगी। मैं इतना नहीं कहूँगी कि पापा ने कहा था। मैं सिर्फ़ ये कहूँगी कि मुझे दबाव दिया गया और मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए।"
"ठीक है," मैंने कहा। "कम से कम शुरुआत तो होगी।"
"पर," उसने कहा, और उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो डर फिर लौटा, "अगर पापा का काम गया, तो वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेंगे।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
उस्ताद ने कहा, "कल सुबह वो भी वहीं होंगे।"
"नहीं होंगे," शालिनी ने कहा। "वो सफ़ेद कुर्ते वाले के साथ हैं। मुझे पता है कि वो आज रात तक पापा को कुछ और न कहें, पर कल सुबह से पहले वो उन्हें मना लेंगे। वो बड़े साहब का आदमी है।"
"फिर तो ठीक है," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार पुराना कड़कपन लौटा था, "अगर तुम्हारे पापा भी वहाँ होंगे, तो तुम्हारी बात सुनेंगे।"
"अगर सुनेंगे," शालिनी ने कहा।
"सुनेंगे," उस्ताद ने कहा। "मैं पचास साल से भाई से बात नहीं कर रहा, फिर भी उसने आज मेरे सामने आकर खड़े होकर बात सुनी। तुम्हारे पापा भी सुनेंगे, बेटी। शायद आधी सुनेंगे, शायद चौथाई सुनेंगे। पर सुनेंगे।"
शालिनी ने सिर हिलाया। फिर उसने कहा, "मैं अब चलूँ? मुझे जाना चाहिए, पापा से बात करनी है।"
"चलो," मैंने कहा।
"आप मेरे साथ नहीं आएँगे?"
मैंने देखा। उसकी आँखों में वो आस थी जो कोई भी आदमी जानता है, वो आस जो सिर्फ़ एक डर के समय होती है — कोई साथ हो, कोई पीछे खड़ा हो, कोई सामने हो। पर मैं जानता था कि ये सफ़र उसका है, और मैं वहाँ नहीं जा सकता। कुछ चीज़ें अकेले ही करनी पड़ती हैं। मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "जब तुम पापा से बात करो, तो इतना कहना — उनसे किसी ने कुछ नहीं छीना। उन्होंने खुद कुछ छोड़ा था। अब उन्हें खुद ही उठाना पड़ेगा।"
वो खड़ी हो गई।
तभी पीपल के नीचे, दूर, चबूतरी के उस पार, कुछ हलचल हुई। मैंने देखा, और मुझे लगा कि कोई दौड़ा-दौड़ा आ रहा है। सानिया दौड़कर आई, हाँफती हुई, उसके हाथ में कोई काग़ज़ था।
"भैया," उसने कहा, "रज़ा सलीम जी आए हैं। वो रजिस्टर लाए हैं और साथ में एक आदमी भी।"
"कौन आदमी?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," सानिया ने कहा, "पर वो सफ़ेद कुर्ते में नहीं है। वो काला है, दुबला है। और रज़ा सलीम जी कह रहे हैं कि ये वो आदमी है जो बाईस साल से उनके साथ काम करता है, और वो सभी काग़ज़ों के बारे में जानता है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "पर मुझे लगता है कि आज कुछ बड़ा होने वाला है।"
शालिनी ने अपना बैग कंधे पर रखा। उसने अपना रूमाल जेब से निकाला और उसे सीधा किया, और फिर वापस जेब में रख लिया।
"अच्छा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर नहीं था, थोड़ी सी थकान थी। "फिर मैं चलती हूँ।"
वो मुड़ी और चलने लगी।
तभी मेरे कान में घंटी बोली — और इस बार उसकी आवाज़ पहले से साफ़ थी, जैसे कोई पुराना रेडियो सही तरंग पकड़ लेता है, और भीतर से छोटी-छोटी आवाज़ें साफ़ आने लगती हैं —
"आधा जोड़… पूरा नहीं…"
मैंने शालिनी को रोक लिया।
"रुको," मैंने कहा।
वो रुकी और पलटी।
"घंटी कह रही है कि जो हुआ, वो आधा जोड़ है," मैंने कहा। "तुमने सच बताया, तुमने काग़ज़ दिए, तुमने दबाव माना — पर जब तक तुम अपने पापा के सामने ये नहीं कहोगी, तब तक ये आधा है।"
"मैं कहूँगी," उसने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "मुझसे कहने से कुछ नहीं होगा। मेरे सामने कहने से भी कुछ नहीं होगा। यहाँ खड़े उस्ताद, मीरा, टिंकू, शबनम आपा — इनके सामने कहने से भी पूरा नहीं होगा। पूरा तभी होगा जब कल सुबह कल सभा में, तुम्हारे सामने खड़े अपने पापा से तुम कहोगी कि 'मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर किए, क्योंकि तुम्हारा डर मेरे सीने पर चढ़ गया था।' और जब तुम ये कहोगी, तब तुम्हारा पापा बैठे नहीं रह सकेंगे। उन्हें खड़े होना पड़ेगा। और जब वो खड़े होंगे, तो या तो तुम्हें गले लगाएँगे, या तुम्हें थप्पड़ मारेंगे। दोनों में से कुछ भी हो, वो पहली बार सच बोलेंगे।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में अचानक कुछ बदला। वो डर नहीं गया, वो कुछ और था। शायद ये समझ कि सच बोलने से रिश्ता टूटता नहीं, सिर्फ़ उसका पुराना रूप टूटता है।
उसने कहा, "अब मैं चलूँ?"
"चलो," मैंने कहा।
वो गई। बैग कंधे पर, रूमाल जेब में, काग़ज़ अंदर, और एक सवाल जो अब उसके पास नहीं, उसके पापा के पास था।
मैं वहीं खड़ा रहा। घंटी ने मेरे हाथ में धीरे से कहा —
"अभी नहीं… अभी आधा…"
मैंने घंटी जेब में रखी, और पलटा।
तभी मेरे पीछे से उस्ताद ने कहा, "बेटा, एक बात सुन ले।"
मैंने पलटकर देखा।
"तुम उस लड़की पर बहुत ज़ोर डाल रहे हो," उन्होंने कहा, धीरे से, पर साफ़। "वो अभी भी डर रही है। तुम्हें लगता है कि वो मंच पर बोलेगी। पर मुझे लगता है, वो कल तक सो नहीं पाएगी। और कल सुबह भी शायद कुछ और सोच ले।"
"तो फिर?" मैंने पूछा।
"तो फिर तुम ये मत सोचना कि ये तुम्हारा काम है," उस्ताद ने कहा। "तुमने उसे रास्ता दिखाया। अब वो चले या न चले, उसका काम है।"
"पर…"
"पर क्या?" उस्ताद ने कहा, और उन्होंने अपना चश्मा थोड़ा ऊपर किया। "तुम्हें लगता है कि तुम हर टूटे हुए रिश्ते को जोड़ सकते हो? तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास घंटी है और तुम सब कुछ ठीक कर दोगे? बेटा, अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो तुम घंटी नहीं, अपना घमंड जोड़ रहे हो।"
मैं चुप हो गया।
"मैंने भी यही सोचा था," उस्ताद ने कहा। "पचास साल पहले। सोचा था कि मैं भाई को जोड़ दूँगा, माँ को जोड़ दूँगा, सब ठीक कर दूँगा। पर तब तक सब टूट चुका था। और मैं सिर्फ़ अपने हाथ मलता रह गया। क्योंकि जोड़ना सिर्फ़ एक इंसान का काम नहीं होता, बेटा। जोड़ना दोनों का काम होता है। तुम ज़ोर लगाओ, पर सामने वाला हाथ नहीं बढ़ाए, तो जोड़ नहीं होता।"
मैंने सिर हिलाया। मैंने कुछ नहीं कहा, पर अंदर कहीं मुझे लगा कि वो सही कह रहे थे। मुझे अभी भी लगता था कि अगर मैं बोलता रहूँ, तो सब हो जाएगा। पर शायद ऐसा नहीं होता। शायद कुछ चीज़ें होने के लिए छोड़नी पड़ती हैं। शायद कुछ सच बोले जाने का इंतज़ार करते हैं, ज़ोर दिए जाने का नहीं।
और फिर, जैसे ठीक इसी वक़्त, सानिया दौड़कर वापस आई।
"भैया," उसने कहा, हाँफते हुए। "रज़ा सलीम जी कह रहे हैं कि वो रजिस्टर खोलेंगे। और साथ में वो दुबला आदमी है, उसने कहा — मुझे लगता है कि सातवाँ नाम अभी भी ज़िंदा है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने अपना रूमाल जेब में रखा और अपनी सिलाई मशीन की तरफ़ देखा, जो उनकी दुकान में अकेली पड़ी थी, और जो आज भी टिक-टिक नहीं कर रही थी।
"तो चलो," उन्होंने कहा। "कुछ देर और रुक जाते हैं।"
और हम चले — पीपल की छाया से, चबूतरी से, टूटी मेज़ से, और उस रास्ते की तरफ़ जहाँ एक बंद रजिस्टर खुलने वाला था, और जहाँ हमें पता था कि कुछ ऐसा निकलेगा जो हम सबको बदल देगा। क्योंकि सच बोलना, और सच सुनना — दोनों में से कोई भी आसान नहीं होता। और आज हम सब सुनने वाले थे।
घंटी ने जेब में धीरे से कहा —
"अभी नहीं… अभी आगे बढ़…"
और मैं आगे बढ़ गया।
॥
पीपल की छाया से हम चले — मैं, उस्ताद, और रज़ा सलीम, और वो काला दुबला आदमी जो हमारे पीछे चुपचाप चल रहा था, जैसे उसकी परछाई भी उसकी बात न सुन पाए।
रास्ते में उस्ताद ने रज़ा सलीम से पूछा, "रजिस्टर कहाँ खोलोगे?"
"दुकान पर," रज़ा सलीम ने कहा। "वहीं जहाँ से लाया था।"
"ना," उस्ताद ने रुककर कहा। "जहाँ खोलो, वहाँ दो गवाह रहें। यही मेरी माँ का रिवाज़ था।"
रज़ा सलीम ने उस्ताद की तरफ़ देखा। एक पल सोचा, फिर बोला, "ठीक है। उस्ताद की दुकान।"
हम उस्ताद की दुकान पहुँचे। सिलाई मशीन अब भी टिक-टिक नहीं कर रही थी। उस्ताद अपनी लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठे, रज़ा सलीम ने लाल जिल्द वाला रजिस्टर मेज़ पर रखा और अपनी काली अंगूठी वाली उँगली से उसका किनारा दबाया। मैंने देखा — उस उँगली की नाखून के नीचे वो काली बूँदें अब भी नहीं सूखी थीं, जैसे उसका शरीर खुद नहीं जानता कि वो किस पक्ष में है।
रजिस्टर खुला। पन्ने पुराने, किनारे उखड़े, पर स्याही अब भी साफ़। पहले पन्ने पर सात नाम, सात अंगूठे। पहला नाम, दूसरा, तीसरा… छठे तक सब ठीक।
सातवें पर मेरी निगाह रुक गई।
सातवाँ नाम — जगदीश यादव।
मेरे दादा।
मैंने साँस रोक ली।
"ये तो पता था," मैंने धीरे से कहा।
"पता था, पर ध्यान से देखो," रज़ा सलीम ने कहा, और अपनी उँगली उस सातवें अंगूठे के नीचे ले गया। "ये अंगूठा जगदीश यादव का है। नाम भी उनका। पर…"
वो रुक गया।
"पर क्या?" मैंने पूछा।
"पर ये अंगूठा उन्होंने अपनी मर्ज़ी से नहीं लगाया," रज़ा सलीम ने कहा। "ये मजबूरी का अंगूठा है।"
उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा ऊपर किया और पन्ने के पास झुके। उन्होंने उस अंगूठे की स्याही को गौर से देखा, बगल की स्याही से तुलना की, और फिर सीधे होकर बैठ गए।
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "ये अंगूठा बाद में लगा है। बाकी अंगूठों की स्याही एक ही है। ये अलग है। ये बाद में लगा।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा फैल गया।
"और उस काला दुबला आदमी ने कहा था कि सातवाँ नाम ज़िंदा है?" मैंने पूछा, पीछे मुड़कर।
वो अब भी दरवाज़े के पास खड़ा था। चेहरा आधा अंधेरे में, आधा रोशनी में — बत्तीस दाँत दिखाकर नहीं, पर आँखों में कुछ ऐसा जो सीधा मुझे देख रहा था।
"हाँ," उसने कहा। "सातवाँ नाम ज़िंदा है।"
"कौन है?" मैंने पूछा।
"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले ये बताओ, तुम्हारे पास जो कड़ी है, वो रखोगे या नहीं?"
उस्ताद ने कड़क आवाज़ में कहा, "पहले तुम अपनी ज़ुबान से कुछ बोलो। कहो तुम कौन हो?"
वो आदमी मुस्कुराया। धीरे से, ऐसे जैसे कोई पुराना ज़ख्म खुल रहा हो।
"मेरा नाम नहीं लिखा गया," उसने कहा। "पर मेरा अंगूठा इस रजिस्टर के पन्नों पर है। सातवें अंगूठे के नीचे, जहाँ नाम की जगह खाली है, वहाँ देखो।"
मैंने रजिस्टर के उस हिस्से को करीब से देखा। सातवें अंगूठे के बगल में एक जगह धुंधली थी। ऐसा लगा जैसे कोई नाम लिखकर फिर मिटा दिया गया हो। स्याही की परत उखड़ी हुई थी, और उस उखड़ी स्याही के नीचे काग़ज़ का सफ़ेद हिस्सा अभी भी चमक रहा था।
"ये जगह खुरची गई है," उस्ताद ने कहा। "नाखून या चाकू से, किसी ने नाम मिटाया है।"
"हाँ," वो आदमी बोला। "क्योंकि जिसका नाम वहाँ लिखा था, उसे ज़िंदा नहीं रहना चाहिए था।"
रज़ा सलीम ने रजिस्टर बंद किया और अपनी काली अंगूठी वाली उँगली से उसकी जिल्द को दबाया।
"मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा," रज़ा सलीम ने कहा। "ये जो आदमी तुम्हारे सामने खड़ा है, इसे मैं बीस साल से जानता हूँ। ये रणवीर का आदमी नहीं है। ये उस दुनिया का आदमी है जो इस गली की नींव में दबी हुई है। और मेरा बाप, सलीम अहमद, मरने से पहले इसी से मिला था।"
രാത…
Wait, no. Let me continue properly.
"तो क्या वो हमारे साथ है?" मैंने पूछा।
"वो अपने साथ है," रज़ा सलीम ने कहा। "और आज शाम पाँच बजे, स्कूल के आँगन में, वो खुद अपना नाम बोलेगा।"
वो काला दुबला आदमी उस्ताद की दुकान से बाहर निकला, दरवाज़े पर रुका, और बिना पलटे कहा, "आज शाम सबको अपनी जगह पता चल जाएगी। किसका नाम नीचे रहा, किसका ऊपर।"
और वो चला गया, जैसे हवा में मिल गया।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कोई हँसी नहीं थी, कोई डर भी नहीं। पर उनकी उँगलियाँ अपने रूमाल को बार-बार मोड़ रही थीं, और मुझे लगा कि उस्ताद आज पचास साल पुराने किसी सवाल को अपने सामने खड़ा देख रहे थे।
"उस्ताद," मैंने कहा। "आज शाम…"
"आज शाम सब कुछ खुलेगा," उस्ताद ने कहा। "पर खुलेगा तब, जब उसकी शक्ल सबके सामने आएगी। और तब तक मेरा सुझाव है — तुम अपना काम करो, अपनी घंटी संभालो, और अपने घर जाओ। स्कूल के आँगन में पाँच बजे पहुँचना है।"
मैंने सिर हिलाया।
जब मैं दुकान से निकला, आसमान पीला पड़ रहा था। शाम हो रही थी। और मेरे अंदर कुछ कह रहा था कि आज की शाम कुछ नया लेकर आएगी। सिर्फ़ सवाल नहीं, सिर्फ़ रजिस्टर नहीं। आज के बाद गली की हवा भी बदलने वाली थी।
शाम चार बजकर पैंतालीस मिनट।
स्कूल का आँगन।
नेम का पुराना पेड़ एक तरफ़, और सामने दो कुर्सियाँ और एक माइक का स्टैंड। पीछे स्कूल की छत, प्लास्टर का वो उभरा हुआ हिस्सा जो अब भी टूटा हुआ था, चारों तरफ़ बच्चों के झूलते पैर।
बच्चों की टोली स्कूल के पीछे वाली सीढ़ी से छत पर चढ़ चुकी थी। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू और टिंकू। पाँचों छत के किनारे पेट के बल लेटे थे, ऐसे जैसे गली के पाँच जासूस आज कोई बड़ी खबर पकड़ने आए हों।
टिंकू ने रफ़ीक़ के कान में कहा, "अगर घंटी फिर अजीब बजी, तो?"
"तो क्या?" रफ़ीक़ ने कहा।
"तो मतलब आज कुछ होगा। घंटी जब अजीब बजती है, कुछ न कुछ होता है।"
"तू बस अपना काम कर," सानिया ने टोका। "मुझे पता है आज किसका सच खुलेगा।"
"किसका?" चिंटू ने पूछा।
"वो जो गेट पर खड़ा है," सानिया ने धीरे से कहा।
सब ने गेट की तरफ़ देखा।
बबलू पांडे। गेट के बाहर, स्कूल की दीवार से सटी, एक हाथ जेब में, दूसरे हाथ में पान। मुँह में पान घुमा रहा था, और धीरे-धीरे मुस्कुरा रहा था। उसकी सोने की चेन अब भी गले में थी, पर आज कुछ ऐसा लगा जैसे वो चेन भारी हो गई हो। जैसे होली नहीं, शादी नहीं — आज उसकी मुस्कान उसके चेहरे पर पहली बार फिट नहीं हो रही थी।
और फिर शबनम आपा आई।
दो बड़ी लोहे की थालियाँ, एक हाथ में समोसों से भरी, दूसरी में गरम चाय की केतली और मिट्टी के कुल्हड़। उनके पीछे उनका भांजा, जो गुमटी से बाहर कभी नहीं निकलता था, आज पीछे-पीछे आ रहा था, एक और थाली लिए।
"सब यहाँ आओ," शबनम आपा ने आवाज़ लगाई। "पहले पेट भरो, फिर बात।"
गली के लोग धीरे-धीरे आ रहे थे। कोई डरता हुआ, कोई सिर झुकाए, कोई बच्चों को साथ लिए। भोला भाई अपनी बीवी की बैसाखी पकड़े आ रहे थे। नसीमा बाई अपने साजिद के साथ, साजिद के हाथ में वही लाल कवर वाली कॉपी। नसीम भाई, रमेश भाई, किराने वाले बूढ़े काका — जो अब भी चना खाते हुए आ रहे थे। दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर, थाने से उठाकर इस आँगन में ले आए थे, और अपने पास वो पीला पुराना लिफ़ाफ़ा रखा था।
शबनम आपा ने समोसे बाँटना शुरू किया।
"पेट भर लो," वो बोलीं, अपनी लोहे की चिमटी से समोसा उठाकर टिंकू की तरफ़ बढ़ाते हुए। "सच बोलने से पहले पेट भरना ज़रूरी है। भूखे आदमी की सच्ची बात भी कड़वी लगती है।"
टिंकू ने समोसा लिया और उसने मुझे देखा।
"उस्ताद," उसने ज़ोर से कहा। "घंटी आज भी अजीब बजेगी?"
