The Mysterious Bell – Chapter 974
वो चुप रहा। बस अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ पीला काग़ज़ निकाला और मुझे दिखाया। उस पर मोटी मोहर थी — नीली। ऊपर कुछ लिखा था, पर मैंने पूरा नहीं पढ़ा। सिर्फ़ इतना देखा — मोहर के नीचे एक तारीख़ थी, और तारीख़ के आगे एक छोटा सा हस्ताक्षर।
"ये किसने दिया?"
"मालिक को दिया गया," उसने कहा। "कल रात। सुबह मालिक ने मुझे बोला — नया काग़ज़ आए बिना गली में पानी मत डालना।"
"तुम्हारे मालिक को किसने दिया?"
उसने कंधे उठाए। "जिसने दिया, उसका नाम नहीं पूछा जाता भाई। पैसा और काग़ज़ देता है, हम पानी देते हैं। बस।"
वो टैंकर पर चढ़ गया और गली से बाहर निकल गया। पूरी गली उसकी ओर देखती रही। किसी ने कुछ नहीं कहा।
मेरी जेब में घंटी थी। उसने कुछ नहीं कहा।
नसीमा बाई ने बाल्टी नीचे रखी। "तो अब क्या? पीने का पानी भी नहीं है।"
मैंने गली के मोड़ की तरफ़ देखा।
"पंप," मैंने कहा।
"कौन सा पंप?"
"हमारा पुराना पंप। गली के मोड़ पर।"
कुछ औरतें हँस पड़ीं। कोई बोली, "वो तो बीस साल से बंद है।"
"तो आज खोलेंगे," मैंने कहा।
गली के मोड़ पर पुराना हैंडपंप था। लोहे का शरीर, पीतल का लीवर, ऊपर गोल मुँह, नीचे पक्का घेरा। उसी पंप से पूरी गली का पानी भरता था, जब टंकी नहीं आती थी। पीपल की जड़ों से होकर उसकी पाइप जाती थी, और मैंने बचपन में देखा था कि उसका लीवर चलाने पर नीचे से पानी कैसे ऊपर आता था।
पर पिछले बीस साल से वो चुप था।
टिंकू पहले आगे आया। "उस्ताद, मैं चलाता हूँ।"
"चला," मैंने कहा।
टिंकू ने दोनों हाथ लगाए और पूरी ताक़त से हैंडल नीचे किया। हैंडल गया, फिर ऊपर आया — और वहीं अटक गया। टिंकू दोबारा ज़ोर लगाया। अटका ही रहा।
"अरे, चलता क्यों नहीं?" वो हाँफते हुए बोला।
गुड्डू पीछे से दौड़ा आया। "मैं धक्का देता हूँ।"
उसने टिंकू की पीठ पर हाथ लगाया और दोनों ने मिलकर हैंडल को धकेला। चिंटू तीसरा आया — उसने टिंकू की कमर पकड़कर पीछे खींचा। तीनों ऐसे लटके जैसे पंप से कुश्ती लड़ रहे हों।
शबनम आपा चिमटी लेकर आईं। "हटो यहाँ से। ये पंप नहीं है, यह हमारी गली का बुज़ुर्ग है। इसे आराम से चलाना सीखो।"
"आराम से?" टिंकू ने कहा। "ये तो बिल्कुल नहीं हिल रहा।"
"क्योंकि तू इसे गधे की तरह खींच रहा है," शबनम ने कहा। "बुज़ुर्गों की तरह खींच — पहले थोड़ा सा, फिर उसके बाद थोड़ा और।"
"मैंने वही किया।"
"तूने ज़ोर लगाया।"
"वही तो कर रहा हूँ।"
उन्होंने चिमटी उठाई और पंप पर हल्की सी टक-टक की। "देख, ये बोल रहा है — मुझे सहलाओ, मुझे मत खींचो।"
टिंकू हँस पड़ा। गुड्डू हँसा। सानिया, जो अब पीछे खड़ी थी, अपना मुँह छिपाकर हँस रही थी।
मैंने अपनी औज़ारों की पेटी खोली और वही जंग लगी रिंच निकाली — वही जिसे पापा ने पच्चीस साल पहले खरीदा था। मैंने पंप के ऊपर का ढक्कन देखा। चार पेंच थे, सब ज़ंग में जाम।
"टिंकू," मैंने कहा, "पानी का बर्तन पकड़। पानी आने वाला है।"
"कितना?"
"पता नहीं। कम से कम एक बाल्टी।"
बाल्टी उसने उठाई। सानिया ने कहा, "अगर ज़्यादा आए तो?"
