The Mysterious Bell – Chapter 936
"यह ताला," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ कमरे में गूँजी, "मैंने नहीं बनाया।"
कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
"मैंने इसका जोड़ा बनाया था," मंसूर चाचा ने कहा। "दो ताले। एक ही साँचे से। एक ही लोहा, एक ही माप, एक ही अंदरूनी जीभ। और दो चाबियाँ।"
उन्होंने ताला ट्रंक पर रखा और उस पर अपनी उँगली फेरी।
"पचास साल पहले दो आदमी मेरी दुकान पर आए थे," उन्होंने कहा। "एक की आँखों में आग थी, दूसरे की आँखों में पानी। वो दोनों ऐसे बैठे थे जैसे एक ही आदमी के दो हिस्से हों। उन्होंने मुझे दो ताले बनाने को कहा और एक बात कही जो मैं पचास साल नहीं भूला — कि ये ताले एक-दूसरे से बात करेंगे, चाबी से नहीं।"
"दोनों ने अपनी चाबी एक-दूसरे को दे दी," उन्होंने आगे कहा। "मैंने अपनी आँखों से देखा। एक ने अपनी चाबी दूसरे की हथेली पर रखी, और दूसरे ने अपनी उसकी हथेली पर। जैसे कोई राख रख देता है। फिर वो दोनों चले गए — एक ताला यहाँ रह गया और उसकी चाबी उस घर में, और दूसरा ताला उस घर में रह गया और उसकी चाबी यहाँ।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
बिल्कुल ठंडे। जैसे मैंने बर्फ़ पकड़ी हो। मैंने अपनी गर्दन पर हाथ रखा और गले की पुरानी चाबी महसूस की, जो मैंने पंद्रह-सोलह साल की उम्र में पापा से ली थी और जिसके बारे में मैंने कभी नहीं पूछा कि यह किस ताले की है।
अब मुझे पता चल रहा था।
मेरी चाबी उस ताले की है जो इस घर में नहीं है। मेरी चाबी उस ताले की है जो रणवीर के घर में पड़ा है।
"माँ," मैंने धीरे से कहा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरी चाबी," मैंने कहा, "उस ताले की है जो उनके घर में है।"
कमरे में किसी ने कोई आवाज़ नहीं की। पर मैंने महसूस किया कि सबने एक साथ साँस रोक ली।
"और उसकी चाबी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी, "यहाँ के उस ताले की है।"
मैंने संदूक की तरफ़ इशारा किया।
"मतलब," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ सच का हिसाब लगाते वक़्त आती है, "दो खानदानों ने जानबूझकर अपनी यादें एक-दूसरे के घर में बंद कर रखी थीं।"
"हाँ," मंसूर चाचा ने कहा।
"और इसीलिए," मीरा ने कहा, "कोई भी अपनी याद खुद खोल नहीं सकता। हर एक को दूसरे की चाबी चाहिए।"
"हाँ," मंसूर चाचा ने फिर कहा। "और यही मैंने पचास साल पहले सुना था — ये ताले एक-दूसरे से बात करेंगे, चाबी से नहीं।"
मैंने रणवीर की चाबी याद की। वो पतला चमकता धागा, और उससे झूलती छोटी चाबी, जो मेरे गले की चाबी जैसी दिखती थी। वो अपनी उँगली से उसे खिला रहा था, जानबूझकर, ताकि मैं देखूँ और समझूँ।
वो मुझे कुछ बताना नहीं चाहता था। वो मुझे याद दिलाना चाहता था।
"तो संदूक का ताला," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ कमरे के सबसे छोटे कोने से आई, "उनकी चाबी से खुलेगा?"