मैंने उसे देखा, फिर आस-पास देखा। लोगों की निगाहें अब मुझ पर थीं। सब जानते थे कि घंटी मेरे पास है। कुछ लोग मुस्कुरा रहे थे, कुछ डरे हुए।
मैंने घंटी जेब से निकाली और उसे हवा में उठाया।
"देखते हैं," मैंने कहा।
और मैंने बजाई।
चरररर…
वो आवाज़ आई — दोहरी, फटी, चरचरी। जैसे एक घंटी नहीं, दो घंटियाँ बज रही हों, और उनके बीच कोई तीसरी फँसी हो। चरररर… और फिर चुप।
आँगन में दो पल के लिए सन्नाटा छा गया।
और फिर छत से बच्चे हँस पड़े। पाँचों, एक साथ।
"अरे, ये तो कुकड़ू-कूँ जैसी बजी," गुड्डू चिल्लाया।
"ना, ये तो मेरी अम्मी की घरघर वाली केतली जैसी," चिंटू ने कहा, और हँसी दुगनी हो गई।
मैंने घंटी जेब में रखी और सिर हिलाया।
आँगन में हँसी का एक हल्का सा झोंका आया। जो डरे हुए आए थे, उनके कंधे थोड़े नरम पड़े। शबनम आपा ने चाय बाँटी और कहा, "देखा, हँसी भी ज़रूरी है। डरे हुए आदमी का सच ठीक से नहीं निकलता।"
पाँच बजने में दस मिनट बाकी थे।
तभी मैंने देखा — शालिनी गेट से आ रही थी।
उसके कंधे पर काला बैग था, जिसमें वो रिपोर्ट थी। उसके हाथ काँप रहे थे। नहीं, काँप नहीं रहे थे, वो हिल रहे थे। जैसे उसके अंदर की कोई चीज़ उसे छोड़कर भागना चाहती हो, और वो ज़बरदस्ती उसे पकड़े हुए आ रही हो।
वो सीधे मंच की तरफ़ बढ़ी। माइक के सामने वाली कुर्सी पर रखा उसका बैग मेज़ पर धरा, और उसने एक गहरी साँस ली।
मैं दूर खड़ा था — पीपल के पास, उस्ताद के बगल में। मैंने उसकी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया।
सिर्फ़ इतना।
और उसने भी सिर हिलाया। बहुत छोटा सा। पर हाँ।
उसकी आँखों में वो डर अब भी था, पर उसके नीचे कुछ और था। वो "कुछ और" जो पिछले कुछ दिनों में उसके अंदर जमा हुआ था — उसकी माँ के जाने का गुस्सा, उसके पापा के झूठ का दर्द, उसके स्कूल के बच्चों के सामने झुके सिर का धब्बा, और उस एक सवाल का जवाब जो उसने खुद से पूछा था और अब सबके सामने पूछने आई थी।
आँगन भरने लगा।
मैंने देखा — रज़ा सलीम भी आए थे। अपने कंधे पर वो लाल जिल्द वाला रजिस्टर लिए, और उनके पीछे वो काला दुबला आदमी था, अब भी चुप, अब भी छाया जैसा, पर अब किसी ने उसकी तरफ़ उँगली नहीं उठाई। जैसे आँगन के लोग उसे पहले से जानते हों, और उसके आने का इंतज़ार कर रहे हों।
मीरा दूसरी तरफ़ से आ रही थी। उसका कैमरा तिपाई पर, लाल बत्ती जलती हुई। वो मेरे पास से गुज़री और उसने धीरे से कहा, "आज रिकॉर्डिंग बंद नहीं होगी। आज जो बोलेगा, सब जाएगा।"
"ज़रूर," मैंने कहा।
शाम पाँच बजे।
दुबे अंकल उठे। उन्होंने अपनी पीली पुरानी कॉपी खोली, एक पन्ना पलटा, और बिना माइक के आवाज़ लगाई, "सब सुनो। ये सभा मैंने नहीं बुलाई। ये सभी ने मिलकर बुलाई है। और आज यहाँ कोई काग़ज़ नहीं लिखा जाएगा, कोई अंगूठा नहीं लिया जाएगा। सिर्फ़ बात होगी।"
कोई नहीं बोला। आँगन में एक गहरी साँस जैसी चुप्पी छा गई।
"पहले शालिनी बेटी बोलेगी," दुबे अंकल ने कहा। "वो स्कूल की इंजीनियर है। और उसके हाथ में वो काग़ज़ है जो इस पूरी गली को बेचने की तैयारी में था।"
शालिनी माइक के पास आई।
उसने अपना बैग मेज़ पर खोला। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे — काग़ज़ निकालते वक़्त काग़ज़ का कोना मेज़ से टकराया और एक हल्की सी आवाज़ हुई।
उसने माइक को अपने मुँह के पास खींचा। एक बार, दो बार उसने होंठ खोले, पर आवाज़ नहीं निकली। आँगन में चुप्पी और गहरी हो गई।
मैंने दूर से उसकी तरफ़ देखा। मेरे पास कुछ नहीं था — न कोई जादू, न कोई शक्ति, बस एक सीधा सा सच। कि आज वो अकेली नहीं है। और शायद यही उसे बोलने के लिए काफ़ी था।
उसने गहरी साँस ली।
"मैं," उसकी आवाज़ काँपी, "मैंने झूठी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं किए।"
आँगन में हल्की सी हलचल हुई।
"मुझ पर दबाव डाला गया," वो बोली, आवाज़ अब थोड़ी साफ़। "मेरे पापा की कंपनी, मज़दूर… मुझे डराया गया कि अगर मैंने सच्ची रिपोर्ट दी, तो सब बंद हो जाएगा।"
किसी ने कुछ नहीं कहा। पर मैंने देखा — कई लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। जैसे हर कोई अपने अंदर के किसी दरवाज़े को खुलते हुए महसूस कर रहा हो।
शालिनी ने काग़ज़ उठाया।
"ये वो रिपोर्ट है जो मैंने पहले लिखी थी," उसने कहा। "सच्ची। और ये लाल पेन से कटी हुई है। मेरे पापा के हाथ से नहीं — किसी और के हाथ से। और ये… ये वो झूठी रिपोर्ट है जो मुझसे ज़बरदस्ती बनवाई गई। इस पर मेरे हस्ताक्षर की जगह अभी भी खाली है।"
उसने माइक से थोड़ा दूर देखा — गेट की तरफ़।
और तभी रोशनी गई।
एक झटके में। न पहले कोई जगमगाहट, न कोई आवाज़। बस एक पल पहले सब कुछ दिख रहा था, और अगले पल सब अंधेरा।
आँगन में सन्नाटा नहीं था — शोर था। कुर्सियाँ खिसकीं, किसी ने चीखा, किसी ने बच्चे का हाथ पकड़ा, किसी ने शबनम आपा की केतली पलट दी। चाय की गरम चीज़ किसी के पैरों पर गिरी और वो उछल पड़ा।
"माइक छोड़ो!" किसी ने चिल्लाया।
"बच्चे कहाँ हैं?"
"टिंकू! सानिया! यहीं रुको!"
मैंने जेब से घंटी निकाली और हवा में उठाई।
"घंटी!" मैंने ज़ोर से कहा।
पर घंटी चुप थी।
नहीं, वो चुप नहीं थी। मैंने महसूस किया — वो काँप रही थी। मेरी हथेली में, बिना आवाज़, बिना शब्द। जैसे वो खुद डर गई हो।
"घंटी, बोल," मैंने फुसफुसाया।
और तभी, अंधेरे में, शालिनी की आवाज़ आई।
"छोड़ो! छोड़ो मेरा बैग!"
और फिर एक ज़ोरदार धक्का। किसी के गिरने की आवाज़। शालिनी की चीख।
मैं भागा — अंधेरे में, कुर्सियों के बीच से, लोगों के कंधों के बीच से। मेरा पैर एक स्टूल से टकराया, मैं लड़खड़ाया, पर रुका नहीं।
"शालिनी!" मैं चिल्लाया।
"बैग… मेरा बैग…"
मैं उसकी आवाज़ की तरफ़ बढ़ा। मेरा हाथ उसके कंधे पर पड़ा। वो ज़मीन पर बैठी थी, हाथ अभी भी हवा में, जैसे किसी चीज़ को पकड़ना चाहती हो जो अब वहाँ नहीं थी।
"बैग ले गया," वो फुसफुसाई, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो सिर्फ़ तब होता है जब आपकी मेहनत, आपका सच, आपके ही हाथों से छिन जाए।
"कौन?" मैंने पूछा।
"पता नहीं… अंधेरा था… किसी ने धक्का दिया…"
और ठीक उसी पल — जैसे किसी ने ऊपर वाले से कहा हो — रोशनी लौट आई।
पहले एक बल्ब जला, फिर दूसरा, फिर पूरा आँगन रोशनी में नहा गया। सब कुछ फिर से दिखने लगा — कुर्सियाँ बिखरी, शबनम आपा की पलटी केतली, टिंकू का पीला चेहरा छत से नीचे झाँकता हुआ, मीरा का कैमरा अब भी चालू।
मैंने मेज़ की तरफ़ देखा।
शालिनी का बैग गायब था।
मेज़ पर सिर्फ़ एक काग़ज़ बचा था — वो रिपोर्ट जो उसने अभी हवा में उठाई थी। वो भी अब नहीं थी।
मैंने गेट की तरफ़ देखा।
बबलू पांडे वहाँ नहीं था।
गेट खुला था, और बाहर गली सुनसान। कुछ पल पहले जो आदमी चबाते हुए खड़ा था, अब वहाँ सिर्फ़ एक गीला पान का दाग बचा था — ज़मीन पर, जैसे उसकी मुस्कान का आख़िरी निशान।
मैंने घंटी फिर उठाई।
"घंटी, कुछ बोल।"
और घंटी ने, बहुत धीरे, दोहरी फटी आवाज़ में कहा —
"जो सच बोलने आया… उसका सच पहले उठा लिया गया। अब देखो, कौन सच से डरता है।"
मैंने शालिनी को उठाया। वो काँप रही थी, पर उसकी आँखों में अब सिर्फ़ डर नहीं था। अब गुस्सा भी था।
"वो बैग मेरी मेहनत का था," उसने कहा, आवाज़ भारी।
"वो बैग नहीं, तेरा सच था," मैंने कहा। "और सच चोरी नहीं होता। सिर्फ़ उसका काग़ज़ चोरी होता है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"तो अब?"
"अब," मैंने कहा, और मेरे हाथ में घंटी अब भी काँप रही थी, "अब हम उस सच को दोबारा लिखेंगे। पर इस बार, खुद अपने हाथ से।"
मैंने आँगन में देखा। दुबे अंकल अब भी अपनी कुर्सी पर बैठे थे, पर उनका हाथ अपने पीले लिफ़ाफ़े पर कसा हुआ था। रज़ा सलीम रजिस्टर सीने से चिपकाए खड़े थे। उस्ताद दरवाज़े के पास, मशीन की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ देख रहे थे। और वो काला दुबला आदमी नहीं था — वो अब भी नहीं था। वो जैसे गायब हो गया था, पाँच बजे की उस हवा में जिसमें सच और झूठ दोनों एक साथ साँस ले रहे थे।
मीरा कैमरा लेकर मेरे पास आई।
"अंकुश," उसने कहा, आवाज़ धीमी। "मैंने अंधेरे में कुछ देखा।"
"क्या?"
"एक आदमी। शालिनी के पास खड़ा था। उसका हाथ उसके कंधे पर था। और जब रोशनी गई, वो आदमी उसकी तरफ़ झुका। उसके गले में कुछ था — काला, लंबा।"
"काली अंगूठी?"
"नहीं," मीरा ने कहा। "डोरी। या पट्टा। कुछ लंबा।"
मैंने घंटी को अपनी हथेली में दबाया।
आज शाम का पहला झटका गुज़र चुका था। पर ये सिर्फ़ शुरुआत थी। मुझे पता था कि बबलू भाग नहीं गया — उसे भगाया गया। किसी ने उसे गेट से उठाया था, और वो कोई ऐसा था जो अंधेरे में खड़ा था, जो शालिनी के कंधे पर हाथ रख सकता था।
और मुझे ये भी पता था कि सच का काग़ज़ चोरी हो सकता है, पर सच खुद नहीं। सच आज भी वहीं था — शालिनी की आँखों में, शबनम आपा के काँपते हाथों में, दुबे अंकल के उस पीले लिफ़ाफ़े में, और मेरी उस घंटी में जो अब भी काँप रही थी, जैसे वो जानती हो कि अभी बहुत कुछ बाकी है।
मैंने शालिनी का हाथ पकड़ा और उसे उठाया।
"अब तू माइक पर जा," मैंने कहा। "और जो काग़ज़ चोरी हुआ, उससे ज़्यादा ज़ोर से बोल। क्योंकि आज तेरा सच काग़ज़ पर नहीं, तेरी ज़ुबान पर है। और ज़ुबान कोई चुरा नहीं सकता।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। फिर आँगन की तरफ़। फिर गेट की तरफ़, जहाँ अब सिर्फ़ वो गीला पान का दाग बचा था।
और उसने सिर हिलाया।
"ठीक है," उसने कहा।
मैंने घंटी जेब में रखी। घंटी ने धीरे से कहा —
"अब सच की बारी। अब उनकी बारी जो सच से डरते हैं।"
मैंने आँगन देखा। लोग अब भी वहीं थे। किसी ने कुर्सी नहीं छोड़ी। शबनम आपा ने पलटी केतली उठाई, नई चाय की तरफ़ देखा, और अपने भांजे से कहा, "एक और केतली ले आ। आज ये आँगन खाली नहीं होने वाला।"
दुबे अंकल उठे, अपना पीला लिफ़ाफ़ा हवा में उठाया, और बोले, "अब मेरी बारी।"
और मैं वहीं खड़ा रहा — स्कूल के उसी आँगन में, जहाँ से सच बोलने की शुरुआत होनी थी, और जहाँ से कुछ ऐसा शुरू हो गया था जिसे अब कोई रोक नहीं सकता था।
क्योंकि आज अंधेरा सिर्फ़ बिजली जाने से नहीं आया था।
आज अंधेरा किसी के अंदर से बाहर आया था। और जब अंदर का अंधेरा बाहर आ जाए, तो फिर रोशनी भी उसे नहीं छिपा सकती।
॥
दुबे अंकल खड़े थे। उनका पीला लिफ़ाफ़ा हवा में उठा हुआ था, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो रिटायरमेंट के बाद इंसान के पास बचती है — बहुत कम बोलने की आदत, और जब बोले तो सीधा।
"अब मेरी बारी," उन्होंने दोबारा कहा, और आँगन में सब चुप हो गए।
पर सच कहूँ, तो उस वक़्त मेरा ध्यान उन पर नहीं था। मेरा ध्यान उस अंधेरे पर था जो स्कूल की पीछे वाली दीवार के उस पार से आ रहा था, जैसे कोई वहाँ से देख रहा हो और हम सब उसकी आँखों के सामने बैठे हों।
और फिर वो हुआ।
मंच के पीछे से किसी टिन के गिरने की आवाज़ आई — ढम्म। इतनी तेज़ कि सब एक साथ सहम गए। एक औरत ने अपने बेटे का नाम चिल्लाया, कोई कुर्सी से उठकर भागा, और माइक का तार खींचकर स्टैंड गिर गया। उस गिरने की आवाज़ ने आँगन को भर दिया — लोहा, सीमेंट और घबराहट, तीनों एक साथ।
"बिजली फ़्यूज़ हो गई!" कोई चिल्लाया।
"गेट खुला है! गेट!"
"बच्चे कहाँ हैं? सानिया! गुड्डू!"
मैंने जेब से घंटी निकाली।
"सुन," मैंने धीरे कहा, "अब क्या?"
और घंटी ने जो किया, वो उसने पहले कभी नहीं किया था।
वो बजी नहीं। वो चरचराई। जैसे पीतल के अंदर कुछ टूटा हो और टूटी हुई चीज़ें एक-दूसरे पर रगड़ रही हों। उस आवाज़ में कोई सुर नहीं था, कोई शब्द नहीं था — सिर्फ़ खुरदुरापन, जैसे घंटी एक साथ पाँच आवाज़ों में बोलने की कोशिश कर रही हो और कोई भी आवाज़ पूरी न हो रही हो।
फिर, बड़ी मुश्किल से, दो शब्द निकले।
"ढूँढो… पीछे…"
बस। उसके बाद घंटी चुप। बिल्कुल चुप।
मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं। मैंने दोबारा हिलाया। एक बहुत हल्की घरघराहट आई, जैसे किसी सोए हुए आदमी ने करवट ली हो और फिर सो गया हो। तीसरी बार हिलाने पर वो भी बंद हो गई।
"अंकुश?" मीरा मेरे पास आई। उसके मोबाइल की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और मैं देख सकता था कि उसके होंठ काँप रहे हैं, पर आवाज़ साफ़ थी। "क्या हुआ?"
"घंटी टूटी आवाज़ में बोली," मैंने कहा। "और बाकी समझ नहीं आया।"
"क्या कहा?"
