The Mysterious Bell – Chapter 965
मैं घर के अंदर गया।
पहले मैंने अपना कमरा खोला — दुकान के पीछे वाला छोटा कमरा, जिसमें मेरी चारपाई थी, लोहे की अलमारी थी, औज़ारों का ट्रंक था, और वो बल्ब था जो गुनगुनाता रहता था। मैंने अलमारी का हर दराज़ खोला। मोज़े, कपड़े, पुरानी नर्सिंग की किताबों के नीचे दबी कुछ पुरानी तस्वीरें। कुछ नहीं।
फिर मैं रसोई में गया। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके हाथ में हिसाब की कॉपी थी, पर वो उसे देख नहीं रही थीं। वो दीवार को देख रही थीं। वो दीवार जिसके पीछे वो दरवाज़ा था।
"माँ।"
"हूँ।"
"पेंच गायब है।"
उन्होंने कॉपी बंद कर दी। "कौन सा पेंच?"
"घंटी का। पीतल का। जो पापा ने कल रात मुझे दिया था।"
माँ ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी कॉपी के ऊपर हाथ रख दिया, जैसे कुछ ढक रही हों।
"चोरी नहीं हुआ," उन्होंने कहा।
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि जो चीज़ चोरी होती है, वो बेची जाती है," माँ ने कहा। "और इस घर में बाईस साल से कोई चीज़ बेची नहीं गई। सब कुछ रखा गया है। सब कुछ छिपाया गया है।"
"तो यह क्या है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो थकान थी जो उन्होंने कभी किसी को नहीं दिखाई थी।
"शायद तेरे पापा ने अपने औज़ारों में रख दिया," उन्होंने कहा। "या शायद इस घर ने उसे वापस ले लिया। इस घर की आदत है, अंकुश। यह कभी कुछ पूरा नहीं होने देता।"
"माँ—"
"मेरी बात सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक सख़्त हो गई। "जो चीज़ इस घर से गायब हुई है, वो कभी चोरी से नहीं गई। वो हमेशा किसी के हाथ से गई है। और आज भी किसी के हाथ में है। सिर्फ़ इतना जान ले कि उस हाथ का मालिक तुझसे कम नहीं जानता।"
"कौन?"
"मुझे नहीं पता," माँ ने कहा। "और यही सबसे डरावनी बात है।"
माँ ने अपने हाथ से आटे का छोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उसे गोल करने लगीं। उनके हाथ काँप रहे थे, हालाँकि वो छिपाने की कोशिश कर रही थीं।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "तेरी दवा ले ली?"
"ले लूँगी।"
"आज?"
"कल।"
"माँ।"
"अंकुश," उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज रात मेरी दवा की बात मत कर। आज रात मुझे सिर्फ़ यह जानना है कि मेरा बेटा उस कुर्सी पर बैठेगा या नहीं।"
मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर मैं झुका और उनके पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा, और उनका हाथ ठंडा था।
"बैठूँगा," मैंने कहा।
"अच्छा।"
"पर कुर्सी पर बैठकर भी सच बोलूँगा।"
माँ हँसी। बहुत धीमे से। "तो फिर कुर्सी उसकी नहीं रही," उन्होंने कहा।
मैं बाहर आया। पापा आँगन में बैठे थे, एक पुराना तख़्त जिस पर धूल जमी थी। उनके हाथ में रिंच थी और वो उसे बार-बार पलट रहे थे, जैसे उस पर कुछ ढूँढ रहे हों।
काजल दुकान के बाहर खड़ी थी और मीरा से बात कर रही थी। मीरा आई थी, कैमरा लटकाए, बाल उलझे हुए, आँखों में वो चमक जो तभी आती है जब कोई नई खबर मिलती है।
"मैंने सुना," मीरा ने कहा। "पेंच गायब है।"
"हाँ।"
"और घंटी ने पूरा कहा।"
"तूने कैसे सुना?"
"काजल ने बताया।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा। वो शर्मिंदा नहीं लग रही थी। "मीरा अब बाहर वाली नहीं है," उसने कहा। "वो हमारे घर की खबर रखती है अब।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी डायरी निकाली।
"चल, मुझे बता," उसने कहा। "आज सुबह से लेकर अब तक क्या-क्या हुआ। एक-एक बात।"
मैंने बताया। पूरा कमरा, अलमारी, ट्रंक, चौकोर जगह, माँ की बात, पापा का चेहरा। मीरा लिखती गई। कभी-कभी रुककर कुछ पूछती, कभी सिर हिलाती।
"तीन बातें साफ़ हैं," उसने कहा और डायरी बंद कर ली। "एक — पेंच ट्रंक से नहीं गया। वो कभी ट्रंक में आया ही नहीं। दो — जो चौकोर जगह है, वो पेंच से पहले से ट्रंक में थी। यानी ट्रंक में तीन चीज़ें थीं, और तीनों अलग-अलग वक़्त पर गईं। तीन — जो व्यक्ति ट्रंक तक पहुँचा, वो घर के अंदर से आया था, बाहर से नहीं।"
"तू इतना कैसे जानती है?"
