The Mysterious Bell – Chapter 975
"वो पट्टी तेरे परदादा ने लगाई थी," माँ ने कहा। "शिवनारायण यादव। उन्होंने इस पंप पर अपना नाम खुदवाया था, जब पंप नया था।"
"तो फिर भारद्वाज कौन है?" टिंकू ने पूछा, जो अब मेरे कंधे के ऊपर से देख रहा था।
माँ ने सिर हिलाया। "वही तो सवाल है बेटा।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा दूर खड़े थे — अपनी रिंच हाथ में लिए, जिसे सुबह उन्होंने नहीं छोड़ा था। उन्होंने पट्टी देखी और उनका हाथ रुक गया। रिंच काँपने लगी।
"ये कभी मेरे हाथ नहीं आई," वो बहुत धीरे बोले। "पर मैंने इसका ज़िक्र सुना है। बचपन में। तेरे दादा बताते थे — पंप के भीतर कुछ है, जिसे खोलना नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जिसने खोला, वो पूछता ही रह गया — भारद्वाज इसमें क्या कर रहा है?"
गली में सन्नाटा छा गया।
मैंने पट्टी को हवा में उठाया। धूप में पीतल चमका, और दोनों नाम साफ़ दिखे। शिवनारायण यादव। और उसके नीचे — भारद्वाज।
"तो भारद्वाज कौन था?" सानिया ने पूछा। "हमारा दुश्मन?"
"नहीं," पापा ने कहा। "शायद पहले दोस्त था। और बाद में कुछ हुआ।"
"क्या हुआ?"
"वही जो आज तक हो रहा है," मैंने कहा। "चीज़ें जोड़ने वाली होती हैं, और बाद में लोग उन्हें तोड़ देते हैं। दुश्मन कोई दूसरी जात का नहीं होता। पहले वही अपना होता है।"
मैंने पट्टी को अपनी कमीज़ में लपेटा और जेब में रखा। घंटी उसी जेब में थी। जब पट्टी घंटी के पास आई, तो घंटी मेरे हाथ में गरम हो गई — इतनी गरम कि मुझे जेब से निकालकर उसे हवा में लहराना पड़ा।
पर उसने कुछ नहीं कहा।
बस गरम रही।
शबनम आपा ने समोसे का डिब्बा उठाया। चार समोसे कीचड़ में गए थे, पर बाकी बचे थे। उन्होंने डिब्बे को पोंछा और मेज़ पर रखा।
"पानी निकल गया," उन्होंने कहा, "पर हिसाब निकल गया। गली को पानी मिला। काग़ज़ की जगह पंप। यही ठीक है।"
मैंने पंप की तरफ़ देखा। पानी का फव्वारा अब भी हल्का-हल्का आ रहा था। बच्चे बाल्टियाँ भर रहे थे। औरतें हँस रही थीं। मोहल्ले के पुराने पंप ने आज पहली बार बीस साल की अपनी चुप्पी तोड़ी थी — और अपने साथ एक नाम भी बाहर लाया था।
नहीं, दो नाम।
शिवनारायण। और भारद्वाज।
मेरे परदादा का नाम। और उस आदमी का नाम जो आज गली को निगलना चाहता है।
दोनों एक ही पट्टी पर।
एक ही पंप के भीतर।
एक ही पानी से धुले।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी अब भी गरम थी।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा, "ये भारद्वाज कौन है?"
घंटी ने पहली बार वो नाम सुना था। उसने मेरे हाथ में एक कंपन भेजा, जैसे कोई धीरे से सिर हिला रहा हो — पता है, पर कहूँगी नहीं।
मैंने जेब में वापस हाथ डाला और पट्टी को उँगलियों से दबाया।
टिंकू मेरे पास आया, बाल्टी हाथ में। "उस्ताद, अब?"
"अब सबको घर भेज," मैंने कहा। "और उस्ताद को बुला। उनसे पूछना है — पचास साल पहले इस पंप पर क्या हुआ था।"
"उस्ताद जानेंगे?"
"उस्ताद को अगर कोई चीज़ जाननी है, तो यही।"
टिंकू दौड़कर गया।
मैंने पट्टी फिर निकाली। धूप में उसे देखा। शिवनारायण यादव। भारद्वाज।
पापा मेरे पास आए। उन्होंने पट्टी देखी और बोले, "मुझे कुछ याद आ रहा है। बहुत धुँधला। तेरे दादा कहते थे — हमारे पुराने बाज़ार की दुकान से कोई आदमी आता था, जिसके जूते चमकते थे। हर महीने के आख़िर में। और वो एक काग़ज़ छोड़ जाता था।"
"कौन सा काग़ज़?"
"पता नहीं। पर दादा उसे दराज़ में रखते थे और कहते थे — ये काग़ज़ अभी नहीं। बाद में।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा, "क्या वो आदमी हमेशा सफ़ेद कुर्ते में आता था?"