"ढूँढो। पीछे।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपना मोबाइल नीचे किया और आँगन के फ़र्श पर रोशनी डाली। और वो एक पल भी नहीं रुकी। सीधा गेट की तरफ़ चली। जैसे उसे पता हो कि कहाँ देखना है।
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ का तरीक़ा बदल गया। "इधर आ।"
मैं गया।
गेट से चार-पाँच कदम पहले, ज़मीन पर एक कलम पड़ी थी। कोई आम कलम नहीं — नीली स्याही वाली, पीतल के ढक्कन वाली, वही कलम जो शालिनी के हाथ में थी जब वो माइक पर खड़ी थी। ढक्कन गायब था, और नोक से स्याही फ़र्श पर फैली हुई थी, जैसे किसी ने कलम को झटके से छीना हो और वो गिरकर लुढ़क गई हो।
उसके दो कदम आगे, गेट की ज़मीन पर, काले कपड़े का एक फटा टुकड़ा पड़ा था। और थोड़ा और आगे — एक टूटा हुआ पट्टा। शालिनी के बैग का पट्टा।
कटा हुआ नहीं। फटा हुआ।
जैसे कोई पूरी ताक़त से खींचे और सीवन चटक जाए।
मैंने उसे उठाया। पट्टे के फटे किनारे रेशेदार थे, और उन पर उँगली रखने से लगा जैसे किसी ने बहुत जल्दी में यह काम किया हो। जल्दी में, पर बिना आवाज़ के। क्योंकि अगर आवाज़ होती तो आँगन में बैठे पचास लोगों में से कोई न कोई सुन ही लेता।
"ये पट्टा है," मैंने कहा। "और ये कलम।"
मीरा ने पट्टा हाथ में लिया और मोबाइल की रोशनी में घुमाया।
"काटा नहीं है," उसने कहा। "फाड़ा है। ज़ोर से।"
"मतलब?"
"मतलब," मीरा ने कहा, "बैग छीनकर नहीं लिया गया। बैग उतारा गया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जिसने उतारा, वो शालिनी के बहुत पास था। इतना पास कि उसे पकड़ना न पड़े।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा हुआ। वही बात जो उसने दो मिनट पहले कही थी — एक आदमी, शालिनी के कंधे पर हाथ, गले में काली लंबी डोरी।
"बच्चे कहाँ हैं?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ अपने ही कान में अजनबी लगी।
"ऊपर," शबनम आपा ने कहा। वो अपनी केतली नीचे रखकर हमारी तरफ़ आ रही थीं, हाथ में चिमटी, और उनके चेहरे पर वो भाव था जो गुस्से और डर के बीच में बनता है। "छत पर हैं। मैंने खुद देखा। पाँचों।"
"आपने देखा?"
"जब बत्ती गई," शबनम आपा ने कहा, "तो सबसे पहले मैंने ऊपर देखा। क्योंकि बच्चे दीये के पास बैठे थे, और जहाँ दीया हो वहाँ बच्चा बत्ती जाने पर भागता है। मैंने सोचा, अगर ये पाँच ऊपर हैं तो ठीक है। अगर नहीं हैं, तो मैं खुद सीढ़ी चढ़ूँगी।"
"और वो ऊपर थे?"
"थे," शबनम आपा ने कहा। फिर उन्होंने आवाज़ नीची की। "पर वो नीचे आ रहे हैं। उन्होंने कुछ देखा है।"
उन्होंने देखा ही था।
सीढ़ी से सबसे पहले टिंकू उतरा, सिर पर माँ का गुलाबी दुपट्टा, आँखों पर काला एक काँच वाला चश्मा, और चेहरे पर वो भाव जो आज तक मैंने उस पर नहीं देखा था। उसके पीछे सानिया, फिर गुड्डू, फिर रफ़ीक़, और सबसे आख़िर में चिंटू — चिंटू की चप्पल हाथ में थी, और वो उसे सीने से चिपकाए उतर रहा था, जैसे वो कोई हथियार हो।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, और सीधा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। "मैंने देखा। मैंने अपनी आँखों से देखा।"
"धीरे," मैंने कहा। "साँस ले।"
"मैं साँस ले रहा हूँ!"
"नहीं ले रहा। तेरा चेहरा लाल है।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली, फिर बोला।
"जब बत्ती गई, तो हम छत पर थे। और मैंने नीचे देखा — मंच के पीछे वाली तरफ़। वहाँ से एक आदमी गया। सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते।"
"कितनी दूर?"
"इतनी दूर जितनी दूर से आप दुकान से गुमटी दिखते हो।" टिंकू ने हाथ से नाप दिखाया। "वो भाग नहीं रहा था, उस्ताद।"
मैं रुका।
"क्या कहा?"
"वो भाग नहीं रहा था," टिंकू ने दोहराया, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे ठंडा कर गया। "भागने वाला आदमी फ़ुर्सत से नहीं चलता। वो फ़ुर्सत से चल रहा था। जैसे उसे कोई जल्दी न हो। जैसे उसे पता हो कि कोई उसे रोकने वाला नहीं है।"
सानिया आगे आई। उसकी आवाज़ टिंकू से धीमी थी, पर उसमें वही बात थी।
"और उस्ताद," उसने कहा, "उसके एक हाथ में कुछ था। काला। फटा हुआ। और वो उसे सीने से लगाकर नहीं ले जा रहा था। वो उसे नीचे लटका रहा था, जैसे कोई कबाड़ हो।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया — मतलब, हाँ, वही।
तभी आँगन के दूसरे कोने से आवाज़ आई।
"अरे, ये क्या तमाशा है!"
हम सब पलटे।
बबलू।
वो आ रहा था — अपने उसी अंदाज़ में, चलते हुए कंधे हिलाते हुए, मुँह में पान, गले में सोने की चेन, और चेहरे पर वो डिफ़ॉल्ट भाव जो कहता है कि मैं यहाँ मालिक हूँ और तुम सब किरायेदार।
पर आज उस चेहरे पर कुछ और भी था। उसका माथा चमक रहा था। मतलब पसीना। और बबलू चाहे कितना भी मोटा हो, इस उम्र में और इस आँगन में, ठंड के मौसम में पसीना आना आसान नहीं है।
"तू कहाँ गया था?" मैंने पूछा। सीधा। बिना तमीज़ के। मेरे पास आज तमीज़ का बजट खत्म हो चुका था।
"फ़्यूज़ देखने," बबलू ने कहा, और उसने पान को एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ किया। "बत्ती गई तो मैं सीधा मीटर के पास गया। सोचा, ये मोहल्ला अंधेरे में बैठा रहेगा तो मेरी भी इज़्ज़त जाएगी। मैंने तार ठीक किया।"
"तूने तार ठीक किया?"
"हाँ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ बहुत धीमी रखी, क्योंकि जब आवाज़ धीमी होती है तो आदमी को सुनने के लिए झुकना पड़ता है, "तू मीटर के पास गया था, और तेरे जूते पर मंच के पीछे की मिट्टी लगी है।"
बबलू ने अपने जूते की तरफ़ देखा। एक पल के लिए। बस एक पल। उसके बाद उसने पान को ज़ोर से चबाया और हँसा।
"अरे, मैं वहाँ से ही गया था," उसने कहा। "पीछे से मीटर का रास्ता छोटा है।"
"मीटर पीछे नहीं है," मैंने कहा। "मीटर स्कूल के सामने वाली दीवार पर है। स्टोर के बाहर।"
आँगन में फिर चुप्पी। और उस चुप्पी में मैं सुन सका — बबलू की साँस। तेज़, छोटी, बेकाबू।
वो कुछ कहने ही वाला था कि शालिनी का पापा आगे आए।
"तू," उन्होंने कहा, और उनकी उँगली मेरी तरफ़ थी। उनका चेहरा लाल था, आँखें फटी हुई, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो डर के बाद आती है — गुस्सा। "तूने मेरी बेटी को मंच पर खड़ा करवाया। तूने उसे सबके सामने बोलने को कहा। और अब उसका बैग गया, उसका काग़ज़ गया — और तू यहाँ खड़ा है, बबलू भाई के जूते देख रहा है!"
मैंने उन्हें देखा। उनके हाथ काँप रहे थे। और मैं जानता हूँ ये काँपना क्या होता है — ये वो काँपना है जो बेटी के लिए आता है, जब बाप को लगता है कि उसके होते हुए भी कुछ हो गया।
"अंकल," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ नीची ही रखी। "आप सही कह रहे हैं। मैंने उसे मंच पर खड़ा करवाया।"
वो रुक गए। मेरे इस जवाब की उन्हें उम्मीद नहीं थी।
"और मैं फिर करूँगा," मैंने कहा।
"क्या?"
"क्योंकि जो चीज़ आज चोरी हुई है," मैंने कहा, "वो काग़ज़ नहीं है। जो चोरी हुई है, वो उस सच को छुपाने के लिए चोरी हुई है जो आपकी बेटी ने आज बोलना शुरू किया था। और जो सच बोलना शुरू हो जाए, उसे कोई बैग उठाकर नहीं रोक सकता।"
शालिनी के पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी। इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, और शायद मेरे साथ खड़ी मीरा, क्योंकि वो मेरे कंधे से सटकर खड़ी थी।
"बैग सुबह मिलेगा। दुकान के पीछे।"
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी, और उसका ठंडापन अजीब तरह से स्थिर था, जैसे वो बुखार उतरने के बाद की ठंडक हो।
"कहाँ?" मैंने फुसफुसाया।
"दुकान के पीछे। सुबह।"
"और उसमें?"
घंटी चुप हो गई। मैंने उसे हिलाया। एक हल्की घरघराहट, फिर वो चरचरी आवाज़, और फिर उस टूटी आवाज़ में कुछ ऐसा जो मेरी रीढ़ से सिर तक गया।
"बैग मिलेगा," घंटी ने कहा, "पर उसमें जो नहीं होगा, वही सबसे ज़रूरी होगा।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरे आस-पास आँगन चल रहा था — शबनम आपा चाय बाँट रही थीं, बच्चे एक-दूसरे से फुसफुसा रहे थे, दुबे अंकल अपना पीला लिफ़ाफ़ा सीने से लगाए बैठ गए थे क्योंकि जब तक माहौल ठीक न हो, कोई सच नहीं खोलता, रज़ा सलीम रजिस्टर को दोनों हाथों से पकड़े खड़े थे और उनके नाखून के नीचे की काली बूँदें अब भी सूखी नहीं थीं, उस्ताद दरवाज़े के पास खड़े मेरी तरफ़ देख रहे थे — पर मैं कहीं और था।
मैं सोच रहा था कि आदमी बैग क्यों चुराता है।
अगर वो सच छुपाना चाहता है, तो बैग चुराना बेकार है। शालिनी का सच उसके मुँह में है, बैग में नहीं। बैग चुराने वाला ये जानता है। फिर भी उसने बैग चुराया। मतलब बैग में कुछ और भी था। कुछ ऐसा जो शालिनी को भी नहीं पता था। और घंटी यही कह रही थी — बैग मिलेगा, पर जो उसमें नहीं होगा, वही सबसे ज़रूरी होगा।
मतलब जो चीज़ उन्होंने निकाल ली है, वो बैग से निकली है। और जो बैग में बचेगा, वो सिर्फ़ काग़ज़ होगा — जो वैसे भी मेरे पास है। क्योंकि शालिनी ने काग़ज़ मेरे हाथ में दिए थे, जब अंधेरा आने से पहले हम दोनों गेट के पास खड़े थे।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ?"
"तेरे पास चाबी है? छोटी वाली?"
मीरा ने एक पल सोचा, फिर अपने फटे बैग में हाथ डाला और एक छोटी चाबी निकाली। किस चीज़ की, नहीं पूछा। जब दो लोग एक ही रात में इतनी बार डर चुके हों, तो वो छोटी-छोटी बातें नहीं पूछते।
"कल सुबह छह बजे," मैंने कहा। "दुकान के पीछे। तू, मैं, टिंकू, और उस्ताद। बस।"
"बबलू को नहीं बताना?"
"बबलू को तो पता है," मैंने कहा। "बस उसे ये नहीं पता कि हमें पता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ चमकी जो मुझे उसके साथ सबसे ज़्यादा पसंद है — कुछ भी समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
"और बबलू का जूता?" उसने पूछा।
"जूता रहने दे," मैंने कहा। "जूता बोलेगा नहीं। जूता गवाही नहीं देता।"
तभी शालिनी के पापा ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ कसी हुई थी, पर उसमें वो ताक़त नहीं थी जो अभी-अभी गुस्से में थी। अब सिर्फ़ डर था।
"मेरी बेटी कहाँ है?" उन्होंने पूछा। "वो मंच से उतरी, और उसके बाद मैंने उसे नहीं देखा।"
मैं सकपका। सच कहूँ, तो मैं भूल गया था। उस पूरे तमाशे में — घंटी, पट्टा, कलम, बबलू का जूता — मैं शालिनी को भूल गया था।
"मीरा —"
"मैंने उसे देखा था," मीरा ने कहा। "जब बत्ती गई, तो वो मंच के नीचे खड़ी थी। फिर गड़बड़ शुरू हुई और वो भीड़ में चली गई।"
"तो वो यहीं है," मैंने कहा। "यहीं कहीं है।"
और तभी हम सबने सुना — आँगन के बिल्कुल आख़िरी कोने से, जहाँ लोहे की सीढ़ी है और उसके पीछे अंधेरा है, एक बहुत छोटी आवाज़।
"बाबा।"
शालिनी की आवाज़।
हम सब भागे। मैं, मीरा, शालिनी के पापा, टिंकू, शबनम आपा चिमटी लिए हुए — पूरी बारात।
वो सीढ़ी के नीचे बैठी थी। घुटने सीने से लगाए, बाल चेहरे पर बिखरे हुए, हाथ में सिर्फ़ एक काग़ज़ का कोना दबाए हुए — फटा हुआ, मुड़ा हुआ, बस इतना कि उँगली भर।
वो रो नहीं रही थी। वो उससे भी बुरी हालत में थी — वो काँप रही थी, और काँपते हुए चीज़ें आवाज़ नहीं करतीं।
"बेटा —" उसके पापा उसके पास घुटनों के बल बैठ गए। "बेटा, तू ठीक है? किसी ने कुछ किया? किसी ने —"
"बैग नहीं गया," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ रेत जैसी थी। "बैग गया। पर सच नहीं गया।"
"क्या?"
उसने अपनी हथेली खोली। उसमें काग़ज़ का एक फटा कोना था — एक कोना, बस। और उस कोने पर नीली स्याही में एक शब्द आधा लिखा था।
मैंने झुककर देखा।
"अंधेरे में मैंने बैग से निकाल लिया," शालिनी ने कहा। "जब वो मेरा बैग खींच रहा था। मुझे नहीं पता क्यों। मेरे हाथ ने खुद कर दिया।"
"किसने?" मैंने पूछा।
उसने ऊपर देखा। उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो डर से बड़ा था।
"मुझे चेहरा नहीं दिखा," उसने कहा। "पर उसके हाथ से एक चीज़ लटक रही थी। काली। लंबी।"
"डोरी?"
"और," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ टूटी, "वो डोरी मेरे गले के पास आई थी, उस्ताद। एक पल के लिए। फिर वो हँसा और चला गया। जैसे — जैसे वो देख रहा हो कि मैं डरती हूँ या नहीं।"
मेरी मुट्ठी भिंच गई।
वो हँसा। मतलब उसे जल्दी नहीं थी। मतलब वो हमें डराना चाहता था, और वो अपना काम करके, देखकर, हँसकर गया। ऐसे आदमी को ताक़त से नहीं पकड़ते। ऐसे आदमी को उसकी ही बात से पकड़ते हैं।
मैंने शालिनी के हाथ से वो फटा कोना लिया। उस पर नीली स्याही में जो आधा शब्द था, उसे मैंने मीरा की रोशनी में देखा।
तीन अक्षर। आधे कटे हुए। पहला अक्षर मोटा, बीच वाला पतला, और नीचे का अक्षर शायद "र"।
"ये किसी और की लिखाई है," मीरा ने कहा, और वो मेरे कंधे के ऊपर से देख रही थी। "शालिनी की नहीं।"
"तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि शालिनी की लिखाई सीधी है," मीरा ने कहा। "और ये अक्षर झुका हुआ है। दाएँ तरफ़। जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो।"
शालिनी ने धीरे से कहा, "ये मेरे बैग में था। मुझे नहीं पता किसने रखा।"
और मेरी जेब से फिर वो आवाज़ आई — इस बार बहुत धीमी, बहुत थकी हुई, जैसे घंटी ने अपना आख़िरी ज़ोर लगा दिया हो।
"जो बैग से निकाला गया," घंटी ने कहा, "वो काग़ज़ नहीं था। वो किसी का नाम था।"
मैंने आँगन में देखा।
दुबे अंकल अब भी अपने पीले लिफ़ाफ़े पर हाथ रखे बैठे थे। रज़ा सलीम रजिस्टर को सीने से लगाए खड़े थे। बबलू ने पान थूका और अपनी चेन को सीधा किया, और उसका हाथ एक बार, बस एक बार, उसके सीने पर गया जहाँ जेब थी। उस्ताद अब भी दरवाज़े के पास खड़े थे, पर अब उनका हाथ उनकी मशीन पर नहीं, मेरी तरफ़ उठा हुआ था।
और मैं समझ गया कि कल सुबह जो बैग मिलेगा, उसमें शालिनी की रिपोर्ट नहीं होगी।
उसमें एक नाम होगा।
और मुझे लगा कि वो नाम मैं उस काग़ज़ के उस आधे कोने से पहले पढ़ चुका हूँ — कहीं, किसी पुराने काग़ज़ पर, किसी पुरानी स्याही में, जिसे किसी ने बहुत पहले छिपाया था और अब वो वापस बाहर आ रहा है।
मैंने शालिनी के पापा की तरफ़ देखा। उनका हाथ अब भी उसके सिर पर था। पर जब मैंने उनकी आँखों में देखा, तो उनमें कुछ और भी था — सिर्फ़ बेटी का डर नहीं।
कुछ और।
और मैंने घंटी को जेब में रखी, और उसकी ठंडक मेरे पैर तक चली गई।
क्योंकि आज रात अगर कोई चीज़ चोरी हुई थी, तो वो सिर्फ़ एक बैग था।
और जिसने वो बैग उतारा, उसने देखा था कि शालिनी के पापा कहाँ खड़े हैं।
॥
सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली, और सबसे पहले मैंने अपनी जेब टटोली।
घंटी वहीं थी। ठंडी थी, बिल्कुल ठंडी, जैसे रात भर किसी ने उसे बर्फ़ में दबाकर रखा हो। मैं उठकर बैठ गया। चारपाई की रस्सियाँ चरचराईं। कमरे में वो पुराना बल्ब अब भी गुनगुना रहा था, हालाँकि बत्ती बंद थी, और मुझे लगा कि वो बल्ब भी मेरी तरह रात भर सोया नहीं।
कल शाम की बातें सिर में घूम रही थीं। स्कूल का आँगन, टिन की गिरने की आवाज़, अंधेरा, शालिनी का काँपता हाथ, वो काली डोरी, और वो आधा लिखा हुआ शब्द, जिसे मैंने मीरा की रोशनी में देखा था।
तीन अक्षर। आधे कटे हुए। पहला मोटा, बीच वाला पतला, नीचे का शायद र।
और घंटी ने कहा था — जो बैग से निकाला गया, वो काग़ज़ नहीं था। वो किसी का नाम था।
मैंने मुँह धोया। पानी ठंडा था। टब के पास रखा आईना टेढ़ा था, और उसमें मेरा चेहरा ऐसा दिख रहा था जैसे कोई दो रात से नहीं सोया हो। मैंने अपनी उँगलियों में लगी ग्रीस को रगड़कर छुड़ाया और बाहर आया।
गली में अभी अंधेरा था, बस पूरब से हल्की सी धुँधली रोशनी आ रही थी। पीपल का पेड़ काला खड़ा था। चबूतरी पर कोई नहीं था। और मुझे लगा कि सुबह की गली इतनी चुप कभी नहीं थी, जितनी आज थी।
तभी पैरों की आवाज़ आई।
दौड़ता हुआ कोई आ रहा था। चप्पल की आवाज़, फिर फिसलने की, फिर एक छोटी सी चीख।
टिंकू गली के मोड़ से घुसा। उसका सिर खुला था, स्कूल का बस्ता कंधे पर पड़ा था, और वो इस तरह दौड़ रहा था जैसे कोई उसके पीछे आ रहा हो।
"उस्ताद!" उसने चिल्लाकर कहा। "उस्ताद, मिल गया!"
