The Mysterious Bell – Chapter 931
"अब मैं सत्तर से ऊपर हूँ, बेटी," वो बोले। "अब मुझे कोई पागल कहे तो मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब मुझे सिर्फ़ ये जानना है कि ये तस्वीर मेरे घर से निकलकर यहाँ कैसे पहुँची।"
उन्होंने तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"और इसमें जो दूसरा आदमी है — इलाही बक्श — वो हमारे यहाँ के थे। हमारे बुज़ुर्गों में गिने जाते थे। मेरे अब्बा उन्हें भाई कहते थे। उनके हाथ में जो पेंसिल है, वो उन्होंने कभी कान से नहीं उतारी। कहते थे, नाप लेते वक़्त पेंसिल ढूँढने में आधा दिन चला जाता है।"
मैंने तस्वीर उनके हाथ से ली और लालटेन के नीचे रखी — सुबह की रोशनी में, दुकान की मेज़ पर, जहाँ उसका हर अक्षर साफ़ दिखे।
और तभी मेरी नज़र कुछ और चीज़ पर पड़ी।
तस्वीर के बिल्कुल बीच में।
"उस्ताद," मैंने कहा, "यहाँ क्या है?"
"कहाँ?"
"बीच में। इन दोनों के बीच। यहाँ।"
उन्होंने झुककर देखा।
तस्वीर के बीच में एक जगह कटी हुई थी। बहुत सफ़ाई से। कैंची से। पीछे की दीवार का हिस्सा वहाँ से गायब था और दोनों आदमियों के बीच की जगह में काग़ज़ की सीधी लकीर बन गई थी। जैसे कोई उन दोनों के बीच खड़ा था और उसे किसी ने बड़ी सावधानी से काटकर निकाल दिया। किनारे इतने सीधे थे कि लगता था काटने वाले का हाथ नहीं काँपा।
काजल ने धीरे से कहा, "कोई तीसरा था।"
"हाँ," मैंने कहा।
तभी बाहर से पैरों की आवाज़ आई और मंसूर चाचा अंदर आए। वो आज आने को कह गए थे। वो अपनी लाठी टिकाकर रुके, चाबियों का गुच्छा कमर पर खनका, और उन्होंने तस्वीर देखी।
फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जिससे कमरे की हवा भारी हो गई।
"तीसरे की परछाई भी काटी है," उन्होंने कहा। "देखो, नीचे ज़मीन पर। दो परछाइयाँ हैं। तीसरी नहीं है। जिसने काटा, उसने परछाई भी साथ में काट दी।"
उस्ताद ने मंसूर की तरफ़ देखा, फिर तस्वीर की तरफ़।
और फिर उन्होंने अपनी उँगली उठाई।
बहुत धीरे से। जैसे अंदाज़ा लगाया जा रहा हो कि उँगली कहाँ रखेगी।
उन्होंने उसे तस्वीर की कटी जगह पर रखा।
और बोले, "यहाँ कोई था।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
"मुझे याद है कि यहाँ कोई खड़ा था," उन्होंने आगे कहा। "मुझे याद है कि मैंने इस तस्वीर में तीन आदमी गिने थे, क्योंकि तीनों के कंधों के बीच उनके हाथ आर-पार जाते थे। तीन हाथ। एक कंधा बीच में था। मुझे याद है।"
"और नाम?" मैंने पूछा। "उनका नाम क्या था?"
उस्ताद ने अपनी उँगली उस कटी जगह पर टिकी रखी। उन्होंने आँखें बंद नहीं कीं। वो तस्वीर को देखते रहे, बहुत शांति से, जैसे अंदर कोई दराज़ खोल रहे हों और उसमें सिर्फ़ खाली जगह मिल रही हो।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, "नाम याद नहीं आता।"
मेरा हाथ मेज़ पर रखा रह गया।
"क्या मतलब याद नहीं आता?" काजल ने कहा। "आपने कहा कि आपको याद है कि वहाँ कोई था।"
"हाँ," उस्ताद ने कहा। "याद है कि था। याद नहीं कि कौन था।"
मंसूर चाचा ने धीरे से अपनी लाठी मेज़ के किनारे टिका दी, जैसे उन पर भी कोई बोझ पड़ गया हो।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप ज़रा सोचिए। कहीं कोई काग़ज़, कोई लिखा हुआ, कोई नाम जो आपने —"
"मैंने सोचा है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी। "मैंने पचास साल सोचा है। मैं आज भी रात को जब नींद नहीं आती तो पुराने नाम गिनता हूँ — अपने अब्बा के दोस्त, दुकान के मुनीम, उनके मोहल्ले के तीन सरदार, उनके दो हिस्सेदार — और उस जगह पर पहुँचकर मेरी ज़ुबान रुक जाती है। जैसे रास्ते के बीच में कोई दीवार खड़ी कर दी गई हो।"
उन्होंने उँगली हटाई और तस्वीर मेरी तरफ़ सरका दी।
"और अब ये तस्वीर सामने है," वो बोले। "और मैं इसमें उसकी जगह देख रहा हूँ।"
उन्होंने सूखी हँसी हँसी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तूने कल रात घंटी से क्या माँगा था?"
