The Mysterious Bell – Chapter 990
"आज मुझे यह दफ़्तार की बेंच पर मिली।" उसने रजिस्टर के किनारे की तरफ़ इशारा किया। "और यह देखो — इसके पन्नों पर धूल नहीं है। मोटे हिस्से में है, किनारों पर है, पर जहाँ-जहाँ उँगली पड़ी है, वहाँ नहीं है। यानी किसी ने इसे आज ही उठाया है।"
मैंने वो किनारे देखे।
रेहाना सही कह रही थी। पन्नों पर धूल की एक पतली परत थी, पर बीच में, जहाँ रजिस्टर खुलता था, वहाँ दो जगह धूल टूटी हुई थी — जैसे किसी ने अँगूठे से दबाकर पन्ने पलटे हों।
"किसके पास यह रजिस्टर आज सुबह थी?" मैंने पूछा।
"मुझे यह उसी दोस्त ने दी," रेहाना ने कहा। "और उसने बताया कि यह उसे दफ़्तार के बाहर वाली बेंच पर मिली थी। जिस पर किसी का नाम नहीं लिखा था। और उसके ऊपर एक चिट्ठी भी रखी थी।"
"क्या लिखा था उस चिट्ठी में?"
रेहाना ने अपने फटे बैग से एक छोटा काग़ज़ निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
काग़ज़ पर एक ही लाइन थी, नीली स्याही में, और वो लाइन चार शब्दों की थी।
"जिसे भुला दिया गया, वो याद करे।"
मैंने काग़ज़ मीरा की तरफ़ बढ़ाया। मीरा ने उसे पढ़ा, फिर कुछ देर उसे देखती रही, फिर उसने अपना कैमरा नीचे रख दिया।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "यह लिखाई मुझे कहीं देखी हुई लग रही है।"
"कहाँ?"
"पता नहीं। पर यह नई नहीं है। इस स्याही की चमक देख — यह पुरानी स्याही है, जो बाद में पानी से फैली है। यानी यह काग़ज़ नया नहीं है। यह पुराना है, और इसे किसी ने संभालकर रखा था।"
उसने काग़ज़ को पलटा।
पीछे की तरफ़ कुछ नहीं था — सिर्फ़ एक धुँधला गोल निशान, जैसे किसी मोहर का निशान हो जो सालों में मिट गया हो।
मीरा ने उसे अपनी आँखों के पास उठाया।
"यह मोहर है," उसने कहा। "पर पढ़ी नहीं जा रही।"
"मुझे दो," मैंने कहा।
मैंने वो काग़ज़ हाथ में लिया और अपनी जेब से सहमति पत्र की सफ़ेद नक़ल निकाली। मैंने दोनों को साथ रखकर देखा।
मोहर का निशान मिल रहा था।
उसी जगह पर, उसी आकार में, उसी घुमाव पर।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा और वो काग़ज़ उनकी तरफ़ बढ़ाया। "यह मोहर आपकी है?"
उन्होंने काग़ज़ लिया और उसे देखा।
उनका हाथ अचानक रुक गया, ठीक वैसे ही जैसे सुबह रेहाना को देखकर रुका था।
"यह अस्पताल की पुरानी मोहर है," उन्होंने कहा। "यह उस वक़्त बनी थी जब मेरे पास अपनी मोहर नहीं थी। पर यह मोहर किसी के पास नहीं रहनी चाहिए थी। यह अस्पताल के रिकॉर्ड वाले कमरे में रहती थी।"
"और अब?"
"अब यह उस कमरे में नहीं है।"
रेहाना ने अचानक कहा, "वो कमरा।"
डॉक्टर इसरानी ने उसकी तरफ़ देखा।
"जिस कमरे में रजिस्टर पड़ी थी?" रेहाना ने पूछा। "वो कमरा जिसका ताला दिन में सिर्फ़ एक घंटे खुलता है?"
डॉक्टर इसरानी ने सिर हिलाया।
"उस कमरे का ताला," उन्होंने कहा, "दो साल पहले बदल गया था। और नई चाबी मेरे पास नहीं है।"
मैंने गहरी साँस ली।
गलियारे में हवा का एक झोंका आया, दवा की खिड़की का पुराना बल्ब हिला और उसकी रोशनी एक पल के लिए तिरछी हो गई।
काजल ने छोटी आवाज़ में कहा, "भइया, मेरी एक बात पूछनी है।"
"पूछ।"
"रेहाना आपा के पन्ने से जिसने नाम काटा, वो काग़ज़ किसी दफ़्तार में जमा हुआ होगा न? कोई रिकॉर्ड होगा?"
रेहाना ने कहा, "नहीं।"
काजल ने उसकी तरफ़ देखा।
"नहीं?"
"जिस दिन मेरा नाम कटा," रेहाना ने कहा, "उस दिन मुझे जो काग़ज़ दिया गया, उस पर लिखा था कि मेरी सेवा स्वेच्छा से समाप्त की गई है। अर्थात मैंने खुद छोड़ा। कोई निष्कासन नहीं, कोई स्थानांतरण नहीं — सिर्फ़ मेरी अपनी इच्छा। और मैंने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगा दिया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"आपने क्यों लगाया?"
