The Mysterious Bell – Chapter 956
वो बैठ गए। कुर्सी पर, मेरे सामने, दो हाथ घुटनों पर — मेरी ही तरह। मुझे ये देखकर अजीब लगा, या शायद डर लगा। क्योंकि जब बाप बेटे की तरह बैठता है, तो समझो कुछ बहुत बड़ा टूट रहा है।
काजल चाय लेकर आई। तीन गिलास। माँ की बगल में रखकर चुपचाप दरवाज़े की आड़ में खड़ी हो गई।
मैंने चाय नहीं उठाई।
"पापा," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देख रहे थे।
"मुझे एक बात पूछनी है। और मुझे पता है कि मैं इसे ठीक से नहीं पूछ पाऊँगा। पर पूछूँगा।"
वो चुप रहे।
"बाईस साल।"
मेरी आवाज़ नीची थी, पर काँप नहीं रही थी।
"बाईस साल आप जानते थे कि उस काग़ज़ पर आपका अंगूठा है। आप जानते थे कि वो अंगूठा आपने डर में लगाया। आप जानते थे कि मैं इसे जानने के लायक़ नहीं था। माँ इसे जानती थीं। काजल ने आपको एक रात रोते हुए देखा, वो भी जानती थी। पूरी गली के सामने आज सच आया, पर घर के सामने आने में बाईस साल लग गए।"
मैंने साँस ली।
"क्यों, पापा? इतना बड़ा सच आप इतने साल कैसे अंदर दबाए रहे?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
फिर उन्होंने चाय उठाई। घूँट लिया। गिलास नीचे रखा।
और चुप रहे।
चुप्पी। फिर वो ही चुप्पी।
मुझे अंदर कुछ गरम उठा।
"पापा, मैंने पूछा—"
"सुनाई दिया," उन्होंने कहा।
"तो जवाब दीजिए।"
"अंकुश—" माँ ने कहा।
"नहीं, माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ ज़्यादा ऊँची हो गई, जितनी मेरी आदत नहीं थी। "बाईस साल चुप रहे। आज एक बात बोल दीजिए। इतना तो हक़ है, माँ। आप भी जानती थीं, ये भी जानते थे, काजल भी जानती थी, और मैं— मैं उस घर में अंधेरे में खड़ा रहा, रोज़, यह सोचकर कि मेरे पापा चुप इसलिए हैं क्योंकि वो स्वभाव से चुप हैं। मुझे पता भी नहीं था कि उनकी चुप्पी के नीचे एक अंगूठा है।"
पापा ने गिलास फिर उठाया, पर इस बार नहीं पिया। सिर्फ़ हाथ में पकड़े रहे।
"डर," वो बोले।
एक शब्द।
"क्या?" मैंने कहा।
"डर बोलता नहीं," उन्होंने कहा, बहुत धीमे से, जैसे हर शब्द को मुँह से बाहर निकालने में ताक़त लग रही हो। "डर बोलता नहीं। डर गला घोंट देता है।"
कमरा चुप हो गया।
काजल ने मुँह पर हाथ रखा।
"पहले साल," पापा ने कहा, "मैं रोज़ सोचता था — कल बोल दूँगा। फिर सोचता — अंकुश अभी छोटा है, काजल छोटी है, सुशीला की तबीयत… फिर सोचता — अब बोलूँगा तो दुकान जाएगी। फिर सोचता — अब बोलूँगा तो मुँह पर लोग थूकेंगे। और फिर एक दिन आया जब मुझे याद भी नहीं रहा कि मैं चुप क्यों हूँ। चुप्पी आदत बन गई थी। और आदत का सबसे बड़ा ऐब ये है कि वो खुद को भूलाती नहीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। नमी नहीं — नमी तो रोज़ देखी थी। कुछ और। जैसे कोई आदमी बीस साल तक एक कुएँ में गिरा रहा हो और अब पहली बार ऊपर का आसमान देख रहा हो, और उसे समझ नहीं आ रहा हो कि वो चमक क्या है।
मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरी कुर्सी पीछे सरककर दीवार से टकराई।
"आपकी चुप्पी ने मुझे अंधेरे में रखा, पापा।"
वो नहीं बोले।
"मैं बाईस साल दुकान पर बैठा, ग्रीस लगाता रहा, साइकिलें ठीक करता रहा, और मुझे पता भी नहीं था कि मेरे ही घर की नींव में एक काग़ज़ दबा है जिस पर मेरे पापा का अंगूठा है। मुझे पता नहीं था कि मेरी माँ रोज़ सुबह उठकर किस चीज़ का बोझ ढो रही है। मुझे पता नहीं था कि मेरी बहन एक रात रोते हुए देखकर चुप रही या नहीं!"
"अंकुश—" काजल ने कहा, आवाज़ फटी हुई।
"क्यों छुपाया, पापा?" मैंने कहा। "क्यों नहीं बोले? दुकान जाती तो जाती। लोग थूकते तो थूकते। पर हम जानते होते। ये घर— ये घर झूठ की दीवार पर नहीं टिका होता।"
"तू सच बोलता है," पापा ने कहा।
"तो जवाब दीजिए!"
