The Mysterious Bell – Chapter 933
"तू ठीक सवाल पूछता है, बेटा," उन्होंने कहा। "इसीलिए तेरे उस्ताद तुझे अपने पास रखता है।"
टिंकू ने शर्म से सिर झुका लिया।
फिर मंसूर चाचा ने आगे देखा, न किसी की तरफ़, बस पीपल की तरफ़, जैसे वहाँ कोई उनका जवाब सुन रहा हो।
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैंने ज़िंदगी में एक ताला बनाया था। सिर्फ़ एक। उसमें चाबी नहीं लगती थी।"
चिंटू ने झटके से उनके घुटने पर हाथ रख दिया, फिर तुरंत खींच लिया।
"बिना चाबी का ताला?" चिंटू ने कहा। "फिर ताला ही क्या?"
मंसूर चाचा हँसे। "अच्छा सवाल है।"
उन्होंने एक चाबी हवा में उठाई और उसे देखते हुए कहा, "मेरे सारे ताले सामान्य ताले हैं। किवाड़े के ताले। संदूक के ताले। दरवाज़े के ताले। उनमें डालो चाबी, घुमाओ, खुल गए। पर वो ताला — मैंने उसे ऐसे बनाया जिसमें चाबी के बदले दो आदमी लगते थे।"
मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर मेरी आवाज़ नहीं निकली।
"दो आदमी?" टिंकू ने कहा।
"हाँ," मंसूर चाचा ने कहा। "एक आदमी सामने खड़ा होता है और एक पीछे। दोनों अपनी मर्ज़ी से, साथ-साथ हाथ रखते हैं। बाहर से कोई चाबी डाले, तो ताला हिलता तक नहीं। अंदर से कोई ज़ोर लगाए, तो भी कुछ नहीं होता। दोनों को साथ जाना पड़ता है। और दोनों को एक ही दिन, एक ही पल, एक-दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है — अगर एक ने भी शक किया, ताला खुद बंद हो जाता है।"
चिंटू ने मुँह खोल दिया था। सानिया ने कलम रोक दी थी। टिंकू जम गया था।
मैंने धीरे से घंटी जेब में टटोली। वो ठंडी थी, बिल्कुल ठंडी — न गरम, न काँपती। बस चुप।
"फिर वो ताला खुला?" चिंटू ने पूछा। "आपने ज़रूर खोला होगा?"
मंसूर चाचा ने थाली में से एक चाबी उठाई। बहुत देर देखते रहे। फिर उसे धीरे से वापस रखकर मुँह साफ़ किया।
"नहीं," उन्होंने कहा।
चिंटू रुक गया।
"वो ताला आज तक खुला नहीं," मंसूर चाचा ने कहा। "क्योंकि उन दो आदमियों में से एक भूल गया कि वो किसके साथ खड़ा था।"
बच्चे चुप हो गए।
"भूल गया मतलब?" सानिया ने कहा।
"मतलब," मंसूर चाचा ने कहा, "दोनों एक-दूसरे से बहुत ज़्यादा प्यार करते थे। माँ की कसम खाते थे। एक ही घर में खाते थे, एक ही मकान के दो कोनों में रहते थे, और जब रात को किसी बच्चे को बुखार चढ़ता, तो दोनों एक ही वक़्त में उसके पास पहुँच जाते। फिर एक काग़ज़ आया। उस काग़ज़ ने दोनों को अलग कर दिया। बस एक लाइन की वजह से, जिसे पढ़कर एक आदमी ने दूसरे को चोर समझ लिया। पचास साल बीत गए। एक आदमी अब तक उसी काग़ज़ को पढ़ता है, दूसरा उसी को छुपाकर रखता है। और उनका ताला मेरे पास है, खुला हुआ, ऐसे पड़ा है जैसे बिना मालिक की गाड़ी।"
हवा में सन्नाटा था।
मैंने एक बार सबकी तरफ़ देखा। टिंकू के हाथ में अब भी एक चाबी थी, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी, जैसे वो भूलना नहीं चाहता कि हाथ में क्या है।
मैंने पूछा, "उस ताले से हमें क्या?"
मंसूर चाचा ने मेरी तरफ़ देखा और बहुत धीरे से कहा, "वो ताला अब भी मेरे पास है, अंकुश। आज भी। और आज भी वो चाबी का इंतज़ार कर रहा है जो उसने कभी नहीं माँगी।"
उस शाम मंसूर चाचा को मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में ले गया। बातचीत का तरीक़ा पहले से तय था। पापा आँगन की दहलीज़ पर बैठ गए थे। माँ रसोई में। काजल दरवाज़े के पीछे। गली के बच्चे बाहर, खिड़की के नीचे, पाँच जोड़ी आँखें।
मैंने लोहे के संदूक को उनके सामने रखा। ढक्कन खोला। अंदर वो मैला खादी कपड़ा, रुई की पुड़िया, दोनों आदमियों की कटी तस्वीर — सब रखा वापस। और ऊपर रखा वो ताला, जो अब बिना चाबी खुल गया था।
मंसूर चाचा ने ताला उठाया। हथेली में रखकर देर तक देखते रहे। उन्होंने उँगली सेंटर में रखी और उसे धीरे से दबाया।
"ओह," उन्होंने कहा। "चालीस साल बाद भी मैंने इसे पहचान लिया।"
वो चुप बैठे रहे। एक मिनट, दो मिनट, तीन मिनट। मुझे लगा कि वो बोलेंगे नहीं। कमरे में एक पुरानी महक थी — लोहे, तेल, और मिट्टी की।
फिर उन्होंने ताले को हथेली पर घुमाया।
और मैंने कुछ देखा जो मैं कभी नहीं भूलूँगा। उन्होंने ताले को इस तरह हथेली पर तोला जैसे कोई सुनार सोना तोलता हो — नीचे-ऊपर, नीचे-ऊपर। और उनके होंठ हिले, कुछ जाप करते हुए, जैसे कोई अपनी ही कही हुई बात गिन रहा हो।
"चाचा," मैंने कहा। "आप क्या कर रहे हैं?"
