The Mysterious Bell – Chapter 958
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो उठे। उन्होंने चश्मा उठाया और टेप से कान पर बाँधा, हाथ काँपते हुए, पर बाँधा।
"चलो," उन्होंने कहा।
मेरी जेब में घंटी गरम थी।
और उसने, बहुत धीमे से, एक लाइन कही जो मैं अब तक नहीं भूलूँगा।
"सवाल पूछा। जवाब सुना। अब आगे बढ़।"
हम सब बाहर निकले।
और मैं, बाहर निकलते वक़्त, एक बार पलटकर देखा।
संदूक के ताले पर ज़ंग की वो मोटी लकीर थी।
पर उसके बीच में, बहुत छोटा सा, एक पतला साफ़ निशान भी था।
जैसे किसी ने उसे अंदर से खुरचा हो।
बाहर दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं, बैसाखी के सहारे, और उनकी आँखें पीछे की गली की तरफ़ थीं।
हवा में पीली रोशनी की गंध थी।
जैसे किसी ने दीया जलाया हो, वहीं, उसी दरवाज़े के भीतर, जिसे खोलने से पापा ने बाईस साल मना किया था।
मीरा ने अपना कैमरा उठाया।
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा।
और पापा, पीछे की तरफ़ चलते हुए, पहली बार मेरी तरफ़ पलटे बिना बोले —
"अंकुश। वहाँ एक दीया है। और जो दीया जलाकर रखता है, वो इस घर में किसी को भी नहीं छोड़ता। सबको बुलाता है।"
मैंने घंटी को जेब में और कसकर पकड़ा।
"तो चलिए, पापा," मैंने कहा। "इस बार हम सब चलते हैं।"
हम पाँच थे।
जब पीछे की गली के मोड़ पर पहुँचे तो सात हो गए, क्योंकि पीपल के नीचे से उस्ताद अली बक्श उठकर हमारे साथ चल पड़े।
और जब हमारे घर के पिछले दरवाज़े के सामने पहुँचे, तो ग्यारह हो गए थे।
दरवाज़ा खुला था।
भीतर दीया जल रहा था।
और दीये के पास, फ़र्श पर, धूल में, एक उँगली से लिखी लाइन थी।
जो बंद करता है, वो आज खुद खुलेगा।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उस पल, बिना किसी घंटी के, बिना किसी जोड़ तंत्र के, सिर्फ़ दो आदमियों के बीच, कुछ ऐसा जुड़ा जो बाईस साल से अलग था।
पापा ने मेरा कंधा पकड़ा।
और मैंने अपना हाथ उनके हाथ पर रख दिया।
अंदर से हवा आई — ठंडी नहीं, गरम नहीं, बस पुरानी।
जैसे बाईस साल की चुप्पी ने पहली बार साँस ली हो।
॥
दीये की लौ हिली।
हवा कहीं नहीं थी। फिर भी लौ एक तरफ़ झुकी, जैसे किसी ने धीरे से साँस छोड़ी हो।
मैं दरवाज़े की चौखट पर खड़ा था और मेरे पीछे ग्यारह लोगों की साँसें थीं। इतनी धीमी कि सुनाई दे रही थीं। जैसे सबने एक साथ साँस लेना बंद कर दिया हो।
अंदर का कमरा छोटा था। इतना छोटा कि हममें से चार लोग एक साथ घुसते तो घुटने टकरा जाते। फ़र्श कच्चा था, चिकनी मिट्टी वाला, जिस पर बरसों की धूल बैठी थी। दीवारें पुरानी, पीली, और उन पर उम्र के धब्बे ऐसे पड़े थे जैसे किसी चेहरे पर नींद की लकीरें।
और बीच में, फ़र्श पर, पीतल के एक छोटे से स्टैंड पर, दीया जल रहा था।
तेल आधा बचा था। बत्ती लाल थी। लौ बहुत सीधी, बहुत शांत, जैसे बरसों से जल रही हो और उसे किसी चीज़ की जल्दी न हो।
"अंदर कोई नहीं है," सानिया की माँ ने धीमे से कहा। "मैंने कहा था न। दीये की रोशनी है।"
माँ ने बैसाखी टिकाकर अंदर झाँका। उनका चेहरा दीये की रोशनी में पीला पड़ गया था।
"यह तेल वही है," माँ ने कहा। "सरसों का। मैं बरसों इसे दीयों में डालती आई हूँ। पर…"
"पर क्या, माँ?"
"पर मैंने यह दीया नहीं जलाया।"
पापा चुप थे। बहुत चुप। उन्होंने चश्मा पहन रखा था, पर मुझे लगा कि वो अंदर कुछ देख नहीं रहे, बस देखने की कोशिश कर रहे हैं।
मैं अंदर गया।
धूल में मेरे जूते के निशान बन गए। मैंने झुककर दीया देखा। पीतल का स्टैंड पुराना था, किनारे से घिसा हुआ, नीचे की तरफ़ एक फूल खुदा था। छोटा-सा। पाँच पंखुड़ियों वाला।
उस्ताद पीछे से आए। उन्होंने चश्मा सीधा किया, घुटने टेककर बैठे, और स्टैंड पर उँगली रखी।
"यह स्टैंड नया नहीं है," उन्होंने कहा। "यह उसी हाथ का काम है।"
"किस हाथ का, उस्ताद?"
