The Mysterious Bell – Chapter 932
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खड़े-खड़े मुझे लगा कि घर की दीवारें थोड़ी दूर सरक गई हैं। माँ की बात हवा में लटक गई थी और मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा था। या शायद पकड़ रहा था, बस मानना नहीं चाह रहा था।
जिसने ताले में रुई डाली, वो मेरे गले की चाबी का जोड़ा जानता होगा। यानी वो सामान्य आदमी नहीं है। वो वही है जिसके पास इस घर की कोई बहुत पुरानी चाबी है। और वो अभी, इसी वक़्त, इसी घर में कहीं बैठा है।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो तस्वीर हाथ में लिए बैठी थीं और उनकी उँगली अब भी उस कटी जगह पर थी, जैसे वो छूकर बता रही हों कि यहाँ कोई था।
"माँ," मैंने धीरे से कहा।
"हूँ।"
"घर में कौन-कौन है जो इस चाबी के बारे में जान सकता है?"
उन्होंने आँख खोली और मुझे देखा। फिर वो मुस्कुराईं। वो मुस्कान जो हमेशा कोई सख़्त बात कहने से ठीक पहले आती है।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "यही सवाल मैं खुद से सुबह से पूछ रही हूँ। और मुझे लगता है, तू भी आज रात यही सवाल लेकर सोएगा।"
"तो जवाब नहीं है?"
"जवाब है," उन्होंने कहा और तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "पर वो जवाब तेरे गले में टँगा है, मेरी ज़ुबान पर नहीं।"
मैंने चाबी उँगलियों में ली। पुरानी, घिसी हुई, और उस पर वही निशान जो मुझे अब हर तरफ़ दिखने लगा था — दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
पापा आँगन की चारपाई पर बैठे थे। घुटनों पर हाथ रखे हुए। उनकी आँखें खुली थीं, पर वो कहीं और देख रहे थे। मैं उनके पास गया और पास में पसर गया।
"पापा।"
"हूँ।"
"जब आपने मुझे ये चाबी दी थी," मैंने कहा, "तब आपने कहा था कि इसका कोई दूसरा हिस्सा नहीं है।"
पापा चुप रहे।
"झूठ बोला था?"
उन्होंने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर वो बोले, "मैंने कहा था कि मुझे नहीं पता। झूठ नहीं बोला था। बस ये नहीं बताया कि मुझे पता था कि मुझे नहीं पता।"
मैं हँस पड़ा। दर्द से। "ये क्या जवाब हुआ?"
"बेटा," उन्होंने कहा और पहली बार मेरी तरफ़ देखा, "कुछ चीज़ें माँ-बाप अपने बच्चों से इसलिए नहीं छिपाते कि वो उन पर भरोसा नहीं करते। वो इसलिए छिपाते हैं कि उन्हें खुद अपनी कही बात पर यक़ीन नहीं होता।"
मैं कुछ देर बैठा रहा। आँगन में सुबह की धूप आ रही थी और पापा के चश्मे पर पड़कर उनकी आँखों से बात कर रही थी। दूर कहीं शबनम आपा की गुमटी से स्टील की थाली गिरने की आवाज़ आई। चिड़िया एक पल को चुप हुई और फिर फिर बोलने लगी।
"पापा," मैंने कहा, "अगर वो चाबी किसी के पास है जो इस घर के अंदर है, तो बताइए कौन हो सकता है।"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
"मुझे नहीं पता, बेटा," उन्होंने कहा। "और यही सबसे डरावनी बात है। क्योंकि अगर मुझे पता होता, तो मैं शायद इतने साल तक इसे अंदर बंद करके न रखता।"
मैं उठा।
"कहाँ जा रहा है?" माँ ने पूछा।
"दुकान।"
"आज दुकान खोलनी है?"
"हाँ," मैंने कहा और शर्ट के बटन ठीक करने लगा। "आज मंसूर चाचा आने वाले हैं। और अगर वो आ रहे हैं, तो गली को पता चलना चाहिए कि कुछ होने वाला है।"
माँ कुछ देर मुझे देखती रहीं। फिर उन्होंने साड़ी का पल्लू ठीक किया और उठकर चूल्हे की तरफ़ चल दीं।
"चाय पीकर जा," उन्होंने कहा। "आज के दिन तेरे लिए काम आएगी।"
दुकान खोलते ही मैंने शटर की आवाज़ सुनी और साथ ही साथ दूर से पाँच जोड़ी चप्पलें चलने की आवाज़। पलटकर देखा तो सानिया तेज़ क़दमों से आ रही थी, उसके पीछे रफ़ीक़, गुड्डू, चिंटू और सबसे आख़िर में टिंकू, जो दौड़ते-दौड़ते रुका, क्योंकि उसके जूते का तसमा खुल गया था।
"उस्ताद!" सानिया ने कहा, हाँफते हुए। "मंसूर चाचा आ रहे हैं। पीपल के मोड़ पर दिखे। वो थैला उठाए हुए जो रोज़ लेकर चलते हैं।"
"उनके साथ कोई है?" मैंने पूछा।
"नहीं," चिंटू ने कहा। "अकेले हैं। पर वो जैसे चल रहे हैं न, उस्ताद, वैसे चलते वक़्त कोई आम आदमी नहीं चलता। वैसे चलते हैं जैसे कोई अंतिम चीज़ लेकर जा रहा हो।"
मैंने रफ़ीक़ को देखा। "तूने देखा?"
