The Mysterious Bell – Chapter 999
रेहाना आपा ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो गिर नहीं रहा था। जैसे उन्होंने उसे रोक लिया हो।
"आपने हस्ताक्षर किए," उन्होंने कहा, "और सुबह आपने मुझे कुछ नहीं बताया।"
"नहीं बताया।"
"मैंने आपको सुबह सब बताया था। मैंने कहा था कि रजिस्टर में नाम बदला हुआ है। और आपने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने अपनी नौकरी बचाने के लिए कहानी बनाई हो।"
डॉक्टर साहब ने कुछ देर उन्हें देखा। फिर उन्होंने दराज़ खोली। उसमें से एक पुराना, चारों तरफ़ से फटा हुआ, पीला लिफ़ाफ़ा निकाला। उसे मेज़ पर रखा, पर खोला नहीं।
"मैं तुम्हें निकालना नहीं चाहता था, रेहाना," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी।
"उस रात के बाद, तुम्हारे घर के बाहर दो आदमी खड़े थे। लकड़ी के जूते। वही जूते। मैंने उन्हें रात भर वहाँ देखा। सुबह भी वही खड़े थे।"
रेहाना आपा की साँस रुकी।
"मैंने सोचा," डॉक्टर साहब ने कहा, "कि अगर तुम काग़ज़ों में बाहर हो, तो वो तुम्हारा पीछा छोड़ देंगे। क्योंकि जिसका नाम कट चुका होता है, उससे कोई नहीं डरता। इसलिए काग़ज़ में मैंने तुम्हें निकाला हुआ दिखा दिया। और सच तुम्हें कभी नहीं बताया।"
"क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि अगर तुम जानतीं," उन्होंने कहा, "तो तुम बोलतीं। और तुम बोलतीं तो मैं भी बोलता। और अगर हम दोनों बोलते, तो उस साल ये अस्पताल बचता या नहीं, मुझे आज तक नहीं पता।"
रेहाना आपा ने अपने आँसू पोंछे। रूमाल नहीं था। उन्होंने कलाई से पोंछे, जैसे किसी बच्चे की नाक पोंछते हैं। फिर वो सीधी बैठीं।
और उन्होंने वो नहीं कहा जो मैं सोच रहा था कि कहेंगी। उन्होंने माफ़ी नहीं माँगी।
"डॉक्टर साहब," उन्होंने कहा, "आपने मुझे बचाया। पर आपने मुझे मुझसे भी छुपाया।"
"हाँ।"
"और मैं भी आपसे कुछ छुपा रही हूँ।"
डॉक्टर साहब ने सिर उठाया।
"मैंने उस रात रजिस्टर की एक कॉपी बनाई थी," रेहाना आपा ने कहा। "सुबह आने से पहले रात को। कार्बन पेपर से।"
मेरी जेब में घंटी हिली। हल्की सी। जैसे किसी ने बर्फ़ के टुकड़े को उँगली से छुआ हो।
"आपने कॉपी किसको दी?" मैंने पूछा।
वो चुप हो गईं।
कमरे का पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था। उसकी हर परिक्रमा पर एक टिक आती थी। मैंने उनकी गिनती करना चाहा और फिर छोड़ दिया।
"मैं नहीं बता सकती," उन्होंने कहा। "अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर मैंने उसका नाम लिया," उन्होंने कहा, "और वो आज ज़िंदा नहीं है, तो उसका घर बचाने का कोई तरीक़ा नहीं बचेगा। और अगर वो ज़िंदा है…" उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "…तो उसका बेटा मुझे सड़क पर देखेगा तो आँख चुरा लेगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मैं उस आदमी की जगह खुद को रख रहा था। अगर मेरे बाप ने किसी के हाथ में ऐसा काग़ज़ दिया होता और फिर उस काग़ज़ के बदले उन्हें कुछ न मिला होता, तो मैं भी आँख चुराता।
"आपा," मैंने धीरे कहा, "आप उसे बचा रही हैं या उसे डरा रही हैं?"
उस सवाल पर उन्होंने मेरी तरफ़ एक लंबी नज़र से देखा। फिर वो मुस्कुराईं। और उस मुस्कुराहट में बहुत कम खुशी थी।
"तुम सीधे मुँह पर बात करते हो, बेटा," उन्होंने कहा।
"साइकिल ठीक करता हूँ," मैंने कहा। "पहले यही देखता हूँ कि टूटा कहाँ है। बात करने में भी वही तरीक़ा लगाता हूँ।"
डॉक्टर साहब ने धीरे से सिर हिलाया। उन्होंने चश्मा वापस पहना और उसकी टेप वाली डंडी कान पर ठीक की, जो हमेशा ठीक नहीं बैठती थी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तुम क्या जानना चाहते हो?"
"मैं जानना चाहता हूँ," मैंने कहा, "कि जब आपने उस रात हस्ताक्षर किए, तो उस काग़ज़ पर किसका नाम लिखा था?"
