The Mysterious Bell – Chapter 928
वो चले गए।
रात दस बजे घर में सब चुप था। माँ दवा लेकर सो गईं। काजल अपनी किताब लेकर चारपाई पर लेटी थी, पर उसकी आँखें बंद नहीं थीं। पापा का कमरा अंधेरा था। बत्ती नहीं जली थी।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। बल्ब गुनगुना रहा था। औज़ारों का ट्रंक, लोहे की अलमारी, चारपाई, और कोने में वो संदूक — पीतल की पट्टियाँ, नीचे शिवनारायण का नाम, और ताला, जिसमें मोम जमा था।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
हाथ काँप रहा था। गुस्से से, डर से नहीं।
आज दिन भर मेरे अंदर एक ही बात घूमती रही थी। मेरे पास रणवीर के काग़ज़ हैं। भवानी का रजिस्टर है। मालती की डायरी है। दुबे अंकल का लिफ़ाफ़ा है। मीरा का कैमरा है। इतनी चीज़ें हैं, और फिर भी हर बार वो एक कदम आगे क्यों निकल जाता है?
क्योंकि वो जानता है, और मैं अंदाज़ा लगाता हूँ। उसके पास सफ़ेद कुर्ते वाले हैं, लकड़ी के जूते वाले हैं, मोम है, चाबियाँ हैं। और मेरे पास सिर्फ़ एक घंटी है, जो कभी कुछ कहती है, कभी चुप हो जाती है।
मैंने घंटी उठाई और ज़ोर से बजाई।
आवाज़ कमरे में फैल गई। बल्ब का गुनगुनाना भी उसमें दब गया।
"क्या चाहिए?"
तंत्र की आवाज़ आज अलग थी। धीमी नहीं। साफ़। जैसे किसी ने मेरे कान के अंदर बैठकर, मेरे ही मुँह के पास आकर कहा हो।
मैंने कहा, "वो ताक़त दे।"
"कौन सी?"
"वो ताक़त जो एक रात में सब खोल दे। रणवीर के सारे काग़ज़, सारे ताले, सारे संदूक। मुझे आज रात सब कुछ जानना है। कल नहीं, आज।"
घंटी मेरे हाथ में ठंडी थी। पर उसकी आवाज़ सुनकर मेरी रीढ़ में जो ठंडक उतरी, वो घंटी से भी ठंडी थी।
"यह माँग नहीं है," तंत्र ने कहा।
"तो क्या है?"
"गुस्सा है।"
"तो गुस्से से माँग रहा हूँ। दे।"
"सुन।"
"मैं नहीं सुनना। मैंने सारी उम्र सुना है। अब मैं चाहता हूँ कि एक बार कुछ तेज़ हो। एक रात। बस एक रात, और मैं इस आदमी को इस गली से बाहर कर दूँगा।"
तंत्र चुप रहा। इतनी देर चुप रहा कि मुझे लगा उसने सुनना बंद कर दिया है।
फिर उसने वो कहा, जो उसने कभी इतने साफ़ शब्दों में नहीं कहा था।
"गुस्से से माँगी ताक़त की कीमत हाथ नहीं देता, अंकुश। हाथ तो फटी जेब है। कीमत याद देता है।"
मैं एक पल के लिए रुका।
"कैसी याद?"
"अपनी।"
"मतलब?"
"मतलब — जो तुझे सबसे ज़्यादा याद है, वो उस रात गिरवी रहेगी। और तू उसे ढूँढेगा, और उसे पहचानेगा नहीं।"
मैं हँस दिया। वो हँसी अच्छी नहीं थी। वो हँसी वो होती है जो आदमी तब हँसता है जब उसे लगता है कि वो सबसे चालाक है।
"मेरे पास यादों की कमी नहीं है," मैंने कहा। "दुकान की ग्रीस से लेकर माँ के हाथ की रोटी तक, सब याद है। एक याद कम हो जाएगी तो क्या होगा? रणवीर का एक काग़ज़ खुल जाएगा। उसके बदले में मैं अपनी सारी यादें दे दूँ।"
तंत्र ने कुछ नहीं कहा।
मैंने घंटी दूसरी बार बजाई।
इस बार आवाज़ लंबी नहीं रही। एक छोटी सी धातु की आवाज़ हुई, जैसे कोई गिलास मेज़ पर रख दिया हो।
"माँग रहा हूँ," मैंने कहा। "रनवीर के सारे राज़, एक रात में।"
घंटी ठंडी हो गई।
इतनी ठंडी कि मेरी हथेली सुन्न हो गई। मैंने उसे दूसरे हाथ में लिया। वो और ठंडी थी।
"घंटी?"
