The Mysterious Bell930 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 930

6 min read November 5, 2026

मैंने रुई की पुड़िया उठाई और लालटेन के नीचे रखी।

"ये ताले के छेद में थी," मैंने कहा। "मोम नहीं। ये।"

माँ ने देखा।

"इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?"

"फ़र्क़ ये पड़ता है," मैंने कहा, "कि मोम किसी ने गरम किया होता तो जलने की गंध रहती। धुआँ का निशान होता। ये रुई है। सूखी। और इसके रेशे बाहर को मुड़े हैं।"

पापा ने अपना हाथ चौखट से हटाया। "मतलब?"

"मतलब," मैंने कहा, "इसे चाबी के छेद में बाहर से धकेला गया होता तो रेशे अंदर को मुड़ते।"

काजल ने धीरे से कहा, "भैया।"

"हाँ?"

"तू ये क्यों ऐसे कह रहा है जैसे डरना चाहिए?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मज़ाक नहीं कर रही थी। वो सच में पूछ रही थी।

"क्योंकि मुझे खुद समझ नहीं आ रहा," मैंने कहा। "और जब समझ न आए तो मैं बोल देता हूँ। बोलने से कभी-कभी आधा डर निकल जाता है।"

तुम सोच रहे होगे कि एक तस्वीर और एक रुई से क्या होगा। तो सुन लो आगे। उस रात बात तस्वीर की नहीं थी। बात इस बात की थी कि तस्वीर सामने आई और घंटी चुप हो गई।

मैंने जेब से घंटी निकाली। हथेली पर रखी। उँगली से छुआ।

ठंडी।

"घंटी," मैंने कहा।

कुछ नहीं।

"देख लिया, बोल दिया, अब ये क्या है?"

कुछ नहीं। न कोई सरसराहट, न कोई गुनगुनाहट, न वो आधी बात जो वो अक्सर छोड़ जाती थी। जैसे जेब में कोई पुरानी चीज़ पड़ी हो, कोई साधारण पीतल।

मैंने उसे कान के पास लाया। फिर दूर किया। फिर दुबारा लाया।

काजल ने कहा, "तेरे चेहरे पर क्या है?"

"कुछ नहीं।"

"झूठ।"

"हाँ," मैंने कहा। "झूठ।"

पापा अंदर नहीं आए। वो मुड़कर आँगन में चले गए और चारपाई के किनारे बैठ गए। माँ ने तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई और बोलीं, "इसे वहीं रख जहाँ से आई है। पर सुबह उस्ताद को बुला।"

"उस्ताद को?"

"इलाही बक्श का नाम जिसे पता होगा," माँ ने कहा, "वो इन बाज़ारों में रह गया हो तो एक ही आदमी है।"

मैंने तस्वीर कपड़े में लपेटी, रुई की पुड़िया उसी में रखी और दोनों को संदूक के अंदर रखकर ढक्कन बंद किया।

पर उस रात मैं सोया नहीं।

मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में चारपाई पर लेटा था और छत को देख रहा था। बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर मोहल्ला धीरे-धीरे सो रहा था — कहीं कोई बर्तन रख रहा था, कहीं कोई अपने बच्चे को डाँट रहा था, फिर वो भी बंद हो गया।

मैंने घंटी तकिये के नीचे से निकाली और उसे छत की तरफ़ उठाया।

"सुन," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ तू नाराज़ है। पर मुझे बता तो दे कि मेरा क्या लिया।"

चुप्पी।

"तूने कहा था — गुस्से से माँगी ताक़त की कीमत याद देता है। तो दे दी। मैं मान गया। लेकिन कौन सी याद?"

चुप्पी। और उस चुप्पी में कोई जवाब नहीं था, ऐसा जवाब जो शायद मुझे खुद ढूँढना था।

मैंने आँखें बंद करके सोचना शुरू किया।

माँ जब मेरे बाल में तेल लगाती थीं — बचपन में — तो कुछ गुनगुनाती थीं। मुझे धुन याद थी। मुझे याद था कि उसमें पहली लाइन ऊपर जाती थी और फिर नीचे आ जाती थी। मैंने अपने मन में वो धुन गुनगुनाई। शब्द? शब्द नहीं आए।

मैंने दुबारा कोशिश की। नहीं आए।

मैं उठ बैठा।

ये वो बात नहीं थी जैसे भूल जाना होता है। भूलने में आदमी को पता रहता है कि कुछ भूला है, और कोशिश करने पर टुकड़े वापस आ जाते हैं। मेरे साथ ये हो रहा था कि जगह थी, आकार था, वो धुन थी — और बीच से शब्द जैसे किसी ने कैंची से काटकर निकाल दिए थे।

मैंने घंटी को देखा।

"ये है?" मैंने पूछा। "ये मेरी सबसे प्यारी याद थी?"

