The Mysterious Bell978 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 978

7 min read November 5, 2026

रात भर छत की टंकी से पानी टपकता रहा। टप। टप। टप। और मैं छत पर पड़ा आसमान देखता रहा, जिसमें एक भी तारा नहीं था।

सुबह पाँच बजे माँ का चूल्हा जला। मैंने आँख बंद करके सुना — बर्तन पर बर्तन, फिर चम्मच, फिर ढक्कन। और फिर वो आवाज़, जो माँ किसी से नहीं, खुद से बोलती हैं।

"आटा कम है।"

मैं उठा, मुँह धोया, और दुकान का शटर उठाया। शटर उठाते वक़्त मेरी नज़र गली पर पड़ी।

और मुझे लगा कि गली ने रात में कुछ पी लिया है।

क्योंकि गली बदल गई थी।

कल शाम तक यहाँ पंप पर बच्चे चिल्ला रहे थे, औरतें हँस रही थीं, हबीब चाचा रुमाल से आँखें पोंछ रहे थे। आज सुबह वही पंप चुप था। एक औरत बाल्टी भर रही थी, पर मेरी तरफ़ देखकर उसने अपना चेहरा बाल्टी की तरफ़ कर लिया।

मैंने कहा, "सलाम, चाची।"

"हाँ," उन्होंने कहा। बस इतना। और चली गईं।

मैंने पानी का नल खोला और हाथ धोए। पानी ठंडा था, साफ़ था, बह रहा था। कल हम इसी पानी के लिए लड़े थे। आज यही पानी बह रहा था और कोई उसे देख नहीं रहा था।

तभी भोला भाई की दुकान का शटर आधा गिरा मिला।

मैंने देखा। भोला भाई अंदर बैठे थे, रेडियो खोलकर सामने रखा था, पर आवाज़ बंद थी। मैंने दरवाज़े पर खड़े होकर कहा, "भोला भाई, आज जल्दी बंद?"

वो उठे। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर नीचे देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "बुरा मत मानना।"

"क्यों मानूँगा?"

"कल से… मतलब उस नाप के बाद से, घर में बीवी डर गई है। कहती है कि जिस दुकान पर इतने काग़ज़ आ रहे हैं, उसके सामने अपनी दुकान रखेंगे तो हमारा नाम भी किसी सूची में चढ़ जाएगा।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"मैं तेरे साथ हूँ," उन्होंने जल्दी से कहा, "पर तू समझ ले, मर्द आदमी लड़ सकता है, औरत को नहीं लड़ा सकता। औरत डरती है तो पूरा घर डरता है।"

मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है, भाई," मैंने कहा। "शटर खुला रखो। मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

और मैं आगे बढ़ गया।

रास्ते में किशनलाल काका मिले, जो किराने की दुकान चलाते हैं। उम्र में बहुत बड़े, आँखें कमज़ोर, हमेशा बोरी पर बैठकर चना खाते हैं। उन्होंने मुझे देखा और चना का लोटा मुँह के पास उठा लिया, जैसे कोई शब्द निकल ही न पाए।

"काका," मैंने कहा।

"हाँ बेटा," उन्होंने कहा। "आज दाल महँगी है।"

मैं हँस पड़ा। "मुझे दाल नहीं चाहिए, काका।"

"तो फिर क्या चाहिए?"

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस गुज़र रहा था।"

वो चुप रहे। फिर जब मैं तीन कदम आगे बढ़ गया, तो उन्होंने कहा, "बेटा, दुकान पर ध्यान दे। ये काग़ज़ वालों का झगड़ा तेरे बस का नहीं है।"

मैं रुक गया।

"मेरे बस का नहीं है?" मैंने पलटकर कहा। "काका, कल आपने अपनी दुकान का काग़ज़ मुझे दिखाया था? जिस पर आपका अंगूठा है?"

वो चुप हो गए।

"वो मैंने नहीं लगाया," उन्होंने धीरे से कहा।

"तो फिर?"

"तो फिर ये बात किसी और को बताओ, मुझे नहीं," उन्होंने कहा। और अंदर चले गए।

यही सबसे अजीब था। कोई मेरा दुश्मन नहीं था। कोई मुझे गाली नहीं दे रहा था। कोई पत्थर नहीं फेंक रहा था। बस सब मेरी तरफ़ देखकर आँखें नीची कर रहे थे। और आँख नीची करना कभी-कभी पत्थर से भारी होता है।

मैं दुकान पहुँचा। पंचर वाला टब रखा, औज़ार सामने फैलाए, और बैठ गया। सुबह का पहला ग्राहक भी नहीं आया।

तभी सामने से चूड़ी वाली बाई निकलीं, जिनकी दुकान का शटर भी आधा गिरा था। उन्होंने मुझे देखा और फिर अपनी सहेली से बोलीं — धीमी आवाज़ में, पर इतनी धीमी नहीं कि मैं न सुनूँ।

"देख लेना," उन्होंने कहा। "इसी की दुकान और इसी की घंटी से सारी मुसीबत आई है। जब तक ये चीज़ें-वीज़ें लेकर बैठा रहा, तब तक ही बात बढ़ी। अब देखो, पूरी गली के अंगूठे लिए जा रहे हैं।"

