The Mysterious Bell – Chapter 964
"नहीं," मैंने खुद से कहा। "ये माफ़ी नहीं है। ये माँ से यह कहना है कि वो मुझे माफ़ कर दे।"
मैंने वो लाइन काट दी।
दूसरी लाइन लिखी — "पापा, माफ़ कर दो कि मैंने तुमसे…"
फिर रुक गया।
यह भी माफ़ी नहीं थी। ये यह कहना था कि पापा मेरी ग़लती भूल जाओ, जबकि मुझे पापा की ग़लती याद थी।
मैंने वो लाइन भी काट दी।
तीसरी लाइन — "काजल, माफ़ कर दो कि मैंने तुझे…"
काट दी।
चौथी — "मीरा, माफ़ कर दो कि मैं तुझ पर…"
काट दी।
पाँचवीं — "उस्ताद, माफ़ कर दो कि…"
काट दी।
हर लाइन कट रही थी। और जब मैंने काग़ज़ को गौर से देखा, तो समझ आया कि हर कटी हुई लाइन में एक ही बात छिपी थी — मुझे माफ़ कर दो, ताकि मुझे कुछ वापस न करना पड़े।
काजल मेरे पीछे आकर खड़ी हो गई। उसने मेरे कंधे के ऊपर से काग़ज़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा।
"हूँ।"
"तू माफ़ी नहीं लिख रहा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तू सौदा लिख रहा है," उसने कहा।
मैं हँसा। पहले हल्का, फिर ज़ोर से। मेरे हँसने से गुड्डू और चिंटू भी हँसने लगे, हालाँकि उन्हें पता नहीं था कि मैं क्यों हँस रहा हूँ।
"तू सही कह रही है," मैंने कहा।
मैंने काग़ज़ दोनों हाथों से पकड़ा और फाड़ दिया।
फिर उसे और फाड़ा।
और फिर उन टुकड़ों को हवा में छोड़ दिया। टुकड़े पीपल के नीचे गिरे, पत्थर पर, और धूल में मिल गए।
"अब मैं बिना काग़ज़ के बोलूँगा," मैंने कहा।
उस्ताद दूर से देख रहे थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अपनी कॉपी बंद कर ली।
तभी पापा की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं मुड़ा।
वो आँगन की तरफ़ चल रहे थे, और उनके हाथ में एक पुरानी चीज़ थी। मैंने देखा — वो घंटी का पीतल का पेंच था, जो उन्होंने कल रात मुझे दिया था और जिसे मैं सुबह उन्हें देकर आया था, यह कहकर कि "इसे औज़ारों के ट्रंक में रख दो, मेरी जेब में गरम हो जाता है।"
पापा ने कहा, "सभा से पहले मुझे ट्रंक से पुराना औज़ार निकालना है।"
"कौन सा?"
"वो जिससे दादा साइकिल की कील ठोकते थे," पापा ने कहा।
वो आँगन में गए, और मैं उनके पीछे-पीछे गया। मुझे लगा कि पापा ट्रंक खोलेंगे और मैं उन्हें पेंच लौटा दूँगा, ताकि वो पेंच सभा तक सुरक्षित रहे।
ट्रंक का ताला खुला।
पापा ने ढक्कन उठाया।
औज़ार अंदर थे — रिंच, हथौड़ा, छेनी, पुरानी रेती, ओटन का पुर्ज़ा, धूल में लिपटी एक पेटी।
पर पेंच नहीं था।
पापा ने पहले ऊपर देखा, फिर नीचे, फिर औज़ार हटाकर देखे। उन्होंने ट्रंक को झकझोरा। धूल उड़ी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत कम सुनी थी। "पेंच कहाँ है?"
मैंने अपनी जेब टटोली। खाली।
"मैंने इसे सुबह तुम्हें दिया था," मैंने कहा। "तुमने इसे ट्रंक में रखा था ना?"
"रखा था," पापा ने कहा। "मैंने अपने हाथ से रखा था।"
हम दोनों झुककर ट्रंक के अंदर देखने लगे।
और तभी मेरी नज़र उस जगह पर पड़ी, जहाँ ट्रंक के कोने में धूल जमी थी — और उस धूल में एक साफ़ चौकोर जगह थी, जैसे किसी चीज़ को हटाकर वहाँ से कुछ उठाया गया हो।
ट्रंक का ताला सही था। कुंडी में कोई निशान नहीं। किसी ने ज़ोर लगाया नहीं।
किसी ने ट्रंक शायद खोला ही नहीं। किसी ने उसे ऐसे लिया, जैसे उसका हक़ हो।
काजल भी आ गई थी। उसने देखा और धीरे से बोली, "किसी ने चोरी नहीं की।"
"तो?" पापा ने कहा।
काजल ने ट्रंक के कोने की तरफ़ देखा, "किसी ने लिया है। जानकर। जैसे वो उसका हो।"
पापा ट्रंक के ढक्कन पर हाथ रखकर खड़े रहे, और उनका चेहरा एक पल में जैसे बीस साल और बूढ़ा हो गया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
मुझे उस पेंच की ठंडक याद आई, जो कल रात तक मेरी जेब में थी, और जो अब किसी और की जेब में है।
मेरी घंटी, जो मेरी कमीज़ के अंदर धागे से बँधी थी, अचानक एक बार बजी।
सिर्फ़ एक बार।
और उसकी आवाज़ में एक ही शब्द था।
"पूरा।"
॥
"पूरा।"
वो शब्द मेरी कमीज़ के अंदर से आया था, धागे से बँधी घंटी से, पर लगा जैसे आँगन की दीवार से टकराकर लौटा हो। पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरी छाती की तरफ़, जहाँ घंटी लटक रही थी।
"इसने क्या कहा?" पापा ने पूछा।
"पूरा," मैंने कहा।
"क्या पूरा?"