क्योंकि वो रो रही थी — मेरी बेटी। उसने कहा था कि अम्मी, अगर आप लड़ेंगी तो मुझे स्कूल से निकाल देंगे। और मैंने सोचा था कि नौकरी से ज़्यादा ज़रूरी कुछ है।"
गलियारे के आख़िर में एक मरीज़ खाँसा। कोई बच्चा रोया। किसी औरत की चप्पलें सरसराईं और फिर सब कुछ फिर चुप हो गया।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो ठंडी थी, पर इतनी ठंडी नहीं जितनी सुबह थी।
मैंने उसे हथेली पर रखा।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा। "मुझे एक आख़िरी बात पूछनी है, और मैं चाहता हूँ कि आप इसका जवाब सिर्फ़ मुझे नहीं, इस गलियारे को दें।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या उस रात," मैंने कहा, "जिस रात अस्पताल का काग़ज़ बदला गया, आपने उस काग़ज़ पर अपना नाम या अंगूठा कहीं और से लगवाया था?"
डॉक्टर इसरानी का चेहरा एक पल के लिए पत्थर जैसा हो गया।
फिर उन्होंने अपनी जेब से वो पुरानी परची निकाली — वही जिस पर दो जाँचें लिखी थीं और दवा बदली हुई थी — और उसे मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"इस पर," उन्होंने कहा, "मेरा अंगूठा मेरे हाथ का है। पर इस पर लगी स्याही, और यह काग़ज़, मेरा नहीं है। मुझे यह परची आज सुबह उसी कमरे से मिली और मैं समझ नहीं पाया कि इसे कहाँ रखूँ। अब समझ आया — इसे आपके पास रखना था।"
मैंने परची ली और उसे ध्यान से देखा।
ऊपर माँ का नाम था। नीचे तारीख़ थी। और बीच में, नीली स्याही में, वो दो लाइनें जो मेरी माँ की दवा का पूरा हिसाब बदल देती थीं।
और फिर मैंने सबसे नीचे देखा — एक बहुत छोटा सा कोना, जहाँ काग़ज़ ज़रा मुड़ा हुआ था।
मैंने उसे सीधा किया।
वहाँ एक अक्षर था।
आधा अक्षर।
"काजल," मैंने कहा। "इसे पढ़।"
काजल ने परची अपने हाथ में ली और उसे आँखों के पास ले गई।
"यह…." उसकी आवाज़ रुक गई।
"क्या है?"
"यह 'रे' है, भइया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "यहाँ 'रे' लिखा है। आधा। बाकी मिट गया है।"
मैंने रेहाना की तरफ़ देखा।
वो शांत खड़ी थी। बिल्कुल शांत।
इतनी शांत कि मुझे लगा कि वो इस पल के लिए पंद्रह साल से खड़ी थी।
"आपा," मैंने कहा। "यह परची आपके नाम की है?"
उसने परची ली। उसे देखा। फिर उसने अपना रजिस्टर खोला और उसके पन्नों के ऊपर अपनी उँगली रखी — धीरे-धीरे, एक-एक पन्ने पर, जैसे गिनती कर रही हो।
"मेरे पास इस अस्पताल में तीन बेड थे," उसने कहा। "तीन मरीज़ जिन्हें मैंने अपनी ड्यूटी में खुद लिटाया था और जिनके लिए मैंने खुद दवा लिखवाई थी।" उसकी उँगली रुक गई। "और इन तीनों मरीज़ों की परचियों पर मेरा नाम लिखा गया है, पर मेरी जानकारी में ये परचियाँ कभी मेरे हाथ से नहीं गईं।"
गलियारे में सन्नाटा था।
"आपका मतलब है," मीरा ने धीरे से कहा, "कि किसी ने आपका नाम परचियों पर लिखकर उन मरीज़ों का इलाज बदल दिया?"
रेहाना ने परची को वापस मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"नहीं," उसने कहा। "मेरा मतलब है कि उन मरीज़ों के इलाज में जो भी हुआ, वो मेरे नाम से हुआ। और जिस दिन मुझे हटाया गया, उस दिन मुझे बताया गया कि मेरी वजह से अस्पताल का कोई काग़ज़ गड़बड़ा गया है।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा सफ़ेद था।
"मुझे उस वक़्त नहीं पता था," उन्होंने कहा। "मैं कसम खाता हूँ, मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि यह परचियाँ बनाई गई थीं।"
"और अब पता है?" मैंने पूछा।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
काजल ने रेहाना का हाथ पकड़ लिया।
"रेहाना आपा," उसने कहा, "आप कल सुबह सभा में आएँगी?"
रेहाना ने उसकी तरफ़ देखा और फिर मेरी तरफ़।
"अगर यह लड़का मुझे बुलाए," उसने कहा। "और अगर कहूँ कि यह मेरी गवाही है, तो यह मेरी गवाही नहीं है। यह मेरी ज़िंदगी है, जो पंद्रह साल से किसी की चुप्पी में बंद है।"
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