The Mysterious Bell – Chapter 935
दुबे अंकल ने लंबी साँस ली। उन्होंने काग़ज़ को पलटा। पीठ की तरफ़ एक कोना था, जहाँ पुरानी स्याही में दो अक्षर लिखे थे — बंद। और उसी कोने के नीचे, नई नीली स्याही में, ताज़ी लिखाई में, एक छोटी लाइन।
"यह पढ़," उन्होंने कहा।
मैंने पढ़ा। सिर्फ़ तीन शब्द थे।
फिर खोल दो।
मेरे हाथ काँपने लगे। पुरानी स्याही में पचास साल पहले किसी ने लिखा था — बंद। और आज, आज की स्याही में, कोई उसी काग़ज़ पर लिख गया — फिर खोल दो।
"इसका मतलब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी, "कोई उस पुराने केस को फिर से खोल रहा है।"
"इसका मतलब यह है," दुबे अंकल ने कहा, "कि जो भी यह कर रहा है, वो तुझे नहीं बुला रहा। वो तेरे नाम को बुला रहा है।"
तुम सोच रहे होगे कि नाम में क्या बड़ी बात है। नाम तो नाम होता है। तो सुनो — जब कोई आपका नाम ऐसे काग़ज़ पर लिखता है जो आपसे पहले का है, तो वो आपको नहीं, आपके पीछे खड़े किसी को बुला रहा होता है। और मुझे उस रात लगा कि मेरे पीछे कोई खड़ा है। बहुत पुराना कोई। जिसका नाम मैं हूँ।
"अंकुश," दुबे अंकल ने कहा, "मैं डरा हुआ हूँ, और मैं इस उम्र में झूठ नहीं बोलूँगा। मैं पचास साल से इस नाम को भूला हुआ था। उस रात के बाद थाने में किसी ने इस लड़के का नाम नहीं लिया। मैंने खुद उस फाइल को दफ़्ते में दबते देखा। और आज रात यह काग़ज़ मेरे नाम पर आया है। मेरे नाम पर, अंकुश। किसी को पता है कि मैं वो काग़ज़ पहचानूँगा। किसी को पता है कि मैं उसे तेरे पास लाऊँगा।"
"आप मेरे पास क्यों लाए?" मैंने पूछा। "आप सीधे पापा के पास ले जा सकते थे।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बूढ़े सिपाहियों की आँखों में होती है — थकान नहीं, हिसाब। पैंतीस साल का हिसाब।
"क्योंकि तेरे पापा इस काग़ज़ को देखकर टूट जाते," उन्होंने कहा। "और मुझे एक आदमी चाहिए था जो इसे देखकर टूटे नहीं, सवाल पूछे। तेरे पापा ने बाईस साल इस शहर में सिर झुकाकर गुज़ार दिए। मैं उनके सिर पर यह बोझ नहीं रख सकता था।"
मैंने काग़ज़ को मोड़ा और जेब में रखा। मेरी जेब में पहले से बहुत काग़ज़ थे — मीरा का गवाह वाला, रणवीर की बड़ी चाबी, ताले में मिली पट्टी, मंसूर चाचा का पीला काग़ज़। अब एक और। जैसे कोई मुझे धीरे-धीरे काग़ज़ों से दबा रहा हो।
"एक बात और," दुबे अंकल ने कहा। उन्होंने अपनी नीली कवर वाली कॉपी उठाई, जिसके कोने मुड़े हुए थे। "यह काग़ज़ थाने के ताले में अकेला नहीं आया। उसके साथ एक छोटी पर्ची थी। उस पर लिखा था — इसे उसी लड़के को देना जो साइकिल गली में दुकान चलाता है।"
"किसकी लिखाई?"
"वही," उन्होंने कहा। "तेरी जैसी।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे दिख रहे थे, पर बादल दूर से आ रहे थे। ऐसा मौसम होता है न, जब हवा में पानी की गंध आती है और पता चल जाता है कि रात में बारिश होगी। मुझे उस वक़्त लगा कि मेरी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसा ही आ रहा है — दूर से, धीरे-धीरे, और मैं उसे रोक नहीं सकता।
"अंकुश," दुबे अंकल ने कहा, "अब जा। छह बजे तक जो करना है कर ले। और यह काग़ज़…"
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"…इसे पूरी गली के सामने खोलना। अकेले नहीं। अकेले खोला तो यह काग़ज़ तेरे ऊपर भारी पड़ेगा।"
"आप आएँगे?" मैंने पूछा।
उन्होंने अपनी कुर्सी की तरफ़ देखा, जैसे वो कोई पुराना दोस्त हो जिससे बात करनी हो।
"मैं अपनी कुर्सी लेकर आऊँगा," उन्होंने कहा। "यह थाने की नहीं है। यह मेरी अपनी है। और अपनी चीज़ पर बैठकर आदमी कम झूठ बोलता है।"
मैं मुड़ा और चल दिया।
गली में लौटते वक़्त मेरे कदम तेज़ थे, पर सोच धीमी। मन में एक ही बात घूम रही थी — जो चाबी मेरे गले में है, वो किस ताले की है। और जो चाबी रणवीर की उँगली पर धागे से झूल रही थी, वो किस ताले की है।
पीपल के नीचे टिंकू बैठा था। उसके हाथ में रोटी का टुकड़ा था और वो उसे खा नहीं रहा था, बस मसल रहा था।
"उस्ताद," उसने कहा और उठ खड़ा हुआ, "सब जमा हो रहे हैं। शबनम आपा ने केतली चढ़ा दी है, उस्ताद अली बक्श आ गए हैं, और मीरा दीदी अपना कैमरा लेकर…"
"टिंकू," मैंने कहा।
"हाँ?"