"मैं डरा हुआ आदमी हूँ," उन्होंने कहा। आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस साफ़ थी। "बेटा, मैं डरा हुआ आदमी हूँ। और डरे हुए आदमी से जवाब माँगना आसान है, उसे देना नहीं।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
माँ ने बैसाखी टिकाई और धीरे से उठीं।
"अब बैठ जाओ," उन्होंने कहा।
"माँ—"
"बैठ जाओ, अंकुश।"
मैं बैठ गया। क्योंकि माँ की आवाज़ में वो चीज़ थी जिसके सामने बीस साल का गुस्सा भी रुक जाता है।
वो खड़ी रहीं। कमरे के बीच में।
"अच्छा सुनो," उन्होंने कहा। "तुम्हारा गुस्सा सच है। ये मैं नहीं कहूँगी कि गुस्सा मत करो। गुस्सा करो। पर एक बात मान लो — गुस्से से सच नहीं खुलता। गुस्सा दरवाज़े पर लात मारता है, और जिस दरवाज़े का ताला सच का हो, वो लात से नहीं खुलता।"
मैंने नीचे देखा।
"और तुम," माँ ने पापा की तरफ़ देखते हुए कहा। "तुम भी सुन लो। तुमने डर में अंगूठा लगाया, ये बात आज पूरी गली जानती है और पूरी गली कह रही है — ये बात हमारे साथ है, हमारे ख़िलाफ़ नहीं। पर तुमने डर में जो दूसरा काम किया, वो तुम्हें कोई नहीं बताएगा, इसलिए मैं बता रही हूँ। तुमने डर में अपने बच्चों को अंधेरे में रखा। ये माफ़ी की बात नहीं। ये भरोसे की बात है। और भरोसा अंगूठे से नहीं, बात से बनता है।"
पापा ने आँखें नीची कर लीं।
काजल अब दरवाज़े की आड़ से निकल आई थी। उसके गाल गीले थे और वो पोंछ भी नहीं रही थी।
"माँ, सब दोषी हैं," उसने कहा।
आवाज़ तेज़ थी। काँपती भी।
"मैं भी दोषी हूँ। मैंने उस रात पापा को भारद्वाज भवन से निकलते देखा था। रोते हुए। और मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया और चादर ओढ़ ली। अगली सुबह मैंने खुद को समझाया कि मैंने सपना देखा था। मैंने खुद से झूठ बोला, भैया। किसी और से नहीं — खुद से।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"और मैंने—" उसकी आवाज़ टूट गई। "और मैं ये सब जानकर भी बीच में आई नहीं। मैं जानती थी कि घर में कुछ गड़बड़ है। मैं जानती थी कि माँ कॉपी में कुछ लिखती है और छुपा देती है। मुझे पता था कि पापा पीछे के कमरे में रात को अकेले बैठते हैं। और मैं— मैं नर्सिंग की किताब खोलकर बैठ जाती थी, जैसे कोई समझदार बेटी होऊँ।"
माँ ने काजल को अपनी तरफ़ खींचा और उसका सिर अपने कंधे पर रख दिया।
"और तुम," काजल ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा, आँसू पोंछते हुए। "तुम भी। तुम रोज़ हँसते रहे। कोई कुछ तुमसे कहता तो तुम हँसी में टाल देते — 'अरे भाई, गाड़ी नहीं है, इंसान है'। तुम मज़ाक करके सब चीज़ को ठीक करने की कोशिश करते हो, भैया। और सब चीज़ ठीक नहीं होती।"
वो सही कह रही थी।
मुझे लगा जैसे किसी ने छत पर पड़े पुराने बल्ब की तरह मेरे अंदर झटका दिया हो और मैं एक पल के लिए बुझ गया।
"हाँ," मैंने कहा। "मैं भी दोषी हूँ। सब दोषी हैं। यही सच है। कोई भी बेकसूर नहीं।"
और तभी पापा उठे।
कुर्सी की टाँग फ़र्श पर खिसकी। वो मेज़ के पास से गुज़रे, मेरे कंधे के पास से, और पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़े।
मैंने पलटकर देखा।
वो अंधेरे में गए। पीछे वाले कमरे में, जहाँ औज़ारों का ट्रंक था और उसके पीछे वो पुराना लोहे का संदूक।
मैं उठकर पीछे गया।
वो संदूक के सामने खड़े थे। झुके हुए। उनका हाथ ताले पर था।
और मैंने देखा।
मंसूर का ताला। जो अभी तक सिर्फ़ थोड़ा काँपा था। जो अभी तक सिर्फ़ थोड़ा भारी था।
पापा ने जैसे ही उसे छुआ, ताला कस गया।
मुझे सुनाई दिया — क्लिक। जैसे किसी ताले के अंदर स्प्रिंग आख़िरी दाँते पर बैठ गई हो।
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