कोई जवाब नहीं।
"घंटी, मैंने कुछ ग़लत माँगा तो बता।"
कोई जवाब नहीं।
"अरे, कुछ बोल ना।"
कुछ नहीं।
मैंने उसे कान के पास लाया, जैसे कोई बच्चा खोखले सीप में समुंदर सुनता है। कुछ नहीं था। बस मेरी ही साँस की आवाज़ थी, जो वापस मेरे कान में लौट रही थी।
मैंने उसे मेज़ पर रख दिया।
कमरा मेरे चारों तरफ़ खड़ा था। औज़ार, ट्रंक, संदूक, और बल्ब। और मैं बीच में बैठा था, एक ऐसी चुप्पी में जो पहले कभी इतनी मेरी नहीं थी।
मुझे लगा कि मैंने कुछ तोड़ दिया है। और मुझे यह नहीं पता कि क्या।
मैं उठा और संदूक के पास गया। गले से वो पुरानी चाबी निकाली। चाबी की नोक ताले में डाली।
घूमी नहीं।
मैंने ज़ोर लगाया। ताला जैसे जान-बूझकर अपने अंदर बैठ गया।
"तेरा ताला, तेरी चाबी, और तू बंद," मैंने ताले से कहा। "कमाल है।"
मैं वापस चारपाई पर बैठ गया। मैंने घंटी की तरफ़ देखा। वो वहीं पड़ी थी, एक छोटी सी पीतल की चीज़, जिसने मेरे सारे काम किए थे और आज पहली बार मेरी बात नहीं मानी थी।
तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
काजल थी। आधी नींद में, बाल बिखरे, हाथ में दवा का डिब्बा।
"भैया, माँ कह रही हैं कि तुमने दवा नहीं ली।"
"मैं ठीक हूँ।"
"तुम ठीक नहीं हो," उसने कहा और अंदर आकर मेरे पास बैठ गई। "तुम्हारा चेहरा ऐसा है जैसे तुमने किसी से झगड़ा किया है और वो कोई इंसान नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। काजल पढ़ने में तेज़ थी, पर उससे भी ज़्यादा तेज़ लोगों को पढ़ने में थी।
"काजल, अगर कोई तुमसे कहे कि एक रात में सब कुछ जान लोगे, पर उसके बदले तुम्हारी एक याद चली जाएगी — तो तुम क्या करोगी?"
उसने दवा का डिब्बा मेरी तरफ़ सरका दिया।
"मैं पूछूँगी, कौन सी याद?"
"और अगर वो न बताए?"
"तो मैं नहीं दूँगी," उसने कहा। "याद चीज़ ऐसी है, भैया। जब तक है, तब तक लगता है कुछ नहीं है। और जब चली जाए, तब लगता है सब कुछ वही था।"
वो उठी और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। फिर रुकी।
"और हाँ, पापा की बत्ती अभी भी नहीं जली। वो जाग रहे हैं।"
वो चली गई।
मैं देर तक बैठा रहा। बल्ब गुनगुनाता रहा। मैंने घंटी उठाई और उसे जेब में डाल दिया।
फिर मैंने मंसूर चाचा का पीला काग़ज़ निकाला। "यह मेरा नहीं है," और नीचे दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
मैंने उसे मेज़ पर रखा और उसी को देखता रहा, जैसे कोई तस्वीर देखता है और उसमें अपना चेहरा ढूँढता है।
रात साढ़े बारह बजे के आसपास कमरे में एक आवाज़ हुई।
खट।
मैंने आँखें खोलीं। मैं चारपाई पर लेटा नहीं था, टेक लगाकर बैठा था। बल्ब अभी भी जल रहा था।
खट।
दूसरी आवाज़। इस बार साफ़। धातु की। जैसे कोई चीज़ फ़र्श पर गिरी हो और लुढ़क गई हो।
फिर तीसरी आवाज़ — हल्की, दूर से, जैसे किसी ने साँस रोककर कहा हो, "हम्म।"
मैं खड़ा हो गया।
बाहर आँगन में हलचल हुई। माँ की आवाज़ आई, "अंकुश?" काजल की आवाज़ आई, "क्या गिरा?"
और फिर पापा के कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। वो दरवाज़ा जो सुबह बंद हुआ था, अब खुल रहा था — बिना किसी दस्तक के।
मैंने लालटेन जलाई। दियासलाई हाथ से छूट गई, फिर उठाई, फिर जलाई। मेरे हाथ काँप रहे थे, और मुझे यह पसंद नहीं आया कि वो काँप रहे थे।
मैं कमरे से बाहर निकला। आँगन में माँ खड़ी थीं, काजल उनके पीछे। पापा अपने दरवाज़े पर खड़े थे, चश्मा नहीं पहना था, आँखें आधी बंद।
"कहाँ से आई आवाज़?" माँ ने पूछा।
"पीछे से," मैंने कहा।
मैं लालटेन लेकर पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। पापा मेरे पीछे-पीछे आए, पर दरवाज़े पर रुक गए। कमरे की दहलीज़ पर खड़े रहे, अंदर नहीं आए। जैसे उन्होंने खुद से कुछ वादा किया हो और आज उसे तोड़ना नहीं चाहते।
मैंने लालटेन ऊपर उठाई।
संदूक वहीं था। पीतल की पट्टियाँ, नीचे शिवनारायण का नाम, ढक्कन बंद।
और उसके सामने, फ़र्श पर, ताला पड़ा था।
खुला हुआ।
उसका कुंडा खुला था, और छेद — जिसमें कल तक सख़्त पीला मोम जमा था — अब बिल्कुल साफ़ था। खुला। खाली। जैसे किसी ने अंदर से धक्का दिया हो और मोम टूटकर गिर गया हो।
मैं झुककर उसे उठाने ही जा रहा था कि काजल ने कहा, "भैया, मत छूओ।"
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