The Mysterious Bell – Chapter 994
मैंने चाय पी। दो घूँट में। जल गया, फिर भी पी गया, क्योंकि माँ की नज़र सामने थी।
गले में चाबी थी, जेब में घंटी, और दूसरी जेब में वो पुराना काग़ज़, जिस पर मेरे परदादा का आधा नाम लिखा था।
मैं निकला।
गली में सुबह का वो वक़्त था जब दूध वाला जा चुका होता है और स्कूल वाले नहीं निकले होते। पीपल के नीचे दो-तीन लोग खड़े थे। मुझे दूर से ही कुछ गड़बड़ लगी, क्योंकि लोग जिस तरह खड़े थे, वो तरीका बात करने का नहीं, देखने का था।
जैसे कोई चीज़ गिरी हो।
मैं आगे बढ़ा।
और फिर मैंने वो देखा जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
जोड़ केंद्र पर, यानी उस टूटी लकड़ी की मेज़ पर जिस पर सफ़ेद पेंट से मैंने खुद लिखा था कि टूटी चीज़ लाओ और टूटा रिश्ता साथ लाओ — उस मेज़ पर अब कुछ नहीं था। मेज़ हटा दी गई थी। और पीपल की जड़ के पास, चबूतरी के उस हिस्से में जहाँ मैं रोज़ बैठता था, लोहे का एक मोटा ताला लगा था।
मोटा ताला। मतलब ऐसा जो आम चाबी से न खुले। जिसकी गर्दन मोटी हो, जिसकी कुंडी किसी पुराने सरकारी दफ़्तार की कुंडी जैसी भारी हो।
और ताले के ऊपर, चबूतरी की ईंट पर, एक काग़ज़ चिपका था।
सील नोटिस।
मैं जानता हूँ तुम सोच रहे होगे कि एक ताला और एक काग़ज़, इसमें क्या बड़ी बात। भाई, ताला ताले की जगह लगता है। ये ताला किसी दरवाज़े पर नहीं लगा था। ये उस जगह पर लगा था जहाँ से पूरी गली में एक भी अच्छी बात शुरू होती थी।
जहाँ एक महीने पहले सिर्फ़ धूल थी, वहाँ लोग आकर बैठने लगे थे। और अब वहाँ ताला था।
मैं सीधा खड़ा रह गया।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद, ये कब लगा?"
"मुझे क्या पता," मैंने कहा। "मैं रात को सोया था, ताला नहीं बना रहा था।"
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसा नहीं। उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चे के चेहरे पर तब आता है जब उसे लगता है कि बड़ों ने कुछ ऐसा कर दिया है जो अब वापस नहीं होगा।
और तभी मैंने वो आवाज़ सुनी।
पान चबाने की आवाज़।
मैं मुड़ा।
बबलू पांडे वहाँ खड़ा था। गले में वही मोटी सोने की चेन, हाथ में वही पानदान, और पीछे उसके दो आदमी — एक हाथ में मोटी लाठी, दूसरा हाथ में काला बैग। दोनों चुप। दोनों ऐसे खड़े जैसे दीवार के दो हिस्से हों।
बबलू ने मुझे देखा और मुस्कुराया।
और यही सबसे डरावनी बात थी।
क्योंकि बबलू पांडे की आवाज़ में हमेशा एक चीख होती थी। वो चीखता हुआ भी नहीं चीखता था, उसकी बात में ही चीख घुली रहती थी। पान की चीख। धमकी की चीख। वो आदमी जब बोलता था तो लगता था कि कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद हुआ।
आज वो नहीं थी।
आज उसकी आवाज़ में नरमी थी। झूठी नरमी।
"अंकुश भाई," उसने कहा। "सुबह-सुबह आ गए? चाय ले लो, मैंने कहा है गुमटी वाली को।"
"शबनम आपा तुम्हारी चाय नहीं बनातीं," मैंने कहा।
"अरे, बना रही हैं," उसने कहा। "आज बना रही हैं।"
उसने अपना हाथ मोटे ताले पर रख दिया। ऐसे, जैसे कोई अपने ही घर के दरवाज़े पर हाथ रखे। और यही बात मुझे अंदर तक चुभी।
"देखो भाई," उसने कहा। "ये चबूतरी साहब ने सार्वजनिक काम के लिए माँगी है। अब इसे सार्वजनिक काम कहो या भला काम, काग़ज़ पर बात एक ही है। कल सुबह सर्वे टीम आएगी। अस्पताल के आँगन में। सुबह सात बजे।"
भीड़ बढ़ रही थी। पीछे से कोई बोला, "कौन सा सर्वे?"