"यही तो मैं भी सोच रहा हूँ, पापा।"
काजल ने ट्रंक का ढक्कन पूरा खोल दिया और अंदर झुककर देखने लगी। उसने हथौड़ा उठाया, फिर रख दिया। छेनी उठाई, फिर रख दी। रेती उठाई और उसके ऊपर जमी ज़ंग देखकर बोली, "अंकुश, यहाँ कुछ भी नहीं है। सिर्फ़ औज़ार हैं और उन पर जमी धूल।"
"धूल में जगह है," मैंने कहा। "चौकोर।"
"हाँ, पर वो पेंच की जगह नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पेंच गोल है, काजल। गोल। उसकी जगह गोल होनी चाहिए थी। यह चौकोर है।"
काजल ने मुझे देखा। पापा ने भी।
"तो इसका मतलब?" काजल ने पूछा।
"मतलब," मैंने कहा और ट्रंक के ढक्कन को धीरे से बंद किया, "इस जगह पर पेंच नहीं था। इस जगह पर कुछ और था। कुछ जो चौकोर था।"
पापा ने अपना चश्मा उतारा और आँखें मसलीं। वो चश्मा जिसके कान पर टेप बँधा था, जो बाईस साल से उनके साथ था, जिसे उन्होंने कल रात मेज़ पर रखा था और फिर वापस पहन लिया था।
"मैंने यहाँ पेंच रखा था," पापा ने कहा। "मुझे याद है। मैंने इसे इसी कोने में रखा था, रेती के पास, ताकि यह खो न जाए।"
"पर वो जगह चौकोर है, पापा," मैंने कहा।
"तो मेरी याद गलत है," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो हार मान लेती है।
मैंने उनके कंधे पर हाथ रखा।
"नहीं," मैंने कहा। "याद गलत नहीं है। याद सही है। बस जगह गलत है।"
"मतलब?"
"मतलब, पापा, किसी ने इस ट्रंक से सिर्फ़ पेंच नहीं लिया। किसी ने ट्रंक खोलने से पहले ही पेंच निकाल लिया था। और जो चीज़ इस जगह पर थी, वो पेंच के साथ चली गई।"
पापा कुछ नहीं बोले।
काजल ने धीरे से कहा, "यानी कोई हमारे घर के अंदर है।"
आँगन में चुप्पी फैल गई। दूर पीपल के नीचे बच्चों की आवाज़ आ रही थी, कोई हँस रहा था, कोई कुछ चिल्ला रहा था, पर हमारे आँगन में सिर्फ़ चूल्हे की बची हुई आग की धीमी फुसफुसाहट थी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उनका चेहरा ऐसा था जैसे कोई पुरानी दीवार अचानक झुक गई हो।
"पापा," मैंने कहा। "घर में कितने दरवाज़े हैं जो बंद हैं?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लगता है कि हम बहुत दिनों से एक ही दरवाज़े के बारे में बात कर रहे हैं, और घर में एक से ज़्यादा बंद दरवाज़े हैं।"
पापा ने कुछ सोचा। फिर बोले, "तीन।"
"तीन?"
"चूल्हे के पीछे वाला एक। दादा की अलमारी के पीछे वाला, जिसमें लकड़ी का डिब्बा रखा है। और तीसरा…"
वो रुक गए।
"तीसरा?" मैंने पूछा।
"तीसरा तेरी माँ की ब्याहता की संदूकची है," पापा ने कहा। "वो मेरे कमरे के कोने में रखी है, रस्सी बँधी हुई। मैंने उसे कभी नहीं खोला। तेरी माँ ने कहा था कि उसे छूना मत।"
"आज रात छूना पड़ेगा," मैंने कहा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुझे पहले नहीं दिखा था। डर। पर वो डर मेरे गुस्से का नहीं था। वो डर उस चीज़ का था जो उन्हें भीतर से खा रही थी। शायद वो जानते थे कि उस संदूकची में क्या है। शायद वो जानते थे कि मैं ढूँढ लूँगा। और वो यही नहीं चाहते थे कि मैं ढूँढूँ।
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