मैंने उसे पकड़कर रोका। वो हाँफ रहा था। उसके घुटने पर बँधी पट्टी ढीली हो गई थी, और माथे पर पसीना था, हालाँकि सुबह की ठंड में पसीना आना मुश्किल है।
"धीरे," मैंने कहा। "पहले साँस ले। तू सुबह चार बजे से कहाँ भाग रहा है?"
"पाँच बजे हैं," उसने कहा। "और मैं भाग नहीं रहा, उस्ताद, मैं आया हूँ। मैंने कहा था न, बैग सुबह दुकान के पीछे मिलेगा। तो मैं आया। मैंने सोचा, तुम सो रहे होगे, तो मैं खुद देख लेता हूँ।"
"तो तूने दुकान के पीछे जाकर देख लिया।"
"हाँ।"
"अकेले।"
उसने हल्का सा मुँह बनाया। "तुमने मना किया था?"
"नहीं, पर—"
"तो फिर?"
बच्चा तर्क में मुझसे आगे निकल रहा था। मैंने अपनी जेब से चाबी निकाली और शटर उठाया। शटर की आवाज़ सुबह की चुप्पी में बहुत ज़ोर से आई। पीछे वाले कमरे में अंधेरा था, और दुकान के पीछे वाली छोटी जगह में पुरानी बोरियाँ पड़ी थीं, जिन पर मैंने सालों से हाथ भी नहीं लगाया था।
टिंकू मेरे आगे-आगे गया। वो बोरियों के पास रुका और उँगली से इशारा किया।
"वहाँ," उसने कहा। "सबसे नीचे वाली बोरी के नीचे। मैंने सुबह देखा कि बोरी का कोना ऊपर उठा हुआ है, जैसे किसी ने कुछ दबाकर बोरी सीधी करके रखी हो।"
मैंने झुककर देखा।
बोरी का कोना सच में ऊपर उठा हुआ था। और उसके नीचे से कुछ काला दिख रहा था।
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।
"अंकुश," घंटी बोली, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे लगा वो मेरे ही सिर के अंदर बोल रही है। "देखने से पहले सोच।"
मैंने आँख बंद की। एक, दो, तीन।
फिर मैंने उस्ताद की बात याद की, जो उन्होंने कल रात कही थी — जो चीज़ मिलती है, वो पहले से रखी गई होती है, और जो रख गया, वो चाहता है कि तुम उसे ठीक वैसे ही उठाओ जैसे वो चाहता है।
"टिंकू," मैंने कहा। "मेरे औज़ारों के ट्रंक से दस्ताने ला। वही मोटे वाले।"
"दस्ताने?"
"हाँ। मैं आज इस बैग को अपने हाथ से नहीं छूऊँगा।"
वो दौड़कर गया। मैं वहीं खड़ा रहा, बोरी को देखता हुआ, और मेरे मन में एक ही बात घूम रही थी — कल रात बैग शालिनी से दूर गेट के पास उतारा गया था। और मेरी दुकान के पीछे, मेरी बोरियों के नीचे रात में रखा गया था।
मेरी दुकान।
मेरे पीछे।
यानी वो आदमी, जो अंधेरे में शालिनी के कान के पास काली डोरी ले जाकर हँसा था, उसे मेरी गली का रास्ता पता था। बस पता ही नहीं था, वो मेरी दुकान के पीछे तक आया था, और मेरे कमरे की दीवार के उस तरफ़ खड़ा था जहाँ मैं सो रहा था।
टिंकू दस्ताने लेकर आया। मैंने पहने। बोरी हटाई।
काला बैग वहाँ पड़ा था। शालिनी का बैग। उसका पट्टा एक तरफ़ से फटा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे कल गेट के पास मिला टुकड़ा दिखा रहा था।
मैंने बैग उठाया। हल्का था।
"हल्का है," मैंने कहा।
"इसलिए तो कह रहा हूँ," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, अगर इसमें सारी रिपोर्ट होती तो भारी होता ना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। कभी-कभी ये तेरह साल का लड़का मुझसे ज़्यादा साफ़ देखता है।
"तू ठीक कहता है," मैंने कहा।
मैंने बैग की ज़िप खोली। अंदर से पहले एक काग़ज़ों का बंडल निकला, फिर एक कलम, और फिर एक छोटा कार्ड जिस पर शालिनी की तस्वीर थी।
मीरा उस वक़्त गली के मोड़ से आ रही थी। उसके हाथ में कैमरा था, बाल बिखरे हुए, और चेहरे पर वो भाव जो उसके चेहरे पर तभी आता है जब उसे पता हो कि आज कोई बड़ी चीज़ होने वाली है।
"मिल गया?" उसने दूर से पूछा।
"आ जा," मैंने कहा। "और हाथ मत लगाना।"
उसने दस्ताने देखे और तुरंत समझ गई। कैमरा चालू किया, फिर मेरी तरफ़ देखा। "बोल, क्या दिखा?"
मैंने काग़ज़ों का बंडल खोला। एक-एक पन्ना देखा। सब पर वही रिपोर्ट — स्कूल की छत, टूटा कोना, मरम्मत का झूठ, बीस लाख का हिसाब। सब था।
"रिपोर्ट की नकल है," मैंने कहा। "पूरी।"
"और हस्ताक्षर वाला पन्ना?" मीरा ने पूछा।
मैंने बंडल उलट-पलटकर देखा। फिर बैग को खाली किया। कोई पन्ना नहीं। वो असली पन्ना, जिस पर शालिनी ने अपना हाथ रोका था, जिस पर उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे, पर जो सबसे ज़रूरी था — वो नहीं था।
"नहीं है," मैंने कहा।
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, तो चोर ने सिर्फ़ एक पन्ना लिया? बाकी सब छोड़ गया?"
"हाँ।"
"तो मतलब उसे पूरी रिपोर्ट नहीं चाहिए थी। उसे सिर्फ़ वो पन्ना चाहिए था जिस पर हस्ताक्षर की जगह थी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, वो चमक जो उसे तभी आती है जब वो किसी सुराग के बहुत पास हो।
"हाँ," मैंने कहा। "और उसने बैग हमारे पास छोड़ दिया, इसका मतलब है कि बैग का हमारे पास होना उसके काम का है।"
तभी मेरी नज़र बैग के अंदर के कोने पर गई। वहाँ कुछ था। एक पर्ची, तह की हुई, बैग के अंदर की जेब में ठुसी हुई।
मैंने उसे दस्ताने से खींचा। खोला।
उस पर नीली स्याही में एक लाइन लिखी थी। छोटी लाइन, पर ऐसी कि मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने पढ़ा, और फिर ज़ोर से पढ़ा, ताकि मीरा और टिंकू भी सुन लें।
"बैग वहीं मिला जहाँ इसकी जगह थी। अब बताओ, चोर कौन?"
मीरा ने कैमरा थोड़ा और पास किया। "आगे कुछ?"
"और नीचे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी हो गई, "छोटे अक्षरों में लिखा है — अब हर उँगली जो इस बैग पर है, वो अंकुश यादव की दुकान से निकली है।"
टिंकू ने साँस रोक ली।
मीरा ने धीरे से कहा, "ये तो सीधी बात है।"
"क्या?"
"ये सीधी बात है, अंकुश," उसने कहा। "ये पर्ची यह नहीं कह रही कि तुमने चोरी की। ये कह रही है कि चोरी का इल्ज़ाम तुम पर लगेगा। और ये लिखने वाला जानता है कि इल्ज़ाम सच से नहीं, काग़ज़ से बनता है।"
मैंने उस पर्ची को उलटा किया। उसके पीछे कुछ नहीं था। फिर मैंने उसे अपनी हथेली पर रखकर ठीक से देखा।
हाथ झुका हुआ था।
वो अक्षर दाएँ तरफ़ झुके थे। जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बदल गई। "ये लिखाई वही है ना?"
उसने पर्ची को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर अपने कैमरे drops करके जल्दी से अपनी कमीज़ की जेब से वो काग़ज़ का फटा कोना निकाला, जो शालिनी ने कल अंधेरे में बैग से खींचा था।
उसने दोनों को अपनी हथेली पर पास-पास रखा।
नीली स्याही। झुकी लिखाई। और एक जैसा वो काँपता हाथ।
"एक ही हाथ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "एक ही आदमी ने ये दोनों लिखे हैं। जो नाम कल बैग में रखा था और जो लाइन आज इसमें रखी है — दोनों एक ही आदमी के हाथ के हैं।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "मतलब चोर ने खुद अपना नाम बैग में रखा था?"
"नहीं," मैंने कहा। "मतलब चोर ने किसी और का नाम रखा था। और अब वो चाहता है कि वो नाम मेरे साथ जुड़ जाए।"
कमरे में एक पल के लिए चुप्पी छा गई। इतनी चुप्पी कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
तभी गली के मुँह से एक आवाज़ आई।
पान चबाने की आवाज़।
वो आवाज़ मैंने सालों में पहचानी है। जैसे कोई चप्पल पत्थर पर रगड़ रहा हो, और साथ में कुछ चिपचिपा हो।
बबलू पांडे।
वो गली में आ रहा था। मोटा शरीर, गले में मोटी सोने की चेन, कमीज़ के दो बटन खुले, और मुँह में पान। वो मुस्कुरा रहा था। सुबह के छह बजे, किसी को मुस्कुराकर मिलना आम बात है। पर बबलू की मुस्कान वो नहीं थी। उसकी मुस्कान वो थी जो कह रही हो — मैं जानता हूँ जो तुम जानते हो, और इसीलिए आज तुम्हारा दिन अच्छा नहीं जाने वाला।
वो मेरी दुकान के पास आया और रुक गया। उसने अपनी कमर से हाथ नहीं हटाया। बस बैग पर नज़र डाली, फिर मेरे हाथ में दस्ताने देखे, फिर मीरा के कैमरे पर।
"अरे," उसने कहा। "सुबह-सुबह मेहनत। मज़ा आ गया।"
"बबलू भाई," मैंने कहा। "इतनी सुबह? आप रोज़ छह बजे उठते हैं?"
"उठने की बात और है," उसने कहा। "मुझे तो खबर मिली है कि आज कुछ मिला है। तो सोचा, देख आऊँ।"
"किसने खबर दी?"
वो हँसा। पान चबाया। और उसने अपनी जेब से पानदान निकालकर उसमें उँगली डाली, जैसे वो इस सवाल को सुनकर बोर हो गया हो।
"अरे भाई," उसने कहा, "गली में खबर और हवा दोनों एक ही तरह चलती हैं। किसी ने कुछ कहा, किसी ने सुना, और ये पूरी गली जान गई। तुझे क्या लगा, तेरी दुकान के पीछे से बैग निकलेगा और किसी को पता नहीं चलेगा?"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा फैल गया।
"आपको कैसे पता कि दुकान के पीछे से बैग निकला है?"
वो रुका। एक पल के लिए। बहुत छोटा पल, पर मैंने देखा। उसके पान चबाने की गति एक सेकंड रुक गई, और फिर चलने लगी, पहले से तेज़।
"मैंने नहीं कहा," उसने कहा, "कि पीछे से निकला। मैंने कहा कि किसी को पता नहीं चलेगा। तूने खुद ही पीछे का ज़िक्र किया। अपनी बात का हिसाब रख, मिस्त्री।"
वो मुस्कुराया, और इस बार मुस्कान में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। जीत की झलक।
"बबलू भाई," मैंने कहा, और मैंने एक कदम आगे रखा। "आपने कल रात आँगन में कहा था कि आप फ्यूज़ देखने गए थे।"
"कहा था। तो?"
"आपके जूतों पर मंच के पीछे की मिट्टी थी। फ्यूज़ मंच के पीछे नहीं होता।"
उसने कुछ नहीं कहा। बस पान चबाया, और मुँह का लाल रंग उसके होंठों के कोने पर फैल गया।
"और कल रात," मैंने कहा, "जब अंधेरा हुआ, तब शालिनी के पास कोई खड़ा था। उसके गले के पास एक काली डोरी आई थी। आप बताइए — गली में काली डोरी किसके पास होती है? जूते की? बैग की? या पानदान की?"
उसकी नज़र एक पल के लिए मेरे चेहरे से हटी और उसके पीछे, गली के मुँह की तरफ़ गई। फिर वापस आई।
"तू बहुत बोल रहा है," उसने कहा। "और सुबह-सुबह बोलने से भूख लगती है। मुझे चाय पीनी है।"
वो मुड़ा। और जाते-जाते उसने अपनी गर्दन थोड़ी सी उठाई और कहा, बिना पीछे देखे, "अब पुलिस वालों को भी कुछ काम मिलेगा। सुबह-सुबह उनके पास भी खबर जाएगी, कि एक मिस्त्री की दुकान के पीछे से चोरी का माल निकला है।"
वो चला गया। पान की आवाज़ गली के कोने तक गई, और फिर गुमटी की तरफ़ मुड़ गई।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे हाथ में पर्ची थी, और मुझे लगा जैसे वो पर्ची मेरे हाथ में जल रही है।
तभी दौड़ते हुए कोई आया।
शालिनी।
उसने साड़ी नहीं पहनी थी। सलवार कुर्ता पहना था, और बाल खुले हुए थे। वो दौड़कर आई और बिना कुछ कहे बैग पर झुक गई। फिर रोने लगी। ऐसे रोई जैसे बहुत देर से रो रही हो और अब कहीं रुक नहीं पा रही हो।
"ये मेरा है," उसने कहा, बीच में साँस लेकर। "ये मेरा बैग है। ये मैंने…"
वो कुछ नहीं कह पाई।
मैंने हाथ बढ़ाया। फिर याद आया कि दस्ताने मेरे हाथ में हैं, और मैंने उन्हें उतार दिया। फिर मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"शालिनी," मैंने कहा। "जो चला गया, वो चला गया। पर जो तुमने कल अंधेरे में बचाया था, वो तुमने नहीं खोया। वो तुम्हारे पास है।"
उसने सिर उठाया। आँखें लाल थीं, और उनमें वो सवाल था, जो हर डरे हुए आदमी की आँख में होता है — क्या मैं इसमें फँस गई हूँ?
"वो पर्ची," मीरा ने धीरे से कहा, और मैंने उसे देखकर मना किया। पर शालिनी ने पर्ची मेरे हाथ में देख ली।
"क्या है ये?" उसने पूछा।
मैंने उसे दिया।
उसने पढ़ा। एक बार। दो बार। और फिर उसका चेहरा ऐसा हुआ जैसे किसी ने उसके भीतर एक दीया बुझा दिया हो।
"ये कह रहे हैं कि चोरी अंकुश भाई ने की?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये कह रहे हैं कि लोग यह मानेंगे। दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है।"
"पर लोग मानेंगे।"
"कुछ लोग मानेंगे," मैंने कहा। "बाकी हमारे काम से मानेंगे। और ये जो पर्ची लिख गया है — इसे यही डर है। उसे पता है कि जो सच एक बार खुल जाए, उसे ये एक काग़ज़ नहीं रोक सकता। इसीलिए वो हमें शुरू में ही फँसाना चाहता है।"
मैंने पर्ची उसके हाथ से ली और उसे अपनी जेब में रखा।
"सच्छुपाने से बड़ा होता है, शालिनी," मैंने कहा। "मैंने ये अपने घर में देखा है। मेरे पापा ने पाँच साल एक बात छिपाई। वो बात बाज़ार में एक पल में निकलती, पर घर में पाँच साल पकी और पूरे घर को जला गई। तुम्हारा एक हस्ताक्षर नहीं हुआ। बस इतना है। जो हस्ताक्षर नहीं हुआ, वो आज किसी और के हाथ में है। कल तुम बोलोगी, और वो काग़ज़ खुद बेकार हो जाएगा।"
शालिनी ने अपने आँसू पोंछे। रूमाल नहीं था, इसलिए उसने अपनी आस्तीन से पोंछा, जैसे बच्चे पोंछते हैं।
तभी गुमटी की तरफ़ से शबनम आपा आई। हाथ में चाय का गिलास था और दूसरे हाथ में लोहे की चिमटी। उसने गिलास शालिनी के हाथ में पकड़ा दिया, बिना कुछ कहे। फिर चिमटी गुमटी की तरफ़ उठाकर बोली, आवाज़ गली के हर कोने तक गई, "जो बच्ची के पीछे पड़ेगा, उसका मुँह मैं इस चिमटी से सेंक दूँगी। और मैं मज़ाक नहीं कर रही।"
गली में कोई नहीं हँसा।
तभी उस्ताद आए। वो धीरे चलते हैं, पर आज उनके कदम पहले से भारी लग रहे थे। उन्होंने बैग देखा, पर्ची देखी, और फिर मेरी तरफ़ आकर बहुत धीमे से कहा, "जो आदमी अपना काम करके दूसरे के आँगन में चीज़ें रखता है, वो अपना चेहरा नहीं दिखाता। पर वो एक चीज़ ज़रूर करता है — वो अपने पीछे अपनी आदत छोड़ जाता है।"
"आदत?" मैंने पूछा।
"वो पर्ची," उस्ताद ने कहा और हवा में उँगली से इशारा किया। "उसे लिखने का शौक है। वो अपनी बात कहने से रोक नहीं पाता। यही उसकी आदत है। और जो आदमी अपनी बात कहने से खुद को रोक नहीं पाता, वो एक दिन सबको बता देगा कि उसने क्या किया।"
मैंने सिर हिलाया।
"अभी मनोज का टेम्पो आया था?" मीरा ने पूछा। "बबलू कहीं पुलिस की बात कर रहा था।"
"पुलिस," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर आ गया जो बच्चों में थाने की बात सुनकर आता है। "उस्ताद, अगर थाने वाले आ गए तो?"