"क्योंकि बाहर से आने वाला ट्रंक के ताले को नहीं छोड़ता," मीरा ने कहा। "वो ताला तोड़ता। ट्रंक के साथ सबसे पहले वही चीज़ करता। पर ताले पर कोई निशान नहीं। मतलब उसे ताला खोलने के लिए ज़ोर नहीं लगाना पड़ा। उसके पास चाबी थी, या ताला पहले से खुला था।"
"चाबी सिर्फ़ मेरे पास है," मैंने कहा।
"सिर्फ़ तेरे पास है," मीरा ने दोहराया। "या यह कहूँ कि सिर्फ़ तेरे पास बची है।"
मैंने घंटी की तरफ़ देखा। वो मेरी छाती पर लटकी थी, शांत, बिल्कुल चुप।
"मीरा," मैंने कहा। "मुझे आज रात एक काम करना है।"
"क्या?"
"पापा के कमरे में जाना है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अभी?"
"रात में।"
"क्यों?"
"क्योंकि घंटी कह रही है।"
और जैसे मैंने यह कहा, घंटी ने बहुत धीरे से, बहुत छोटी आवाज़ में कहा, "चुप्पी।"
मीरा ने सुना। उसने कोई सवाल नहीं पूछा। उसने बस अपना कैमरा उठाया और उसे बंद कर दिया।
"आज रात कैमरा नहीं," उसने कहा। "यह बात घर की है।"
शाम ढल गई। पीपल के नीचे बच्चे अपने-अपने घर चले गए। शबनम आपा ने गुमटी की चाय की केतली फिर से चढ़ाई। उस्ताद अली बक्श ने अपनी सिलाई मशीन पर एक पुराना कपड़ा रखा और उसे सिलने लगे, हालाँकि दुकान का कोई काम नहीं था। मंसूर चाचा चबूतरी पर बैठे थे, उनके सामने पीतल की थाली में चाबियाँ पड़ी थीं और उससे ठन-ठन की आवाज़ आती रहती थी, जैसे कोई पुरानी घड़ी बज रही हो।
मैंने रात का खाना नहीं खाया। माँ ने चूल्हे पर रोटी सेंकी, काजल ने मेरी थाली में दाल डाली, और दोनों मेरी तरफ़ देखती रहीं जब मैंने थाली को हाथ नहीं लगाया।
"खा ले," माँ ने कहा।
"बाद में।"
"तू कब से बाद में कह रहा है, गिनती करूँ?"
"माँ, आज रात मुझे खाली पेट ही रहना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से कहा, "यह कोई व्रत नहीं है, अंकुश। यह बात है। और बात खाली पेट नहीं होती।"
"माँ—"
"मेरी बात सुन।" उन्होंने मेरी थाली उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "जब तेरे पापा उस रात रणवीर के दफ़्तर से लौटे थे, उन्होंने भी कुछ नहीं खाया था। बाईस साल से उनका पेट भरा हुआ दिखता है, पर वो भूखा ही है। भूखे आदमी से सच नहीं बोला जाता। सच सिर्फ़ भरे पेट से बोला जाता है।"
मैंने थाली ले ली।
खाते हुए मैंने सोचा — माँ के पास हर बात का जवाब है। हर डर का तोड़ है। पर आज उनकी आँखों में वो डर था जिसका तोड़ उनके पास भी नहीं था।
रात नौ बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में आया और चारपाई के नीचे से अपनी पुरानी टॉर्च निकाली। फिर मैंने जेब से गले की चाबी निकाली — वो पुरानी चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है। वो चाबी मेरे गले में इतने साल लटकी रही थी कि उसकी धातु मेरी त्वचा से मिल गई थी, उसकी सतह पर पसीने की परत जम गई थी, और अब वो चिकनी हो गई थी, इतनी चिकनी कि उँगली फिसल जाए।
और रणवीर की दी हुई दूसरी चाबी, जो मैंने मिट्टी से उठाई थी, वो भी मेरे पास थी। छोटी, काली, घिसे दाँते वाली, जिसके छल्ले पर पीली पड़ी मोटी रस्सी बँधी थी।
मैंने दोनों चाबियाँ सामने मेज़ पर रखीं।
फिर मैं दरवाज़े से बाहर गया, आँगन पार किया, और उस दरवाज़े के सामने खड़ा हो गया जो अब खुला था — चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा। उसके भीतर अंधेरा था, पर दरवाज़े की चौखट पर दीये की पीली रोशनी अभी भी काँप रही थी।
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