The Mysterious Bell – Chapter 963
मुझे याद आया। वो पेंसिल मेरी दुकान की मेज़ पर पड़ी थी, और उस पर मेरे दाँतों के निशान थे।
"मैंने नहीं लौटाई," मैंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे लगा तेरे पास और हैं।"
हँसी फूट पड़ी। टिंकू ने अपनी भौंहें चढ़ाईं, "उस्ताद, ये माफ़ी नहीं हुई।"
"कल लौटा दूँगा," मैंने कहा।
"कल नहीं, अभी," टिंकू ने कहा, और अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।
मैंने जेब से पेंसिल निकाली, और उसे दिया। टिंकू ने पेंसिल अपनी कमीज़ की जेब में रखी, और ऐसे बैठा जैसे उसने कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो।
फिर एक पल ऐसा आया जब चबूतरी पर हँसी रुक गई।
टिंकू खड़ा हुआ। उसका चम्मच उसके हाथ में था, पर उसकी पकड़ ढीली थी।
"मेरा सवाल है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो अभी थी। "किसने आख़िरी समोसा नहीं खाया, और घर ले गया?"
चबूतरी पर चुप्पी छा गई।
चिंटू ने कुछ कहना चाहा, पर सानिया ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"मैंने," टिंकू ने कहा। "मैंने आख़िरी समोसा नहीं खाया। मैंने उसे काग़ज़ में लपेटा और घर ले गया।"
"क्यों?" काजल ने पूछा, धीरे से।
"क्योंकि माँ ने तीन महीने से समोसा नहीं खाया," टिंकू ने कहा। "वो कहती है कि बाहर का खाना महँगा है।"
उसने चम्मच नीचे रखा।
"मैंने चुराया नहीं था," उसने कहा। "मैंने शबनम आपा को पैसे देने की सोची थी, पर मेरे पास पूरे पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने सोचा कि चुपचाप ले जाऊँगा, और कल दे दूँगा।"
उसकी आवाज़ टूट गई।
"पर कल तक मैं दे नहीं पाया।"
शबनम आपा की आवाज़ गुमटी से आई — क्योंकि वो अपनी गुमटी से सब सुन रही थीं, और अब चबूतरी की तरफ़ आ रही थीं।
"टिंकू," उन्होंने कहा।
टिंकू ने सिर नीचा कर लिया।
शबनम आपा उसके सामने आकर खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी पकड़े। उनका चेहरा कड़ा था। पर उनकी आवाज़ नहीं।
"तूने मुझसे कहा होता," उन्होंने कहा, "तो मैं तुझे मुफ़्त दे देती।"
टिंकू ने सिर उठाया।
"पर तूने चुपचाप लिया," शबनम आपा ने कहा। "और चुपचाप लेने से चोरी हो जाती है। चाहे तेरी नीयत कितनी भी साफ़ हो।"
टिंकू ने सिर हिलाया।
"अब बता," शबनम आपा ने कहा, "तेरे पास कितने पैसे हैं?"
टिंकू ने जेब से दो सिक्के निकाले।
शबनम आपा ने उन्हें देखा, और फिर अपनी चिमटी मेज़ पर रख दी — वो चिमटी जो कभी नीचे नहीं रखती थीं।
"कल से तू मेरी गुमटी पर काम करेगा," उन्होंने कहा। "दो घंटे। चाय के पैसे काटकर बाकी तुझे मिलेंगे। और समोसा तू अपनी माँ के लिए ले जा सकता है — पर बताकर।"
टिंकू ने उनका हाथ पकड़ लिया। शबनम आपा ने हाथ नहीं छुड़ाया। बस एक पल के लिए उनका चेहरा नरम पड़ गया, और फिर वो फिर से कड़ा हो गया, जैसे उन्होंने खुद को संभाल लिया हो।
"अब बहुत हुआ," उन्होंने कहा, और चबूतरी की तरफ़ मुड़ीं। "मेरी गुमटी में सच की परीक्षा नहीं होगी।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरी गुमटी में हिसाब की परीक्षा होगी," उन्होंने कहा, और अपनी कॉपी निकाली — वो मोटी कॉपी जिसमें गली के हर आदमी का उधार लिखा था। "कौन कितनी चाय पीकर भूल गया, ये सच है। और ये सच आज निपटेगा।"
कॉपी खुली, और गली हँस पड़ी।
"रमेश भाई," शबनम आपा ने पढ़ा, "तीन महीने की चाय — पूरे बयालीस रुपये।"
रमेश भाई ने अपना सिर खुजाया, "आपा, उसमें दो चाय मेरे साले की थीं।"
"तेरे साले ने भी चाय पी थी, और चाय पीने के बाद वो तेरा साला ही रहा," शबनम आपा ने कहा। "पैसे तेरे।"
हँसी की आवाज़ पीपल की डालियों तक गई।
"और भोला भाई," शबनम आपा ने कहा, "तेरे अठारह रुपये।"
