The Mysterious Bell995 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 995

6 min read November 5, 2026

"मेरी सुई का समय," उन्होंने फिर कहा। "रोज़ सुबह नौ बजे। मैं आती हूँ, वो देख लेते हैं। मेरा बेटा शहर में है। वो नहीं देखता। ये देखते हैं। इनको काग़ज़ चाहिए तो दे दो, पर ये रहें।"

उस वक़्त हवा भारी हो गई।

मैंने देखा कि चूड़ी वाली बाई ने अपना मुँह फेर लिया। उस आदमी ने भी जिसने अभी मुझ पर चिल्लाया था। भीड़ ने अपनी आवाज़ नहीं बदली, पर उसकी शक्ल बदल गई। डर की शक्ल बदल जाती है जब सामने किसी और का डर खड़ा हो जाए।

बबलू ने भी सुना। उसने पान का गोला बनाया और तरफ़ फेंका।

फिर वो मुस्कुराया। और वो मुस्कान मुझे सबसे ज़्यादा चुभी।

क्योंकि उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था।

उसने ताले पर एक आख़िरी बार हाथ रखा, जैसे कोई जानवर को सहला रहा हो, और भीड़ की तरफ़ मुड़ा।

"सुनो सब लोग," उसने कहा। "साहब ने कहा है कि किसी को कुछ नहीं होगा। जिसका मकान है, उसका मकान। जिसकी दुकान है, उसकी दुकान। बस काग़ज़ साफ़ होना चाहिए। जो साफ़ है, वो साफ़ रहेगा। जो गड़बड़ है, वो गड़बड़। इसमें हमारी क्या गलती?"

"और जो साफ़ नहीं है?" मीरा ने पूछा।

बबलू ने उसकी तरफ़ देखा और हँसा।

"तो साफ़ कर लो," उसने कहा। "सफ़ाई में किसका नुक़सान है?"

वो मुड़ा और चलने लगा। उसके दोनों आदमी उसके पीछे चले। लाठी वाला आगे, बैग वाला पीछे। जाते वक़्त लाठी वाले ने पीपल की जड़ पर एक ठोकर मारी, और वो ठोकर मुझे अपने सीने पर लगी।

रेहाना आई। वो कब आई, पता नहीं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो सिर्फ़ उन लोगों के हाथ में आता है जिन्होंने पंद्रह साल कुछ सहा हो।

"आज शाम तक कुछ न कुछ खुलना चाहिए," उसने धीरे से कहा।

"क्या खुलेगा?" मैंने पूछा।

"पता नहीं," उसने कहा। "पर खुलना चाहिए। वरना कल वो सर्वे आएगा और ये गली नाप लेगा। और जो नाप लिया जाए, वो बिक जाता है।"

मैंने घंटी निकाली।

वो गरम थी। बहुत गरम नहीं, पर उतनी भी नहीं जितनी रात में थी। जैसे किसी ने आधी रात को जगकर कुछ सोचा हो, फिर सो गया हो।

"कुछ बोल," मैंने धीरे से कहा।

घंटी चुप रही।

"एक शब्द," मैंने कहा।

तब वो बोली।

"नाम," उसने कहा।

बस इतना।

मैंने आँखें बंद कर लीं।

नाम।

मेरे पास पहले से एक आधा नाम था। शिवनारायण। और उस काग़ज़ पर नीचे गवाह की जगह दो लकीरें और एक बिंदु था। और आज सुबह बबलू ने यही कहा कि सर्वे गली के हर दरवाज़े का नाम लिखेगा।

मैं समझ गया।

वो ज़मीन नहीं नापेंगे। वो नाम लिखेंगे। और जिस घर का नाम उनकी सूची में नहीं होगा, उस घर को वो काग़ज़ पर खाली बता देंगे। और जो काग़ज़ पर खाली है, उसका कोई मालिक नहीं। और जिसका कोई मालिक नहीं, वो सरकार का। और सरकार का मतलब उनका।

रीति वही पुरानी है। नाम मिटाओ, ज़मीन ले लो।

टिंकू ने फिर ताले को छुआ।

"उस्ताद," उसने कहा, "कम से कम मेज़ तो निकाल लें? चबूतरी पर ही बैठेंगे।"

"मेज़ वो अपनी रखेगा," मैंने कहा। "हम अपनी रखेंगे।"

"हमारी मेज़ कहाँ है?"

"हमारी मेज़ लोग हैं," मैंने कहा।

टिंकू ने मुँह बनाया। उसे ये बातें कम पसंद थीं। उसे औज़ार पसंद थे, हाथ पसंद थे, वो चीज़ें पसंद थीं जो खुलती और बंद होती हैं।

और मुझे भी, सच कहूँ तो। मुझे भी औज़ार पसंद थे।

पर आज ताले के सामने औज़ार सिर्फ़ तोड़ सकता था। और तोड़ना उनका काम था।

मैंने मोहर के नीचे लिखी तारीख़ पढ़ी। फिर अपनी जेब से मीरा का दिया गवाह काग़ज़ निकाला।

"मीरा," मैंने कहा। "इस मोहर की तस्वीर उतार। बहुत पास से। और नीचे की जो तारीख़ है, वो भी।"

"क्यों?"