"मैंने नहीं," रफ़ीक़ ने कहा और टूटे चश्मे को सही किया, "पर अगर चिंटू कह रहा है तो सच ही कह रहा होगा। चिंटू का दिमाग़ अजीब चीज़ें पकड़ता है।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो ठंडी थी, चुपचाप ठंडी। मैंने उसे हल्का हिलाया। कुछ नहीं हुआ।
"अच्छा," मैंने कहा, "तो सब चलो, चलकर पीपल के नीचे चबूतरी पर बैठते हैं। आज वहीं कुछ होगा।"
पीपल के नीचे उस सुबह की धूप बहुत अलग थी। पत्तों से छनकर आ रही थी, ज़मीन पर चौकोर बनाती हुई, और उसी में मंसूर चाचा बैठे थे।
उन्होंने सफ़ेद टोपी पहनी हुई थी, कंधे पर एक मोटा कपड़े का थैला टँगा था, जिसकी रस्सी पुरानी थी और जिसके नीचे एक-दो जगह से सीवन खुली हुई थी।
उन्होंने थैला ज़मीन पर रखा और उसकी रस्सी खोलने लगे। उँगलियाँ काँप रही थीं — उमर की वजह से, शायद।
"बैठ बेटा," उन्होंने मुझसे कहा, बिना ऊपर देखे। "और ये जो तेरे पीछे भेड़-बकरी की टोली आ रही है, इन्हें भी बैठा। ये देखना चाहिए कि आज उनके उस्ताद को क्या दिखने वाला है।"
आज भी याद है, जब उन्होंने थैला खोला तो मुझे यक़ीन नहीं हुआ।
थैले में से चाबियाँ निकलीं। सैकड़ों। शायद हज़ार से भी ज़्यादा। छोटी, बड़ी, ज़ंग लगी, चमकती, टेढ़ी, सीधी, बंदरगाह वाली, संदूक वाली, किवाड़ वाली, ऐसी जिनके दाँते घिस चुके थे, और ऐसी जिनके ऊपर रंग पड़ा हुआ था।
वो उन्हें एक-एक करके एक लोहे की थाली में डालने लगे। ठन, ठन, ठन। वो आवाज़ पीपल के नीचे गूँज रही थी, और मुझे लगा जैसे गली में कहीं संगीत बज रहा हो, बस वो धुन थोड़ी दुखद थी।
ठन, ठन, ठन।
बच्चे घेरकर बैठ गए। रफ़ीक़ ने एक चाबी उठाई। चिंटू ने दूसरी। गुड्डू ने अपनी जेब से एक पुरानी रिम निकाली और उसे चाबी के साथ पीसने की कोशिश करने लगा, जिस पर सानिया ने उसका हाथ मार दिया।
ठन, ठन।
"मंसूर चाचा," सानिया ने कहा, अपनी कॉपी खोलते हुए, "इतनी सारी चाबियाँ हैं तो इतने सारे ताले कहाँ हैं?"
मंसूर चाचा ने उसकी तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे की आँखें छोटी थीं और उनमें एक बात थी जो बड़ों की आँखों में होती है — बहुत कुछ देख लेने के बाद बची हुई चुप्पी।
"बेटा," उन्होंने कहा, और हँसे, "ताले तो लोगों के दिलों में हैं। चाबियाँ मेरे पास रह गईं।"
सानिया ने अपनी कॉपी पर कुछ लिखने की कोशिश की। फिर रुक गई। फिर कलम की नोक को मुँह पर रखकर सोचने लगी।
मैं वहीं बैठा था। मैंने उनका थैला देखा, जो अब खाली था, पर उसके तल्ले में कुछ और था — एक मोटा कपड़ा जिसमें कुछ लिपटा हुआ था। मैंने पूछने की कोशिश की, पर उन्होंने आँख उठाकर इतना कह दिया कि सवाल हलक में रह गया।
"वो बाद में," उन्होंने कहा। "पहले चाबियाँ।"
ठन, ठन।
फिर टिंकू ने कुछ कहा।
वो एक चाबी हाथ में लेकर उठा था और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो बात है जो बच्चों की आँखों में तब आती है जब वो कुछ ऐसा पूछते हैं जो उन्हें भी किसी ने नहीं पूछा।
"मंसूर चाचा," उसने कहा, "ऐसा ताला बनाया जा सकता है जो अंदर से बंद हो जाए?"
ठन।
आख़िरी चाबी थाली में गिरी और चाचा का हाथ हवा में रुक गया।
उन्होंने अपना हाथ धीरे से नीचे किया। थाली को पास खींचा और उस उलझी हुई चाबियों के ढेर को देखकर बहुत देर तक चुप बैठे रहे। उनका चेहरा बदल गया था — यह एक शब्द में कहना तो मुश्किल है, पर लगा जैसे किसी ने कुछ पूछ लिया जो सालों से किसी ने नहीं पूछा था।
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