The Mysterious Bell – Chapter 934
मैंने घंटी जेब से निकाली। हथेली पर रखी और धीरे से पूछा, "अब बोल।"
एक पल के लिए कुछ नहीं हुआ। फिर एक बहुत हल्की आवाज़ आई — इतनी धीमी कि मुझे लगा बल्ब है या पंखा। पर शब्द साफ़ थे।
"दादा के हाथ में," घंटी ने कहा।
मैंने आँखें बंद कीं और उस आवाज़ को समझने की कोशिश की। दादा के हाथ में। "मतलब?"
घंटी चुप रही।
"मतलब," मैंने खुद से कहा, "जो संदूक की चीज़ है, वो दादा के हाथ से निकली थी।"
खिड़की से हवा आई। मेज़ पर रखा काग़ज़ हिला। दूर कहीं कुत्ते भौंके। कोई स्कूटर गुज़रा। फिर सन्नाटा।
मैंने ताले को देखा और अपने आप से कहा, "दादा, अब आपकी बारी है। आपने जो रखा है, वो मुझे बंद रखना सिखा गया। पर अब आप बता दीजिए — खोलना कैसे है।"
ठंडी हवा आई। मुझे लगा कमरे में कुछ बदला। संदूक की तरफ़ देखा, वो बंद था। फिर भी मुझे लगा जैसे किसी ने पीछे से हल्का सिर हिलाया।
और उसी वक़्त काजल दरवाज़े पर आई और उसने कुछ कहा जिससे रात की दिशा बदल गई।
"अंकुश," उसने कहा, "बाहर दुबे अंकल हैं। कह रहे हैं कि आज रात थाने में कुछ आया है। एक काग़ज़। और उस काग़ज़ पर तेरा नाम है।"
मैंने घंटी जेब में डाली। ताला मेज़ पर ही रहा। मैं उठा।
"क्या लिखा है?"
"नहीं बताया," काजल ने कहा। "कह रहे हैं कि जब तक तू खुद न आए, कुछ नहीं बोलेंगे।"
फिर कुछ सोचकर उसने कहा, "और अंकुश, एक बात और। दुबे अंकल डर रहे हैं। उनकी आवाज़ काँप रही थी। और वो जब डरते हैं, तो बात अक्सर बड़ी होती है।"
उस रात मैंने ताले को मेज़ पर छोड़ा और दरवाज़ा बंद किया। संदूक को एक बार देखा। फिर दरवाज़े के बाहर निकला।
और तुम सोच रहे होगे कि ये सब रुक गया। नहीं। शुरू हुआ था। दादा का ताला खुलने से पहले थाने का काग़ज़ खुलने वाला था। और उस काग़ज़ में मेरा नाम था, जो मैंने कभी किसी के सामने नहीं लिखा — न किसी रसीद पर, न किसी रजिस्टर में।
पर अगर उस काग़ज़ में मेरा नाम था, तो उसे लिखने वाला वही था जो जानता था कि मैं कौन हूँ — दादा की चाबी वाला। और वो मुझे सिर्फ़ बता रहा था कि अब खेल सीधा है।
मंसूर चाचा ने कहा था — जो चीज़ दादा की है, वो पोते के हाथ में आकर शाप बन जाती है।
मैं गली में निकला, पीपल के नीचे से गुज़रा। ठंडी हवा चल रही थी। पत्ते सरसरा रहे थे। एक चिड़िया जाग रही थी, या सोने की तैयारी कर रही थी। मैंने घंटी जेब में टटोली।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "अगर आज रात कोई बात बिगड़े, तो मुझे बताना। मैं अंधेरे में नहीं लड़ना चाहता।"
घंटी ने एक ही शब्द कहा और मुझे लगा कि उस आवाज़ में पहली बार थोड़ी नरमी थी।
"जानती हूँ।"
मैंने आगे क़दम बढ़ाया। थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी दिख रही थी। उस पर वो बैठे थे, पर सीधे नहीं, झुके हुए। उनके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था और उसे देखते वक़्त उनके कंधे काँप रहे थे।
मैंने तेज़ क़दम बढ़ाए।
कुछ बातें खुलने से पहले इंसान को तोड़ देती हैं। और यह उनमें से एक थी।
॥
थाने के बाहर दुबे अंकल की कुर्सी पुरानी थी, पर उस रात उनकी पीठ कुर्सी से भी ज़्यादा पुरानी लग रही थी।
मैं पहुँचा तो उन्होंने सिर नहीं उठाया। बस लिफ़ाफ़े को दोनों हाथों से दबाए बैठे रहे, जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो और छूट जाने का डर हो।
"आ गया," उन्होंने कहा।
"आ गया," मैंने कहा। "पर आपकी हालत देखकर लग रहा है, मुझे देर हो गई।"
तब उन्होंने आँखें उठाईं। नीली शर्ट की आस्तीन चढ़ी हुई थी और हाथ में वो लिफ़ाफ़ा था जिसका कोना गीला हो चुका था — जैसे उन्होंने उसे कई बार खोला हो, फिर बंद किया हो, फिर खोला हो।
"बैठ," उन्होंने कहा।
"कुर्सी एक ही है," मैंने कहा। "आप बैठे हैं।"
"तो खड़ा रह। सुनने के लिए बैठना ज़रूरी नहीं होता।"
मैं उनके सामने खड़ा हो गया। थाने के अंदर एक जवान सिपाही कुर्सी पर बैठा था, जो हमारी तरफ़ नहीं देख रहा था, पर देख रहा था। ऐसे ही देखते हैं सिपाही — आँखें रजिस्टर पर, कान बाहर।
दुबे अंकल ने लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें से एक काग़ज़ निकला। पीला, मोटा, किनारों से घिसा हुआ, और बीच से दो तहों में मुड़ा हुआ। जिस तरह पुराने काग़ज़ मुड़ते हैं — जैसे उन्हें बंद रहने की आदत पड़ गई हो।
"यह आज रात आया," उन्होंने कहा। "थाने के ताले में पड़ा मिला। मेरे नाम पर।"
"किसने लाया?"
