The Mysterious Bell – Chapter 929
मैं रुक गया।
"क्यों?"
"क्योंकि जिसने खोला, वो शायद अभी भी अंदर है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो नर्सिंग की किताबों से नहीं आती, जो डर से आती है।
माँ ने कहा, "अंकुश, बत्ती वहीं रख दे।"
मैंने लालटेन संदूक के पास रखी।
फिर मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो दहलीज़ पर खड़े थे, हाथ से दरवाज़े का चौखट पकड़े हुए।
"पापा," मैंने कहा, "आपने कहा था कि आज इस कमरे में मुझे आना है। मैं आ गया हूँ।"
पापा ने धीरे से सिर हिलाया। एक बार, बस एक बार।
"खोल," उन्होंने कहा।
मेरा हाथ ढक्कन पर गया। धातु ठंडी नहीं थी। धातु गरम नहीं थी। वो किसी चीज़ जैसी थी जिसे छूने पर लगता है कि उसने अभी-अभी किसी का हाथ छोड़ा है।
मैंने ढक्कन उठाया।
मैंने सोचा था कि अंदर से धूल उड़ेगी। धूल नहीं उड़ी।
अंदर से एक गंध आई। पुरानी, सूखी, बंद गंध — जैसे बरसों से बंद किसी अलमारी का दरवाज़ा पहली बार खुले, जैसे सूखे फूल किसी किताब के पन्नों में दबे हों, जैसे धूप में सुखाया हुआ कपड़ा सालों तक वैसे ही मोड़कर रख दिया गया हो।
और उसी वक़्त, मेरी जेब में घंटी अपने आप बजी।
एक बार।
धीमी, छोटी, जैसे किसी ने दूर से कहा हो — "देख लिया।"
और फिर वो चुप हो गई।
इस बार की चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। यह वो चुप्पी थी जैसे किसी ने उसका मुँह दबा दिया हो। जैसे वो बोलना चाहती हो और कोई उसके ऊपर हाथ रखकर कह रहा हो — नहीं। अभी नहीं।
मैंने लालटेन उठाई और अंदर झाँका।
मेरे पीछे, दहलीज़ पर, पापा ने एक लंबी साँस ली — वो साँस जो आदमी तब लेता है जब वो किसी चीज़ का इंतज़ार करते-करते थक गया हो और वो चीज़ आख़िरकार सामने आ गई हो।
और मेरे अंदर कहीं, बहुत गहरे में, कुछ चुप हो गया।
मुझे समझ नहीं आया क्या। बस इतना पता चला कि अब मेरे भीतर एक कोना ऐसा है जहाँ पहले कोई आवाज़ थी, और अब है नहीं।
मैंने घंटी को जेब से निकाला और हथेली में रखा।
"अब बोल," मैंने कहा।
उसने कुछ नहीं कहा।
"घंटी।"
कुछ नहीं।
और तब मुझे वो बात याद आई जो उसने आज रात दस बजे कही थी।
गुस्से से माँगी ताक़त की कीमत हाथ नहीं देता। याद देता है।
मैंने संदूक के अंदर देखा, और मेरा हाथ एक पल के लिए रुक गया।
क्योंकि अंदर जो रखा था, वो धूल में लिपटा नहीं था।
उसे किसी ने, कभी, बहुत प्यार से रखा था।
॥
लालटेन की रोशनी संदूक के अंदर गिर रही थी और मैं उस रोशनी में देख रहा था कि बरसों की बंद गंध के पीछे क्या छिपा है।
संदूक खाली था।
मैंने एक बार फिर देखा। सच में खाली। न कपड़े, न काग़ज़, न कोई औज़ार, न कोई डिब्बा। सिर्फ़ लकड़ी का भीतरी हिस्सा, जिस पर बैठी धूल कुछ जगहों से साफ़ थी — जैसे किसी ने बहुत सावधानी से सिर्फ़ एक चीज़ निकाली हो और बाकी कुछ भी न छेड़ा हो।
और उसी खाली संदूक के एक कोने में, बीच से थोड़ा हटकर, एक कपड़ा रखा था।
मैंने लालटेन नीचे की।
कपड़ा मोटा था, खादी जैसा, मैला सफ़ेद, किनारों से पीला पड़ चुका। उस पर धूल की पतली परत थी, पर मोड़ की लकीरें अभी भी साफ़ थीं। समझ आ रहा था कि जिसने इसे रखा था, उसने पहले इसे घुटने पर रखकर, आराम से, दो बार मोड़ा था। जल्दी में नहीं। कोई काम निपटाने के लिए नहीं।
और उसी कपड़े के एक कोने में, एक छोटी सी पुड़िया बँधी थी।
मैंने उसे छुआ। वो रुई थी। सूखी रुई, जो अब रुई जैसी नहीं लगती थी। सूखकर वो नाखून जितनी सख़्त हो गई थी, पीली, जैसे कोई चीज़ बरसों तक अपनी जगह पर दबी रही हो और उसका आकार ही बदल गया हो। पुड़िया पर उसी कपड़े का एक धागा दो बार लिपटा हुआ था।
काजल ने पीछे से झाँका।
"क्या है?"