बबलू ने उस आदमी की तरफ़ देखा भी नहीं। उसने सिर्फ़ अपना पान मुँह के एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ घुमाया।
"अरे भाई," उसने कहा, "सर्वे मतलब नाप। नाप मतलब पता लगाना कि क्या कहाँ है। कुछ छीन नहीं रहे, कुछ बाँट रहे हैं।"
"क्या बाँट रहे हो?" ये आवाज़ मीरा की थी। वो कब आई, मुझे पता नहीं चला। उसके कंधे पर कैमरा था और बगल में वो फटा बैग।
बबलू ने उसे देखकर मुस्कुराया।
"बेटा, तुम रोज़ आती हो," उसने कहा। "कुछ नया भी लाओ।"
"नया लाती हूँ," मीरा ने कहा। "पर तुम्हारा चेहरा रोज़ पुराना ही मिलता है।"
कुछ लोग हँसे। बबलू हँसा नहीं। उसने अपना हाथ ताले से हटाया और झाड़ लिया, जैसे उस पर धूल लग गई हो।
और तभी वो हुआ जो मुझे डर था।
भीड़ में से एक आवाज़ आई। औरत की आवाज़।
"अंकुश भैया, ये सब तुम्हारी वजह से हो रहा है।"
मैं मुड़ा। चूड़ी वाली बाई थीं। उनके हाथ में लाल धागे लिपटे थे और आँखों में वो डर था जो भूख से बड़ा होता है।
"तुमने घंटी बजाकर पूरी गली को मुसीबत बुला ली," उन्होंने कहा। "मेरी दुकान का शटर आधा गिरा है। भोला के यहाँ भी। किशन काका बोलते तक नहीं। अब तुम बताओ, हम क्या करें?"
मैं चुप रहा।
क्योंकि सच कहूँ तो उस वक़्त मेरे पास जवाब नहीं था। मेरे पास बहुत कुछ था — काग़ज़, निशान, तारीख़ें, आधा नाम, एक टूटी पीतल की पट्टी। पर जवाब नहीं था।
और जब आदमी के पास जवाब न हो, तो उसे चुप रहना चाहिए। बोल दे तो और बिगड़ता है।
पीछे से एक और आवाज़ आई। एक आदमी की।
"कुछ तो करो भाई। तुम रोज़ कुछ नया लाते हो, हमें समझ नहीं आता। अब तुम्हारी बातें हमारे काम नहीं आ रहीं, उल्टा हमारा काम बंद हो रहा है।"
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा। "कहो न कुछ।"
मैंने उसका हाथ हटाया और आगे बढ़ा।
और तभी अस्पताल का दरवाज़ा खुला।
डॉक्टर निहाल इसरानी बाहर आए। उनके हाथ में वही पुराना स्टेथोस्कोप था, जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा हुआ था। उन्होंने किसी को नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ सामने देखा और धीरे से खाँसा।
"अस्पताल आज भी खुला है," उन्होंने कहा।
भीड़ चुप हुई। पूरी नहीं, पर आधी ज़रूर।
"मरीज़ का इलाज काग़ज़ से नहीं होता," उन्होंने कहा। "हाथ से होता है। और मेरे हाथ अभी काम कर रहे हैं। इसलिए जिसको दवा चाहिए, वो अंदर आ जाए। और जिसको काग़ज़ चाहिए, वो बाहर रुक जाए।"
कुछ लोग हँसे। किसी ने ताली बजाई। और उस एक वाक्य से हवा थोड़ी हल्की हुई।
डॉक्टर साहब मेरी तरफ़ आए। उन्होंने ताले की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"तोड़ोगे?" उन्होंने धीरे से पूछा।
"नहीं," मैंने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि तोड़ने वाले बहुत हैं," मैंने कहा। "मैं खोलने वालों में से हूँ।"
डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। वो अंदर चले गए।
टिंकू ने ताले को छुआ। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
"उस्ताद, औज़ार ट्रंक में है," उसने कहा। "पाँच मिनट।"
"नहीं।"
"फिर कैसे खुलेगा?"
"सच से," मैंने कहा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी बकवास कह दी हो। और सच कहूँ तो उस वक़्त वो बकवास ही लग रही थी। ताला लोहे का था। सच काग़ज़ का था। लोहा काग़ज़ को नहीं मानता। यही तो दुनिया का सबसे पुराना नियम है।
मैंने ताले पर लगी मोहर देखी।
नीली गोल मोहर। आधी घिसी हुई। नीचे तारीख़ और ऊपर एक नाम, जो जान-बूझकर ऐसे छापा गया था कि दूर से पढ़ो तो साफ़ लगे और पास जाओ तो फैल जाए।
और तभी चबूतरी के कोने से एक आवाज़ आई।
"बेटा।"
मैं मुड़ा।
एक बूढ़ी मरीज़ थीं। अस्पताल के बाहर वाली बेंच पर बैठी थीं। पुरानी साफ़ साड़ी, हाथ में पुरानी परची। उन्होंने डॉक्टर साहब की आवाज़ सुनी थी और वो उठकर खड़ी हो गई थीं।
"डॉक्टर साहब," उन्होंने कहा। "अगर ये अस्पताल बंद हो गया, तो मेरी सुई का समय कौन देखेगा?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
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