मंसूर चाचा ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें मुस्कुराईं, पर होंठ नहीं।
"अगर बात सिर्फ़ चाबी की होती," उन्होंने कहा, "तो मैं पचास साल से यह ताला लिए नहीं बैठा होता। मैं चाबी बनाने वाला हूँ। मैं दो और बना सकता था — तीन भी। पर यह ताला अपनी शर्त खुद बोलता है। और उसने अपनी शर्त बता दी है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या बोला था इसे?" उन्होंने पूछा।
"दादा के हाथ में," मैंने कहा।
"तो यह ताला चाबी का रास्ता नहीं बता रहा," मंसूर चाचा ने कहा। "यह हाथ का रास्ता बता रहा है। इसमें जो बंद है, वो किसी थेली से नहीं, किसी हाथ से निकलेगा। और वो हाथ इस वक़्त इस घर में नहीं है।"
पापा ने पहली बार हिलकर अपनी जगह बदली। उन्होंने दीवार से टिककर खड़े रहना बंद किया और एक कदम आगे आए।
"इतना भी कोई नहीं बताता," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर कमरे में हर शब्द साफ़ सुनाई दिया।
"मुझे किसी ने नहीं बताया," पापा ने कहा। "मेरे पापा ने नहीं बताया। मेरी माँ ने नहीं बताया। मैंने यह संदूक बरसों देखा, इसके नीचे हाथ फेरा, इसका ताला उठाया, और मुझे कभी नहीं पता चला। और आज…"
वो रुके। माँ ने उनका हाथ पकड़ लिया।
"आज पता चल रहा है," पापा ने कहा, "कि यह संदूक मेरा नहीं, किसी और का है। और मैं पचास साल से एक ऐसी चीज़ का रखवाला बना बैठा हूँ जिसका मालिक मुझे कभी बताया ही नहीं गया।"
कमरे में वो सन्नाटा उतरा जो सिर्फ़ सच के बाद उतरता है।
मैंने मंसूर चाचा की तरफ़ देखा। उन्होंने ताला उठाया, उसे उलटा किया, और उसके भीतर की जीभ को उँगली से हिलाया। धातु की एक धीमी, चरमराती आवाज़ निकली।
"आप इसे खोलने की ज़िद नहीं कर रहे," मीरा ने कहा।
"नहीं कर रहा," मंसूर चाचा ने कहा। "क्योंकि जो ताला खुद अपनी शर्त बता दे, उसे ज़बरदस्ती खोलने का मतलब है — उसकी शर्त को झूठ बनाना। और मैं पचास साल से एक ही बात से बचता आया हूँ।"
"किस बात से?" मैंने पूछा।
"इस बात से," उन्होंने कहा, "कि मैं किसी का ताला खोलूँ और उसका बोझ मेरे ऊपर आ जाए।"
उन्होंने ताला ट्रंक पर रख दिया। फिर उन्होंने अपना थैला उठाया और उसके तल्ले से एक चीज़ निकाली — मोटे कपड़े में लिपटी, जिसे उन्होंने खोला नहीं, बस घुटनों पर रख लिया।
"यह आज नहीं," उन्होंने कहा। "यह तब, जब यह ताला खुलेगा।"
काजल ने धीरे से पूछा, "क्या है इसमें?"
मंसूर चाचा ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ ऐसा कहा जो उन्होंने पूरे वक़्त में सबसे धीमे स्वर में कहा।
"एक आवाज़," उन्होंने कहा।
कमरे में बल्ब गुनगुनाया। पीतल के लैंप की लौ एक बार झुकी और फिर सीधी हो गई, जैसे किसी ने उस पर हल्का सा फूँक मारा हो।
"कैसी आवाज़?" मैंने पूछा।
मंसूर चाचा ने ताला उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा। वो ठंडा था, पर उस पर एक हल्की गरमाहट भी थी — जैसे कोई चीज़ अभी-अभी किसी के हाथ से आई हो।
"इस ताले में लोहा नहीं है," उन्होंने कहा।
"मतलब?"
"मतलब यह कि मैंने इसे बनाया तो लोहे से है," उन्होंने कहा, "पर इसमें जो बंद है, वो लोहा नहीं है। इसमें एक याद बंद है।"
फिर उन्होंने उँगली उठाई। उनकी उँगली काँप रही थी, पर आवाज़ नहीं।
"और जिस दिन वो याद खुलेगी," उन्होंने कहा, "उस दिन तुझे अपनी एक पुरानी आवाज़ याद आएगी। ऐसी आवाज़ जो अब तेरे अंदर नहीं है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"कैसी आवाज़?" मैंने फिर पूछा, और मेरी आवाज़ फट रही थी।
"मुझे नहीं पता," मंसूर चाचा ने कहा। "पर मैंने उस रात एक बात सुनी थी, जब वो दोनों आदमी मेरी दुकान से निकले थे। उनमें से एक ने दूसरे से कहा था — जो हमने बंद किया है, वो चीज़ नहीं है। वो आवाज़ है। और आवाज़ को बंद नहीं किया जा सकता, बस भुलाया जा सकता है।"
मेरे हाथ में ताला भारी हो गया। भारी ऐसा कि मुझे लगा वो मेरे हाथ से नीचे खिंच रहा है। मैंने उसे ट्रंक पर रख दिया। फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली में रखा। वो ठंडी थी। बिल्कुल ठंडी, जैसे उसने कई दिन से कुछ न कहा हो।
मैंने धीरे से कहा, "अब बोल।"
कुछ नहीं हुआ।
"बोल," मैंने फिर कहा, और इस बार आवाज़ में गुस्सा था। "जब ज़रूरत नहीं थी तब तू बोलती थी। जब बुलाया तब चुप है?"
खिड़की के बाहर टिंकू ने कुछ कहा, पर मैंने सुना नहीं। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और अपने होंठ सिकोड़ लिए, जैसे कह रही हों — अंदर देख, बाहर नहीं।
और तभी, बहुत हल्की सी, इतनी धीमी कि कमरे में सिर्फ़ मैंने सुनी, घंटी ने कुछ कहा।
"माँगना।"
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