भोला भाई ने जेब से पैसे निकाले और मेज़ पर रख दिए, "आपा, मैं तो रोज़ देता हूँ।"
"रोज़ नहीं देता," शबनम आपा ने कहा। "रोज़ देने वाला कॉपी में नहीं लिखा जाता।"
मैं हँसते-हँसते थक गया था, पर मेरे अंदर एक बात चल रही थी।
शबनम आपा सच की परीक्षा से बच नहीं रही थीं। वो सच की परीक्षा को हिसाब में बदल रही थीं, क्योंकि जिस चीज़ का हिसाब होता है, वो छिपती नहीं।
तभी चबूतरी की तरफ़ मंसूर चाचा आए।
वो धीरे चलते थे, लाठी के सहारे, और उनके हाथ में कपड़े में लिपटी कोई चीज़ थी। उन्होंने सीधे चबूतरी के बीच आकर वो कपड़ा खोला, और उसके अंदर से वो पुराना ताला निकाला, जिसे मैंने कल रात तक देखा था।
ताला पत्थर पर रखते ही एक अजीब सी बात हुई।
जिन लोगों ने उसे छुआ, उन्होंने अपने हाथ पीछे खींच लिए।
"ये ताला गरम है," काजल ने कहा।
"नहीं," मंसूर चाचा ने कहा। "ये ताला अभी ठंडा है।"
उन्होंने अपनी हथेली ताले पर रखी।
"जब बनाया था, तब ये गरम था," उन्होंने कहा। "अब ठंडा हो गया है।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि इसने बहुत झूठी माफ़ी सुनी है," मंसूर चाचा ने कहा। "हर झूठी माफ़ी इसके अंदर एक ठंडक छोड़ जाती है। और सच्ची माफ़ी इसे गरम करती है।"
उन्होंने ताला उठाया और चबूतरी के बीच रख दिया।
"आज सभा में कोई नाटक नहीं चलेगा," उन्होंने कहा। "जो सच्ची माफ़ी बोलेगा, ताला गरम होगा। जो झूठ बोलेगा, ताला ठंडा रहेगा। और तुम सब देख लेना।"
टिंकू ने सवाल किया, "चाचा, ताला ठंडा होगा तो क्या होगा?"
मंसूर चाचा ने उसकी तरफ़ देखा।
"कुछ नहीं होगा," उन्होंने कहा। "बस ताला खुलेगा नहीं। और जो अंदर बंद है, वो अंदर ही रहेगा।"
फिर उन्होंने एक पल रुककर कहा, "और वो अंदर वाला कभी नहीं बताएगा कि उसने क्या देखा।"
चिंटू ने हाथ उठाया, "चाचा, एक बार ट्रायल कर लें?"
"ट्रायल?"
"मैं रफ़ीक़ से झूठी माफ़ी माँगता हूँ, और देखते हैं ताला ठंडा होता है या नहीं।"
मंसूर चाचा ने कुछ सोचा, फिर सिर हिलाया।
चिंटू रफ़ीक़ के सामने गया, और एक नाटकीय अंदाज़ में बोला, "रफ़ीक़ भाई, माफ़ कर दो। तेरा चश्मा मैंने नहीं तोड़ा, पर माफ़ कर दो।"
चबूतरी पर हँसी आई।
पर मंसूर चाचा ने हाथ उठाया, "रुको।"
सब रुक गए।
उन्होंने ताला उठाया और उसे चिंटू की हथेली पर रख दिया।
ताला ठंडा था। बर्फ जैसा ठंडा।
चिंटू की हँसी होंठों पर ही रुक गई।
"इसने झूठ सुना है," मंसूर चाचा ने कहा। "तुम सबने सुना — इसमें झूठ था?"
चिंटू ने गर्दन हिलाई।
"इसमें माफ़ी नहीं थी," मंसूर चाचा ने कहा। "इसमें यह था कि मैंने किया भी नहीं, फिर भी माफ़ कर दो। और जब माफ़ी से पहले अपना बचाव होता है, तो माफ़ी कभी सच्ची नहीं होती।"
उन्होंने ताला वापस रख दिया।
"अब याद रखना," उन्होंने कहा। "कल सभा में जो भी बोलेगा, ये ताला सुन रहा होगा।"
मैंने चुपचाप उस्ताद की लाल जिल्द वाली कॉपी खोली, और उसमें क्रम लिखने के लिए अंतिम पन्ना ढूँढा। पन्ना खाली था, सिर्फ़ ऊपर कोने में एक पुरानी लकीर थी।
मैंने उस्ताद से पूछा, "इसमें लिखूँ?"
"लिख," उन्होंने कहा। "पर लिखने से पहले सोच। जो सभा के क्रम में लिखा जाता है, वो सभा के बाद सबको याद रहता है।"
मैंने कलम उठाई।
फिर मैंने कलम रख दी।
क्योंकि तभी मुझे एहसास हुआ कि मुझे सिर्फ़ क्रम नहीं लिखना है। मुझे ये भी लिखना है कि मैं अपनी बारी में क्या बोलूँगा।
और मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
मैं उठा और गली के किनारे वाली पुरानी पटिया पर बैठ गया। सूरज ढल रहा था। पीपल की छाया लंबी हो रही थी।
मैंने जेब से काग़ज़ निकाला, और उस पर लिखने लगा।
"माँ, माफ़ कर दो कि मैंने तुम्हारी दवा के पैसे…"
मैंने कलम रोकी।
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