The Mysterious Bell – Chapter 966
मैंने टॉर्च जलाई और भीतर गया। कमरा छोटा था, छत नीची, दीवारों पर पुराना प्लास्टर उखड़ा हुआ। फ़र्श पर धूल थी, और उस धूल में वो लाइन अभी भी बनी थी जो किसी ने उँगली से लिखी थी — जो बंद करता है, वो आज खुद खुलेगा।
मैंने टॉर्च की रोशनी दीवार पर घुमाई। वो ताखा जहाँ पीतल का काँटा टँगा था, अब भी खाली था। मैंने कमरे की हर दरार देखी, हर कोना, हर ईंट। कुछ नहीं।
फिर मैं वापस आँगन में आया और उस दरवाज़े को बंद करके उस पर लगे पुराने ताले को देखने लगा।
ताला बड़ा था, ज़ंग लगा, पर उसकी कुंडी चिकनी थी, जैसे हाल में किसी ने उसे छुआ हो।
मैंने गले की चाबी ताले में डाली। चाबी घूमी, पर ताला नहीं खुला। फिर मैंने रणवीर वाली चाबी डाली। वो भी नहीं मिली। ताले का छेद दोनों से बड़ा था, या दोनों से छोटा।
मैंने दोनों चाबियाँ हाथ में लेकर ताले को दोनों तरफ़ से देखा।
तभी मुझे एहसास हुआ। ताला गरम था। नहीं, गरम नहीं — गुनगुना। जैसे किसी ने अभी अभी उसे हाथ में पकड़ा हो।
मैंने घंटी की तरफ़ देखा।
घंटी ने बहुत धीरे से कहा, "चाबी नहीं।"
"तो क्या?"
"चुप्पी।"
"किसकी चुप्पी?"
"तेरे पापा की।"
मैंने चाबियाँ जेब में रखीं और कुछ देर वहीं खड़ा रहा। पीछे माँ के कमरे की बत्ती जल रही थी और उसकी रोशनी आँगन में पड़ रही थी। दूर पीपल के नीचे तपेरी अभी भी जल रही थी, उसकी पीली लौ हवा में काँप रही थी, और उसी लौ में मुझे पूरी गली दिख रही थी — पीपल, चबूतरी, उस्ताद की बंद दुकान, शबनम आपा की गुमटी जिसकी एक लालटेन अभी भी जल रही थी।
मैंने घंटी से पूछा, "आज रात पापा के कमरे में जाना है?"
"हाँ।"
"कब?"
"जब वो सोएँ, तब नहीं," घंटी ने कहा। "जब वो जाग रहे हों, तभी।"
"अगर वो सो रहे हों तो?"
"तो उन्हें जगा।"
"और अगर वो जगना न चाहें?"
घंटी ने इस बार कुछ नहीं कहा। बस एक बार हल्की सी बजी, जैसे कोई सिर हिला रहा हो।
मैं अपने कमरे में लौटा और चारपाई पर बैठ गया। बाहर आँगन में कुछ हलचल हुई। मैंने देखा — पापा आँगन में आए, उनके हाथ में एक लोटा था, उन्होंने पानी पिया और फिर कुछ देर आसमान की तरफ़ देखते रहे। फिर वो अपने कमरे की तरफ़ गए, पर दरवाज़े पर रुक गए। उन्होंने एक बार मेरे कमरे की तरफ़ देखा। मैंने आँख बंद कर ली, जैसे सो रहा हूँ। वो अंदर चले गए और दरवाज़ा बंद कर दिया — पूरा नहीं, आधा।
मैं एक घंटे तक जागता रहा। घड़ी नहीं थी, पर मैंने बाहर तपेरी की लौ कम होते देखी, फिर बुझते देखी। पीपल की पत्तियों की आवाज़ धीमी होती गई। गली की आख़िरी लालटेन भी बुझ गई।
फिर मैं उठा। मैंने कपड़े नहीं बदले। मैंने सिर्फ़ पानी पिया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
पापा के कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था, जैसे मैंने सोचा था। भीतर बत्ती जल रही थी — एक छोटी पीली बत्ती, जिसकी रोशनी में पापा का चेहरा उभर रहा था।
मैं रुका और अंदर झाँका।
पापा जाग रहे थे। चारपाई पर बैठे थे, पीठ दीवार से टिकाए हुए, और उनके दोनों हाथों में कुछ था।
पेंच। वो पीतल का पेंच, जो ट्रंक से गायब था।
मैंने उसे पहचान लिया। उसकी सतह पर वही हल्की ज़ंग थी जो पापा ने कल रात दिखाई थी, और उसका कोना वही तेल से चिकना था जो मैंने उसे दिया था।
मैं कुछ देर दरवाज़े पर खड़ा रहा। मेरी साँस धीमी हो गई थी।
फिर मैंने दरवाज़े पर धीरे से दस्तक दी।
पापा ने सिर उठाया। उन्होंने मुझे देखा, और उनके हाथों में पेंच काँपा। उन्होंने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने बस उसे अपनी हथेली में बंद कर लिया और कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
"आ जा," उन्होंने कहा।