वो नहीं बोले। बस उठे, घुटनों पर से धूल झाड़ी, और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो वो कहना नहीं चाह रहे थे।
"बाद में," उन्होंने कहा।
मीरा ने कैमरा अंदर किया। लाल बत्ती जल रही थी। वो कुछ बोलने ही वाली थी कि अचानक रुक गई। उसने कैमरा नीचे किया और नाक से हवा खींची, जैसे कुत्ता खबर सूँघता है।
"अंकुश," उसने कहा। "यहाँ गंध है।"
"कौन सी गंध? तेल की?"
"नहीं।" उसने एक कदम और अंदर रखा। "साबुन की। और धूप की। जैसे कोई कपड़ा यहाँ रखा गया हो जो अभी-अभी धूप से आया हो।"
मैं ठंडा हो गया।
साबुन और धूप।
सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी। उसका पुराना बैग। उस्ताद ने उस दिन सूँघकर कहा था — इसमें साबुन और धूप की गंध है।
"यहाँ कोई आता है," मैंने कहा। "रोज़ नहीं। पर आता है।"
"और दीया जलाकर जाता है," काजल ने कहा। उसकी आवाज़ दबी थी। "क्यों?"
"क्योंकि वो चाहता है कि हम जानें," पापा ने कहा।
सब पलटे।
पापा दरवाज़े पर ही खड़े थे, अंदर नहीं आए थे। उनका एक हाथ चौखट पर था। टेप से बँधा चश्मा उनकी नाक पर थोड़ा फिसल गया था।
"क्या जानें, पापा?"
"कि यह कमरा खाली नहीं है।" उन्होंने अंदर देखा। "और यह घर भी नहीं।"
फ़र्श पर, दीये से चार क़दम दूर, धूल में उँगली से लिखी लाइन थी। मैंने झुककर उसे पढ़ा।
जो बंद करता है, वो आज खुद खुलेगा।
धूल बहुत पतली थी। लिखने वाले की उँगली हल्की रही होगी, या शायद जल्दी में थी। आख़िरी अक्षर थोड़ा टेढ़ा था, जैसे लिखते-लिखते हाथ रुक गया हो।
"यह लिखाई पहचानी लग रही है," टिंकू ने कहा। वो मेरी कमर के पीछे से झाँक रहा था।
"तेरी हर चीज़ पहचानी लगती है," मैंने कहा। "बड़े होकर तू जासूस बनेगा, और मैं तेरा मुँह नहीं देखूँगा।"
"उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"भूत दीया जलाते हैं क्या?"
मैंने उसके सिर पर हल्का हाथ रखा।
"भूत नहीं," मैंने कहा। "बिजली का बिल ज़्यादा डरावना होता है।"
हँसी नहीं फूटी। पर सबके चेहरे पर एक पल के लिए कुछ ढीला हुआ। कभी-कभी हँसी का काम सिर्फ़ यही होता है — डर को थोड़ा पीछे धकेल देना।
मैंने दीवार पर नज़र घुमाई।
दरवाज़े से सीधे हाथ पर एक छोटा ताखा था। पीतल का काँटा, जिस पर कुछ टाँगा जाता था। पर अब कुछ नहीं था। सिर्फ़ काँटा था, और उसके नीचे दीवार पर धूल में एक आयत जैसा साफ़ निशान — जैसे किसी ने कोई चीज़ वहाँ से उतारी हो।
"यहाँ कुछ रखा था," मैंने कहा।
"क्या?"
"पता नहीं। पर वो अब नहीं है।"
मीरा ने तुरंत उस दीवार की तस्वीर ली। क्लिक की आवाज़ उस छोटे कमरे में अजीब तरह गूँजी।
माँ ने धीरे से कहा, "मत बुझाओ।"
"माँ?"
"दीया मत बुझाना।" उन्होंने बैसाखी सँभाली। "जिसने जलाया है, वो जानता है कि जलाना क्या होता है। हम बुझाने वाले नहीं बनेंगे।"
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली ठंडी थी।
"भैया," उसने धीमे से कहा। "मुझे डर लग रहा है।"
"मुझे भी।"
"तुम्हें भी?"
"काजल, मैं डरता नहीं हूँ, ऐसा मैं कब कहता हूँ?" मैंने उसका हाथ दबाया। "पर आज मुझे यह डर अच्छा लग रहा है। क्योंकि इसका मतलब है कि अंदर कोई है। खाली कमरे से मुझे ज़्यादा डर लगता है।"
हम बाहर आए।
मैंने दरवाज़ा बंद नहीं किया। थोड़ा-सा खुला छोड़ दिया, एक हाथ की दरार जितना।
"अंकुश," काजल ने कहा। "खुला छोड़ रहे हो?"
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