कमरा फिर चुप हुआ।
डॉक्टर साहब ने अपना आधा भरा गिलास उठाया, देखा कि उसमें धूल है, और वापस रख दिया।
"मेरा," उन्होंने कहा।
मैं झुक गया। मतलब मैं सुनने के लिए झुक गया, जैसे दूर से आवाज़ आ रही हो।
"आपका?"
"उस काग़ज़ पर लिखा था कि यह ज़मीन अस्पताल की है," उन्होंने कहा, "और नीचे लिखा था कि अस्पताल का मालिक — यानी मैं — इस ज़मीन को सरकारी खाली ज़मीन मानता है और उस पर कोई दावा नहीं करता। और मुझे गवाह के तौर पर हस्ताक्षर करने थे।"
"तो असली काग़ज़ कहाँ है?" रेहाना आपा ने कहा। "जिस पर शिवनारायण का नाम था? जिस पर गली के लोगों के अंगूठे थे?"
डॉक्टर साहब ने मेज़ पर रखे उस पुराने लिफ़ाफ़े की तरफ़ देखा। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वो काग़ज़," उन्होंने कहा, "कभी किसी दफ़्तर में नहीं रहा।"
"मतलब?"
"मतलब यह कि शिवनारायण यादव उस ज़माने का आदमी नहीं था जो अपना काग़ज़ अलमारी में रखे," डॉक्टर साहब ने कहा। "वो उस ज़माने का आदमी था जो अपना हिसाब सिर्फ़ भरोसे पर रखता था। उसे उस वक़्त सबसे ज़्यादा भरोसा साइकिल गली के एक परिवार पर था।"
मेरी जेब में घंटी अब फिर से हिली। और इस बार वो ठंडी नहीं थी।
मैंने उसे हाथ में निकाला। पीतल पर उँगलियों की गरमी वापस आ रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कोई सर्दी से लौट रहा हो।
"आपा," रेहाना आपा ने कहा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश।"
"हाँ।"
"तुम्हारे घर में पीछे की तरफ़ एक पुरानी लोहे की संदूक है ना? पीतल की पट्टियों वाली?"
मेरी साँस रुक गई।
वो संदूक मैंने देखा था। औज़ार वाले ट्रंक के पीछे, बोरी के नीचे, बरसों से पड़ा। पीतल की पट्टियाँ, बीच में उभरा हुआ फूल, और नीचे बाएँ कोने पर मोटे अक्षरों में खुदा हुआ — शिवनारायण।
छोटी चाबी उसमें नहीं लगती थी। मंसूर चाचा का ताला नहीं खुला था। ताले के छेद में मोम जैसी कोई चीज़ भरी थी।
मैंने कभी उसे खोला नहीं। मैंने हमेशा सोचा कि वो पुराना संदूक है, बस पुराना संदूक है, उसमें कोई औज़ार होंगे, कोई पुराने कपड़े होंगे। मैंने हमेशा उसे कल के लिए छोड़ दिया। और कल आज तक नहीं आया।
रेहाना आपा उठ खड़ी हुईं। उनका बैग उन्होंने उठाया, फिर उसे फिर से कुर्सी पर रख दिया, जैसे अभी वो जाने वाली नहीं हैं।
"वो परिवार तुम्हारा है, अंकुश," उन्होंने कहा।
कमरे में सन्नाटा था। असली सन्नाटा, वो जिसमें आपको अपनी साँस भी अजनबी लगती है।
"असली काग़ज़ तुम्हारे घर की उस पुरानी संदूक में छिपा है," उन्होंने कहा, "जिसे तुमने अब तक खोला नहीं।"
मैं बैठा रहा।
डॉक्टर साहब ने कुछ नहीं कहा। वो बस देखते रहे। और उनकी आँखों में कुछ था जो पचास साल से रुका हुआ था, और अब भी पूरा बाहर नहीं आ रहा था।
मैंने घंटी को हथेली में रखा। वो अब गरम थी। बिल्कुल गरम, जैसे किसी ने उसे धूप में रख दिया हो।
"घंटी," मैंने मन में कहा, "कुछ बोल।"
और घंटी ने, सिर्फ़ मेरे कान के लिए, एक शब्द कहा।
"संदूक।"
मैं खड़ा हो गया।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपने उस रात हस्ताक्षर क्यों किए? डर से? या किसी और वजह से?"
उन्होंने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपनी मेज़ की दराज़ से एक पुरानी तस्वीर निकाली — वो वाली तस्वीर जो दीवार पर थी, बिना तारीख़ वाली, औरत की हँसती आँखों वाली।
"ये इसी अस्पताल में नर्स थी," उन्होंने कहा। "कहती थी कि दीवारें पीली रखना, क्योंकि पीले रंग में मरीज़ जल्दी घबराते नहीं।"
"और?"
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