The Mysterious Bell – Chapter 1001
"तो चलो," उसने कहा। "मैं दूसरा हाथ हूँ।"
हम गली की तरफ़ चले।
धूप अब ढल रही थी और पीपल की छाया लंबी हो रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर वो मोटा ताला अब भी लगा था और उस पर चिपका सील नोटिस हवा में हिल रहा था। जोड़ केंद्र बंद था। पर गली खाली नहीं थी। शबनम आपा गुमटी में चाय बना रही थीं, भोला भाई अपना आधा शटर उठाकर कुछ देख रहे थे, और उस्ताद की मशीन से आवाज़ आ रही थी — टिक, टिक, टिक।
घर पहुँचा।
पापा आँगन में बैठे थे। उनके हाथ में पुरानी रिंच थी और वो उसे बिना कुछ किए घुमा रहे थे। माँ दरवाज़े के पास खड़ी थीं।
"कुछ मिला?" पापा ने पूछा। उनकी आवाज़ धीमी थी।
"कुछ मिला," मैंने कहा। "और अब वो मिलेगा जो बाईस साल से इसी घर में पड़ा है।"
मैं घर के पीछे गया। बोरी हटाई। औज़ार वाला ट्रंक सरकाया। और वो संदूक वहाँ खड़ा था, जैसे बरसों से मेरा इंतज़ार कर रहा हो। पीतल की पट्टियाँ, बीच में उभरा फूल, और नीचे मोटे अक्षरों में — शिवनारायण।
मैंने घंटी हथेली पर रखी।
और घंटी ने, बहुत धीरे, सिर्फ़ मेरे कान के लिए, कहा।
"अब।"
॥
शाम को सात बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे जब मैंने आँगन में आवाज़ दी।
"सब अंदर। आज घर का दरवाज़ा बंद करके बैठना है।"
माँ दरवाज़े के पास खड़ी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में हिसाब की कॉपी। उन्होंने कुछ नहीं पूछा। बस एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर अंदर चली गईं और चूल्हे की लौ धीमी कर दी।
पापा आँगन में बैठे थे। पुरानी रिंच उनके हाथ में थी और वो उसे बिना कुछ किए घुमा रहे थे — जैसे कोई बच्चा खाली हाथ में पहिया घुमाता है। मैंने उन्हें टोका नहीं।
काजल ने पीछे के कमरे से चारपाई खींचकर बीच के कमरे में डाली। उसके हाथ में नर्सिंग की किताब अब भी दबी थी, पर आज वो किताब नहीं खोल रही थी।
तभी दरवाज़े पर टिंकू आया। दुकान से लौटा था, हाथों में ग्रीस, घुटने पर पट्टी, और आँखों में वो वाली चमक जो सिर्फ़ उसके पास होती है।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने शटर गिरा दिया। औज़ार समेट दिए। कुछ नहीं छोड़ा।"
"अच्छा किया।"
"और उस्ताद…" वो रुका। "रास्ते में सफ़ेद गाड़ी फिर खड़ी थी। गली के मुँह पर। अंदर कोई बैठा था, बाहर कोई नहीं उतरा।"
मैंने घंटी जेब में टटोली। वो गरम थी। बहुत गरम नहीं, पर गरम।
"अंदर आ जा," मैंने कहा।
मीरा आख़िर में आई। कैमरा बैग में था, हाथ में सिर्फ़ डायरी। उसने दरवाज़े पर खड़े होकर पूछा, "कितने लोग हैं?"
"जितने होने चाहिए," माँ ने पीछे से कहा। "अब दरवाज़ा बंद करो और आ जाओ।"
दरवाज़ा बंद हुआ। कुंडी चढ़ी। और उस आवाज़ के साथ ही घर का माहौल बदल गया — जैसे बाहर की पूरी गली, पूरा शोर, सफ़ेद गाड़ी, सील नोटिस, सर्वे वाली मेज़, सब बाहर ही रह गए।
अंदर सिर्फ़ हम थे।
और वो संदूक।
मैंने टिंकू के साथ मिलकर लोहे की संदूक को पीछे से खींचकर बीच के कमरे में ला दिया। भारी थी, बहुत। पीतल की पट्टियाँ, बीच में उभरा फूल, और नीचे बाएँ कोने पर मोटे अक्षर — शिवनारायण।
रेहाना आपा पहले से आई हुई थीं। वो चारपाई के किनारे बैठी थीं, गोद में पुराना कपड़े का बैग, और उनकी उँगलियाँ बैग की सिलाई पर चल रही थीं — जैसे कोई तस्बीह हो।
"रेहाना आपा," मैंने कहा, "आपको भी अंदर बुलाना था। अब जब घर बंद है, तो कुछ बातें घर में ही रहेंगी।"
उन्होंने सिर हिलाया। उनकी आँखें भीगी नहीं थीं, पर थकी ज़रूर थीं — पंद्रह साल की थकान।
मैंने संदूक के सामने घुटने टेके। मीरा मेरे बगल में बैठी। घंटी मैंने हथेली पर रखी और फिर संदूक के किनारे पर रख दी।
"दो हाथ," मैंने धीरे कहा।
