The Mysterious Bell – Chapter 976
गली की टंकी सूखी मिली।
वो टंकी पीपल के पीछे, ऊँचे लोहे के स्टैंड पर रखी थी। हर रोज़ सुबह नगरपालिका का पानी आता, टंकी भरती, और दोपहर तक पूरी गली उससे भरती। आज टंकी खोली गई तो भीतर से सिर्फ़ सूखी ज़ंग की गंध निकली।
पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। फिर एक औरत बाल्टी लेकर लौटी। फिर दूसरी। फिर दस।
दोपहर के दो बजे तक गली के मुँह पर चालीस औरतें खड़ी थीं, बाल्टियाँ हाथों में, सिर पर कपड़े, और हर चेहरे पर वही एक सवाल।
और तभी पीला टैंकर आया।
वो टैंकर जिस पर हर हफ़्ते गली का पानी आता था। जिसका ड्राइवर हर बार हँसकर कहता था — चाची, आपकी बाल्टी सबसे भारी है, कमर दुख जाती है मेरी।
आज वो टैंकर आया, रुका — और आगे नहीं बढ़ा।
ड्राइवर ने खिड़की से सिर निकाला। उसके होंठ हिले, पर हँसी नहीं थी।
"आज नहीं," उसने कहा।
शबनम आपा सबसे आगे थीं। चिमटी हाथ में।
"क्या मतलब आज नहीं?"
"आपा, मेरा कसूर नहीं।" उसने हाथ उठाया। "साहब के दफ़्तार से सूची आई है। जिस घर का नाम सूची में है, उसे पानी। जिसका नहीं है, उसे नहीं।"
"कौन सी सूची?"
उसने अपनी जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला, और उसे खिड़की से बाहर लटका दिया। लोग आगे बढ़े।
"ये पुराना काग़ज़ चलेगा?" किसी ने पूछा।
"नहीं चलेगा।" ड्राइवर ने साफ़ कहा। "पुराना काग़ज़ अब किसी काम का नहीं। नया चाहिए। नए काग़ज़ पर जो नाम है, उसे चार बाल्टी। जो नाम नहीं है, उसे एक बूँद नहीं।"
गली में एक आवाज़ उठी। फिर दूसरी। फिर सबकी।
भोला भाई आगे आए, हाथ जोड़कर। "भाई साहब, मेरी बीवी का ऑपरेशन हुआ है। उसे रोज़ नहाना पड़ता है। पानी नहीं होगा तो—"
"भोला भाई, मैं क्या करूँ?" ड्राइवर की आवाज़ में सच में मजबूरी थी। "ऊपर से नाम आया है। मेरे चार बच्चे हैं। मैं अपनी नौकरी नहीं जानता, पर इतना जानता हूँ — अगर आज तुम्हें पानी दे दिया, तो कल मेरे घर का चूल्हा बंद।"
"तो सूची दिखाओ," मैंने कहा।
मैं भीड़ को चीरकर आगे आया।
ड्राइवर ने मुझे देखा। उसकी नज़र मेरी जेब पर गई, फिर गले की चाबी पर, फिर मेरी आँखों पर।
"तू वही है न?" उसने कहा। "साइकिल वाला?"
"हाँ।"
"तो सुन ले।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "तेरा नाम इसमें नहीं है।"
मैंने काग़ज़ लिया।
और पढ़ते ही मेरा हाथ ठंडा हो गया।
ऊपर लिखा था — पानी की सुविधा हेतु सहमति पत्र।
नीचे भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की गोल नीली मोहर।
और उसके नीचे वही सूची, जो सुबह मैंने अपने हाथ में उलटी पकड़ी थी। वही पचास से ज़्यादा अंगूठे। वही नाम — रमेश कुमार भार्गव, भोला प्रसाद, नसीमा बी, किशनलाल। और सबसे ऊपर, सबसे ऊपर — शंकर यादव।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।
"ये काग़ज़," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में दूर लगी, "ये कोई पानी का काग़ज़ नहीं है।"
"तो क्या है?"