"तो भाग जाना।"
टिंकू ने बाल्टी पकड़ी रखी। मैंने रिंच से पहला पेंच खोला। दूसरा खोला। तीसरा खोला। चौथा भी खुल गया।
ढक्कन उठाया।
अंदर पानी का पुराना रबर था — फटा हुआ। चार जगह से फटा, जैसे बूढ़े की साँस की नली काटी गई हो।
"यही रुक रहा था," मैंने कहा। "रबर फट गया है। नया चाहिए।"
"नया कहाँ से आएगा?" शबनम आपा ने पूछा। "बाज़ार जाने में घंटा भर लगेगा।"
मैंने अपने थैले में झाँका। पुराने साइकिल ट्यूब के टुकड़े पड़े थे — मैं कभी फेंकता नहीं। उनमें से एक टुकड़ा निकाला। कैंची से गोल काटा। किनारों को रेती से घिसा।
"ये टिकेगा?" टिंकू ने शक से पूछा।
"टिकेगा," मैंने कहा। "ये तुम्हारे पापा का पुराना साइकिल ट्यूब है। उनके ज़माने का रबर बेहतर था।"
टिंकू हँसने वाला था। फिर हँस नहीं पाया। उसके पापा छह महीने पहले गए थे। उसने अपना सिर नीचे कर लिया और बाल्टी को कसकर पकड़ लिया।
मैंने नया रबर बैठाया। पेंच कसे। ढक्कन बंद किया।
"अब चलाओ," मैंने कहा।
टिंकू ने हैंडल चलाया। पहले तो कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ खट-खट की आवाज़ आई। फिर पंप के भीतर से कुछ गड़गड़ाया।
"और चलाओ," मैंने कहा।
टिंकू ने ज़ोर लगाया। गुड्डू ने पीछे से धक्का दिया। शबनम ने चिमटी हवा में उठाई, जैसे कोई जादू कर रही हों।
और तभी —
पानी का तेज़ फव्वारा ऊपर फूटा।
सच कहूँ तो फव्वारा नहीं था। बम था। पंप का मुँह पहले से खुला था, और भीतर भरी हुई हवा ने पानी को इस तरह ऊपर फेंका जैसे पच्चीस साल की चुप्पी टूटी हो।
टिंकू चीखा। गुड्डू भागा। चिंटू इतना तेज़ भागा कि अपनी चप्पल छोड़ गया।
सानिया पीछे हटी — पर हँस रही थी। सारी गली हँस रही थी।
और शबनम आपा —
शबनम आपा का समोसे का डिब्बा उसी जगह रखा था। पानी का फव्वारा सीधा उस डिब्बे पर पड़ा। ढक्कन उड़ गया और चार समोसे उड़कर कीचड़ में गिर गए।
शबनम ने चिमटी उठाई। "अंकुश!"
"मैंने नहीं किया," मैंने तुरंत कहा। "पंप ने किया।"
"पंप का मालिक तेरे ही नाम पर लिखा है, यहीं तो फँसा है तू।"
पूरी गली हँस पड़ी। सुबह की भारी बातें थोड़ी देर के लिए पीछे चली गईं। औरतें बाल्टियाँ लेकर आगे आईं। पहली बाल्टी भरी। दूसरी। तीसरी। पानी ठंडा था, साफ़ था — टंकी के पानी से भी साफ़।
मैंने पानी से अपना चेहरा धोया। बीस साल बाद इस पंप का पानी मेरे हाथ पर लगा, और अजीब बात — मुझे लगा कि मैं इसे पहले कभी छू चुका हूँ। बहुत पहले।
जब फव्वारा थमा और बाल्टियाँ भरने लगीं, मैंने देखा कि पंप के मुँह के नीचे कुछ पीतल का चमक रहा है। पानी के साथ कुछ आया था — पाइप के भीतर से।
मैंने झुककर उसे उठाया।
पीतल की एक पट्टी थी। टूटी हुई। घिसी, धूल और ज़ंग में लिपटी। लंबाई में लगभग एक हाथ के बराबर। किनारे पर छोटे-छोटे छेद — शायद कभी किसी चीज़ पर कसी हुई थी।
"ये क्या है?" टिंकू ने पूछा।
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर पंप के भीतर कोई पीतल की पट्टी नहीं होती।"
"तो?"
"तो किसी ने रखी होगी। जान-बूझकर।"
मैंने अपनी कमीज़ की आस्तीन से उसे पोंछा। धूल उतरी, पर पट्टी अब भी धुँधली थी। कुछ अक्षर थे — बहुत हल्के, खुदे हुए।
टिंकू ने अपनी जेब से पानी की कुछ बूँदें उस पर डालीं। पानी से पट्टी साफ़ हुई।
और उस पर अक्षर उभर आए।
बहुत धुँधले, बहुत पुराने, खुदे हुए। जैसे किसी ने बहुत जल्दी में खुरचे हों, फिर उसे भुला दिया हो।
मैंने पट्टी को ध्यान से देखा।
पहला नाम — शिवनारायण।
दूसरा — यादव।
और उसके ठीक नीचे —
एक और नाम।
इस बार ज़्यादा साफ़, जैसे दूसरे हाथ ने खुदा हो।
भारद्वाज।
मैंने अपनी पकड़ ढीली होते महसूस की।
"माँ?" मैंने पलटकर कहा।
माँ बाल्टी लेकर खड़ी थीं। मुझे नहीं पता कब आईं। उनकी नज़र बाल्टी पर नहीं, पट्टी पर थी। वो गुमसुम थीं, और जब बोलीं, तो उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी नरमी आ गई — जैसे कोई पुराना चेहरा अचानक सामने आ गया हो।
"यही पंप था," उन्होंने कहा। "जब मैं इस घर में आई थी।"
किसी ने कुछ नहीं कहा।
"मैं जिस दिन ससुराल आई थी," माँ ने कहा, "उस दिन भी ये पंप चल रहा था। मैंने इसी से अपना पहला घड़ा भरा था। तेरे पापा ने मुझे पहली बार यहीं पानी पिलाया था — एक मटके के ढक्कन में।"
"माँ, ये —"
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