The Mysterious Bell – Chapter 991
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"आपकी गवाही आपकी है," मैंने कहा। "और किसी की चुप्पी आपकी नहीं है।"
रेहाना ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखें भर आईं।
वो भागी नहीं। वो कुछ देर बस वहीं बैठ गई, फिर उसने अपना रजिस्टर खोला और उसके पन्नों पर उँगली रखकर डॉक्टर की तरफ़ देखा।
"आपने मुझे नौकरी से नहीं निकाला था, डॉक्टर साहब," उसने कहा। "आपने मुझे बचाया था। और मैं पंद्रह साल से यही सोच रही हूँ कि बचाने वाला इंसान सच क्यों नहीं बोलता।"
डॉक्टर इसरानी ने अपना चश्मा फिर पहना।
इस बार उन्होंने उसे नहीं उतारा।
"क्योंकि बचाने वाला इंसान," उन्होंने धीरे से कहा, "अगर सच बोलने लगे, तो उसे यह भी बताना पड़ेगा कि वो पूरा सच नहीं बचा पाया।"
रेहाना ने अपना सिर हिलाया — बहुत हल्का, जैसे कोई सालों पुराना हिसाब माफ़ नहीं, सिर्फ़ बंद कर रही हो।
मैं उठ खड़ा हुआ।
"काजल," मैंने कहा। "माँ की परची को सँभाल।"
काजल ने उसे सँभाला।
"मीरा," मैंने कहा। "आपा के पन्ने वाली तस्वीरें ले लो।"
मीरा ने कैमरा उठाया।
"अंकुश," रेहाना ने कहा। "एक आख़िरी बात।"
"कहिए।"
"आज सुबह भवन में मेरी एक दोस्त ने मुझे बताया कि वर्दी वाली औरत ने दो नाम पूछे थे। एक अंकुश यादव और एक शांति देवी।"
मैं रुक गया।
"शांति देवी," मैंने दोहराया।
"हाँ।" उसने अपना रजिस्टर बंद किया। "और मेरी दोस्त ने यह भी बताया कि वो औरत भवन से निकलकर अस्पताल की तरफ़ गई थी।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी अब ठंडी नहीं थी।
बर्फ़ जैसी नहीं थी।
वो गरम थी।
और मैंने उसे हथेली पर रखकर महसूस किया कि वो धीरे-धीरे धड़क रही है, जैसे किसी का दिल नाम सुनकर जाग गया हो।
तभी गलियारे के आख़िर से आवाज़ आई — चप्पलों की, धीमी, ठहरी हुई।
मैंने पलटकर देखा।
एक औरत आ रही थी।
सफ़ेद कपड़े में।
उसके हाथ में कोई काग़ज़ था। वो काग़ज़ चमकदार नहीं था, पुराना था, मुड़ा हुआ था।
वो रुकी। उसने रेहाना को देखा। फिर डॉक्टर इसरानी को। फिर मुझे।
और उसने जो पहला शब्द बोला, वो सिर्फ़ मेरे लिए था।
"अंकुश यादव?"
मेरी जेब में घंटी और गरम हो गई।
मैंने सिर हिलाया।
वो आगे आई और उसने वो पुराना काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"मैंने इसे पंद्रह साल संभालकर रखा है," उसने कहा। "और आज मुझे बताया गया कि ये आपका है।"
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर दो लकीरें थीं और बीच में एक बिंदु — वही निशान जो मंसूर चाचा के काग़ज़ पर था, जो घंटी के छल्ले पर था, जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था।
और उस काग़ज़ पर, उस निशान के नीचे, बहुत पुराने अक्षरों में एक नाम था — अधूरा, कटा हुआ, पर इतना साफ़ कि मैं उसे पढ़ सकूँ।
शिवनारायण।
पर वो नाम अभी भी अधूरा था।
जैसे किसी ने उसे लिखते-लिखते हाथ रोक दिया हो।
॥
उस काग़ज़ को हाथ में पकड़ते ही मेरी उँगलियाँ ठंडी हो गईं। काग़ज़ पतला था, किनारों से चटका हुआ, और बीच से ऐसा मुड़ा कि मुझे खोलते वक़्त डर लगा कि कहीं टूट न जाए।
"आप कौन हैं?" मैंने पूछा।
"हमीदा," उसने कहा। "तीस साल नूर अस्पताल के फ़र्श पर झुककर काम किया है। अब घुटने जवाब दे गए, तो डॉक्टर साहब ने रसोई में बिठा दिया। सुबह की चाय, दोपहर का पानी, बस इतना।"
वो रुकी। उसने अपने हाथ से अपनी कमर पकड़ी, जैसे वहाँ कोई पुराना दर्द अब भी बैठा हो।
"यह काग़ज़?" मैंने पूछा।
"उस रात पिछले दरवाज़े के पास नाली में मिला था," उसने कहा। "आधा जला, आधा भीगा। मैंने उसे उठाया, कपड़े में लपेटा और अपने बक्से में रख दिया। न जाने क्यों रखा। मुझे इतना ही पढ़ना आता है कि दवा की पर्ची पहचान लूँ।"
"और आज?"