मैंने अपने हाथ देखे। ग्रीस लगे हुए थे। मैंने उन्हें पोंछा नहीं।

मैंने सोचा — अगर घंटी सच में मुसीबत लाती है, तो मैं उसे आज ही उतारकर रख दूँ? रात भर के लिए तो रख दिया था। तब क्या हुआ? कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ नींद नहीं आई।

और तभी जो सबसे मारने वाली बात थी, वो आई।

लगभग आठ बजे उस्ताद अली बक्श की दुकान से होते हुए एक लड़का आया। छोटा, दुबला, स्कूल के बस्ते वाला। उसने मेरी दुकान पर एक टिफ़िन रखा।

मैंने पहचाना। वो हमारा ही टिफ़िन था।

लाल ढक्कन। कोने पर टेप का पुराना निशान। नीचे माँ ने सालों पहले कुछ लिखा था।

"ये?" मैंने कहा।

"आंटी ने नहीं दिया," लड़के ने कहा। "ये तो चाची के यहाँ से आया था। मैं सिर्फ़ पहुँचा रहा हूँ।"

"कहाँ से?"

"जहाँ से टिफ़िन जाता है," उसने कहा, और भाग गया।

मैंने ढक्कन उठाया।

दाल, दो रोटियाँ, आलू की सूखी सब्ज़ी। वैसी ही रखी थी। जैसी माँ ने सुबह भरी थी। रोटियाँ सूख चुकी थीं, सब्ज़ी में से भाप का एक भी कतरा नहीं निकला। ऊपर से कुछ भी नहीं हिला था। कोई किसी ने उँगली तक नहीं लगाई थी।

और ढक्कन खुला था। पूरा नहीं, बस दो उँगली जितना। जैसे किसी ने खोलकर देखा हो, फिर बंद किए बिना लौटा दिया हो।

मैं टिफ़िन लेकर घर गया।

माँ चूल्हे पर थीं। कड़ाही पर हाथ। मैंने टिफ़िन उनके पास रख दिया, बिना कुछ कहे।

उन्होंने देखा। ढक्कन देखा। अंदर देखा।

और फिर — मैंने सोचा था कि वो पूछेंगी, कहाँ गया, क्यों आया, किसने लौटाया। मैंने सोचा था कि वो गुस्सा करेंगी, या रोएँगी, या कम से कम हाथ रोक देंगी।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

बस बर्तन उठाया, पानी के नल के नीचे रखा, और धोने लगीं।

तड़तड़। तड़तड़। तड़तड़।

मैं वहीं खड़ा रहा।

"माँ।"

"हाँ।"

"तुमने कुछ पूछा नहीं।"

"क्या पूछूँ?" उन्होंने बिना पलटे कहा। "टिफ़िन लौट आया। मतलब जिसे भेजा था, उसने लौटा दिया। इसमें पूछने की क्या बात है?"

"कौन था?"

"जिसकी दुकान में भेजा था।"

"माँ, नाम —"

"नाम बताने से क्या होगा?" उन्होंने अब पलटकर देखा। उनके हाथ गीले थे और उनकी आँखें — मैं झूठ नहीं बोलूँगा — आँखें सूखी थीं। "अंकुश, सुबह से मैंने छह फोन उठाए हैं। पाँच औरतों ने बात की और पाँचों ने यही कहा — दीदी, बुरा मत मानना, अगले हफ़्ते से टिफ़िन बंद कर दो। मेरे यहाँ भी बच्चे हैं।"

मैं कुछ नहीं बोला।

"मैंने किसी को गाली नहीं दी," उन्होंने कहा। "किसी का नाम नहीं लिया। सिर्फ़ इतना कहा — ठीक है बहन, तुम्हारे बच्चे भी मेरे हैं।"

फिर उन्होंने बर्तन पोंछा, सुखाया, और रसोई के ताखे पर रख दिया।

"टिफ़िन का खाना फेंकना मत," उन्होंने कहा। "मैं उसी में पानी डालकर खिचड़ी बना दूँगी। खाना फेंकना पाप है। डर फेंको, खाना नहीं।"

और फिर वो फिर चूल्हे पर झुक गईं।

उस वक़्त मुझे कुछ समझ आया। माँ का डर उन लोगों से नहीं था जो टिफ़िन लौटा रहे थे। माँ का डर इस बात से था कि कहीं मैं हार मान लूँ। क्योंकि अगर मैं हार मान लूँ, तो उनके पास हारने के सिवा कुछ नहीं बचेगा।

मैंने कमरे से बाहर आकर दुकान की तरफ़ देखा। शटर खुला था। कोई ग्राहक नहीं था। और मुझे लगा कि यह शटर अब किसी के काम का नहीं।

मैं गुमटी की तरफ़ चला।

शबनम आपा का चूल्हा जल रहा था। कल उन्होंने मुफ़्त चाय का ऐलान किया था, पर आज उनके पास पाँच कप से ज़्यादा नहीं बिके थे। चिमटी हाथ में थी और आँखों में वो वाली चमक, जो किसी की बात सुनकर आती है — जैसे उन्होंने सुबह से बहुत कुछ सुना हो और अब उनका पारा चढ़ रहा हो।

मैं बेंच पर बैठ गया।

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