"तो क्या?" मैंने कहा। "हमने चोरी नहीं की।"
"पर बैग हमारी दुकान से मिला।"
"हाँ," मैंने कहा। "और इसीलिए हम पहले से तैयार हैं।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "कल तूने सब कुछ रिकॉर्ड किया?"
"किया। पूरा। स्कूल आँगन, शालिनी के सवाल, बबलू का जूता, मंच के पीछे की मिट्टी, सब।"
"और कल रात का बैग निकलना?"
"अभी-अभी रिकॉर्ड किया," उसने कहा। "पहली चीज़ से आख़िरी तक। शालिनी का आना भी।"
"तो फिर हमारे पास कुछ है," मैंने कहा।
मैंने पर्ची अपनी जेब से निकाली और उसे फिर देखा। झुकी लिखाई। नीली स्याही। और वो आधा शब्द, जो फटे कोने पर था।
मैंने अपने मन में उन दोनों को पास-पास रखा। तीन अक्षर। मोटा, पतला, और नीचे र।
और मेरे पेट में एक नाम कुलबुलाने लगा। एक नाम जिसे मैंने कहीं पढ़ा था। किसी पुराने काग़ज़ पर। किसी पुरानी स्याही में।
मैंने आँख बंद की और उसे पकड़ने की कोशिश की, पर वो नाम मेरी उँगलियों से ऐसे फिसला जैसे गीला साबुन।
तभी गली के मुँह से आवाज़ आई।
गाड़ी की आवाज़। भारी गाड़ी। इंजन की वो आवाज़ जो जीप की होती है, टेम्पो की नहीं।
टिंकू दौड़कर मुँह तक गया और फिर वापस आया, और उसका चेहरा सफ़ेद था।
"उस्ताद," उसने कहा। "पुलिस की जीप है। दो सिपाही हैं। और…"
"और?"
"और दुबे अंकल की कुर्सी खाली है।"
मैं गली के मुँह तक गया।
जीप वहीं रुकी थी, थाने के सामने। दो सिपाही उतरे थे और वो दुबे अंकल की कुर्सी को देख रहे थे, जो खाली पड़ी थी। वो कुर्सी जिस पर बैठकर दुबे अंकल पच्चीस साल से गली की हर बात सुनते आए थे। वो कुर्सी जिसके पैर के नीचे ईंट का टुकड़ा रखा था ताकि वो हिले नहीं। वो कुर्सी, जो उनकी अपनी थी, थाने की नहीं, और जिस पर बैठकर, उनके शब्दों में, आदमी कम झूठ बोलता है।
आज वो खाली थी।
और मेरे हाथ में शालिनी का बैग था, मेरी जेब में वो पर्ची थी जिस पर लिखा था कि चोरी का इल्ज़ाम मुझ पर लगेगा, और मेरे सामने खड़ी जीप से एक सिपाही उतरकर मेरी तरफ़ आ रहा था, हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ लिए।
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी। एक पल के लिए मुझे लगा वो बोलेगी। पर वो चुप रही।
और उस चुप्पी में मुझे एक बात समझ आई, जो मुझे पहले नहीं समझ आई थी — दुबे अंकल ने कल रात अपना पीला लिफ़ाफ़ा सीने से लगाया था और कहा था कि वो आज सुबह सबके सामने खोलेंगे।
आज सुबह उनकी कुर्सी खाली है।
यानी किसी को पता चल गया कि वो क्या खोलने वाले थे।
॥
सिपाही मेरी तरफ़ आ रहा था। उम्र तीस के आसपास, कद छोटा, मूँछें कटी हुई, और चाल में वो ठसक जो नई वर्दी में आती है। उसके हाथ में मुड़ा हुआ काग़ज़ था, जिसे वो बार-बार खोलकर देख रहा था, जैसे वो ख़ुद उसे पढ़ नहीं पाया हो और मुझसे पढ़वाना चाहता हो।
पीछे वाला सिपाही लंबा था, चुप, और उसने अपने दोनों हाथ पीछे बाँध रखे थे। वो गली को देख रहा था, दुकानों को, पीपल को, और उसकी नज़र जब उस्ताद की सिलाई मशीन पर पड़ी तो एक पल के लिए रुक गई।
"तुम अंकुश यादव हो?" पहले सिपाही ने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "सुबह-सुबह मशहूर हो गया हूँ, ये अच्छी बात है।"
वो हँसा नहीं। उसने काग़ज़ खोला और उस पर उँगली रखी।
"ये क्या है?"
मैंने देखा। एक शिकायत। सादे काग़ज़ पर, किसी की जल्दी में लिखी हुई लिखाई। ऊपर मेरी दुकान का नाम। नीचे कुछ लाइनें।
"जी," मैंने कहा, "काग़ज़ है।"
"मज़ाक मत करो।"
"माफ़ करना," मैंने कहा। "आदत है। सुबह से किसी ने मज़ाक नहीं किया, तो मुँह सूख रहा है।"
पीछे से टिंकू ने एक छोटी सी हँसी निकाली, फिर तुरंत चुप हो गया।
सिपाही ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"कल रात तुम्हारी दुकान के पीछे एक बैग मिला। किसी लड़की का। उसमें काग़ज़ थे। तुमने उसे छुपाया क्यों?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। सच बोलने का मन बना लिया था, और सच बोलने में एक अजीब सा आराम होता है, ऐसा आराम जैसे भारी बोरी ज़मीन पर रख दी जाए।
"जी," मैंने कहा। "बैग मेरी दुकान के पीछे मिला। सुबह पाँच बजे। मेरा शागिर्द टिंकू बोरी के नीचे से निकालकर लाया।"
"तो तुमने उसे थाने क्यों नहीं दिया?"
"क्योंकि मुझे यह जानना था कि वो वहाँ कैसे पहुँचा," मैंने कहा। "अगर मैं उसे सीधे थाने दे आता, तो वो सबूत बन जाता। और सबूत वो होता है जो सच बताए। मुझे पहले यह देखना था कि ये सच बताता है या सिर्फ़ मेरी तरफ़ उँगली करता है।"
"और वो क्या बताता है?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो पीछे खड़ी थी, कैमरा हाथ में, और उसकी आँखें कह रही थीं कि बोलो।
"ये बताता है," मैंने कहा, "कि बैग पर जो उँगलियों के निशान हैं, वो मेरी दुकान से निकले हैं। और ये बात सच है। क्योंकि बैग यहीं रखा गया था। जिसने रखा, उसने मेरी दुकान चुनी। यही तो सबसे आसान जगह थी जहाँ सबकी नज़र जाती है, और फिर सबसे आसान शक़ भी।"
सिपाही ने मुझे घूरा।
"तुम वकील हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "साइकिल मिस्त्री हूँ। पर रोज़ झूठ सुनता हूँ, इसलिए सच की शक्ल पहचान लेता हूँ।"
उसके चेहरे पर कुछ बदला। गुस्सा नहीं आया, पर वो सतर्क हो गया, और सतर्क सिपाही सबसे ज़्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि वो सुनने लगता है।
"बैग किसका है?"
"शालिनी का," मीरा ने आगे आकर कहा। "वो स्कूल में इंजीनियर है। कल शाम पाँच बजे स्कूल के आँगन में सभा थी। शालिनी वहाँ सच बोलने आई थी कि जो रिपोर्ट उसके नाम पर बनाई गई, वो झूठी है। उसने हस्ताक्षर नहीं किए। बोलते-बोलते बिजली गई, और अंधेरे में किसी ने उसका बैग छीन लिया।"
"तुम कौन हो?"
"मीरा तिवारी। बस्ती की आवाज़। मेरे पास उस सभा की पूरी रिकॉर्डिंग है, जिसमें यह सब है।"
सिपाही ने लंबी साँस ली। फिर उसने मुड़कर अपने साथी को देखा, और वो दोनों एक पल बिना बोले खड़े रहे। यही तो पुलिस की भाषा है — वो चुप होकर आपस में बात कर लेते हैं, और आपको लगता है कि आप बाहर खड़े हैं।
तभी गली के मुँह से धीमी चप्पलों की आवाज़ आई।
दुबे अंकल आ रहे थे।
नीली शर्ट, वो पुरानी वर्दी जैसी, आधी आस्तीन में। हाथ में एक मुड़ा हुआ अख़बार और एक पुरानी नीली कवर वाली कॉपी। उनकी चाल में वो धीरज था जो सिर्फ़ उन लोगों में आता है जिन्होंने बहुत साल तक वर्दी पहनी हो और अब उसे पहनते नहीं बल्कि उसके कपड़े जैसा रंग पहनते हैं।
दोनों सिपाही उन्हें देखकर सीधे खड़े हो गए।
"अंकल," छोटे सिपाही ने कहा, "आप… कुर्सी खाली थी तो हम…"
"मैं सब्ज़ी लेने गया था, बेटा," दुबे अंकल ने कहा। "आदमी को सुबह सब्ज़ी भी लेनी होती है, सिर्फ़ थाने में बैठना काम नहीं है।"
फिर वो मेरी तरफ़ आए, मेरे कंधे के पास हाथ रखा, और सिपाही की तरफ़ देखा।
"जो पूछना है, पूछो। पर साफ़ सुनो — यहाँ जाँच होगी, काग़ज़ होगा, हिसाब होगा। पर बिना सबूत किसी को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा। जिसे इल्ज़ाम देना है, उससे पहले उस काग़ज़ पर अपना नाम लिखवाओ जो तुम मेरे बच्चे की तरफ़ बढ़ा रहे हो।"
छोटा सिपाही कुछ कहने ही वाला था कि दुबे अंकल ने हाथ उठा दिया।
"मैं जानता हूँ कि शिकायत कैसे आई। किसी ने किसी को भेजा है। पर तुम दोनों उस काग़ज़ के सिर्फ़ मोहरा हो। अभी तुम लिख लो — बैग दुकान के पीछे से ज़ब्त हुआ, दुकान वाले ने खुद दिखाया, बैग में काग़ज़ मिले, जो उस लड़की का नाम लेते हैं जिसने कल सबके सामने कहा कि उसने हस्ताक्षर नहीं किए। बस इतना लिख लो। बाकी जाँच करेगी।"
लंबा सिपाही पहली बार बोला।
"अंकल, हमें बस बैग ले जाना है।"
"ले जाओ," दुबे अंकल ने कहा। "पर रसीद दो। और फोटो खिंचवाओ जाते वक़्त। ये बच्चा भी रखेगा, ये लड़की भी रखेगी। क्योंकि कल को अगर इस बैग से कुछ गायब निकला, तो सबको पता होना चाहिए कि गया कहाँ से था।"
छोटे सिपाही का चेहरा उतर गया। उसने काग़ज़ मोड़ा और जेब में रखा।
"अच्छा," वो बोला। "हम बैग ले जा रहे हैं। तुम यहीं रहो, कहीं मत जाओ।"
"मैं तो दुकान वाला हूँ," मैंने कहा। "जाऊँगा कहाँ? पहाड़ पर हवाई जहाज़ उड़ाने थोड़े जाना है।"
उसने मुझे घूरा। फिर बैग माँगा। मीरा ने रसीद लिखी, दोनों ने हस्ताक्षर किए, मीरा ने अपने कैमरे से फ़ोटो ली, और बैग जीप में रखा गया।
जीप चली गई।
और जैसे ही उसका इंजन दूर हुआ, गली में वो सन्नाटा बैठ गया जो हमेशा किसी बड़ी चीज़ के बाद बैठता है। शबनम आपा गुमटी से बाहर आईं, हाथ में चिमटी, और मुझे देखकर बोलीं, "अब बोल। क्या हुआ?"
मैंने कहा, "कुछ नहीं। बैग ले गए।"
"और?"
"और कुछ नहीं।"
"झूठ मत बोल। तेरा चेहरा बता रहा है कि कुछ और हुआ है।"
"आपा," मैंने कहा, "मेरा चेहरा हमेशा ऐसा ही रहता है। मैं सुबह से कुछ नहीं खाया।"
"तो आ, दो समोसे खा। भूखा आदमी सोच भी गलत करता है।"
मैं हँसा। पर हँसी अंदर तक नहीं गई।
क्योंकि मेरे पेट में वो नाम अभी भी कुलबुला रहा था। वो आधा नाम जो फटे काग़ज़ के कोने पर था। और वो पर्ची, जिस पर लिखा था कि इस बैग पर हर उँगली मेरी दुकान से निकली है।
दोपहर तक वो बात हो गई जिसका डर था।
उस्ताद की दुकान पर बैठे हुए मुझे पता चला कि एक आदमी लाइसेंस दफ़्तार से आया था और उसने दुकान के शटर पर एक और पीला काग़ज़ चिपका दिया था। शबनम आपा ने आकर बताया। मैं दौड़कर गया।
पीला काग़ज़। फिर वही भाषा। लाइसेंस जाँच के दौरान निलंबित। दस दिन। काग़ज़ साफ़ न होने तक काम बंद।
मैंने पढ़ा और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"अरे," टिंकू ने कहा, "ये तो पिछले वाला ही है।"
"नहीं," मीरा ने पास आकर काग़ज़ देखते हुए कहा। "तारीख़ नई है। और नीचे लिखने वाले का नाम नहीं है। पहले वाले पर नाम था।"
"तो?"
"तो इसका मतलब है कि अब वो नाम नहीं देना चाहते। पहले वाले पर नाम था तो हम पकड़ सकते थे। अब नहीं।"
मैंने काग़ज़ उतारा और मोड़कर जेब में रखा। फिर मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दुकान के अंदर थे।
वो औज़ार समेट रहे थे।
मैंने उन्हें कभी ऐसे औज़ार समेटते नहीं देखा था। वो हमेशा औज़ार रखते थे, रखने के बाद भूल जाते थे, और फिर ढूँढते रहते थे। पर आज वो उन्हें एक-एक करके पोंछ रहे थे, एक-एक करके ट्रंक में रख रहे थे, और हर औज़ार रखने से पहले उसे एक पल हाथ में पकड़कर देख रहे थे, जैसे किसी पुराने आदमी का हाथ पकड़कर उसे अलविदा कह रहे हों।
मैं अंदर गया।
"पापा।"
"हूँ।"
"ये क्या कर रहे हो?"
"औज़ार।"
"क्यों?"
"बंद है दुकान।"
"दस दिन के लिए है। दस दिन। बारह भी हो सकते हैं। पर बंद है तो बंद है। औज़ार समेटने की क्या ज़रूरत?"
उन्होंने एक पुराना पेचकस उठाया, उसे कपड़े से पोंछा, और उसे ध्यान से ट्रंक में रखा। फिर बोले, "बंद दुकान में औज़ार पड़े रहें तो ज़ंग लगती है।"
और ये बात उन्होंने ऐसे कही जैसे कोई और बात कह रहे हों। मैं उनके सामने खड़ा रह गया। उनका चश्मा कान पर टेप से बँधा था। उनकी कमर झुकी थी। हाथ काँप रहे थे, पर काँपते हुए भी वो हर औज़ार को सीधा रख रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, "आप डर रहे हो।"
उनका हाथ रुका।
"डरना अलग बात है," उन्होंने कहा, "और तैयार रहना अलग। मैं तैयारी कर रहा हूँ।"
"किसकी?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें कमज़ोर थीं, पर उस पल उनमें वो चीज़ थी जो मुझे पहले नहीं दिखी थी।
"उसकी जो आज नहीं आया," उन्होंने कहा, "पर आएगा।"
फिर वो चुप हो गए, और मैं जानता था कि आगे कुछ नहीं कहेंगे। पापा की चुप्पी ऐसी ही है। एक दरवाज़ा है जो अंदर से बंद है, और आप उसे खटखटा सकते हैं, पर वो खुलेगा तब जब वो खुद खोलें।
शाम चार बजे शालिनी आई।
वो अकेली नहीं थी। उसके साथ उसके पापा थे। दुबले, थके, चालीस-पचास के बीच, हाथ में एक मोटा बैग जिसमें काग़ज़ भरे हुए थे। उनकी आँखों में वो डर था जो आदमी के चेहरे पर तब आता है जब उसका पूरा जीवन किसी एक काग़ज़ पर टिका हो।
वो उस्ताद की दुकान के बाहर रुके, और शालिनी ने कहा, "पापा, अंदर चलिए।"
वो अंदर नहीं आए। वो बाहर खड़े रहे, और फिर बोले, "शालिनी, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"कल की सभा में तुम चुप रहना।"
शालिनी रुक गई।
"क्या?"
"मैंने सोचा है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, धीमी और टूटी। "अगर तुम बोल दोगी, तो साहब के सारे काम रुक जाएँगे। और अगर उसके काम रुके तो…" उन्होंने अपना बैग देखा। "…तो मेरी कंपनी का क्या होगा? बाईस मज़दूर हैं। तीन महीने की मज़दूरी बाकी है। उनके बच्चे हैं। मैं उन्हें क्या कहूँगा?"
शालिनी ने उन्हें देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं।
"पापा," उसने कहा, "और मैं? मैं झूठ पर हस्ताक्षर करती तो आपकी कंपनी बच जाती, पर मैं बचती? उस छत के नीचे बच्चे बैठते हैं। अगर कल वो छत गिरी, तो उन बाईस मज़दूरों के बच्चे भी उसी में होंगे।"
उनके पापा ने मुँह फेर लिया।
"मैं मज़दूरों की बात कर रहा हूँ।"
"मैं भी," शालिनी ने कहा। "मैं भी उन्हीं की बात कर रही हूँ।"
वो दोनों चुप खड़े रहे।
मैं बीच में नहीं आया। कभी-कभी सबसे ज़रूरी काम यही होता है — कुछ न कहना। मैं टिंकू के पास बैठ गया और उससे धीरे से कहा, "देख रहा है? बाप-बेटी की बात।"
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा, "अगर उसके पापा नहीं माने तो?"