घंटी ने कुछ नहीं कहा।

और मैं उस रात बहुत देर तक बैठा रहा, उस खाली जगह को टटोलता रहा, जैसे ज़ुबान से दाँत निकल जाने पर आदमी उँगली बार-बार उस गड्ढे में डालता है।

सुबह मैंने टिंकू को उस्ताद के पास भेजा।

टिंकू दौड़कर गया और आधे घंटे में लौटा, हाँफता हुआ। "उस्ताद आ रहे हैं। कहा कि पहले मशीन का पाया ठीक करेंगे, फिर आएँगे।"

"पाया?"

"वो नीचे वाला लोहे का पाया। कह रहे थे कि दुकान आज झुकी हुई लग रही है।"

मैं मुस्कुरा दिया। उस्ताद के पास हर चीज़ का जवाब होता था, और वो जवाब कभी सीधा नहीं होता था।

वो नौ बजे के करीब आए।

दुकान पर आए, चश्मा नाक पर, कान पर पेंसिल, कंधे पर वही मोटा कपड़ा जो वो रोज़ लाते थे और कभी इस्तेमाल नहीं करते थे। गले में सुई धँसी हुई थी, जैसे घर से चलते वक़्त कोई काम अधूरा छूट गया हो और वो उसे साथ ले आए हों।

मैंने उन्हें बैठने की कुर्सी दी। वो बैठे, फिर मैंने कपड़े में लिपटी तस्वीर उनके सामने मेज़ पर रखी।

उन्होंने पहले कपड़े को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"कहाँ से आई?"

"संदूक से," मैंने कहा। "रात को खुला मिला।"

उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने कपड़ा खोला, तस्वीर निकाली, और अपने मोटे चश्मे के ऊपर से मेरी तरफ़ देखा — जैसे पूछ रहे हों, सच में ये वही है?

फिर उन्होंने चश्मा उतारा।

धीरे से, दोनों हाथों से, किनारों को पकड़कर, जैसे कोई बहुत नाज़ुक चीज़ उतार रहे हों। उन्होंने उसे मेज़ पर रखा। अपनी कुर्सी पर पीछे टिके। और तस्वीर को दोनों हाथों में उठाकर देखने लगे।

वो देखते रहे।

मैंने सोचा कि कुछ बोलेंगे। नहीं बोले।

काजल दरवाज़े पर आकर रुक गई। माँ आँगन में खड़ी थीं और अंदर नहीं आईं। पापा दुकान के बाहर, पीपल की तरफ़ मुँह किए खड़े रहे।

मुझे लगा कि बहुत देर हो रही है। फिर मैंने उनके हाथ देखे।

उनके हाथ काँप रहे थे। बहुत हल्का, बहुत छोटा कंपन — वो कंपन जो बूढ़े हाथों में उम्र से आता है, पर ये उम्र का नहीं था।

"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा।

उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।

"ये तस्वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी रोज़ होती थी। रोज़ उनकी आवाज़ सूखी लकड़ी जैसी होती थी — साफ़, कड़क, कम शब्दों वाली। आज वो आवाज़ गीली थी। "ये तस्वीर मेरे घर की दीवार पर टँगी थी।"

कमरा चुप।

"दीवार पर," उन्होंने दोहराया, "खिड़की के पास, उस कील पर जिस पर अब कुछ नहीं टँगा। बरसों टँगी रही।"

"फिर?"

"फिर एक दिन नहीं थी।"

उन्होंने तस्वीर को थोड़ा और ऊपर उठाया।

"मैंने उस दिन सारा घर देखा। संदूक, अलमारी, बक्से, पुराने काग़ज़, कोई कोना नहीं छोड़ा। मैंने अपनी माँ के कपड़ों तक हाथ डाला, जो उनके जाने के बाद मैंने कभी नहीं छुए थे।" उन्होंने तस्वीर नीचे की। "नहीं मिली।"

मैंने कुछ कहना चाहा, पर उन्होंने हाथ उठाकर रोक दिया। जैसे बीच में बोलना उनकी बात तोड़ देगा और वो बात फिर कभी नहीं निकलेगी।

"मैंने आज तक किसी से नहीं कहा," वो बोले, "कि उस तस्वीर को ढूँढते-ढूँढते मेरी आँखें कमज़ोर हुईं। मैंने सबको ये कहा कि उम्र से आँखें गईं। लोगों ने मान लिया। मैंने भी मान लिया। पर सच ये है कि जिस हफ़्ते वो तस्वीर गई, उस हफ़्ते मैंने रात-रात भर दीये जलाकर देखा। तीन महीने। और उसके बाद मैंने चश्मा लगा लिया और कह दिया कि उम्र है।"

मेरे गले में कुछ अटक गया।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने किसी से क्यों नहीं कहा?"

"क्योंकि आदमी तस्वीर के लिए रोता है तो लोग कहते हैं पागल है," उन्होंने कहा। "और मैं उस वक़्त जवान था। जवान आदमी पागल नहीं कहलाना चाहता।"

काजल ने पीछे से कहा, "अब?"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा और पहली बार उनके चेहरे पर वो पुरानी सूखी मुस्कान आई।

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