The Mysterious Bell998 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 998

7 min read November 5, 2026

उनका चेहरा — जो तीस साल से मरीज़ों की आँखों में सबसे स्थिर चीज़ था, जो बूढ़ी औरत को भी लगता था कि डॉक्टर साहब हैं तो कुछ नहीं होगा — उस चेहरे की एक माँसपेशी काँप रही थी।

और उनके होंठों से एक ही शब्द निकला।

"क्या?"

अफ़सर ने नक्शे पर उँगली रखी और बिना घुमाए, बिना नरम किए, दोबारा कहा।

"यहाँ सरकारी खाली ज़मीन लिखी है। अस्पताल का नाम नहीं है।"

डॉक्टर साहब ने एक कदम आगे रखा। फिर रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — एक लंबी नज़र, जिसमें सवाल भी था और शिकायत भी और कुछ ऐसा भी जो शब्द नहीं बनता।

मेरी जेब में घंटी थी।

और वो अचानक बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई।

॥

घंटी जेब में बर्फ़ जैसी ठंडी थी। मैंने हाथ अंदर डाला तो लगा किसी ने बर्फ़ का टुकड़ा जेब में रख दिया हो। उँगलियाँ ठिठक गईं।

अफ़सर की उँगली अब भी उस पुराने नक्शे पर थी। वही जगह। वही पीला पड़ा काग़ज़। स्याही हल्की, किनारों पर धब्बे, और बीच में एक लकीर जो अस्पताल की पीली दीवार से शुरू होकर कहीं बाहर जाकर रुक जाती है।

"साहब," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपने ही कानों में अजनबी लग रही थी। "इस नक्शे की एक नकल मिल सकती है?"

उसने पेन नीचे रखा।

"दो दिन बाद। जाँच के बाद।"

"दो दिन में बहुत कुछ हो जाता है, साहब।"

"मैं कुछ नहीं कह सकता," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ नापता हूँ। फ़ैसला मेरा काम नहीं है।"

फिर वो मेरी तरफ़ नहीं देखा। रजिस्टर खोला, उसमें लिखने लगा, जैसे मैं वहाँ था ही नहीं। और शायद उसके काग़ज़ों में मैं था भी नहीं। उसके काग़ज़ों में सिर्फ़ ज़मीन थी। लकीरें थीं। नाप था।

मैं पीछे मुड़ा।

डॉक्टर इसरानी अब भी आँगन के दरवाज़े पर खड़े थे। पुराना स्टेथोस्कोप उनके हाथ में था, रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ, टेप का रंग पीला पड़ चुका था। उनकी उँगलियाँ उस नली को ऐसे दबा रही थीं जैसे किसी का हाथ पकड़ रही हों और छूटने का डर हो।

"डॉक्टर साहब," मैंने धीरे कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उस एक नज़र में सब कुछ था। सवाल भी। शिकायत भी। और कुछ ऐसा भी जो शब्द नहीं बन पाता।

वो कुछ नहीं बोले। बस अंदर मुड़ गए।

मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा। पीछे मेज़ पर पीला फ़ीता पड़ा था, धूल में एक सीधी लकीर छोड़ गया था। हैंडपंप अब भी टपक रहा था — टप, टप — जैसे कोई बच्चा गिनती कर रहा हो।

टिंकू मेरे पास आया।

"उस्ताद," उसने कहा, "वो डॉक्टर साहब का हाथ काँप रहा था।"

"देखा।"

"डॉक्टर साहब का हाथ नहीं काँपता। वो मेरी अम्मी के टाँके भी आराम से लगाते हैं।"

"पता है।"

"तो फिर?"

मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। बाल गरम थे, धूप में तपे हुए।

"इसका मतलब है कि काग़ज़ ने उनके हाथ को भी नहीं छोड़ा," मैंने कहा।

दोपहर ढल रही थी। सर्वे वाली मेज़ पर अफ़सर अपनी फ़ाइल समेट रहा था। उसका साथी फ़ीता लपेट रहा था और फ़ीते पर लगी धूल झाड़ रहा था, जैसे धूल ही उसका असली काम हो।

मैंने देखा रेहाना आपा अस्पताल की सीढ़ियों के पास खड़ी थीं। उनका फटा कपड़े का बैग दोनों हाथों से सीने से चिपका हुआ था। उनकी आँखें आँगन की तरफ़ थीं, पर वो देख नहीं रही थीं। वो कुछ सोच रही थीं। और सोचते वक़्त उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे अंदर ही अंदर कोई बात दोहरा रही हों।

"आपा," मैंने कहा। "थोड़ी देर ऊपर चलिए।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"क्यों?"

