The Mysterious Bell – Chapter 977
और शबनम आपा, जो उस वक़्त गुमटी पर अपना डिब्बा ढक रही थीं — उनके ऊपर पानी की पूरी बौछार गिरी।
डिब्बा खुला। समोसे भीगे। चटनी की कटोरी उलटी।
शबनम आपा ने पहले एक लंबी साँस ली। फिर पानी से भीगे बाल हटाए। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश यादव," उन्होंने कहा। "तूने पंप ठीक किया या बादल बन गया?"
"आपा, गलती—"
"चुप।" उन्होंने चिमटी उठाई। "ग्यारह बरस में मेरे समोसे नहीं भीगे। आज भीग गए। जा, सबको बुला। आज पूरी गली को भीगा समोसा खिलाऊँगी। बेकार तो ठहरे।"
भीड़ हँसी। ज़ोर से हँसी। उस हँसी में वो थकान भी थी जो सुबह से जमा हो रही थी, और वो राहत भी जो बाल्टी भरने से मिलती है।
मैं भी हँसा।
और मैंने तभी देखा।
पानी के साथ पाइप के भीतर से कुछ बाहर आया था।
वो मेरे पैर के पास गिरा। पानी में टन की आवाज़ हुई।
एक पट्टी।
पीतल की। धूल में लिपटी। इतनी पुरानी कि उसका रंग काला पड़ गया था। करीब एक हाथ लंबी, दो अँगल चौड़ी। एक किनारा टूटा हुआ।
मैंने उसे उठाया।
मैंने पानी से धोया।
मैंने अँगूठे से रगड़कर धूल हटाई।
और उस पर अक्षर उभरे।
अक्षर खुदे हुए थे। गहरे। उस तरह खुदे हुए जैसे कोई उन्हें मिटाना नहीं चाहता था।
ऊपर एक नाम था — शिवनारायण।
मैंने उसे पढ़ा। एक बार। फिर दोबारा। फिर उँगली उस पर फेरी।
मेरे परदादा का नाम।
मेरे घर की नींव में जिसका नाम अब तक सिर्फ़ काग़ज़ों में, पुरानी पट्टियों में, पुराने रजिस्टरों में मिल रहा था — वो नाम आज इस गली के पानी से निकलकर मेरे हाथ में आया था।
मैंने पट्टी को घुमाया।
और उसके ठीक नीचे, बड़े अक्षरों में, दूसरा नाम।
भारद्वाज।
मेरा हाथ रुक गया।
हवा रुक गई। शोर रुक गया। पानी भी जैसे एक पल के लिए रुक गया।
मैंने धीरे से पलटकर देखा।
पापा मेरे ठीक पीछे खड़े थे। उन्होंने पट्टी देखी। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"पापा," मैंने कहा। "भारद्वाज।"
वो कुछ नहीं बोले।
"पापा, ये कौन है?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। पर उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे उन्हें पता हो।
"पापा।"
"अंकुश, मैं सच कह रहा हूँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे नहीं पता। पर एक बात याद आ रही है। तेरे दादा एक दिन आए थे, बहुत गुस्से में। उन्होंने कहा था — खल्लू भाई ने आज मुझसे कहा, जगदीश, जो हमने साथ बनाया, उसका नाम हमने साथ नहीं लिखा। और दादा हँसे थे। इतना हँसा था जैसे कोई मज़ाक हो।"
"नाम साथ नहीं लिखा," मैंने दोहराया।
"हाँ। और दादा ने कहा था — भई, नाम नहीं लिखा, तो क्या हुआ? पानी तो नाम नहीं पूछता।"
मैंने पट्टी को फिर देखा।
उस पर दो नाम थे। बराबर अक्षरों में। एक ही हाथ से खुदे हुए नहीं लग रहे थे। दो अलग हाथ। दो अलग आदमियों ने एक ही पट्टी पर अपना नाम लिखा था।
और मैंने सोचा — भाई, ये कोई रणवीर का नाम नहीं है।
रणवीर के हाथ में पीतल बोलता नहीं, जलता है। रणवीर की तस्वीरों में उंगली है, मुस्कान है, कोई काम नहीं।
पर इस पट्टी पर भारद्वाज वो नाम है जो इस गली के पानी के साथ धुला है। पचास साल से।
मैंने पट्टी उठाई। माँ बाल्टी लेकर आईं — वो पहली कुछ औरतों में थीं जो आज पहली बार लाइन में थीं — और उन्होंने दूसरी बाल्टी अपने बेटे के हाथ में पकड़ा दी।
"भर," उन्होंने कहा।
मैंने पंप का हैंडल पकड़ा।
और माँ ने उस पानी को बहते देखा।
उनकी नज़र कुछ पल पानी पर रही। फिर उन्होंने बाल्टी आगे की और पानी भरा।
"यही पंप था," माँ ने धीरे से कहा।
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
"मैं इस घर में आई थी," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो नरमी आ गई जो अब से पहले कभी नहीं सुनी थी। "तो पहला पानी मैंने इसी पंप से पिया था। मेरी सास ने मेरे सिर पर पानी डाला था — जब मैं तीन दिन की बहू थी। और मुझे याद है, पंप पानी से गरम था। धूप में। और वो पानी इतना ठंडा था कि मेरी साँस रुकी गई।"
"माँ," काजल ने कहा, जो वहाँ सफ़ेद कोट में ही खड़ी थी, "आप आज पहली बार ऐसा बोलीं।"
"क्योंकि ये पंप आज से पहले चुप था," माँ ने कहा। "बीस साल से। जब से शहर का पानी आया।"
उन्होंने बाल्टी ली और पलटीं। फिर रुकीं।
"अंकुश," उन्होंने मेरे हाथ में पट्टी देखी। "वो क्या है?"
