The Mysterious Bell – Chapter 927
"कल ग्यारह बजे," मैंने कहा, "पहले हम पूरी गली को बताएँगे कि सरकारी ताला किस चीज़ पर लगता है।"
"किस पर?"
"उस चीज़ पर जिसका कोई मालिक न हो।"
टिंकू ने सिर झुकाया, जैसे उसने कोई जादू सीख लिया हो।
तभी बाहर गली में हवा का झोंका आया और दुकान का टेढ़ा बोर्ड हल्का-सा खड़खड़ाया। मैंने सिर उठाया। मैंने सोचा कि दरवाज़ा खुला रह गया है, और मैं उसे बंद करने उठा।
पर दरवाज़ा बंद था।
और मेज़ पर रखी घंटी, जो आधे घंटे से शांत थी, एक बार हल्की-सी काँपी।
मैंने उसे हाथ में लिया।
"क्या कहा?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
पर उसकी चुप्पी अब वो चुप्पी नहीं थी जो पहले थी। पहले वो मुझसे सवाल पूछती थी। आज वो मुझसे एक बात छिपा रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपने हाथ में कुछ दबाकर बैठा हो और कहे — अभी नहीं, बेटा। अभी नहीं।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"टिंकू, एक काम कर। सुबह जल्दी उठ। मंसूर चाचा को सीधे उस्ताद अली बक्श की दुकान पर ले जाना। उन दोनों को आपस में बात करनी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि दो लोहार अगर एक मेज़ पर बैठ जाएँ," मैंने कहा, "तो कोई ताला बंद नहीं रहता।"
टिंकू हँसा और भाग गया।
मैं अकेला बैठा रहा। बल्ब गुनगुनाता रहा।
मैंने जेब से मंसूर चाचा का पीला काग़ज़ निकाला और उसे खोलकर देखा — "यह मेरा नहीं है," और नीचे दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
और मुझे लगा कि यह काग़ज़ कोई ताला नहीं खोल रहा।
यह काग़ज़ मुझसे कह रहा था कि अब तक जो ताले मैंने खोले, वो सब मेरे थे।
असली ताला वो है, जिस पर नाम किसी और का लिखा है।
और वो नाम — शिवनारायण — आज पहली बार दो जगहों पर एक साथ गूँजा था। मेरी दुकान के पुराने संदूक के नीचे। और एक ऐसे आदमी के घर में, जो इस पूरी गली को अपनी जेब में डालना चाहता है।
सुबह जब मैं उठा, आँगन में चाय की पतीली चढ़ी थी और माँ रोटियाँ बेल रही थीं। पापा चुपचाप बैठे थे, हाथ में रेती पकड़े हुए, और रेती को देख रहे थे, जैसे उससे कोई पुराना हिसाब बाक़ी हो।
मैंने उनके पास जाकर पूछा, "पापा, आपने कहा था कि वो संदूक आपके पापा ने बनाया नहीं था। किसने बनाया?"
पापा ने रेती नीचे रखी।
"उस पर नाम है," उन्होंने कहा। "नाम ही बनाने वाले का है।"
"तो वो संदूक आपके पास कैसे आया?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होता है, जिसने कोई चीज़ छिपाकर रखी हो और उसे छिपाना अब उसके बस में न हो।
"मैं तुझे एक बात बताता हूँ," उन्होंने कहा। "और तू आज इस बात को अपने अंदर रखना।"
"कहिए।"
"उस रात जब मैंने रणवीर के काग़ज़ों पर अंगूठा लगाया," पापा ने कहा, "तो मैंने अपने हाथ से ज़्यादा बड़ा काम किया था।"
मैंने पूछा, "क्या?"
"मैंने उन्हें एक चीज़ दी थी," पापा ने कहा। "और मुझे उस वक़्त लगा था कि मैं सिर्फ़ एक चीज़ दे रहा हूँ। बाद में समझ आया कि मैंने एक वादा दिया था।"
पापा उठे और अपने कमरे की तरफ़ चले गए। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने कहा, "आज शाम मंसूर भाई को घर पर ले आना। मैं उनसे बात करूँगा। पर बात वहीं होगी जहाँ वो संदूक रखा है। मैं उस कमरे में दाख़िल नहीं होऊँगा — तुम मुझे बाहर खड़ा रखना। अब उस कमरे में मुझे नहीं, तुझे जाना है।"
मैं चुप खड़ा रहा।
और मेरे हाथ अपने आप गले की चाबी पर चले गए, और उस वक़्त मुझे लगा कि वो चाबी पहले से ज़्यादा गरम है।
जैसे अब वो किसी ताले को याद करके नहीं, किसी ताले को पुकार कर गरम हो रही हो।
॥
पापा उठे। रेती मेज़ पर पड़ी रह गई। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस आँगन पार किया, कमरे का दरवाज़ा खोला, अंदर गए, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ छोटी थी। एक क्लिक। पर मेरे कान में वो ऐसी बजी जैसे किसी ने ताला बंद कर दिया हो, और चाबी मेरे हाथ से छीन ली हो।
माँ चूल्हे के पास खड़ी थीं, हाथ में बेलन। उन्होंने कुछ कहा नहीं। बस आटे की लोई को थाली में रखा और आँच धीमी कर दी।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा, फिर आँखें नीची कर लीं।
मैंने दरवाज़े पर दो दस्तकें दीं।
"पापा?"