"आज सुबह एक बाई आई," उसने कहा। "सफ़ेद वर्दी। चेहरा देखा नहीं, मुँह पर कपड़ा था। उसने मेरा नाम लिया। हमीदा। इस अस्पताल में मेरा नाम अब कोई नहीं लेता। वो बोली कि तेरे पास एक पुराना काग़ज़ है, आज उस लड़के को दे देना जो घंटी रखता है। उसने कहा कि वक़्त आ गया है।"
"कैसे पहचाना कि मैं वही हूँ?"
वो मुस्कुराई। बूढ़े लोग ऐसे ही मुस्कुराते हैं, जैसे जवाब देने से ज़्यादा ज़रूरी हो कि सवाल अब बेकार हो गया है।
"तू गलियारे में आया," उसने कहा, "और तीन लोगों ने तेरी तरफ़ देखा। डॉक्टर साहब ने चश्मा उतार दिया। रेहाना ने रजिस्टर बंद कर दिया। तू जिस जगह खड़ा हो, वहाँ हवा बदल जाती है। मुझे इतना पढ़ना आता है।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो बेंच पर बैठे थे और उनका चश्मा उनके हाथ में था। उन्होंने वो काग़ज़ माँगा।
मैंने दे दिया।
उन्होंने उसे खोला, एक उँगली उस अधूरे नाम पर रखी और कुछ देर वैसे ही बैठे रहे। फिर उन्होंने चश्मा पहना और काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"शिवनारायण," वो बोले।
"आप इन्हें जानते हैं?"
डॉक्टर इसरानी ने जवाब नहीं दिया। उन्होंने बेंच से हाथ उठाया, जैसे कुछ कहने की कोशिश की, और फिर हाथ गिरा दिया।
रेहाना ने काग़ज़ लिया। उसने उसे देखा और मुझे लगा कि वो काग़ज़ नहीं, किसी का चेहरा देख रही है। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
हमीदा ने अपनी साड़ी ठीक की।
"मैं चलूँ?" उसने पूछा।
"आपको बाई कहाँ मिली थी?"
"सीढ़ी के नीचे।" उसने सीढ़ी की तरफ़ इशारा किया। "वहाँ कोई नहीं बैठता। वो बैठी थी। मैंने उसे रोटी देनी चाही, तो उसने कहा कि मेरे पास वक़्त नहीं है। और फिर मेरे हाथ में यह काग़ज़ रखकर चली गई।"
"कहाँ गई?"
"बाहर।" हमीदा ने अस्पताल के गेट की तरफ़ देखा। "मैं उसके पीछे जाने की सोच रही थी, पर मेरी टाँगें। इसलिए सीधे तुम्हारे पास आई।"
वो चली गई। हमने उसे जाते हुए देखा।
तुम सोच रहे होगे कि इतने सारे काग़ज़ और इतने सारे नाम हो गए हैं, इनका क्या करेगा ये आदमी। पर गली के काम ऐसे ही चलते हैं। पहले एक नाम आता है, फिर उस नाम के नीचे एक और नाम उभरता है, और जब तक तुम सब जोड़ते हो, तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारा अपना नाम भी उसी जोड़ में पड़ा था।
मैंने काग़ज़ ऐसे मोड़ा जैसे लोग बहुत कीमती चीज़ मोड़ते हैं, और अपनी जेब की तरफ़ देखा।
घंटी गरम थी।
इतनी गरम कि कपड़े से भी महसूस हुई।
माँ अस्पताल के नीचे वाले कमरे में थीं। मैंने काजल से कहा कि वो उनके पास रहे। मीरा को कहा कि गुमटी पर आ जाए, जब वो पन्नों की तस्वीरें उतार ले। और खुद डॉक्टर इसरानी के सामने खड़े होकर कहा,
"डॉक्टर साहब, शाम को मुझे आपके साथ गुमटी पर बैठना है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे?" उन्होंने कहा।
"आपको।"
"मैं तेरे काम का आदमी नहीं हूँ, बेटा।"
"आप रेहाना आपा के काम के आदमी हैं," मैंने कहा। "और वो मेरे काम की हैं। तो गणित ऐसे ही चलता है।"
वो कुछ कहने से पहले मुस्कुराए। फिर रुक गए, जैसे मुस्कुराने पर खुद उन्हें ताज्जुब हुआ हो।
शाम को सात बजे गुमटी की लालटेन जल रही थी और सामने वाली बेंच खाली कर दी गई थी। शबनम आपा ने यह खुद किया था। उन्होंने अपनी पुरानी बेंच पर एक मैली चादर बिछाई और चारों तरफ़ देखकर कहा,
"आज यहाँ कोई चाय नहीं पीएगा। जब कोई भी मुँह खोलना है, तो खोले। चाय पीने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है।"
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