मीरा ने अपना हाथ बढ़ाया और ताले पर रख दिया। मेरा हाथ उसके ऊपर आया।
ताला पीतल का था, छोटा, और चाबी का छेद एकदम कसा हुआ। मैंने गले की चाबी निकाली, उसमें डाली, और घुमाया।
नहीं घूमी।
"फिर वही," मीरा ने कहा। "जैसे पहले बार किया था।"
"पहले हम अकेले थे," मैंने कहा। "आज दो हाथ हैं।"
मैंने फिर घुमाया। ताला चरचराया — जैसे कोई बूढ़ा जाग रहा हो — और फिर अंदर कुछ टूटा। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"लगा कि अंदर कुछ है," उसने कहा।
"है," मैंने कहा। "पर ताले में नहीं।"
मैंने टिंकू की तरफ़ हाथ बढ़ाया। उसने फटाफट जेब से सरसों के तेल की छोटी शीशी निकाली — वो जो वो हर वक़्त अपने पास रखता है, किसी को नहीं बताता क्यों।
तेल डाला। फिर घुमाया। और इस बार ताला खुल गया।
ढक्कन उठाया तो अंदर से वो गंध आई — पुरानी लकड़ी, हल्की सीलन, और काग़ज़। बहुत पुराना काग़ज़। ऐसा काग़ज़ जो बरसों से बंद जगह में पड़ा हो और जिसकी गंध तुम्हें बता दे कि यहाँ कुछ लिखा गया था।
अंदर मैला खादी का कपड़ा था। सूखी रुई की पुड़िया थी। और उसके नीचे — धूल में एक चौकोर साफ़ जगह।
बस।
जगह साफ़ थी, चीज़ गायब।
कुछ पल कोई नहीं बोला। पापा ने रिंच घुमाना बंद कर दिया। उनकी उँगलियाँ रुक गईं और रिंच उनके घुटने पर रखी रह गई, जैसे कोई चीज़ जो अब किसी काम की नहीं।
"निकाल लिया," मैंने कहा। "किसी ने निकाल लिया। और ज़ोर से नहीं निकाला — आराम से, बिना कुछ तोड़े।"
"तो इसका मतलब?" टिंकू ने पूछा।
"मतलब ये कि जो चीज़ अंदर थी, वो किसी को चाहिए थी। और जिसको चाहिए थी, उसके पास चाबी थी।"
माँ ने उस वक़्त कुछ नहीं कहा। वो बस मुड़कर अंदर के कमरे में गईं, और जब लौटीं तो उनके हाथों में एक छोटी लकड़ी की संदूकची थी।
ब्याहता की संदूकची।
लाल रंग उतरा हुआ, कोनों पर पीतल के छोटे टुकड़े, ढक्कन पर घिसा हुआ फूल। ताला बहुत छोटा था, पर मोटा — ऐसा ताला जो दिखने में छोटा हो और जिसे खोलने के लिए ताक़त लगे।
उन्होंने उसे मेरे सामने, चारपाई पर रख दिया।
"ये मेरे मायके से आई थी," माँ ने कहा। "ब्याह के दिन मेरी माँ ने दी थी। उस दिन इसका ढक्कन खुला था, और उसके बाद…"
वो रुक गईं।
"उसके बाद?" काजल ने पूछा।
"उसके बाद मैंने इसे कभी पूरा नहीं खोला," माँ ने कहा। "ढक्कन उठाया, ऊपर के कपड़े देखे, और बंद कर दिया। हर बार लगा कि अंदर कुछ ऐसा है जो मुझे नहीं देखना चाहिए।"
पापा ने उस वक़्त पहली बार अपना सिर उठाया।
"मेरे बाबा," उन्होंने धीरे कहा, "इस संदूकची को कभी खुला नहीं दिखाया। एक बार मैंने बचपन में ढक्कन उठाने की कोशिश की थी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया था — इतनी ज़ोर से कि अगले दिन कलाई पर निशान रह गया।"
कमरा चुप हो गया।
"उस दिन मुझे लगा कि वो डाँट रहे हैं," पापा ने कहा। "आज लगता है कि वो डर रहे थे।"
मैंने संदूकची पर हाथ रखा।
ताला बर्फ़ जैसा ठंडा था। इतना ठंडा कि मेरी हथेली सिकुड़ गई और ठंड कलाई तक चली गई — ठीक वैसे ही जैसे उस दिन अस्पताल में घंटी ठंडी हुई थी। मैंने हाथ नहीं हटाया।
"माँ," मैंने कहा, "ये हमेशा से ठंडा है?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "पहले गरम लगता था। ब्याह के शुरू के सालों में मैं इसे छूती थी तो लगता था कि अंदर कुछ ज़िंदा है। फिर धीरे-धीरे…"
"ठंडा हो गया?"
"पता नहीं कब," उन्होंने कहा। "बस एक दिन हाथ लगाया और लगा कि अंदर सब खत्म हो गया।"
टिंकू आगे आया। उसने संदूकची के ढक्कन पर नाक रखी और गहरी साँस खींची — जैसे कोई जासूस फ़िल्म में करता है, पर उसकी नाक पर ग्रीस लगी थी और ये पूरा माजरा इतना उलटा था कि मुझे हँसी रोकनी पड़ी।
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