"तो कुछ नहीं होगा।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि हर बात अपने वक़्त पर होती है। और अभी उस आदमी को मौक़ा देना है। डर को बाहर निकलने देना है। जो डर बाहर आ जाता है, वो अंदर से कमज़ोर हो जाता है।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर बोला, "उस्ताद, ये बात आपने किस किताब में पढ़ी?"
"किसी में नहीं। साइकिल के पहिये में पढ़ी है। जो पहिया जाम हो, उसे ज़ोर से नहीं घुमाते। उसे थोड़ा ढीला करते हैं। फिर अपने आप घूमने लगता है।"
शालिनी के पापा आख़िरकार अंदर आए। उन्होंने बैग मेज़ पर रखा और बोले, "मैं सच बोलूँगा, पर मुझे एक बात का जवाब चाहिए।"
"पूछिए," मैंने कहा।
"क्या आप मेरे मज़दूरों को बचा सकते हो?"
मैं एक पल रुका। सच बोलना था, और सच बोलना आसान नहीं था।
"नहीं," मैंने कहा। "मैं कोई साहब नहीं हूँ। मेरे पास पैसा नहीं, सत्ता नहीं। जो मेरे पास है, वो ये गली है, ये लोग हैं, और एक घंटी है जो कभी-कभी बोलती है — और सच कहूँ तो वो भी अब कम बोलने लगी है।"
"तो फिर?"
"तो फिर मैं आपसे यह कहूँगा," मैंने कहा। "आपके मज़दूरों की मज़दूरी अगर सच बोलने से रुकती है, तो वो मज़दूरी झूठ से भी नहीं चुकेगी। वो किसी और रास्ते से आएगी। पर उस रास्ते के लिए पहले उस काग़ज़ को सबके सामने खोलना पड़ेगा।"
शालिनी के पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। उन्होंने बैग खोला और उसमें से काग़ज़ों का बंडल निकाला।
"ये सब है," उन्होंने कहा। "मेरी कंपनी का हिसाब, मज़दूरों की सूची, साहब के काम के काग़ज़, और वो रसीदें जो झूठी लिखी गईं। मैं कल सभा में आऊँगा। पर मैं बोलूँगा नहीं। मैं बस ये काग़ज़ रख दूँगा।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। उसने हल्का सिर हिलाया। यही काफ़ी था। पहला कदम हमेशा पूरा नहीं होता, पर वो कदम होता है।
शाम ढलने लगी।
शालिनी और उसके पापा चले गए। मैं दुकान में आया और बैठ गया। दुकान बंद थी, शटर पर पीला काग़ज़ चिपका था, और अंदर अंधेरा था। पापा ट्रंक के पास बैठे थे और उनका हाथ ट्रंक के ढक्कन पर रखा था।
उस्ताद आए। उनकी चाल में वो धीमापन था जो पिछले कुछ दिनों से बढ़ गया था। वो मेरे सामने बैठे और बोले, "घंटी दे।"
मैंने जेब से घंटी निकाली और उनकी तरफ़ बढ़ा दी।
वो उसे दोनों हाथों में लेकर अपनी आँखों के पास उठा लाए। उनका मोटा चश्मा उनकी नाक पर फिसला हुआ था और उन्होंने उसे उँगली से सरका दिया। फिर शुरू हुआ वो काम जिसे मैं कभी नहीं भूलूँगा।
उन्होंने घंटी को घुमाया। उसे उल्टा किया। उसकी खाँच देखी। उनकी उँगली उस छोटे लोहे के टुकड़े पर गई जिसे टिंकू ने पिछली रात फँसाया था — वो टुकड़ा जिससे घंटी ने दोहरी आवाज़ में कहा था, "दो, आधी, जीभ।"
उस्ताद ने टुकड़ा निकाला। उसे रोशनी में रखकर देखा। फिर वापस घंटी में रखा।
"ये गलती से नहीं फँसा," उन्होंने कहा।
"मतलब?"
"मतलब ये कि इसे कोई जान-बूझकर दबाकर फँसाया गया है। देखो — घंटी के अंदर एक खाँच है। ये खाँच उसी कड़ी के लिए बनी है। ये टुकड़ा उसी खाँच में बैठता है। और जब बैठता है, तो घंटी की जीभ आधी हो जाती है। आधी जीभ वाली घंटी पूरी बात नहीं कहती, अंकुश। वो आधी बात कहती है। और आधी बात वो सबसे खतरनाक चीज़ है जो इस दुनिया में है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा हुआ।
"तो जिसने ये टुकड़ा भेजा," मैंने कहा, "वो चाहता था कि मेरी घंटी आधी सच बोले?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि आधा सच तुम्हें गलत रास्ते पर भेजता है। पूरा सच तुम्हें खड़ा करता है। आधा सच तुम्हें दौड़ाता है — और दौड़ते आदमी को दिशा नहीं दिखती, सिर्फ़ रफ़्तार दिखती है।"
मैंने गहरी साँस ली।
"उस्ताद," मैंने कहा, "पिछली रात टिंकू ने ये टुकड़ा घंटी में फँसाया। उसने खुद किया। किसी ने नहीं कहा।"
"पर उस लड़के को ये टुकड़ा मिला कहाँ से?"
"डिब्बे से।"
"और डिब्बा कहाँ से आया?"
"मनोज लाया। साहब की तरफ़ से।"
"तो?" उस्ताद ने पूछा।
मैं चुप हो गया।
"सोच," उन्होंने कहा। "सोच की उस डिब्बे में पेचकस क्यों था? तेरे पापा का पुराना पेचकस, जो भारद्वाज भवन में छूट गया था। कोई पुरानी चीज़। कोई पुराना औज़ार। और उसी डिब्बे में ये टुकड़ा भी था। दोनों एक साथ। क्यों?"
"क्योंकि एक ही आदमी ने भेजे।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "जिसने पेचकस भेजा, उसी ने ये टुकड़ा भी भेजा। और दोनों के पीछे एक ही बात है — वो तुम्हारे पास से गुज़रना चाहता है।"
उन्होंने घंटी मेरी हथेली पर रख दी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "ये आदमी कोई नया नहीं है। जो पुरानी चीज़ें जानता है — पेचकस, टुकड़ा, ताले की चेन, तारीख़ — वो नया नहीं हो सकता।"
"तो कौन है?"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उसे कपड़े से पोंछा। फिर उसे वापस पहना।
"मुझे नाम नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मुझे एक बात पता है। वो आदमी तुम्हारे घर के अंदर की बात जानता है।"
मुझे लगा मेरे पेट में कुछ गिर गया।
"घर के अंदर की?"
"हाँ।" उन्होंने उँगली उठाई और गिनाने लगे, वैसे गिनते हैं जैसे तराज़ू पर बाट गिनते हैं। "उसे पता है तेरे पापा का पेचकस कहाँ था। उसे पता है तेरे घर का पुराना दरवाज़ा कहाँ है। उसे पता है तेरे घर के औज़ारदान की चाबी कैसी है। उसे पता है कि माँ की दवाई कहाँ रखी है। उसे पता है कि तेरे घर में रात को कौन सोता है और कौन नहीं सोता।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कैसे?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "जो चीज़ें भेजी गई हैं, वो सिर्फ़ चीज़ें नहीं हैं। वो इशारे हैं। हर इशारा बता रहा है कि वो अंदर देख चुका है। पेचकस बता रहा है कि वो पापा तक पहुँच चुका है। टुकड़ा बता रहा है कि वो घंटी तक पहुँच चुका है। और टुकड़े की खाँच बता रही है कि वो घंटी के बारे में तुमसे ज़्यादा जानता है। अगर वो इतना जानता है कि वो टुकड़ा उस खाँच में ठीक बैठा सके, तो वो बहुत पुराना खिलाड़ी है। शायद बहुत पुराना। शायद हमसे भी पुराना।"
मैंने घंटी को देखा। वो मेरी हथेली पर पड़ी थी, ठंडी, चुप।
"उस्ताद," मैंने कहा, "जब मैं छोटा था, तो मेरे घर में एक और आदमी आता था? कोई जिसे पापा जानते हों?"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा, जो ट्रंक के पास बैठे थे।
पापा ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ़ अपना हाथ ट्रंक के ढक्कन पर कस लिया।
"मैं जानता हूँ," उस्ताद ने धीरे से कहा, "कि तेरे पापा बहुत पहले किसी से डरते थे। और जिससे आदमी डरता है, उसका नाम वो कभी नहीं लेता। वो उसकी चीज़ें पहचानता है, उसकी आवाज़ से सिकुड़ जाता है, पर नाम नहीं लेता। क्योंकि नाम लेना मानो उसे बुलाना है।"
पापा के कंधे झुक गए।
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ पलों में चुप्पी ही सबसे बड़ी बात होती है।
बाहर गली में हवा चल रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। और शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप उठ रही थी, जिसकी खुशबू दुकान के अंदर तक आ रही थी।
मैंने घंटी जेब में रखी।
"मैं एक बात समझ गया," मैंने कहा।
"क्या?" उस्ताद ने पूछा।
"कि जिसने ये सब भेजा, वो मेरे पास से कुछ लेना चाहता है।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "पर वो मुझसे लड़ नहीं रहा। वो मुझे आज़मा रहा है। वो देख रहा है कि मैं कहाँ टूटता हूँ।"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"और ये बात तुझे सबसे पहले समझनी थी," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो तुझे आज़मा रहा है, वो तेरा दुश्मन नहीं है। तेरा दुश्मन वो है जो उसके पीछे बैठा है और तुझे देख रहा है, पर खुद कुछ नहीं भेजता। वो सिर्फ़ एक काम करता है — वो अपने आदमी को भेजता है, और अपने आदमी की गलतियों में अपना नाम नहीं आने देता।"
"साहब।"
"हाँ।"
मैं उठा। दुकान के दरवाज़े तक गया। बाहर गली में टिंकू बच्चों के साथ बैठा था, और सानिया उसे कुछ समझा रही थी। मैं उन्हें देखकर मुस्कुराया, फिर मुड़ा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "मेरे पास कितना वक़्त है?"
"किस चीज़ का?"
"कल की सभा का।"
उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा, जो अब मेरी जेब में थी।
"घंटी से पूछना चाहोगे?" उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "घंटी से नहीं। आपसे।"
उस्ताद एक पल चुप रहे। फिर बोले, "कल सुबह दस बजे। पीपल के नीचे। और उससे पहले एक काम करना है।"
"क्या?"
"अपने घर के पुराने दरवाज़े के नीचे जो पैर का निशान है, वो तुमने देखा है।"
"हाँ।"
"उसे मिटाना मत। उसे उसी तरह रखना। क्योंकि जो आदमी अंदर आया, वो बाहर जाते वक़्त भी उसी जगह से गया होगा। और कल सभा में जब तुम सबके सामने खड़े हो, तो उन लोगों से कहना कि कोई उस दरवाज़े के आगे अपना पैर रखकर खड़ा होकर बताए कि वो निशान किसका है।"
मैं ठिठक गया।
"उस्ताद, वो निशान बाहर की तरफ़ मुड़ा है।"
"हाँ।"
"मतलब वो घर से बाहर जाने वाले का है।"
"हाँ।"
"तो फिर कोई क्यों खड़ा होगा?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जिन्होंने बहुत साल पहले किसी चीज़ को खोया हो और उसे फिर ढूँढ रहे हों।
"क्योंकि," उन्होंने कहा, "जो आदमी अंदर आया था, वो बाहर जाते वक़्त उसी दरवाज़े से गया। और उसे रोकने वाला कोई नहीं था। मतलब वो उस घर का जाना-पहचाना था।"
मेरी साँस रुक गई।
"मेरे घर का जाना-पहचाना?"
"मैं नहीं कहता कि वो तेरा जाना-पहचाना है," उस्ताद ने कहा। "मैं कहता हूँ कि वो घर का जाना-पहचाना है। फ़र्क़ है दोनों में।"
वो उठे। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, और उनका हाथ हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो सत्तर साल की उम्र में आता है।
"कल सभा में एक बात याद रखना," उन्होंने कहा। "जो सच बोले, उसका पक्ष लेना। जो चुप रहे, उसे नहीं छेड़ना। और जो झूठ बोले…" वो रुके। "…उसे बोलने देना। मत रोकना। क्योंकि झूठ जितना बोला जाता है, उतनी उसकी सिलाई खुलती जाती है।"
वो बाहर चले गए।
मैं दुकान में अकेला रह गया।
पापा ट्रंक के पास बैठे थे। उनका हाथ ट्रंक के ढक्कन पर था, और उनकी आँखें बंद थीं।
मैं उनके पास गया और उनके सामने बैठ गया।
"पापा।"
"हूँ।"
"आप किससे डरते हैं?"
उन्होंने आँखें नहीं खोलीं।
"मैं डरता नहीं।"
"झूठ।"
एक लंबी चुप्पी।
"पापा," मैंने कहा, "घंटी आज बहुत चुप है। और मुझे लगता है कि वो इसलिए चुप है कि उसे भी नहीं पता कि किससे डरना है।"
उन्होंने आँखें खोलीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और फिर वो कुछ बोलने ही वाले थे कि बाहर से टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद, जल्दी आओ!"
मैं दौड़ा।
गली के मुँह पर एक लड़का खड़ा था। पतला, उम्र पंद्रह-सोलह, हाथ में एक टूटी घड़ी। उसकी आँखें डरी हुई थीं।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"वो… वो काग़ज़ वाले…"
"कौन काग़ज़ वाले?"
"जो सुबह आए थे, टेम्पो वाले। वो अस्पताल की तरफ़ गए हैं। और साथ में चार आदमी हैं।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "पर उनमें से एक ने कहा कि आज रात बारह बजे से पहले सब साफ़ हो जाना चाहिए।"
मैंने घड़ी देखी। घड़ी रुकी हुई थी। पर मुझे वक़्त पता था।
शाम छह बज चुके थे।
और अस्पताल की मुख्य सीढ़ी आज रात बारह बजे बंद होनी थी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दुकान के दरवाज़े पर खड़े थे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
और उसी पल, जब मैंने उसे हवा में पकड़ा, वो बजी। एक बार। छोटी सी आवाज़। जैसे कोई सोते हुए आदमी ने करवट बदली हो।
और उसके बाद मैंने जो सुना, वो मुझे ठंडा कर गया।
"घर का दरवाज़ा," घंटी ने कहा। "अंदर से नहीं, बाहर से।"
मैंने उसे देखा।
"क्या मतलब?"
"जो अंदर आया," घंटी ने कहा, "वो दरवाज़े से नहीं आया। वो दरवाज़े के पीछे से आया।"
और फिर वो चुप हो गई।
मैं गली के बीचोंबीच खड़ा रह गया, हाथ में टूटी घड़ी वाला लड़का, सामने पापा, और उनके पीछे दुकान का वो अंधेरा, जिसमें पुराना बंद दरवाज़ा आज भी बंद था।
क्योंकि वो बंद नहीं था।
वो कभी बंद नहीं था।
हमें सिर्फ़ लगता था कि वो बंद है।
॥
उस रात मैं सोया नहीं।
सोना क्या था, जब घंटी ने कह दिया हो कि जो दरवाज़ा मैं बरसों से बंद समझ रहा था, वो कभी बंद ही नहीं था।
मैं घर के पिछले हिस्से में गया। चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा वहीं खड़ा था। तीन बार पेंट चढ़ा, कुंडा ज़ंग खाया हुआ, नीचे लकड़ी फूली हुई। मैंने घुटनों के बल बैठकर देखा।
धूल में पैर का निशान अब भी था। बाहर की तरफ़ मुड़ा हुआ।
मैंने उसे उँगली से छुआ। ठंडा था। और उसके किनारे पर एक पतली लकीर थी, जैसे कोई जल्दी में निकला हो और एड़ी घसीटकर गई हो।
मैं वहीं बैठ गया।
तुम सोच रहे होगे कि एक पैर के निशान से क्या होता है। तो सुनो — उस रात मुझे पता चला कि निशान सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं बनते। निशान आदमी के अंदर भी बनते हैं। और मेरे अंदर बहुत सारे निशान पहले से बने हुए थे, बस मैंने उन्हें देखना बंद कर रखा था।
पीछे कमरे से माँ की खाँसी आई।
मैं दबे पाँव गया। माँ करवट ले रही थीं। काजल उनके पलंग के पास फ़र्श पर बैठी थी, नर्सिंग की किताब खुली, आँखें बंद।
माँ ने आँख खोलकर मुझे देखा।
"तू अभी तक जगा है।"
"नींद नहीं आ रही।"
"झूठ।"
मैं हँस दिया। "माँ, आप डॉक्टर हो क्या?"
"डॉक्टर नहीं, माँ हूँ। माँ को सब पता होता है, बस बोलना नहीं होता।"
उन्होंने हाथ बढ़ाया। मैंने पकड़ लिया। उनकी हथेली पतली थी, और उँगलियाँ ठंडी।
"वो दरवाज़ा खोलना है?" उन्होंने धीरे से पूछा।
मैं चुप रहा।
"मैंने तुझे मना किया था," माँ ने कहा। "और मैं अब भी मना करती हूँ। पर एक बात कहती हूँ। जिस दिन तू उसे खोलेगा, उस दिन मुझे साथ रखना। मेरे पीछे मत खोलना।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसके पीछे जो है," माँ ने कहा, "वो तेरे पापा का नहीं, मेरा भी है।"
वो करवट फिर गईं। बात खत्म।
मैं बाहर आया। आँगन में पापा की चारपाई खाली थी। वो दुकान में ही सोए थे, ट्रंक के पास, हाथ ढक्कन पर रखे। जैसे कोई नींद में भी अपनी चीज़ पहरा दे रहा हो।
सुबह चार बजे मैंने दुकान का पीछे वाला बल्ब जलाया। गुनगुनाता पुराना बल्ब। मैंने घंटी जेब से निकाली और मेज़ पर रखी।
"तूने कहा था," मैंने कहा, "दरवाज़ा बाहर से आया। मतलब?"
घंटी चुप रही।
"अरे, अब तो बोल। बात अधूरी छोड़कर सो जाना तेरी आदत है क्या?"