"पट्टी है," मैंने कहा। "पंप की।"
"उस पर क्या लिखा है?"
"परदादा का नाम। और दूसरा नाम — भारद्वाज।"
माँ की आँखें थोड़ी फैलीं। फिर सिकुड़ीं। फिर वो बाल्टी उठाकर चल दीं।
"माँ?"
"मुझे बहुत कुछ याद है," उन्होंने बिना पलटे कहा। "बहुत कुछ। पर अभी सिर्फ़ इतना जान ले — जिस आदमी का नाम इस पंप पर लिखा है, उसके बेटे ने आज सुबह मेरे घर का अंगूठा माँगा था।"
वो चली गईं।
मैं पट्टी लेकर वहीं खड़ा रह गया।
पानी अब भी बह रहा था। एक हल्की, लगातार धार। बच्चे बाल्टियाँ भर रहे थे। औरतें हँस रही थीं। कोई चटनी माँग रहा था। हबीब चाचा अपनी चारपाई पर बैठकर रुमाल से आँखें पोंछ रहे थे।
और मेरी जेब में घंटी थी।
मैंने उसे छुआ।
वो गरम थी। बहुत गरम।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "भारद्वाज कौन है?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
लंबी चुप्पी।
फिर उसने सिर्फ़ दो शब्द कहे।
"खून नहीं।"
मैं सन्न रह गया।
"क्या मतलब खून नहीं?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो भीगा खड़ा था, बाल माथे से चिपके हुए।
"उस्ताद," उसने कहा, "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "एक बात समझ नहीं आई।"
"क्या?"
"घंटी ने कहा — खून नहीं।"
टिंकू ने सोचा। फिर उसने कहा, "मतलब… भारद्वाज और परदादा भाई नहीं थे?"
"शायद," मैंने कहा।
"तो फिर?"
"तो फिर," मैंने पट्टी मुट्ठी में दबाई, "इसका मतलब है कि कोई अपने नाम से नहीं, अपने काम से जुड़ा था। और जब भारद्वाज नाम आता है, तो हम सबको सिर्फ़ रणवीर भारद्वाज याद आता है।"
"और कोई?"
"हो सकता है कोई और हो।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "जिसे इस गली ने भुला दिया।"
टिंकू ने पट्टी की तरफ़ देखा। फिर सड़क की तरफ़।
"उस्ताद, वो काम करता है क्या? भारद्वाज परिवार में कोई और भी?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मुझे उस्ताद की बात याद आ गई थी।
"वो जो दुकान पर हर महीने के आख़िर में आता था," मैंने खुद से कहा, "जिसके जूते चमकते थे।"
और मुझे पापा की बात याद आई — तेरे दादा कहते थे, ये आदमी अपने हाथ से कुछ ऐसा बनाता है जो पानी से भी नहीं मिटता।
पानी से नहीं मिटता।
और ये नाम — पचास साल पानी के भीतर दबा था। और आज, जब पानी टूटा, तो बाहर आया।
मैंने पट्टी जेब में रखी और घंटी को उसके ऊपर रख दिया।
और एक बात मेरे भीतर ठंडी होकर बैठ गई।
गली के हाथ में अब एक ही पानी था — यही पुराना पंप।
और उस पंप पर भारद्वाज का नाम खुदा था।
मतलब, जिस आदमी का बेटा आज हमारा पानी बंद कर रहा है, उसके पुरखों ने यहाँ पानी बनाया था। और उसी पंप से आज हम उसके बेटे से लड़ रहे थे।
ये कहानी का सबसे अजीब मोड़ था।
और मुझे लगा — जिस घर की चौखट पर मैं ताला खोलने की सोच रहा हूँ, वो शायद इसी नाम से खुलेगा।
॥
उस रात मैंने घंटी तकिये के नीचे रख दी। पहली बार।
क्यों, पता नहीं। शायद इसलिए कि वो बहुत गरम थी और मैं ठंडा होना चाहता था। या शायद इसलिए कि जब उसने "खून नहीं" कहा, तो मुझे लगा कि आज रात मुझे उसकी आवाज़ नहीं, अपनी सोच की आवाज़ सुननी है।
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