पापा की आँखें फैल गईं।
"शायद," उन्होंने कहा। "क्यों?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ पट्टी को जेमैंने सिर्फ़ पट्टी को जेब में रख लिया और कुछ नहीं कहा।
कुछ कहता, तो क्या कहता? कि पापा, आपके परदादा का नाम एक टूटी पीतल की पट्टी पर उस आदमी के नाम के साथ खुदा है, जो आज हमारी गली को बेचने पर तुला है? ऐसी बात मुँह से निकलती है, तो हवा भी सुनकर चुप हो जाती है।
पापा ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। फिर मेरी आँखों में देखा।
"अंकुश," उन्होंने धीरे से कहा, "तेरे दादा कहते थे — खल्लू भाई।"
मैं ठिठक गया।
"कौन?"
"खल्लू भाई।" पापा ने रिंच को दूसरे हाथ में लिया, जैसे उसका वज़न अचानक बढ़ गया हो। "मुझे बहुत धुँधला याद है। मैं छोटा था। दादा की दुकान पर एक आदमी आता था। दुबला, लंबा, आस्तीन चढ़ाए। हाथ में हमेशा ग्रीस। और वो दादा को 'जगदीश भाई' कहता था।"
"खल्लू भाई," मैंने दोहराया। ज़ुबान पर नाम अजीब लगा। "उसका पूरा नाम?"
पापा ने सिर हिलाया, जैसे हिलाना चाहते हों पर याद न आ रहा हो।
"मुझे नहीं पता। बस इतना याद है कि जब वो जाता था, तो दादा दरवाज़े तक छोड़ने जाते थे। और लौटकर कहते थे — ये आदमी अपने हाथ से कुछ ऐसा बनाता है जो पानी से भी नहीं मिटता।"
"पानी से नहीं मिटता," मैंने कहा। मेरी नज़र पंप पर गई। पंप से अब भी हल्का-हल्का पानी टपक रहा था, और उस टपकन में एक लय थी। टप। टप। टप।
धूप चढ़ रही थी। बच्चों की भीड़ छँट गई थी। औरतें बाल्टियाँ लेकर अपने घर चली गई थीं। सिर्फ़ एक आदमी बचा था, जो दूर पीपल की छाया में खड़ा हमें देख रहा था — हबीब चाचा।
और तभी उस्ताद आए।
वो आए तो उनके आने की आवाज़ पहले आई — चप्पल की नहीं। उनके हाथ में कैंची थी, और कैंची के छल्ले हिल रहे थे। टिन। टिन। टिन।
टिंकू उनके पीछे-पीछे दौड़ता आया।
"उस्ताद," टिंकू ने हाँफते हुए कहा, "मैंने कहा था न, उस्ताद जानेंगे।"
उस्ताद अली बक्श मेरे सामने रुके। उनकी आँखें मेरी जेब पर टिक गईं। जैसे उन्हें पता हो कि मैंने क्या रखा है।
"निकाल," उन्होंने कहा।
मैंने पट्टी निकाली। उन्होंने कैंची अपनी कमर में खोंसी और पट्टी को अपनी हथेली पर रख लिया। उनकी उँगलियाँ उस पर फिरीं — जैसे कोई अंधा अक्षर पढ़ रहा हो।
फिर उन्होंने पट्टी को उलटा किया।
और वो चुप हो गए। इतनी देर चुप रहे कि टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, मैंने कंधा उचकाया।
"आधी है," उस्ताद ने आख़िर कहा।
"क्या?"
"ये पट्टी पूरी नहीं है।" उन्होंने मेरी तरफ़ बढ़ाई। "देख। एक किनारा सीधा है, दूसरा टूटा हुआ। जहाँ टूटा है, वहाँ दो छेद हैं — आधे।"
मैंने देखा। सच में। पट्टी के एक कोने पर दो आधे छेद थे। जैसे कोई हिस्सा टूटकर अलग हो गया हो।
"दूसरी आधी कहाँ है?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — वो हाथ जिसकी उँगलियों में चालीस साल की सुईयाँ लगी हैं — और बहुत धीरे बोले, "ये पंप किसी एक आदमी का नहीं है, अंकुश। ये दो हाथों से लगा है। और जो दो हाथों से लगे, वो एक हाथ से बंद नहीं होता।"
"किसके दो हाथ?"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। और उस नज़र में वो सब था जो वो बोल नहीं रहे थे।
"जब बताने का वक़्त आएगा," उन्होंने कहा, "तब बताऊँगा। पर पहले ये गली प्यासी न मरे। पंप ठीक कर। अभी।"
वो मुड़े और चले गए।
मैं उनके पीछे देखता रहा।
तुम सोच रहे होगे कि ये बूढ़े लोग हर बात को पहेली क्यों बना देते हैं। मैं भी सोचता था। पर उस दिन मुझे समझ आया — ये पहेली नहीं बनाते। ये सिर्फ़ उस वक़्त तक बोलना टालते हैं, जब तक बोलने से किसी का घर न टूट जाए। और यही टालना, कभी-कभी, सबसे बड़ी गलती बन जाता है।
दोपहर तक सब बदल गया।
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