"कोई नहीं जानता। ताले में पड़ा था। सिपाही ने सुबह देखा तो समझा कि कल का कोई काग़ज़ है। फिर उसने मेरा नाम पढ़ा और मेरे पास लाया।"
मैंने हाथ बढ़ाया। उन्होंने काग़ज़ नहीं दिया। पहले उन्होंने अपनी उँगली उस पर रखी, जैसे कह रहे हों — पहले मेरी बात सुन।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैं इस शहर में पैंतीस साल सिपाही रहा हूँ। मैंने कितने काग़ज़ पढ़े हैं, गिन नहीं सकता। पर ऐसा काग़ज़ मैंने दो बार देखा है। एक बार आज रात। और एक बार पचास साल पहले, जब मैं जवान सिपाही था और मेरी मूँछें भी पूरी नहीं आई थीं।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। यह जो ठंडक होती है न, वो हवा से नहीं आती। वो अंदर से आती है, जैसे कोई आपके भीतर का बल्ब बंद कर दे।
"पढ़ो," उन्होंने कहा और काग़ज़ मेरी तरफ़ सरका दिया।
मैंने खोला। स्याही भूरी थी, पुरानी। अक्षर बड़े, थोड़े तिरछे, जल्दी में लिखे हुए। ऊपर एक लाइन थी — पुराने बाज़ार में आग लगने की रात, मिस्त्री शिवनारायण यादव के घर से एक लड़का गुम हुआ।
मेरी आँखें उस लाइन पर अटक गईं। गुम हुआ। लड़का।
नीचे उम्र लिखी थी — करीब दस साल।
और उसके नीचे नाम।
अंकुश यादव।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ लिया। एक पल के लिए मुझे लगा कि मैं किसी और का काग़ज़ पढ़ रहा हूँ, किसी और के नाम का। फिर मैंने अपना नाम अपनी ज़ुबान पर दोहराया, और मुँह सूख गया।
"यह…" मैंने कहा, और आवाज़ नहीं निकली। गला साफ़ करके फिर कहा, "यह मेरा नाम है।"
"हाँ," दुबे अंकल ने कहा।
"पर मैंने यह कभी नहीं लिखा। न किसी रसीद पर, न किसी रजिस्टर में।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मैंने तेरे पापा के काग़ज़ देखे हैं। तेरे हाथ की लिखाई जानता हूँ — दुकान के बोर्ड पर, उन पर्चियों पर जो तू गुमटी में छोड़ता है। और यह लिखाई…"
वो रुके। मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"यह लिखाई तेरी जैसी है," उन्होंने धीरे से कहा। "थोड़ी बड़ी, थोड़ी तिरछी, और हर अक्षर के आख़िर में वो छोटा-सा झुकाव। बिल्कुल तेरी।"
कमरे में सन्नाटा हो गया, हालाँकि हम थाने के बाहर खुले में खड़े थे। पास में पीपल था, दूर कहीं कोई रेडियो बज रहा था, और एक कुत्ता लगातार भौंक रहा था — जैसे वो भी किसी चीज़ से डरा हो।
"तो कोई मेरी नक़ल कर रहा है," मैंने कहा।
"नक़ल करने वाला इतना पुराना काग़ज़ नहीं लिखता," दुबे अंकल ने कहा। "यह काग़ज़ पचास साल पुराना है। इसकी स्याही सूँघ। इसमें वो गंध है जो पुराने थाने के रजिस्टरों से आती थी — सीलन, थोड़ी कपूर, और थोड़ी मिट्टी।"
मैंने सूँघा। और सच में वही गंध थी। घर की अलमारी में पड़े उन पुराने काग़ज़ों जैसी, जिन्हें पापा कभी नहीं खोलते।
"तो मतलब," मैंने कहा, "यह काग़ज़ पचास साल पहले लिखा गया था। और उसमें मेरा नाम है।"
"हाँ।"
"और मैं चौबीस साल का हूँ।"
"हाँ।"
"तो मेरा नाम उस काग़ज़ में कैसे आया, जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था?"
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