कुछ देर बाद आवाज़ आई। बहुत धीमी।
"घर में जो था, वो बाहर गया। बाहर से कोई नहीं आया।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"मतलब… जो साया है, वो…"
"वो तुम्हारे घर का है," घंटी ने कहा। "और वो अब बाहर है।"
फिर चुप्पी।
मैं मेज़ पर झुक गया। सिर भारी हो रहा था। सुबह होने से पहले मुझे एक फ़ैसला लेना था।
शालिनी।
कल के आँगन में उसने कहा था कि वो बोलेगी। पर उसके पापा ने कह दिया था — चुप रह। और बाप के कहने पर बेटी चुप हो जाती है, ये मुझे पता था। ये मुझे बहुत अच्छे से पता था, क्योंकि मेरे घर में यही हो रहा था। पापा चुप, माँ चुप, मैं चुप — और हम सब एक ही छत के नीचे एक-दूसरे से छुपकर जी रहे थे।
फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि शालिनी के पास एक मौक़ा था। और वो मौक़ा अगर आज नहीं पकड़ा गया, तो सच हमेशा आधा रह जाएगा।
आधा सच।
आधी जीभ वाली घंटी।
आधा जुड़ा हुआ जोड़।
नहीं। ऐसे नहीं चलेगा।
मैंने सुबह छह बजे टिंकू को जगाया। वो दुकान के पीछे बोरी पर सोया था, हाथ में छोटा पेचकस पकड़े। मैंने उसे हिलाया।
"उस्ताद… पाँच मिनट…"
"उठ। आज काम है।"
"काम क्या, उस्ताद, रात भर…"
"आज सुबह दस बजे," मैंने कहा, "स्कूल के गेट पर छोटी सभा होगी।"
टिंकू एक झटके में उठ बैठा, आँखें मलते हुए।
"छोटी सभा? फिर से?"
"हाँ। बड़ी सभा में सब आ गए, पर बोला किसने? शालिनी ने एक लाइन कही और बत्ती गई। सच वहीं अटक गया। आज वो पूरा बोलेगी।"
"और अगर वो न बोले?"
मैंने उसके सिर पर हल्का हाथ रखा।
"तो हम सब यहीं रह जाएँगे। दुकान बंद, अस्पताल बंद, गली साहब की। और फिर तेरी माँ की दाल, रफ़ीक़ का स्कूल, शबनम आपा की गुमटी — सब काग़ज़ों में बिक जाएगा।"
टिंकू ने पेचकस जेब में डाला।
"मैं चलूँगा।"
"अभी नहीं। पहले मीरा को बुला। और शबनम आपा को भी।"
शबनम आपा सुबह सात बजे गुमटी का शटर उठा रही थीं। मैंने उन्हें सब बताया।
उन्होंने चिमटी नीचे रखी। एक लंबी साँस ली।
"तू कह रहा है कि हम एक लड़की के घर जाएँगे?"
"हाँ।"
"और उसका बाप हमें गाली देगा।"
"बहुत हद तक।"
"और अगर उसने दरवाज़ा न खोला?"
शबनम आपा ने रुमाल से हाथ पोंछा।
"तो मैं दरवाज़ा खटखटाऊँगी। और मैं इतनी ज़ोर से खटखटाती हूँ कि पूरी गली सुन ले।"
मीरा नौ बजे आई। कैमरा कंधे पर, बैग फटा हुआ, बाल बिखरे। दस मिनट में सब समझ गई।
"मैं दो पत्रकार बुला सकती हूँ," उसने कहा। "और अभिभावक? गेट पर बच्चों के माँ-बाप ज़रूरी हैं।"
"क्यों?"
"क्योंकि छत के नीचे उनके बच्चे बैठे हैं," मीरा ने कहा। "जब कोई माँ अपने बच्चे की छत की बात सुनेगी, तो वो चुप नहीं रहेगी। और मुझे सिर्फ़ माँओं पर भरोसा है। बाक़ी सब बिक जाता है।"
शालिनी का घर स्कूल के पीछे पीपल की दूसरी गली में था। नीला दरवाज़ा। दरवाज़े के ऊपर छोटी सी जाली, जिससे अंदर का आँगन दिखता था। बाहर सीमेंट का चबूतरा, और उस पर पुराने फूलों की गमलियाँ, जिनमें अब सूखी मिट्टी थी।
हम सुबह नौ बजकर पैंतालीस पर पहुँचे।
दरवाज़ा बंद था। पर सबसे पहली बात — बाहर नया ताला लगा था। चमकदार। इतना चमकदार कि सूरज में उस पर नज़र नहीं टिकती थी।
शबनम आपा ने सीधा जाकर तीन दस्तकें दीं।
अंदर से कोई नहीं आया।
तीन और।
फिर जाली के पीछे एक चेहरा आया। शालिनी। आँखें लाल। बाल बँधे हुए, पर उलझे हुए।
"आप लोग…" उसकी आवाज़ बैठी हुई थी।
"बेटा, दरवाज़ा खोल," शबनम आपा ने कहा। "मैंने तेरे लिए सुबह की चाय भी नहीं पी।"
शालिनी ने पीछे देखा। जैसे कोई पीछे खड़ा हो।
तभी अंदर से उसके पापा की आवाज़ आई। मैंने उन्हें पहली बार इतने करीब से सुना।
"जाने दो उन्हें। हमारा काम उनसे नहीं है।"
मैंने मीरा को रोका। और खुद दरवाज़े के सामने जाकर खड़ा हो गया। दरवाज़े से सटकर नहीं — दो कदम पीछे। जैसे कोई मेहमान खड़ा होता है, चोर की तरह नहीं।
"सर," मैंने कहा। "मैं शालिनी को भगाकर नहीं ले जाने आया।"
अंदर चुप्पी।
"मैं उसे भगाने आया होता," मैंने कहा, "तो पीछे वाली गली से आता। दीवार भी कम है, और मुझे कूदना भी आता है। पर मैं सामने के दरवाज़े पर खड़ा हूँ, क्योंकि मैं कुछ छिपाना नहीं चाहता।"
"हमें कुछ नहीं सुनना।"
"सुन लीजिए," मैंने कहा। "बस दो मिनट। मैं आपसे कुछ माँगने नहीं आया। मैं सिर्फ़ इतना कहने आया हूँ कि आपकी बेटी ने कल एक सच बोला था। उसके लिए किसी ने उसका बैग चुराया। उसे अंधेरे में धक्का दिया गया। उसका हाथ काँप रहा था। मैं वो देखकर आया हूँ।"
अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
"और आज मैं ये कहने आया हूँ," मैंने कहा, "कि वो सच बोलने का हक़ उसका है। आपका नहीं, मेरा नहीं। उसका। आप उसका दरवाज़ा बंद कर सकते हैं, सर। पर उसका मुँह नहीं बंद कर सकते। उसका मुँह बंद करने के लिए आपको अंदर से भी ताला लगाना पड़ेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। शबनम आपा ने होंठ कसे।
फिर ताला खुलने की आवाज़ आई।
नहीं, ताला बाहर था। आवाज़ कुंडे की थी।
दरवाज़ा अंदर से खुला।
शालिनी खड़ी थी। आँसू पोंछती हुई। उसकी आँखों में वो डर नहीं था जो कल था। एक और चीज़ थी। गुस्सा। अपने ही ऊपर।
"मैं अब डरना बंद कर रही हूँ," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर काँप नहीं रही थी।
"शालिनी!" अंदर से पापा की आवाज़ फटी। "अंदर आ जा।"
वो नहीं हिली।
"पापा," उसने कहा, "मैं जा रही हूँ।"
"तू जाएगी तो…"
"तो क्या?"
"तो लौटने की ज़रूरत नहीं।"
शबनम आपा ने एक कदम आगे रखा। मैंने उन्हें हाथ से रोका।
शालिनी ने पापा की तरफ़ देखा। फिर उसने धीरे से कहा, "ठीक है।"
और वो बाहर आ गई।
पापा दरवाज़े तक आए। उनका चेहरा लाल था। हाथ में काग़ज़ों का बंडल। उन्होंने वो बंडल ज़मीन पर नहीं रखा, सीने से चिपकाए रखा।
"तुम्हें पता है मेरी कंपनी में कितने आदमी काम करते हैं?" उन्होंने मुझसे कहा। "तीन मज़दूर। तीन। उनके घर चलते हैं मेरी कंपनी से। तीन घर। तीन बच्चे स्कूल जाते हैं। तीन औरतें रोटी बनाती हैं।"
वो रुके। उनकी साँस फूल रही थी।
"अगर मैं आज सच बोल दूँ, तो साहब मेरा काम बंद कर देगा। कल से तीन घरों में चूल्हा नहीं जलेगा। बताओ, ये सच तुम्हारे भाषण से चलेगा?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। एक पल चुप रहा।
तुम सोच रहे होगे कि मैंने वहीं कोई बड़ी लाइन मारी होगी। नहीं। सच यह है कि उस वक़्त मुझे लगा कि वो सही कह रहे हैं। और यही सबसे डरावनी बात थी।
फिर मैंने कहा, धीरे से।
"सर, आप ग़लत नहीं हैं। पर आप अधूरे हैं।"
"क्या?"
"तीन घर," मैंने कहा। "अगर आप आज चुप रहे, तो तीन घर तो चलेंगे। पर साथ में एक और चीज़ चलेगी — आपकी बेटी का डर। और वो डर उसके साथ बड़ा होगा, उसके बच्चों में जाएगा। और उनके बच्चे भी किसी दिन ऐसे ही दरवाज़े के पीछे से झाँकेंगे।"
उन्होंने मुँह फेर लिया।
"और सर," मैंने कहा, "तीन घर नहीं टूटेंगे। झूठ से तो पूरा मोहल्ला टूटेगा। अस्पताल की ज़मीन जाएगी, स्कूल की छत जाएगी, इस गली का हर शटर किसी एक आदमी के नाम हो जाएगा। उस दिन आपकी कंपनी में तीन मज़दूर नहीं, तीन सौ मज़दूर भूखे होंगे। और उस दिन आपकी बेटी आपसे यही पूछेगी — पापा, उस वक़्त आप कहाँ थे?"
उनका हाथ काग़ज़ों के बंडल पर कस गया।
शालिनी ने एक कदम आगे रखा।
"पापा," उसने कहा। "वो काग़ज़ आप मुझे दीजिए।"
"शालिनी…"
"मैं झूठ नहीं बोलूँगी। मैं सिर्फ़ सच बोलूँगी। जो मैंने देखा, जो मैंने सुना, जो मुझे करने को कहा गया। उसमें आपका नाम नहीं आएगा। पर अगर कोई पूछे कि रिपोर्ट किसने काटी, तो मैं उसका नाम नहीं बताऊँगी। क्योंकि मुझे नहीं पता। मैं सिर्फ़ यह बताऊँगी कि मुझ पर दबाव था।"
पापा ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर।
फिर उन्होंने बंडल अपने सीने से उतारा और उसे शालिनी की तरफ़ बढ़ा दिया।
"मैं सभा में नहीं बोलूँगा," उन्होंने कहा। "पर काग़ज़ मैं अपने पास नहीं रखूँगा।"
शालिनी ने बंडल पकड़ा। उसके हाथ काँप रहे थे। पर वो गिरा नहीं।
हम निकले। गली के मोड़ पर शबनम आपा ने कहा, "एक मिनट।" वो भागकर गुमटी गईं और लौटकर आईं — हाथ में पीतल की थाली, जिसमें दो समोसे और एक गिलास चाय।
"पहले ये पी ले," उन्होंने शालिनी से कहा। "सच बोलने से पहले पेट में कुछ होना चाहिए। भूखे आदमी की आवाज़ काँपती है, और जो आवाज़ काँपती है, उस पर लोग हँसते हैं।"
शालिनी ने चाय पी। एक घूँट। फिर दूसरा। फिर उसने गिलास वापस दिया और कहा, "अब चलिए।"
स्कूल का गेट पुराना लोहे का था। कब्ज़े टूटे हुए। खुलने पर वो बूढ़े आदमी की खाँसी जैसी आवाज़ करता था।
शाम चार बजे वहाँ भीड़ जमा थी।
माँएँ आई थीं — बच्चों की, बच्चों के बैग पकड़े हुए। दो पत्रकार आए थे, एक के हाथ में कैमरा, दूसरे के हाथ में छोटा माइक। मीरा का कैमरा तिपाई पर था, लाल बत्ती जल रही थी। टिंकू, सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू पहली बेंच पर बैठे थे, जो भोला भाई ने अपनी दुकान से उठाकर इसी काम के लिए लाई थी।
उस्ताद अली बक्श पीछे खड़े थे। हाथ में उनकी कैंची नहीं थी। बस उनका मोटा चश्मा था।
रामलाल चौकीदार गेट की कुंडी पकड़े खड़ा था, जैसे आज भी किसी को रोकना चाहता हो।
शालिनी गेट तक पहुँची।
एक माँ ने आवाज़ उठाई। "बेटा, हमें यही बताओ — छत टूटी है या नहीं?"
शालिनी ने उसकी तरफ़ देखा।
"छत नहीं टूटी," उसने कहा। "छत ठीक है। मेरी रिपोर्ट टूटी थी।"
वहाँ एक पल के लिए इतनी चुप्पी छा गई कि पीपल के पत्तों की आवाज़ सुनाई दी।
फिर सब बोलने लगे, एक साथ। और मीरा ने हाथ उठाकर सबको रोका।
"एक-एक करके," उसने कहा। "सब सुनेंगे।"
मैंने माइक उठाया। वो भारी था, पर सच कहूँ तो मुझे माइक से ज़्यादा अपने हाथ पर भरोसा था।
"शालिनी," मैंने कहा, "अब।"
उसने माइक पकड़ा। उसकी उँगलियाँ माइक के हैंडल पर सफ़ेद दिख रही थीं।
उसने एक लंबी साँस ली। और शुरू करने ही वाली थी कि—
"रुको।"
आवाज़ पीछे से आई।
भीड़ चीरकर एक आदमी आगे आया। सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। उँगली में काली अंगूठी। सलीम बक्श।
उसके हाथ खाली थे। उसने दोनों हाथ हवा में उठाए, जैसे किसी जमाने में कहा जाता था — मेरे पास कुछ नहीं है।
"मैं शालिनी बेटी को रोकने नहीं आया," उसने कहा। "मैं तो इसके उलटा आया हूँ।"
मैंने एक कदम आगे रखा। "सलीम साहब, आपका रजिस्टर, आपका सातवाँ नाम — सब बाद में। अभी बेटी बोल रही है।"
"बोलेगी," सलीम ने कहा। "पर उसके पहले सुन लो।"
उसने अपनी जेब में हाथ डाला। बहुत धीरे। जैसे कोई ज़हर निकाल रहा हो। और बाहर एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पुराना। कोना टूटा हुआ। ऊपर कोई मोहर नहीं।
"ये असली हस्ताक्षर वाला पन्ना नहीं है," उसने कहा। "ये उसका कोना है। असली पन्ना मेरे पास है।"
भीड़ में फुसफुसाहट दौड़ गई।
"कल रात चार आदमी अस्पताल गए थे," सलीम ने कहा। "उनमें से एक ने ये पन्ना मुझे देने के बदले अपनी जान की भीख माँगी। मैंने नहीं लिया। मैंने उसे खरीदा नहीं। वो मेरे पास खुद रखा गया है। रखने वाले ने कहा था — इसे तब ही निकालना, जब सही वक़्त हो।"
"तो वक़्त कब है?" मीरा ने पूछा।
सलीम ने मेरी तरफ़ देखा।
"अभी।"
फिर उसने धीरे से कहा — और उसकी आवाज़ में हल्की सी हँसी थी, जो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई।
"अंकुश भाई, मैं वो पन्ना तुम्हें दे दूँगा। मुफ़्त में। एक शर्त पर। तुम घंटी से लोहे का टुकड़ा निकालकर मेरे हाथ में रख दो।"
मैं वहीं जम गया।
मेरे पीछे उस्ताद की साँस रुक गई।
घंटी मेरी जेब में थी। उसका वज़न अचानक बढ़ गया, जैसे किसी ने उसमें एक पत्थर और डाल दिया हो।
और उसी पल, बिना मेरे छुए, बिना हवा में उठे, घंटी बजी।
एक बार।
और उसकी आवाज़ में जो आया, वो सिर्फ़ दो शब्द थे।
"अब खेल।"
॥
घंटी की आवाज़ हवा में लटक गई।
"अब खेल।"
बस दो शब्द। और मेरी जेब में घंटी फिर चुप हो गई, जैसे कहकर अपना मुँह सी लिया हो।
सलीम बक्श मेरी तरफ़ देख रहा था। उसके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो लोग तब लगाते हैं जब उन्हें लगता है कि चाल उनकी चल गई। उसकी काली अंगूठी वाली उँगली हल्की-हल्की हिल रही थी, जैसे कोई तार छेड़ रहा हो।
उसके पीछे सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर खड़ी थी। इंजन बंद। कोई उतरा नहीं।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी। जैसे अभी-अभी बर्फ़ से निकली हो।
और मैंने सलीम की तरफ़ देखकर कहा, "नहीं।"
भीड़ में एक आवाज़ निकली, जैसे किसी ने अचानक पानी का गिलास मेज़ पर रख दिया हो। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया। पीछे उस्ताद की साँस रुकी हुई थी, मुझे सुनाई दी।
सलीम की मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली।
"नहीं?" उसने कहा। "अंकुश भाई, ज़रा सोच लो। तुम्हारे पास एक पुराना लोहे का टुकड़ा है। मेरे पास एक काग़ज़ है जिस पर उस लड़की के हस्ताक्षर हैं। इतना बड़ा सौदा है। बराबर की चीज़ है। और मैं कह रहा हूँ — मुफ़्त।"
"आपने मेरी बात पूरी नहीं सुनी," मैंने कहा। "मैंने ये नहीं कहा कि मैं काग़ज़ नहीं लूँगा। मैंने कहा — नहीं। आपकी शर्त पर नहीं।"
"तो पन्ना कैसे मिलेगा?"
"जिस तरह सच मिलता है," मैंने कहा। "खुलकर। सबके सामने। किसी अलमारी की तिजोरी से नहीं।"
उसने हाथ जेब में डाल लिए, जैसे कोई मुनीम हिसाब बंद करता है।
"बड़ी बातें करते हो, बेटा।"
"माँ ने सिखाया है," मैंने कहा। "कि सच कभी किसी काग़ज़ के पन्ने का मोहताज नहीं होता। काग़ज़ उसे साबित कर सकता है, मिटा भी सकता है। काग़ज़ जल जाता है, फट जाता है, चूहा खा जाता है। पर सच आदमी के भीतर बैठा होता है। और जब वो बाहर आता है, उसे कोई मोहर नहीं चाहिए।"
सलीम ने गर्दन हल्की टेढ़ी की। "ये सब बहुत अच्छा है। पर मेरी शर्त पर तुम्हारा जवाब?"
"मेरा जवाब है — आप वो पन्ना अपने पास रखिए। हम उसे अपने तरीके से निकलवा लेंगे।"
"कैसे?"
