The Mysterious Bell – Chapter 1000
"और जिस रात मैंने हस्ताक्षर किए," उन्होंने कहा, "उस रात उसका इलाज यहीं चल रहा था। उसी इमारत में। उसी ज़मीन पर।" उन्होंने तस्वीर वापस दराज़ में रखी, धीरे से, जैसे काँच के टुकड़े को संदूक में रखते हों। "उस रात उससे कहा गया था कि अगर मैं काग़ज़ पर साफ़ नहीं हुआ, तो दवा कल से बंद।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।
"तो आपने हस्ताक्षर किए।"
"हाँ।"
"और दवा चलती रही?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "वो तीन महीने बाद चली गई। और मैं उस दिन से यही सोचता हूँ कि मैंने हस्ताक्षर किए — इससे कुछ बचा या नहीं बचा।"
रेहाना आपा ने उनकी तरफ़ देखा। और इस बार उन्होंने कुछ नहीं कहा। वो बस मेज़ के पास आईं, उनकी कुर्सी के पास खड़ी हो गईं, और एक हाथ उनके कंधे पर रख दिया। बस एक हाथ। कोई शब्द नहीं, कोई माफ़ी नहीं, कोई सफ़ाई नहीं।
और मैंने देखा कि डॉक्टर साहब का कंधा पहली बार झुका।
मैं बीच में बैठा था। दो लोग जो पंद्रह साल से एक-दूसरे को एक ही कमरे में देखते आए थे, जो सुबह-शाम गलियारे में एक-दूसरे के सामने से गुज़रते थे, जो एक ही मरीज़ के पास खड़े होते थे और एक-दूसरे से आँख नहीं मिलाते थे —
और आज, इस कमरे में, दोनों ने कहा कि एक-एक बात अभी भी छिपी है।
मैंने सोचा — यही तो सबसे बड़ी बात है। मैंने आज तक जितने भी जोड़े देखे, हर जोड़ में कोई एक बात रह ही जाती थी। कुछ पीछे रह जाती थी। और वही पीछे रही बात आगे चलकर फिर से दरार बन जाती थी।
आधा सच जोड़ नहीं होता। आधा सच दरार पर पुल जैसा होता है। आप उस पर चल सकते हो। पर दरार बंद नहीं होती।
और जो दरार बंद नहीं होती, वो किसी दिन फिर खुलती है।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप दोनों अभी तक आधे-आधे सच पर खड़े हैं।"
"हमें पता है," उन्होंने कहा।
"तो पूरा क्यों नहीं करते?"
रेहाना आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि पूरा करने के लिए ज़ुबान से बोलना पड़ता है, बेटा," उन्होंने कहा। "और हम दोनों ने पंद्रह साल चुप रहकर अपनी-अपनी ज़ुबान आधी कर ली है।"
मैं हँसा। नहीं, मैंने हँसने की कोशिश की। और वो हँसी आधी ही निकली।
"तो फिर मेरी बात सुनिए," मैंने कहा। "मैं पंद्रह साल नहीं, बाईस साल की बात रोज़ घर में देख रहा हूँ। मेरे बाप ने एक ग़लत काग़ज़ पर अंगूठा लगाया और चुप रहे। मेरी माँ ने जानकर भी चुप रह गईं। और मैंने सोचा कि मैं सब ठीक कर दूँगा, अकेले। और क्या हुआ? घर में तीन लोग थे, और तीनों अलग-अलग कमरों में एक ही सच को ढो रहे थे।"
कमरा चुप था।
"माफ़ी माँगना आसान है," मैंने कहा। "मैंने खुद दुकान के पीछे बैठकर सौ बार माफ़ी लिखी। काग़ज़ भरे, फाड़े। पर जब बाप के सामने बोलने की बारी आई, तो गला सूख गया।"
"तो तुमने क्या किया?" डॉक्टर साहब ने पूछा।
"सच बोला," मैंने कहा। "काग़ज़ पर नहीं, मुँह से। और वो सच अच्छा नहीं था। वो सच यह था कि मुझे डर लगता है कि मैं इस घर को बचा नहीं पाऊँगा।"
डॉक्टर साहब ने बहुत देर मेरी तरफ़ देखा।
"तुम अजीब लड़के हो," उन्होंने कहा। "तुम सबको जोड़ना चाहते हो और खुद अंदर से टूटे बैठे हो।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर मेरे पास साइकिल की दुकान है। मैं वही भर पाता हूँ जो सामने आता है।"
फिर डॉक्टर साहब उठे। वो दीवार के पास गए जहाँ वो छोटी तस्वीर टँगी थी। उन्होंने उसे उतारा, काँच पर से धूल पोंछी और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"ये रख लो," उन्होंने कहा। "ये तुम्हारी विरासत है। और विरासत सिर्फ़ चीज़ें नहीं होतीं। कभी-कभी कोई आदमी होता है जो गलती करता है और फिर चुप हो जाता है। तुम्हें उसकी भी विरासत मिलेगी। उसे भी उठाना।"
मैंने तस्वीर ली।
उसमें जवान इसरानी बड़े सफ़ेद कोट में खड़े थे, और जवान शिवनारायण उनके बगल में, हाथ में औज़ार, और मेज़ पर पीतल की घंटी।
मैंने तस्वीर को अपने दोनों हाथों से पकड़ा। और मुझे लगा जैसे मैं अपने परदादा की आवाज़ सुन रहा हूँ, हालाँकि उनकी कोई आवाज़ मेरे पास नहीं थी, सिर्फ़ उनकी साइकिल थी, सिर्फ़ उनकी घंटी थी, सिर्फ़ उनकी गली थी।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात और पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपने कहा कि शिवनारायण को सबसे ज़्यादा भरोसा साइकिल गली के एक परिवार पर था। किस पर?"
