The Mysterious Bell993 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 993

7 min read November 5, 2026

डॉक्टर ने रेहाना की नौकरी बचाने के लिए उसका नाम मिटाया। रेहाना ने अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए रजिस्टर की कॉपी किसी को दी। दोनों ने एक-दूसरे से आधा सच कहा। दोनों पंद्रह साल से उसी चादर पर खड़े थे।

"आपा," मैंने कहा। "आपने मुझे अपना पूरा दर्द बताया। कम से कम आधा सच और बताओ।"

रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या?"

"आपने उस रजिस्टर की कॉपी किसी को दी है।"

उसका चेहरा नहीं बदला। बस उसकी गर्दन थोड़ी नीची हुई।

"किसी को नहीं," उसने कहा। पर यह पहला झूठ था जो उसने आज रात बोला, और उसने इसे उसी तरह बोला जैसे कोई पुरानी आदत से कोई छोटी गलती कर दे।

मैंने उससे यह नहीं कहा कि मुझे पता है। मैंने कहा,

"ठीक है। जब आप बोलना चाहें, मैं सुनूँगा। बेंच यहीं रहेगी।"

शबनम आपा ने उस वक़्त अपनी गुमटी की तरफ़ देखा।

"मेरी बेंच हमेशा यहीं रहेगी," उन्होंने कहा। "पर मेरी बेंच पर झूठ बोलने की जगह नहीं है। ये बेंच सस्ती है, हिम्मत नहीं है।"

रेहाना ने उनकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोली।

तभी घंटी बजी।

एक बार।

बहुत छोटी आवाज़। ऐसी जैसे कोई दूर किसी बंद कमरे में बजा रहा हो और आवाज़ दीवार से टकराकर हम तक आई हो।

मैंने जेब से उसे निकाला। वो और गरम हो गई थी, पर उसकी पीतल की सतह पर उँगली रखने पर लगा कि वो काँप रही है।

"क्या कहा तूने?" मैंने पूछा।

"दोनों सच बोले," घंटी ने कहा। "दोनों आधा रखा।"

"तो जोड़ कब होगा?"

घंटी कुछ देर चुप रही। फिर उसने कहा,

"अंकुश।"

"हाँ।"

"आज मैं छोटी लग रही हूँ।"

और चुप हो गई।

मेरे हाथ में पीतल बर्फ़ जैसा ठंडा नहीं हुआ। वो गरमी में ही बंद रही, बस आवाज़ जाती रही। मैं उसे उलटकर अपनी हथेली में दबाकर बैठ गया। कभी-कभी तुम्हें एक चीज़ की सबसे बड़ी कमी उसकी आवाज़ नहीं, उसकी आवाज़ की ताक़त लगती है। घंटी आज थकी हुई लग रही थी।

रेहाना उठ खड़ी हुई।

"मैं जाऊँ?" उसने पूछा। किसी से नहीं, गुमटी की लालटेन से पूछा।

"आपा," मैंने कहा। "कल पाँच बजे की सभा है। आपका रजिस्टर वहाँ पहुँचना चाहिए। आप खुद पहुँचिएगा। मैं आपको बुलाने को कोई नहीं भेजूँगा। आपको आना है या नहीं, ये आप तय करेंगी।"

उसने सिर हिलाया।

वो गुमटी के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, जैसे कुछ कहना हो, पर वो रुक गए। उनका हाथ हवा में रह गया और फिर नीचे गिरा।

डॉक्टर इसरानी ने हलवे की कटोरी उठाई।

इस बार उन्होंने एक चम्मच मुँह में रखा। वो बूढ़े आदमी जब हलवा खा रहे थे तो मुझे लगा कि वो दवा निगल रहे हैं।

रेहाना दरवाज़े पर पहुँची, उसने अपनी ओढ़नी ठीक की और फिर वो रुक गई।

वो पीछे मुड़ी।

मुझे लगा कि वो शायद मुझसे कहेगी कि कल सुबह वो कितने बजे आएगी, या यह कि डॉक्टर साहब को उससे माफ़ी नहीं माँगनी चाहिए। पर उसने जो कहा वो मैंने सोचा भी नहीं था।

"अंकुश।"

"हाँ आपा।"

"उस रात रजिस्टर में ज़मीन का मालिक वो नहीं था जो आज है।"

मेरी पीठ ठंडी हो गई।

"आपने पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।

"क्योंकि मैं पंद्रह साल से उस नाम को भूलना चाहती थी," उसने कहा। "और भूलने का सबसे अच्छा तरीक़ा यह होता है कि तुम किसी और को बता दो। मैंने किसी को नहीं बताया।"

वो एक कदम आगे आई। लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, और मैंने देखा कि उसकी आँखें सूखी थीं। इतनी सूखी कि लगा कि उनमें अब रोने के लिए भी पानी नहीं बचा।

"उसका नाम शिवनारायण था," उसने कहा। "पूरा नाम नहीं लिखा था। बीच में एक लकीर खींचकर आधा कर दिया गया था। ऊपर किसी ने अंगूठा लगाया था और उस अंगूठे के नीचे उसका नाम काट दिया गया था।"