मेरा दिल एक पल को रुका।
"आपको कैसे —"
"क्योंकि मैंने भी एक बार माँगा था," उन्होंने कहा। "पचास साल पहले। इसी ज़ुबान से। और मेरे साथ भी वही हुआ था। मुझे लगा था कि मैं भूल रहा हूँ। धीरे-धीरे। हर साल थोड़ा। जैसे आदमी अपनी चीज़ें किसी और के घर में छोड़ता जाए और याद न रखे कि कहाँ छोड़ी।"
उन्होंने अपना चश्मा उठाया, पर पहना नहीं। उसे हाथ में घुमाते रहे।
"मुझे लगता था कि भूलना ऐसा होता है," वो बोले। "आज देख रहा हूँ कि भूलना कभी-कभी ऐसा नहीं होता। कभी-कभी तस्वीर में से किसी को काटकर निकाल दिया जाता है, और जिसने काटा, वो तेरी याद से भी उतना ही साफ़ काट देता है। इतना साफ़ कि तुझे कभी पता नहीं चलता कि कुछ कटा है। तुझे बस लगता है कि तस्वीर ऐसी ही थी।"
मैंने तस्वीर को देखा। दोनों आदमी मुस्कुरा रहे थे। उनके कंधों पर एक-दूसरे के हाथ थे। उनके बीच की जगह खाली थी, पर उस खाली जगह का किनारा इतना सीधा था कि साफ़ दिखता था — वहाँ कोई था।
मैंने घंटी जेब से निकाली। उसे हथेली में रखा।
"अब बोल," मैंने कहा। "ये जो उनका नाम कटा है — इसका इलाज क्या है?"
घंटी चुप रही।
फिर, बहुत धीरे से, हथेली में इतना हल्का कंपन हुआ कि मुझे लगा मेरा ही हाथ काँपा। ऐसा लगा जैसे वो कुछ कहना चाहती है। जैसे उसका मुँह खुल रहा है और एक बार फिर कोई ऊपर से हाथ रखकर दबा रहा है।
"अंकुश," उस्ताद ने कहा।
"हाँ।"
"मैं आज यहाँ से जाऊँगा," उन्होंने चश्मा पहनते हुए कहा, "तो मैं तेरे पास एक चीज़ छोड़ जाऊँगा। और वो ये है — जिस नाम को किसी ने काटा है, वो नाम कहीं न कहीं पूरा पड़ा है। काग़ज़ में, किसी के दिमाग़ में, किसी के बच्चे के नाम में, किसी की नींद में। नाम पूरी तरह मरता नहीं। वो सिर्फ़ छिपता है।"
"और अगर उसे छिपाने वाला ज़िंदा हो?"
उस्ताद ने तस्वीर की तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रहे।
"तो उसे भी किसी दिन खुलना पड़ेगा," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो चीज़ें छिपाकर रखी जाती हैं, वो लंबे समय में बोझ बनती हैं, और बोझ वाला आदमी आख़िर में बैठ जाता है।"
वो उठे। कुर्सी थोड़ी खिसकी और फ़र्श पर उसकी टाँग की आवाज़ हुई।
और जब वो दरवाज़े की तरफ़ मुड़े, तब मैंने एक बात देखी जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
उन्होंने उँगली फिर उस कटी जगह पर रखी — मानो बिना देखे, आदत से।
और उनके होंठ हिले। बहुत हल्के से। एक अक्षर बनने की कोशिश करते हुए, जैसे कोई बहुत दूर से अपना नाम बता रहा हो और आवाज़ रास्ते में खो गई हो।
फिर उन्होंने अपनी उँगली हटाई और हवा में ऐसे झाड़ी जैसे वहाँ कुछ लगा हो, और बाहर निकल गए।
मैंने तस्वीर को उठाया और दोनों आदमियों के बीच की उस सीधी कटी जगह को देखा।
तुम सोच रहे होगे कि अब मैं काग़ज़ों की तरफ़ भागूँगा, किसी रजिस्टर की तरफ़, किसी चाबी की तरफ़।
नहीं। उस सुबह मैंने एक काम किया जो मुझे आगे के हर दरवाज़े पर काम आया।
मैंने काजल से कहा, "इस तस्वीर की एक नकल बनवानी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि जो दिमाग़ से कट जाता है, वो आँख के सामने टँगा रहे तो किसी दिन दिमाग़ लौटता है," मैंने कहा।
फिर मैंने तस्वीर माँ को दी और पूछा, "ये रुई? ये ताले के छेद में थी। किसने डाली होगी?"
माँ ने तस्वीर देखते हुए, बिना आँख उठाए, इतना कहा जिसने सुबह की सारी हवा बदल दी।
"जिसने डाली होगी," माँ ने कहा, "वो तेरे गले की चाबी का जोड़ा जानता होगा।"
मैं वहीं खड़ा रह गया।
क्योंकि माँ सही कह रही थीं। ताले में अगर रुई अंदर से बाहर धकेली गई थी, तो उसे धकेलने वाला वो नहीं था जो दरवाज़े के बाहर से आता है। वो अंदर था। और वो अब भी उस घर में कहीं है।
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