The Mysterious Bell – Chapter 957
मैं क़रीब गया और लालटेन उठाई। उसकी पीली रोशनी में वो ताला दिखा — साधारण, पुराना, काला। पर अब उस पर ज़ंग की एक नई पतली लकीर बन गई थी, जैसे किसी ने उसे अंदर से जकड़ दिया हो।
"ये क्या हुआ?" मैंने कहा।
पापा ने हाथ नहीं हटाया। ताले पर रखा रहा।
"तुम्हारी चुप्पी," मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से गरम थी। "ये ताला कस रही है। आप जानते हैं, पापा? यही वो बात है जो मैं कह रहा था। आपकी चुप्पी बाईस साल से इस घर में कुछ न कुछ कस रही है। पहले घर के दरवाज़े। अब संदूक का ताला। मुझे माफ़ कीजिए, पर मैं ये नहीं मान सकता कि ये सब इत्तेफ़ाक़ है।"
पापा ने हाथ हटाया।
और वो पलटे।
मैंने उनके चेहरे पर वो देखा जो मैंने कभी नहीं देखा — थकान। बस थकान। वो थकान जो नींद से नहीं जाती।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"मैंने ताला नहीं कसा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"ताले ने तुम्हारी बात सुनी," उन्होंने कहा। "मेरी नहीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
पीछे से माँ की बैसाखी की आवाज़ आई — टक, टक, टक। वो भी आ गईं। काजल भी। मीरा भी, दरवाज़े पर।
कमरा छोटा था। पाँच लोग अंदर आए, तो घुटन भर गई।
मीरा ने लालटेन उठाई और ताले पर रखी। फिर कुछ देर देखती रही।
"ये नहीं खुलेगा," उसने कहा।
"पता है," मैंने कहा।
"नहीं, तुम नहीं समझे," उसने कहा और मेरी तरफ़ पलटी। "तुम जो अभी कर रहे हो — पापा की चुप्पी पर गुस्सा— वो ताले को और कस रहा है। तुम्हारा गुस्सा सही है, अंकुश, मैं तुम्हारी तरफ़ हूँ। पर ताला गुस्से की जगह नहीं सुनता। वो सिर्फ़ एक चीज़ सुनता है — और वो तुम्हारी खोई हुई आवाज़ है।"
"तो फिर मैं कहाँ से लाऊँ उसे?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटने लगी थी। "बताओ कहाँ से? पूरी गली खोद डाली। मंसूर चाचा का ताला खोला, थैला खोला, पुराने बाज़ार की धूल खोदी, भारद्वाज भवन के पीछे लोहे की सीढ़ी चढ़ा, रणवीर के सामने खड़ा हुआ, पापा के सामने बैठा… और आवाज़? आवाज़ कहीं नहीं है। मेरे अंदर एक जगह है जहाँ बोलते वक़्त कुछ निकलता है, पर वो मेरा नहीं है, माँ! वो किसी और की आवाज़ है, किसी और के गले की है, और मैं उसी से अपना काम चला रहा हूँ!"
मैंने दीवार पर हाथ मारा।
माँ चौंकीं।
मैं तुरंत पलटा।
"माफ़ करो, माँ। मेरा मतलब—"
"जानती हूँ," उन्होंने कहा।
और अचानक मेरे अंदर कुछ टूटा। सच में टूटा। किसी शोर से नहीं, किसी आवाज़ से नहीं। बस एक ऐसी जगह से टूटा जहाँ मैंने कभी हाथ नहीं लगाया था।
मैं उसी तरह दीवार के सहारे सरककर बैठ गया। फ़र्श पर।
"मुझसे नहीं हो रहा," मैंने कहा।
कमरे में चुप्पी।
"मुझसे नहीं हो रहा, माँ। पाँच बजे भवन है। सभा है। सील है। मशीन है। चाबियाँ हैं, ताले हैं, काग़ज़ हैं। स्कूल है, अस्पताल है, गुमटी है। रणवीर है। और मेरे पास कुछ नहीं है। मेरे पास एक घंटी है जो मुझे भरोसा दिलाती है और मैं ही उस पर भरोसा नहीं कर पा रहा। मेरे पास एक ताला है जो मेरे घर में बंद है और मैं उसे खोल नहीं पा रहा। मेरे पास पापा हैं और मैं उनसे एक सीधी बात नहीं पूछ पा रहा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने सोचा था मैं अकेले सब ठीक कर लूँगा। और अब सब सामने है, और मैं— मैं खुद ही टूटा हुआ हूँ।"
बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर मैंने कुछ सुना।
किसी के घुटने फ़र्श पर टिकने की आवाज़।
मैंने आँखें खोलीं।
पापा मेरे सामने बैठ गए थे। फ़र्श पर। वैसे ही, जैसे मैं बैठा था। दोनों हाथ घुटनों पर। पीठ दीवार से।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस बैठे रहे।
माँ एक तरफ़ खड़ी रहीं। काजल ने मुँह दोनों हाथों से ढक लिया। मीरा ने लालटेन नीचे रख दी और उसकी रोशनी अब हमारे बीच फ़र्श पर फैली थी।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पापा, आप चश्मा लगा लीजिए।"