कोई जवाब नहीं।
"पापा, आपने कहा था कि शाम को मंसूर चाचा को लाना है। मैं ले आया तो बात कहाँ होगी? आप कमरे से बाहर आइए।"
अंदर से सिर्फ़ चारपाई की चरचराहट आई। फिर चुप्पी।
माँ ने धीरे से कहा, "अंकुश, उन्हें रहने दो।"
"माँ, वो बंद दरवाज़े के पीछे बैठ गए हैं और आप कह रही हैं रहने दो?"
"मैं यह नहीं कह रही कि सब ठीक है," माँ ने कहा। "मैं यह कह रही हूँ कि आज उनका दरवाज़ा तेरे दस्तक से नहीं खुलेगा। जिस आदमी को अपनी ही बात से शर्म आ रही हो, वो दरवाज़ा अंदर से बंद करता है। उसे खुद खोलने दो।"
मैं आँगन में खड़ा रहा। सूरज ऊपर चढ़ रहा था और मेरे अंदर कुछ जल रहा था, जिसकी आँच सूरज की आँच से अलग थी।
उसी वक़्त गली से टिंकू दौड़ता आया। उसके हाथ में पुराने रेडियो की एक तार थी, जैसे बहाना बनाकर आया हो।
"उस्ताद, मंसूर चाचा की दुकान पर तख़्ते लगे हैं। कोई नहीं खोल रहा। मीरा दीदी वहीं गई हैं।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"टिंकू, उस्ताद अली बक्श की दुकान पर जा। वहाँ बैठ। जब मंसूर चाचा वहाँ आएँ, मुझे खबर करना। उन दोनों को बात करनी है।"
"और आप?"
"मैं दुकान खोलता हूँ," मैंने कहा। "आज कुछ ऐसा ठीक करूँगा जो बजता हो। बजने वाली चीज़ें ठीक करने में आदमी का दिमाग़ साफ़ रहता है।"
टिंकू भाग गया।
दिन कटता गया, पर कटता नहीं दिख रहा था। दोपहर में एक बूढ़ी औरत साइकिल की घंटी लेकर आई। घंटी का ढक्कन दबा हुआ था, अंदर की जीभ फँसी थी। मैंने उसे खोला, स्प्रिंग सीधी की, और घंटी बजाकर उसे लौटा दी।
बूढ़ी औरत हँसी। "बेटा, तेरे हाथ में जादू है।"
मैंने कहा, "नहीं अम्मा, हाथ में सिर्फ़ ग्रीस है। जादू तो आपकी साइकिल में है, जो अब भी बजना चाहती है।"
वो हँसकर चली गई। पर उसके जाने के बाद मैं देर तक उस घंटी को देखता रहा।
जिस चीज़ को मैंने दिन भर ठीक किया, वो मेरी जेब में चुप बैठी थी। और मैं उसे ठीक नहीं कर सकता था, क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि वो टूटी कब।
शाम को मीरा आई। उसने बताया कि मंसूर चाचा उस्ताद की दुकान पर दो घंटे बैठे रहे। और जाते वक़्त एक बात कह गए।
"क्या बात?"
"कह गए — जिस ताले की दो चाबियाँ हों, उसका मालिक एक होता है। दो नहीं।"
मैंने मीरा को देखा।
"और?"
"और यह कि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में एक ताला बनाया था जो अंदर से बंद होता है। वो ताला आज कहीं खुलने वाला है।"
मेरी जेब में घंटी थी। मैंने उसे हाथ में लिया। ठंडी थी।
शाम सात बजे मंसूर चाचा खुद हमारे घर आए। उन्होंने आँगन में खड़े होकर पापा के बंद दरवाज़े को देखा और बस इतना कहा, "शंकर भाई, मैं आया हूँ।"
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
मंसूर चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में बुढ़ापा था, और उस बुढ़ापे के पीछे एक कारीगर की शर्म थी।
"वो नहीं आएँगे," उन्होंने कहा। "आज नहीं।"
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि मैंने भी चालीस साल एक ताला बनाकर अपने ही हाथ से बंद किया है," उन्होंने कहा। "जो आदमी अपना ही बनाया ताला नहीं खोल पाता, वो दरवाज़े के पीछे ही बैठता है। कल आऊँगा, अंकुश। पर एक बात याद रखना — आज रात तेरे कमरे में जो है, वो ताले से नहीं, तेरे सब्र से बंद है।"
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