"तोल रहा हूँ।"
"क्या तोल रहे हैं?"
"इस ताले का भार," उन्होंने कहा, "जब मैंने इसको बनाया था तब यह हल्का था। आज यह भारी है।"
"कैसे?"
"कोई ताला अपने आप भारी नहीं होता, अंकुश," उन्होंने कहा और ताले को मेज़ पर रख दिया। "ताला तो लोहा है। भार उसके भीतर की बात से आता है। जिस चीज़ पर आज तक कोई नहीं खुला, वो चीज़ भारी हो जाती है।"
मैं कुछ देर उन्हें देखता रहा। उनका चेहरा अब भी शांत था पर उस पर जो पसीना था, वो गर्मी का नहीं था।
"चाचा," मैंने कहा। "आप इसे खोल सकते हैं?"
वो रुके। बहुत देर रुके।
काजल ने दरवाज़े के पीछे से झाँका। पापा दहलीज़ पर ठिठके। माँ ने रसोई में हल्की सी छनक कर दी — पता नहीं थाली गिरी या हाथ फिसला।
"हाँ," मंसूर चाचा ने कहा। "मैं इसे खोल सकता हूँ।"
मेरे भीतर कुछ हिला। मुझे लगा हवा में साँस लौटी है।
"तो खोल दीजिए।"
"पर पहले," उन्होंने कहा और मेरी तरफ़ मुड़े। "तुझे एक बात माननी पड़ेगी।"
"कौन सी बात?"
"इस संदूक में जो है," मंसूर चाचा ने कहा और संदूक की तरफ़ उँगली बढ़ाई, "वो तेरा नहीं है।"
मैं चुप हो गया।
"वो तेरे दादा का है। जगदीश यादव का। उन्होंने इसे रखा, उन्होंने इसे छिपाया, और उन्होंने ही वो ताला लगवाया जो तुझे बाईस साल से चुपचाप खींच रहा है। तू इसे मेरे हाथ से मत लेना। तू इसे उनके हाथ से लेना।"
मुझे गला सूखता लगा।
"और मानेगा नहीं तो?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब भी शांत थीं, पर छोटी हो गई थीं।
"तो जो चीज़ दादा की है," उन्होंने कहा, "वो पोते के हाथ में आकर शाप बन जाती है। और फिर खोलने से बेहतर है कि वो बंद ही रहे।"
काजल ने दरवाज़ा थोड़ा और खोला। पापा दहलीज़ से एक क़दम आगे आए और फिर ठिठक गए।
मैंने मंसूर चाचा को देखा। मैंने ताले को देखा। मैंने संदूक को देखा, जो पंद्रह मिनट पहले खाली मिला था और अब सिर्फ़ तीन चीज़ों से भरा था और फिर भी भारी लग रहा था।
"मैं समझा नहीं," मैंने कहा। "अगर ये दादा का है, तो मेरा क्या?"
"पोता होने के नाते तेरा एक ही हक़ है," चाचा ने कहा। "बंद रखने का। और जब खोले, तो यह जानकर खोल कि तू उधार ले रहा है, मालिक बनकर नहीं आ रहा।"
मैंने धीरे से कहा, "मैं उधार लूँगा।"
"मुझे बाद में बताना," उन्होंने कहा और उठ गए। "अभी मुझे गुमटी जाना है। शबनम ने कहा है कि आज मेरे लिए चाय रखी है। और तेरे दादा के ताले का भार उतारने से पहले पेट में कुछ जाना चाहिए।"
वो हँसे। पर हँसी आधी थी।
रात नौ बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में अकेला था।
मेज़ पर ताला रखा था। पीछे संदूक बंद था। घंटी जेब में ठंडी थी, अब भी चुप।
मैंने बल्ब जलाया। पुराना बल्ब, जो हमेशा गुनगुनाता है। आज भी गुनगुना रहा था। मुझे लगा जैसे वो भी कुछ कहना चाहता है।
मैंने अपनी गले की चाबी निकाली। ताले के पास ले गया। जैसे ही चाबी पास गई, ताला हल्का काँपा — मुझे यक़ीन है, काँपा। पर खुला नहीं। फिर भी वो मेरी चाबी की आहट सुन रहा था। वो मुझे सुन रहा था।
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