"क्योंकि डॉक्टर साहब ने अंदर जाकर दरवाज़ा खुला छोड़ दिया है," मैंने कहा। "और डॉक्टर साहब दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ते।"

वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर धीरे से सीढ़ी चढ़ने लगीं।

मैं उनके पीछे चढ़ा। सीढ़ियाँ पुरानी थीं, पत्थर की, और हर सीढ़ी पर एक अलग आवाज़ आती थी — कोई चरमराती, कोई चटकती, कोई चुप रह जाती। मुझे लगा मैं सीढ़ियाँ नहीं, कोई पुराना हिसाब चढ़ रहा हूँ।

डॉक्टर साहब का कमरा वही था। काग़ज़ों के ढेर, आधा भरा पानी का गिलास जिस पर धूल की पतली परत जमी थी, टूटे चश्मे कोने में रखे, और दीवार पर वो तस्वीर — बिना तारीख़ वाली — जिसमें एक औरत की आँखें हँस रही थीं।

पर आज उस कमरे में एक चीज़ नई दिखी।

दरवाज़े के पीछे, दीवार पर, कम ऊँचाई पर एक छोटी सी काली-सफ़ेद तस्वीर टँगी थी। चौकोर, पुराने फ्रेम में, काँच पर धूल। उसमें दो जवान लड़के खड़े थे। एक ने बहुत बड़ा सफ़ेद कोट पहना था, जो उसके कंधों से बड़ा लग रहा था, जैसे उधार का हो। दूसरा दुबला, छोटे कद का, हाथ में कोई औज़ार, और आँखों में वो हँसी जो शक्ल से ज़्यादा देर तक याद रहती है।

उस दूसरे लड़के के पीछे एक लकड़ी की मेज़ थी। मेज़ पर एक रजिस्टर रखा था और रजिस्टर के बगल में… पीतल की एक घंटी।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। बर्फ़ अब भी वहीं थी।

"डॉक्टर साहब," मैंने धीरे कहा और तस्वीर की तरफ़ सिर हिलाया, "ये आप हैं?"

वो कुर्सी पर बैठे थे। सामने मेज़ पर उनके हाथ थे, दोनों। अब वो नहीं काँप रहे थे। वो बस बहुत भारी लग रहे थे, जैसे किसी ने उन पर कोई बोझ रख दिया हो और अब वो उठाना भूल गए हों।

"हाँ," उन्होंने कहा।

"और ये?"

"शिवनारायण यादव," उन्होंने कहा। "तुम्हारे परदादा।"

कमरे में एक पल के लिए हवा भी रुक गई।

रेहाना आपा दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उनका बैग उनके हाथ से फिसला और कुर्सी के पाये से टकराया। उन्होंने उसे उठाने की कोशिश नहीं की।

"आप जानते थे?" उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो पंद्रह साल से दबी हुई थी। "आप जानते थे कि वो इसी गली का है?"

डॉक्टर साहब ने उनकी तरफ़ देखा।

"मैं जानता था," उन्होंने कहा। "पर मैंने कभी नहीं कहा।"

"क्यों?"

"क्योंकि जिस रात ये सब हुआ," डॉक्टर साहब ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब कोई डॉक्टर नहीं था, सिर्फ़ एक थका हुआ आदमी था, "उस रात मुझे अपने ही दफ़्तर में बुलाया गया था। रात के ग्यारह बजे के बाद। और मैं गया था।"

मैंने कुर्सी खींची और बैठ गया। रेहाना आपा भी बैठीं, बिना पूछे, जैसे उनके पैरों ने खुद फ़ैसला कर लिया हो।

"दफ़्तार का दरवाज़ा खुला था," डॉक्टर साहब ने कहा। "अंदर एक ही बत्ती जल रही थी। मेज़ पर रजिस्टर खुला था। और उस रजिस्टर में पन्ना बदला हुआ था।"

"आपने कैसे पहचाना कि बदला हुआ है?" मैंने पूछा।

"क्योंकि मैं उस रजिस्टर को अपने हाथ से लिखता था," उन्होंने कहा। "हर मरीज़ का नाम, हर तारीख़, हर दवा। उस पन्ने पर लिखाई मेरी नहीं थी। और ज़मीन वाला हिस्सा, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था, अचानक वहाँ था। साफ़ नीली स्याही में। जैसे कोई जल्दी में हो और फिर भी साफ़ लिख रहा हो।"

"और उस रात वहाँ कौन था?"

उन्होंने अपना चश्मा उतारा। काँच पर उँगली फेरी। फिर बिना चश्मे के ही मेरी तरफ़ देखा।

"तीन आदमी थे," उन्होंने कहा। "एक जो मुझे अंदर लाया। एक जो दरवाज़े की तरफ़ पीठ किए खड़ा था और जिसके जूते बहुत चमकते थे। और एक जो बैठा था, मेरी ही कुर्सी पर, और मुस्कुरा रहा था।"

"और उसने आपसे कहा?"

"उसने कहा — डॉक्टर साहब, आप इसमें सिर्फ़ गवाह हैं। और गवाह को सिर्फ़ हस्ताक्षर करने होते हैं।"

कमरे में चुप्पी बैठ गई। नीचे आँगन से किसी की आवाज़ आई — अफ़सर का साथी कुछ बोल रहा था — पर वो आवाज़ इस कमरे तक पहुँचते-पहुँचते मर गई।

"और आपने हस्ताक्षर कर दिए।" यह मैंने कहा। सवाल की तरह नहीं, बयान की तरह।

"कर दिए," उन्होंने कहा।

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