उन्होंने रेहाना आपा की तरफ़ देखा। और रेहाना आपा ने मेरी तरफ़।
कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर रेहाना आपा ने अपना बैग उठाया, उसका फटा पट्टा ठीक किया, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ीं। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने पलटकर देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "जब तुम उस संदूक को खोलो, तो अकेले मत खोलना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो काग़ज़ पचास साल किसी संदूक में बंद रहा हो," उन्होंने कहा, "वो खुलते वक़्त गवाह माँगता है।"
वो चली गईं। सीढ़ियों पर उनके पैरों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर गई।
मैं कमरे में अकेला बचा, डॉक्टर साहब के सामने, हाथ में पुरानी तस्वीर पकड़े।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "मेरा एक सवाल और है। और ये सबसे ज़रूरी है।"
"पूछो।"
"अगर वो काग़ज़ मिल जाए," मैंने कहा, "तो क्या ये अस्पताल बच जाएगा?"
उन्होंने अपना चश्मा उतारा। उसे मेज़ पर रखा। फिर बिना चश्मे के, मेरी आँखों में देखा।
"नहीं," उन्होंने कहा। "काग़ज़ अस्पताल नहीं बचाता। काग़ज़ सिर्फ़ यह बताता है कि अस्पताल किसका है। और उसे बचाने के लिए वो लोग चाहिए जो उस काग़ज़ के पीछे खड़े हों।"
मैंने सिर हिलाया।
"तो मुझे लोग चाहिए," मैंने कहा।
"तुम्हारे पास लोग हैं," उन्होंने कहा। "तुम्हें बस उन्हें गिनने की आदत नहीं है।"
मैं हँसा। इस बार हँसी पूरी निकली।
दरवाज़े से बाहर निकला तो सीढ़ियों पर टिंकू बैठा मिला। वो घुटनों पर सिर रखे बैठा था, पर मेरी आवाज़ सुनकर उठ खड़ा हुआ।
"उस्ताद," उसने कहा, "आप अंदर बहुत देर थे।"
"काम था।"
"क्या मिला?"
मैंने तस्वीर उसकी तरफ़ बढ़ाई।
"ये मेरे परदादा हैं," मैंने कहा। "और ये डॉक्टर साहब, जवानी में।"
उसने तस्वीर देखी। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर तस्वीर में मेज़ पर रखी घंटी पर उँगली रखी।
"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये तो आपकी घंटी जैसी है।"
"पता है।"
"मतलब ये अंदर से?"
"हाँ।"
"तो अब क्या?"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। उसे हथेली पर रखा। वो गरम थी। बहुत गरम।
"अब घर," मैंने कहा। "और वो संदूक।"
हम सीढ़ियाँ उतरने लगे। नीचे आँगन में सर्वे वाली मेज़ पर अब सिर्फ़ एक फ़ाइल रह गई थी और धूल में पीली लकीर। हैंडपंप की टपकन अब भी चल रही थी।
बाहर गली में मीरा खड़ी थी, कैमरा लटका हुआ, हाथ में डायरी। वो हमें देखकर आगे आई।
"कुछ मिला?" उसने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "सब कुछ।"
"ये क्या जवाब है?"
"मीरा," मैंने कहा, "मेरे घर की पीछे वाली तरफ़, औज़ार वाले ट्रंक के पीछे, बोरी के नीचे एक पुरानी लोहे की संदूक है।"
वो रुक गई। उसकी उँगलियाँ डायरी पर जम गईं।
"मुझे पता है," उसने कहा। "मैंने उसे देखा है। तुमने कभी उसे खोला नहीं।"
"आज खोलूँगा।"
"ताले में चाबी नहीं लगती," उसने कहा। "हमने कोशिश की थी, याद है?"
"हाँ। पर आज कुछ बदल गया है।"
मैंने घंटी हथेली पर उठाई। वो गरम थी, और उसकी गरमी मेरी उँगलियों से होकर कलाई तक जा रही थी।
"घंटी," मैंने धीरे कहा।
और घंटी ने कहा।
"दो हाथ।"
"क्या बोली?" मीरा ने पूछा।
"कह रही है कि संदूक अकेले नहीं खुलेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर टिंकू की तरफ़। फिर अपना कैमरा उतारकर बैग में रख दिया।
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