मैं अंदर गया। कमरे में सीलन और धूप और पुराने काग़ज़ों की गंध थी। कोने में वो संदूकची रखी थी, रस्सी बँधी हुई, और उस पर धूल की मोटी परत थी। पापा के पास रखी मेज़ पर पीली जिल्द वाली फाइल पड़ी थी और उसके ऊपर रखी थी उनकी पुरानी रिंच।
मैं चारपाई के किनारे पर बैठ गया। पापा ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने अपनी हथेली खोली और पेंच को उस पर रख दिया।
"मैं इसे तुझे लौटाने आया था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, इतनी धीमी कि जैसे वो अपने ही कानों तक न पहुँच रही हो। "आज सुबह, तू गया था तब मैंने सोचा — इसे ट्रंक में रख दूँगा। फिर तू दुकान पर आया और मैंने ट्रंक खोला। और…"
वो रुके।
"और?" मैंने धीरे से कहा।
"और मैंने इसे ट्रंक में रखने के बजाय जेब में रख लिया," पापा ने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि डर लगा।"
"किस बात का डर?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, और उनके चश्मे के काँच पर बत्ती की रोशनी पड़ रही थी।
"मुझे लगा कि अगर यह ट्रंक में रहेगा, तो कोई इसे ले जाएगा," उन्होंने कहा। "और अगर मैं इसे अपने पास रखूँगा, तो कोई इसे मुझसे नहीं ले जाएगा।"
"तो फिर ट्रंक से गायब क्या हुआ, पापा?"
पापा ने धीरे से सिर हिलाया।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर वो चौकोर जगह… मैंने उसे देखा। मुझे याद आया कि मैंने वहाँ कुछ और रखा था। बहुत पहले।"
"क्या रखा था?"
"एक डिब्बा," पापा ने कहा। "पीतल का छोटा डिब्बा, जिसमें दादा के कुछ काग़ज़ रखे थे। पर मुझे उसका रास्ता याद नहीं। मुझे सिर्फ़ यह याद है कि वो वहाँ था। और फिर नहीं था। और मैंने कभी पूछा भी नहीं।"
"कब से?"
पापा ने कुछ देर सोचा। "बाईस साल से ज़्यादा," उन्होंने कहा।
हम दोनों चुप हो गए। बत्ती की लौ काँप रही थी और उसकी परछाईं दीवार पर ऊँची-नीची हो रही थी।
"पापा," मैंने कहा। "आज मैं गुस्सा करने नहीं आया।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं आज सिर्फ़ सच चाहता हूँ।"
पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने उसे छिपाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पेंच को मेरी तरफ़ बढ़ा दिया और मैंने उसे हाथ में लिया। वो अब गरम नहीं था। वो पापा के हाथों की गरमाहट लिए हुए ठंडा हो रहा था, जैसे किसी पुरानी पकड़ से आख़िरी बार निकल रहा हो।
"मुझे बोलने में डर लगता है," पापा ने कहा।
"किससे?"
"तुझसे।"
"मुझसे?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ टूट गई।
"मुझे सबसे ज़्यादा डर इस बात का है," उन्होंने कहा, "कि तू मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा।"
वो शब्द कमरे में गिरे और मैंने उन्हें सुना। मैंने उन्हें बहुत देर तक सुना। और मैं कुछ नहीं बोला। मैं सिर्फ़ पेंच को अपनी हथेली में पकड़े बैठा रहा, और मेरी छाती पर लटकी घंटी, पहली बार, बिल्कुल चुप रही।
बिल्कुल चुप।
॥
पापा के शब्द हवा में लटके रहे, और मैं उन्हें सुनता रहा।
कमरे में बत्ती की लौ धीमी थी। दीवार पर परछाइयाँ ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई बूढ़ा आदमी सिर हिला रहा हो। बाहर गली से किसी साइकिल की घंटी आई, दूर, किसी और की। फिर चूल्हे की आँच की धीमी फुहार। फिर सन्नाटा।
मैंने पेंच को हथेली में दबाया। वो पापा की गरमाहट से छूटकर अब मेरे हाथ में ठंडा हो रहा था। मैंने उसे देखा। पीतल, हल्की ज़ंग, घिसा हुआ कोना। ये वही पेंच था जो घंटी के अंदर बैठा था। ये वही पेंच था जिसे पापा ने डर के मारे अपनी जेब में छिपा लिया था।
"माफ़ करना," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी। "मैं जानता हूँ, ये बात कहने से कुछ ठीक नहीं होता।"
मैंने सिर उठाया।
"नहीं होता," मैंने कहा।
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