गुमटी के बाहर हवा रुक गई।

"और नीचे?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे अपनी ही नहीं लगी।

"नीचे गवाह की जगह कोई नाम नहीं था," रेहाना ने कहा। "बस दो लकीरें थीं और बीच में एक बिंदु। वही निशान जो तुम्हारे घंटी के छल्ले पर है।"

उसने एक गहरी साँस ली, जैसे पंद्रह साल से छाती में रखी कोई चीज़ अब जाकर बाहर निकली हो।

"मैंने उस रात सोचा था कि ये कोई आम काग़ज़ है," उसने कहा। "आज सुबह तुम्हें देखकर समझ आया कि ये आम काग़ज़ नहीं था। ये बस आधा था। बाक़ी आधा किसी और के पास है।"

वो मुड़ी और बाहर चली गई।

मैं गुमटी की बेंच पर बैठा रह गया। मेरी जेब में वो पुराना काग़ज़ था, जिस पर शिवनारायण लिखा था और जो नाम अधूरा था।

मैंने काग़ज़ निकाला।

लालटेन की रोशनी में उस अधूरे नाम को देखा।

अब वो मुझे अधूरा नहीं लग रहा था।

वो बस आधा था। और आधा होने की बीमारी में लोग पूरा होने की दुआ माँगते हैं, पर सच यह है कि आधा नाम कभी पूरा नहीं होता, वो बस अगले आधे से जुड़ता है।

मेरे परदादा का नाम शिवनारायण यादव था।

और ज़मीन का काग़ज़ जब आख़िरी बार ज़िंदा था, तब उस पर उनका नाम था।

मैंने घंटी को हथेली पर रखा। वो गरम थी, और धड़क रही थी, बहुत धीरे, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए खुद से कह रहा हो कि बस, थोड़ा और।

शबनम आपा आईं। उन्होंने तीनों कटोरी देखीं। एक भी खाली नहीं थी। उन्होंने एक गहरी साँस ली और कटोरियाँ उठा लीं।

"अब क्यों उठा रही हो?" मैंने पूछा।

"क्योंकि बात पूरी नहीं हुई," उन्होंने कहा। "जब पूरी होगी, तब खाओगे। हलवा बिगड़ता नहीं है, बस ऊपर से सूख जाता है।"

उन्होंने कटोरियाँ अंदर रखीं और लौटकर मेरे सामने खड़ी हो गईं।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "आज रात तू घर जा। सो। कल सुबह कुछ होने वाला है। मुझे लग रहा है।"

"क्यों लग रहा है?"

"क्योंकि आज शाम मेरी गुमटी पर तीन लोग बैठे थे," उन्होंने कहा, "और तीनों ने अपना आधा सच कहा। इतना आधा सच मेरे चूल्हे की आग भी नहीं बुझा सकता। अब जो होगा, वो पूरा होगा।"

वो अंदर चली गईं और उन्होंने गुमटी की लालटेन धीमी कर दी।

मैं उठा और सड़क की तरफ़ चला।

मेरी जेब में काग़ज़ था और वो गरम था। घंटी भी गरम थी। और मेरे सीने में जो चीज़ गरम थी, उसका नाम डर था, पर वो डर आज किसी और चीज़ में बदल रहा था।

मैंने चलते-चलते घंटी को हथेली से दबाया।

"ठीक है," मैंने धीरे से कहा। "तू आज छोटी है। सुन ले। कल तेरी ज़रूरत बड़ी होगी। इसलिए आज आराम कर।"

घंटी ने कोई जवाब नहीं दिया।

पर उसकी गरमी एक पल के लिए थोड़ी सी बढ़ी।

जैसे किसी ने थककर भी हाँ कह दिया हो।

॥

रात मैं सोया तो घंटी सिरहाने रखी थी। तकिये के नीचे नहीं, सिरहाने। जान-बूझकर। ताकि अगर वो बोले तो मैं सुन सकूँ, और अगर वो चुप रहे तो मुझे पता रहे कि वो चुप है।

वो चुप रही।

पूरी रात चुप रही। एक बार भी नहीं बजी। मैं बीच-बीच में जागकर हाथ बढ़ाता, उसे छूता, वो गरम मिलती। और मैं फिर सो जाता।

सुबह माँ की आवाज़ से नींद खुली। वो अस्पताल से लौट आई थीं। डॉक्टर इसरानी ने कहा था कि आज एक जाँच और होगी, पर माँ ने कहा कि जाँच अस्पताल में भी हो सकती है और घर में भी, और घर वाली जाँच में चूल्हा जलता रहता है।

मैं उठकर बैठा। कमरे में हल्की धूप आ रही थी, और उस धूप में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे किसी ने हवा में चीनी घोल दी हो।

"आज जल्दी," माँ ने कहा। "चाय पीकर निकल।"

मैंने कुछ पूछा नहीं। माँ की आवाज़ में एक बात थी जो सुबह-सुबह चेतावनी जैसी लगती है। वो चाय बना रही थीं और उनके हाथ की हरकत तेज़ थी। जब माँ के हाथ तेज़ होते हैं, तो समझ लो कि कुछ होने वाला है।

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