"रुई," मैंने कहा। "सूखी।"
"रुई क्यों?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने उसे उँगलियों में दबाया। रुई ने मेरी उँगली का आकार लिया, फिर धीरे-धीरे वापस फैलने लगी, पर फैली नहीं। जैसे वो अपना आकार छोड़ने को तैयार ही न हो।
मैंने उसे लालटेन के पास ले जाकर देखा।
उसके रेशे एक तरफ़ मुड़े हुए थे। सब एक ही तरफ़। बाहर की तरफ़।
ऐसे, जैसे किसी ने इसे अंदर से बाहर धकेला हो।
मैंने वो बात मुँह से नहीं निकाली। अभी नहीं। अभी तो मेरे सामने वो कपड़ा था, जिसे किसी ने प्यार से रखा था।
मैंने धागा खोला। कपड़ा खुला।
उसके अंदर एक तस्वीर थी।
सिर्फ़ एक तस्वीर। और कुछ नहीं।
तस्वीर सफ़ेद-काली थी, छोटी, हथेली से थोड़ी बड़ी। किनारे मुलायम थे, कोने गोल हो चुके थे, और ऊपर की तरफ़ एक हल्का पीलापन आ गया था, जैसे उसे बहुत बार हाथ लगा हो, उँगलियों ने बहुत बार उसे पकड़ा हो।
मैंने तस्वीर कपड़े से बाहर निकाली और लालटेन के नीचे रखी।
काजल मेरे कंधे के ऊपर से झाँकने लगी। माँ दरवाज़े की तरफ़ आ गई थीं। पापा दहलीज़ पर ही खड़े थे।
तस्वीर में दो आदमी थे।
दोनों जवान। दोनों के चेहरे पर वो मुस्कान थी जो लोग कैमरे के सामने नहीं, अपने लोगों के सामने लाते हैं। एक लंबा, पतला, चौड़े कंधे वाला, कमर पर सादा कपड़े का फीता बँधा हुआ, आँखें सीधी और तेज़। दूसरा उससे थोड़ा भरा हुआ, गोल चेहरा, माथे पर पसीने की हल्की चमक, कान पर पेंसिल, और होंठों पर वो हँसी जो बिना वजह भी आ जाती है।
दोनों के हाथ एक-दूसरे के कंधे पर थे।
मैंने पहली नज़र में नहीं पहचाना। फिर लंबे आदमी के चेहरे पर नज़र ठहरी, और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"ये तो…" मैंने कहा, और आवाज़ आगे नहीं बढ़ी।
"बोल," पापा ने दहलीज़ से कहा।
"ये परदादा हैं," मैंने कहा। "शिवनारायण यादव।"
कमरे में कोई नहीं बोला।
माँ दरवाज़े तक आईं और फिर, बिना कुछ कहे, दरवाज़े के पास ही ज़मीन पर बैठ गईं। सीधे। जैसे उनके पैरों ने उन्हें बैठा दिया हो। उन्होंने तस्वीर मेरे हाथ से ली और लालटेन के पास ले जाकर बहुत देर तक देखती रहीं।
"और ये दूसरे?" काजल ने पूछा।
माँ ने धीरे से कहा, "इलाही बक्श।"
मैं ठिठक गया।
"कौन?"
"इलाही बक्श," माँ ने फिर कहा, और इस बार उनकी आवाज़ में वो अजीब सी थकान थी जो पुरानी यादों को नाम लेते वक़्त आती है। "ये नाम मैंने बहुत बरसों बाद सुना है।"
"कहाँ सुना था?"
माँ ने तस्वीर देखते हुए कहा, "तेरे पापा की माँ ने एक बार कहा था। बुखार में। जब वो चार दिन बाहर ही नहीं आईं। मैंने सुना था और मैंने सोचा था कि बुखार की बकवास है।"
"क्या कहा था?"
"कहा था — इलाही बक्श ने हमारे घर को दो बार बचाया। एक बार आग से, एक बार उस आदमी से।"
कमरा चुप हो गया। काजल ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा दहलीज़ पर खड़े थे, हाथ दरवाज़े के चौखट पर, और उनके चेहरे पर वो याद आ रही थी जो बोली नहीं जाती। फिर उन्होंने एक बात कही और मेरे अंदर कुछ हिल गया।
"यह तस्वीर मैंने बहुत पहले देखी थी," उन्होंने कहा। "जब मैं छोटा था। मेरे पापा के पास, दुकान के उस काले डिब्बे में। और एक दिन वो चली गई। मैंने पूछा था तो पापा ने कहा था — चली गई।"
"चली गई?"
"हाँ।" पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे लगा था कि भूल गए होंगे। पर डिब्बा बंद रहता था और खुलता था तो वो जगह उनकी उँगली से छूते थे। देखकर नहीं। छूकर। जैसे आदमी बत्ती बुझ जाने पर दीवार पर टँगी चीज़ को अंधेरे में भी छू लेता है।"
मैंने तस्वीर पलटी।
पीछे कुछ नहीं था। न तारीख़, न नाम, न मोहर, न कोई पेंसिल की लकीर। कुछ भी नहीं। जैसे जिसने रखी थी, उसने जान-बूझकर पीछे कुछ नहीं लिखा। जैसे उसे लगा हो कि नाम सामने वाले को खुद पता होगा।
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