"नहीं," उन्होंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि अभी मुझे तुम्हारा चेहरा धुँधला देखना है। अगर साफ़ देख लिया तो मुझे याद आ जाएगा कि मैं तुम्हारा बाप हूँ, और बाप होने का घमंड वापस आ जाएगा।"
मैंने कुछ कहने की कोशिश की। नहीं निकला।
"मैं तुमसे कुछ कहूँ?" उन्होंने पूछा।
"कहिए।"
"तू सच बोलता है," पापा ने कहा।
मैंने सिर उठाया।
"आज तक तूने जो कहा, सब सच था। इतना सच कि कमरे का बल्ब भी उसे सह न सका, तभी तो दरवाज़ा बंद करना पड़ा। पर अंकुश—"
वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, बिना चश्मे के, धुँधला-धुँधला, पर सीधा।
"तू सही बोलता है, पर सच बोलने का तरीक़ा अभी नहीं सीखा।"
मेरे अंदर ताला फिर क्लिक हुआ।
मैंने पीछे की तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी में संदूक का ताला अब और कसा हुआ दिख रहा था — ज़ंग की वो पतली लकीर अब मोटी हो गई थी, जैसे रात के अंदर कोई दूसरी रात भी आ गई हो।
काजल ने रोना बंद कर दिया।
मीरा ने कुछ लिखने के लिए अपनी कॉपी निकाली, फिर रोक दी।
और मैं वहीं बैठा रहा। पापा के सामने। फ़र्श पर।
बाहर पीपल पर एक कौवा बोला।
और फिर मैंने देखा — दीवार पर टँगी उस पुरानी घड़ी की सुई, जो बंद पड़ी थी, एक बार हिली।
बस एक बार।
फिर रुक गई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ पीतल की छोटी घंटी थी, काजल के धागे से बँधी। धागा गरम था।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा।
कोई आवाज़ नहीं आई।
"घंटी, तू बोल क्यों नहीं रही?"
फिर आई। इतनी धीमी कि जैसे किसी ने कमरे की दूसरी तरफ़ से फुसफुसाया हो।
"क्योंकि तूने सवाल पूछा और जवाब सुना नहीं।"
मैं सीधा हो गया।
"क्या?"
"सुना नहीं," घंटी ने कहा। "पापा ने जवाब दे दिया था। तूने उसे बदल दिया।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो मेरी तरफ़ देख रहे थे।
"मैंने क्या दिया था, अंकुश?" उन्होंने पूछा।
मैंने सोचा।
"आपने कहा था… डर बोलता नहीं, गला घोंट देता है।"
"और तूने क्या किया?"
"मैंने… मैंने कहा कि आपकी चुप्पी ने मुझे अंधेरे में रखा।"
"हाँ," पापा ने कहा। "और वो भी सच था। पर उस सच में मेरी बात शामिल नहीं थी। तूने अपनी बात कही, मेरी बात सुनी नहीं। सच बोलना यही नहीं होता कि जो ज़ख़्म तुम्हारे हैं वो बता दो। सच बोलना यह भी है कि सामने वाले का ज़ख़्म सुन सको, बिना उसे अपने ज़ख़्म से दबा दिए।"
मैं चुप हो गया।
माँ ने मेरी तरफ़ देखकर धीरे से सिर हिलाया। जैसे कह रही हों — अब समझा?
"तो फिर," मैंने कहा, आवाज़ भारी। "अब क्या करूँ?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब तू वो कर," उन्होंने कहा, "जो मैं बाईस साल से नहीं कर पाया। तू पूछ। और मैं जवाब दूँगा। सच में दूँगा। बिना मोड़-तोड़।"
मैंने साँस ली।
कमरे में हवा भारी थी, पर कुछ थी भी।
"पापा," मैंने कहा। "वो अंगूठा आपने लगाया। ठीक है। पर उस रात कोई तीसरा आदमी था क्या? कोई जिसने आपको वहाँ बुलाया हो?"
पापा की आँखें एक पल के लिए ऊपर उठीं।
वो कुछ कहने ही वाले थे कि बाहर गली से आवाज़ आई।
पैरों की तेज़ आवाज़। एक बच्चे की, एक औरत की।
दरवाज़े पर टिंकू दिखा। हाँफता हुआ। साथ में सानिया, और उसके पीछे सानिया की माँ, चप्पल पहनते हुए।
"उस्ताद!" टिंकू फ़र्श पर गिरा-सा, आधा खड़ा। "उस्ताद, चूल्हे के पीछे वाला दरवाज़ा… वो खुला है!"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"क्या?"
"खुला है, उस्ताद! रास्ते में एक लाइन बनी है, धूल में — माँ ने देखा—"
सानिया की माँ ने अपनी साड़ी सीधी की और कहा, "जब मैं पीछे के नल से पानी लेने गई थी, तो दरवाज़े के नीचे से पीली रोशनी आ रही थी। पर अंदर कोई नहीं है। दीये की रोशनी है। जलता हुआ दीया।"
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