"आप खुद बताइए," मैंने कहा। "क्योंकि आप यहाँ सिर्फ़ काग़ज़ दिखाने नहीं आए हो। आप कुछ और चाहते हो।"
उसका चेहरा एक पल के लिए बदला। बहुत थोड़ा। पर बदला। जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खटकी हो।
"मैं चाहता हूँ," उसने कहा, "कि तुम अपने उस्ताद से पूछो कि मैं कौन हूँ।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। उस्ताद अली बक्श वहीं खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था। उन्होंने सलीम की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने ज़मीन देखी।
और उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"ठीक है," मैंने कहा। "वो बाद में। पहले बेटी बोलेगी।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। वो अब भी माइक पकड़े खड़ी थी। उसकी उँगलियाँ माइक के हैंडल पर सफ़ेद दिख रही थीं, जैसे खून सब सिर में चढ़ गया हो। उसके गाल पर सुबह का सूजा हुआ हिस्सा अब भी गुलाबी था।
"शालिनी," मैंने कहा। "बोलो। और ये मत सोचना कि पीछे कौन खड़ा है। पीछे जो खड़ा है, वो भी इंसान है। और इंसान सबसे ज़्यादा तब डरता है जब कोई सच बोलने लगता है।"
उसने एक बार गहरी साँस ली।
फिर माइक अपने मुँह के पास लाया।
"मैं इंजीनियर हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर माइक उसे बढ़ा रहा था, और वो बढ़ती जा रही थी। "मेरा काम छत देखना है, मरम्मत बताना है। मैंने वो छत देखी है। तीन बार देखी है। और मैं साफ़ कह रही हूँ — वो छत गिरने वाली नहीं है।"
बेंच पर बैठी एक औरत ने हाथ उठाया। "बेटा, पर वो तस्वीर? तस्वीर में तो प्लास्टर गिरा हुआ था।"
"मैडम," शालिनी ने कहा, "वो कोना जान-बूझकर खुरचा गया था। किसी ने प्लास्टर उखाड़ा, उसे गीला किया, फिर सुखाया। ताकि फोटो में वो गिरता हुआ लगे। मैंने वो टुकड़ा अपने हाथ से छुआ है। अंदर से वो गीला था और किनारे पर सीधी मसाला लकीर थी। जो प्लास्टर अपने आप गिरता है, उसका किनारा टेढ़ा होता है। सीधा नहीं।"
वो "सीधी लकीर" शब्द हवा में गिरा और मुझे लगा जैसे किसी ने पूरे आँगन में एक तार खींच दिया हो।
"और रिपोर्ट?" दूसरी औरत ने पूछा। "रिपोर्ट पर आपके हस्ताक्षर थे ना?"
शालिनी ने माइक कसकर पकड़ा।
"रिपोर्ट पर मेरे हस्ताक्षर नहीं थे," उसने कहा। "मुझसे कहा गया था कि हस्ताक्षर करो। ज़ोर डाला गया। मेरे पापा को फोन आया, मेरे पापा की कंपनी के काम अटके हुए हैं, बीस लाख का हिसाब मरम्मत के नाम पर लिखा गया है और वो पैसा किसी और काम में गया है। मैंने हस्ताक्षर नहीं किए। मैंने पहली, सच्ची रिपोर्ट लिखी — उस पर लाल पेन से चार जगह काटकर लिखा गया, भाषा ठीक करें। मुझसे कहा गया कि जो पहले से लिखा है, उसे ठीक करना तुम्हारा काम है, सवाल करना नहीं।"
"तो हमारे बच्चों की छत?" एक आदमी ने आवाज़ उठाई। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, और गुस्सा अब सही जगह जा रहा था।
"आपके बच्चों की छत गिरने वाली नहीं है," शालिनी ने कहा। "छत बस मरम्मत माँग रही है। और मरम्मत माँगना कोई जुर्म नहीं होता। जुर्म ये है कि मरम्मत के नाम पर पैसा लिया गया और वो छत को छुआ भी नहीं।"
वो "बीस लाख" शब्द हवा में गिरा, तो लगा कि चारों तरफ़ कुछ टूटा। भले ही कोई शीशा नहीं टूटा, भले ही कोई दीवार नहीं गिरी, पर वहाँ जो चीज़ टूटी, वो भरोसा था। और भरोसा टूटने की आवाज़ सबसे तेज़ होती है।
तभी एक आदमी बेंच से उठा। छोटा, दुबला, हाथ में पीला बंडल, और कुर्ते की जेब से एक काग़ज़ का कोना बाहर।
"मेरा बेटा इसी स्कूल में है," उसने कहा। "सातवीं में। और जिस दिन ये खबर आई कि छत गिर रही है, उस दिन मेरी बीवी ने रात भर आँसू पोंछे। मेरा बेटा सुबह स्कूल नहीं गया, वो दरवाज़े के पीछे बैठा रहा। और ये सब — ये सब इस लड़की ने किया?"
वो उँगली शालिनी की तरफ़ उठी, और हवा में ऐसे लटकी जैसे कोई चाकू हो।
"रुको," मैंने कहा। "पहले पूरा सुनो।"
पर भीड़ सुनना नहीं चाहती थी। भीड़ को एक नाम चाहिए था। और उसे उस वक़्त कोई नाम दिख रहा था — शालिनी। पतली, काँपती, माइक पकड़े एक लड़की। सबसे आसान शिकार।
और फिर आवाज़ आई। भीड़ से तेज़ आवाज़।
"चुप हो जाओ।"
मैंने पीछे देखा।
शालिनी के पापा।
वो बेंच के किनारे खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता। पर कुर्ता साफ़ था, फटा नहीं था। उनके हाथ खाली थे, बस एक उँगली पर घड़ी की पट्टी की लकीर बनी हुई थी। उनका चेहरा लाल था — पर गुस्से से नहीं। शर्म से। शर्म कभी-कभी लाल गुस्से जैसी ही दिखती है, और लोग दोनों में फ़र्क़ नहीं कर पाते।
"बोलिए," उस दुबले आदमी ने कहा। "आप ही बताइए। आपकी बेटी हमारे बच्चों को डराने में शामिल है या नहीं?"
शालिनी के पापा ने एक बार बेटी की तरफ़ देखा।
शालिनी ने उनकी तरफ़ नहीं देखा। वो माइक को अपने सीने से लगाए खड़ी थी, जैसे कोई ढाल पकड़ी हो।
और पापा ने कहा, "उसने नहीं डराया। मैंने डराया।"
सन्नाटा।
इतना सन्नाटा कि पीपल के पत्तों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और दूर कहीं नाली में पानी टपक रहा था, डिट-डिट-डिट, और वो आवाज़ भी साफ़ थी।
"ये काग़ज़," उन्होंने कहा, और शालिनी के हाथ से बंडल लेकर ऊपर उठा दिया, हालाँकि उनका हाथ काँप रहा था, "ये देखिए। इनमें मेरे मज़दूरों के नाम हैं। बाईस नाम। तीन महीने की मज़दूरी बाकी है। तीन महीने, भाई साहब।"
उन्होंने आँखें झपकीं।
"मेरे पास दो रास्ते थे। एक — सच बोलूँ और मेरे बाईस आदमियों के घर के चूल्हे बंद हो जाएँ। दूसरा — मुँह बंद रखूँ और काम चलता रहे। मैंने दूसरा रास्ता चुना।"
भीड़ में कोई बोला, "तो पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि पहले मैं खुद से ही डरता था," उन्होंने कहा। "डर को कभी नहीं बताते कि वो डर है। इसे समझदारी कहते हैं, मज़बूरी कहते हैं, हालात कहते हैं।"
उन्होंने बंडल को अपने सीने से लगाया।
"उस दिन मैंने अपनी बेटी को फोन किया था। मैंने कहा — बेटा, तू चुप रह। तेरे पापा का काम अटका है। और मैंने ये भी कहा — जो हुआ, वो हो गया, अब सिर्फ़ चुप रहने से सब ठीक होगा।"
उनकी आवाज़ टूटी। उन्होंने कुर्ते के कोने से मुँह पोंछा।
"मैंने अपनी बेटी को अपने डर में शामिल कर लिया। बस यही मेरा जुर्म है। और मैं उसे यहीं, सबके सामने, कबूल कर रहा हूँ।"
शालिनी ने माइक नीचे कर दिया। वो इतना धीरे कर दिया कि माइक फ़र्श से टकराकर खड़खड़ाया।
वो अपने पापा की तरफ़ बढ़ी। दो कदम। फिर रुक गई, जैसे पूछ रही हो — क्या मैं आ सकती हूँ?
पापा ने हाथ बढ़ाया।
वो सीने से चिपक गई। पूरे आँगन के सामने। और बच्चों के सामने। और उन माँओं के सामने जो अभी उस पर चिल्ला रही थीं। उसने अपना मुँह उनके कुर्ते में छिपा लिया और रोई।
और मैं वहीं खड़ा सब देख रहा था, और मेरी जेब में कुछ हल्का हो रहा था। जैसे कोई गाँठ खुल रही हो। धीरे-धीरे। रेशा-रेशा।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी के भीतर, उसकी खाँच में, वो लोहे का टुकड़ा फँसा हुआ था — वही जो रणवीर के डिब्बे से मिला था। जिस पर उस्ताद ने कहा था कि ये दो घंटियों के जोड़ का पुराना कड़ा है। जिसके छेद में तेल की परत बैठी हुई थी, और जिस पर सुई जैसा घिसा निशान था।
और अब अचानक वो टुकड़ा हिला।
मैंने घंटी धीरे से बाहर निकाली। हथेली पर रखी। और जैसे ही शालिनी के पापा ने वो आख़िरी बात कही — मैंने उसे सच में जुड़ते हुए महसूस किया।
टुकड़ा चटककर बाहर आ गिरा।
मेरी हथेली पर। छोटा, गहरा, चिकना। एक कोना अब भी टूटा हुआ।
और घंटी बजी।
पहली बार। साफ़। बिल्कुल साफ़। जैसे सालों से उसका गला बैठा हुआ था और आज उसे पानी मिल गया। जैसे किसी ने उसके भीतर की ज़ंग को उतार दिया हो।
पूरे आँगन में वो आवाज़ गई। रामलाल चौकीदार ने गेट की कुंडी छोड़ दी। मीरा का कैमरा एक पल के लिए हिला। उस्ताद ने चश्मा उतार लिया, जैसे उन्हें अपने कानों पर भरोसा नहीं हो रहा।
और घंटी ने कहा —
"पहला जोड़ पूरा।"
मैंने उसे हथेली में दबाया। "कितने अंक?" मैंने धीरे से पूछा।
"पूछना नहीं," घंटी ने कहा। "देखना।"
और मैंने देखा।
शालिनी अपने पापा के सीने से चिपकी खड़ी थी। उसके पापा उसके सिर पर हाथ रखे थे, और वो हाथ काँप रहा था। पर इस बार काँपने की वजह डर नहीं थी।
शालिनी रो रही थी।
और उस रोने में वो बात थी जो मैंने बहुत कम सुनी थी — जो रोना टूटने के बाद आता है, और आदमी को हल्का कर देता है।
टिंकू मेरे पास आया।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाया। "ये रो रही है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो फिर आप क्यों हँस रहे हो?"
"क्योंकि ये रोना अच्छे वाला रोना है, टिंकू।"
"अच्छा रोना भी होता है?"
"होता है," मैंने कहा। "वो रोना जो टूटे हुए दो आदमियों के बीच से निकलता है, और उनके बीच जो दरार थी, वो भर जाती है। बाकी रोना सिर्फ़ आँख धोता है। ये दिल धोता है।"
टिंकू ने एक पल सोचा। फिर उसने अपनी कमीज़ की बाँह से नाक पोंछी। और मैंने देखा कि उसकी आँखें भी भरी हुई थीं।
उस आँगन में एक औरत फूट-फूटकर रोने लगी। कोई उसे चुप कराने नहीं गया। कभी-कभी रोने देना ही सबसे बड़ी दवा होती है।
शबनम आपा ने वहीं से आवाज़ लगाई, "सबको चाय। मेरी तरफ़ से। आज कोई पैसा नहीं लूँगी। और जो कोई पैसा देगा, उसके हाथ पर चिमटी।"
आँगन में पहली बार हँसी आई। हल्की सी। थोड़ी झिझकी हुई। ऐसी हँसी जो किसी लंबे रोने के बाद आती है और जिसमें आँसू और हँसी एक ही साँस में मिल जाते हैं।
बच्चे बेंच से उठ गए। चिंटू ने सानिया का हाथ खींचा। गुड्डू ने रफ़ीक़ को धक्का दिया और दोनों शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ भागे, जैसे दुनिया की सबसे बड़ी खबर यही हो कि आज चाय मुफ़्त है।
और मैं वहीं खड़ा सोच रहा था कि इस पूरे साल में ये पहला पल है जब कुछ जुड़ा है। सच में जुड़ा है। दिखावे से नहीं, नारे से नहीं। दो लोगों ने एक-दूसरे के सामने सच रखा, और वो सच बर्दाश्त करने लायक था, इसलिए जुड़ गया।
मेरे हाथ में लोहे का टुकड़ा था, और वो हल्का लग रहा था। बहुत हल्का।
पर हल्कापन ज़्यादा देर नहीं टिका। क्योंकि तभी मुझे गली की तरफ़ से गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी। पहले एक स्कूटर की खड़खड़, फिर उसके पीछे जीप की वो धीमी चीख जो सभा से पहले आती है।
मैंने माइक मीरा को लौटाया और गेट की तरफ़ बढ़ा।
गली के मुँह पर खाकी रंग की छोटी जीप खड़ी थी। और उसके आगे एक स्कूटर।
स्कूटर पर बबलू पांडे बैठा था। सोने की मोटी चेन गले में, पान दबाया हुआ, और चलाते हुए हमारी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहा था। उसने स्कूटर रोका, पैर ज़मीन पर टिकाया, और पान थूका। जूते से रगड़ा।
फिर उतरा। और मेरी तरफ़ आया। धीरे-धीरे। जैसे टाइम ले रहा हो।
"अंकुश भाई," उसने कहा। "आपने अपनी बात पूरी कर ली? मैंने सुना आपने बड़ी सभा की थी।"
"बबलू साहब," मैंने कहा। "आपने जल्दी कर दी। चाय बाकी थी।"
"जल्दी नहीं होती तो सच सूख जाता है," उसने कहा। "और भाई, एक बात बताऊँ? तुम्हारी दुकान के पीछे से एक बैग मिला है। एक थैला। किसी लड़की का। तुमने रखा, मत रखना — मुझे क्या? मैंने सोचा, पुलिस को खबर कर दूँ। अच्छा है, कानून भी तो कुछ पता करे।"
स्कूल के गेट पर खड़े लोगों ने पीछे मुड़कर देखा।
पुलिस।
वो शब्द हर सभा को तोड़ देता है। मैंने ये अपनी गली में बहुत बार देखा है। बात चल रही होती है, लोग खुल रहे होते हैं, फिर कोई पीछे से चुपचाप "पुलिस" कह देता है, और सबकी ज़ुबान बंद। सब याद करने लगते हैं कि उन्हें कौन सी बात नहीं कहनी थी।
जीप से दो सिपाही उतरे। एक सुबह वाला छोटा, और उसके पीछे लंबा वाला, जो बस चुपचाप हाथ पीछे बाँधे खड़ा था।
और उनके पीछे — दुबे अंकल।
नीली शर्ट में। अपनी कुर्सी नहीं, बस दुबे अंकल। चलते हुए वो थोड़ा झुके हुए थे। उनकी जेब से पीला काग़ज़ का कोना दिख रहा था। वही लिफ़ाफ़ा जो उन्होंने सभा में खोलने को कहा था।
बबलू ने एक और पान मुँह में डाला। फिर मेरे कान के पास झुककर कहा, इतना धीरे कि बस मैं सुनूँ —
"जो सीधा चलता है, वो रास्ते में दुकानें छोड़ जाता है। तुम्हारी दुकान भी अब रास्ते में पड़ गई, भाई।"
मैं मुस्कुराया। "बबलू साहब, आपने मुझे ये बात पहले क्यों नहीं बताई? मैं तो पहले से सीधा ही चल रहा था।"
वो हँसा। एक बार। छोटी हँसी। फिर उसने ठुड्डी उठाकर गेट की तरफ़ देखा, जहाँ शालिनी अपने पापा के साथ खड़ी थी।
"बेटा," उसने आवाज़ बढ़ाकर कहा, "नाम है या नकाब? जो आज सच बोल रहा, उसका नाम भी साथ चलेगा।"
शालिनी ने उसकी तरफ़ देखा। और मैंने देखा कि वो पहली बार नहीं डरी। उसने सीधे उसकी आँखों में देखा, और उसके पापा ने उसकी पीठ पर हाथ रखा।
और उसी पल —
घंटी। जो अभी साफ़ बजी थी। जो अभी "पहला जोड़ पूरा" कहकर चुप हुई थी। उसकी आवाज़ बदल गई।
साफ़ नहीं। भारी। बहुत भारी। किसी बूढ़ी आवाज़ जैसी। ऐसी आवाज़ जो बहुत दूर से आ रही हो, और जो दूर से आकर भी कान के सबसे पास लगे।
उसने फुसफुसाया —
"अब सुनो पचास साल पुरानी बात।"
मेरी रीढ़ सीधी हो गई। मेरे हाथ में लोहे का टुकड़ा था और वो अचानक गरम लगने लगा।
बबलू ने पान चबाया। उसके दाँतों में कीचड़ भरा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"अब पुलिस वालों को भी कुछ काम मिलेगा," उसने कहा।
और मेरी जेब में घंटी चुप नहीं हुई।
वो गुनगुनाने लगी।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई बूढ़ा आदमी किस्सा शुरू करने से पहले गला साफ़ कर रहा हो।
दुबे अंकल ने जीप से उतरकर मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो बात थी जो आदमी के पास सालों पड़ी रहती है और एक दिन भारी हो जाती है।
और मैंने उनकी तरफ़ देखकर सोचा — जो कहानी आज खुलेगी, वो किसी काग़ज़ से नहीं निकलेगी। वो उस घंटी से निकलेगी जो मेरी जेब में बैठी है और जो मुझसे पहले मेरे किसी बुज़ुर्ग की जेब में बैठी थी।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरी जेब की तरफ़ देख रहा था, आँखें बड़ी करके।
"उस्ताद," उसने कहा, "घंटी कुछ बोल रही है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और आज वो पूरी बात बोलेगी।"
बबलू ने दूसरा पान मुँह में डाला।
और घंटी की गुनगुनाहट बढ़ने लगी, जैसे पचास साल की चुप्पी जगह ढूँढ रही हो।
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