"क्योंकि जो तारीख़ आज की है, वो कल लगी होगी," मैंने कहा। "और सील का काग़ज़ सुबह सात बजे नहीं लगता। ये रात में लगा है। रात में जब कोई देख नहीं रहा था। और जो रात में लगेगा, वो दिन में गिरेगा भी।"

मीरा ने कुछ नहीं कहा। बस कैमरा उठाया और मोहर के सामने झुक गई।

उधर चूड़ी वाली बाई मेरे पास आईं। उनकी आँखें अब भी डरी हुई थीं, पर लड़ने वाली थीं।

"तेरे से कह दिया ना," उन्होंने कहा। "अब तो मैं जाती हूँ। मेरी दुकान का शटर उठाना है।"

"बाई," मैंने कहा, "शटर उठाओ। और आज दुकान खुली रखो।"

"क्यों?"

"क्योंकि जिस दिन सब बंद कर देंगे," मैंने कहा, "उस दिन ये काग़ज़ कहेगा कि गली बंद है। और जिस दिन सब खुलेंगे, उस दिन उसे ये लिखना पड़ेगा कि गली ज़िंदा है।"

वो मेरी तरफ़ देखती रही।

"मेरी दुकान में चूड़ियाँ हैं," उन्होंने कहा। "कोई खरीदने नहीं आता। डर के मारे आज तो कोई आएगा भी नहीं।"

"तो आज सिर्फ़ दरवाज़ा खुला रखो," मैंने कहा। "बिक्री नहीं हुई तो नहीं हुई। दरवाज़ा खुला रहा तो बहुत है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैंने कोई नई बात कह दी हो। फिर वो अपने धागे सीधे किए और चली गईं।

पीछे से गुड्डू दौड़कर आया। उसकी साँस फूल रही थी।

"भैया," उसने कहा, "बबलू ने अपने आदमी से कुछ कहा। मैंने सुना है।"

"क्या?"

"कह रहा था — अभी तो टैंकर भी काग़ज़ माँगेगा।"

मैं हँसा। इस बात पर हँसा, क्योंकि डर के समय में अगर हँस नहीं सके, तो बाक़ी चीज़ों का कोई मतलब नहीं रहता।

"गुड्डू," मैंने कहा। "तुम पाँचों जनों को बता दो — आज पीपल के नीचे नहीं, दुकान के सामने वाली पटिया पर शाम छह बजे मिलना है।"

"क्यों?"

"क्योंकि पीपल पर ताला लग गया," मैंने कहा। "मेज़ नीचे नहीं है, गली है।"

वो हँसकर भागा।

तभी सानिया की माँ आईं। उनके हाथ में बाल्टी थी और बाल्टी खाली थी।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "नल की लाइन से पानी नहीं आ रहा। किसी ने कहीं वॉल्व बंद कर दिया है।"

मैंने घंटी को जेब में रखा।

"कहाँ?" मैंने पूछा।

"उसी अस्पताल के पीछे वाली लाइन से," उन्होंने कहा।

मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़े थे और सब सुन रहे थे। उन्होंने मेरी आँखों में देखा और सिर हिलाया।

"मेरे पीछे आओ," उन्होंने कहा।

हम गए। अस्पताल के पीछे वाली गली। वो सूखी नाली, जहाँ रात में मैंने लकड़ी के जूतों के निशान देखे थे। और वहाँ, पुरानी लाइन के पास, दो नई ईंटें रखी थीं और उनके नीचे वाल्व बंद था।

डॉक्टर साहब झुके।

"बत्तीस साल में पहली बार," उन्होंने कहा, "इस शहर ने मेरे अस्पताल का पानी बंद किया है।"

मैंने वो वाल्व अपने हाथ से खोला। पानी आया। ज़ोर से आया। सानिया की माँ ने बाल्टी भर ली और चली गईं।

मैं वहीं खड़ा रहा।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "आपको कोई आदमी वाल्व बंद करते हुए दिखा?"

"नहीं," उन्होंने कहा। "बंसीलाल रात को जगा करता था, पर आज उसकी चारपाई खाली थी।"

"कहाँ गए?"

डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराए।

"ट्रेन में नहीं गए," उन्होंने कहा। "बंसीलाल जैसा आदमी कहीं जाता नहीं। वो या तो बीमार है, या डरा हुआ है।"

मैंने उस पल अपनी जेब में हाथ डाला और ठंडी पीतल की पट्टी को छुआ।

"आज शाम तक कुछ न कुछ खुलेगा," मैंने कहा। "ऐसा मुझसे किसी ने कहा है।"

"किसने?"

"एक औरत ने," मैंने कहा। "जिसने पंद्रह साल पहले अपना नाम खो दिया था।"

डॉक्टर इसरानी कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर उन्होंने अपना पुराना स्टेथोस्कोप उठाया और अपने कमरे की तरफ़ बढ़ गए।

"अंकुश," उन्होंने जाते-जाते कहा, "अगर आज तुम कामयाब हो गए, तो मुझे एक काम करना है।"

"क्या?"

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