"ये वही काग़ज़ है जो आज सुबह अस्पताल के गेट पर नापने वाला अफ़सर लेकर आया था। इसमें पानी नहीं है। इसमें ज़मीन है।"
एक पल के लिए पूरी गली चुप हो गई।
और फिर शबनम आपा ने चिमटी उठाई।
"तो तुम पानी रोक रहे हो," उन्होंने कहा, "जमीन के लिए।"
ड्राइवर पीछे हटा।
"आपा, मैं तो—"
"तू नहीं। तेरे ऊपर वाला।" शबनम ने चिमटी नीचे की और टैंकर के पहिये पर पटक दी। टन। "पर सुन ले भाई। ये गली उस दिन नहीं मरी जिस दिन उसका पानी बंद हुआ। ये गली उस दिन मरेगी जिस दिन उसके लोग अपने ही भाई के अंगूठे को पहचानना बंद कर देंगे।"
"आपा," मैंने उनका हाथ पकड़ा, "रहने दो।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये आदमी हमारा दुश्मन नहीं है। ये भी उसी काग़ज़ में लिखा हुआ है। बस इसका नाम नीचे है, ऊपर नहीं।"
शबनम ने मेरी तरफ़ देखा। फिर टैंकर की तरफ़। फिर अपनी चिमटी उठाई और उसे कमर में खोंस लिया।
"भर दे," उन्होंने कहा।
"आपा—"
"मैंने कहा भर दे। जितना दे सकता है, दे। और साहब से जाकर कह — शबनम की गुमटी का नाम सूची से हटा। मेरा पानी मुझे नहीं चाहिए, पर मेरी गली का पानी मैं नहीं बेचूँगी।"
ड्राइवर ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने पाइप खोला।
आधा टैंकर खाली हुआ। चालीस बाल्टियाँ भरीं। पर आधा से ज़्यादा पीछे के घरों तक नहीं पहुँचा। गली की टंकी सूखी रही।
और शाम चार बजे, गली की आख़िरी उम्मीद थी — पुराना हैंडपंप।
वो पंप हबीब चाचा के आँगन के मोड़ पर था। बीस साल पुराना। एक बार उस्ताद ने उसका हत्था जोड़ा था। आज सुबह उसने पहली बार पानी दिया था। पर दोपहर होते-होते वो फिर जाम हो गया था।
और यहाँ कहानी में थोड़ी हँसी आई। भगवान जाने ऐसी हँसी क्यों आती है, पर आती है — तब, जब सबसे ज़्यादा डर लग रहा होता है।
टिंकू पंप पर चढ़ा।
उसने हैंडल पकड़ा और पूरी ताक़त से नीचे खींचा। पंप ने "घर्र" की आवाज़ की और कुछ नहीं।
उसने फिर खींचा। "घर्र।"
"तू पंप चला रहा है या उसे गला घोंट रहा है?" शबनम आपा ने कहा।
"आपा, ये चलता नहीं!"
"तो चलता कैसे है, वो सीख।" उन्होंने चिमटी उठाई। "ये पंप नहीं है, बेटा। ये इस गली का बुज़ुर्ग है। इसे ज़ोर से नहीं, आराम से चलाया जाता है। जैसे बूढ़े बाप का हाथ थामते हैं — धीरे।"
गुड्डू और चिंटू पीछे से आए और टिंकू के कंधे पर हाथ रखकर धक्का देने लगे।
"अरे, तुम दोनों पीछे से धक्का क्यों दे रहे हो?" टिंकू चिल्लाया।
"ताक़त बढ़ाने के लिए," गुड्डू ने कहा।
"तुम मेरी ताक़त हो या मेरा बोझ?"
"दोनों," चिंटू ने कहा।
भीड़ हँस पड़ी। औरतें हँसीं। बच्चे हँसे। हबीब चाचा हँसे, जो कब से खड़े देख रहे थे।
पर पंप नहीं चला।
तब मैंने अपनी रिंच निकाली।
वो जंग लगी रिंच, जिसने इस गली की कितनी साइकिलें ठीक की थीं, उस दिन उसने एक बुज़ुर्ग को ठीक किया।
मैंने पंप के ऊपरी ढक्कन के चार पेंच खोले। पेंच जाम थे। एक-एक करके खुले, और हर पेंच खुलने पर पंप से ज़ंग और ग्रीस की एक परत झड़ी।
ढक्कन उठाया।
भीतर का रबर फटा हुआ मिला। इतना फटा कि उसकी दो बोटियाँ लटक रही थीं।
"यही है," हबीब चाचा ने पीछे से कहा। "मैं कहता था, ये रबर बदलवा दो। पर कोई सुनता कहाँ था।"
"रबर कहाँ से आएगा?" टिंकू ने पूछा।
"यहाँ से," मैंने कहा।
मैंने अपनी जेब से साइकिल की पुरानी ट्यूब का एक टुकड़ा निकाला — वो जो मैंने पिछले हफ़्ते पंचर वाले टब में काटकर रखा था, सोचकर कि किसी काम आएगा।
वो काम आया।
मैंने उसे कैंची से गोल काटा, दोनों तरफ़ ग्रीस लगाई, और फटे रबर की जगह बैठा दिया। फिर ढक्कन रखा। चारों पेंच कसे। एक-एक करके, जैसे कोई पुराने दोस्त का हाथ थामता हो।
"अब धीरे," मैंने टिंकू से कहा।
टिंकू ने हैंडल पकड़ा।
और उसने खींचा।
पहला खींचा — कुछ नहीं।
दूसरा — पंप के भीतर से गड़गड़ाहट। और फिर—
फुस्स्स।
पानी आया। पर ज़ोर से नहीं। पहले एक धार, फिर दो, फिर… और फिर वो हुआ जो मैंने नहीं सोचा था।
पानी का एक तेज़ फव्वारा फूटा।
सीधा ऊपर। तीन हाथ ऊँचा। और उसमें से ऐसी बौछार पड़ी कि मैं तो गीला हुआ ही, आसपास खड़े सब नहा गए।
बच्चे चीखकर भागे।
"अरेeee!" चिंटू चिल्लाया। "पानी आ गया! पानी आ गया!"
भागने की जगह वो पंप के नीचे ही खड़ा रहा और पूरा नहा गया।
गुड्डू भागा और नाली में गिर गया।
रफ़ीक़ की चश्मा सरक गई और वो उसे पकड़ने के चक्कर में सीधा शबनम आपा की गुमटी की तरफ़ दौड़ा।
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