"आज तू कुछ नहीं बोलेगा। आज बस सुनना।"
वो एक पल के लिए रुका। फिर उसने सिर हिलाया और अपनी जेब से एक छोटा-सा काग़ज़ निकाला, जिस पर उसने रोटी के टुकड़े से चिकना हाथ पोंछकर कुछ लिखा था।
"यह क्या है?" मैंने पूछा।
"जो भी बोले, मैं लिखूँगा," उसने कहा। "ताकि बाद में कोई मुकर न जाए। मैंने आज सुबह अपने अब्बा का नाम रजिस्टर में देखा था न। अब मुझे लगता है, जो काग़ज़ में लिखा जाता है, वो मिटता नहीं। तो मैं लिखूँगा।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसके बाल गीले थे। मुझे उस वक़्त कुछ कहना था, पर कह नहीं पाया। कभी-कभी सबसे ज़रूरी बात सबसे छोटे आदमी के मुँह से आती है, और आप उसका जवाब नहीं दे पाते।
छह बजे से पहले मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में पहुँचा।
कमरा छोटा था। फ़र्श पर पुरानी चटाई बिछी थी, दीवार से ट्रंक टिका था, और उसके पीछे वो लोहे का संदूक — जिसके नीचे परदादा शिवनारायण का नाम खुदा था। बल्ब गुनगुना रहा था, जैसे वो भी थक गया हो। पीतल का लैंप माँ ने जला दिया था, और उसकी पीली रोशनी में कमरे की धूल साफ़ दिख रही थी — हवा में तैरती हुई, जैसे कोई पुरानी कहानी का पन्ना झड़ रहा हो।
सबसे पहले पापा आए। वो दरवाज़े के पास खड़े रहे, दीवार से टिककर। उनकी नीली कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई थी, और हाथ में कोई औज़ार नहीं था। मुझे उन्हें औज़ार के बिना देखने की आदत नहीं थी। ऐसा लगा जैसे किसी ने उनके हाथ खाली कर दिए हों।
माँ आईं और स्टील का डिब्बा ट्रंक पर रख दिया। उसमें मेरी दवा थी, और एक पानी की बोतल, और दो रोटियाँ — क्योंकि माँ के लिए कोई भी सभा हो, रोटी वहाँ होनी ही चाहिए।
काजल टॉर्च लेकर आई और चुपचाप दरवाज़े के पास बैठ गई। उसके पीछे टिंकू, और टिंकू के पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू — चारों खिड़की के बाहर, जैसे गली के असली पहरेदार वही हों।
उस्ताद अली बक्श आए तो कमरे में सिलाई की गंध आ गई। उन्होंने अपना मोटा चश्मा सीधा किया, कान पर पेंसिल टिकी थी, और हाथ में नापने का फीता था। वो बिना कुछ बोले एक कोने में खड़े हो गए।
शबनम आपा केतली और तीन गिलास लेकर आईं और उन्हें ट्रंक पर रख दिया। फिर उन्होंने कमरे को एक बार देखा और कहा जो सिर्फ़ वही कह सकती थीं।
"कमरा तो छोटा है," उन्होंने कहा, "पर आज इसमें पूरी गली आने वाली है। ज़रा हवा निकलने दो, वरना सच घुट जाएगा।"
और फिर मंसूर चाचा आए।
उनके हाथ में वो थैला था — फटा हुआ, रस्सी से बँधा, जिसे वो कमर से लटकाए रखते थे। वो आकर संदूक के सामने बैठ गए, थैला घुटनों पर रखा, और एक लंबी साँस ली, जैसे कोई पचास साल की सीढ़ी उतरकर आया हो।
अंत में दुबे अंकल आए। दो लड़के उनकी कुर्सी उठाकर लाए और दरवाज़े के पास रख दी। वो बैठे, कुर्सी चरमराई, और उन्होंने अपने घुटनों पर हाथ रखकर कहा, "शुरू करो।"
घड़ी में छह बज गए थे। बाहर हवा तेज़ हो गई थी और खिड़की के काग़ज़ को हिला रही थी।
मैंने मंसूर चाचा की तरफ़ देखा।
"बोलिए," मैंने कहा।
उन्होंने थैले से ताला निकाला और उसे दोनों हाथों से ऊपर उठाया। पीतल की रोशनी में ताला काला दिख रहा था, और उस पर ज़ंग की महीन फूल जमी थी।
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